Thursday, August 9, 2007

कवि श्री इन्दीवर की यादें ~` उन्हीँ के शब्दोँ में ,( गीतकार शैलेन्द्रजी, साहिर लुधयानवी



बडे अरमानो से रखा है बलम तेरी कसम [#N8161]
चँदन सा बदन, चँचल चितवन [#271]
छोड दे सारी दुनिया किसी के लिये [#N8235]
दर्पन को देखा, तुने जब जब किया सिँगार [#541]
दिल ऐसा किसीने मेरा तोडा [#N8046]
दिल को देखो चहरा ना देखो [#716]
दुल्हन चली हो पहन चली तीन रँग की चोली [#740]
है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैँ गीत वहाँ के गाता हूँ [#862]
हम थे जिनके सहारे , वो हुए ना हमारे [#395]
हमने अपना सबकुछ खोया प्यार तेरा पाने को [#914]
हमने तुझको प्यार किया है जितना कौन करेगा उतना [#128]
हर कोई चाहता है एक मुठ्ठी आसमान [#715]
होँठोँ से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो [#94]
जाती हूँ मैँ, जल्दी है क्या [#N9126]
जब कोई बात बिगड जाये जब कोई मुश्किल पड जाये [#878]
मेरे देस की धरती सोना ओगले उगले हीरे मोती [#462]
मिले ना फूल तो, काँटोँ से दोस्ती कर ली [#155]
नफरत करनेवालोँ के सीने मेँ प्यार भर दूँ [#1003]
ओ नदिया चले चले रे धारा [#1142]
ओह रे ताल मिले नदी के जल मेँ [#104]
पल भर के लिये कोई हमेँ प्यार कर ले, झूठा ही सही [#353]
रुप तेरा ऐसा दर्पन मेँ ना समाये [#405]
सवेरे का सूरज तुम्हारे लिये है [#945]
ज़िँदगी का सफर है ये कैसा सफर [#488]
इन सारे गीतोँ की खूबी ये है कि उन्हेँ सुनते समय हमेँ भी साथ गुनगुनाने को मन करता है. शब्द सरल हैँ आम जीवन से जुडे से, रोज की बोल चाल की भाषा से लिये हुए तभी ऐसा महसूस होता है मानोँ कोई अपने मन की बात ही कह रहा है पर कवि एक कलाकार है.
खास तौर से फिल्मोँ के लिये लिखे गये गीत हमारे सुख दुख के साथी होते हैँ.
जब कभी दिल रोया तो कोई गीत याद आया. जब जब खुशी आयी तब भी फिल्म का गीत उसी के अनुरुप याद आया है ऐसा अक्सर हुआ है .
आइये, तो ऐसे एक से एक बेहतरीन और सुरीले गीतोँ के कवि श्री इन्दीवर जी को, उन्हीँ के शब्दोँ द्वारा याद कर लेँ .
साहित्य को लोकप्रिय बनाने मेँ हरीवँश राय बच्चन जितना ही नरेन्द्र जी का योगदानरहा है.जहाँ तक फिल्म क्षेत्र, आकाशवाणी और दूरदर्शन का सवाल है, नरेन्द्र जी ने हिन्दी साहित्य को लोकप्रिय बनाने मेँ अभूतपूर्व योगदान दिया है.साहित्य के सँबँध मेँ गीतकार शैलेन्द्रजी की एक बात अक्सर याद आती है. मैँ उन्हेँ उर्दू के महान शायरोँ के जब शेर सुनाया करता था , तो वे मुझे डा. हरिवँश राय बच्चन और पँडित नरेन्द्र शर्मा की किताबोँ से चुने हुए कुछ गीत, जो उन्हेँ जबानी याद थे, अक्सर सुनाया करते और कहते, " इन्दीवर, तुमने इनको नहीँ पढा !" मैँ कहता, " मैँने इन्हेँ पढा है और मुझे ये सब बहुत पसँद भी हैँ " जो कवितायेँ शैलेन्द्र जी ने पँडित नरेन्द्र शर्मा की सुनायी, वे मुझे पहले भी याद थीँ और आज तक याद हैँ .
नरेन्द्र जी के "प्रवासी के गीत " नामक गीत सँग्रह मेँ -
" आज के बिछुडे न जाने कब मिलेँगे आज से हमतुम गिनेँगे एक ही नभ के सितारे पर सदा को दूर होँगे ज्योँ नदी के दो किनारे सिन्धु तट पर भी न हो दो मिल सकेँगे.. आज के बिछुडे न जाने ...."
पँडित नरेन्द्र शर्मा जी के गीतोँ की जब ये पँक्तियाँ साहिर लुधयानवी ने सुनी तो वे बाजिद हो गये कि उन्हेँ उसी रोज नरेन्द्र जी के घर ले जाया जाये ! मैँ , नरेन्द्र जी से बिना समय लिये, साहिर लुधियानवी को अपने साथ, उन्हेँ मिलाने,अपने साथ, उनके घर ले गया ! मैँ तो उनके पाँव छूता ही था, और साहिर लुधियानवी ने भी उनके पाँव छूए ! बातचीत के दौरान, साहिर ने जो मुझे इकबाल का पर्शियन शेर सुनाया था, मैँने किसी बात पर, उदाहरण के तौर पर, उसे सुनाया. उसी दौरान, हिन्दी के महान साहित्यकार नरेन्द्र जी ने जैसे कि वे पर्शियन के महान साहित्यकार भी होँ, ये शेर, सुनाया --
कज अजा आई तये चीनी शिकस्त खूब शुद, असबाबे खुद बीनी शिकस्त
इससे जाहिर होता है कि उनको उर्दू के लिटेरेचर के साथ पर्शीयन लिटेरचर का भी ज्ञान था. सँस्कृति और साहित्य का तो उनके लिखे और देख रेख मेँ बने, "महाभारत " नामक धारावाहिक से पता चल ही जाता है.उनके ज्योतिष ज्ञान की लता जी भी कायल थीँ, यहाँ एक बात कहना जरुरी है. आधुनिक मार्क्सवादी साहित्य से प्रेरित नवयुवक साहित्यकारोँ के नरेन्द्र जी अपनी तरुण अवस्था से ही मार्गदर्शक रहे हैँ अगर मेरा कोई साहित्यिक रुप या स्थान है तो उसका श्रेय नरेन्द्र जी को ही जाता है. उन्होँने ही आकाशवाणी बँबई से अखिल भारतीय स्तर के कवि सम्म्मेलन मेँ , जिसमेँ महान साहित्यकार और कवि भाग लेते हैँ , नविदित साहित्यकारोँ को उत्साहित किया और उन्हेँ कविता पाठ के अवसर , साहित्यिक कवि सम्मेलनोँ मेँ दिलवाये.
नरेन्द्र जी ने आकाशवाणी द्वारा हिन्दी की अपार सेवा की - फिल्म क्षेत्र मेँ हिन्दी के प्रसिध्ध साहित्यकार श्री भगवती चरण वर्मा, जो उस समय बँबे टाकिज़ मेँ थे, उन्हेँ गीत लिखने के लिये बँबई ले आये. फिल्म "हमारी बात " के गीत आज तक लोकप्रिय हैँ --
१) मैँ उनकी बन जाऊँ रे,
आयेँ वो चँदा के रथ मेँ
मैँ मन ही मन अँग लगाऊँ
दूर खडी शरमाऊँ ..मैँ उनकी .
.आज सोलह सिँगार करूंगी,
ए री सखी मैँ पी को वरुंगी
,भोले मन के अरमानोँ की
जयमाला पहनाऊँ ..दूर खडी शरमाऊँ "
२) इन्सान क्या ? जो ठोकरेँ नसीब की न सह सके
वो कश्ती क्या जो साथ मेँ तूफान मेँ न रह सके ?
३ ) ऐ बादे सबा इठलाती न आ
मेरा गुँचाए दिल तो टूट गया
और अभी हाल ही मेँ रिलिज़ हुई राजकपूर की फिल्म ," सत्यम शिवम सुँदरम" के ये दो गीत साहित्य की अमूल्य निधि हैँ
" यशोमती मैया से बोले नँदलाला, राधा क्यूँ गोरी, मैँ क्योँ काला ?"
और,
" ईश्वर सत्य है सत्य ही शिव है,शिव ही सँदर है जागो, उठ कर देखो,जीवन ज्योत उजागर ...है ..सत्यम शिवम सुँदरम "
भारतीय दर्शन मेँ जो स्थान बडे बडे त्यागी, तपस्वी और ऋषियोँ का है, वही स्थान नरेन्द्र शर्मा जी का हिन्दी और हिन्दुस्तान के साहित्य और अदबपसँद लोगोँ के दिलोँ मेँ हैो कोई भी उनसे मिला,
उनकी छाप, ह्रदय मेँ लिये रहा.
पँडित नरेन्द्र शर्मा ,
साहित्यकारोँ के ह्रदय मेँ हमेशा ध्रुव तारे की तरह अटल रहेँगे.
-- लेखक : स्व. इन्दीवर जी

7 comments:

Udan Tashtari said...

वाह, इन्दीवर जी को बहुत बेहतरीन तरीके से याद किया गया है. अच्छा लगा पढ़कर.

Sanjeeva Tiwari said...

सदा की तरह बहुत अच्‍छी जानकारी ।

धन्‍यवाद

“आरंभ” संजीव का हिन्‍दी चिट्ठा

Lavanyam -Antarman said...

समीर भाई,सँजीव भाई,
आपको आलेख पसँद आया उसके लिये धन्यवाद
स -स्नेह, -लावण्या

जोगलिखी संजय पटेल की said...

लावण्याबेन...प्रणाम...जै श्रीकृष्ण.
पहले पूरे परिवार का सुंदरतम चित्र दिखाने के लिये मन से साधुवाद...ऐसा लगा शाह परिवार हमारे मन-आँगन का मेहमान बन आया.

दूसरी बात इंदीवरजी के बारे में..
इंदीवरजी कल्याणजी-आनंदजी को जब लता अलंकरण मिला तब इन्दौर पधारे थे...नाटे क़द के बड़े इंसान.क़लम के वैसे ही तपस्वी जैसे पापाजी (पं.नरेन्द्र शर्मा) थे.

हिन्दी काव्य रचना को जब चित्रपट संगीत के हवाले से देखता हूँ तो शुरू करूँ पं.प्रदीप,पँ.भरत व्यास,प.नरेन्द्र शर्मा,शैलेन्द्रजी,साहिर लुधियानवी (नीले गगन के तले...मन रे तू काहे न धीर धरे और छा गए बादल जैसे गीतों के कारण मै साहिर साहब को हिन्दी कवि ही मानता हूँ;उर्दू वालों का हक़ तो हमेशा पहला ही रहेगा इस गीत जादूगर पर)गोपालसिंह नेपाली,नीरज,इन्दीवर और रवीन्द्र जैन(अभी विवाह में क्या कमाल कर गये हैं हमारे दादू) हमारे हिन्दी चित्रपट गीत परम्परा के नवरत्न हैं (संयोग देखिये गिनती में भी पूरे नौ हो गए)दु:ख सिर्फ़ इतना ही होता है कि संगीतकार और गीतकार को हमारा भारत वह इज़्ज़त नहीं देता जिसके हक़दार वे होते हैं...मेरी इस टिप्पणी को हिन्दी - उर्दू को बाँटने वाले कहीं भुना न लें इसलिये साफ़ कर देना चाहता हूँ कि शायरी के लिहाज़ से जो भी काम हिन्दी फ़िल्मों में हुआ है वह हिन्दी के पाये का ही है और उसके नुमाइंदे भी क़लम के ईमानदार हस्ताक्षर रहे हैं.

आपके क़लम ने इंदीवरजी का स्मरण कर पुण्य बटोर लिया लावण्या बेन.

Lavanyam -Antarman said...

सँजय भाई, जै श्री कृष्ण तमने पण --
आपने "नौ रत्न " हिन्दी फिल्म सँगीत के चुने हैँ उन्हेँ मेरे भी प्रणाम.
जो कोई भी इतने मधुर गीत हमेँ दे गये कि जिन्हेँ इतने बरस बाद भी
हम गुनगुनाते हैँ , अपना समझते हैँ उनकी कलम को लाखोँ सलाम !
श्री रवीँग्र जैन जी भी उत्कृष्ट सँगीतकार, गीतकार हैँ -
- शादी की शोभा बढ गई होगी उनकी उपस्थिति से --
मेरे परिवार के प्रति आपके सद्` भाव के लिये कृतार्थ हूँ !
ऐसे ही स्नेह बनाये रखेँ
स्नेह के साथ, आवजो

-- लावण्या

जोगलिखी संजय पटेल की said...

कुटुम्ब की दूसरी और तीसरी पीढी़ के नाम भी जारी करे दीजिये तो उनके नाम से शुभ-भाव जारी करना चाहूँगा.शायद अमेरिकी जँवाईराज खड़े हैं अपने भारतीय परिधान में ...आँखों को सुकून मिया.यही तो है सत्यं...शिवं...सुदरम की क्ल्पना.

Lavanyam -Antarman said...

संजय भाई ,
मेरे परिवार में बिटिया है,सौ. सिंदुर, जंवाई ब्रायन , उनका पुत्र नोआ .
[ नोआज़ आर्क की कथा याद होगी ]
पुत्र सोपान व पुत्रवधू सौ. मोनिका भी चित्र में खड़े हैं --

स्वतंत्र भारत की ६० वी साला गिरह आप को भी खुशी दे
इस शुभ कामना के साथ...
सा स्नेह -- लावान्या