Thursday, October 30, 2008

संगीत - संध्या : झलकियाँ

संगीत संध्या : श्रोता भी शामिल हुए जश्न में तब , महिलाएं व पुरूष सभी उठ कर नाचे ......ये महाशय लाल शर्ट पहने हुए , संगीत सुनते ही , नाच शुरू कर देते हैं और लोग उन्हें " देसी एल्विस प्रेस्ली " कहते हैं !! :-)
ये कन्याएं भी आनंद ले रहीं हैं ...
हमारे मित्र प्रवीन भाई व भाबी जी खुश हैं --
अमित पंडया तबला वादक हैं ग्रुप के -
दर्शक दीर्घा में तालियाँ बजने लगीं --- वाह जी वाह !
और ये पंडया परिवार गाते हुए ...ऐश्ना , रश्मि जी व राज पंडया जी सारे ही गायक हैं ...
एक सज्जन अपनी श्रीमती के संग प्रसन्न मुद्रा में ...
और हम भी दर्शक बने हुए ...माहौल का आनंद लेते हुए ....सब के साथ हैं ....
ये थीं झलकियाँ - मेरे शहर के संगीत - संध्या की - आपको कैसी लगी ?
फ़िल्म: सत्यम शिवम् सुंदरम का ये शीर्षक गीत गाया गया था --
http://www.youtube.com/watch?v=dufsqvm4cec
ये गीत भी पापा जी का लिखा हुआ है जो नही गाया , पर आप सुनियेगा --
सुनी जो उनके आने की ...आहट ,
गरीब खाना सजाया हमने ...
फ़िल्म: सत्यम शिवम् सुंदरम
http://www.youtube.com/watch?v=loJO0JjdS6Y




Tuesday, October 28, 2008

दीपावली मंगलमय हो

दीपावली मंगलमय हो
मेरा काव्य पाठ सुनिए ---
http://www.sopanshah.com/lavanya/Deep.mp3
ये कविता उन के लिए है जो अपने स्वजन को याद कर रहे हैं और अपनों की कमी महसूस कर रहे हैं -
स्मृति दीप
भग्न उर की कामना के दीप,
तुम, कर में लिये,मौन, निमंत्र्ण, विषम,
किस साध में हो बाँटती?
है प्रज्वलित दीप, उद्दीपित करों पे,
नैन में असुवन झड़ी!
है मौन, होठों पर प्रकम्पित,
नाचती, ज्वाला खड़ी!
बहा दो अंतिम निशानी,
जल के अंधेरे पाट पे,
' स्मृतिदीप ' बन कर बहेगी,
यातना, बिछुड़े स्वजन की!
एक दीप गंगा पे बहेगा,
रोयेंगी, आँखें तुम्हारी।
धुप अँधकाररात्रि का तमस।
पुकारता प्यार मेरा तुझे,
मरण के उस पार से!
बहा दो, बहा दो दीप को
जल रही कोमल हथेली!
हा प्रिया! यह रात्रिवेला
औ ' सूना नीरवसा नदी तट!
नाचती लौ में धूल मिलेंगी,
प्रीत की बातें हमारी!
- लावण्या शाह




Sunday, October 26, 2008

http://anuragarya.blogspot.com/ :
डॉ ।अनुराग आर्य " दील की बात " वाले :) ॥आप ने कहा था सो ये लीजिये, मेरे घर के सामनेवाले सुदर्शन पेड का चित्र - आपके लिये ..
और हम , जैन सेण्टर जाने के लिए तैयार ..
दीपावली पर एक पुरानी सुनी हुई कथा याद आ रही है ..अब सच है या मनगढँत ..उसका प्रमाण तो है नहीँ ..पर जब इसे सुना था तब बहुत दिनोँ तक मन मेँ घुमती रही और बार बार विश्वास - अविश्वास के बीच मन झूलता रहा था - खैर ! सन्क्षिप्त में कथा सुनाती हूँ ....
एक थे धनी व्यापारी ..काफी धन कमा लिया था ..दीपावली की रात थी ..पूजन विधि हो चुकी थी ..चोपडे में पहला हिसाब 'मिती ' लिख कर दादाजी , अपने तिमंजिले पर जगमग दीपमालिका व गेंदे के फूलों के बंदनवार , देखने लगे की अचानक एक सुंदर स्त्री सामने देख नमस्कार , करने लगे ॥
" दीपावली मंगलमय हो ! " वे बोले , और कहा, ' भीतर हैं घर की महिलायें ..आप पधारें ! "
वह स्त्री मुस्कुराकर नमस्ते करती हुईं भीतर दाखिल हो गईं --
फिर एक के बाद एक सभी सदस्योँ से वे मिलीँ और कोई समझा भाभी से मिलने आईँ हैँ तो कोई उन्हेँ चाची की सखी मानकर उनके कमरे तक छोड आया -
- वे पूरा घर, घूमघाम कर, फिर दादाजी के सामने, घर के बारामदे तक आ गईँ
॥दादा जी ने प्रश्न किया , " आप मिल लीँ ? जिनसे , मिलना था ? "
अब वे बोलीँ , " सभी से ! अब मैँ चलूँ ?"
तभी दादाजी की काग द्रष्टि ने दीपकोँ की मध्धम रोशनी मेँ भी स्त्री के चरणोँ से कुमकुम से बने हुए , रक्ताभ पद्`चिह्न बारामदे मेँ भीतर जाते और अब बाहर निकलते हुए देख लिये !!
तेजी से समूचे जीवन का हिसाब करते हुए अब वे बोले,
" आप रुकीये ..जब तक मैँ लौट ना आऊँ कृपा कर यहीँ रुकीये ! "
और वे लगभग दौडते हुए अपने आवास के पिछवाडे भागे ..छप्पक की अवाज़ आई फिर निस्तब्धता छा गई !
दादाजी ने बावडी मेँ छलाँग लगा ली थी -
कहते हैँ , महालक्ष्मी जी स्वयम्` पधारीँ थीँ इन सज्जन के घर और दादाजी के कहने पर उसी घर मेँ स्थिर हो गईँ ! :)
चूँकि दादाजी स्वर्ग से लौटकर तो आनेवाले ना थे ~~~
कोई कहता है ये किस्सा बिडला परिवार के किसी पूर्वज का है ॥
जिन्हेँ ये भी आदेश मिला है कि जब तक वे मँदिरोँ का निर्माण करवाते रहेँगेँ, उनकी लक्ष्मी सदा स्थायी रहेँगीँ -
सच और कथा की काल्पनिकता के बारे में ..और क्या कहूं ? :)
अब यहां की दीपावली की बात सूना दूँ ......
दीपावली आ रही है और हमारे यहाँ के भारतीय समाज मेँ अमरीकी धरा पर रहते हुए, कामकाजी व्यस्तता के चलते हुए भी, लोग उत्साह से भारतीय पर्वोँ का आयोजन करते हैँ -
ज्यादातर शादी -ब्याह होँ या ऐसे पर्व या कोई कवि सम्मेलन जैसे मिलाप , वीक एन्ड मेँ ये सारे आयोजित होते हैँ सो कल भी जैन सेन्टर मेँ शाम को सूर्यास्त से पहले , रात्रि भोज था फिर गायक राज पँड्या नामक गायक व गायिका रश्मि जी, युवा गायिका बिटीया ऐष्णा व तबला वादक पुत्र अमित इन चारोँ ने
"सँगीत -सँध्या " मेँ कई नये पुराने गीतोँ से समाँ बाँधा -
एक स्कुल के नये सजाये होल मेँ सँगीत सँध्या आयोजित की गई थी
- यहाँ सभी से मिलना हुआ - बडा अच्छा रहा -
और पहला गीत "सत्यम शिवम सुँदरम " गाया तो मेरे नजदीक बैठे सज्जन ने उठकर " गीत के लेखक स्व. पँडित नरेन्द्र शर्मा हैँ और यहाँ उनकी पुत्री "लावण्या जी " उपस्थित हैँ " कहते हुए सभागृह मेँ पधारे सभी से मेरा परिचय करवाया - और पहली पँक्ति मेँ बैठे हुए हमेँ भी उठकर सब के स्नेह अभिवादन को स्वीकार करना लाजिमी हो गया -
ये सारा अनायास घटित हुआ --
और देर रात घर आकर "आवाज़" पर डा, कीर्ति जी द्वारा सँचालित कवि सम्मेलन भी सुना और सभी साथी कवियोँ को सुनना अच्छा लगा --
डॉक्टर मृदुल कीर्ति : लीजिये आपके सेवा में प्रस्तुत है अक्टूबर २००८ का पॉडकास्ट कवि सम्मलेन। अगस्त और सितम्बर २००८ की तरह ही इस बार भी इस ऑनलाइन आयोजन का संयोजन किया है हैरिसबर्ग, अमेरिका से डॉक्टर मृदुल कीर्ति ने। आप भी सुनियेगा ....
http://podcast.hindyugm.com/2008/10/podcast-kavi-sammelan-part-4.html --

Saturday, October 25, 2008

मेरे स्वर में : मेरे गीत

दीपावली मंगलमय हो !!
एवं नूतन वर्ष अनगिनती उल्लास लेकर आए
सुनीये ....
मेरे स्वर में : मेरे गीत
http://www.sopanshah.com/lavanya/Be.mp3
पतझड़ में लाल रंग हर तरफ़ फैला हुआ है ॥
पतियों पे और ज़मीन पर भी ~~~~

Friday, October 24, 2008

परोपकारी मित्र की कथा -- गतांक से आगे ....

सियार और हिरन
कौवा

कौवा बोला --

" मित्र, अनायास आए हुए के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिये।
अज्ञातकुलशीलस्य वासो देयो न कस्यचित्। मार्जारस्य हि दोषेण हतो गृध्रो जरद्रवः।।
कहा भी गया है कि -- जिसका कुल और स्वभाव नहीं जाना है, उसको घर में कभी न ठहराना चाहिए, क्योंकि बिलाव के अपराध में एक बूढ़ा गिद्ध मारा गया।

यह सुनकर सियार झुंझलाकर बोला-- "मृग से पहले ही मिलने के दिन तुम्हारी भी तो कुल और स्वभाव नहीं जाना गया था। फिर कैसे तुम्हारे साथ इसकी गाढ़ी मित्रता हो गई ? "
यत्र विद्वज्जनो नास्ति श्रलाघ्यस्तत्राल्पधीरपि। निरस्तपादपे देशे एरण्डोsपि द्रुमायते।।

जहाँ पंडित नहीं होता है, वहाँ थोड़े पढ़े की भी बड़ाई होती है। जैसे कि जिस देश में पेड़ नहीं होता है, वहाँ अरण्डाका वृक्ष ही पेड़ गिना जाता है।और दूसरे यह अपना है या पराया है, यह अल्पबुद्धियों की गिनती है। उदारचरित वालों को तो सब पृथ्वी ही कुटुंब है।जैसा यह मृग मेरा बंधु है, वैसे ही तुम भी हो। मृग बोला --

" इस उत्तर- प्रत्युत्तर से क्या है ? सब एक स्थान में विश्वास की बातचीत कर सुख से रहो।क्योंकि न तो कोई किसी का मित्र है, न कोई किसी का शत्रु है। व्यवहार से मित्र और शत्रु बन जाते हैं। "

कौवे ने कहा-- " ठीक है। फिर प्रातःकाल सब अपने अपने मनमाने देश को गये।एक दिन एकांत में सियार ने कहा -- मित्र मृग, इस वन में एक दूसरे स्थान में अनाज से भरा हुआ खेत है, सो चल कर तुझे दिखाऊँ। "

वैसा करने पर मृग वहाँ जा कर नित्य अनाज खाता रहा। एक दिन उसे खेत वाले ने देख कर फँदा लगाया।

इसके बाद जब वहाँ मृग फिर चरने को आया सो ही जाल में फँस गया और सोचने लगा-- " मुझे इस काल की फाँसी के समान व्याध के फंदे से मित्र को छोड़कर कौन बचा सकता है ? "

इस बीच में सियार वहाँ आकर उपस्थित हुआ और सोचने लगा--

" मेरे छल की चाल से मेरा मनोरथ सिद्ध हुआ और इस उभड़े हुए माँस और लहू लगी हुई हड्डियाँ मुझे अवश्य मिलेंगी और वे मनमानी खाने के लिए होंगी। "
मृग उसे देख प्रसन्न होकर बोला --

" हो मित्र मेरा बंधन काटो और मुझे शीघ्र बचाओ। "

आपत्सु मित्रं जानीयाद्युध्दे शूरमृणे शुचिम्।भार्यो क्षीणेषु वित्तेषु व्यसनेषु च बांधवान्।।

में मित्र, युद्ध में शूर, उधार में सच्चा व्यवहार, निर्धनता में स्री और दु:ख में भाई (या कुटुंबी) परखे जाते हैं। और दूसरे विवाहादि उत्सव में, आपत्ति में, अकाल में, राज्य के पलटने में, राजद्वार में तथा श्मशान में, जो साथ रहता है, वह बांधव है।

सियार जाल को बार- बार देख सोचने लगा --

" यह बड़ा कड़ा बंध है और बोला-- ""मित्र, ये फँदे तांत के बने हुए हैं, इसलिए आज रविवार के दिन इन्हें दाँतों से कैसे छुऊँ मित्र जो बुरा न मानो तो प्रातः काल जो कहोगे, सो कर्रूँगा''। "

ऐसा कह कर उसके पास ही वह अपने को छिपा कर बैठ गया।

पीछे वह कौवा सांझ होने पर मृग को नहीं आया देख कर इधर- उधर ढ़ूढ़ते- ढ़ूंढ़ते उस प्रकार उसे (बंधन में) देख कर बोला --

"मित्र, यह क्या है ?''

मृग ने कहा -- ""मित्र का वचन नहीं मानने का फल है''।

हितकामानां यः श्रृणोति न भाषितम्। विपत्संनिहिता तस्य स नरः शत्रुनंदन।।

कहा गया है कि जो मनुष्य अपने हितकारी मित्रों का वचन नहीं सुनता है, उसके पास ही विपत्ति है और अपने शत्रुओं को प्रसन्न करने वाला है।

कौवा बोला -- "वह ठग कहाँ है ?" मृग ने कहा -

-"मेरे मांस का लोभी यहाँ ही कहाँ बैठा होगा ? "

कौवा बोला -- " मैंने पहले ही कहा था। मेरा कुछ अपराध नहीं है, अर्थात मैंने इसका कुछ नहीं बिगाड़ा है, अतएव यह भी मेरे संग विश्वासघात न करेगा, यह बात कुछ विश्वास का कारण नहीं है, क्योंकि गुण और दोष को बिना सोचे शत्रुता करने वाले नीचों से सज्जनों को अवश्य भय होता ही है।और जिनकी मृत्यु पास आ गयी है, ऐसे मनुष्य न तो बुझे हुए दिये की चिरांद सूंघ सकते हैं, न मित्रता का वचन सुनते हैं और न अर्रूंधती के तारे को देख सकते हैं। "

प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। वर्जयेत्तादृशं मित्र विषकुम्भं पयोमुखम्।

पीछे काम बिगाड़ने वाले और मुख पर मीठी- मीठी बातें करने वाले मित्र को, मुख पर दूध वाले विष के घड़े के समान छोड़ देना चाहिए।

कौवे ने लंबी सांस भर कर कहा कि --

" अरे ठग, तुझ पापी ने यह क्या किया ?''

क्योंकि अच्छे प्रकार से बोलने वालों को, मीठे- मीठे वचनों तथा कपट से वश में किये हुओं को, आशा करने वालों को, भरोसा रखने वालों को और धन के याचकों को, ठगना क्या बड़ी बात है ? और हे पृथ्वी, जो मनुष्य उपकारी, विश्वासी तथा भोले- भाले मनुष्य के साथ छल करता है उस ठग पुरुष को हे भगवति पृथ्वी, तू कैसे धारण करती है
दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्।

उष्णो दहति चाड्गारः शीतः कृष्णायते करम्।

के साथ मित्रता और प्रीति नहीं करनी चाहिये ! क्योंकि गरम अंगारा हाथ को जलाता है और ठंढ़ा हाथ को काला कर देता है। दुर्जनों का यही आचरण है। मच्छर दुष्ट के समान सब चरित्र करता है, अर्थात् जैसे दुष्ट पहले पैरों पर गिरता है, वैसे ही यह भी गिरता है। जैसे दुष्ट पीठ पीछे बुराई करता है, वैसे ही यह भी पीठ में काटता है। जैसे दुष्ट कान के पास मीठी मीठी बात करता है, वैसे ही यह भी कान के पास मधुर विचित्र शब्द करता है और जैसे दुष्ट आपत्ति को देखकर निडर हो बुराई करता है, वैसे ही मच्छर भी छिद्र अर्थात् रोम के छेद में प्रवेश कर काटता है।

प्रियवादी च नैतद्विश्वासकारणम्।मधु तिष्ठति जिह्मवाग्रे हृदि हालाहलं विषम्।

दुष्ट मनुष्य का प्रियवादी होना यह विश्वास का कारण नहीं है। उसकी जीभ के आगे मिठास और हृदय में हालाहल विष भरा है।

प्रातःकाल कौवे ने उस खेत वाले को लकड़ी हाथ में लिये उस स्थान पर आता हुआ देखा, उसे देख कर कौवे ने मृग से कहा --"

"मित्र हरिण, तू अपने शरीर को मरे के समान दिखा कर पेट को हवा से फुला कर और पैरों को ठिठिया कर बैठ जा। जब मैं शब्द कर्रूँ तब तू झट उठ कर जल्दी भाग जाना। "

मृग उसी प्रकार कौवे के वचन से पड़ गया।

फिर खेत वाले ने प्रसन्नता से आँख खोल कर उस मृग को इस प्रकार देखा,
" आहा, यह तो आप ही मर गया। "

ऐसा कह कर मृग की फाँसी को खोल कर जाल को समेटने का प्रयत्न करने लगा, पीछे कौवे का शब्द सुन कर मृग तुरंत उठ कर भाग गया।

इसको देख उस खेत वाले ने ऐसी फेंक कर लकड़ी मारी कि उससे सियार मारा गया।
त्रिभिर्वषैंस्रिभिर्मासैस्रिभि: पक्षैस्रिभिर्दिनै:अत्युत्कटै: पापपुण्यैरिहैव फलमश्रुते।।
जैसा कहा गया है कि प्राणी तीन वर्ष, तीन मास, तीन पक्ष और तीन दिन में, अधिक पाप और पुण्य का फल यहाँ ही भोगता है।
लेखक : M. Rehman

http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/hitop103.htm




से साभार

Tuesday, October 21, 2008

मित्रता किससे करें!


मित्रता किससे करें!

विष्णु शर्मा रचित हितोपदेश की कथा, अनुवाद: पंडित नरेन्द्र शर्मा

बहुत पहले की बात है। एक घने जंगल में एक कौआ और मृग दो मित्र रहते थे. उनकी मित्रता इतनी गहरी थी कि जंगल के दूसरे जानवर भी उनकी मित्रता की मिसालें दिया करते थे. जबकि जंगल के कुछ जानवरों का मत था कि दोस्ती केवल अपनी जाति में करनी चाहिए. किसी गैर जाति में दोस्ती का परिणाम कभी अच्छा नहीं निकलता. मगर कौआ और मृग सुनते तो सबकी थे मगर करते अपने मन की थे. कौआ एक घने वृक्ष पर रहता था. कौए के साथ-साथ उस वृक्ष पर और भी बहुत से जानवर रहते थे. कौए की पत्नी और उसके दो बच्चों से मृग बहुत प्यार करता था. एक बार पड़ोस के जंगल में रहने वाला एक गीदड़ उस वन में आ गया. उसने मोटे-ताजे मृग को नदी किनारे घास चरते देखा तो उसके मुंह में पानी आ गया. उसने सोचा, इस मृग का मांस कितना स्वादिष्ट होगा. इसका शरीर तो मांस से भरा पडा है. एक दफा ऐसा मांस खाने को मिल जाए तो आनंद आ जाए - परन्तु दूसरे ही क्षण उसे ध्यान आया कि मैं इसका मांस कैसे खा सकता हूँ. एक मृग का शिकार करने की शक्ति तो मुझमें है ही नहीं. मैं ठहरा गीदड़ - इतने बड़े मृग का शिकार तो मुझसे हो ही नहीं सकेगा। गीदड़ का शैतानी दिमाग बहुत तेज़ी से काम करता है. जब कोई काम उसके वश का नहीं होता तो वह दूसरों के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाना अच्छी तरह जानता है॥
चालाकी और हेराफेरी तो उसकी रग-रग में बसी हुई थी॥
उस गीदड़ ने एक योजना बनाई कि छल कपट से ही वह इस शिकार तक पहुँच सकता है, अतः पहले इस मृग से मित्रता करो, तभी इसका शिकार करना उचित होगा. भले ही लोग इसे धोखे का नाम दें, परन्तु मैं तो इसे अपनी राजनीति ही कहूँगा. किसी चीज़ को पाने की शक्ति यदि प्राणी में नहीं हो तो अपनी बुद्धि से किसी दूसरे का सहारा लेकर उसे प्राप्त करने में कोई बुराई नहीं होती. यही सोचकर गीदड़ उस मृग के पास गया और और बड़ी ही मीठी वाणी में बोला –
"भैयाजी नमस्कार..." मृग ने नज़रें उठाकर गीदड़ को देखा और सोच में पड़ गया. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह गीदड़ कौन है और उसे कैसे जानता है?
"भाई, राम-राम तो हमने कर ली..." हिरन ने कहा -
"परन्तु मैं तो तुम्हें जानता ही नहीं कि तुम कौन हो?"
"भाई, यदि आप मुझे नहीं जानते तो क्या हुआ, मैं तो आपको जानता हूँ. असल बात यह है कि मैं बहुत वर्षों बाद इस जंगल में वापस आया हूँ. मेरे माता- पिता, कई वर्ष पूर्व इस जंगल को छोड़कर चले गए थे, अब जब उनकी मृत्यु हो गयी तो मैं पूरी तरह से अकेला पड़ गया था. मेरा कोई भी मित्र उस जंगल में नहीं था. ऐसे में मैंने यह फैसला लिया कि चलो अपने देश में ही वापस चलते हैं, शायद वहाँ पर ही कोई मित्र मिल जाए, बस यही सोचकर इधर आया तो आपकी भोली-भाली और प्रेमभरी सूरत को देखते ही मेरा मन उछलकर कहने लगा, " वाह...वाह...प्यारे...अब तो तुम्हें एक अच्छा मित्र मिल ही गया ! देखो न, कैसा सीधा प्राणी है, जो कभी किसी का बुरा नहीं सोचता. ऐसे ही किसी प्राणी से मित्रता करनी चाहिए, बोलो मित्र! क्या आप एक दुखी गीदड़ की मित्रता स्वीकार करोगे?"

मृग बहुत देर तक गीदड़ के उदास चेहरे को देखता रहा. उस बेचारे मृग को क्या पता था कि यह दिल का खोटा चतुर गीदड़ उसे अपनी मित्रता के जाल में फंसा रहा है, उसने तो अपने जीवन में कभी किसी की बुराई सोची ही नहीं थी. इसलिए उस गीदड़ की बात सुनकर उसने कहा -
"भैया गीदड़! यदि तुम्हारा कोई दोस्त नहीं तो मैं ही आज से तुम्हारा दोस्त हूँ. तुम मेरे होते किसी प्रकार की चिंता मत करो."
गीदड़ ने मृग के मुख से यह शब्द सुने तो बहुत प्रसन्न हुआ और मृग के पास ही हरी-हरी घास पर बैठकर बड़ी मीठी-मीठी बातें करने लगा.
और फ़िर धीरे-धीरे शाम होने लगी. जंगल के सभी जानवर अपने-अपने घरों की और लौटने लगे. मृग ने भी घास चरना छोड़ दिया और गीदड़ से बोला -
"अच्छा भाई गीदड़ - अब तुम भी अपने घर को जाओ और मैं भी -
शाम हो रही है."
"मेरा तो यहाँ कोई ठिकाना ही नहीं है भइया," गीदड़ ने बड़ी मासूमियत से कहा - "क्यों न मैं आज तुम्हारे साथ ही चलूँ - तुम्हारे घर के आसपास ही मैं भी कहीं सर छुपा लूंगा."

"भाई गीदड़! सोचा तो तुमने ठीक है, किंतु इस बात पर भी तो विचार करो कि इस प्रकार किसी अनजान प्राणी को कौन अपने आस-पास टिकने देगा - आजकल का माहौल इतना दूषित हो चुका है कि हर प्राणी, दूसरे प्राणी को संदिग्ध नज़रों से देखता है. फ़िर किसी अनजान प्राणी पर कोई कैसे विश्वास करेगा - न मालूम उसके मन में क्या है."
"भाई मृग! तुम यह कैसी बातें कर रहे हो?" चालाक गीदड़ अपनी वाणी में प्यार और अपनत्व का रस घोलकर बोला - "एक और मित्र मान रहे हो और दूसरी और अनजान कह रहे हो. अरे भाई, जब मैं तुम्हारा मित्र बन गया, तो अनजान कहाँ रहा. यदि कोई पूछे, तो तुम इतना तो कह ही सकते हो ना कि मैं तुम्हारा मित्र हूँ. बस, मेरे लिए इतना ही काफी है. बाकी मैं स्वयम संभाल लूंगा."
" ठीक है भइया - चलो - मेरा इसमें क्या जाता है." सहज भाव से हिरन ने कहा.
जिस समय हिरन कौए के वृक्ष के पास पहुंचा तो उसके साथ आए गीदड़ को देखकर कौए ने हैरानी से पूछा -
"अरे मित्र हिरन! तुम्हारे साथ यह कौन है?"
"एक परदेसी, जिसका इस संसार में कोई नहीं है." हिरन ने कहा.
"और लगता है तुमने इसे मित्र बना लिया है"
"क्या करता मित्र - इसकी करूँ दास्ताँ सुनकर मुझे दया आ गयी."

तभी कौए ने धीरे से मृग से कहा - "देखो मित्र, राह चलते किसी भी अनजान प्राणी से मित्रता नहीं करनी चाहिए, बुद्धिमान लोग भी यही कहते हैं कि जिस प्राणी के बारे में आप कुछ जानते नहीं, जिसके वंश का कुछ पता न हो, उसे कभी भी अपना मित्र मत बनाओ. इसी भूल के कारण तो एक बिलाव के अपराध की सज़ा बेचारे एक बूढे गिद्ध को भुगतनी पडी थी. उस निर्दोष को मौत की नींद सोना पडा था."
"यह तुम क्या कह रहे हो दोस्त?"
"मैं जो कुछ भी कह रहा हूँ, वह केवल तुम्हारी भलाई के लिए ही कह रहा हूँ, क्योंकि इस संसार में मीठी-मीठी बातें करने वाले बड़े ठग भी होते हैं।"

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( इस कथा के साथ का रोचक इतिहास भी बतला दूँ ....ये कहानी मुझे गुगल करने पे मिली - पापाजी की लिखी हुई और एक वेब साईट पे देखी ..और सेव कर ली !
जब कट / पेस्ट करने गयी तब ये सम्भव न था ..तब इस बात के बारे में , मैंने
भाई श्री अनुराग शर्माजी को बतलाया ...आप को ये बतला दूँ की अभी अभी, उन्होंने , पूरी कथा , टाइप कर के मुझे भेज दी :-) ...और मेरी खुशी ठिकाना न रहा !

शायद , कथा अधूरी है ...अब पता करना होगा की आगे कथा क्या हो सकती है .....
अभी इस समय अनुराग भाई ने इतना परिश्रम किया है आप सब के सामने , इस कथा को आने के लिए जो अपने व्यस्त समय में से , मेरे लिए ये कहानी को टाइप किया है उसका जितनी बार धन्यवाद करू , कम रहेगा ...ऐसे लोग आज भी दुनिया में होते हैं क्या ? :)

जी हाँ , आप ही देख लीजिये ..उनकी भलमनसाहत को !! और शामिल हो जाइए,

मेरे संग शुक्रिया कहने में !!

और ....दुसरे गूगल महाराज का भी आभार जो , ये कहानी ...समय के सागर से निकले रत्न की तरह ..आज , हम सब के सामने है !!

आशा करती हूँ , आपको ये किस्सा पसंद आया होगा ....

अब , आप भी बतलायेँ " मित्रता किससे करेँ ?"

स्नेह सहित,

- लावण्या

Sunday, October 19, 2008

समय

दीपावली की अग्रिम बधाई भी थी
डा. बेन्जामीन ने सर्व धर्म समभाव पर भाषण दिया
डा. सिध्धर्थ काक सम्माननीय अतिथि ने भारत वर्ष की साँस्कृतिक धरोहर व योगदान के बारे मेँ विस्तार से समझाया
बाल विहार के बच्चोँ ने श्लोक व देशभक्ति के गीत गाये
हमारे शहर का मँदिर ~ सँध्या आरती का समय

शनिवार की सँध्या हमारे शहर के मँदिर मेँ आयोजित हिन्दू अवेयरनेस डे के समारोह मेँ बिताकर आये तो लगा आप सभी को दीखलायेँ कि कौन महानुभाव आये थे और खास तौर पर बच्चोँ के प्रयास बहुत अच्छे लगे ~

अब शामेँ जल्दी आ जातीँ हैँ दिन सिकुडने लगे हैँ अब भी दोपहर को धूप होने पर बाहर घूमना अच्छा लगता है जब धूप भली लगती है पर सुबह और शाम आने तक ठँड पडने लगती है अब अक्तूबर माह भी बस, भागा ही जा रहा है ...

॥पता नहीँ जो समय बीत जाता है, वह कहाँ जाकर छिप जाता है ? काल के किस हिस्से मेँ बीता समय आसरा लेता होगा ? और नई सुबह, कहाँ से चल कर आतीँ हैँ ? मुझे पता है तो सिर्फ वर्तमान का

॥हाँ यहाँ जहाँ मैँ .... हूँ ........जहाँ साँसे ले रही हूँ, देख रही हूँ, सुन रही हूँ,........ टी।वी। तो कभी रेडियो तो कभी पँछीयोँ का चहचहाना या फव्वारे से निरँतर ऊपर उठकर धरा की ओर खर खर कर झरते पानी की आवाज़ सुनती हूँ,......

कई तरह के शोर मेरी दिनचर्या का हिस्सा हैँ, कभी किसी बच्चे की किलकारी तो किसी माँ का आवाज़ देना...... आहिस्ता से ! बसोँ का आना, फेडएक्स की ट्रक का आना जाना, असंख्य कारे आती जाती हैं मेरे कोम्प्लेक्स मेँ !

दुपहर को डाक बाँटने सरकारी नीली और लाल धारीयोँवाली सुफेद जीप कार मेँ आती " डेबी" जो डाक लाती है और "हाय मीसीज़ शाह " कहती मुस्कुराती है" ॥

और एक सज्जन हैँ बड़ी ऊम्र के हैं और बम्बई से पुत्र के घर पत्नी सहित आये हैँ और रोजाना सैर करने निकल पडते हैँ जब भी मिल जाते हैँ अचूक गुजराती मेँ पूछते हैँ, "केम छो? " ( "कैसी हैँ " ) और २ घँटा घूमते हैँ। उनकी पुत्रवधु के दूसरी सँतान नवम्बर माह तक आ जायेगी ..एक बार कह रहे थे, " हमेँ इस बार अमरीकी पडौसियोँ से बड अच्छे अनुभव हुए ..पहले हमारा इम्प्रेशन कुछ अलग ही था यहाँ के लोगोँ के बारे मेँ पर अब ४ माह से जितनोँ से भी मिलना हुआ, बडे भले और सच्चे लोग लगे हमेँ ! कई अपने वृध्ध माता पिता की देखभाल करते हैँ और कई अकेले रहते हैँ तब भी साहसी जीवन जीते हैँ और भलमनसाहत से पेश आते हैँ इत्यादी "

तो खैर ! बाहर की दुनिया मेँ दिन भर कुछ ना कुछ घटता रहता है ..पर सब कुछ शाँत रहता है ..ये अमरीकी जीवन का एक बहुत बडा सच है -

शाँति ! शोर शराबा , यातायात का हो तब भी नियँत्रित ! कोई होर्न नहीँ बजाता .ना ही कोई लाउड स्पीकर पर भजन या कव्वालीबजा कर अपने धार्मिक त्योहारोँ के समय, अपना हक्क मानकर दूसरोँ को परेशान करता है !

..क्लब होँ या डीस्को, सब मकान के भीतर पर वहाँ हमारा जाना नहीँ होता !

-हाइवे पर वाहनोँ का रेला ऐसा शोर करता है मानोँ जल प्रपात घोष करता हुआ बह रहा हो ! पर वह भी दूर की ध्वनि है ! कार, घर जब दरवाज़े व खिड़कियाँ बँद कर लो तब एकदम से शाँति पसर जाती है और तब दुपहर की धूप प्रखर होकर और भी स्वच्छ और भी साफ चमकने लगती है ..शाम होने से पहले, चाय के साथ ,आहिस्ता समय आगे सरक जाता है ..फिर आँख मिचौनी खेलता वक्त का लम्हा, हाथोँ से फिसल कर, छिपने को आतुर, फिर ओझल हो जाता है ...

Friday, October 17, 2008

फ़िर भी

इस सादगी पे कौन न मर जाए
या खुदा वो क़त्ल भी करते हैं ,
हाथ में तलवार भी नही
हम चाहें या ना चाहें
फ़िल्म : फ़िर भी गायक : हेमंत कुमार संगीतकार : रघुनाथ सेठ

गीतकार : पण्डित नरेन्द्र शर्मा

हम चाहें या ना चाहें
हमराही बना लेती हैं
हमको जीवन की
हम चाहें या न चाहें ...
ये राहें कहाँ से आती हैं
ये राहें कहाँ ले जाती हैं
राहें धरती के तन पर
आकाश की फैली बाहें
हम चाहें या न चाहें ...
उतरा आकाश धरा पर
तन मन कर दिया निछावर
जो फूल खिलाना चाहें
हँस हँस कर साथ निबाहें
हम चाहें या न चाहें ...


संगीत : रघुनाथ सेठ फ़िल्म: फ़िर भी - १९७१ शब्द : पण्डित नरेन्द्र शर्मा
कलाकार : प्रताप शर्मा, उर्मिला भट्ट , निर्माता : शिवेंद्र सिन्हा

फिर भी : से दूसरा गीत है ...
गायक : मन्ना डे : kyon pyaalaa chhalaktaa hai

क्यूँ प्याला छलकता है :
क्यूँ दीपक जलता है
दोनों के मन में कहीं अनहोनी विकलता है
क्यूँ प्याला छलकता है पत्थर में फूल खिला
दिल को एक ख़्वाब मिला
क्यूँ टूट गए दोनों इसका ना जवाब मिला
दिल नींद से उठ उठ कर
क्यूँ आँखें मलता है.. हैं राख की रेखाएँ लिखती है चिंगारी
हैं कहते मौत जिसे जीने की तैयारी
जीवन फिर भी जीवनजीने को मचलता है॥

मन्ना डे :
प्रबोध चंद्र डे मई - १ १९२० मन्ना डे के नाम से मशहूर हुए हिन्दी सिने संसार के गायक हैं । बंगला भाषा में : মান্ না দে
मन्ना बाबू के पिताजी का नाम था पूर्ण चंद्र और महामाया डे माताजी थीं -- उनके चाचाजी संगीताचार्य कै .सी . डे थे जिन्होंने मानना बाबू को बहुत प्रभावित किया था -इंदु बाबर पाठशाला में उनकी शिक्षा हुई थी । उसके बाद स्कॉटिश चर्च स्कूल में आगे की शिक्षा हुई : Scottish Church College, और बाद में विद्यासागर कोलेज से स्नातक हुए ।बचपन से कुश्ती और घूंसेबाजी से मन्ना बाबू को लगाव रहा था ।

कृष्ण चंद्र डे से आरंभिक संगीत शिक्षा लेने के बाद , उन्होंने उस्ताद दबीर खान से संगीत सीखा। , मन्ना डे , ३ साल कोलेज प्रतियोगिता में जीते थे । कृष्ण चंद्र डे १९४२ में मुंबई ले कर आए जहाँ सहायक के रूप में मन्ना बाबू ने काम किया - और फ़िर , सचिन देव बर्मन जी के लिए काम किया और कई संगीत निर्माताओं के लिए काम करते हुए स्वतंत्र कार्य शुरू किया।

उस्ताद अमन अली खान और उस्ताद अब्दुल रहमान खान . तमन्ना , १९४३ . से शास्त्रीय संगीत की तालीम लेते रहे ।

तमन्ना , १९४३ में बनी फ़िल्म प्रथम रही जिससे उन्हें ब्रेक मिला। सुरैया जी के साथ गीत गाया जो बहुत सराहा गया और एक गीत " ऊपर गगन विशाल " ,

फ़िल्म में गाया जो प्रसिध्ध हुआ । १९५० मशाल , सचिन देव बर्मन की धुनों से सजी फ़िल्म भी सफल हुई । १९५२ , फ़िल्म अमर भूपाली .बंगाली और मराठी में बनी फिल्म सफल हुई और मन्ना बाबू सफल हुए

यह दोस्ती , हम नही तोडेगे गीत फ़िल्म : शोले में गाया हुआ और एक चतुर नार कर के सिंगार फ़िल्म पडोसन का ये मन्ना बाबू के बहुत बाद के सफलतम गीत हैं

हेमंत कुमार मुखर्जी भी बँगाल से आये और बम्बई फिल्म इन्डस्ट्री मेँ बहुत लोकप्रिय हुए।

३५०० से ज्यादा गीत मन्ना बाबू ने गाये हैं ।

दिसम्बर १८ , १९५३ , मन्ना डे ने सुलोचना कुमारन जो केरल प्रांत से हैं उनसे विवाह किया । शुरोमा , अक्टूबर १९ , १९५६ ,और सुमिता , जून २० , १९५८ को जन्मी उनकी २ बेटियाँ हैं । .
बंगाली में लिखी "जिबोनेर जल्सघोरे " मन्ना बाबू की आत्मकथा है

"यादें जी उठी " हिन्दी में पेंगुइन बुक्स से प्रकाशित हुई है

पद्मभुसन मन्ना बाबू को भारत सरकार ने दिया
१९६९ National Film Award for Best Male Playback Singer , मेरे हुजुर के लिए मिला १९७१ में National Film Award for Best Male Playback Singer बंगाली निशि पद्मा को मिला - १९७१ में पद्म श्री मिला
क़व्वाली : ' 'यह इश्क इश्क है , ए मेरी जोहरा -जबीं , यारी है इमां मेरा
प्यार भरे नगमे : प्यार हुआ इकरार हुआ , आ जा सनम मधुर चांदनी में हम ,तुम गगन के चंद्रमा हो , दिल की गिरह खोल दो , ये रात भीगी भीगी , सोच के ये गगन झूमे , शाम ढले जमुना किनारे इत्यादी हैं

भाव भरे गीत : जिंदगी कैसी ये पहेली हाय , कसमे वादे प्यार वफ़ा , हरतरफ अब ये ही अफसाने हैं , नादिया चले चले रे धारा , जैसे गीत हैं

मस्ती भरे नगमे : आओ ट्विस्ट करे ,किसने चिलमन से मारा ऐ भाई , जरा देख के चलो , झूमता मौसम मस्त महिना , एक चतुर नार , चुनरी संभल गोरी

देश भक्ति के गीत : ए मेरे प्यारे वतन , जाने वाले सिपाही से , होके मजबूर ,

भक्ति गीत : तू प्यार का सागर है , , भज रे मन राम सुखदाई , और

मधुशाला के सारे गीत मन्ना बाबू की हिन्दी साहित्य के प्रति अनुपम भेंट ही है --

Wednesday, October 15, 2008

गीतांजलि’ और गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर

रवि बाबू अपनी डेस्क पर
गीतांजलि’ और गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर

(१८६१ -१९४१ ) की सर्वाधिक प्रशंसित और पठित पुस्तक है। इसी प्रकार उन्हे १९१० में विश्व प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार भी मिला । इसके बाद अपने जीवन काल में अपने पूरे जीवन काल में वे भारतीय साहित्य पर छाए रहे है।

साहित्य की विभिन्न विधाओं, संगीत और चित्र कला में सतत् सृजनरत रहते हुए उन्होंने अन्तिम साँस तक सरस्वती की साधना की और भारतवासियों के लिए गुरू देव के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

प्रकृति, प्रेम ईश्वर के प्रति निष्ठा, और मानवतावादी मूल्यों के प्रति समर्पण भाव से सम्पन्न गीतांजलि के गीत पिछली एक सदी से बांग्लाभाषी जनों की आत्मा में बसे हुए हैं। विभिन्न भाषाओं में हुए इसके अनुवादों के माध्यम से विश्व भर के सह्रदय पाठक इसका रसास्वादन कर चुके हैं।

प्रस्तुत अनुवाद हिंदी में भिन्न है कि इसमें मूल बांग्ला रचनाओं के गीतात्मकता को बरकरार रखा गया है, जो इन गीतों का अभिन्न हिस्सा है, इस गेयता के कारण आप इन गीतों को याद रख सकते हैं।

" तुम्हें रहूँ, प्रभु ! अपना सतत बनाए, इतना-सा ही मेरा ‘मैं’ रह जाए।

तुम्हें निरखता हूँ प्रत्येक दिशा में, अर्पित कर सर्वस्य मिलूँ मैं तुम से;

प्रेम लगाए रहूँ अहर्निश तुम में,इच्छा मेरी इतनी सी रह जीए।

तुम्हें रहूँ प्रभु ! अपना सतत बनाए।।

तुम्हें रखूँ मैं कहीं ढक करके, इतना सा ही मन मेरा बचा रहे।

प्राण-भरित हो लीला,नाथ ! तुम्हारी, रखे हुए हो मुझे इसी भाव से

बँधा रहूँ तव-पाश में चिर मैं, इतना-सा ही बन्धन मेरा रह जाए।

तुम्हें रहूँ प्रभू ! अपना सतत बनाए।।
प्रस्तुत हैं इसी पुस्तक के कुछ अंश :

डॉ. डोमन साहु ‘समीर कहते हैं :

बँगला भाषा की ‘गीतांजलि’ विश्वविश्रुत कवि रवीन्द्रनाठ ठाकुर (१८६१ -१९४१) की कालजयी कृति है जिस पर उन्हें साहित्य के क्षेत्र में विश्व का सर्वोच्च ‘नोबेल पुरस्कार’ प्राप्त करने का गौरव उपलब्ध रहा है।

वस्तुतः विश्व-साहित्य की एक अपूर्व/अमूल्य निधि है ‘गीतांजलि’।

‘गीतांजलि’ के गीतों के अनुवाद अनेक भाषाओं में हुए हैं।

उसके कुछ गीतों के अनुवाद सन्ताली भाषा में किए हैं

विश्वभारती-ग्रन्थ-विभाग, कोलकत्ता द्वारा प्रकाशित बँगला ‘गीतांजलि’ की जो प्रति कुल १५७ गीत हैं। उनमें से जो गीत आत्माभिव्यंजन, अध्यात्म-चिन्तन, जीवन-दर्शन, प्रकृ़ति-चित्रण, भाव-प्रकाशन आदि की दृष्टि से मुझे ‘विशिष्ट’ लगे उन १३८ गीतों के अनुवाद मैंने इस संग्रह में संकलित किए हैं।

शेष तीन गीत रबि बाबू की अन्य तीन पुस्तकों से हैं। मेरे द्वारा अनूदित ये सभी गीत लयात्मक और छन्दोबद्ध हैं।

यद्यपि इनमें अन्त्यानुप्रास के निर्वाह का कोई आग्रह नहीं है ताकि मूल बँगला गीतों की भाव-सम्पदा की सुरक्षा में कोई व्यवधान न पड़े। प्रस्तुत अनूदित गीतों का प्रकाशन राधाकृष्ण प्रा। लि. नई दिल्ली द्वारा किया जा रहा है जिसके लिए मैं अपना हार्दिक आभार उक्त प्रकाशन-संस्था के प्रति अभिव्यक्त करना चाहूँगा। आशा है, हिन्दी-जगत में इन अनुवादों का स्वागत होगा। इति शुभम् !

२१ नवम्बर, २००२ ई.
-डॉ. डोमन साहु ‘समीर
(१ )
मेरा माथा नत कर दो तुमअपनी चरण-धूलि-तल में;

मेरा सारा अहंकार दोडुबो-चक्षुओं के जल

-मंडित होने में नितमैंने निज अपमान किया है;

घिरा रहा अपने में केवलमैं तो अविरल पल-पल

सारा अहंकार दो डुबो चक्षुओं के जल

करूँ प्रचार नहीं मैं, खुद अपने ही कर्मों से;

करो पूर्ण तुम अपनी इच्छामेरी जीवन-चर्या से

तुमसे चरम शान्ति मैं, परम कान्ति निज प्राणों में;

रखे आड़ में मुझकोआओ, हृदय-पद्म-दल में

सारा अहंकार दो।डुबो चक्षुओं के जल में।।-

आमार माथा नत क’रे दाव तोमार चरण धूलार त’ ले।)
(२ )
विविध वासनाएँ हैं मेरी प्रिय प्राणों से भीवंचित कर उनसे तुमने की है रक्षा मेरी;संचित कृपा कठोर तुम्हारी है मम जीवन में।अनचाहे ही दान दिए हैं तुमने जो मुझको, आसमान, आलोक, प्राण-तन-मन इतने सारे, बना रहे हो मुझे योग्य उस महादान के ही, अति इच्छाओं के संकट से त्राण दिला करके।मैं तो कभी भूल जाता हूँ, पुनः कभी चलता, लक्ष्य तुम्हारे पथ का धारण करके अन्तस् में, निष्ठुर ! तुम मेरे सम्मुख हो हट जाया करते। यह जो दया तुम्हारी है, वह जान रहा हूँ मैं;मुझे फिराया करते हो अपना लेने को ही।कर डालोगे इस जीवन को मिलन-योग्य अपने, रक्षा कर मेरी अपूर्ण इच्छा के संकट से।।

(आमि / बहु वासनाय प्राणपणे चाइ...। )
(३ )
अनजानों से भी करवाया है परिचय मेरा तुमने;

जानें, कितने आवासों में ठाँव मुझे दिलवायाहैदूरस्थोंको भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने,

भाई बनवाए हैं मेरे अन्यों को, जानें, पुरातन वास कहीं जब जाता हूँ, मैं,

‘क्या जाने क्या होगा’-सोचा करता हूँ मैं।नूतन बीच पुरातन हो तुम,

भूल इसे मैं जाता हूँ;दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ

और मरण में होगा अखिल भुवन में जब जो भी,

जन्म-जन्म का परिचित, चिन्होगे उन सबको तुम ही।

तुम्हें जानने पर न पराया होगा कोई भी;नहीं वर्जना होगी और न भय ही कोई

हो तुम मिला सभी को, ताकि दिखो सबमें ही।

दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने।।

(कत’ अजानारे जानाइले तुमि...। )
(४ )
मेरी रक्षा करो विपत्ति में, यह मेरी प्रार्थना नहीं है;मुझे नहीं हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही है।दुःख-ताप में व्यथित चित्त कोयदि आश्वासन दे न सको तो, विजय प्राप्त कर सकूँ दुःख में, मेरी चाह यही है।।मुझे सहारा मिले न कोई तो मेरा बल टूट न जाए, यदि दुनिया में क्षति-ही-क्षति हो, (और) वंचना आए आगे, मन मेरा रह पाये अक्षय, मेरी चाह यही है।।मेरा तुम उद्धार करोगे, यह मेरी प्रार्थना नहीं है;तर जाने की शक्ति मुझे हो, मेरी चाह यही है। मेरा भार अगर कम करके नहीं मुझे दे सको सान्त्वना, वहन उसे कर सकूँ स्वयं मैं, मेरी चाह यही है।।नतशिर हो तब मुखड़ा जैसे सुख के दिन पहचान सकूँ मैं, दुःख-रात्रि में अखिल धरा यह जिस दिन करे वंचना मुझसे, तुम पर मुझे न संशय हो तब, मेरी चाह यही है।।

(विपोदे मोरे रक्षा क’रो, ए न’हे मोर प्रार्थना)
(५ )
प्रेम, प्राण, गीत, गन्ध, आभा और पुलक में, आप्लावित कर अखिल गगन को, निखिल भुवन को, अमल अमृत झर रहा तुम्हारा अविरल है।दिशा-दिशा में आज टूटकर बन्धन सारा-मूर्तिमान हो रहा जाग आनंद विमल है;सुधा-सिक्त हो उठा आज यह जीवन है।शुभ्र चेतना मेरी सरसाती मंगल-रस, हुई कमल-सी विकसित है आनन्द-मग्न हो;अपना सारा मधु धरकर तब चरणों

जागउठी नीरव आभा में हृदय-प्रान्त में, उचित उदार उषा की अरुणिम कान्ति रुचिर है, अलस नयन-आवरण दूर हो गया शीघ्र है।।

(प्रेमे प्राणे गाने गन्धे आलोके पुलके...।)
(६ )
आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में;

आओ गन्धों में, वर्णों में, गानों में।आओ अंगों में तुम,

पुलिकत स्पर्शों में;आओ हर्षित सुधा-सिक्त सुमनोंमनाओ

मुग्ध मुदित इन दोनों नयनों में;आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में

निर्मल उज्ज्वल कान्त !

आओ सुन्दर स्निग्ध प्रशान्त !

आओ, आओ हे वैचित्र्य-विधानों में।आओ सुख-दुःख में तुम, आओ मर्मों में;आओ नित्य-नित्य ही सारे कर्मों में।आओ, आओ सर्व कर्म-अवसानों में;आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में।।(तुमि ! नव-नव रूपे एसो प्राणे...।)

(७ )
लगी हवा यों मन्द-मधुर इसनाव-पाल पर अमल-धवल है;

नहीं कभी देखा है मैंनेकिसी नाव का चलना

है किस जलधि-पार सेधन सुदूर का ऐसा,

जिससे-बह जाने को मन होता है;

फेंक डालने को करता जीतट पर सभी चाहना-पाना !

पीछे छरछर करता है जल, गुरु गम्भीर स्वर आता है;

मुख पर अरुण किरण पड़ती है, छनकर छिन्न मेघ-छिद्रोंसेकहो, कौन हो तुम ?

कांडारी।किसके हास्य-रुदन का धन है ?

सोच-सोचकर चिन्तित है मन, बाँधोगे किस स्वर में यन्त्र ?

मन्त्र कौन-सा गाना होगा

(लेगेछे अमल धवल पाले मन्द मधुर हावा)
(८ )
कहाँ आलोक, कहाँ आलोक ?

विरहानल से इसे जला

है, दीपक पर दीप्ति नहीं है;

क्या कपाल में लिखा यही है ?

उससे तो मरना अच्छा है;

विरहानल से इसे जलालोव्यथा-दूतिका गाती-प्राण !

जगें तुम्हारे हित भगवान।सघन तिमिर में आधी

रात तुम्हें बुलावें प्रेम-विहार-करने, रखें दुःख से मान।

जगें तुम्हारे हित भगवान।’मेघाच्छादित आसमान है;

झर-झर बादल बरस रहे हैं।

किस कारण इसे घोर निशा मेंसहसा मेरे प्राण जगे हैं ?

क्यों होते विह्वल इतने हैं ?झर-झर बादल बरस रहे हैं।

बिजली क्षणिक प्रभा बिखेरती, निविड़ तिमिर नयनों में भरती।

जानें, कितनी दूर, कहाँ है-गूँजा गीत गम्भीर राग में।

ध्वनि मन को पथ-ओर खींचती, निविड़ तिमिर नयनों में भरती।

कहाँ आलोक, कहाँ आलोक ?

विरहानल से इसे जला लो। घन पुकारता, पवन बुलाता,

समय बीतने पर क्या जाना !निविड़ निशा, घन श्याम घिरे हैं;

प्रेम-दीप से प्राण जला लो।।

(कोथाय आलो, कोथाय ओरे आलो ? )

Monday, October 13, 2008

कोलंबस का कारनामा -

रानी इज़ाबेला
क्रीस्टोफर कोलम्बस
५१६ साल पहले, इटली से क्रीस्टोफर कोलम्बस राजा फर्डीनन्ड -द्वीतीय आरागोन के व रानी इज़ाबेला कास्टील और लीयोन की, अनुमति लेकर एक नई दुनिया की खोज मेँ निकले थे.

तीन बार इज़ाबेला ने हाँ और ना की जब कोलम्बस ने अपनी योजना का प्रस्ताव रखा कि भारत की खोज के लिये जाने की अनुमति दी जाये भारतीय गरम मसाले युरोपीय माँसभक्षीयोँ के लिये अत्यँत आवश्यक होने लगे थे और भारत के रत्न, सुबर्ण और वैभव के किस्से भी युरोपीयन को आकृष्ट करने लगे थे - कोलम्बस ने भी भारतीय वैभव को हथियाने के मनसूबे से ही व्यापारीय जहाज लेकर, एक नई दुनिया की खोज मेँ प्रवास करने का निर्णय लिया था जिसके लिये राजसी स्वीकृती व आदेश भी निहायत आवश्यक था -


कोलंबस एक नाविक थे साहसी थे और उनका जीवन काल १४५१ से – मई की २० , १५०६ तक का रहा। स्पेन राज्य का नए भूखंड पर फैलाव और प्रसार उनके जीवन काल के बाद से ही हुआ। दक्षिण अमरीकी भूखंड पर इसके पहले तक , यूरोप से कोई भी आया नहीं था -


बहामा द्वीप के सान साल्वाडोर नामके स्थान पर कोलम्बस का जहाज लँगर डाल कर खडा हुआ तब जो लोग उसे दीखे उन्हेँ कोलम्बस ने इन्डीयन कहकर पुकारा - पर ये अमेरीकी इन्डीयन थे नाकि भारत वाले विशुध्ध देसी इन्डीयन !!


कोलंबस का १४९२ की साल में , अमेरिका के भूखंड पर उतरना अमेरिका और स्पेन अक्टूबर १२ के दिन कोलंबस दिवस के नाम से मनाया जाता है : क्लीक कीजिये : (Columbus Day)

और कुछ नहीँ तो कोलम्बस महाशय को अनेक विभिन्न समाज व सँस्कृतियोँ को एक दूसरे के सामने लाकर खडा करने मेँ सहायक भूमिका अदा करनेवाले के तौर पर तो हम रख ही सकते हैँ -

आज यहाँ अमरीका मेँ बैन्क होलीडे है पर अधिकतर ओफीस खुली रहतीँ हैँ -


१७९२ से कोलम्बस दिवस मनाये जाने की प्रथा का आरँभ हुआ है। इटली से आकर अमरीका मेँ बस गये अब अमरीकी नागरिकोँ का बहुत बडा वर्ग, अपने इस शोधकर्ता खलासी नाविक को गर्व से याद करता है।


तो अमरीकी रेड इन्डीयन इस दिवस को "अमरीकी भूखँड की खोज का दिवस " मानने से इन्कार करते हुए जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन करते हैँ चूँकि उनका कहना है कि, "हम लोग यहाँ रहते ही थे आप आये उससे भी पहले से अमरीका आबाद था !! रेड इन्डीयन विरोध प्रदर्शन कोलोराडो स्टेट के डनवर शहर मेँ जोर शोर से किया जाता रहा है -और बर्कली कोलज मेँ भी इस दिन को " मूल नागरिक रेड इन्डीयन दिवस " के तौर पर मनाया जाता है !


पूर्वीय प्राँतोँ मेँ जैसे न्यू योर्क, मेसेचुस्टेस, कनेटीकट,न्यु जर्सी मेँ कोलम्बस दिवस को फिर भी शौख से मनाया जाता है -

खैर! जो भी हुआ सो हुआ ॥

कोलंबस के कारनामे से विश्व का नक्शा जरुर बदला बदला सा दीखने लगा !

Friday, October 10, 2008

कितना प्यारा बच्चा ....

पम्पकिन लूंगा ..ये वाला ...और ये देखो, कितने सारे और ...
आहा ...देखो कित्ती फास्ट चला रहा हूँ मेरी कार ....
आइ लव यू " नो आ"
आज आपको मिलवाती हूँ मेरे नाती , " नोआ " से ॥
अब २ साल और ५ माह के हो गए हैं वो और खूब पहचानते हैं हर तरीके की गाडीयों को ...
बहुत पसंद है उसे ! हर तरह की कार्स !!
फोर्ड, जी एम् टोयोटा , होंडा , क्रायसलर, शेवरोलेट , इम्पाला, अल्फा रोमियो , पोर्श
मर्सीडीज़ , जीप, हम्मर, निसान, बी एम् डब्ल्यू ...
ओहो , मैं ना पहचानू पर नोआ पहचान लेता है !!
~~ और हम मुस्कुराते रहते हैं ! :~~)))
अब वे स्कुल भी जाने लगे हैं और नए नए दोस्त बनाने लगे हैं ...
गीत संगीत भी बहुत चाव से सुनते हैं नोआ जी और गाते भी हैं :)
उसके आगे भविष्य का आसमान खुला है ॥
ईश्वर मेरे नोआ को दुनिया की हर खूबसूरत चीज से नवाजे !
सुख की बदली सदा उसे खुशियों की सरगम से भीगोती रहे
और हमेशा मुस्कान सजी रहे
चेहरे पर ...
मेरे आशीर्वाद और प्यार मेरे नोआ के लिए और इस विश्व के हर शिशु के लिए
- लावण्या

Wednesday, October 8, 2008

श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' जी : रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद

१९०८ जन्म – से : १९७४ ´
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,

आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!

उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,

और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।
जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?

मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरतेऔर लाखों बार

तुझ-से पागलों को भी चांदनी में बैठ

स्वप्नों पर सही करते आदमी का स्वप्न?

है वह बुलबुला जल का आज बनता

और कल फिर फूट जाता हैकिन्तु,

फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?

बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।
मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,

देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?

स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?

आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?
मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,

आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,

और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,

इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।
मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने,

जिसकीकल्पना की जीभ में भी धार होती है,

बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,

स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।
स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-

रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,

रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,

स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

दिनकर जी का जन्म भूमिहार ब्राह्मण : Brahmin परिवार में हुआ / सिमरिया गाँव , बेगुसराय तालुका, बिहार : Bihar वीर रस के कवि की जन्मभूमि है।

वे ३ बार रज्य सभाके मनोनीत सदस्य रहे और पद्म भूषण से भी सुशोभित किये गये थे । दिनकर जी न केवल एक महान साहित्यकार थे बल्कि गृह मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार के रूप में उन्होंने दक्षिण एवं उत्तरी भारत को भाषाई स्तर पर जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

मानस बवेजा से सुनिए "रश्मि रथी "

Part 1 Part 2 Part 3

बढ़कर विपत्ति पर छा जा , मेरे किशोर मेरे ताज़ा ,
जीवन का रस छन जाने दे , तन को पत्थर बन जाने दे ,
तू स्वयं तेज भयकारी है , क्या कर सकती चिंगारी है ?"
(रश्मिरथी , सर्ग ३ )

दिनकर जी की बड़ी सुंदर पंक्तियां हैं-

" बड़ा वो आदमी जो जिंदगी भर काम करता है।

बड़ी वो रूह जो तन से बिना रोए निकलती है।"

क्षमा शोभती उसी भुजंग को जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दन्त हीन, विषरहित,विनीत,सरल हो।

दिनकर जी की सर्व प्रथम प्रकाशित कृति है : विजय संदेश १९२८

प्रन्भंग १९२९

रेणुका : Renuka १९३५
हुंकार : १९३८
रसवंती : १९३९
द्वंद्वगीत : १९४०
कुरुक्षेत्र : Kurukshetra१९४६
धुप छाँव : १९४६
सामधेनी १९४७
बापू १९४७
इतिहास के आंसू १९५१
धुप और धुआं १९५१
मिर्च का मज़ा १९५१
रश्मिरथी : १९५४
नीम के पत्ते १९५४
सूरज का ब्याह १९५५
नील कुसुम १९५४
चक्रवाल १९५६
कविश्री १९५७
सीपी और शंख १९५७
नए सुभाषित १९५७
रामधारी सिंघ 'दिनकर '
Urvashi उर्वशी : १९६१ : ज्ञान पीठ पुरस्कार
परशुराम की प्रतीक्षा १९६३
कोयला और कवित्व १९६४
मृत्ति तिलक १९६४
आत्मा की आंखे १९६४
हारे को हरिनाम १९७०
काव्य संचय :
लोकप्रिय कवि दिनकर : १९६०
दिनकर की सूक्तियां : १९६४
दिनकर के गीत : १९७३
संचयिता : १९७३
रश्मिलोक : १९७४
उर्वशी तथा अन्य श्रृंगारिक कवितायें : १९७४
दूसरी रचनाएं :
मिटटी की ओर : १९४६
चित्तौर का साका : १९४८
अर्धनारीश्वर : १९५२
रेती के फूल : १९५४
हमारी सांस्कृतिक एकता : १९५४
भारत की सांस्कृतिक कहानी : १९५५
राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता : १९५५
उजली आग : १९५६
संस्कृति के चार अध्याय : १९५६ : साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कृति
काव्य की भूमिका : १९५८
पन्त , प्रसाद और मैथिलीशरण : १९५८
वेणु वन : १९५८
धर्मं , नैतिकता और विज्ञानं : १९५९
वट - पीपल : १९६१
लोकदेव नेहरू : १९६५
शुद्ध कविता की खोज : १९६६
साहित्यामुखी : १९६८
हे राम ! : १९६८
संस्मरण और श्रद्धांजलियां : १९७०
मेरी यात्रायें : १९७१
भारतीय एकता : १९७१
दिनकर की डायरी : १९७३
चेतना की शिला : १९७३
विवाह की मुसीबतें : १९७३
आधुनिक बोध : १९७३

"दिनकर" जी के कुछ काव्य संकलन हैं
दिनकर चाचाजी का व्यक्तित्व बेहद प्रभावशाली था। मेरी मुलाक़ात जब हिन्दी साहित्य केतेजस्वी कवि श्री दिनकर जी से हुई तब मेरी उमर शायद २० बरस की होगी ।

स्थान था पापाजी का घर नई दिल्ली में जब वे आकाशवाणी देहली केन्द्र का कार्य देख रहे थे हम बच्चे और अम्मा सुशीला और गायत्री दीदी , देहली आए हुए थे।
गायत्री दीदी का ब्याह हिन्दी के कवि श्री शिव शंकर शर्मा " राकेश " जी से , दिल्ली में जब हुआ था तब हम नेताजी नगर , दिल्ली में , पापा जी के साथ ,
शादी के समारोह में खुश हो रहे थे !
श्री दिनकर जी , बच्चन जी , नागेन्द्र जी इत्यादि कई महानुभाव पधारे थे .....
श्री दिनकर जी ,उनकी खुली, उन्मुक्त, ठहाकेदार हँसी, चमकता हुआ दीव्य ऊँचा ललाट, सुफेद झक्क धोती, उस पे पहना रेशमी कुर्ता ,
आज भी आँखोँ के सामने स्पष्ट है
फ़िर कई बरसों के बाद उनके निधन की दुखद घटना के बारे मेँ मेरी अम्मा ने जो रोमाँचक बात बतलाई थी वह याद आ रही है -
श्री दिनकर चाचा जी किन्हीँ निजी मामलोँ मेँ उलझ कर असँतुष्ट थे।
उनके जीवन की सँध्या काल मेँ वे अपनोँ से ही शायद किन्हीँ कारणोँ से
मन ही मन कुछ खिन्नता महसूस कर रहे थे।
इसी मन:स्थिती मेँ वे भुवनेश्वर के सुप्रसिध्ध जगन्नाथ धाम मँदिर के लिये अपना घर छोड कर वे यात्रा पे निकले थे -
जैसे ही मँदिर के प्राँगण मेँ उन्होँने प्रवेश किया और भक्ति भाव से दोनोँ हाथ प्रणाम मुद्रा मेँ उपर की ओर उठाये और प्रभु
को " जय हो ! " की गुहार की,
ठीक उसी वक्त, दैव योग से कवि के प्राण पँखेरु उड गये !
ये कितनी विस्मयकारी बात है ना ?
उनकी आत्मा दिव्य रही होगी जो प्रभु ने वहीँ पर उन्हेँ अपनी शरण मेँ ले लिया !
लाल कीले की प्राचीर से देश भक्ति की वीर रस से ओत - प्रोत कविताओँ का
स -स्वर पाठ करनेवाले हमारे राष्ट्रकवि दिनकर जी
चाचाजी हिन्दी काव्य जगत के अनमोल रतन हैँ!
आप सभी ने एक प्रभावशाली एवँ ओजस्वी कविवर दिनकर जी की कविताओँ को चाव से पढा होगा -आज उन्हेँ देखिये, एक बेटी की द्रष्टि से,जैसे कोई एक घर के सद्स्य को देखता है ॥
मेरी नज़रोँ से देखिये ..
उनकी महानता का बोध, मुझ अबोध को उस समय कम ही रहा होगा -
आज जब उनकी काव्य पँक्तियाँ, विशुध्ध देश प्रेम की वैतरणी सम जन मन की मलिनता को धोती हुई पावन करती हुई बहतीँ हैँ तब सोचती हूँ ,
कि ईश्वर हर मनुष्य की आत्मा की ना जाने कितनी कसौटीयाँ लेते हैँ।
तभी तो हरेक आत्मा कुँदन की तरह तप कर, और निखरती है और जब इस प्रक्रिया का अँत होता है तब जो मूल तत्त्व है वह, स्वर्ण सा दमकता हुआ उस पूर्ण मेँ समा जाता है -
अहम्` ब्रह्म्` मेँ विलीन हो जाता है
सदा सदा के लिये और मुक्ति के द्वार खुल जाते हैँ
श्री दिनकर जी , उनकी कालजयी कविताओं द्वारा सदा अमर रहेँगेँ !
उनकी पावन स्मृतियोँ को मेरे शत शत प्रणाम !!
-- लावण्या

Sunday, October 5, 2008

पतझड और शीत की लहर .......,

" जो जुत्रास " नामके एक शख्श ने, सितम्बर २९ , २००७ के दिन, मेसेचुसेट्स प्राँत मेँ दर्ज करवा कर, विश्व के सबसे विशालकाय कद्दू उगानेवाले का इनाम जीत लिया सबसे विशाल कद्दू,१६८९ पाउन्ड का है !!
पतझड और शीत की लहर ,
साल के अँतिम महीनो की कुदरत प्रदत्त सौगात है हम मनुष्योँ के लिये.सितम्बर माह पूरा हुआ और अक्तूबर भी भागा जा रहा है.
इस वर्ष ठँड का मौसम कहीँ ओझल हुआसा लग रहा है. अन्यथा, यहाँ
तक आते आते तो सारे पेड रँगोँ की चुनरिया ओढे धीरे धीरे पतोँ कोजमीन पर बिछाते दीखलाई पडते.
मेरे आवास के ठीक सामने एक सुदर्शन पेड है.
पाँच, त्रिकोणाकार की पत्तियाँ सजाये एक ही पत्ती मेँ,
लाल, कत्थई, मरुन, केसरी, पीला, हरा इतने सारे रँगोँ का सम्मिश्रण लिये,
कुदरत का करिश्मा सा लगता है वो मुझे ! फिर सारे पत्ते, तेज़ हवाओँ के साथ, टूट कर,गिरने लगते हैँ और पेड, सिर्फ शाखोँ को सम्हाले
,खडा ठिठुरने लगता है। इसी पतझड के साथ नवरात्र का त्योहार भी आ जाता है.
अमरीका के हर शहर मेँ भारतीय लोग, मिल जुल कर, माँ जगदम्बा की प्रतिष्ठा करते हैँ। मिट्टी के कलश मेँ दीप रखा जाता है, जिसके छिद्रोँ से पावन प्रकाश बाहर आता रहता है और सुहागिन की नत काया को आशिष देता है।

माता की चौकी भी सजती है. श्रध्धालु भक्त ९ दिनोँ तक उपवास भी करते हैँ तो स्त्रियाँ औरबच्चे गरबा मेँ तल्लीनता से, दूर भारत के गुजरात के गाँवोँ मेँ गाये गरबे वैसी ही पुरानी शैली से, पूर्ण भक्ति भाव से गाते हुए दीखलायी देते हैँ.
अभी गणेशोत्सव सँपन्न हुआ और अब, माँ भवानी का आगमन हुआ है. आरती के बाद, प्रसाद भी बाँटा जाता है। मँदिरोँ की शोभा देखते ही बनती है.
बँगाली कौम के लोग दुर्गोत्सव मेँ माँ दुर्गा के स्वरुप की स्थापना करते हैँ।

यही तो भारतीय सनातन धर्म की रीत है जो हर जगह अपना अस्तित्व नये सिरे से, बना कर दुबारा पल्लवित हो जाती है।

अमेरीका मेँ भी इसी ऋतु मेँ अलग किस्म के त्योहार मनाये जाते हैँ.
जिसका नाम भी बडा अजीओगरीब है !
जी हाँ, ये है, हालोईन का त्योहार ! (The Festival of Halloween )--
३१ अक्तूबर , अँतिम रात्रि को आइरीश मूल के लोग, १ नवम्बर से पहले अपने मृतक पूर्वजोँ के लिये मोमबत्तियाँ जला कर, प्रार्थना किया करते थे।

जिसकी नीँव रखी गयी थी, २००० साल से पहले !
"समहेन" केल्टीक याने आयर्लैन्डके लोगोँ के यम देवता हैँ --
औरु उनकी मान्यता थी कि मृतक आत्माएँ १ नवम्बर के अगली रात्रि को धरती पर लौटतीँ हैँ -
सो, तैयार हुई फसल की कटाई के बाद,
विविध प्रकार के परिधानोँ मेँ सज कर,
बडे कद्दूओँ को काट कर, उस के भीतर जगह करने के बाद,
जली हुई मोमबतीयाँ रखीँ जातीँ थीँ कि जिससे प्रेतात्मा की बाधा ना होऔर दूसरे दिवस की सुबह, हर आत्मा की भलाई के लिये पूजा करके बिताई जाती थी.
७ वीँ शताब्दि के बाद औयरलैन्ड से चल कर समूचे युरोप मेँ ये प्रथा, प्रचलित हुईऔर जब वहीँ से प्रवासी, अमरीका भूखँड बसाने आये
तो अपनी रीति रीवाज, रस्मोँ को त्योहारोँ को भी साथ लेते आये।

आज अमरीका मेँ बीभत्स, भयानक, वेश भूषा, पहन कर लोग एक दूसरे को डराते हैँ
तो कई सारे मनोविनोद के लिये, तस्कर, खलासी,नाविक, नर्स,राजकुमारी, कटे सर से झूठ मूठ का रक्त बहता हो ऐसे या डरावने मुखौटे लगा कर,
सुफेद, लाल, नीले पीले, हरे ऐसे नकली बाल लगा कर ,
विविध रुप धर लेते हैँ और अँधेरी रात मेँ खुद डर कर मजा लेते हैँ
या औरोँ को डराने के प्रयास मेँ तरकीब करते हैँ.
छोटे बच्चोँ के साथ उनके माता पिता भी रहते हैँ
हर घर पर दस्तक देकर बच्चे पूछते हैँ,
" ट्रीक ओर ट्रीट ? "
मतलब, कोई करतब देखोगे या हमेँ खुश करोगे ?
तो घर से लोग बाहर निकल कर,
चोकलेट, गोली, बिस्कुट इत्यादी उनकी झोली मेँ डाल देते हैँ.
खूब सारी केन्डी मिल जाती है बच्चोँ को !
कई बुरे सुभाव को लोग, बच्चोँ को परेशान भी करते हैँ
इसलिये टी.वी. पर खूब सारी,हिदायतेँ दीँ जातीँ हैँ -- खैर !जैसा देश, वैसे त्योहार !
अब भारतीय लोग नवरात्र के साथ साथ हेलोईन भी मना ही लेते हैँ
और द्वार पर आये बच्चोँ का मन तोडते नहीँ --
विश्व का सबसे विशालकाय कद्दू
जानते हैँ आप कि सबसे विशाल कद्दू,१६८९ पाउन्ड का है
जिसे " जो जुत्रास " नामके एक शख्श ने,
सितम्बर २९ , २००७ के दिन, मेसेचुसेट्स प्राँत मेँ दर्ज करवा कर,
विश्व के सबसे विशालकाय कद्दू उगानेवाले का इनाम जीत लिया.
आजकल, अमरीका के हर मोल की दुकान पर
या घरोँ की सामने हर घर की ड्योढी पर,
केसरी रँग के कद्दू, मक्का, और खेत मेँ रखते हैँ वैसा गुड्डा सजाया दीख जाता है. और, इस तरह परदेस मेँ रहते हुए भी,
धरती माता और जगजन्नी अम्बिका का प्रसाद मिल जाता है.
अब चलूँ ..
माँ की आरती का पावन अवसर है..
आप सभी को,
"अमरीका की पाती" " जय माता दी " कहते हुए, विदा लेती है।

http://www.youtube.com/watch?v=oZA66kG5UEc.
.फिर मिलेँगे ..
तब तक, भगवती प्रसन्न रहे !-

( सृजन गाथा से साभार )


- स स्नेह, -- लावण्या

Friday, October 3, 2008

विविध ~ भारती ~~~ स्वर्ण जयँती उत्सव मना रहा है...


स्ट्युडियो मेँ चिँतन की मुद्रा मेँ पापा जी स्व. पँडित नरेन्द्र शर्मा


कौन जानता था कि, एक नन्हा सा पौधा इतना घटादार,घना, हरा भरा बरगद सा फैला विशाल वृक्ष बन जायेगा ?

मेरे पूज्य पापा जी स्व.पँडित नरेन्द्र शर्मा तथा अन्य कर्मठ साथियोँ की मेहनत से लगाया ये नन्हा बिरवा, "विविध ~ भारती" स्वर्ण जयँती उत्सव मना रहा है...
भारत सरकार द्वारा आरँभ किया गया, भारत की जनता के प्रति पूरी ततह समर्पित, आधुनिक वायु सँचार माध्यम का यशस्वी रेडियो कार्यक्रम, अबाध, सुचारु रुप से चलता रहे, ये मेरी शुभकामना है और विविध भारती से जुडे हरेक व्यक्ति को मेरे सस्नेह अभिवादन !
स्वर्ण जयँती सु -अवसर आया,

जन जन के मन उमँग छाया
नव सँशोधन, स्वर लहर मधुर
विविध भारती बन,मधुराकर्षण
भारत के गौरव सा, ही हो पूरण
शत वरष,भावी के कर गुँजारित
प्रेम वारिधि छलका कर ,अविरत
जन जन का बन समन्वय -सेतु
फहराता रहे, यशस्वी, हर्ष - केतु
-- लावण्या

जोगलिखी संजय पटेल की said...

पचासवाँ शुभ जन्म दिवस मनाओ विविध भारती,

हम श्रोताओं की भावनाएँ उतारे तुम्हारी आरती

नाच रहा है मन - मयूरा ; जगमगाए दीपक सरस

लावण्य बढ़े प्रतिपल तुम्हारा पल पल रहे अति सरस

Prem Piyush said...
लावण्या,

आपके पापाजी की यह सारी संकल्पना समय के धारा के साथ आज भी बह रही है विविध भारती का नाम, इसकी संकल्पना, अनेक कार्यक्रमों की रुपरेखा जो समय के साथ अपनी मौलिकता लेकर आज भी वैसी ही मनोरंजक और ज्ञानवर्धक है ।शैशवावस्था से पाल पोसकर बड़ा किया गया विविध भारती का सदा युवा रहने वाला इस रुप का श्रेय पंडित जी को जाता है । अपनी सारी कृतियों और रेडियो मनोरंजन के उन नामों में पंडितजी अमर हैं ।

m.p. said...
lavanya ji ,aapki panktiyon mein chhupa aashirwad man ko chhoo gaya. humare poorvaj the panditji aur aap unki santaan hain ,hamare liye garv ka vishay hai ki aapka aashirvad hamen mila hai.hamne seemit saadhnon ke saath jo prayas kiya,aapko kaisa laga agar aap do panktiyan likhengi to mahati kripa hogi.mere paas hindi font nahin hai,roman mein likh raha hoon kshamaprarthi hoon........ mahendra modi,

sahayak kendra nideshak,vividh bharati,mumbai mpmodi@gmail.com

(यहाँ ऊपर दी हुई सारी सामग्री पुनः प्रकाशित कर रही हूँ )

..और अब आगे

http://radionama.blogspot.com/ " रेडियोनामा "

देखिये ये लिंक्स :

http://radionamaa.blogspot.com/2007/10/blog-post_25.html

http://radionama.blogspot.com/2008/02/blog-post.html

http://radionama.blogspot.com/2007/09/blog-post_8214.html

प्रकाशित आलेख को मेरे जाल घर पर भी दे रही हूँ ~~~

आप अवश्य पढेँ और आपकी शुभकामना व आशीर्वाद

विविध भारती के लिए अवश्य दीजिये ~~~

धन्यवाद !

" बधाई हो जी बधाई ..
आप सारे श्रोताओँ को और दूर परदेस मेँ बसे या भारत मेँ विविध भारती के रंगारंग कार्यक्रमोँ को सुन रहे अनगिनत रसिक श्रोताओँ को विविध भारती के स्‍वर्ण जयँती के उपलक्ष्य मेँ अनेकोँ बधाईयाँ ! आशा है आपकी ईद बढिया मनी होगी और नवरात्र के उत्सव का आप भरपूर आनँद ले रहे होँगेँ ...आज आपके सामने विविध भारती की शिशु अवस्था की यादेँ लेकर लौटी हूँ ..

जनाब रिफत सरोश जी ने हमेँ यह बतलाया था कि, कैसे पहले इन्डियन पीपल्स थियेटर यानी इप्टा रंगमंच की दुनिया में सक्रिय था ॥

वहीँ किसी कार्यक्रम मेँ रि‍फत साहब ने नाटक के सूत्रधार की आवाज़ सुनी और ये भी जान लिया कि श्रोता जिस आवाज़ के जादू से बँधे हुए से थे वह हिन्दी कविता से नाता रखते कवि नरेन्द्र शर्मा थे.

भारत की स्वतँत्रता के बाद आकाशवाणी की नीति मेँ परिवर्तन आया और रेडियो के लिये हिन्दी लेखकोँ और कवियोँ की तलाश जारी हुई. नीलकँठ तिवारी, रतन लाल जोशी, सरस्वती कुमार दीपक, सत्यकाम विध्यालँकार, वीरेन्द्र कुमार जैन, किशोरी रमन टँडन,डा. शशि शेखर नैथानी, सी. एल्. प्रभात, के. सी. शर्मा भिक्खु, भीष्म साहनी जैसे हिन्दी के अच्छे खासे लोग रेडियो प्रोग्रामोँ मेँ हिस्सा लेने लगे.
अब रि‍फत सरोश जी के शब्दोँ मेँ आगे की कथा सुनिये ..

" उन्हीँ दिनोँ हम लोगोँ ने पँ. नरेन्द्र शर्मा को भी आमादा किया- एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया- " कवि और कलाकार" उसमेँ सँगीत निर्देशक अनिल बिस्वास, एस्. डी. बर्मन, नौशाद और शैलेश मुखर्जी ने गीतोँ ,गज़लोँ की धुनेँ बनाई । शकील, साहिर और डाक्टर सफदर "आह" के अलावा नरेन्द्र जी भी इस प्रोग्राम के लिये राजी हो गये - नरेन्द्र जी के एक अनूठे गीत की धुन अनिल बिस्वास ने बनाई थी, जिसे लता मँगेशकर ने गाया था -

" युग की सँध्या कृषक वधू -सी, किसका पँथ निहार रही "

पहले यह गीत कवि ने स्वयँ पढा, फिर इसे गायिका ने गाया उन दिनोँ आम चलते हुए गीतोँ का रिवाज हो गया था और गज़ल के चकते दमकते लफ्ज़ोँ को गीतोँ मेँ पिरो कर अनगिनत फिल्मी गीत लिखे जा रहे थे - ऐसे माहौल मेँ नरेन्द्र जी का यह गीत सभी को अच्छा लगा, जिसमेँ साहित्य के रँग के साथ भारत भूमि की सुगँध भी बसी हुई थी - और फिर नरेन्द्र जी हमारे हिन्दी विभाग के कार्यक्रमोँ मेँ स्वेच्छा से आने लगे - एक बार नरेन्द्र जी ने एक रुपक लिखा -

" चाँद मेरा साथी " उन्होँने चाँद के बारे मेँ अपनी कई कवितायेँ जो विभिन्न मूड की थीँ एक रुपक लडी मेँ इस प्रकार पिरोई थी कि मनुष्य की मनोस्थिति सामने आ जाती थी - वह सूत्र रुपक की जान था - मुझे रुपक रचने का यह विचित्र ढँग बहुत पसँद आया और आगे का प्रयोग किया -मैँ बम्बई रेडियो पर हिन्दी विभाग मेँ स्टाफ आर्टिस्ट था और अब्दुल गनी फारुकी प्रोग्राम असिस्टेँट ! फारुकी साहब नरेन्द्र जी से किसी प्रोग्राम के लिये कहते , वे फौरन आमादा हो जाते - आते , और अपनी मुलायम मुस्कुराहट और शान्त भाव से हम सब का मन मोह लेते !

समय ने एक और करवट बदली उस समय के सूचना तथा प्रसारण मँत्री डा. बी.वी. केसकर फिल्मी गानोँ से आज़िज थे मगर पब्लिक गाना सुनना चाहते थे - केसकर साहब ने एक व्यापक कार्यक्रम बनाया कि आकाशवाणी के बडे बडे केन्द्रोँ पर लाइट म्युजिक यूनिट ( प्रसारण गीत विभाग ) बनायेँ जायेँ, परन्तु उनमेँ फिल्मी गानोँ जैसा छोछोरापन और बाजारुपन न हो ! बम्बई मेँ इस भाग के प्रोड्युसर नरेन्द्र जी नियुक्त किये गये - कल तक नरेन्द्र शर्मा हमारे अतिथि बनकर आया करते थे , अब वे, जिम्मेदार और प्रभावशाली अफसर बन गये जिनकी डायरेक्ट पहुँच मँत्री महोदय तक थी और हमने देखा कि बी. पी. भट्ट जैसे स्टेशन डायरेक्टर उनके आग पीछे घूमने लगे परन्तु नरेन्द्र जी की मुस्कुराहट मेँ वही मुलायमियत और वही रेशमीपन था ! वह सहज भाव से हम लोगोँ से बातेँ करते -

उनको एक अलग कमरा दे दिया गया था प्रसार गीत विभाग भारतीय सँगीत का एक अँग नहीँ, बल्कि हमारे हिन्दी सेक्शन का एक हिस्सा था और नरेन्द्र जी की वजह से सेक्शन चलाने मेँ हमेँ बडी आसानी थी - कहीँ गाडी नहीँ रुकती थी , चाहे आर्टिस्‍टों का मामला हो या टेपोँ और स्टुडियो का ! उन्होँने हिन्दी सेक्शन के अन्य कामोँ मेँ हस्तक्षेप करना उचित नहीँ समझा उन्हेँ प्रसार गीत से ही सरोकार था आधे दिन के लिये दफ्तर आते थे - या तो सुबह से लँच तक या लँच के बाद शाम तक ! अपने ताल्लुकात की वजह से उन्होँने फिल्मी दुनिया के मशहूर सँगीतकारोँ से प्रसार गीतोँ की धुनेँ बनवाईँ जैसे नौशाद , एस. डी बर्मन, सी. रामचन्द्र, राम गांगुली, अनिल बिस्वास, उस्ताद अली अकबर खाँ और कोई ऐसा फिल्मी गायक न था जिसने प्रसार गीत न गाये होँ - लता मँगेशकर, आशा भोँसले, गीता राय, सुमन कल्याणपुर, मुकेश, मन्ना डे, एच. डी. बातिश, जी. एम्. दुर्रानी, मुहम्मद रफी, तलत महमूद, सुधा मल्होत्रा - सब लोग हमारे बुलावे पर शौक से आते थे - यह नरेन्द्र जी के व्यक्तित्त्व का जादू था - एक सप्ताह मेँ एक दो गाने जरुर रिकार्ड हो जाते, जो तमाम केन्द्रोँ को भेजे जाते आज मैँ अनुभव करता हूँ कि, नरेन्द्र जी का एक यही कितना बडा एहसान है आकाशवाणी पर कि उन्होँने उच्चकोटि के असँख्य गीत प्रसार विभाग द्वारा इस सँस्था को दिये !

आकाशवाणी को बदनामी के दलदल से निकालने और प्रोग्रामोँ को लोकप्रिय बनाने मेँ नरेन्द्र जी का महत्त्वपूर्ण योगदान है " प्रसार -गीत " तो उसकी एक मिसाल है परन्तु जो अद्वितीय कार्य उन्होँने किया वह था, " विविध भारती " की रुपरेखा की तैयारी तथा प्रस्तुति ! अपने मित्र तथा आकाशवाणी के महानिर्देशक श्री जे. सी. माथुर के साथ मिलकर नरेन्द्र जी ने आल इँडीया वेरायटी प्रोग्राम का खाका बनाया जिसका अति सुँदर नाम रखा " विविध भारती " आकाशवाणी का ऐसा इन्कलाबी कदम था जिसने न सिर्फ उस की खोई हुई साख वापस दिलाई, बल्कि आकाशवाणी के श्रोताओँ मेँ नई रुचि पैदा की और उसमेँ हलके -फुलके प्रोग्रामोँ द्वारा राष्ट्रीयता और देश प्रेम का एहसास जगाया और आगे चलकर यह कार्यक्रम आकाशवाणी के लिये " लक्ष्मी का अवतार " साबित हुआ - इस तमाम आकाशवाणी के इतिहास मेँ उनका नाम सुनहरे अक्षरोँ मेँ लिखा जायेगा -

मेरे फरिश्तोँ को भी पता न था कि नरेन्द्र जी जैसे विद्वान मेरे बारे मेँ इतनी अच्छी राय रखते हैँ कि जब "विविध भारती " विभाग की स्थपना होने लगी तो उन्होँने अपने असिस्टँट प्रोद्युसरोँ के लिये जहाँ दिल्ली से बी. एस्. भटनागरजी, विनोद शर्मा, सत्येन्द्र शरत्` और नागपुर से भृँग तुपकरी को चयन किया तो बम्बई से मुझे योग्य समझा और मेरा नाम हिन्दी प्रोड्युसरोँ की सूची मेँ रखा इस प्रकार मेरी ज़िन्दगी मेँ एक नया मोड लाने मेँ नरेन्द्र जी का एह्सान है - उन दिनोँ आकाशवाणी मेँ " आसिस्टेँट प्रोड्यूसर " बनना बडे गौरव की बात समझी जाती थी

जब विविध भारती के लिये नमूने के प्रोग्राम तैयार किये जाते थे, तो मैँने नरेन्द्र जी की " चाँद मेरा साथी " वाली टेकनीक को अपनाकर गज़लोँ और गीतोँ का मिलाजुला प्रोग्राम " गजरा " बनाया जिसमेँ हल्की फुल्की चटाखेदार हिन्दुस्तानी जबान की कम्पेयरिँग मेँ पिरोया - यह पहला प्रोग्राम था जो श्री जे. सी. माथुर को सुनाया गया था और उन्हेँ पसँद आया " यह आकाशवाणी का पँचरँगी प्रोग्राम है - विविध भारती, गजरा ! गीत के रँग -बिरँगे फूलोँ से बनाया गया - गजरा "

बीच मेँ एक बात याद आ गई - नरेन्द्र जी अच्छे खासे ज्योतीषी भी थे -


" विविध भारती " प्रोग्राम पहली जुलाई को शुरु होने वाला था - फिर तारीख बदली आखिर पँडित नरेन्द्र शर्मा ने अपनी ज्योतिष विध्या की रोशनी मेँ तय किया कि यह प्रोग्राम ३ अक्तूबर १९५७ के शुभ दिन से शुरु होगा और प्रोग्राम का शुभारँभ हुआ तो " विविध भारती " का डँका हर तरफ बजने लगा -


लेखक: ज़नाब रीफत सरोश साहब ....
( आगे की कथा ..फिर कभी सुनाऊँगी ..आज इतना ही ..कहते हुए आपसे आज्ञा ले रही हूँ ...और मेरे पापा जी के लगाये इस पवित्र बिरवे को आज हरा भरा सघन पेड़ बना हुआ देखकर विविध भारती व आकाशवाणी सँस्था को सच्चे ह्र्दय से शुभकामनाएँ दे रही हूँ !

ईश्वर करेँ कि हर इन्सान जो इनसे जुडा हुआ है कार्यक्रम प्रस्‍तुतकर्ता या श्रोता के रुप मेँ, चाहे देशवासी होँ या परदेसी श्रोता, मित्र व साथी, सभी को बधाई देते अपार हर्ष हो रहा है ! शुभम्-भवति ..स-स्नेह सादर-- लावण्या

Wednesday, October 1, 2008

मैं कहती हूँ आँखिन देखी .,

चित्रकार श्री लक्ष्मण पै के साथ पद्मा जी
मैं कहती हूँ आँखिन देखी .,

पुस्तक का कवर पेज
एक ख़बर ये भी है कि, मेरे जाल घर की कीमत है

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ऐसा मैं यहाँ से जान पाई हूँ !
श्रीमती पद्मा सचदेव
लाल डेड ,अरिन माल , हब्बा ये नाम कश्मीर की खुबसूरत वादियों से गूंजी और उसी सरज़मीन पर जन्मी , कवियात्रीयों की सूची है जिस में आज पद्मा जी का नाम भी शामिल हो गया है। पद्मा जी का जन्म १९४० में , प्रोफेसर जे देव बदु जो संस्कृत के विद्वान थे उनकी प्रथम संतान के रूप में , हुआ था। १९४७ के विभाजन के बाद वे देवका नदी के किनारे बसे पुर्णमँडल गाँव में आ बसे। शैशव मेँ सुनी अपनी प्यारी मातृभाषा डोगरी मेँ पद्मा जी ने छोटी छोटी कविता रच कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया और पिता के पैरोँ तले बैठ, सँस्कृत के श्लोक भी बोले हैँ। कोलेज के स्टेज पर पढी डोगरी कविता को "सँदेश " पत्रिका मेँ स्थान मिला सँपादक वेद पाल दीप जी के सौजन्य से ~~ जो पद्मा से १२ साल बडे थे १६ साल की पद्मा से पर दोनोँ को प्यार हो गया और दोनोँ के परिवारोँ की मरज़ी ना होते हुए भी प्यार परवान चढा!
उसके बाद पद्माजी ने ३ साल श्रीनगर अस्पताल मेँ बिताये और वे राजरोग यक्ष्मा से पीडीत रहीँ ! १४ वर्ष की ऊम्र मेँ लिखी पद्मा जी की कविता "राजा दीयाँ मन्डीयाँ " डोगरी भाषा की हर किताब का हिस्सा बन गई है।

स्वस्थ होने के बाद रेडियो कश्मीर ,जम्मू के लिये कई बरसोँ तक पद्मा जी ने कार्य भार सम्भालाऔर वे उनके पति से अलग हो गईँ। जम्मू कश्मीर के मुख्य मँत्री ने पद्माजी को सहकार पत्र दिया जिसे लेकर वे जम्मू मेँ उनके खिलाफ हो उठे मध्य वर्गीय समाज को पीछे छोड, दिल्ली का रुख किया जहाँ उनकी दोस्ती शास्त्रीय गायक श्री सुरिँदर सिँह जी से प्रगाढ होती गई।


सन १९६९ मेँ पद्मा जी की काव्य पुस्तक निकली जिसकी भूमिका राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिँह दिनकर जी ने लिखी थी और कहा था,

" जो पद्मा लिखती है वही कविता है जिसे पढकर लगता
है मैँ अपनी लेखनी फेँक दूँ ! "

" हर कलाकार उतना बड़ा होता है जितना वोह
अपने अन्दर के बच्चे को बचा कर रखता है "

ये पद्मा जी का कहना है ~~ ये फ़िल्म गीत है !

Movie: Prem Parbat
Singer(s): Lata Mangeshkar
Music Director: Jaidev
Lyricist: Padma Sachdev

(१ )
ये नीर कहाँ से बरसे हैये बदरी कहाँ से आई है) -२ये बदरी कहाँ से आई है
गहरे गहरे नाले गहरा गहरा पानी रेगहरे गहरे नाले, गहरा पानी रेगहरे मन की चाह अनजानी रेजग की भूल-भुलैयाँ में -२कूँज कोई बौराई है
ये बदरी कहाँ से आई है
चीड़ों के संग आहें भर लींचीड़ों के संग आहें भर लींआग चनार की माँग में धर लीबुझ ना पाये रे, बुझ ना पाये रेबुझ ना पाये रे राख में भी जोऐसी अगन लगाई है
ये नीर कहाँ से बरसे है ...
पंछी पगले कहाँ घर तेरा रेपंछी पगले कहाँ घर तेरा रेभूल न जइयो अपना बसेरा रेकोयल भूल गई जो घर -२वो लौटके फिर कब आई है -२
ये नीर कहाँ से बरसे हैये बदरी कहाँ से आई है
(२ )
मेरा छोटा सा घरबार मेरे अंगना में -२
छोटा सा चंदा छोटे छोटे तारेरात करे सिंगार मेरे अंगना में
मेरा छोटा सा घरबार मेरे अंगना में
(प्यारा सा गुड्डा मेरा अम्बर से आया -२अम्बर से आया मेरे मन में समाया ) -२कण - कण में जागा है प्यार मेरे अंगना में -२
मेरा छोटा सा घरबार ...
# हुम्मिन्ग #
(देहरी रंग लूँ अंगना बुहारूँ तुलसी मैया मैं तोरी नजर उतारूँ) -२प्यार खड़ा मेरे द्वार मेरे अंगना में -२
मेरा छोटा सा घरबार ...

"तावी ते चहान " १९७६ मेँ नेहरियान गलियाँ, १९८२ मेँ और " पोट पोट निम्बल" १९८२ मेँ और १९९९ मेँ " तनहाईयाँ" उनकी कविताओँ की कीताबेँ प्रकाशित हुईँ

" उत्तरबाहिनी" और " ताँथियाँ" उनकी दूसरी शारिरिक बीमारी के बाद लिखी गई कविताओँ की पुस्तक हैँ ।

मैं कहती हूँ आखिन देखी : पद्मा सचदेव : प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ
सारांश:

( पदमा सचदेव जी ने देश-विदेश की बहुतेरी यात्राएं की, जिनमें से कुछ विशेष के वृत्तान्त उनकी इस पुस्तक में संगृहीत है।
कहना न होगा कि यहाँ उनकी सृजनात्मकता का एक अलग और अनोखा विस्तार है, जिसमें उत्कटता और उत्ताप की थरथराहट निरन्तर बरकरार रहती है।)


" जय माता दी .... जम्मू के करीब आते ही जब ट्रेन छोटी-छोटी नदियों के खड्डों से गुजर रही होती है, तभी दाहिनी ओर के पहाड़ों में तीन शिखर बड़े-बुजुर्गों की तरह सिर जोड़े बैठे दिखाई देते हैं। जैसे एक तन पर तीन सिर हों। पहाड़ी की इस चोटी को त्रिकुटा पर्वत कहते हैं और इसी के नीचे वह सुन्दर और रहस्यमय गुफा है,
जहाँ माता वैष्णों का निवास है।
‘पहाड़ें आली माता तेरी सदा ई जै’ पहाड़ों वाली माता तुम्हारी सदा ही जय हो और ‘जै माता दी’ के नारों से आकाश झूम उठता है। त्रिकुटा माता भी हम इसे कहते हैं। इसके चरणों में बसा डोगरा वीरों का सुन्दर और पहाड़ों के दामन से आने वाली नम हवाओं में धुला-धुलाया यह जम्मू शहर मन्दिर की घण्टियों से जगता है,
श्लोक और वेदमंत्र सुनकर आँखे खोलता है,
तवी में नहाने जाती बड़ी-बूढ़ियों की फुसफुसाहट से अँगड़ाई तोड़ता है।
इसके मन्दिरों के सोने के कलश सुबह के समय कच्चे वासन्ती रंग की किरणों की फुहार से गेंदे के फूलों की रंगत से होड़ करते हैं...दोपहर को मजदूर या किसान के तपे हुए मुँह से जैसे पसीना पोंछते दिखाई देते हैं और शाम को जाती किरणों के साये में हवनकुण्ड में बुझती-जलती आग की तरह चमक उठते हैं। मन्दिरों का यह शहर मानो कोई पुराना तपस्वी है।माँ का भवन जम्मू से 39 मील की दूरी पर है। पर पहाड़ की दूसरी जगहों की तरह खूब पास दिखाई देता है। किसी-किसी ऊँचे घर से पहाड़ पर खड़े बिजली के खम्भे रात को चमकती तारों की झिलमिल में उन सुन्दर स्त्रियों जैसे लगते हैं, जो किसी आहट को सुनकर अपने हाथ में उठायी दीये की थाली को थामे ठिठक गयी हों। पहाड़ों में आती पुजारियों से पुजी हुई हवा भी मानो यह दृश्य देखने के लिए रुक जाती है।
‘सन्तो जै माता दी.. कहते-कहते कोई बुढ़िया अपने घुटने थामे सीढ़ी-सीढ़ी चढ़ती है। ऊपर से आता कोई सन्त कह उठता है-
बस करीब ही है माता का भवन।

‘पैड़ी-पैड़ी चड़ दे जाओजै माता दी करदे जाओ’
(सीड़ियाँ चढ़ते चलो और माता की जय बोलते चलो)

इस भीड़ में बूढ़े, जवान, बच्चे, नये ब्याहे हुए, नये पैदा हुए और कन्याएँ सब शामिल रहते हैं। कोई पिट्ठू अपने पीछे किसी गदवदे बच्चे को बिठाए छड़ी के साथ ऊपर चढ़ता जाता है। कोई डोली में, कोई घोड़े पर। अधिकतर पैदल। माँ भी तभी प्रसन्न होती है। बादशाह अकबर भी नंगे पाँव पैदलचलकर आये थे और सोने का छत्र चढ़ाया था।माता वैष्णों के दर्शनों को जाना मानो प्रकृति के घर के आँगन के बीचो–बीच गुजर कर निकलना हो। यह प्रकृति कभी भरे हुए बादलों की सूरत में आकर आपको अपनी आगोश में ले लेती है, कभी जंगली फूलों की सुगन्ध का रूप धरकर आपके ऊपर चुल्लू भर सुगन्ध फेंक जाती है, कभी एक मालिन की तरह आँचल में फूल लिये खड़ी मिलती है और कभी एक कन्या की तरह, जो स्वयं देवी ही हो। कभी-कभी लोगों को लाल कपड़े पहने एक कन्या अपनी सहेलियों के संग दिखाई दी है जो कभी गिट्टे और कभी गेंद खेलती है।

इस कहानी पर माता के भजन भी बने।
‘पंज सत्त कंजका खेडदियांबिच्च खेड्डै आधकुआंरी’ (पाँच-सात कन्याएँ खेल रही हैं, उनमें अधकुँआरी भी है)माता की स्तुति में गाये जाने वाले भजनों को भेटाँ कहते हैं।छुटपुन में जब अपने गाँव पुरमण्डल में मैं बाकी लड़कियों के साथ नवरात्रि रखती थी, तब रोज शाम को उस घर में एकत्रित होते थे, जहाँ माता की ‘साख’ बोयी जाती थी। साख माने जौ के दाने एक मिट्टी के बर्तन में बोये जाते हैं और उस पर लाल कपड़े का पर्दा किया जाता है। जिसकी साख खूब बड़ी होती है वह भाग्यशालियों में गिना जाता। लाल किनारी जड़े कपड़े में वह पीली हरी साख खूब सुन्दर लगती। एक पुजारिन होती जिसे हम डोगरी में ‘पचैलन’ कहते हैं, वह पूजा करती। फिर बहुत बड़े आँगन में ढोलकी पर भेंटें गायी जातीं। जब भेंटें खत्म होतीं तब डोगरी के लोकगीत गाये जाते। नवरात्रों की समाप्ति के दिन गोपियाँ कान्ह बनते पुरमण्डल के छोटे से गाँव की हर दुकान पर जातीं, एक-एक ताँबे का पैसा मिलता, जो बाद में सबमें बँटता। यह भी होड़ रहती कि किसकी राधा अधिक सुंदर है। किसके कान्ह का श्रंगार अद्वितीय है। इसके अलावा सुबह जब हम देविका में नहाने जाते थे, तब पुजारिन कौन है, यह बात गुप्त रखी जाती थी। नहीं तो दूसरी टोली की लड़कियाँ उस पर अपना साया डाल देतीं तो उसे दोबारा नहाना पड़ता था। देविका को गुप्त गंगा भी कहते हैं। उसमे पतला-सा पानी का प्रवाह तो रहता है पर जगह-जगह रेत खोदकर छोटे ‘सूटे’ (छोटा जलाशय) बनाये जाते हैं।
वहीं हम नहाया करते थे।
फिर जब पहली बार मैं माता वैष्णों गयी, उसकी खूब याद है। खूब छोटी थी मैं। मेरे ताऊजी के बड़े बेटे और उनकी पत्नी के चेहरे तो दिखायी दे रहे हैं और न जाने कौन-कौन था। धुँधलायी-सी एकाध बुढ़िया भी दिखाई दे रही हैं। शायद मेरी ताई होंगी। मैं थी, हाथ में जल की लुटिया। बार-बार प्यास लगती। तारों की छाँह में चले थे हम। रात कटरा में कहीं धर्मशाला में रुके होंगे। उस वक्त उस कठिन चढ़ाई में जा रहे बहुत कम लोग थे। बात भी तो चालीसेक बरस पहले की है। ‘जै माता दी’ हर साँस में से निकलता रहा। मेरी धर्मपरायणा भाभी निर्जल थीं। माता को मत्था ‘सुच्चे मुँह’ ही टेकना था। मैं भी जिद में आ गयी। जल न पिया। शायद चार बज चले थे। सूनसान चढ़ाई पर लगता कहीं से भी माता रानी निकल आएँगी। फिर सुबह के उजास फूटते ही हम बाल गंगा में नहा लिये थे। फिर याद है कुछ छत्र। सँकरी गुफा में हाथों में दिये लेकर खड़े राह दिखाते पुजारी। सीली पहाड़ी की दीवारों पर आँखें झपकती दीपक की लौ। जब मन्दिर में सीढ़ी चढ़ कर पहुँची तो एक दो पुजारी धोती पहने बैठे थे। छत्र नजर आये और दर्शन हो गये।
फिर स्कूल के साथ भी जाना हुआ था। गर्भजून की गुफा में मेरा दम घुटने लगा था। तभी पीछे से एक मोटे सेठ की भयावह साँसे सुनाई दीं। वह भी रेंग रहा था। मैं किसी तरह बाहर निकल आयी। पहले भी इसमें से गुजरी थी तब भाभी शरारत से बोली थीं-‘‘बुआजी, अब आप दोबारा गर्भजून में न जाएँगी। हो गया मोक्ष।’’ मैं खूब प्रसन्न थी। पण्डितों की मूर्ख कन्या को मोक्ष से ज्यादा क्या अच्छा लगता पर आज ठीक से जानती हूँ, मुझे मोक्ष नहीं चाहिए।

मैं बार-बार इस दुनिया में आना चाहती हूँ। यह कम्बख्त बड़ी सुन्दर है।
हमउम्र लड़कियों के साथ जाने का और ही मजा होता है। रास्ते भर पुण्य काम और खाद्य-सामग्री का इस्तेमाल ज्यादा। पिकनिक और पूजा साथ-साथ होती है। तब ठहरने के उतने अच्छे इन्तजाम न थे। उसी गुफा में से वापस भी आना पड़ता था। पर हमारे महाराजा डॉक्टर कर्णसिंह ने माता को मत्था टेककर निकलने की राह दूसरी बनवा दी, जहाँ काफी लोग बैठ भी सकते है। अधकुआँरी में अपने दादा प्रताप सिंह जी के नाम से उन्होंने धर्मशाला भी बनवायी। हमारी महारानी और महाराजा साहब दोनों ही देवी के भक्त हैं। जब पाकिस्तान से हमारी जंग हुई थी तो गँवई लोगों ने यह कहानी बुनी कि माता रानी ने डॉ। कर्णसिंह को कहा,

‘‘अपनी तोपों के मुँह पाकिस्तान की तरफ मोड़ो।’’

और हाँ, कन्या-पूजन जानते हैं न आप। माता के रास्ते में जगह-जगह कन्याएँ रहतीं टोलियों में। उन्हें सन्त पैसे देते। गुड़ीमुड़ी बनी ये लड़कियाँ पतले कपड़ों में ठण्ड से सिर जोड़े बैठी रहतीं और माता की भेंटें गाती रहतीं। नवरात्रों में हमारे खूब पैसे बनते थे। तब एक पैसा मिलता था, अब रुपयों पर आ गये हैं लोग। और औरतों ने जबसे कंजूसी से बच्चे पैदा करना शुरू किये हैं, छोटी कन्याएँ पूजने के लिए भी कहाँ मिलती हैं। पर जितनी मिलती हैं वे एक घर की पूरियाँ छोले की रिकाबी रखकर दूसरे घर भाग जाती हैं।

अपने पैसे भींचकर रखती हैं जैसे कभी हम रखते थे।
और हाँ, जब से वैष्णों का इन्तजाम सरकार ने अपने हाथों में ले लिया है तब से सुनती हूँ और भी सुधार हुआ है। हालाँकि हजारों बारीदारों ने मुकदमें वगैरह भी ठोंके हैं। अगर इस चढ़तल को सरकार अच्छे कामों में लगाये तो श्रद्धालुओं का चढ़ावा बेकार न जाएगा। पर बारीदारों को भी कहीं-न-कहीं काम मिलना चाहिए। माता वैष्णों के दरबार के इन्तजाम में कई तरह के सुधार हुए हैं और होंगे। सन्तों की श्रद्धाभरी यात्राएँ अब पहले से भी सुगम हो गयी हैं।
मेरी माँ ने तब मन्नत माँगी थी कि मेरी टाँगें ठीक हो जाएँगी तो मैं चलकर माँ के दर्शन करूँगी। मैं गयी थी। पर इस बात को भी तीस बरस तो हो ही गये। पता नहीं अब कब बुलाएँगी माँ। कब फिर उनके दर्शन कर पाऊँगी। कब ताजा खिले फूलों जैसी कुमारी कन्याओं के मुँह देख पाऊँगी, कब बादलों से लिपटकर सीढ़ियाँ चढ़ते अपने आपको उड़ते हुए महसूस करूँगी। हर बार जम्मू जाने पर कहती हूँ ‘‘माँ, मुझे बुलाओ न।’’ उसकी मर्जी के बगैर उसके दर्शन भी कोई नहीं कर पाता। जब भी उस गुफा में गयी हूँ, तन फूलों की तरह हल्का हो गया है। एक अनिवर्चनीय सुख से भर उठी हूँ। रास्ते पर माता से माँगने के कई मंसूबे...और फिर जब माँ की ठण्डी चट्टान पर सिर रखा है तब कुछ भी माँगने को नहीं रहा। आँसुओं से भरी आँखों से माँ के दर्शन भी धुँधले-धुँधले हुए। वे तो बिना माँगे ही सब देती हैं। माता हैं न, सारे जगत् की माता !
ॐ Namestehttp://lavanyam-antarman.blogspot.com/