Wednesday, September 30, 2009

क्रिया योग : ओतोबायोग्रफ़ी ऑफ़ अ योगी

स्वामी जी श्री प्रज्ञानंद जी
`गुरु कृपा ईश कृपा सम '
कृपाकांक्षीनी
मम्मी जी और मैं : इनके दामाद हार्ट सर्जन हैं
गुरु ~ शिष्य परम्परा सचित्र
आंधियों में जलता दीप ,
एक , अकम्पित
लड़ता अंधियारे से ,
नन्हा सा जीव अकेला
बोलो जलता रहता ,
किसके सहारे ?

वही जीव ,
जीवित रहता
जिस बल से ,
आत्म - दीप , प्रकाशित ,
जिस का वरदान
वही महा तेज पुंज ,
जो सब का प्राण !
सत्संग का सुफल
अंतर्मन के पवित्र मोती
कौन यूं , लुटाता है ?
जो खोकर हर आराम
सत कर्म सुफल श्रम पाता है

क्रिया योग एक प्राचीन योग प्रणाली है
क्रिया योग प्रणाली
महावातर बाबाजी की कृपा से
उनके शिष्य
सन` १८६१ में प्राप्त हुई थी
बहुचर्चित पुस्तक ' Autobiography of a Yogi.[1]
से आप में से कई
अवश्य परिचित होंगें ,
के प्रकाशन तथा पठन ने
क्रिया योग को
पश्चिम में सुप्रसिध्ध कर दिया
प्राणायाम द्वारा त्वरित गति से अवरुध्ध तथा सुशुप्त आत्मिक अनुभूतियों का विकास होना
इस क्रिया योग पध्धति का
अवदान है
जिससे शांति का आभास होता है
तथा आत्मिक विकास के साथ
ईश्वर उन्मुख प्रतिक्रियां भी
उत्तरोत्तर बढ़तीं जातीं हैं [1]
सरलता से आत्मा विकास पथ पर आगे बढ़ पाती है .[2]
भगवद` गीता में श्री कृष्ण ने क्रिया योग का उल्लेख किया है
योगनान्दा जी ,
स्वामी श्री युक्तेस्वर गिरी जी के शिष्य थे
जो स्वयं श्री लाहिरी महासय के शिष्य थे
वही क्रिया योग प्रणाली को
अमरीका तक लाये थे और आगे
यूरोप में भी ये तेजी से प्रचलित हो गयी ,
आज २१ वीं सदी में कई केंद्र क्रिया योग संस्था के खुल गए हैं .[16]
अमरीकी , भारतीय तथा विश्व के कई तरह के लोग
श्रध्धा तथा भक्ति भाव सहित
स्वामी जी का आख्यान सुनते रहे
- पहले शायद मेडीटेशन का सत्र हो चुका था --
स्वामीजी की बातें सरल थीं -
मन पर संयम रखो
- अन्यथा मन, मनुष्य को कपि की तरह नचाता है -
स्वास्थ्य का ध्यान रखो
व्यायाम + प्राणायाम करो
मिताहार लो -
सात्विक भोजन खाया करो -
- वैर, ईर्ष्या का त्याग करो --
मन प्रफुल्लित रखो
- जीवन का नाम ही संघर्ष है -
नित नये संघर्ष के लिए ,
उससे लड़ने के लिए कटीबध्ध रहो -

- ऐसा लगा मानो वे माता हैं और शिशुओं के समुदाय को
माँ की ममता लिए
प्यार से, दुलार से, मधुर वाणी में
, समझा रहे हैं --
दसहरे के बीत जाने पर , ये मन को भला लगा --
आप सभी को विजया दशमी की शुभकामनाएं
तथा आगामी दीपावली के त्यौहार भरे दिनों के लिए भी
मेरी शुभेच्छा
-- लावण्या

Friday, September 18, 2009

ॐ नमो भगवते महादुर्गायेय नम:

ii ॐ नमो भगवते महादुर्गायेय नम: ii

दुर्गा - पूजा

---------------------------------------------------------------------------------------------------



सजा आरती सात सुहागिन ,
तेरे दर्शन को आतीं ,
माता , तेरी पूजा , अर्चना कर ,
भक्ति निर्मल पातीं !
दीपक , कुम कुम - अक्षत ले कर ,
तेरी महिमा गातीं ,
माँ दुर्गा तेरे दरसन कर के ,
वर , सुहाग का पातीं !
वह तेरी महिमा
शीश नवां कर गातीं !
हाथ जुडा कर , बाल नवातीं,
धीरे से हैं गातीं ,
" माँ ! मेरा बालक भी तेरा " ~~~
ऐसा तुझको हैं समझातीं :-)
फिर फिर तेरी महिमा गातीं ~~
तेरी रचना , भू -मंडल है !
ऐसे गीत , गरबे में गातीं
माता ! तुझसे कितनी सौगातें ,
भीख मांग , ले जातीं !!
माँ ! सजा आरती , सात सुहागिन ,
तेरे दर्शन को आतीं ,
मंदिर जा कर , शीश नवाकर ,
ये तेरी महिमा गातीं !
~~~लावण्या ~~~
क्लिक करें और माँ दुर्गा के दर्शन करें
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
श्रध्धा और भक्ति से भरा , माँ भवानी के प्रति सदीयों से
चला आ रहा अनुष्ठान , शक्ति उपासना का पर्व , नव रात्र
आपके जीवन में , हर्ष उल्लास व ऊर्जा लाये ...
इस शुभेच्छाओं के साथ ...

असमंजस :
~~~
किस से कहती ? कौन सुने ?
ऊमडती रहतीं जो मन् में ,
नीर भरी बदली सी ,
बिरहन की , वो अनकही यादें !
भोगी , जो हर उर्मिला ने
पाषण वत अहिल्या ने ~~
शकुंतला ने , जो वन में ,
हर माँ ने , प्रसव पीडा में !
वो , अनकही यादें !
कैसे आश्रू को , कोई समझाए ?
कैसे मन् के भावों को दिखलाये ?
ऐसा , वाणी में , सामर्थ्य कहाँ ?
जो रंगों को बोल कर दर्शाए ?
आह ! ये , अनकही यादें !
रह जातीं हैं अनकही ही
लाख समझाने पर भी ,
दुर्गम भीष्म प्रतिज्ञा सी ,
धरती के गर्भ में दबी दबी
भावी के अंकुर सी ,
"अनकही यादें "
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
[ मेरा प्रयास : -- लावण्या ]

Saturday, September 12, 2009

मेरे आदरणीय दादा _ श्री राज सिँह डुँगरपुर

मेरे आदरणीय दादा श्री राज सिँह डुँगरपुर [Rajsingh-aa+(5).jpg]दादा = श्री राज सिँह डुँगरपुर जी,

आज मैं बहुत उदास हूँ
:-((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((((9999
मेरे आदरणीय दादा _ ...
सोच रही हूँ, आज की सुबह मेरे जीवन में,
कितनी बुरी खबर लेकर आयी !!
क्यों ऐसा समय आया के , मुझ अनाथ के सर से, एक और पिता सम हाथ भी आज हट गया ?
वैसे , मेरा उन राज कुंवर से लहू का रिश्ता तो नहीं
पर वे मेरे बड़े भ्राता मेरे दादा ही हैं !
खार , हमारे छोटे से घर पर , दादा पहली बार आये थे तब, मानों घर की छत , झुक गयी थी
इतने ऊंचे , भरे पूरे ६ ' से भी ऊपर !
उनका मुस्कुराता चेहरा , मैं अपलक देखती रह गयी थी !
आँखों के सामने , घूम गयी हॉलीवुड की फिल्म " गोंन विथ द विंड " के नायक क्लार्क गेबल की छवि !
Respected DADA is handsomer then Clark Gable &
even Sean Connery who plays James Bond !!
( ये विचार मेरे युवा मानस में आये थे )
इतने हसीं किसी भद्र सज्जन पुरुष को , इससे पहले , मैंने नहीं देखा था !

हां, धर्मेन्द्र जी मुझे सभी नायकों से ज्यादा पसंद हैं पर दादा जैसा , आज तक जीवन में किसी को देखा ही नहीं !!
ये तो था आँखों से देखा व्यक्तित्त्व फिर जब् उन्हें शिष्टाचार सहित प्रणाम किये और उनकी आवाज़ सुनी
और उन्मुक्त और निश्छल बच्चों सी पवित्र हंसी का ठहाका भी सुना तो मैं भी खूब मुस्कुराई थी --
दिन बीतते गए...हम तीनों बहनें अविवाहीत थीं ...
पूज्य पापा जी की बगिया के ३ पुष्प थे हम !!
एक जूही, एक चमेली तो एक रजनी गंधा ही हों मानों ...फुलवारी को मह्कातीं हुईं , सहेलियों के संग ,
चिरैया सी चहकती हुई हमारी युवावस्था , पापा जी की छत्रछाया के सुरक्षित कवच के नीचे कितनी महफूज़ थी !
मेरी अम्मा के जतन से संवारी बगिया में और भी अनगिनत फूल थे ,
पर हम तीन बहने , लाड प्यार के संग कभी कभार डांट फटकार और एकाध चपत भी खा ही लेतीं थीं !
पर इतना प्यार मिलता था के हम फिर भी , खिलखिलाते ही रहते थे

अब , उन्हीं की तरह हमें लाड दुलार के साथ , दुनिया की नई चीजें सिखलाने वाले ,
दुनिया भर में भ्रमण करने वाले , दादा भी
हमारे छोटे से घर व परिवार का हिस्सा बन गए थे --
पहली बार चाइनीज फ़ूड , उन्हीं के संग खाया था -
कैसे , चाइनीज सूप के लिए टेढी, सुफेद चीनी मिट्टी की चम्मच को soup bowl से , पीया जाता है वो सीखा ,
पञ्च सितारा होटल में शानदार भोजन से पहले
सुफेद नैपकिन गर्म भाप से निकला आता है जिससे हाथ पोंछ कर,
दुसरे नैपकिन से कांटे , चम्मच और फोर्क निकालकर ,
नैपकिन , गोदी में कैसे बिछाते हैं और
फोर्क से पुलाव किस तरह खाया जाता है,
ये भी दादा ने , हमें माडर्न लाइफ की तहजीब का हिस्सा मानकर सिखलाया था !
हम तो थे एक आश्रम जैसे सीधे सादे घर में रहनेवाले शहरी गंवार !
हमने ये सब इससे पहले कभी देखा तक नहीं था !
खैर !! ये तो हुई , औपचारिक बातें ...
दादा अम्मा से कहते ,
" अम्मा बहनों की शादियाँ जल्दी न करवाना !
घर सूना हो जाएगा !! "

मेरे दादा के पास अनुभव और अलौकिक बातों के भरपूर खजाने थे ..
राज परिवार की अलौकिक बातें, देस परदेस की रंगबिरंगी जानकारियाँ हों
या वन्य प्राणी संबन्धी बातें हों
या विश्व राजनीति की बातें ..
पापा से उनकी बातचीत समय को पंख लगाकर गुजार देतीं थीं
जयपुर की महारानी साहिबा गायत्री देवी जी , उनकी आंटी आयेशा थीं !
वे तो नहीं आयीं परंतु,
महारानी बीकानेर उनकी बड़ी दीदी हैं वे तो किशनगढ़ की कुंवरी
स्वयं उनकी आदरणीय माँ साहिबा थीं ..वे ,
रीन्वां की महारानी साहिबा दादा की मासी माँ ,
कुंवर श्री हनुमंत सिंह जी ..दांता के ,
(क्रिकेट भी खेलते और दादा के चचेरे भाई हैं ) --वे ,
उदयपुर महाराणा साहब भी
ये सभी , कई बार ,
पापा जी के आवास पर पधारे ...
हम कभी इन राजसी महापुरुष व सन्नारियों के लिए
चाय बनाते तो , कभी शरबत
और दौड़ दौड़ कर
जलपान हमारे दीवानखाने तक
अम्मा के आदेशानुसार , पहुंचाते थे ...
कहाँ तो इन सभी के संगमरमर जटित ६०० कमरों के राज प्रसाद
और कहाँ हमारा कुल ३ कमरे और १ लम्बे रसोईघर वाला
कुटिया - सा छोटा सा , घर !!
पर माँ साहिबा किशनगढ़ भी बारामदे में आकर आस पास देखतीं हुई कहतीं ,
" पण्डित जी , म्हने आपनु घर बहु पसंद छे ! "
ये बड़प्पन था माँ साहिबा का !
जो ये ऐसा कहतीं थीं --
घेरदार नीले राजस्थानी घाघरे और सर पर ओढी केसरिया चुनरी में
तेज नैन नक्श्वालीन माँ साहिबा ,
मीरां जी की प्रतिकृति सी ही लगतीं मुझे !
उन्हीने दादा से कहा था,
" पण्डित जी के घर जब् भी जाओ , खाली हाथ न जाना "
और माँ जी के आदेश अनुसार हमारे दादा ,
हमेशा फल या ओरंज पीको चाय का पेकेट,
बॉम्बे जिम खाना से और कभी मिठाई या ऐसा ही कुछ लेकर ही आते ! --
कितनी सारी यादों ने आ घेरा है ...
मन इतना उदास है के दादा के जाने के समाचार , पढ़कर !
सजल नयन लिए बैठी हूँ जब्
ये लिख रही हूँ..........................
हमारे छोटे भाई परितोष का मेसेज था और अभी बात हुई
वह पूज्य दादा को अंतिम विदाई देकर , हताश और टूटे मन से , घर लौटा है ....
दादा, माँ साहिबा और महाराणा डूंगर पुर महा रावल राजा साहिब लक्षमण सिंह जी के पास जा चुके हैं ...
आत्मा अनंत पथ की और अग्रसर हो गयी ...
और रह गयीं यादें ..........
ईश्वर उन्हें अपने प्रकाश में , समा ले
और दादा की पवित्र आत्मा को वैकुण्ठ लोक मिलेगा ये मेरा विशवास है !
मेरे दादा जैसा सच्चा और वीर - धीर और सदाचारी महापुरुष , आज तक मैंने देखा नहीं --
दादा सर से पैर तक, एक सज्जन पुरुष थे और नस नस में राजसी शौर्य और उदारता उनमे भरी हुई थी -
- दादा मेरी स्मृतियों में ही नहीं
सदा अमर रहेंगें ..
कोइ उन्हें सचिन तेंदुलकर के दुनिया के समक्ष लानेवाले , क्रिकेट सेलेक्टर
C.C. I. - सी सी आई संस्था के प्रेजिडेंट के नाम से जानेगा और याद करेगा
तो कोइ उन्हें, भारत के एक जगमगाते राजसी परिवार के कुंवर की तरह याद करेगा ,
परंतु मेरे दादा , मेरे लिए, हमेशा मेरे परम आदरणीय बड़े भाई रहेंगें
जिनकी चौड़ी कलाई पर , मैंने , राखी बाँध कर , मन से नेह नाता बाँध लिया था
जो आज भी , वैसा ही अटूट है....
और मेरी अंतिम साँसों तक रहेगा ..............
मेरे दादा , आप क्यूं चले गए ?
अब इस दुखियारी बहन की कौन सुध लेगा ?
आप इतनी दूर आये थे , मुझ से मिलने
वह अब स्मृति - शेष रह जाएगा
.......... दा .. दा दा दा..
आप आज बहुत याद आ रहे हैं ....
- लावण्या .

ये बहुत पहले मेरे ब्लॉग पर लिखा था -
- आज पुन: प्रस्तुत कर रही हूँ --

Full Story of Indian CricketDungarpur's oral history of Indian Cricket As a young cricketer he played with legendary CK Naidu and watched him cracking sixes. He played with Vinoo Mankad and saw the great cricketer struggling in poverty. Himself a first class cricketer he later managed Indian sides and later as one of the country's most successful cricket administrators he was closely associated with the rise of Indian cricket. But one of his toughest assignments was to manage the rivalry between Kapil Dev and Gavaskar. Raj Singh Dundarpur tells the full story of Indian cricket.To listenClick here (English)
I came across this article...
Dungarpur remembers Lata of 1959In 1959, could be August, I came to Bombay to do law। I told Dilip Sardesai's first cousin, Sopan Sardesai, that I can't exist without playing cricket.He told me that the only place that you could get cricket was at a Walkeshwar house, where Lata Mangeshkar's brother and his friends played tennis ball cricket. I said, "I'm not bothered by who plays, but I have to be there." They used to stay in a two-bedroom flat in a building behind the Walkeshwar house. She was in those days, I suppose, recording all day; nor was I hung up on seeing her. I just played and went back to my sister's house in Nepean Sea Road. But her family must have discussed that I had come, so she said, "We must offer him a cup of tea." I was invited to come up — I can't remember if it was raining. She was utterly charming; she came to see me off and gave me her car. They were celebrating nariyal poornima shortly and she invited my brother and me for dinner. Everybody was quite crazy about cricket and I was just a Ranji Trophy player. Sopan Sardesai and the Mangeshkar family lived in Nana Chowk, in what would be perhaps little above a chawl. From there, she went to Walkeshwar and then to Peddar Road. That's how I started to know her. I went for a couple of her recordings, and so on.She was into cricket before me. She had watched the Australian services team in 1945 and remembers Keith Miller very distinctly — who is perhaps the handsomest cricketer the game has ever known. She also said that she saw Mushtaq Ali and Amarnath play. But she, of course, sat in the north stand. I think she couldn't afford any other ticket.What struck me was her utter simplicity. She was a legend in 1959 and when I went for her recording, I realised the ease with which she completed her recording assignment.I think the hallmark of any entertainer (is) he must be able to display his art as if it's very simple. When you see Sobers, Gavaskar, Tendulkar or Mankad, they made it look as if there's nothing to it. So did she. In few minutes, the recording was over. I remember that she gave a sovereign to Prem Dhawan who had composed the lyrics and it was at the Bombay Sound Recording studio in Dadar. I kept on regularly meeting her. She was very easily accessible, but at that time she was recording from 9 am-9 pm.I didn't listen to her music then a great deal. She may remember (those song recordings), but I don't. She has an elephantine memory — she can even tell you what dress she was wearing that day. I think she has a split personality. Rub her the wrong way and she just won't take it — she's like a tigress. Once, an Income Tax commissioner's daughter was getting married. He sent her an invitation and then took the audacity to call her up and tell her to sing a couple of songs at the reception.She said, "I will definitely sing, but before that I will have a word with Mrs Gandhi and tell her that this is how her officers are treating us. I must take her permission, she is the Prime Minister of India. I must say how well we are being treated." He came by the next flight and apologised to her. But she would have spoken to her — Mrs Gandhi knew her extremely well. On her 75th birthday, she told me that Vajpayeeji, Advaniji, Sharad Pawar spoke to her and so many other politicians. I think I've been out with her for about 15-20 concerts around the world. In the 1975 concert for the Nehru Memorial Centre in London, my brother-in-law Lalit Sen was the Parliamentary secretary to Pandit Nehru. He was very close to Krishna Menon and he said, "Lalit, you must get Lata Mangeshkar to sing so that we can get funds for the Centre." Lalit asked me to speak to her. She said, "For Pandit Jawaharlalji, I will give a concert and not charge one pound. But I will only sing at the Royal Albert Hall."I asked her why and she said, "I'm supposed to be a leading singer of India. It is a prestigious hall. I owe it to my people not to sing in a university hall." She was the singer who filled the Royal Albert Hall for three days. I remember that when I came along with Dilip Kumar, she asked us to check how the acoustics were. So Yusufbhai, as I call him, stood at one end and I stood in the other. I remember the recordist said, "How can this frail girl sing barefooted in March? She'll get pneumonia." She sings barefooted because I think it's sacred. She wears a navratan ring that belonged to the late K L Saigal whom she never met. But her brother was a jeweller and Saigal's family fell on hard days and she bought the ring. She still wears it at recordings and public performances. Lata Mangeshkar can be childlike. When she got the Bharat Ratna, we were in London. She opened the flat and it was 11:30 at night. The phone was ringing.She picked it up and said, "Wow!" I said, "Hell! What is wow left for Lata Mangeshkar?" She said, "Rachna (her favourite niece) is telling me that I've got the Bharat Ratna." The phones never stopped till late in the night. The next morning — in London, you have to make a cup of tea yourself — I made one for her.She had her two, three medicines and I asked her, "How does it feel to be a Bharat Ratna?" She said, "Now that you ask me…bahut achha lagta hai."After that great song Ae Mere Watan Ke Logon, Panditji invited her to have a cup of tea. Indira Gandhi, with her two young sons, was persuading her to sing.She said, "Dekhiye, main to kisi ghar mein gati nahin hoon (I don't sing in anybody's house)."Just then, Panditji arrived. He said, "Indu, tu yeh ladki ko kya pareshan kar rahi ho (Why are you troubling this girl?)" She said, "Pappu, bacche so gaye the kal raat ko; inko suna nahin (The children were sleeping last night; they didn't hear her sing)." "To jab record hogi, to pet bhar ke sun lena (They can listen when her records come out)." He took her hand and said, "Chalo, main chai pilata hoon (Come, I'll give you tea)." She refused to sing in Pandit Nehru's house. But when Mehboob Khan got ill, Yusufbhai asked her to call him. When she called him, he said, "Tum 'Dheere se aaja re' telephone mein suna do, aur mujhe accha lage ga (you sing 'Dheere se॥' on the telephone and I'll feel better)." She sang straightaway — from Peddar Road to California.Everybody knows that I was extremely close to her — I am still close to her. I just spoke to her 15 minutes ago. This is a very personal matter. But we came from different backgrounds — '60s was very different. Perhaps, both were very attached to their respective families. It was one of those things that just didn't happen. But that has neither enhanced the relationship, nor has it reduced. She is the treasure house of my admiration and affection and I continue to be in touch with her.Mukesh once told me when we were having dinner in New York, "Raj Singhji to Aurangazeb hai."That means he hated music and understood nothing. My relationship was not built on music. People think I'm a connoisseur, but I find even half-an-hour very difficult to pass at a concert. But she watched the World Cup. An Australian was once doing research on her. While he was leaving, he asked if there was anything he could do for her.She asked for a signed picture of Don Bradman and got it. In 1983, we won the World Cup and N K P Salve asked her to raise money through a concert for the cricketers. She said, "Salvesaab, apne to mera wicket le liya (you have taken my wicket)." The net profit of that Nehru Stadium concert was about 45 lakh and each player got a lakh rupees. She built this great hospital in Pune. She saw her father die when she 12-13 years old without any medical aid in Sasoon Hospital.She promised herself that if she ever became anything, she would build this hospital in memory of her father so that other children wouldn't see their parents die without medical aid. One gentleman Sayeed Bhawan, I think from Oman, gave her Rs 6 crore in donation. He listens to her music, day and night. In tuti-phuti Hindi, he said that it was the least he could do for his sister. Now he's giving Rs 8 crore for her cancer research centre. She said that Madan Mohan was the music director who never attempted to replace her — all others did and came back to her. And Yash Chopra never took anybody but her. So she recorded those songs of Madan Mohan's and I believe that in less than a week, 11 lakh cassettes have sold and Yash Chopra has given her a new Mercedes Benz. On her 75th birthday, she was in a suite at the Oberoi. Before I went to Calcutta — I had to be there on September 28 — I had gone to wish her and just her family was there. She has been doing this for the past 20-25 years, she used to go to the Taj before. She is an avid shopper. If she ever got into trouble, it would be for the maximum number of perfumes. There's one thing that very few people know. Nobody realises, including her family members, what she has done for her family. This is her one distinct and incomparable commitment in life. She's like a Christmas tree, you shake it and goodies fall. These children have been thoroughly spoiled by her. She once heard a child cry in London. She knocked on this Egyptian couple's house, took the child in her arms and didn't go to sleep for the next five-six hours. That is Lata Mangeshkar. She's unbelievably kind. What hasn't changed in 75 years is her thirst for excellence. That's why she says sometimes that she doesn't want to sing anymore because she says, "I can't hit the notes that are high". I think it's a very rude thing to say (that she should stop singing). Can you ask anyone to stop eating? Music is her sacred vocation. She still packs in houses and sings extremely well. She's singing because she enjoys it. The song that I can listen to again and again is that song from Mughal-e-Azam, Bekas pe karam keejeye. It is in chaste Urdu and it is a prayer to God, "I'm so helpless, why don't you bless me?" When she sang it in South Africa once, there were a lot of Muslims from Cape Town. They went berserk. At Royal Albert Hall, the Pakistan High Commission had bought 300 tickets. But as the relationship was so poor, they didn't want to publicise it. They were spellbound.

Tuesday, September 8, 2009

गतांक से आगे : श्री इन्द्रबहादुर सिंह जी का सम्पादकीय पुस्तक : " शेष - अशेष " से जारी ....

इस चित्र में,
दीपक, मैं, मेरी अम्मा स्व, सुशीला नरेंद्र शर्मा, जीजाजी बकुल भाई ,
स्व. वासवी ( मेरी बड़ी बहन ) ,
स्व. पं. नरेंद्र शर्मा ,
मुझसे छोटी सौ. बांधवी तथा सबसे छोटा भाई,
श्रीमान परितोष नरेंद्र शर्मा
मेरी अम्मा स्व. सुशीला नरेंद्र शर्मा
********************
पापा जी, दीदी
तथा ग़ज़लों के अमर संगीत निर्देशक
स्व. श्री मदन मोहन जी के सुपुत्र ,
श्री संजीव भाई ,
हमारे घर ,
फिल्म " सत्यम शिवम् सुंदरम " की रजत जयन्ती ट्राफी के साथ

" धरित्री पुत्री तुम्हारी , हे , अमित आलोक ,
जन्मदा मेरी वही है , स्वर्ण -गर्भा कोख ! "
स्व. पं. नरेंद्र शर्मा,

सुप्रसिद्ध संगीत मर्मग्य श्री हृदयनाथ मंगेशकर जी
तथा उनकी
और
हम सबकी बड़ी दीदी
स्वर साम्राग्न्यी सुश्री लता मंगेशकर जी के साथ


( गीत सुनने के लिए कृपया , क्लिक करें )

गायिका : आशा भोसले
संगीत निर्देशक : गोविन्द नरेश


( गीत सुनने के लिए कृपया , क्लिक करें )

गायक : पण्डित भीमसेन जोशी
संगीत निर्देशक : श्रीनिवास खले

( गीत सुनने के लिए कृपया , क्लिक करें )

गायक : पण्डित भीमसेन जोशी
संगीत निर्देशक : श्रीनिवास खले

गतांक से आगे :
श्री इन्द्रबहादुर सिंह जी का सम्पादकीय
[ शेष - अशेष " का प्र्रथम संस्करण , १९९५ में ,
बंबई की संस्था" मौलिक प्रकाशन " से छप चुका था --
पण्डित नरेंद्र शर्मा " सम्पूर्ण रचनावली "
शीघ्र प्रकाशित होगी ]


" पण्डित जी अजात शत्रु थे - क्रोध और बैर की मुद्रा में कभी भी नहीं देखे गए -

आजीवन होंठों पर स्मित, हास् , चहरे पर सहज स्नेह, करुना और मैत्री का भाव , बांहों में अपनत्व का आलिंगन, ह्रदय में साधू भाव का तारल्य बरबस अपनी और खींच लेने के चुम्बकीय आकर्षण के हेतु थे -

प्रीति के इस घर में, बैर का एक भी द्वार न था -

" सबके पण्डित नरेंद्र शर्मा " का निधन , सभी को अंतस तक रुला गया -
जो जहां जैसा था, निधन का समाचार पाकर, काठ हो गया !
एक साथ सभी की अश्रु धारा फ़ुट पडी ऐसा कोइ क्षेत्र नहीं, जहां से अपनी श्रध्धा अर्पित करने वालों का तांता न लगा हो !
निधन की इतनी गहन व्यथा को आंसुओं ने आकंठ सिंचित किया और जब् चेतना जागी,
तो इन अश्रु कानों को उस " ज्योति - कलश ' पर अर्पित कर दिया -
" शेष - अशेष " उसी का अवदान है -

घर - परिवार, मित्र परिजन, साहित्य , समाज, धर्म, अध्यात्म, - ज्योतोश , फिल्म, टी. वी . , रडियो , प्रेस, गीत - संगीत, देश - विदेश, आदि क्षेत्रों से हिन्दी, अंग्रेजी, में हमें इतने अधिक पत्र, लेख, संस्मरण, श्रध्धांजलि आदि प्राप्त हुईं कि उनमें से हम व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण सभी भावोद्गारों को इस पुस्तक में सम्मिलित नहीं कर पा रहे हैं -
जिन स्नेहियों के लेखादि इसमें संकलित नहीं किये जा सके हैं, उनके हम, क्षमाप्रार्थी हैं तथापि उनकी भावनाएं, इन स्मृतियों में समाहित एवं संचारित हैं

पुस्तक को खंडों में ( पुष्पों ) में विभाजित किया गया है --
प्रत्येक खंड में सामान प्रवृतिमूलक सामग्री को संयोजित करने का प्रयास किया गया है

यद्यपि यह पुस्तक, पं. नरेंद्र शर्मा के प्रति श्रध्धांजलि एवं स्मृति - ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित की जा रही है, तथापि, इन सभी उद`गारों में , पण्डित नरेंद्र शर्मा के जीवन , कार्य, उन पर पड़नेवाले प्रभाव ,
उनके चिंतन, दर्शन, काव्य, उनके बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व , गुण - दोष , उनके प्रदेय
आदि से समन्धित विषयों पर प्रचुर सामग्री भी सहज सुलभ है -
कई ऐसे विशिष्ट तथ्य हैं जो इससे पहले उजागर नहीं हुए थे -

नरेद्र को साहित्य समाज, राजनीति, धर्म, और संस्कृति , राष्ट्र और राष्ट्रीयता के परिप्रेक्षेप्य में जानने - समझाने कि द्रष्टि से भी इस पुस्तक की प्रासंगिकता एवं उपादेयता है --

यह् ग्रन्थ केवल अश्रु कोष लेकर नहीं उससे बहुत अधिक ज्ञान - कोष लेकर आपके समक्ष प्रस्तुत है -
- यह् एक तप: पुत, ऋषि - कल्प कविर्मनीषी के अभिषेक जल - बिन्दुओं का कोष है --

अत: इस पुस्तक का नरेंद्र - साहित्य के सन्दर्भ में एक अन्योन्याश्रित स्थायी महत्त्व है --

नरेंद्र से समन्धित विविध आयामों , प्रवृत्तियों , समय - समय पर घटित होनेवाले प्रभाव - परिवर्तनों और अथ से इति तक उनकी जीवन - यात्रा में आनेवाले मोडों - पडावों का पूरा कथा - विस्तार है -

- इसमें केवल " कद्र मर्दुम बाद मुर्दम " का पिष्ट - पेषण अथवा पितृ - तर्पण परंपरा निर्वाह नहीं है

पण्डित जी के निधन के पश्चात् उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला शर्मा शून्य हो चलीं थीं !

जिस सहचर को ,
" बाँध रेशमी डोरीयों में तुम्हें सब दिन
रखूँगी पास,
निशदिन पास, अपने पास "

का संकल्प किया था,
रेशमी डोरियों के बंधन चटकाकर वह,

" आज तक तुम फूल , तितली , गीति थी -
वह छोडता हूँ
प्रीती कविकृत प्रेयसी की प्रीती --
वह छोड़ता हूँ "

गाता हुआ, चलता बना और असहाय एकाकी बच गयी प्रेयसी के अधर मंद स्वरों में ,
फडफडाते रह गए --

" आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगें ......
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगें ..........

और अत: त: वह प्रेयसी १२ जून १९९१ को विछोह की सभी सीमाएं पार कर
स्वयं प्रिय के पास चली गयीं ,
जहाँ, वह फिर गा रही होगी,

" बाँध रेशमी डोरीयों में तुम्हें सब दिन
रखूँगी पास,
निशदिन पास, अपने पास "

प्रिय की स्मृति में में प्रकाशित यह " शेष - अशेष " उसी प्रेयसी सुशीला को समर्पित है --

उन सभी स्नेहियों के आभारी है --
आप सभी के भावों का आकार है यह स्मृति - ग्रन्थ !
आपकी श्रध्दा और प्रियता का स्मारक है यह स्मृति - ग्रन्थ !
आपके प्रत्येक उद`गार इस ग्रन्थ के सर्ग हैं जिस अपनेपन की तरलता में सिक्त - सिंचित करके आपने अपने शब्द लिखे हैं , उनके अक्षर - अक्षर मोती के सामान मूल्यवान एवं आभायुक्त हैं --

" शेष - अशेष " स्मृति - ग्रन्थ परिवार की एक अविछिन्न कड़ी हैं आप !
इस ग्रन्थ का पन्ना पन्ना आपका कृतज्ञ है --
अन्तराष्ट्रीय स्तर के चित्रकार श्री साबाजी पोलाजी ने
मुख - पृष्ठ पर , " शेष - अशेष " के प्रतीक - भाव को उकेरकर
हमारे संश्लिष्ट अव्यक्त को भाषा प्रदान की है --

उनके प्रति आभार व्यक्त करना स्वयं के प्रति आभारी हो जाना होगा, अस्तु --
" मौलिक प्रकाशन " के साथ ही हम मुद्रक प्रिन्तोग्रफी और विशेषरूप से ,
उसके मालिक गिरीश शाह के ह्रदय से आभारी हैं --

जिनके अप्रत्याशिश सहज सहयोग के फलस्वरूप ही यह ग्रन्थ और अधिक विलंब से प्रकाश में आने के कुयोग से बच सका
अंतत : " तेरा तुझको सौंपता , क्या लागे है मेरा "

-- इन्द्रबहादुर सिंह
प्राचार्य
बी. एल. रुइया ( बहु उद्देशीय ) हाई स्कूल
महंत रोड, विले पार्ले ( पूर्व )
बंबई - ४०००५७
गुरुवार , १३ अप्रेल , १९९५

संकलन व प्रस्तुति --
- लावण्या