Wednesday, January 27, 2016

२१ वीं सदी में महिला लेखन , चुनौती और संभावनाएं



' समय की धारा में बहते बहते
   हम आज यहां तक आये हैं 
   बीती सदियों के आँचल से 
   आशा के फूल,सजा लाये हैं
   हो मंगलमय प्रभात धरा पर
   मिटे कलह का कटु उन्माद ,
   वसुंधरा हो हरी - भरी, नित,
   चमके खुशहाली का प्रात ! '
मेरी कविता प्रत्येक मनुष्य के लिए शुभ कामना सन्देश स्वरूप है। स्वस्तिमय शब्द हों, उन्नत भविष्य हो, विश्व में शान्ति रहे इसी से समग्र मनुजता की विजय होगी। 

    स्त्री, समाज की आधी आबादी है। आधुनिक युग में स्त्री को एक ओर प्रगति के सोपान पर अग्रसर होने के सुअवसर मिले हैं तो साथ साथ अवरोधों के रोड़ों ने  स्त्रियों  के,  उठते कदम की कवायद को बार - बार स्तम्भित भी किया है। परन्तु स्त्री, युगों युगों से ऐसे प्रत्याघातों से लड़ती हुई, आज २१ वीं  सदी तक आ पहुँची  है। महिला लेखन भी स्त्री संघर्ष की लम्बी कहानी का एक हिस्सा है। महिला लेखन एकांतिक साधना है।  जिसकी  अटूट गाथा  इतिहास में दर्ज है। 

हम देखते हैं कि प्राचीन वेदों में प्रसिद्ध नारी पात्र , अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं। जिनमे अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी  रोमशा, इंद्राणी दि सुप्रसिद्ध हैं |

      गुप्त कालीन, मौर्य एवं बुद्ध के युग  से चलकर मध्य युगीन नारी के सामाजिक एवं व्यक्तिगत स्वातंत्र्य पर नियंत्रण बढ़ता गया। साहित्य सृजन इस के उपरान्त भी थमा नहीं। दक्षिण भारत की अंड़ाल ने कृष्ण प्रेम की प्रेम धारा बहायी।  आज भी दक्षिण भारत में श्रद्धा - भक्ति से अंडाल की पदावली गायी  जातीं हैं। 
कश्मीर में भक्ति रस से सभर स्त्री लिखित कविता लल्लेश्वरी योगिनी ने गायीं हैं  जो अमर हो गयीं  ! 
मीरां बाई के पद आज  न सिर्फ राजस्थान के रहे किंतु वे विश्व साहित्य की अनमोल  धरोहर हैं। कर्नाटक की अक्का महादेवी , महाराष्ट्र की संत मुक्ता बाई और जनाबाई और बंगाल की शारदा देवी माँ ने अपने अपने व्यक्तित्त्व से, वाणी की गंगा से जन मन की मलिनता को धोया है। 
अंग्रेज़ों के राज्य विस्तार ने भारत का  स्त्री - स्वातंत्र्य, घर की चारदीवारी के बीच, कैद कर दिया था। भीषण मानवीय हानि , उथल पुथल और विस्थापन के बाद, भारी क्षति से पीड़ित  सं १९४७ में भारत स्वतंत्र हुआ। श्री और संपदा का असहय ह्रास हुआ। अक्सर  युद्ध काल में स्त्री को ही अधिक भुगतना पड़ता है। 
अतः उस पाकिस्तान हिंदुस्तान विभाजन का दर्द , महिला लेखन में अमृता प्रीतम जैसी पंजाब की बेटी ने आंसू पिरोकर लिखी अपनी रचनाओं में पेश किया। ' अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ ' कवयित्री अमृता प्रीतम (१९१९-२००५) द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कविता है जिसमे १९४७ के भारत विभाजन के समय हुए पंजाब के भयंकर हत्याकांडों का अत्यंत दुखद वर्णन है।
स्वतंत्र भारत की महिलाएं न सिर्फ अपनी पारंपारिक भाषाओं में रचनाएँ कर रहीं  हैं किन्तु प्रवासी महिला अपने आवासीय प्रदेशों से और अन्य महिलाएं अपने प्रादेशिक भाषा के लेखन से अपनी पहचान बना रहीं हैं। 
आधुनिक समय में , कुछ भारतीय लेखिकाएं, अंतर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर रहीं हैं।  जैसे अमरीका में झुम्पा लाहिड़ी ! इन्होंने  बुकर पुरस्कार प्राप्त किया।  
 या अरूंधती राव की तरह वामपंथी और अपने खुले विचारों से लिखीं पुस्तकों से ये विश्व में कुतूहल का विषय बनी हुईं हैं। महिला लेखन प्रत्येक रूप में यथा संभव  जारी है। 
मेरे विचार : प्रत्येक महिला का ह्रदय वात्स्ल्य  भाव का अजस्र सिंधु सागर है। विश्व के प्रति , समाज के लिए और परिवार की ज़िम्मेदारियों के संग अपने व्यक्तित्व को विभिन्न खाकों में बांटते हुए २१ वीं सदी के आरम्भ में स्त्रियां,  बहु - आयामी जीवन जी रहीं हैं। 

आज का समय,  सेल फोन, फेसबुक, ब्लॉग , ट्वीटर जैसे अत्याधुनिक उपकरणों से सजे संचार माद्यमों से संचालित मशीनी युग का कालखण्ड है। बाज़ारवाद के फैलते, विश्व में मुनाफ़ाखोरी में बढ़त हुई है  और उद्योगों की बहुलता से सामाजिक परिवर्तन को द्रुत गति मिली है जिससे मानव जीवन में भारी बदलाव आया है।     स्त्री भी इस सत्य से प्रभावित हुई है और स्त्री लेखन में इन के प्रत्याघात अंकित हैं । 
      अक्सर स्त्री लेखन करतीं समस्त महिलाएं अपने व्यक्तिगत जीवन में से समय निकाल कर ही अपने लेखन को आकार - प्रकार  दे पातीं हैं। 


मैं इन महिलाओं से तादात्म्य स्थापित कर पाती हूँ चूंकि मैं भी अपनी पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवहारगत जिम्मेदारियां निभाते हुए लेखन कार्य से जुडी रही हूँ। 
सं. १९८९ से अमरीका में रहती हूँ और भारतीय समाज में हो रही तब्दीलियों  के साथ साथ, उत्तर अमरीका के समाज को नजदीक से देखा परखा है और उसी के बारे लिखा है।  
दोनों मुल्कों के नागरिकों के प्रति मेरे मन में  चिंता भी है और भविष्य के लिए फिर भी , शुभआशा  ही बलवती हुई है। 
विश्व में मनुष्य की प्रगति और उन्नति के प्रति मैं सदैव सजग रही हूँ। जो भी देखा है और अनुभवों के आधार पर  सीखा है उस से ही लेखन कार्य संपन्न किया है। 
हाँ यह  कह  सकती हूँ कि मेरा ब्लॉग लेखन मेरी साहित्य साधना का एक हिस्सा  रहा है। 
कविता संग्रह ' फिर गा  उठा प्रवासी ' , उपन्यास ' सपनों के साहिल ' देवदासी प्रथा पर आधारित, महिला उत्थान विषय पर  केन्द्रित हैं। 
अमरिकी  समाज में रहतीं महिलाओं के जीवन से जुडी कथाएँ और सर्वथा  भारतीय परिवेश में महिला की स्थिति दर्शाती कहानियाँ  मेरी तीसरी पुस्तक ' अधूरे अफ़साने ' कहानी संग्रह में समाहित हैं। साथ साथ विविध विषयों पे सामयिक आलेख, यात्रा विवरण , संस्मरण , शोध इत्यादी ब्लॉग लेखन में निरंतर उभरे हैं। 
जो महिलाऐं  साहित्य साधना से मुख नहीं मोड़ पातीं वे सतत सृजनशील रहतीं हैं। चाहे वे जिस किसी परिस्थिति में क्यों न रहें ! यह स्वभाव बन जाता है। 
मेरा ब्लॉग ' लावण्यम अंतर्मन ' विविध विषयों पर शोधपूर्ण आलेखों का संग्रह है। 
' लावण्यम अंतर्मन '  ब्लॉग पर कई अनोखे  विषयों की जानकारी लिए हुए आलेख पढ़ पायेंगें। 
कुछ महत्त्वपूर्ण विषय आपके साथ साझा कर रही हूँ।
१ ) यु. एन. ओ. UNO  में हिन्दी :   
http://www.lavanyashah.com/2011/09/blog-post.html 
२ ) प्रवासी भारतीय अमरीका में 
३ ) महिला दिवस 2013 : बलात्कार कैसे रोके जाएं? http://www.lavanyashah.com/2013/03/file-2013-2013.html
४ ) स्त्री सशक्तिकरण और द ग्लास सीलिंग’ = "शीशे की छत " कोर्पोरेट कल्चर पर आधारित आलेख 
http://www.lavanyashah.com/2010/09/blog-post.html
  कुछ अंश -    
 ग्लास सीलिंग मुहावरे के मशहूर हो जाने पर इस पर संशोधन भी हुए। संशोधनों के बाद यह भी पता चला है कि सन १९८४  में 'एड्वीक' पत्रिका के एक आलेख में, गे ब्र्यायनट ने सबसे प्रथम ग्लास सीलिंग मुहावरे का प्रयोग किया था । अब तो खोज विस्तृत होने लगी और पता चला कि, १९७९ में ह्यूलीट पेकार्ड कंपनी में कार्यरत केथरिन लाव्रेंस और मेरीएन श्र्च्रेइबेर नामक दो महिलाओं ने इसी मुहावरे को समझाते हुए कहा था कि, बाहरी तौर पर महिलाओं की प्रगति भले सुचारू रूप से चलती हुई दिखलाई दे परंतु इस प्रगति के अवरोध में अदृश्य, पारदर्शक अवरोध खड़े किये जाते हैं, जो महिला कर्मचारी के प्रगति, प्रमोशन और सर्वोच्च पद पर आसीन होने के मार्ग में बाधाएँ व रुकावट उत्पन्न करते हुए हर स्थान पर हर प्रगति के रास्तों पर अवरोध उत्पन्न करने के लिए रखे जाते हैं ।
अमरीका में ऐसे एकल परिवारों की संख्या में वृद्धि हो रही है जहाँ परिवार का ' मुखिया' = माने हेड ऑफ़ द फ़ेमेली ' एक स्त्री पात्र है सन १९७० से ऐसे परिवारों की संख्या में निरंतर बढ़ावा हो रहा है और ऐसे परिवार अमरीका में बड़ी तादाद में हैं परंतु वे अकसर ग़रीबी की रेखा के नीचे रहते हैं। 
ज़्य़ादादातर, ऐसे स्त्री मुखिया वाले एकल परिवार की महिलाएँ तलाकशुदा होतीं हैं या इनमें से कई बिन ब्याही माएँ हैं । सन` २०००  की जन गणना के आँकड़ों के अनुसार ११ % प्रतिशत परिवार अमरीका में ग़रीबी की हालत में जी रहे हैं जबकि २८  प्रतिशत एकल मुखिया स्त्री वाले परिवार ग़रीबी की हालत में जीने को बाध्य हैं। बिनब्याही माँ अकसर कच्ची या कम उम्र में माता बनी हैं। पढाई शिक्षा सिर्फ़ स्कूल तक सीमित होते ना उनके पास कोई डिग्री है ना कोइ ऐसा हुनर है जिस के तहत उन्हें अच्छा रोज़गार प्राप्त हो सके इस कारण ऐसी महिलाओं को नौकरी या पेशा भी ऐसा ही मिल पाता है जो उन्हें कम आय ही प्राप्त करवाता है। बच्चों की परवरिश के लिए भगौड़े पति या जिनके साथ उनका शारीरिक सम्बन्ध रहा वे व्यक्ति बच्चे की आवश्यकता पूर्ति के लिए पैसा नहीं देते या तो बहुत कम हिस्सा अपनी सीमित आय में से दे पाते हैं। बच्चे के लिए प्राप्य ऐसी धनराशि को चाईल्ड सपोर्ट कहते हैं। अमेरीका में ' तलाक' ही धन की समस्या या इकॉनोमिक दीवालियेपन का एक प्रमुख कारण है।
अंत में महिला लेखन की चुनौतियों को हम महिलाएं स्वीकार करते हुए संघर्षरत रहें और हमारे ईमानदारी से परखे प्रसंग, अनुभवों से आगामी पीढ़ी का मार्ग दर्शन करने में हम धैर्य एवं साहस के साथ निरंतर आगे बढ़ें यही कृत संकल्प करते हुए मानव कल्याण की भावना से पूरित सर्वोदय के लिए प्रयासरत रहें यह मंगल कामना करें। 
भारत की बेटी आगे बढ़े। अंतरिक्ष के द्वार कल्पना चावला ,  सुनीता विलियम्स जैसी भारत की बिटिया के लिए अब खुले हैं।   
उस तरह  प्रत्येक  महिला के लिए भी सीमाऐं  ना ही ब्रह्माण्ड के विस्तृत छोर  तक रहीं हैं ना ही स्त्री के कोमल ह्रदय की कंदराओं में वे कैद रहे पाएंगीं ।
नारी मन की भावनाओं को मुक्तांगण चाहिए ! उन्हें मुक्त धारा में बहने दें। पयस्विनी अमृत धारा ने ही मानव शिशु को अमृत पान करवाया है और विष - पान से बचाया  है। अत : महिला लेखन, स्त्री सृजन सृष्टि का नियामक अधिनियम एवं बल है और सदैव रहेगा।  इसे मुक्तगगन में विहरने दो ! 
कविता : कौन यह किशोरी ?
चुलबुली सी, लवँग लता सी,

कौन यह किशोरी ?

मुखड़े पे हास,रस की बरसात,

भाव भरी, माधुरी !

हास् परिहास, रँग और रास,

कचनार की कली सी,

कौन यह किशोरी?

अल्हडता,बिखराती आस पास,

कोहरे से ढँक गई रात,

सूर्य की किरण बन,

बिखराती मधुर हास!

कौन यह किशोरी?

भोली सी बाला है,

मानों उजाला है,

षोडशी है या रँभा है ?

कौन जाने ऐसी ये बात!

हो तेरा भावी उज्ज्वलतम,

न होँ कटँक कोई पग,

बाधा न रोके डग,

खुलेँ होँ अँतरिक्ष द्वार!

हे भारत की कन्या,

तुम,प्रगति के पथ बढो,

नित, उन्नति करो,

फैलाओ,अँतर की आस!

होँ स्वप्न साकार, मिलेँ,

दिव्य उपहार, बारँबार!

है, शुभकामना, अपार,

विस्तृत होँ सारे,अधिकार!

यही आशा का हो सँचार !

-श्रीमती  लावण्या दीपक शाह 

परिचय :   श्रीमती लावण्या दीपक  शाह

 सुप्रसिद्ध कवि स्व० श्री नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं और वर्तमान में  अमेरिका में रह कर अपने पिता से प्राप्त काव्य-

परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

समाजशास्त्र और मनोविज्ञान विषयों में बी.ए. (आनर्स) की उपाधि प्राप्त 

लावण्या , भारत के  सुप्रसिद्ध पौराणिक ' जयगाथा ' पर आधारित 

महाग्रंथ का दूरदर्शन पर  प्रसारित स्वरूप टीवी धारावाहिक "महाभारत" के 

लिये  कुछ दोहे लिख चुकी हैं। 

भारतीय दूतावास न्यू यॉर्क के निमंत्रण पर संस्था में  कविता - पाठ किया। 

उत्तर अमेरिका में इनकी लिखीं कविताएँ  और स्व० नरेन्द्र शर्मा और 

स्वर- साम्राज्ञी लता  मंगेशकरजी से  जुड़े संस्मरण,  अमरीका के 

' स्वरांजलि रेडियो कार्यक्रम '  लिंक : 
http://www.sopanshah.com/lavanya/Swranjali_LavanyaShah_1.mp3

 एवं ' सलाम नमस्ते ' रेडियो कार्यक्रम   डलास  शहर , टेक्सास प्रांत अमेरिका से  प्रसारित हुए हैं।

स्व. गायक मुकेशजी पर आधारित संमरणात्मक रेडियो वार्ता यूरोप के 

नैधरलैंड प्रांत से प्रसारित हुए ।  


वे , उत्तर अमरिका की '  अंतर राष्ट्र्रीय हिन्दी समिति ' द्वारा प्रकाशित मुख 

पत्रिका ' विश्वा ' में उप - सम्पादिका हैं। लिंक  :


कोलम्बस ओहायो शाखा में :


President — Smt. Lavanya Shah


कविता पुस्तक  " फिर गा उठा प्रवासी "  इन्होंने अपने पिता जी की 

प्रसिद्ध कृति " प्रवासी के गीत "  को समर्पित की हैं। 

उपन्यास ' सपनों के साहिल ' का प्रकाशन हो चुका है। उपन्यास का 

दीर्घकालीन फलक  सन १९२० के भारत से चलकर  स्वतन्त्र भारत की 

कहानी से जुड़ा २१ वीं सदी तक ४ पीढ़ियों की गाथा को  समेटे हुए है। 

लावण्या जी की प्रकाशनाधीन पुस्तकें : 

१) भारत के अमर युगल पात्र 

२ ) सुंदरकांड : भावानुवाद 

३ ) अधूरे अफ़साने - कथा संग्रह-  इत्यादी 


लावण्या दीपक शाह के ब्लॉग : 

१ ) अंतर्मन - अंतर्मन - लिंक : 


२ ) लावण्यम ~ अंतर्मन 


मेसन , ओहायो उत्तर अमरीका से