Saturday, August 13, 2016

श्री मैथिली शरण गुप्त - अतित के चल चित्र "दद्दा का घर -- देल्ही १९६२ "

 दद्दा का घर -- देल्ही १९६२ " 

``सखि वे मुझसे कह कर जाते,
तो क्या वे मुझको अपनी पथ बाधा ही पाते।
नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते
पर इनसे जो आँसू बहते
सदय हृदय वे कैसे सहते?
जायँ सिद्धि पावें वे सुख से
दुखी न हों इस जन के दु:ख से
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
आज अधिक वे भाते।''
 --श्री मैथिली शरण गुप्त
अतित  के  चल  चित्र  : दद्दा  का  घर  -- देल्ही  १९६२ 
देल्ही  की  लू  भरी   गर्मियों  का   मौसम  था।  हम  लोग  बम्बई  से  २  महीनो  की  स्कूल  की  छुट्टियों  के  दौरान , पापाजी  के  पास  देहली  आये  हुए  थे  [ पापाजी से मेरा आशय है  मेरे  पिता  / स्वर्गीय  पं. नरेन्द्र  शर्मा  ]
 पापाजी  उस  समय  AIR के  चीफ़  प्रोडूसर  / डिरेक्टर  के  पद  पर  थे  और  उनका  देल्ही  रहना  आवश्यक  था।  भारत  सरकार  ने  उन्हें  बम्बई  से  देल्ही  बुलवा  लिया  था।  हम  लोग  बम्बई  में  जन्मे,  पले , बड़े  हुए  थे  और  नयी  दिल्ली  हमे सदा " परायी  नगरी  " ही  लगती  थी। हमारे मन में पापाजी  से  मिलने  का  उत्साह  तो  था  पर  दिल्ली   की  गर्मियों  के बारे में जितना सुन रखा था उसे अनुभव करने का समय सामने आ पहुंचा था और इस भयानक गर्मियों के मौसम ने हमें  मन ही मन परेशान  कर  रखा  था। इसी उहापोह को  मन में समाए,  हम  सब  आ  ही  पहुंचे  थे देल्ही !
दद्दा, श्री  मैथिलि शरण  गुप्त , उस समय राज्य  सभा  के  M.P. थे।  ठीक  राष्ट्र पति  भवन  के  चौराहे  को  पार  कर,  जो  पहला  मकान  पड़ता  था,  उसकी  पहली  मंजिल  पर, पूज्य दद्दा  को  एक  फ्लैट , भारत  सरकार  द्वारा, रहने  के  लिए  दिया  गया  था। दद्दा ,  गर्मी  की  छुट्टियों  के  संसदीय  सत्र  में, कुछ माठ के लिए , अपने  मूल  वतन , झांसी  जा  रहे  थे।  पर  जब  हम  [ मेरी  अम्मा , श्रीमती  सुशीला  नरेन शर्मा  और  हम  ४  भाई  , बहेन  ] ३  दिनों  के  लम्बे  प्रवास  के  बाद , देहरादून  एक्सप्रेस  [ जो  हर  स्टेशन  पर  रूक  रूक  कर , ३  दिनों  के  बाद  बम्बई  से  देल्ही  पहूँचती  थी  और  ' एक्सप्रेस '  कहलाने  के बिलकुल  लायक  नहीं  थी  ;-)) ] उस  से  यात्रा  पूरी  कर  के,  हम  लोग, मतलब, मैं , लावण्या, मुझसे  बड़ी  बहन  वासवी, छोटी  बांधवी  और  भाई  - परितोष  और  हमारी  अम्मा, श्रीमती  सुशीला  नरेन्द्र  शर्मा, ये  हम  सब , दद्दा  के  घर  पहुंचे। वहां  दद्दा  से  मिलते  ही, हम  सब  बच्चों  ने, उन्हें  पैर  छू  कर, विधिवत  प्रणाम  किया।  दद्दा  ने  हमारे झुके हुए सरों  पर अपने कांपते हुए  हाथ  रख  कर  आशीर्वाद  दिए। अम्मा  को  देख  प्रस्सन्न  हुए  और  कहा ,
" अच्छा  हुआ  बहु  तुम  आ  गयीं !  चौका  सम्हालो  और  देख  लो , मैंने  अनाज , आटा , दाल,  चावल  सभी  रखवा  दिया  है।  तुम  इसे  अपना  ही  घर  समझना  और  आनंद  पूर्वक  रहना।  मैं  लौट  आऊँगा  और  तुम  लोगों  से  मिलूंगा।  "
 
उस प्रथम साक्षात्कार के वक्त परम पूज्य दद्दा की  निश्छल  हंसी  आज  भी  मुझे  याद  है। मेरी  उमर , उस  वक़्त, करीब  ११  या  १२  वर्ष  की  होगी। 

दद्दा , खूब  लम्बे  थे। दुबले  पतले  भी  थे  और  गर्मियों  में  महीन  सूती  धोती  और  एक  सूती  " अंग -  वस्त्रम  " बिलकुल  गांधीजी  की  तरह  लपेटे  रहते  थे।  उनका  एक  सेवक  भी  था। नाम  अभी  याद  नहीं  आ  रहा। वही  उनकी  देख  भाल किया करता  था। बड़े  से  बड़ी  हस्ती  आ  जाये  या  कोई  सर्वथा  अपरिचित  या  कोई  नवागंतुक हो, सब को  एक सरीखा  नाश्ता  वह  एक  बड़ी  सी  थाली  पर  सजा  कर  दे  जाता  था। नाश्ते  में  हमेशा  यही  परोसा  जाता  था  ...१  छोटा  सा  लड्डू   , पुदीने   की  एकदम  हरी  चटनी  का  छोटा  सा  एक  बिंदु  और  पाव  टुकड़ा  [ १ / ४  ] ....मठडी  !! :-))
  
हमें देहली की गर्मी को दूर भगाने के लिए सीलींग पर लटका पंखा दिखा और हम बच्चों ने जैसे ही पंखे के स्वीच को ओन  किया तो पूजनीय दद्दा , कहने लगे  कि ' हमारी भारत  सरकार  बिजली  का  बिल  चुकाती  है  और  हमे बिजली का  सही  इस्तेमाल  करना  चाहिए  !  दुरूपयोग  नहीं  करना  चाहिए  ...और  वे , १  नंबर  पर  ही  पंखा  / फेन .... चलते  थे  और  पूरे  पसीने  से  भीग  जाते  थे  !! :-))
यह  उनका  बड़प्पन   भी  था  और  बच्चों  सी  निश्छल  मासूमियत  भी  थी शायद जो उन्हें ऐसे नियम और सिद्धांत पर अटल रखे हुए थी।  उनके  व्यक्त्तित्व  में  और  उनकी  सादगी में जो  भोलापन  था उसके आगे   हम  में  से  कोई  उनकी  कही  बात  का  प्रतिकार  नहीं  कर  पाया ! 
 हाँ  उनके  झाँसी  के  लिए  प्रस्थान  होने  के  बाद , फेन  / पंखा   खूब  तेजी  से  चलता  रहा  पर  हम लोग समझ गए कि देल्ही  की  गर्मी  के  सामने  वो  बेचारे  की  भी कोइ बिसात  न थी !! 
दद्दा  ने  वासवी  की  हस्ताक्षर  इकट्ठा  करनेवाली  एक  कॉपी  में  यह  पंक्तियाँ लिख  कर  वासवी को दीं थीं - यह पंक्तियाँ उसी समय दद्दा ने हस्ताक्षर करते हुए हमारे समक्ष रचीं थीं और यह पंक्तियाँ उनकी किसी अन्य रचना में नहीं हैं और  अप्रकशित  हैं ।  वासवी  जितने भी रचनाकारों से, कवियों से मिलती तब हर  कवि  से आग्रह किया करती थी की ' कृपया ,बिलकुल  नयी  रचना  को ही आप  मेरी  इस  हस्ताक्षर एकत्रित करनेवाली पुस्तक  में  लिख  दीजिए !
 जो पंक्तियाँ परम् पूज्य ददद्दा ने लिखीं वे भी  सुन लीजिए  ,
" अपना  जितना  काम आप  ही  जो  कोई  कर  लेगा  ,
पा  कर  उतनी  मुक्ति  आप  वह  औरों  को  भी  देगा  ! "
[ और  नीचे  हस्ताक्षर  किये , " -- मैथिलिशरण  गुप्त  " ]
          दद्दा  के  फ्लैट  के  पडौस  में  एक  अशोक  भाई  रहते  थे। वे  राष्ट्र पति  भवन  के   चीफ़  पेस्ट्री  ' शेफ  (' पाक शास्त्री ' ) थे  !! उनके  हाथों  से  तैयार  किये  गये , बहुत  बढ़िया  पुद्दिंग्स , कस्टर्ड , जेल्लो  , आईस क्रीम और केक  खाने का अवसर  भी  उसी  दौरान  हमे  मिला  था। आज वे, स्मृतियाँ मधुर  याद  बन कर मन में  रस  घोल रहीं हैं  !
 - लावण्या 
 
  

Wednesday, January 27, 2016

२१ वीं सदी में महिला लेखन , चुनौती और संभावनाएं



' समय की धारा में बहते बहते
   हम आज यहां तक आये हैं 
   बीती सदियों के आँचल से 
   आशा के फूल,सजा लाये हैं
   हो मंगलमय प्रभात धरा पर
   मिटे कलह का कटु उन्माद ,
   वसुंधरा हो हरी - भरी, नित,
   चमके खुशहाली का प्रात ! '
मेरी कविता प्रत्येक मनुष्य के लिए शुभ कामना सन्देश स्वरूप है। स्वस्तिमय शब्द हों, उन्नत भविष्य हो, विश्व में शान्ति रहे इसी से समग्र मनुजता की विजय होगी। 

    स्त्री, समाज की आधी आबादी है। आधुनिक युग में स्त्री को एक ओर प्रगति के सोपान पर अग्रसर होने के सुअवसर मिले हैं तो साथ साथ अवरोधों के रोड़ों ने  स्त्रियों  के,  उठते कदम की कवायद को बार - बार स्तम्भित भी किया है। परन्तु स्त्री, युगों युगों से ऐसे प्रत्याघातों से लड़ती हुई, आज २१ वीं  सदी तक आ पहुँची  है। महिला लेखन भी स्त्री संघर्ष की लम्बी कहानी का एक हिस्सा है। महिला लेखन एकांतिक साधना है।  जिसकी  अटूट गाथा  इतिहास में दर्ज है। 

हम देखते हैं कि प्राचीन वेदों में प्रसिद्ध नारी पात्र , अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं। जिनमे अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी  रोमशा, इंद्राणी दि सुप्रसिद्ध हैं |

      गुप्त कालीन, मौर्य एवं बुद्ध के युग  से चलकर मध्य युगीन नारी के सामाजिक एवं व्यक्तिगत स्वातंत्र्य पर नियंत्रण बढ़ता गया। साहित्य सृजन इस के उपरान्त भी थमा नहीं। दक्षिण भारत की अंड़ाल ने कृष्ण प्रेम की प्रेम धारा बहायी।  आज भी दक्षिण भारत में श्रद्धा - भक्ति से अंडाल की पदावली गायी  जातीं हैं। 
कश्मीर में भक्ति रस से सभर स्त्री लिखित कविता लल्लेश्वरी योगिनी ने गायीं हैं  जो अमर हो गयीं  ! 
मीरां बाई के पद आज  न सिर्फ राजस्थान के रहे किंतु वे विश्व साहित्य की अनमोल  धरोहर हैं। कर्नाटक की अक्का महादेवी , महाराष्ट्र की संत मुक्ता बाई और जनाबाई और बंगाल की शारदा देवी माँ ने अपने अपने व्यक्तित्त्व से, वाणी की गंगा से जन मन की मलिनता को धोया है। 
अंग्रेज़ों के राज्य विस्तार ने भारत का  स्त्री - स्वातंत्र्य, घर की चारदीवारी के बीच, कैद कर दिया था। भीषण मानवीय हानि , उथल पुथल और विस्थापन के बाद, भारी क्षति से पीड़ित  सं १९४७ में भारत स्वतंत्र हुआ। श्री और संपदा का असहय ह्रास हुआ। अक्सर  युद्ध काल में स्त्री को ही अधिक भुगतना पड़ता है। 
अतः उस पाकिस्तान हिंदुस्तान विभाजन का दर्द , महिला लेखन में अमृता प्रीतम जैसी पंजाब की बेटी ने आंसू पिरोकर लिखी अपनी रचनाओं में पेश किया। ' अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ ' कवयित्री अमृता प्रीतम (१९१९-२००५) द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कविता है जिसमे १९४७ के भारत विभाजन के समय हुए पंजाब के भयंकर हत्याकांडों का अत्यंत दुखद वर्णन है।
स्वतंत्र भारत की महिलाएं न सिर्फ अपनी पारंपारिक भाषाओं में रचनाएँ कर रहीं  हैं किन्तु प्रवासी महिला अपने आवासीय प्रदेशों से और अन्य महिलाएं अपने प्रादेशिक भाषा के लेखन से अपनी पहचान बना रहीं हैं। 
आधुनिक समय में , कुछ भारतीय लेखिकाएं, अंतर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर रहीं हैं।  जैसे अमरीका में झुम्पा लाहिड़ी ! इन्होंने  बुकर पुरस्कार प्राप्त किया।  
 या अरूंधती राव की तरह वामपंथी और अपने खुले विचारों से लिखीं पुस्तकों से ये विश्व में कुतूहल का विषय बनी हुईं हैं। महिला लेखन प्रत्येक रूप में यथा संभव  जारी है। 
मेरे विचार : प्रत्येक महिला का ह्रदय वात्स्ल्य  भाव का अजस्र सिंधु सागर है। विश्व के प्रति , समाज के लिए और परिवार की ज़िम्मेदारियों के संग अपने व्यक्तित्व को विभिन्न खाकों में बांटते हुए २१ वीं सदी के आरम्भ में स्त्रियां,  बहु - आयामी जीवन जी रहीं हैं। 

आज का समय,  सेल फोन, फेसबुक, ब्लॉग , ट्वीटर जैसे अत्याधुनिक उपकरणों से सजे संचार माद्यमों से संचालित मशीनी युग का कालखण्ड है। बाज़ारवाद के फैलते, विश्व में मुनाफ़ाखोरी में बढ़त हुई है  और उद्योगों की बहुलता से सामाजिक परिवर्तन को द्रुत गति मिली है जिससे मानव जीवन में भारी बदलाव आया है।     स्त्री भी इस सत्य से प्रभावित हुई है और स्त्री लेखन में इन के प्रत्याघात अंकित हैं । 
      अक्सर स्त्री लेखन करतीं समस्त महिलाएं अपने व्यक्तिगत जीवन में से समय निकाल कर ही अपने लेखन को आकार - प्रकार  दे पातीं हैं। 


मैं इन महिलाओं से तादात्म्य स्थापित कर पाती हूँ चूंकि मैं भी अपनी पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवहारगत जिम्मेदारियां निभाते हुए लेखन कार्य से जुडी रही हूँ। 
सं. १९८९ से अमरीका में रहती हूँ और भारतीय समाज में हो रही तब्दीलियों  के साथ साथ, उत्तर अमरीका के समाज को नजदीक से देखा परखा है और उसी के बारे लिखा है।  
दोनों मुल्कों के नागरिकों के प्रति मेरे मन में  चिंता भी है और भविष्य के लिए फिर भी , शुभआशा  ही बलवती हुई है। 
विश्व में मनुष्य की प्रगति और उन्नति के प्रति मैं सदैव सजग रही हूँ। जो भी देखा है और अनुभवों के आधार पर  सीखा है उस से ही लेखन कार्य संपन्न किया है। 
हाँ यह  कह  सकती हूँ कि मेरा ब्लॉग लेखन मेरी साहित्य साधना का एक हिस्सा  रहा है। 
कविता संग्रह ' फिर गा  उठा प्रवासी ' , उपन्यास ' सपनों के साहिल ' देवदासी प्रथा पर आधारित, महिला उत्थान विषय पर  केन्द्रित हैं। 
अमरिकी  समाज में रहतीं महिलाओं के जीवन से जुडी कथाएँ और सर्वथा  भारतीय परिवेश में महिला की स्थिति दर्शाती कहानियाँ  मेरी तीसरी पुस्तक ' अधूरे अफ़साने ' कहानी संग्रह में समाहित हैं। साथ साथ विविध विषयों पे सामयिक आलेख, यात्रा विवरण , संस्मरण , शोध इत्यादी ब्लॉग लेखन में निरंतर उभरे हैं। 
जो महिलाऐं  साहित्य साधना से मुख नहीं मोड़ पातीं वे सतत सृजनशील रहतीं हैं। चाहे वे जिस किसी परिस्थिति में क्यों न रहें ! यह स्वभाव बन जाता है। 
मेरा ब्लॉग ' लावण्यम अंतर्मन ' विविध विषयों पर शोधपूर्ण आलेखों का संग्रह है। 
' लावण्यम अंतर्मन '  ब्लॉग पर कई अनोखे  विषयों की जानकारी लिए हुए आलेख पढ़ पायेंगें। 
कुछ महत्त्वपूर्ण विषय आपके साथ साझा कर रही हूँ।
१ ) यु. एन. ओ. UNO  में हिन्दी :   
http://www.lavanyashah.com/2011/09/blog-post.html 
२ ) प्रवासी भारतीय अमरीका में 
३ ) महिला दिवस 2013 : बलात्कार कैसे रोके जाएं? http://www.lavanyashah.com/2013/03/file-2013-2013.html
४ ) स्त्री सशक्तिकरण और द ग्लास सीलिंग’ = "शीशे की छत " कोर्पोरेट कल्चर पर आधारित आलेख 
http://www.lavanyashah.com/2010/09/blog-post.html
  कुछ अंश -    
 ग्लास सीलिंग मुहावरे के मशहूर हो जाने पर इस पर संशोधन भी हुए। संशोधनों के बाद यह भी पता चला है कि सन १९८४  में 'एड्वीक' पत्रिका के एक आलेख में, गे ब्र्यायनट ने सबसे प्रथम ग्लास सीलिंग मुहावरे का प्रयोग किया था । अब तो खोज विस्तृत होने लगी और पता चला कि, १९७९ में ह्यूलीट पेकार्ड कंपनी में कार्यरत केथरिन लाव्रेंस और मेरीएन श्र्च्रेइबेर नामक दो महिलाओं ने इसी मुहावरे को समझाते हुए कहा था कि, बाहरी तौर पर महिलाओं की प्रगति भले सुचारू रूप से चलती हुई दिखलाई दे परंतु इस प्रगति के अवरोध में अदृश्य, पारदर्शक अवरोध खड़े किये जाते हैं, जो महिला कर्मचारी के प्रगति, प्रमोशन और सर्वोच्च पद पर आसीन होने के मार्ग में बाधाएँ व रुकावट उत्पन्न करते हुए हर स्थान पर हर प्रगति के रास्तों पर अवरोध उत्पन्न करने के लिए रखे जाते हैं ।
अमरीका में ऐसे एकल परिवारों की संख्या में वृद्धि हो रही है जहाँ परिवार का ' मुखिया' = माने हेड ऑफ़ द फ़ेमेली ' एक स्त्री पात्र है सन १९७० से ऐसे परिवारों की संख्या में निरंतर बढ़ावा हो रहा है और ऐसे परिवार अमरीका में बड़ी तादाद में हैं परंतु वे अकसर ग़रीबी की रेखा के नीचे रहते हैं। 
ज़्य़ादादातर, ऐसे स्त्री मुखिया वाले एकल परिवार की महिलाएँ तलाकशुदा होतीं हैं या इनमें से कई बिन ब्याही माएँ हैं । सन` २०००  की जन गणना के आँकड़ों के अनुसार ११ % प्रतिशत परिवार अमरीका में ग़रीबी की हालत में जी रहे हैं जबकि २८  प्रतिशत एकल मुखिया स्त्री वाले परिवार ग़रीबी की हालत में जीने को बाध्य हैं। बिनब्याही माँ अकसर कच्ची या कम उम्र में माता बनी हैं। पढाई शिक्षा सिर्फ़ स्कूल तक सीमित होते ना उनके पास कोई डिग्री है ना कोइ ऐसा हुनर है जिस के तहत उन्हें अच्छा रोज़गार प्राप्त हो सके इस कारण ऐसी महिलाओं को नौकरी या पेशा भी ऐसा ही मिल पाता है जो उन्हें कम आय ही प्राप्त करवाता है। बच्चों की परवरिश के लिए भगौड़े पति या जिनके साथ उनका शारीरिक सम्बन्ध रहा वे व्यक्ति बच्चे की आवश्यकता पूर्ति के लिए पैसा नहीं देते या तो बहुत कम हिस्सा अपनी सीमित आय में से दे पाते हैं। बच्चे के लिए प्राप्य ऐसी धनराशि को चाईल्ड सपोर्ट कहते हैं। अमेरीका में ' तलाक' ही धन की समस्या या इकॉनोमिक दीवालियेपन का एक प्रमुख कारण है।
अंत में महिला लेखन की चुनौतियों को हम महिलाएं स्वीकार करते हुए संघर्षरत रहें और हमारे ईमानदारी से परखे प्रसंग, अनुभवों से आगामी पीढ़ी का मार्ग दर्शन करने में हम धैर्य एवं साहस के साथ निरंतर आगे बढ़ें यही कृत संकल्प करते हुए मानव कल्याण की भावना से पूरित सर्वोदय के लिए प्रयासरत रहें यह मंगल कामना करें। 
भारत की बेटी आगे बढ़े। अंतरिक्ष के द्वार कल्पना चावला ,  सुनीता विलियम्स जैसी भारत की बिटिया के लिए अब खुले हैं।   
उस तरह  प्रत्येक  महिला के लिए भी सीमाऐं  ना ही ब्रह्माण्ड के विस्तृत छोर  तक रहीं हैं ना ही स्त्री के कोमल ह्रदय की कंदराओं में वे कैद रहे पाएंगीं ।
नारी मन की भावनाओं को मुक्तांगण चाहिए ! उन्हें मुक्त धारा में बहने दें। पयस्विनी अमृत धारा ने ही मानव शिशु को अमृत पान करवाया है और विष - पान से बचाया  है। अत : महिला लेखन, स्त्री सृजन सृष्टि का नियामक अधिनियम एवं बल है और सदैव रहेगा।  इसे मुक्तगगन में विहरने दो ! 
कविता : कौन यह किशोरी ?
चुलबुली सी, लवँग लता सी,

कौन यह किशोरी ?

मुखड़े पे हास,रस की बरसात,

भाव भरी, माधुरी !

हास् परिहास, रँग और रास,

कचनार की कली सी,

कौन यह किशोरी?

अल्हडता,बिखराती आस पास,

कोहरे से ढँक गई रात,

सूर्य की किरण बन,

बिखराती मधुर हास!

कौन यह किशोरी?

भोली सी बाला है,

मानों उजाला है,

षोडशी है या रँभा है ?

कौन जाने ऐसी ये बात!

हो तेरा भावी उज्ज्वलतम,

न होँ कटँक कोई पग,

बाधा न रोके डग,

खुलेँ होँ अँतरिक्ष द्वार!

हे भारत की कन्या,

तुम,प्रगति के पथ बढो,

नित, उन्नति करो,

फैलाओ,अँतर की आस!

होँ स्वप्न साकार, मिलेँ,

दिव्य उपहार, बारँबार!

है, शुभकामना, अपार,

विस्तृत होँ सारे,अधिकार!

यही आशा का हो सँचार !

-श्रीमती  लावण्या दीपक शाह 

परिचय :   श्रीमती लावण्या दीपक  शाह

 सुप्रसिद्ध कवि स्व० श्री नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं और वर्तमान में  अमेरिका में रह कर अपने पिता से प्राप्त काव्य-

परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

समाजशास्त्र और मनोविज्ञान विषयों में बी.ए. (आनर्स) की उपाधि प्राप्त 

लावण्या , भारत के  सुप्रसिद्ध पौराणिक ' जयगाथा ' पर आधारित 

महाग्रंथ का दूरदर्शन पर  प्रसारित स्वरूप टीवी धारावाहिक "महाभारत" के 

लिये  कुछ दोहे लिख चुकी हैं। 

भारतीय दूतावास न्यू यॉर्क के निमंत्रण पर संस्था में  कविता - पाठ किया। 

उत्तर अमेरिका में इनकी लिखीं कविताएँ  और स्व० नरेन्द्र शर्मा और 

स्वर- साम्राज्ञी लता  मंगेशकरजी से  जुड़े संस्मरण,  अमरीका के 

' स्वरांजलि रेडियो कार्यक्रम '  लिंक : 
http://www.sopanshah.com/lavanya/Swranjali_LavanyaShah_1.mp3

 एवं ' सलाम नमस्ते ' रेडियो कार्यक्रम   डलास  शहर , टेक्सास प्रांत अमेरिका से  प्रसारित हुए हैं।

स्व. गायक मुकेशजी पर आधारित संमरणात्मक रेडियो वार्ता यूरोप के 

नैधरलैंड प्रांत से प्रसारित हुए ।  


वे , उत्तर अमरिका की '  अंतर राष्ट्र्रीय हिन्दी समिति ' द्वारा प्रकाशित मुख 

पत्रिका ' विश्वा ' में उप - सम्पादिका हैं। लिंक  :


कोलम्बस ओहायो शाखा में :


President — Smt. Lavanya Shah


कविता पुस्तक  " फिर गा उठा प्रवासी "  इन्होंने अपने पिता जी की 

प्रसिद्ध कृति " प्रवासी के गीत "  को समर्पित की हैं। 

उपन्यास ' सपनों के साहिल ' का प्रकाशन हो चुका है। उपन्यास का 

दीर्घकालीन फलक  सन १९२० के भारत से चलकर  स्वतन्त्र भारत की 

कहानी से जुड़ा २१ वीं सदी तक ४ पीढ़ियों की गाथा को  समेटे हुए है। 

लावण्या जी की प्रकाशनाधीन पुस्तकें : 

१) भारत के अमर युगल पात्र 

२ ) सुंदरकांड : भावानुवाद 

३ ) अधूरे अफ़साने - कथा संग्रह-  इत्यादी 


लावण्या दीपक शाह के ब्लॉग : 

१ ) अंतर्मन - अंतर्मन - लिंक : 


२ ) लावण्यम ~ अंतर्मन 


मेसन , ओहायो उत्तर अमरीका से 

Saturday, December 12, 2015

योगवासिष्ठ संस्कृत सहित्य ~ अद्वैत वेदान्त का अति महत्वपूर्ण ग्रन्थ

ॐ 
दशरथ राजा ने पुत्र प्राप्ति हेतु ' पुत्र कामेष्टी यज्ञ ऋष्यश्रृंग ऋषि से अयोध्या नगरी में करवाया था। उस यज्ञ में सिद्ध किये चरू का आधा भाग पटरानी कौसल्या ने भक्षण किया। एक साल पश्चात राम दाशरथि का जन्म हुआ। चैत्र शुक्ल नवमी, दोपहर के १२ बजे पांच गृह उच्च स्थिति में थे उस समय पुनर्वसु नक्षत्र , कर्क लग्न में गुरु चन्द्र योग था। 
राम का नामकरण दशरथ राजा के कुल गुरु वसिष्ठ द्वारा हुआ।  ' रामस्य लोक रामस्य ' इस श्लोक से राम और लघु भ्राता ' लक्षमण ' का नाम रखा गया। वसिष्ठ ऋषि ने दशरथ पुत्रों को  शास्त्रों की विधिवत शिक्षा दी। यजुर्वेद का सम्पूर्ण ज्ञान , राम को प्राप्त हुआ। सोलह वर्ष  के राम शिक्षा समाप्त कर तीर्थयात्रा भर्मण को निकले। तदुपरांत राम के मन में वैराग्य [ विरक्ति भाव ] भाव उत्पन्न हुआ। धन, राज्य, माता इत्यादी का त्याग कर, प्राण त्याग करने के विचार १६ वर्षीय राम के मन में आने लगे। 
' किं धनेन किंम्बाभिहि: किं राज्येन किमीह्या। 
आ निसचयापन्नः प्रान्त्यागपर : स्थित।।' 
राम की यह विलक्षण वैराग्यवृत्ति देखकर वसिष्ठ ने उन्हें ज्ञान कर्म समुच्चयात्मक उपदेश प्रदान किया। यही संवाद ' योग वसिष्ठ ' ग्रन्थ में समाहित है। 
ध्यान मनुष्य को स्वयं से मिलने अर्थात् आत्मा का साक्षात्कार कराने का सहज पथ है।
वसिष्ठ ने राम से कहा , ' आत्मज्ञान एवं मोक्षप्राप्ति के लिए अपना दैनंदिन व्यवहार एवं कर्तव्य छोड़ने की आवश्यकता नहीं है । जीवन सफल बनाने के लिए कर्तव्य निभाना उतना ही आवश्यक है जितना आत्मज्ञान ! 
' उभाभ्यामेव पक्षाभ्याम् यथा कहे पक्षिणाम गति : 
तथैव ज्ञानकर्मभ्याम्  जायते परमं पदम। 
केवलात्कर्मणो ज्ञानानन्ही मोक्षोभिजायते। 
किन्तुभाभ्याम् भवेन्मोक्ष : साधनम् तुभयम विदुः। 
  योगवासिष्ठ  
अर्थात - आकाश में घूमनेवाला पंछी जिस तरह अपने दो पंखों पर तैरता है , उसी भांति ज्ञान और कर्म के समुच्चय से मनुष्य जीवन को परमपद प्राप्ति होती है। केवल ज्ञान, या केवल कर्म की उपासना करने से मोक्ष प्राप्ति असंभव है। इस कारण दोनों प्रवृत्ति का समन्वय कर ही मोक्ष प्राप्ति संभव है। ' 
महारामायण में योग वसिष्ठ या वसिष्ठ रामायण ग्रन्थकर्ता वसिष्ठ ऋषि का उल्लेख है। ८ वीं और ११ वीं शताब्दी तक इसे संगृहीत किया गया। 
श्लोक संख्या ३२ हज़ार हैं जिनमे अध्यात्म का विस्तृत एवं प्रासादिक विवेचन प्राप्त है। 
योगवासिष्ठ संस्कृत सहित्य में अद्वैत वेदान्त का अति महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें ऋषि वसिष्ठ भगवान राम को निर्गुण ब्रह्म का ज्ञान देते हैं। 
आदिकवि वाल्मीकि परम्परानुसार योगवासिष्ठ के रचयिता माने जाते हैं।
महाभारत के बाद संस्कृत का यह दूसरा सबसे बड़ा ग्रन्थ है। यह योग का भी महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। 'महारामायण', 'योगवासिष्ठ-रामायण', 'आर्ष रामायण', 'वासिष्ठ-रामायण' तथा 'ज्ञानवासिष्ठ' आदि नामों से भी इसे जाना जाता है।
विद्वत्जनों का मत है कि सुख और दुख, जरा और मृत्यु, जीवन और जगत, जड़ और चेतन, लोक और परलोक, बंधन और मोक्ष, ब्रह्म और जीव, आत्मा और परमात्मा, आत्मज्ञान और अज्ञान, सत् और असत्, मन और इंद्रियाँ, धारणा और वासना आदि विषयों पर कदाचित् ही कोई ग्रंथ हो जिसमें ‘योग वासिष्ठ’ की अपेक्षा अधिक गंभीर चिंतन तथा सूक्ष्म विश्लेषण हुआ हो। अनेक ऋषि-मुनियों के अनुभवों के साथ साथ अनगिनत मनोहारी कथाओं के संयोजन से इस ग्रंथ का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। मोक्ष प्राप्त करने का एक ही मार्ग है आत्मानुसंधान। आत्मानुसंधान में लगे अनेक संतों तथा महापुरुषों के क्रियाकलापों का विलक्षण वर्णन इस ग्रंथ में दिया गया हैं। योगवासिष्ठ में जग की असत्ता और परमात्मसत्ता का विभिन्न दृष्टान्तों के माध्यम से प्रतिपादन है। पुरुषार्थ एवं तत्त्व-ज्ञान के निरूपण के साथ-साथ इसमें शास्त्रोक्त सदाचार, त्याग-वैराग्ययुक्त सत्कर्म और आदर्श व्यवहार आदि पर भी सूक्ष्म विवेचन है।
इसमें बौद्धों के विज्ञानवादी, शून्यवादी, माध्यमिक इत्यादि मतों का तथा काश्मीरी शैव, त्रिक प्रत्यभिज्ञा तथा स्पन्द इत्यादि तत्वज्ञानों का निर्देश होने के कारण इसके रचयिता उसी (वाल्मीकि) नाम के अन्य कवि माने जाते हैं। अतः इस ग्रन्थ के वास्तविक रचियता के संबंध में मतभेद है। यह ग्रन्थ आर्षरामायण, महारामायण, वसिष्ठरामायण, ज्ञानवासिष्ठ और केवल वासिष्ठ के अभियान से भी प्रसिद्ध है। योगवासिष्ठ की श्लोक संख्या ३२ हजार है। विद्वानों के मतानुसार महाभारत के समान इसका भी तीन अवस्थाओं में विकास हुआ। 
  1. वसिष्ठकवच
  2. मोक्षोपाय (अथवा वसिष्ठ-रामसंवाद)
  3. वसिष्ठरामायण (या बृहद्योगवासिष्ठ)
  4. योगवासिष्ठ ग्रन्थ छः प्रकरणों (४५८ सर्गों) में पूर्ण है।
    1. वैराग्यप्रकरण (३३ सर्ग),
    2. मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण (२० सर्ग),
    3. उत्पत्ति प्रकरण (१२२ सर्ग),
    4. स्थिति प्रकरण (६२ सर्ग),
    5. उपशम प्रकरण (९३ सर्ग), तथा
    6. निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध १२८ सर्ग और उत्तरार्ध २१६ सर्ग)।
    इसमें श्लोकों की कुल संख्या २७६८७ है। वाल्मीकि रामायण से लगभग चार हजार अधिक श्लोक होने के कारण इसका 'महारामायण' अभिधान सर्वथा सार्थक है। इसमें रामचन्द्रजी की जीवनी न होकर महर्षि वसिष्ठ द्वारा दिए गए आध्यात्मिक उपदेश हैं।
    प्रथम वैराग्य प्रकरण में उपनयन संस्कार के बाद प्रभु रामचन्द्र अपने भाइयों के साथ गुरुकुल में अध्ययनार्थ गए। अध्ययन समाप्ति के बाद तीर्थयात्रा से वापस लौटने पर रामचन्द्रजी विरक्त हुए। महाराज दशरथ की सभा में वे कहते हैं कि वैभव, राज्य, देह और आकांक्षा का क्या उपयोग है। कुछ ही दिनों में काल इन सब का नाश करने वाला है। अपनी मनोव्यथा का निरावण करने की प्रार्थना उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठ और विश्वामित्र से की। दूसरे मुमुक्षुव्यवहार प्रकरण में विश्वामित्र की सूचना के अनुसार वशिष्ठ ऋषि ने उपदेश दिया है। ३-४ और ५ वें प्रकरणों में संसार की उत्पत्ति, स्थिति और लय की उत्पत्ति वार्णित है। इन प्रकारणों में अनेक दृष्टान्तात्मक आख्यान और उपाख्यान निवेदन किये गए हैं। छठे प्रकरण का पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में विभाजन किया गया है। इसमें संसारचक्र में फँसे हुए जीवात्मा को निर्वाण अर्थात निरतिशय आनन्द की प्राप्ति का उपाय प्रतिपादित किया गया है। इस महान ग्रन्थ में विषयों एवं विचारों की पुनरुक्ति के कारण रोचकता कम हुई है। परन्तु अध्यात्मज्ञान सुबोध तथा काव्यात्मक शैली में सर्वत्र प्रतिपादन किया है।
  5. स्वयं योगवासिष्ठकार ने इस ग्रथ की उपर्युक्त विशेषता का कथन किया है । वे कहते हैं कि- शास्त्रं सुबोधमेवेदं सालंकारविभूषितम् ।
    अर्थात् यह शास्त्र सुबोध है, अच्छी प्रकार से समझ में आने योग्य है, अलंकारों से विभूषित है, रसों से युक्त सुन्दर काव्य है । इसके सिद्धान्त दृष्टान्तों द्वारा प्रतिपादित हैं ।
    दृष्टान्तों और कथा-कहानियों का प्रयोग विषय-बोध को सरल बनाता है । हमारे देश में कथा-कहानियाँ, आख्यान-उपाख्यान शताब्दियों से ज्ञान-प्रवाह के साधन रहे हैं । यही कारण है कि श्रुति परम्परा का अवलम्बन लेकर पुष्पित-पल्लवित-प्रवाहित हमारी संस्कृति इसके ज्ञान-सम्पदा से आप्लावित रही है। यहाँ साधारण जन से लेकर राजप्रासादों तक ज्ञानियों का अभाव कभी नहीं रहा ।
    योगवासिष्ठकार स्वयं कठिन एवं दुरूह भाषा के सन्दर्भ में अपनी अरुचि को व्यक्त करते हुये कहते हैं  कि कठिन और रसहीन भाषा श्रोता के हृदय में न प्रवेश कर पाती है न ही उसे आह्लादित कर पाने की क्षमता उसमें होती है । इस सन्दर्भ में योगवासिष्ठकार कहते हैं-
    यत्कथ्यते हि हृदयंगमयोपमान-
    युक्त्या गिरा मधुरयुक्तपदार्थया च ।
    श्रोतुस्तदंग हृदयं परितो विसारि
    व्याप्नोति तैलमिव वारिणि वार्य शंकाम् ॥, योगवासिष्ठ, ३ .८४ .४५ 
    अर्थात् जो कुछ ज्ञान ऐसी भाषा में कहा जाता है जो मधुर शब्दों से युक्त है एवं जिसमें समझ में आने वाली उपमाओं, दृष्टान्तों एवं युक्तियों का प्रयोग किया गया है, वह भाषा सुनने वाले के हृदय-प्रदेश में प्रवेश करके वहाँ पर इस प्रकार फैल जाती है जैसे तेल की बूँद जल के ऊपर फैल जाती है । जल पर तेल के समान फैलकर मधुर दृष्टान्तों से युक्त भाषा श्रोताओं के हृदय को प्रकाशित करती है एवं उनकी शंकाओं का समाधान करती है । योगवासिष्ठकार ने कठिन, शुष्क एवं दुरूह भाषा को राख में पड़े हुये घी के समान बताया है-
    त्यक्तोपमानममनोग्यपदं दुरापं
     क्षुब्धं धराविधुरितं विनिगीर्णवर्णम् ।
    श्रोतुर्न याति हृदयं प्रविनाशमेति
     वाक्यं किलाज्यमिव भस्मानि हूयमान् ॥, योगवासिष्ठ, ३ .८४ .४६ 
    अर्थात् जो भाषा कठिन, कठोर एवं कठिनाई से उच्चारण किये जाने वाले शब्दों से युक्त एवं दृष्टान्तों से रहित है, वह श्रोता के हृदय में प्रवेश नही कर सकती और वैसे ही नष्ट हो जाती है जैसे राख में पड़ा हुआ घृत ।
    योगवासिष्ठकार का विचार था की भाषा की दुरूहता ज्ञानप्राप्ति में बाधक नहीं बननी चाहिये । सरल भाषा एवं सम्यक् दृष्टान्तों के प्रयोग द्वारा सामान्यजनों को भी ज्ञानियों के समान ज्ञान प्रदान किया जा सकता है । इसके लिये उन्होंने मञ्जुल भाषा, दृष्टान्तों, उपमाओं एवं सूक्तियों का प्रचुर प्रयोग करके दार्शनिक ज्ञानराशि को सर्वजनबोधगम्य बनाने का प्रयास किया । दार्शनिक ज्ञान को सरलतम माध्यम से सर्वजनग्राह्य बनाने के अपने इस विचार का उन्होंने इस ग्रन्थ में कथन एवं समर्थन भी किया –
    आख्यानकानि भुवि यानि कथाश्च या या
     यद्यत्प्रमेयमुचितं परिपेलवं वा ।
    दृष्टान्तदृष्टिकथनेन तदेति साधो
     प्रकाश्यमाशु भुवनं सितरश्मिनेव ॥, योगवासिष्ठ, 3.84.47
    अर्थात् इस संसार में जितनी भी कथायें और आख्यान हैं और जितने भी उचित और गूढ़ विषय हैं, वे सब दृष्टान्तों के माध्यम से कहने से वैसे ही प्रकाशित होते हैं जैसे कि यह संसार सूर्य की किरणों द्वारा प्रकाशित होता है ।
  6. काव्यं रसमयं चारु दृष्टान्तैः प्रतिपादितम् ॥योगवासिष्ठ, २. १८ .३३ 
  7. कथा शैली की इसी ऋजुता को देखते हुये योगवासिष्ठकार ने ब्रह्मविद्या को काव्यमयी मधुरता के साथ संसार के समक्ष रखा । वैराग्य से निर्वाण तक की यात्रा करने वाला, पथ-प्रदर्शन करने वाला यह ग्रन्थ समान रूप से साहित्यप्रेमियों के मध्य समादृत है । डॉ. आत्रेय ने इस अनुपम ग्रन्थ के महात्म्य को रेखांकित करते हुये लिखा है कि यह ग्रन्थ “काव्य, दर्शन एवं आख्यायिका का सुन्दर संगम-त्रिवेणी के समान महत्व वाला है। तीर्थराज जिस प्रकार पापों का विनाश करता है उसी प्रकार योगवासिष्ठ भी अविद्या का विनाश करता है । इसका पाठ करने वाला यह अनुभव करता है कि वह किसी जीते जागते आत्मानुभव वाले महान् व्यक्ति के स्पर्श में आ गया है, और उसके मन में उठने वाली सभी शंकाओं का उत्तर बालोचित सुबोध, सुन्दर और सरस भाषा में मिलता जा रहा है, दृष्टान्तों द्वारा कठिन से कठिन विचारों और सिद्धान्तों का मन में प्रवेश होता जा रहा है, और कहानियों द्वारा यह दृढ़ निश्चय होता जा रहा है कि वे सिद्धान्त, जिनका प्रतिपादन किया गया है, केवल सिद्धान्त मात्र और कल्पना मात्र ही नहीं हैं बल्कि जगत् और जीवन में अनुभूत होने वाली सच्ची घटनायें हैं ।” योगवासिष्ठ को योगवासिष्ठ महारामायण, महारामायण, आर्षरामायण, वासिष्ठरामायण, ज्ञानवासिष्ठ, वासिष्ठ एवं मोक्षोपाय आदि विभिन्न नामों से भी जाना जाता है । ग्रन्थ के महात्म्य का प्रतिपादन करते हुये स्वयं योगवासिष्ठकार कहते हैं कि, 
  8. अस्मिंन्श्रुते मते ज्ञाते तपोध्यानजपादिकम् ।
  9. मोक्षप्राप्तौ नरस्येह न किंचिदुपयुज्यते ॥, योगवासिष्ठ, 2.18.34
    सर्वदुःखक्षयकरं परमाश्वासनं धियः ।
    सर्वदुःखक्षयकरं महानन्दैककारणम् ॥, योगवासिष्ठ, 2.10.9, 2.10.7
    य इदं शृणुयान्नित्यं तस्योदारचमत्कृतेः ।
    बोधस्यापि परं बोधं बुद्धिरेति न संशयः ॥ , योगवासिष्ठ, 3.8.13
    अर्थात् मोक्ष प्राप्ति के लिये इस ग्रन्थ का श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन कर लेने पर तप, ध्यान और जप आदि किसी साधन की आवश्यकता नहीं रहती । यह ग्रन्थ सब दुःखों का क्षरण करने वाला, बुद्धि को अत्यन्त आश्वस्त करने वाला, विश्वास प्रदान करने वाला और परमानन्द की प्राप्ति का एकमात्र साधन है । जो इसका नित्य श्रवण करता है उस प्रकाशमयी बुद्धि वाले को बोध से भी परे का बोध हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है । योगवासिष्ठ के इसी महत्त्व के विषय में लाला बैजनाथ जी ने योगवासिष्ठ भाषानुवाद के भूमिका में लिखा है , जिसे डॉ. आत्रेय ने अपनी पुस्तक में उद्धृत किया है “वेदान्त में कोई ग्रन्थ ऐसा विस्तृत और अद्वैत सिद्धान्त को इतने आख्यानों और दृष्टान्तों और युक्तियों से ऐसा दृढ़ प्रतिपादन करने वाला आज तक नहीं लिखा गया, इस विषय से सभी सहमत हैं कि इस ग्रन्थ के विचार से ही कैसा ही विषयासक्त और संसार में मग्न पुरुष हो वह भी वैराग्य-सम्पन्न होकर क्रमशः आत्मपथ में विश्रान्ति पाता है । यह बात प्रत्यक्ष देखने में आयी है कि इस ग्रन्थ का सम्यक् विचार करने वाला यथेच्छाचारी होने के स्थान में अपने कार्य को लोकोपकारार्थ, उसी दृष्टि से कि जिस दृष्टि से श्रीरामचन्द्र जी करते थे, करते हुये उनकी नाईं स्व-स्वरूप में जागते हैं ।”
    बत्तीस हजार श्लोकों वाला यह ग्रन्थ जो अपने कलेवर में रामायण से भी बड़ा है, अपने अन्दर पचपन आख्यानों-उपाख्यानों को समाहित किये हुये है । इनमें से दो दीर्घ उपाख्यान लीलोपाख्यान और चूडालोपाख्यान बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं, एक ओर जहाँ ये गूढ़ दार्शनिक ज्ञान प्रदान करते हैं दूसरी ओर ये स्त्री-सशक्तिकरण का एक मानदण्ड भी प्रस्तुत करते हैं । डॉ. आत्रेय ने इन दोनों उपाख्यानों को ’योगवासिष्ठ के हृदय’ कहा है ।
  10.  डॉ. आत्रेय ने पं. भगवान दास जी की पुस्तक ’Mystic Experiences’ से उद्धृत करते हुये लिखा है कि “वेदान्तियों में तो यह उक्ति प्रचलित है कि यह ग्रन्थ सिद्धावस्था में अध्ययन करने के योग्य है और दूसरे ग्रन्थ भगवद्गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र साधनावस्था में अध्ययन किये जाने योग्य हैं ।”
संकलन 
- लावण्या