Sunday, September 30, 2007

जहाँ पे सवेरा हो, बसेरा वहीँ है ~ ~ सृजनगाथा से ~~~


http://www.srijangatha.com/2007-08/octuber07/usa%20ki%20dharti%20se%20-%20lshahji.htm
जहाँ पे सवेरा हो, बसेरा वहीँ है

भारतीय मूल के प्रवासी विश्व मेँ जहाँ कहीँ पहुँचते हैँ और अपने परिवार के साथ बस जाते हैँ वहाँ पर वे लोग अपनी साँस्कृतिक धरोहर साथ ले कर चलते हैँ. मोरीशयस, जावा सुमात्रा, इन्डोनेशीया,मलेशिया,सिँगापोर,होँगकोँग, जैसे पूर्वीय द्वीप सँस्कृति मेँ जा कर भारतीय, ग्राम जीवन से निकल कर, कई परिवारोँ ने,अपनी नई गृहस्थीयाँ बसाईँ थीँ.जिनकी आज शायद २ री या ३ री पीढीयाँ भी वहीँ बसी हुईँ हैँ.वे भारत घूमने तो जाते रहे होँगँ पर लौट के फिर वे भारत नहीँ गये. हाँ ये शत प्रतिशत तो खैर नहीँ कह सकते,कुछेक लौट कर आये भी होँ परँतु अधिकाँश "अप्रवासी" ही बने रहे.
ये "अप्रवासी" भी बडी अजीब किस्म की शख्सियत होती है !
सोचिये,रुप रँग,सोच,मानसिकता, साँस्कृतिक झुकाव, सभी, सर्वथा भारतीय होते हुए भी, इन्सान, परदेश के परिवेश से ताल मेल मिलाने की आजीवन कोशिश करते करते,
वहीं परदेश मेँ प्राण त्याग देता है ...
उसकी माटी पराये देस मेँ पराई माटी मेँ घुल मिल जाती है
और
अगली पीढी, जीती है यादोँ के सहारे ...
सगे सँबँधी भी तस्वीरोँ और यादोँ के सहारे,
अपने
स्वजनोँ को याद करते रहते हैँ !
ये मेरे मन की बातेँ , मैँ , आप को बतला कर, पूर्व भूमिका स्वरुप आपसे बाँट रही हूँ क्यूँकि अब आप से कुछ, चित्रमय झलकियाँ बाँटने का मन है
१) ये चित्र दीर्घा है "गणेशोत्सव " कीँ जो न्यु -योर्क के पास के न्यु जर्सी शहर मेँ सम्पन्न हुआ था :~

~ जिस तरह भारत के हर शहर मेँ गणेश प्रतिमा की प्रेम पूर्वक स्थपना होती है, ठीक उसी तरह, पूरी श्रध्धा और आनँद के साथ, अमेरीका मेँ भी ऐसा उत्सव प्रवासी भारतीय जो अमरीका मेँ घर बसा कर रहते हैँ वे भी ऐसे अनुष्ठान सम्पन्न करते हैँ

1) http://indianera.com/slideshow/GaneshUtsav/index.asp

२) ये चित्र दीर्घा है प्रथम अँतराष्ट्रीय भारतीय प्रवासी दिवस समारोह की जो न्यु -योर्क शहर मेँ सम्पन्न हुआ था :~~

2) http://indianera.com/slideshow/Pier60/index.asp

3 ) और ये चित्र देखिये, "अभूतपूर्व भारत की झलकियाँ उत्सव कीँ "

3 ) http://www.indianera.com/slideshow/brayantpark/index.asp

4 ) और यह ३ री द्रश्य - दीर्घा है " साठ वर्ष - और ६० प्रतिभाएँ "

4 ) http://www.indianera.com/slideshow/KamalNath/index.asp

5) यह चित्रमय कहानी है भारतीय बुजुर्ग समाज की -ब्रीज वोटर इलाके से इन्हेँ पिकनिक या एक दिन की सैर के लिये इकट्ठा करके घूमने ले जाया गया था.युवा पीढी काम काज मेँ व्यस्त रहतीँ हैँ और इन्हेँ भी मनोरँजक पर्यटन की आवश्यक्ता है जिसे पूरा करना जरुरी है.
5 ) http://www.indianera.com/slideshow/senior_council2007/index.asp

6) http://www.harrissalat.com/archives/restaurants/
Jersey City:
"The Number One Indian Ice Cream In The World"
और जिस तरह भारत के परिवार मेँ माता पिता बच्चोँ को आइस्क्रीम खिलाने ले जाते हैँ बिलकुल उसी तरह, अब भारत की मशहूर कँपनी 'क्वालिटी " की दुकान अब अमेरीका मेँ भी खुल गई है !
तो मजे हो गये ना बच्चोँ के और बडोँ के भी !
अब
अमरीका मेँ भी बहुतेरे आ इस्क्रीम मिलते हैँ पर, 'क्वालिटी " का ब्रान्ड मिलने से खुशी बढ गई और अहमदाबाद के वाडीलाल वाला ब्रान्ड भी भारतीय सौदा बेचनेवाली दुकानोँ मेँ अब मिल ही जात है,
आसानी
से ..
.ये भारतीय वस्तु के प्रति भारतीय लोगोँ का मोह है और अमरीकी प्रजा भी शौक से इसे चखती है और पसँद करती है.
इस
प्रकार भारतीय सामग्री का व्यापार बढता जा रहा है. पसँद अपनी अपनी और व्यैक्तिक आज़ादी का सर्वव्यापी विकास प्रजातँत्र की गाडी का एक पहिया है जिस की तेज दौड से
आज
विश्व निकट आकर सिकुडता जा रहा है .
..आज इतना ही, फिर मिलेँगेँ ..
कुछ
और बातोँ के साथ ..
अमरीका
की पाती ...
आपसे
विदा लेती है..
.राम ..राम भाइयोँ और बहनोँ ...
स्नेह सहित : लावण्या

Saturday, September 29, 2007

मौन मेँ सँगीत

मौन मेँ सँगीत
कुहासे से ढँक गया सूरज,
आज दिन पूरा, ख्वाबोँ मेँ गुजरेगा!
तनहाइयोँ मेँ बातेँ होँगीँ,
शाखेँ सुनेँगीँ, नगमे, गम के,
गुलोँके सहमते, चुप हो जाते स्वर,
दिल की रोशनी,धुँधलके की चादर,
लिपटी खामोश वादीयाँ, काँपतीँ हुईँ,
देतीँ दिलासा, कुछ और जीने की आशा !
पहाडोँ के पेड नज़र नहीँ आते,
खडे हैँ, चुपचाप, ओढ चादर घनी,
दर्द गहरी वादीयोँ सा,मौन मेँ सँगीत !
तिनकोँ से सजाये नीड, ख्वाबोँ से सजीले,
पलते विहँग जहाँ कोमल परोँ के बीच,
एक एका, आपा अपना, विश्व सपना सुहाना,
ऐसा लगे मानोँ, बाजे मीठी प्राकृत बीन !
ताल मेँ कँवल, अधखिले, मुँदेँ नयन,
तैरते दो श्वेत हँस,जल पर, मुक्ता मणि से,
क्रौँच पक्षी की पुकार, क्षणिक चीरती, फिर,
आते होँगेँ, वाल्मीकि क्या वन पथ से चलकर ?
ह्र्दय का अवसाद, गहन बन फैलता जो,
शून्य तारक से, निशा को चीरता वो,
शुक्र तारक, प्रथम, सँध्या का, उगा है,
रागिनी बनकर बजी मन की निशा है !
चुपचाप, अपलक, सह लूँ, आज,पलछिन,
कल गर बचेगी तो करुँगी .....बात !

-- लावण्या

Friday, September 28, 2007

थोडा रेशम लगता है ..और वादा न तोड हर पीढी के युवा दीलोँ की धडकनोँ को लता मँगेशकर जी की आवाज़ का जादू उसी तर्ज पे फिर , फिर भाता है

ये दीदी का एक मस्तीभरा गीत है जिसे री - मीक्स किया गया और अलग तरीकोँ से गाया गया है -
- पर, मुझे ये ओरीजीनल गीत ही ज्यादा पसँद है
और ये दूसरा उसी तरह का गीत है जो आज युवा वर्ग मेँ बेहद लोकप्रिय है , सालोँ साल गुजर जाते हैँ और हर पीढी के युवा दीलोँ की धडकनोँ को लता मँगेशकर की आवाज़ का जादू , उसी तर्ज पे फिर , फिर भाता है और समय का बहाव मानोँ रुक सा जाता है.

दीदी के साथ V.I.P. Lounge मेँ बैठे हुए -
स्थल " लोस - अन्जिलिस का हवाई अड्डा
साल: १९७५ -
चित्र मेँ , मैँ हूँ - ( और हाँ मैँ ने अमरीकन ड्रेस पहन रखी थी जिसे देखकर दीदी कुछ नाराज़ हो गईँ थीं और पापा जी से भी जा कर मेरी शिकायत कर दी थी कि "लावण्या, अमरीकन हो गई है ! " -
दूसरे दिन हिल्टन होटल मेँ , मैँ, जामुनी बाँधणी साडी पहन कर गई तब दीदी खुश हो गईँ थीँ और कहा था कि,
" तुम अब वही लावण्या लग रही हो ! "
मेरी अम्मा भी, अक्सर, मुझे, डाँट देतीँ थीँ कि ,
" तुम,भारतीय लडकी हो,तो,साडी ही पहना करो ! " ;-)

अलका जी ने दीदी पर ये आलेख लिखा है और उन्हेँ" युवावस्था का मधुर पँछी" / 'sweet bird of youth " कहा है उसके शीर्षक मेँ ;

( Alka Yagnik the singer )

प्रभु - कुँज , पहली मँजिल का दायाँ फ्लेट लता दीदी व पूरा परिवार रहने के लिये इस्तेमाल करते हैँ - वहीँ भाई ह्र्दयनाथ का परिवार व ३ सँतान, आदीनाथ, बैजनाथ और सबसे छोटी राधा , भारती भाभी के साथ, उषा दीदी, और माई मँगेशकर भी रहतीँ थीँ - और आज भी , सभी रहते हैँ -- बाँयेँ फ्लेट मेँ आशा जी का पूरा परिवार रहता है -- एक दरवाज़ा खोल देने से दोनोँ घर एक हो जाते हैँ


मीना ताई खाडिलकर , लता दीदी और उषा जी प्रसन्न मुद्रा मेँ ~~~
दीदी के लिये श्री दिलीप कुमार जी और नरगिस जी ने ये तारीफ के शब्द कहे थे : ~`
जिस तरह फूल की खुश्बू का कोई रंग नहीं होता वो महज खुश्बू होती है, जिस तरह बहते हुए पानी के झरने या ठंडी हवाओं का कोई घर या देश नहीं होता, जिस तरह कि उभरते हुए सूरज की किरणों का या किसी मासूम बच्चे की मुस्कुराहट का कोई मजहब या भेदभाव नहीं होता, वैसे ही लता मंगेशकर की आवाज कुदरत की तख़लीक का एक करिश्मा है।- दिलीप कुमार (अभिनेता)लता किसी तारीफ की नहीं बल्कि परस्तिश के काबिल हैं। उनकी आवाज सुनने के बाद ऐसा आलम तारी हो जाता है.. यूं समझिए जैसे कोई दरगाह या मंदिर में जाए तो वहां पहुंचकर इबादत में सिर खुदबखुद झुक जाता है और आंखों से बेसाख्ता आंसू बहने लगते हैं।- नरगिस दत्त (अभिनेत्री)

Thursday, September 27, 2007

" स्वरांजली " ~~ Happy Birth day Lata didi !!

ये मेरा चित्र दीदी ने खीँचा है दीदी एक बहुत अच्छी फोटोग्राफर भी हैँ
उषा दीदी और बडी दीदी साथ साथ गाते हुए ~
~ उनके साथ गाये गीत याद आ रहे हैँ क्या ?

दीदी किसी परिचित परिवार की शादी के अवसर पर
अपनी उपस्थिति से अवसर को महिमा प्रदान करतीँ हुईँ

दीदी उनके घर 'प्रभु - कुँज' के पूजा कक्ष मेँ

दीदी का तैल चित्र : आप ये लिन्क से लता दीदी से सँबँधित कई सारे गीत + बातेँ सुन पायेगेँ ~~~ बताइयेगा कि कैसा लगा आपको "स्वराँजलि " का कार्यक्रम :

http://www.sopanshah.com/lavanya/

मेरी लता दीदी को साल गिरह की प्यारभरी, अनेकानेक, शुभ कामना

समूह गान गातीँ हुईँ लता दीदी
"शर्मीली, सकुचाई सी , इस दुनिया मेँ तुम आई हो "
~( अपने घर पर )

माई मँगेशकर और उनकी लाडली पुत्री लते
सर्वथा भारतीय सँस्कृति की जीती जागती मिसाल बनीँ एक नारी परँतु, अपने बलबूते से धनवान और सफल गायिका बनीँ

~~ लता मँगेशकर

मेरे पास दीदी की दी हुई एक बहुत पुरानी तस्वीर

मेरी लता दीदी जब पहली बार अमेरीका मेँ अपना शो करने आयीँ थीँ तब की तस्वीर इस फोटो मेँ दीदी जो गाने गानेवाली थीँ उसे ध्यान से पढ रहीँ हैँ : मानोँ कोईविध्यार्थी अपनी एक्जाम की तैयारी कर रहा हो ! उनकी सँगीत के प्रति लगन वसमर्पण चकित करने की हद्द तक का, अपनी आँखोँ से, मैँने देखा है ~~दीपक मेरे पति वहीँ पर बैठे हुए हैँ और दीदी ने हल्के नीले रँग पर सुफेद फूल की प्रिन्टवाली साडी पहन रखी है जो जरा अनहोनी घटना है क्योँकि वे हमेशा सुफेद साडीयाँ कभी रँगीन किनारे और पल्लू वाली ऐसी ही ज्यादातर पहनतीँ हैँ और उन्होँने श्वेत रँग की ऊनी शोल भी ओढ रखी है , चश्मा भी पहने हैँ और वे अपनी पुस्तक पढने मेँ ध्यान मग्न हैँ !


मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे ...
हां दीदी, आप के स्वरोँ को कौन भूला पायेगा भला ?
७८ बरस की किशोरी या एक सँपूर्ण नारी की छवि ?
आत्मीय , स्वजन, प्यारी बडी दीदी, आपको पैर छू के, प्रणाम करते हुए ,
"आपकी दीर्घायु की , स्वास्थ्य की श्री कृष्ण जी से कामना करती हूँ " ~
~ " साल गिरह की अनेकानेक शुभ कामनाएँ स्वीकारेँ ~
~ सादर, स ~ स्नेह,
लावण्या

Wednesday, September 26, 2007

समीर भाई, आपके अनुरोध पर ;~~~

ये जे. पोल गेटी म्युझीयम के भीतर रखे पुरातन , आकर्षक कलाकृतियोँ के चित्र हैँ समीर भाई, आपके अनुरोध पर : ~
ये क्या हो सकता है ? बताऊँ :-) ?
ये नमक रखने का सोने से बना "सोल्ट सेलर " है
जिसे धनिक राज परिवार भोजन के समय ,
नमक छिडकने के लिये इस्तेमाल किया करते थे.
रोम मेँ इस प्रकार के केसरी और काले रँग के
कलात्मक बरतन प्रचलित थे ~ ये एक ऐसा ही फूलदान है
स्वर्ण मुकुट

वीनस
एक मार्बल पे तैल रँगोँ से उकेरा एक चित्र देखा था ~ "वसँत का आगमन " और रोम शहर मेँ, प्राचीन काल के कपडोँ मेँ सजे रोमन नागरिक, झरोखोँ से झाँकते हुएऔर ११ से १५ वर्ष की आयु के बाल बालिकाएँ हाथोँ मेँ वसँत मेँ खिले नये पुष्प गुच्छोँ के साथ किलकारी भरते, भवन से मार्ग की और झूमते हुए अग्रसर होते हुए ~~~
यह चित्र - द्रश्य , मानस पटल पर, ३२ सालोँ से, मानोँ, अँकित हो गया था जिसकी अति कलात्मक प्रतिकृति, खरीदते हुए सँग्रहालय से सँबँधित वस्तुओँ की दुकान मेँ, मैँ, उसी चित्र को, ढूँढ रही हूँ, देख रही हूँ ......

आहा ! आखिर वह लुभावना चित्र मुझे, मिल ही गया !



Tuesday, September 25, 2007

गेटी म्युझीयम, केलीफोर्नीया प्राँत के लोस ~ एन्जीलीस शहर मेँ बनाया गया , एक बेहद खूबसुरत सँग्रहालय है.

गेटी म्युझीयम, केलीफोर्नीया प्राँत के लोस ~ एन्जीलीस शहर मेँ बनाया गया , एक बेहद खूबसुरत सँग्रहालय है.हम लोग मतलब मैँ और मेरे पति दीपक १९७४ से लेकर १९७६ तक अमेरीका के इसी शहर मेँ रहा करते थे.दीपक अपनी उच्च शिक्षा मेँ व्यस्त रहते थे तो पडौस मेँ रहनेवाली एक मुझसे ऊम्र मेँ बडी महिला अक्सर अपने साथ नये शहर के विभिन्न आकर्षणोँ की सैर कराने, अपनी बडी कार में
ले जाया करती थी.
एक बार हम लोग गेटी म्युझीयम देखने गये थे जो पहले "सान्टा मोनिका " नाम के इलाके में ठीक पेसेफिक महासमुद्र के सामने एक ऊँचे टीले पर हुआ करता था. यह ग़ेटी महोदय की ऐस्टेट है.
फिर हम लोग भारत लौट गये और तब एक समाचार पढे थे कि ये गेटी सँग्रहलाय दूसरे स्थान पर स्थानाँतरित कर दिया गया है.इस बार,गत सप्ताह दुबारा उसे देखने का मौका मिला और बडी प्रसन्नता हुई. कुछ चित्र : ~~
चारोँ तरफ पहाडीयोँ से घिरा यह सँग्रहलाय अत्यँत रमणीय है.ौपर तक पहुँचने के लिये झक्क सुफेद ट्राम पे सवार होकर, जाया जाता है.
गेटी म्युझीयम का आकर्षक प्रवेश - द्वार
"लोस - ऐन्जीलीस " शहर नेपथ्य मेँ दूर तक फैला हुआ दीखाई देता है
जो अमरीका का सबसे विशाल शहर है

एक खुला हवादार, व्युँइँग प्लेटफोर्म,

"ठँडी हवायेँ लहरा के आयेँ "

ये गीत गुनगुनाने का मन हो जाये ऐसा हसीन समाँ था

Sunday, September 16, 2007

सास भी कभी बहु थी ! बच्चन परिवार की झाँकी :)


जब गुड्डी जया भादुरी दुल्हन बनीँ अमिताभ बच्चन कीँश्रीमती तेजी हरिवँशराय बच्चन अपने बडे पुत्र अमिताभ के साथ

आज्ञाकारी बेटी, आदर्श नँदा परिवार की बहु,
पुत्री नव्य नवेली + पुत्र अगत्स्य की मम्मी श्वेताम्बरा निखिल नँदासास भी कभी बहु थी ! ;-))
जया , श्वेता नँदा और ऐश्वर्या, अभिषेक के साथ, मँदिर मेँ पूजा करते हुए
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अरे ये ना समझेँ कि बस .
..इतने फोटो दीखला दिये और बात खतम .
.किस्सा खतम , खाना हजम ..
..नहीँ जी ! :)
फिर लौटेँगेँ ...
कूछ सनहरी यादोँ के साथ ...
जैसा सुझाया है मेरी भाभी ,रजनी भार्गव जी ने
अभी हिन्दी ब्लोग ~~ जगत मेँ यादेँ बाँट लूँ ..
फिर , भविष्य मेँ मेरे सँस्मरणोँ की पुस्तक भी आ ही जायेगी इन्शाल्लाह ! :))

गायत्री दीदी की यादेँ : "मनुष्य की माया और वृक्ष की छाया उसके साथ ही चली जाती है "


डा. शिवशँकर शर्मा "राकेश" मेरे जीजाजी व गायत्री दीदी ३ वर्ष की लावण्या
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"मनुष्य की माया और वृक्ष की छाया उसके साथी ही चली जाती है "
पूज्य चाचाजी ने यही कहा था एक बार मेरे पति स्व. श्री राकेश जी से !
आज उनकी यह बात रह -रह कर मन को कुरेदती है. पूज्य चाचाजी के चले जाने से हमारी तो रक्शारुपी "माया ' और छाया ' दोनोँ एक साथ चली गयीँ और हम असहाय और छटपटाते रह गये ~
जीवन की कुछ घटनायेँ , कुछ बातेँ बीत तो जातीँ हैँ किँतु, उन्हेँ भुलाया नहीँ जा सकता, जन्म - जन्म तक याद रखने को जी चाहता है. कुछ तो ऐसी है, जो बँबई के समुद्री ज्वारोँ मेँ धुल - धुल कर निखर गयी हैँ और शेष
ग्राम्य जीवन के गर्द मेँ दबी -दबी गँधमयी बनी हुईँ हैँ !
सच मानिए, मेरी अमर स्मृतियोँ का केन्द्रबिन्दु केवल मेरे दिवँगत पूज्य चाचाजी कविवर पं.नरेन्द्र शर्मा जी हैँ!
अपने माता पिता से अल्पायु मेँ ही वियुक्त होने के लगभग ६ दशकोँ के उपरान्त यह परम कटु सत्य स्वीकार करना पडता है कि,
मैँ अब अनाथ - पितृहिना हो गयी हूँ ! :-(
एक बरगद की शीतल सघन छाया अचानक चुक गई है !
१९४२ मेँ मैँने पहली बार पूज्य चाचा जी को देखा - जाना था .
तब मैँ केवल छ: वर्ष की थी. तभी एक समर्पित राष्ट्रभक्त काँग्रेसी के नाते, वे दो वर्ष का कठोर कारावास भोग कर गाँव जहाँगीरपुर ( खुर्जा -बुलन्द शहर ) लौटे थे. जनता उनके स्वागत मेँ उमड पडी थी. बडे बडे स्वागत द्वार सजे थे, तोरण झुमे थे और जयजयकार के स्वर जुलूस के बाजोँ के साथ गूँजे थे, तब सरकार ने उन्हेँ बुलन्दशहर मेँ ६ मास तक नज़रबन्द रखा.
उनकी शारीरिक गतिविधि तो नियँत्रित हो गयी किँतु, आत्मिक -मानसिक उछालोँ को शासन छू नहीँ पाया. वे दुर्दिन पूज्य चाचा जी के साथ, मैँने और पूज्य अम्मा जी ने ( दादी जी गँगा देवी जी )
खुरजा की नयी बस्ती के एक मकान मेँ बिताए.
वे बोझिल दिन योँ ही बीत गये.
१९५० हमारे परिवार के लिए बडा अशुभ रहा.
सच मानिए, घर के चोरागोँ ने ही घर को आग लगा दी!
हम भाई बहन पूज्य अम्माजी के साथ गाँव मेँ कृष्णलीला देखने गये थे कि मौका देखकर, हमारे कुछ ईर्ष्यालु भाई -बँधुओँ ने हमारे घर चोरी करा दी !
एक वज्रपात हुआ हम पर, अस्तित्व की जडेँ ही हिल गयीँ पूज्य चाचा जी को वास्तविकता का जब पता चला, तब अपनी परम पूजनीया माता जी के दृढ आग्रह करने पर भी कि दोषी व्यक्तियोँ को अवश्य दँड दिलाया जाए, एक ज्ञानी महापुरुष की तरह यह कह कर मन को समझा लिया और हमारे धैर्य के टूटे बाँध को बाँध दिया कि,
" जो गया वह वापस आनेवाला नहीँ है, भला अपने ही लोगोँ को पुलिस के हवाले कैसे कर दूँ ? अपने घर की बदनामी होगी "
हमारे भरण पोषण के लिए उन्होँने भरपूर सहारा दिया, जिससे हम सम्मान सुविधा सहित रह सकेँ. आर्थिक सहायता तो देते ही थे, अपने चचेरे, फुफेरे भाइयोँ को भी खत लिखते थे कि वे हमारा ध्यान रखेँ.
आज यह सोचकर भी डर लगता है कि पू. चाचा जी का रक्षारुपी हस्त हम पर न होता तो हमारा गाँव मेँ रहना भी सँभव नहीँ था.
चोरी की दुर्घटना के बाद ही पू. चाचाजी मुझे अपने साथ बँबई ले गये.
महानगर की गोद मेँ, गोबर की गुडिया थाप दी !
परम स्नेहशीला पू. सुशीला चची जी ने मुझे बाँहोँ मेँ भर कर
अपने भीतर उतार लिया.
गाँव के घर की देहरी का, जब -तब ध्यान आ ही जाता था.
अपने कर्तव्योँ से कहीँ अधिक,मुझे, अधिकार मिले.
बहुत दिनोँ तक पास - पडौस के लोग मुझे, चाचा जी की बहन समझते रहे. भला, भाई की लडकी को इतनी आत्मीयता से कौन सहेजता है ?
गृह - वापी मेँ पूज्य चाचा जी कमल की तरह मुक्त -निर्लिप्त -से रहते थे.
अपनी धुन मेँ ही सृजन के सूत्र बुनते थे. घर मेँ क्या हो रहा है?
बच्चे क्या कर रहे हैँ ? हम कहाँ आ -जा रहे हैँ ?
उन्हेँ उनसे कोई सरोकार न था.
इसलिए मुझे याद नहीँ कि उन्होँने कभी हमेँ किसी बात पर डाँटा--फटकारा था.
हाँ, प्यारी - प्यारी चाचा जी ही हम सभी से सिर खपाती थीँ जब कभी वे कहती थी कि तुम्हारे चाचा जी ऐसा कह रहे हैँ या तुम्हारे पापा ने यह कहा है, तो हम उनकी भोली अटकल समझकर कहते कि,
" आप ही अपने मन से बना रहीँ हैँ ,
वह तो कभी कुछ कहते ही नहीँ ! "
सच तो यह है कि
बच्चे माँ के निकटतम सँपर्क मेँ रहने कारण सिर चढे हो जाते हैँ
यह सँस्मरण उन दिनोँ का है जब पूज्य चचा जी आकाशवाणी दिल्ली मेँ
" विविधभारती " के लोकप्रिय कार्यक्रम निर्देशक थे.
ट्रेन का समय हो रहा था. हम सब नास्ता कर रहे थे तभी पूज्य चाची जी अचानक किसी बात का ध्यान कर के कुछ रुँआसी होकर कहने लगी
" नरेन्द्र जी, मैँ भी आपके साथ दिल्ली चलूँगी
ये बच्चे मुझे बहुत परेशान करते हैँ "
पूज्य चाचा जी ने मुस्कुराते हुए पूछा,
" कौन परेशान करता है ? "
वो बोलीँ, " गायत्री से लेकर परितोष तक सभी "
चाचा जी फिर मधुर कर्कश आवाज मेँ कहने लगे,
" देखो बच्चोँ, तुम अपनी अम्मा को परेशान मत करना , इनका कहना माना करो नहीँ तो अगली बार इन्हेँ अपने साथ दिल्ली ले जाऊँगा "
यह कह कर कुछ और लँबी मुस्कान होँठोँ मेँ ही पी गये
वे गर्जनाओँ मेँ विश्वास नहीँ करते थे.
शायद उन्हेँ अपने सात्विक सँस्कारोँ पर भरोसा था
और फिर स्टेशन रवाना हो गये.
वे कभी निराश - हताश नहीँ दीखे --
ईश्वर के व्यक्त अव्यक्त निर्णय के प्रति सर्वात्मना विनत रहे.
इसीलिए प्रभु का नाम प्रभुमय होने तक उनका अविरत जप रहा.
उनकी सँत योगी जैसी क्षणिक मृत्यु हुई !
अपना ज्योति कलश , ज्योति पुरुष ने अचानक उठा लिया.
जितना स्नेह सम्मान पाया था, यहाँ ,
उससे कहीँ अधिक दे गये देने पाने वालोँ को !
पू. चाचा जी का बहुचर्चित महामानव - कवि रुप
अविस्मृत स्मृति शेष हो गया है !
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लेखिका " श्रीमता गायत्री "राकेश "
कविता, मैरिस रोड अलीगढ यु.पी. भारत

Friday, September 14, 2007

बँबई का माउन्ट मेरी का चर्च, बान्द्रा (सँस्मरण)

बँबई का माउन्ट मेरी चर्च,
मुम्बई नाम जिस देवी के लिये बना है उसी मुम्बा देवी का मँदिर
बँबई के माउन्ट मेरी के चर्च,
बान्द्रा मेँ हम अक्सर, घर से पैदल चल कर जाते थे.
अरब समुद्र के सामने छोटी पहाडी
पे बसा ये चर्च बेहद खूबसुरत है
और मेरी आस्था का एक केन्द्र भी है ~
~ अन्य, मंदिरों के साथ !
आज ऊम्र के इस पडाव पर आने के बाद, बचपन की मीठी बातोँ मेँ मन बार बार लौट जाने को बैचेन रहता है.मेरे बचपन के ४ वर्ष बँबई महानगर के मध्य मेँ बसे माटुँगा उपनगर के शिवाजी पार्क के इलाके से जुडी यादेँ हैं .....
ये शिवाजी पार्क माटुँगा के बीचोँबीच एक खुला मैदान है जहाँ सुनील गावसकर और सचिन तेँदुलकर जैसे होनहार क्रिकेट खिलाडी भी अपना बल्ला सम्हाले बचपन से जवानी की ओर बढते हुए,
खेल सीखते दीख जाते थे.
हम लोग तैकलवाडी के पहिले मँजिल के १ बड कमरा और एक छोटा कमरा जिसके पीछे एक बडा रसोई घर था वहीं रहते थे.
ये वही घर था जो मेरे प्रख्यात कवि पिता पँडित नरेद्र शर्मा ने बँबई आते ही अपने आवास के रुप मेँ चुना थापापा जी की जीवन यात्रा का सफर ग्राम जहाँगीरपुर, खुर्जा, बुलँद शहर से शुरु होता इलाहाबाद के त्रिवेणी सँगमसे विध्यापन समाप्त करता वाराणसी काशी विश्वविध्यालय मेँ २ साल बीता कर , आनँद भवन मेँ ४ साल बिता कर,फिर देवली डीटेँशन कैँप, आग्रा और राजस्थान की ब्रिटीश जेलोँ मेँ , २ वर्ष बिताने के बाद, फिर गाँव अपनी माता जी, गँगा देवी से मिलने, जहाँगीरपुर पहुँचा ही था कि चित्रलेखा के सुप्रसिध्ध लेखक श्री भगवती चरण वर्मा जी पापा को बँबई, हिन्दी फिल्मोँ मेँ पट कथा व गीत लेखन के लिये बँबई, "बोम्बे टाकीज़ " मेँ श्रीमती देविका रानी के निर्माण सँस्था से
जुडने हेतु बँबई अपने साथ ले आये थे. युवा कवि नरेन्द्र ने तब,
माटुँगा के इसी घर मेँ रहना शुरु किया था और उनके पीछे पीछे,
प्रसिध्ध छायावादी कविश्री सुमित्रानँदन पँत जी दादा जी भी, उन्हीँ के पास रहने आ गये थे.
2 वर्ष तक वह छोटा सा फ्लेट,
हिन्दी साहित्यिक गतिविधियोँ का केन्द्र बिन्दु बना, अनेकविध ,
नित नयी कविता और कहानीयोँ को सुनता रहा ~
~ और पँत जी की अगुवानी मेँ, और उन्हीँ के आग्रह से, यु. पी. के ब्राह्मण युवक मेरे पापा जी का एक गुजराती कन्या
सुशीला से पाणि ग्रहण संस्कारा सँपन्न हुआ था.
अब उस छोटे से फ्लेट मेँ ३ प्राणी रहन लगे थे,
1) पँत जी, २ ) पापा जी और ३ ) श्रीमती सौ. सुशीला नरेन्द्र शर्मा !
शादी की खबर सुन कर गाँव से , सास जी ,गँगा देवी, आईँ ! और अपने साथ, ताऊजी की बिटिया गायत्री जो १२, या १३ वर्ष की थीँ
उन्हेँ भी अपने साथ ले आईँ और अपनी नई नवेली बहु को उसे सौँपते हुए कहा कि," जेठ जी,
जिठानी जी तो रहे नहीँ बहू !!
२ बेटोँ को तो मैँ पाल लूँगी गाँव मेँ, वे खेती सम्भालेँगे,
इस बिटिया को तू, यहाँ सम्हाल ले .
.और अँग्रेज़ी इस्कूल मेँ ना भेजियो,
ना ही सहरी रीत भात सीखाइयो,
हाँ सलीका सीखा दीजो ! '
ये हिदायत देकर लाख समझाने पर भी बँबई ना रुकते हुए, अम्मा जी अपने पुत्र की सुखी गृहस्थी को आशिषेँ आखिर देतीँ, आखिरकार , जहाँगीर पुर खुर्जा की ट्रेन पर सवार,
तोहफोँ से लदे, बैगोँ के साथ, फिर लौट गईँ थीँ गाँव !
और गायत्री दीदी समेत अब उस छोटे से फ्लेट मेँ ,
४ प्राणी रहने लगे थे और २ चाकर थे -
१ था गोपाल जो शुध्ध शाकाहारी भोजन शर्मा परिवार के लिये बनाया करता था और दूसरा था बहादुर नेपाली जो श्रेध्धेय पँतजी के लिये माँसाहारी खाना अलग चुल्हे पे बनाया करता था ~
~ और , मुझसे बडी मेरी बहन प्रिय वासवी के जन्म होते होते,पँत जी दादा जी इलाहाबाद लौट गये थे उसका विवरण आगे सुनाऊँगी .
.आज , इतना ही .
.अब गायत्री दीदी की यादोँ के साथ ..
.फिर जल्द ही लौटती हूँ ..
.तब तक , के लिये ....आज्ञा....

Thursday, September 13, 2007

...मेरा ग्रेन्ड सन (He is) NOAH :-) & fable of Noah's ark !


ये है ओरिस्सा मेँ बना मत्स्यावतार का पट चित्र



video

ये हैँ नोआ :--)))

...मेरा ग्रेन्ड सन .....

He is NOAH ( spoken same as Goa ) my Grand son ..

* & i'm his proud Nani !!

.आपको याद है ना नोआ'ज़ आर्क की क़हानी ?


अचरज की बात भले लगे परँतु हमारे भागवत मेँ महाविष्णु के "मत्स्यावतार " की कथा से इन नोआ महाशय की कथा बहुत मेल खाती है --

"मत्स्यावतार " http://kids.swaminarayan.org/thingstoknow/99to100.htm


जहाँ महाविष्णु ने राज सतयव्रत को एक विशाल मत्स्य यानि मछली के रुप मेँ, अभय दान दिया था और कहा था कि, " धरती जब जल मेँ डूब जायेगी तब मैँ तुम्हारी रक्षा करुँगा "

हयग्रीव दानव का फिर उन्होँने सँहार किया था ~
द्वारिका मेँ निर्मित "शँख नारायण " मँदिर मेँ मत्स्य अवतार रुपी कृष्ण और महाविष्णु का पूजन किया जाता है ~
और ये तेलेगु भाषा मेँ भी ऐसी ही कथा आँध्र प्रदेश मेँ भी है

http://www.telugubhakti.com/telugupages/Monthly/Bhaktas/content1.htm

यही कहानी कुराने पाक मेँ भी आती है -

- ऐसा वीकीपीडीया मेँ लिखा है देखेँ लिन्क -

http://en.wikipedia.org/wiki/Noah's_Ark


&

http://www.yrm.org/Noah's%20Ark%20Story.htm


जहाँ नोआ को "नुह " कहा गया है
और जो बडी कश्ती उसने बनाई थी उसे "सफीना " कहा गया था.

पुराने समय मेँ भी दुनिया मेँ जब पाप बढने लगा तब सर्व शक्तिमान ऊपरवाले ने पानी का सैलाब बहा दिया जिसमेँ सारी धरती डूबने लगी परंतु उसके पहले नोआ का परिवार अपनी बडी नौका मेँ खाने पीने की सारी सामग्री लेकर और हर तरह के जानवर की नस्ल के साथबच गये और उन्हीँ से दुबारा धरती पर आबादी बढी और सभ्यता और सँस्कृति का विकास हुआ था -

-अब कथा कहानियाँ , किस्से तो बहुत हैँ .

.उन्हेँ अक्षरश: सत्य मानेँ या नहीँ ये आपकी श्रध्धा का विषय है ~~

.परँतु हमारी बिटिया का नामकरण हमने किया था "सिँदुर " और उसे ये हक्क है कि वो अपने बेटे का नामकरण करे !

..तो नाम उसीने चुना......."नोआ "....Noah .

.ये कहकर कि ये भी एक अच्छा इन्सान बनेगा !
मेरे आशिष तो हैं ही, आप भी दीजियेगा .

.शुक्रिया ! :)

Wednesday, September 12, 2007

राम मिलाइन जोडी :)

कुछ चित्र ऐसे होते हैँ कि आगे कुछ कहने जैसा बाकी ही नहीँ रहता ..ये २ चित्र अलग अलग समय पर देखे थे परँतु, विचार यही आया मन मेँ कि"राम मिलाइन जोडी " "रानी को जँचा वो राजा " और " राजा को पसँद वही रानी '
पहला चित्र है चीन के सबसे लँबे सज्जन का ..और साथ ब्याह के जोडे मेँ सजी खडी हैँ उनकी दुल्हन !कितनी सुँदर हैँ ...अब भगवान भी ना कभी कभी ऐसे जोडोँ को मिलवा देते हैँ कि बस देखते रह जाओ >पसँद अपनी अपनी ...खयाल अपना अपना ..और नहीँ तो क्या !
मियाँ बीवी राजी तो क्या कर लेगा काजी ? दूसरे चित्र मेँ उत्तरी देश की लडकी है ..अपने बोय फ्रेन्ड के साथ खडीँ हैँ ! माशाल्लाह क्या ऊँचाई पायी है !
मेरे बेटे की शादी फीनीक्स शहर मेँ हुई थी ..तब उसका एक सह कर्मचारी अपनी पत्नी समेत आया था - पतिदेव की ऊँचाई होगी करीब ६ फीट ६ इँच और पत्नी भी थीँ ६ फीट कीँ लँबी चौडी !
सुँदर युगल था !
हम भारतीयोँ के बीच ऐसे सज रहे थे मानोँ , देहात की मिट्टी + घास फूस की झोँपडीयोँ के बीच, ऐम्पायर स्टेट , सीयर्स टावर के साथ शोभायमान हो !
मैँने उनसे कहा, " मैँ भगवान से प्रार्थना करुँगी कि , मुझे अगले जनम मेँ आप दोनोँ की तरह लँबा, बनायेँ " तो वो झट से बोले, "हम उनसे कहेँगेँ कि हमेँ आप जैसा छोटे कद का बना देँ ! " चूँकि हम बस्स्` ५ फीट पहुँचे ही पहुँचे खडे थे दोनोँ के सामने ;-)

...और सच मानिये, हम तीनोँ सहजता से , खुले दील से मुस्कुराते हुए, हँसने लग पडे थे ...
कैसे कैसे अलग अलग किस्म के प्राणी रचे हैँ ईश्वर ने इस रँगीन दुनिया मेँ ...
इतने अलग रँगोँ के, नैन नक्श, ऊँचाई, दुबले पतले, मोटे, नाटे , बुध्धु, गहरे चिँतक और विद्वान, द्वेष और ईर्ष्या रखने वाले, कुटील, क्रूर, हंसमुख , मिलनसार, सेवा भावी, लुटेरे, दास भाव के, क्रोधी, विरोधी,काले, गोरे, लाल , पीले ...स्वस्थ, कमज़ोर, बहादुर, डरपोक, इन्साफ पसँद या नाइन्साफ, ऐहसान फ़रामोश !!
ऊफफ्फ ~ इतनी सारी विविधता ना होती तो क्या ये सँसार, इतने सारे रँगोँ और गुण या दोष विहिन, इतना रोचक लगता क्या ? नहीँ ना ? प्राणी मात्र मेँ ईश्वर का आवास है ये सारे धर्म समझाते हैँ .......
फिर
, इन्सान क्यूँ अपनी विविधता मेँ उस एकता के दर्शन नहीँ कर पाता ? क्यूँ अपने आप को निश्पक्ष होकर पहचान नहीँ पाता ?
ये कौन सा पर्दा है जो मनुष्य को दूसरोँ से , अलग किये रखता है ?
उसके भीतर छिपे, उस एक अनँत परमात्मा से पर्दा किये,क्यूँ भटकता रहता है वह ? क़ब उठेगा पर्दा ? कब होगा वो बे - पर्दा ? कब होगा मिलन उसका परवरदीगार से ?

Sunday, September 9, 2007

अरे जा रे हट नटखट.....




http://www.youtube.com/watch?v=Y5fGd338xuE

अटक
अटक झट पट पनघट पर,

चटक मटक एक नार नवेली,

गोरी गोरी ग्वालनकी छोरी चली चोरी चोरी,

मुख मोरी मोरी मुसकाये अलबेली,

संकरी गलीमें मारी कंकरी कन्हैया ने,

पकरी बांह और की अटखेली,

भरी पिचकारी मारी सररर…..

बोली पनिहारी बोली अररर…..

अरे जा रे हट नटखट,

ना छू रे मेरा घुंघट,

पलटके दुंगी आज तुज़े गाली रे,

मुझे समझोना तुम भोलीभाली रे,

आया होली त्योहार, उडे रंगकी बौछार ,

तु है नार नखरेदार मतवाली रे,

आज मीठी लगे है तेरी गाली रे
तक तक न मार पिचकारीकी धार

कोमल बदन सह सके ना ये मार

तु है अनाडी बडा ही गंवार

तेरी झपझोरी से बाझ आइ ओरी रे

चोर तेरी चोरी निराली रे

मुझे समझोना तुम भोलीभाली रे

धरती है लाल, आज अंबर है लाल

उडने दे गोरी गालो का गुलाल

मत लाज का आज घुंघट निकाल

दे दिलकी धडकन पे धिनक धिनक

झांझ बजे … बजे, संगमें मृदंग बजे

अंगमें उमंग खुशियारी रे

आज मीठी लगे है तेरी गाली रे

Man Mohini, Hum Dil De Chuke Sanam - Hindi Song
Hum Dil De Chuke Sanam (1999), MUSIC: Ismail Darbar