Wednesday, September 28, 2016

वैश्विक कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा

 वैश्विक कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ~ 
 
श्री तेजेन्द्र शर्मा आधुनिक हिंदी साहित्य के सक्षम हस्ताक्षर हैं। वे लेखक तो हैं  ही किन्तु लन्दन निवासी होने के बावजूद, यूरोप  की भौगोलिक सीमा में बंधे हुए न रह कर, एक वैश्विक हिंदी कथाकार की हैसियत से पहचाने जाते हैं। 
     इंसान कहीं भी रहे, भावनाएं तो विश्व के हरेक देश में, मानव मन में, एक सी ही उभरतीं हैं। ऐसी मानवीय संवेदनाओं को अपने लेखन से उजागर करते हुए, तेजेन्द्र शर्मा जी ने  हिंदी साहित्य में, अपनी कथाओं द्वारा अपार ख्याति प्राप्त की है। आधुनिक हिंदी साहित्य के तेजेन्द्र जी, सशक्त शब्द शिल्पी हैं और इसी कारण उन की कहानियाँ जब जब लिखी गईं तब तब एक विशाल पाठक वर्ग ने उसे पढ़ा, सराहा और एक नए  सिरे से, बदलते हुए सामाजिक परिवेश को समझा। उर्दू, पंजाबी और नेपाली भाषी लेखकों ने, अपनी अपनी भाषाओं में तेजेन्द्र जी की कहानियों को अनुदित किया । 
      भारत के जगरांव ग्राम में सन १९५२, अक्टूबर की १२ तारीख  को तेजेन्द्र जी का जन्म, पंजाब प्रांत में हुआ था। शैशव के कुछ वर्ष बीते और परिवार शहर में रहने आ गया । 
     तेजेन्द्र जी ने  देहली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी विषय में एम. ए. किया और  कम्प्युटर विधा में डिप्लोमा भी लिया। अंग्रेज़ी, हिंदी पंजाबी, उर्दू और गुजराती भाषाओं के वे जानकार हैं। 
   भारत  से लन्दन तक की तेजेन्द्र भाई साहब की जीवन - यात्रा, किसी घुमावदार, अति मानवीय संघर्षों से भरी कहानी से कम नहीं। 
स्वयं उनहोंने कहा है , 
"  जगरांव से लुधियाना जाना,
    ग्रामद्रोह कहलायेगा
     लुधियाने से मुंबई में बसना
       नगरद्रोह बन जायेगा
    मुंबई से लंदन आने में
   सब का ढंग बदल जाता है
     पासपोर्ट का रंग बदल जाता है !" 
एक रचनाकार बनने से पहले तेजेन्द्र जी की बाल्यवस्था में परिवार का अनेकों बार तबादला हुआ था। नीड का निर्माण फिर फिर की सी प्रतीति  और पिता का क्रोधी किन्तु निडर और साहसी स्वभाव, माता का असीम स्नेह, भारतीय रिश्ते नातों की डोर से बंधा शैशव, परिवार से जुड़े  रिश्तों से मिला अपार स्नेह संबल, यह सभी एक बच्चे के मन को मानवीय संवेदनाओं के विविध स्पन्दनों से भरते रहे। 
                   जीवन के किसी मोड़ पर  मिला हरजीत दीदी का निर्मल स्नेह भी भविष्य के लेखक के जहन  में ऐसा बसा कि  कहीं न कहीं, किसी न किसी मोड़ पर, तेजेन्द्र शर्मा के लेखन द्वारा, विश्व में फैले हुए असंख्य पाठकों के मन को छु गया ! 
   अपनी युवावस्था में तेजेन्द्र  जी ने  भारतीय विमान सेवा में २२  वर्ष  गुजारे। उस वक्त  तेजेन्द्र जी को दुनियाभर के लोगों को नज़दीक से देखने समझने का मौका मिला। यह अनुभव, सुफेद बादलों पे उड़ते एरोप्लेन में भी तेजेन्द्र शर्मा के लेखक मन के मौन भावों को, कहानियों का आकार देने से ना चुके। अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में तेजेन्द्र जी कहते हैं , ' मेंरा मुख्य उद्देश्य है पाठक के साथ एक संवाद पैदा करना। जो मैं सोच रहा हूँ, वह पाठक तक पहुँचे, यह मेरा मुख्य उद्देश्य रहता है। ' 
                दिन गुजरते रहे परंतु नियति ने अब बड़ी कठिन परीक्षा ली ! उनके हँसते खेलते परिवार को यकायक सहमा दिया। तेजेन्द्र जी ,धर्मपत्नी इंदु जी, बिटिया दीप्ती और पुत्र मयंक सभी के जीवन में  दारुण, अत्यंत दुखद मोड़ आया! इंदु जी जानलेवा कैंसर से जूझ रहीं थीं। कैंसर सा असाध्य रोग और अपनी पत्नी का वह अंतिम समय, तेजेन्द्र जी न जाने कैसे झेल गए ! 
        इंदु जी के जाने के बाद, कथाकार के जीवन को सर्द  हवाओं ने आ घेरा और फिर ज़िन्दगी में तब्दीलीयां आईं। कहते हैं कि,
' तब्दीलीयां जब भी आती हैं ,मौसम  मे...
   किसी का यूं अचानक  चले जाना, 
    बरसों तलक , बहुत याद आता है ! ' 
उनकी धर्मपत्नी, सहचरी, रचनाकार की प्रेरणा शक्ति, जिसे अंग्रेज़ी में ' muse ' कहते हैं,  उनका चले जाना, असहय दुःख भी अब इस रचनाकार को सहना था। 
     तेजेन्द्र जी की आत्म स्वीकृति है कि हिंदी भाषा के प्रति एक लेखक की हैसियत से उन्हें रुझान बख्शनेवालीं, व्यक्ति , श्रीमती इंदु तेजेन्द्र शर्मा जी हीं थीं। कहानी लेखन की विधा के लिए तेजेन्द्र जी कहते हैं ' कहानी स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा है। ' इंसान की ज़िंदगानी भी तो वैसी ही होती है। 
          सौ. इंदु जी का इस तरह, असमय जीवन पथ पर छोड़ जाना और कैंसर दैत्य से विकट संघर्ष और  इंदु जी से बिछोह का दारुण दंश, कथाकार के मन के इंद्रधनुष को, विषाद के गहरे रंगों से बेध गया। कथाकार की कला, करुण रस  से बिंध कर और निखरती चली गई।
    तेजेन्द्र जी ने यही कहा ' एक कहानीकार के तौर पर मैं अपने आप को मूलतः हारे हुए व्यक्ति के साथ खड़ा पाता हूँ, जीतने वाले के साथ जश्न नहीं मना पाता।' 
        इस दौरान इंदु जी के संग २१ वर्ष का बंबई शहर सहवास और विश्व भ्रमण, जीवन के अनुभवों को परिपक्व करते रहे थे। ये सारे अनुभव  कथाकार  तेजेन्द्र शर्मा के रचनाकार मन को, नीजी संवेदनाओं को, विविध रंगों से तराशते रहे थे । 
       तेजेन्द्र जी की रचनाशीलता हिंदी सिनेमा, रेडियो, स्टेज जैसे संचार माध्यम द्वारा भी अभिव्यक्त हुई और  निरंतर प्रगति करती रही।इसी काण उनकी कहानियों के पात्र सजीव लगते हैं। उनके हाव भाव तक पाठक दृश्यों को पढ़ते वक्त, देख पाते हैं। अपनी कथा पढ़ने की सूझ बुझ तेजेन्द्र जी को विविध कला क्षेत्रों में दक्षता पूर्वक कार्य करने से ही बखूबी आती है।'  शांति '  नामक टीवी सीरियल में भी तेजेन्द्र जी के कार्य को खूब सराहा गया। 
       इंदु जी के जाने के बाद,  इंदु जी की स्मृति में, तेजेन्द्र जी ने ' इंदु कथा सम्मान ' की नींव बंबई में ही रखी। कालान्तर में जब तेजेन्द्र शर्मा जी लन्दन आकर बस गए तब ' इंदु कथा अंतरराष्ट्रीय सम्मान ' स्थानांतरित होकर अन्तरराष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार बना।   
तेजेन्द्र जी ने उस दौर के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा है, ' ११ दिसम्बर १९९८ को मैं लन्दन में बसने के लिए आया। उस समय मेरी आयु ४६ वर्ष थी। मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी। और न ही कोई बहुत बड़ा बैंक बैलेन्स था। मैं एअर इण्डिया की शाही नौकरी छोड़ कर आया था जहाँ अमरीकी डॉलर में पगार मिलती थी और भारतीय रुपये में खर्चा करता था। मुझे  अपने परिवार को पालना था। लन्दन शहर ने मुझे पहले बीबीसी में समाचार वाचक की नौकरी दी और फिर ब्रिटिश रेल में ड्राइवर की। यानि कि उस उम्र में मुझे नौकरी नहीं, नौकरियाँ मिलीं – और वो भी एकदम भिन्न क्षेत्रों में। ' 
            लन्दन रेलवे विभाग में कार्यरत तेजेन्द्र जी की कथाओं ने अब देस और परदेस को एक साथ समेट  लिया है। कहानीकार के  कथा शिल्प को अब व्यापक विस्तार मिला। 
          तेजेन्द्र जी की इस दौर की  कहानियाँ  मानव मन और सामाजिक उतार चढावों के तानों बानों से कसी हुईं, बुनी हुईं, सर्वकालिक हो गईं और इसी कारण से  तेजेन्द्र शर्मा जी की कहानियाँ, सार्वभौम विषय वस्तु के कारण, लन्दन तक सीमित न रह कर, भारत में बसे पाठकों को नवीन कथा विषय की इन कहानियों को पढ़ने के लिए उत्सुकता से बाध्य करतीं रहीं। आज तेजेन्द्र जी की कथाएं भारत में पाठ्यक्रम का हिस्सा बन चुकी हैं । 
       एक साक्षात्कार में बेबाकी से उत्तर देते हुए तेजेन्द्र जी कहते हैं कि  ' हम प्रगतिशील लोग धर्म के मामले में बहुत मॉडर्न हैं और परम्पराओं के विरुद्ध हैं। किन्तु जहाँ तक लेखन का सवाल है वही दकियानूसी रवैया रखते हैं। ' 
      ' काला सागर, ढिबरी टाइट, देह की क़ीमत, क़ब्र का मुनाफ़ा, तरकीब, पाप की सज़ा, मुझे मार डाल बेटा, एक बार फिर होली, पासपोर्ट का रंग, बेघर आँखें, कोख का किराया, टेलिफ़ोन लाइन/ जैसी कहानियाँ  लिखनेवाले तेजेन्द्र जी कहते हैं 
'  मैं शायद उन गिने चुने लेखकों में शामिल हूँ जिनके लेखन में आज का समाज जगह पाता है।'
             आधुनिक काल को अपने लेखन से विश्व के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करनेवाले रचनाकार को आधुनिक हिंदी साहित्य के सक्षम कथाकार तेजेन्द्र भाई को  मैं इसीलिए ' रैनेसान्स मेन ' या '' Renaissance Man ' या ' नवजागरण का कथाकार ' मानती हूँ। 
     आधुनिक इतिहास और मध्य युग को  जिस तरह यूरोप में रेनेसांस युग कहते हैं वह समय काल  १४ वीं से १७ वीं शताब्दी के दौरान  फैला हुआ है। यह कालखंड यूरोप में कई बदलाव लाया। इसी प्रकार भारतीय चेतना को वैश्विक फलक तक लाने का साहस तेजेन्द्र शर्मा जैसे रचनाकार, अपने लेखन द्वारा  आज के मध्य युगीन भारतेंदु युग के पश्चात के साहित्य को आधुनिक २१ वीं सदी के हिंदी साहित्य को जोड़ने का काम करते हुए मानों एक सेतु रच कर पूरा कर रहे हैं। 
        तेजेन्द्र जी के अभिप्राय,  ' कहानी ' और ' लेखक '  के लिए गौर तलब है।  वे कहते हैं कि, " कोई कहानी सच नहीं होती और कहानी से बड़ा सच कोई नहीं होता। एक कवि और कहानीकार के सच में भी अन्तर होता है। कवि का एक अपना सच होता है जो कि आवश्यक नहीं की शाश्वत सत्य ही हो। कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने भीतर का सत्य़ खोज सकता है।
' प्रतिबिम्ब ' तेजेन्द्र जी की लिखी हुई पहली कथा है। ' रेत का घरौंदा ' ईंटों का जंगल ' कड़ियाँ ' काला सागर, ' ढिबरी टाइट ' ,पासपोर्ट का रंग ' जिस पर कविता भी लिखे गई उसी से चाँद पंक्तियाँ 
 ' भावनाओं का समुद्र उछाल भरता है
   आइकैरेस सूरज के निकट हुआ जाता है
  पंख गलने में कितना समय लगेगा?
    धडाम! धरती की खुरदरी सतह
     लहु लुहान आकाश हो गया!
    रंग आकाश का कैसे जल जाता है?
     पासपोर्ट का रंग कैसे बदल जाता है? ' 
बेघर आँखें ' सीधी रेखा की परतें ', ' ये क्या हो गया ', '  कब्र का मुनाफ़ा ' ,' देह की कीमत ' , ' दीवार में रास्ता ' इत्यादी  अनेक कथाएं, आधुनिक युगबोध की कहानियां हैं। 
     इसी कारण तेजेन्द्र जी के भीतर का इंसान लेखक बना तो उन के जमीर ने यही कहा ' हारा हुआ आदमी भारत में है तो ब्रिटेन में भी है और अमरीका में भी है। जिस आदमी को सद्दाम ने दबा रखा था वो भी हारा हुआ आदमी था। जिस किसी की साथ अन्याय होता है – मेरा हारा हुआ आदमी वह है। और मैं बेझिझक उसके साथ सदा खड़ा रहूँगा। ' 
' ये घर तुम्हारा है ' तेजेन्द्र जी का  कविता ग़ज़ल संग्रह हैं जिसकी  शीर्ष कविता में तेजेन्द्र जी कहते हैं 
नदी की धार बहे आगे,मुड क़े न देखे
न समझो इसको भंवर अब यही किनारा है " 
       तेजेन्द्र जी को उनके लेखन एवं सम्पादन के लिए एवं हिंदी सेवा के लिए असंख्य पुरस्कारो से नवाजा गया है। सुपथगा सम्मान-१९८७ में मिला। ढिबरी टाइट के लिये महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार-१९९५ प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों प्रदान किया गया। सहयोग फ़ाउंडेशन का युवा साहित्यकार पुरस्कार-१९९८ में दिया गया। यू.पी. हिन्दी संस्थान का प्रवासी भारतीय साहित्य भूषण सम्मान-२००३, प्रथम संकल्प साहित्य सम्मान- दिल्ली २००७ में प्राप्त हुआ। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा का डॉ॰ मोटूरि सत्यनारायण सम्मान-२०११ में और अंतरराष्ट्रीय स्पंदन कथा सम्मान २०१४ में मिला। 
    लन्दन में रहकर हिंदी रचनाकारों को अंतरराष्ट्र्रीय स्तर पर सम्मानित करती हुई  संस्था को हाऊस ऑफ लॉर्ड्ज़ ' में स्थापित करने का श्रेय श्री तेजेन्द्र जी का है। विश्व के विभिन्न देशों में बसे अन्य रचनाकारों को संस्था द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। हिंदी भाषा के प्रति यही सच्चा समर्पण है। 

कवि और लेखकों को लोगबाग कभी कभार याद कर लेते हैं बाकि अक्सर यही देखने में आता है कि रचनाकारों को साहित्य + लेखन के साथ जीवन में कड़ा संघर्ष ही अधिकतर झेलना पड़ता है। 
    एक पाठक, सौ मित्रों के समान होता है और जो लेखक की पुस्तक पढ़ने के बाद, उस पर कुछ कहे, वह तो लाखों में कोइ एक होता है। लेखक का हौसला बढ़ानेवाले की बात को मन में रखे हुए, लिखते रहना ही एक रचनाकार की वास्तविक नियति है।
      इस निष्कर्ष पर पहुंचकर अद्भुत कथाकार तेजेन्द्र जी से यही अपेक्षा रहेगी कि वे निरंतर सक्रीय रहें , लिखते रहें। अछूते विषयों पर, कलम चलातें  रहें और मानव संवेदनाओं से सभर कहानियां बुनते रहें जिस से भारत के लेखक और प्रवासी भारतीय लेखक के बीच का कृत्रिम  भेद मिट जाए और विश्व में कटुता और विभाजन की त्रासदी हारे ! जीत हो मानवता की और सच्चे मानवीय मूल्यों की और खेमों या विघटन कारी भावना की करारी हार हो ! अभी तेजेन्द्र शर्मा जी को बहुत कुछ लिखना शेष है और हमें, उनका लिखा हुआ पढ़ना ! मेरी सद्भावनाएँ रचनाकार तेजेन्द्र शर्मा जी के उज्जवल भविष्य के लिए प्रेषित करते हुए अतीव हर्ष हो रहा है। 
शुभमस्तु ! 
- श्रीमती लावण्या दीपक शाह 
 ओहायो प्रांत सीनसीनाटी शहर से 



Saturday, August 13, 2016

श्री मैथिली शरण गुप्त - अतित के चल चित्र "दद्दा का घर -- देल्ही १९६२ "

 दद्दा का घर -- देल्ही १९६२ " 


``सखि वे मुझसे कह कर जाते,
तो क्या वे मुझको अपनी पथ बाधा ही पाते।
नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते
पर इनसे जो आँसू बहते
सदय हृदय वे कैसे सहते?
जायँ सिद्धि पावें वे सुख से
दुखी न हों इस जन के दु:ख से
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
आज अधिक वे भाते।''
 --श्री मैथिली शरण गुप्त
अतित  के  चल  चित्र  : दद्दा  का  घर  -- देल्ही  १९६२ 
देल्ही  की  लू  भरी   गर्मियों  का   मौसम  था।  हम  लोग  बम्बई  से  २  महीनो  की  स्कूल  की  छुट्टियों  के  दौरान , पापाजी  के  पास  देहली  आये  हुए  थे  [ पापाजी से मेरा आशय है  मेरे  पिता  / स्वर्गीय  पं. नरेन्द्र  शर्मा  ]
 पापाजी  उस  समय  AIR के  चीफ़  प्रोडूसर  / डिरेक्टर  के  पद  पर  थे  और  उनका  देल्ही  रहना  आवश्यक  था।  भारत  सरकार  ने  उन्हें  बम्बई  से  देल्ही  बुलवा  लिया  था।  हम  लोग  बम्बई  में  जन्मे,  पले , बड़े  हुए  थे  और  नयी  दिल्ली  हमे सदा " परायी  नगरी  " ही  लगती  थी। हमारे मन में पापाजी  से  मिलने  का  उत्साह  तो  था  पर  दिल्ली   की  गर्मियों  के बारे में जितना सुन रखा था उसे अनुभव करने का समय सामने आ पहुंचा था और इस भयानक गर्मियों के मौसम ने हमें  मन ही मन परेशान  कर  रखा  था। इसी उहापोह को  मन में समाए,  हम  सब  आ  ही  पहुंचे  थे देल्ही !
दद्दा, श्री  मैथिलि शरण  गुप्त , उस समय राज्य  सभा  के  M.P. थे।  ठीक  राष्ट्र पति  भवन  के  चौराहे  को  पार  कर,  जो  पहला  मकान  पड़ता  था,  उसकी  पहली  मंजिल  पर, पूज्य दद्दा  को  एक  फ्लैट , भारत  सरकार  द्वारा, रहने  के  लिए  दिया  गया  था। दद्दा ,  गर्मी  की  छुट्टियों  के  संसदीय  सत्र  में, कुछ माह  के लिए , अपने  मूल  वतन , झांसी  जा  रहे  थे।  पर  जब  हम  [ मेरी  अम्मा , श्रीमती  सुशीला  नरेन शर्मा  और  हम  ४  भाई  , बहेन  ] ३  दिनों  के  लम्बे  प्रवास  के  बाद , देहरादून  एक्सप्रेस  [ जो  हर  स्टेशन  पर  रूक  रूक  कर , ३  दिनों  के  बाद  बम्बई  से  देल्ही  पहूँचती  थी  और  ' एक्सप्रेस '  कहलाने  के बिलकुल  लायक  नहीं  थी  ;-)) ] उस  से  यात्रा  पूरी  कर  के,  हम  लोग, मतलब, मैं , लावण्या, मुझसे  बड़ी  बहन  वासवी, छोटी  बांधवी  और  भाई  - परितोष  और  हमारी  अम्मा, श्रीमती  सुशीला  नरेन्द्र  शर्मा, ये  हम  सब , दद्दा  के  घर  पहुंचे। वहां  दद्दा  से  मिलते  ही, हम  सब  बच्चों  ने, उन्हें  पैर  छू  कर, विधिवत  प्रणाम  किया।  दद्दा  ने  हमारे झुके हुए सरों  पर अपने कांपते हुए  हाथ  रख  कर  आशीर्वाद  दिए। अम्मा  को  देख  प्रस्सन्न  हुए  और  कहा ,
" अच्छा  हुआ  बहु  तुम  आ  गयीं !  चौका  सम्हालो  और  देख  लो , मैंने  अनाज , आटा , दाल,  चावल  सभी  रखवा  दिया  है।  तुम  इसे  अपना  ही  घर  समझना  और  आनंद  पूर्वक  रहना।  मैं  लौट  आऊँगा  और  तुम  लोगों  से  मिलूंगा।  "
उस प्रथम साक्षात्कार के वक्त परम पूज्य दद्दा की  निश्छल  हंसी  आज  भी  मुझे  याद  है। मेरी  उमर , उस  वक़्त, करीब  ११  या  १२  वर्ष  की  होगी। 

दद्दा , खूब  लम्बे  थे। दुबले  पतले  भी  थे  और  गर्मियों  में  महीन  सूती  धोती  और  एक  सूती  " अंग -  वस्त्रम  " बिलकुल  गांधीजी  की  तरह  लपेटे  रहते  थे।  उनका  एक  सेवक  भी  था। नाम  अभी  याद  नहीं  आ  रहा। वही  उनकी  देख  भाल किया करता  था। बड़े  से  बड़ी  हस्ती  आ  जाये  या  कोई  सर्वथा  अपरिचित  या  कोई  नवागंतुक हो, सब को  एक सरीखा  नाश्ता  वह  एक  बड़ी  सी  थाली  पर  सजा  कर  दे  जाता  था। नाश्ते  में  हमेशा  यही  परोसा  जाता  था  ...१  छोटा  सा  लड्डू   , पुदीने   की  एकदम  हरी  चटनी  का  छोटा  सा  एक  बिंदु  और  पाव  टुकड़ा  [ १ / ४  ] ....मठडी  !! :-))
  
हमें देहली की गर्मी को दूर भगाने के लिए सीलींग पर लटका पंखा दिखा और हम बच्चों ने जैसे ही पंखे के स्वीच को ओन  किया तो पूजनीय दद्दा , कहने लगे  कि ' हमारी भारत  सरकार  बिजली  का  बिल  चुकाती  है  और  हमे बिजली का  सही  इस्तेमाल  करना  चाहिए  !  दुरूपयोग  नहीं  करना  चाहिए  ...और  वे , १  नंबर  पर  ही  पंखा  / फेन .... चलते  थे  और  पूरे  पसीने  से  भीग  जाते  थे  !! :-))
यह  उनका  बड़प्पन   भी  था  और  बच्चों  सी  निश्छल  मासूमियत  भी  थी शायद जो उन्हें ऐसे नियम और सिद्धांत पर अटल रखे हुए थी।  उनके  व्यक्त्तित्व  में  और  उनकी  सादगी में जो  भोलापन  था उसके आगे   हम  में  से  कोई  उनकी  कही  बात  का  प्रतिकार  नहीं  कर  पाया ! 
 हाँ  उनके  झाँसी  के  लिए  प्रस्थान  होने  के  बाद , फेन  / पंखा   खूब  तेजी  से  चलता  रहा  पर  हम लोग समझ गए कि देल्ही  की  गर्मी  के  सामने  वो  बेचारे  की  भी कोइ बिसात  न थी !! 
दद्दा  ने  वासवी  की  हस्ताक्षर  इकट्ठा  करनेवाली  एक  कॉपी  में  यह  पंक्तियाँ लिख  कर  वासवी को दीं थीं - यह पंक्तियाँ उसी समय दद्दा ने हस्ताक्षर करते हुए हमारे समक्ष रचीं थीं और यह पंक्तियाँ उनकी किसी अन्य रचना में नहीं हैं और  अप्रकशित  हैं ।  वासवी  जितने भी रचनाकारों से, कवियों से मिलती तब हर  कवि  से आग्रह किया करती थी की ' कृपया ,बिलकुल  नयी  रचना  को ही आप  मेरी  इस  हस्ताक्षर एकत्रित करनेवाली पुस्तक  में  लिख  दीजिए !
 जो पंक्तियाँ परम् पूज्य ददद्दा ने लिखीं वे भी  सुन लीजिए  ,
" अपना  जितना  काम आप  ही  जो  कोई  कर  लेगा  ,
पा  कर  उतनी  मुक्ति  आप  वह  औरों  को  भी  देगा  ! "
[ और  नीचे  हस्ताक्षर  किये , " -- मैथिलिशरण  गुप्त  " ]
          दद्दा  के  फ्लैट  के  पडौस  में  एक  अशोक  भाई  रहते  थे। वे  राष्ट्र पति  भवन  के   चीफ़  पेस्ट्री  ' शेफ  (' पाक शास्त्री ' ) थे  !! उनके  हाथों  से  तैयार  किये  गये , बहुत  बढ़िया  पुद्दिंग्स , कस्टर्ड , जेल्लो  , आईस क्रीम और केक  खाने का अवसर  भी  उसी  दौरान  हमे  मिला  था। आज वे, स्मृतियाँ मधुर  याद  बन कर मन में  रस  घोल रहीं हैं  !
 - लावण्या 
 
  

Wednesday, January 27, 2016

२१ वीं सदी में महिला लेखन , चुनौती और संभावनाएं



' समय की धारा में बहते बहते
   हम आज यहां तक आये हैं 
   बीती सदियों के आँचल से 
   आशा के फूल,सजा लाये हैं
   हो मंगलमय प्रभात धरा पर
   मिटे कलह का कटु उन्माद ,
   वसुंधरा हो हरी - भरी, नित,
   चमके खुशहाली का प्रात ! '
मेरी कविता प्रत्येक मनुष्य के लिए शुभ कामना सन्देश स्वरूप है। स्वस्तिमय शब्द हों, उन्नत भविष्य हो, विश्व में शान्ति रहे इसी से समग्र मनुजता की विजय होगी। 

    स्त्री, समाज की आधी आबादी है। आधुनिक युग में स्त्री को एक ओर प्रगति के सोपान पर अग्रसर होने के सुअवसर मिले हैं तो साथ साथ अवरोधों के रोड़ों ने  स्त्रियों  के,  उठते कदम की कवायद को बार - बार स्तम्भित भी किया है। परन्तु स्त्री, युगों युगों से ऐसे प्रत्याघातों से लड़ती हुई, आज २१ वीं  सदी तक आ पहुँची  है। महिला लेखन भी स्त्री संघर्ष की लम्बी कहानी का एक हिस्सा है। महिला लेखन एकांतिक साधना है।  जिसकी  अटूट गाथा  इतिहास में दर्ज है। 

हम देखते हैं कि प्राचीन वेदों में प्रसिद्ध नारी पात्र , अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं। जिनमे अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी  रोमशा, इंद्राणी दि सुप्रसिद्ध हैं |

      गुप्त कालीन, मौर्य एवं बुद्ध के युग  से चलकर मध्य युगीन नारी के सामाजिक एवं व्यक्तिगत स्वातंत्र्य पर नियंत्रण बढ़ता गया। साहित्य सृजन इस के उपरान्त भी थमा नहीं। दक्षिण भारत की अंड़ाल ने कृष्ण प्रेम की प्रेम धारा बहायी।  आज भी दक्षिण भारत में श्रद्धा - भक्ति से अंडाल की पदावली गायी  जातीं हैं। 
कश्मीर में भक्ति रस से सभर स्त्री लिखित कविता लल्लेश्वरी योगिनी ने गायीं हैं  जो अमर हो गयीं  ! 
मीरां बाई के पद आज  न सिर्फ राजस्थान के रहे किंतु वे विश्व साहित्य की अनमोल  धरोहर हैं। कर्नाटक की अक्का महादेवी , महाराष्ट्र की संत मुक्ता बाई और जनाबाई और बंगाल की शारदा देवी माँ ने अपने अपने व्यक्तित्त्व से, वाणी की गंगा से जन मन की मलिनता को धोया है। 
अंग्रेज़ों के राज्य विस्तार ने भारत का  स्त्री - स्वातंत्र्य, घर की चारदीवारी के बीच, कैद कर दिया था। भीषण मानवीय हानि , उथल पुथल और विस्थापन के बाद, भारी क्षति से पीड़ित  सं १९४७ में भारत स्वतंत्र हुआ। श्री और संपदा का असहय ह्रास हुआ। अक्सर  युद्ध काल में स्त्री को ही अधिक भुगतना पड़ता है। 
अतः उस पाकिस्तान हिंदुस्तान विभाजन का दर्द , महिला लेखन में अमृता प्रीतम जैसी पंजाब की बेटी ने आंसू पिरोकर लिखी अपनी रचनाओं में पेश किया। ' अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ ' कवयित्री अमृता प्रीतम (१९१९-२००५) द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कविता है जिसमे १९४७ के भारत विभाजन के समय हुए पंजाब के भयंकर हत्याकांडों का अत्यंत दुखद वर्णन है।
स्वतंत्र भारत की महिलाएं न सिर्फ अपनी पारंपारिक भाषाओं में रचनाएँ कर रहीं  हैं किन्तु प्रवासी महिला अपने आवासीय प्रदेशों से और अन्य महिलाएं अपने प्रादेशिक भाषा के लेखन से अपनी पहचान बना रहीं हैं। 
आधुनिक समय में , कुछ भारतीय लेखिकाएं, अंतर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर रहीं हैं।  जैसे अमरीका में झुम्पा लाहिड़ी ! इन्होंने  बुकर पुरस्कार प्राप्त किया।  
 या अरूंधती राव की तरह वामपंथी और अपने खुले विचारों से लिखीं पुस्तकों से ये विश्व में कुतूहल का विषय बनी हुईं हैं। महिला लेखन प्रत्येक रूप में यथा संभव  जारी है। 
मेरे विचार : प्रत्येक महिला का ह्रदय वात्स्ल्य  भाव का अजस्र सिंधु सागर है। विश्व के प्रति , समाज के लिए और परिवार की ज़िम्मेदारियों के संग अपने व्यक्तित्व को विभिन्न खाकों में बांटते हुए २१ वीं सदी के आरम्भ में स्त्रियां,  बहु - आयामी जीवन जी रहीं हैं। 

आज का समय,  सेल फोन, फेसबुक, ब्लॉग , ट्वीटर जैसे अत्याधुनिक उपकरणों से सजे संचार माद्यमों से संचालित मशीनी युग का कालखण्ड है। बाज़ारवाद के फैलते, विश्व में मुनाफ़ाखोरी में बढ़त हुई है  और उद्योगों की बहुलता से सामाजिक परिवर्तन को द्रुत गति मिली है जिससे मानव जीवन में भारी बदलाव आया है।     स्त्री भी इस सत्य से प्रभावित हुई है और स्त्री लेखन में इन के प्रत्याघात अंकित हैं । 
      अक्सर स्त्री लेखन करतीं समस्त महिलाएं अपने व्यक्तिगत जीवन में से समय निकाल कर ही अपने लेखन को आकार - प्रकार  दे पातीं हैं। 


मैं इन महिलाओं से तादात्म्य स्थापित कर पाती हूँ चूंकि मैं भी अपनी पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवहारगत जिम्मेदारियां निभाते हुए लेखन कार्य से जुडी रही हूँ। 
सं. १९८९ से अमरीका में रहती हूँ और भारतीय समाज में हो रही तब्दीलियों  के साथ साथ, उत्तर अमरीका के समाज को नजदीक से देखा परखा है और उसी के बारे लिखा है।  
दोनों मुल्कों के नागरिकों के प्रति मेरे मन में  चिंता भी है और भविष्य के लिए फिर भी , शुभआशा  ही बलवती हुई है। 
विश्व में मनुष्य की प्रगति और उन्नति के प्रति मैं सदैव सजग रही हूँ। जो भी देखा है और अनुभवों के आधार पर  सीखा है उस से ही लेखन कार्य संपन्न किया है। 
हाँ यह  कह  सकती हूँ कि मेरा ब्लॉग लेखन मेरी साहित्य साधना का एक हिस्सा  रहा है। 
कविता संग्रह ' फिर गा  उठा प्रवासी ' , उपन्यास ' सपनों के साहिल ' देवदासी प्रथा पर आधारित, महिला उत्थान विषय पर  केन्द्रित हैं। 
अमरिकी  समाज में रहतीं महिलाओं के जीवन से जुडी कथाएँ और सर्वथा  भारतीय परिवेश में महिला की स्थिति दर्शाती कहानियाँ  मेरी तीसरी पुस्तक ' अधूरे अफ़साने ' कहानी संग्रह में समाहित हैं। साथ साथ विविध विषयों पे सामयिक आलेख, यात्रा विवरण , संस्मरण , शोध इत्यादी ब्लॉग लेखन में निरंतर उभरे हैं। 
जो महिलाऐं  साहित्य साधना से मुख नहीं मोड़ पातीं वे सतत सृजनशील रहतीं हैं। चाहे वे जिस किसी परिस्थिति में क्यों न रहें ! यह स्वभाव बन जाता है। 
मेरा ब्लॉग ' लावण्यम अंतर्मन ' विविध विषयों पर शोधपूर्ण आलेखों का संग्रह है। 
' लावण्यम अंतर्मन '  ब्लॉग पर कई अनोखे  विषयों की जानकारी लिए हुए आलेख पढ़ पायेंगें। 
कुछ महत्त्वपूर्ण विषय आपके साथ साझा कर रही हूँ।
१ ) यु. एन. ओ. UNO  में हिन्दी :   
http://www.lavanyashah.com/2011/09/blog-post.html 
२ ) प्रवासी भारतीय अमरीका में 
३ ) महिला दिवस 2013 : बलात्कार कैसे रोके जाएं? http://www.lavanyashah.com/2013/03/file-2013-2013.html
४ ) स्त्री सशक्तिकरण और द ग्लास सीलिंग’ = "शीशे की छत " कोर्पोरेट कल्चर पर आधारित आलेख 
http://www.lavanyashah.com/2010/09/blog-post.html
  कुछ अंश -    
 ग्लास सीलिंग मुहावरे के मशहूर हो जाने पर इस पर संशोधन भी हुए। संशोधनों के बाद यह भी पता चला है कि सन १९८४  में 'एड्वीक' पत्रिका के एक आलेख में, गे ब्र्यायनट ने सबसे प्रथम ग्लास सीलिंग मुहावरे का प्रयोग किया था । अब तो खोज विस्तृत होने लगी और पता चला कि, १९७९ में ह्यूलीट पेकार्ड कंपनी में कार्यरत केथरिन लाव्रेंस और मेरीएन श्र्च्रेइबेर नामक दो महिलाओं ने इसी मुहावरे को समझाते हुए कहा था कि, बाहरी तौर पर महिलाओं की प्रगति भले सुचारू रूप से चलती हुई दिखलाई दे परंतु इस प्रगति के अवरोध में अदृश्य, पारदर्शक अवरोध खड़े किये जाते हैं, जो महिला कर्मचारी के प्रगति, प्रमोशन और सर्वोच्च पद पर आसीन होने के मार्ग में बाधाएँ व रुकावट उत्पन्न करते हुए हर स्थान पर हर प्रगति के रास्तों पर अवरोध उत्पन्न करने के लिए रखे जाते हैं ।
अमरीका में ऐसे एकल परिवारों की संख्या में वृद्धि हो रही है जहाँ परिवार का ' मुखिया' = माने हेड ऑफ़ द फ़ेमेली ' एक स्त्री पात्र है सन १९७० से ऐसे परिवारों की संख्या में निरंतर बढ़ावा हो रहा है और ऐसे परिवार अमरीका में बड़ी तादाद में हैं परंतु वे अकसर ग़रीबी की रेखा के नीचे रहते हैं। 
ज़्य़ादादातर, ऐसे स्त्री मुखिया वाले एकल परिवार की महिलाएँ तलाकशुदा होतीं हैं या इनमें से कई बिन ब्याही माएँ हैं । सन` २०००  की जन गणना के आँकड़ों के अनुसार ११ % प्रतिशत परिवार अमरीका में ग़रीबी की हालत में जी रहे हैं जबकि २८  प्रतिशत एकल मुखिया स्त्री वाले परिवार ग़रीबी की हालत में जीने को बाध्य हैं। बिनब्याही माँ अकसर कच्ची या कम उम्र में माता बनी हैं। पढाई शिक्षा सिर्फ़ स्कूल तक सीमित होते ना उनके पास कोई डिग्री है ना कोइ ऐसा हुनर है जिस के तहत उन्हें अच्छा रोज़गार प्राप्त हो सके इस कारण ऐसी महिलाओं को नौकरी या पेशा भी ऐसा ही मिल पाता है जो उन्हें कम आय ही प्राप्त करवाता है। बच्चों की परवरिश के लिए भगौड़े पति या जिनके साथ उनका शारीरिक सम्बन्ध रहा वे व्यक्ति बच्चे की आवश्यकता पूर्ति के लिए पैसा नहीं देते या तो बहुत कम हिस्सा अपनी सीमित आय में से दे पाते हैं। बच्चे के लिए प्राप्य ऐसी धनराशि को चाईल्ड सपोर्ट कहते हैं। अमेरीका में ' तलाक' ही धन की समस्या या इकॉनोमिक दीवालियेपन का एक प्रमुख कारण है।
अंत में महिला लेखन की चुनौतियों को हम महिलाएं स्वीकार करते हुए संघर्षरत रहें और हमारे ईमानदारी से परखे प्रसंग, अनुभवों से आगामी पीढ़ी का मार्ग दर्शन करने में हम धैर्य एवं साहस के साथ निरंतर आगे बढ़ें यही कृत संकल्प करते हुए मानव कल्याण की भावना से पूरित सर्वोदय के लिए प्रयासरत रहें यह मंगल कामना करें। 
भारत की बेटी आगे बढ़े। अंतरिक्ष के द्वार कल्पना चावला ,  सुनीता विलियम्स जैसी भारत की बिटिया के लिए अब खुले हैं।   
उस तरह  प्रत्येक  महिला के लिए भी सीमाऐं  ना ही ब्रह्माण्ड के विस्तृत छोर  तक रहीं हैं ना ही स्त्री के कोमल ह्रदय की कंदराओं में वे कैद रहे पाएंगीं ।
नारी मन की भावनाओं को मुक्तांगण चाहिए ! उन्हें मुक्त धारा में बहने दें। पयस्विनी अमृत धारा ने ही मानव शिशु को अमृत पान करवाया है और विष - पान से बचाया  है। अत : महिला लेखन, स्त्री सृजन सृष्टि का नियामक अधिनियम एवं बल है और सदैव रहेगा।  इसे मुक्तगगन में विहरने दो ! 
कविता : कौन यह किशोरी ?
चुलबुली सी, लवँग लता सी,

कौन यह किशोरी ?

मुखड़े पे हास,रस की बरसात,

भाव भरी, माधुरी !

हास् परिहास, रँग और रास,

कचनार की कली सी,

कौन यह किशोरी?

अल्हडता,बिखराती आस पास,

कोहरे से ढँक गई रात,

सूर्य की किरण बन,

बिखराती मधुर हास!

कौन यह किशोरी?

भोली सी बाला है,

मानों उजाला है,

षोडशी है या रँभा है ?

कौन जाने ऐसी ये बात!

हो तेरा भावी उज्ज्वलतम,

न होँ कटँक कोई पग,

बाधा न रोके डग,

खुलेँ होँ अँतरिक्ष द्वार!

हे भारत की कन्या,

तुम,प्रगति के पथ बढो,

नित, उन्नति करो,

फैलाओ,अँतर की आस!

होँ स्वप्न साकार, मिलेँ,

दिव्य उपहार, बारँबार!

है, शुभकामना, अपार,

विस्तृत होँ सारे,अधिकार!

यही आशा का हो सँचार !

-श्रीमती  लावण्या दीपक शाह 

परिचय :   श्रीमती लावण्या दीपक  शाह

 सुप्रसिद्ध कवि स्व० श्री नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं और वर्तमान में  अमेरिका में रह कर अपने पिता से प्राप्त काव्य-

परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

समाजशास्त्र और मनोविज्ञान विषयों में बी.ए. (आनर्स) की उपाधि प्राप्त 

लावण्या , भारत के  सुप्रसिद्ध पौराणिक ' जयगाथा ' पर आधारित 

महाग्रंथ का दूरदर्शन पर  प्रसारित स्वरूप टीवी धारावाहिक "महाभारत" के 

लिये  कुछ दोहे लिख चुकी हैं। 

भारतीय दूतावास न्यू यॉर्क के निमंत्रण पर संस्था में  कविता - पाठ किया। 

उत्तर अमेरिका में इनकी लिखीं कविताएँ  और स्व० नरेन्द्र शर्मा और 

स्वर- साम्राज्ञी लता  मंगेशकरजी से  जुड़े संस्मरण,  अमरीका के 

' स्वरांजलि रेडियो कार्यक्रम '  लिंक : 
http://www.sopanshah.com/lavanya/Swranjali_LavanyaShah_1.mp3

 एवं ' सलाम नमस्ते ' रेडियो कार्यक्रम   डलास  शहर , टेक्सास प्रांत अमेरिका से  प्रसारित हुए हैं।

स्व. गायक मुकेशजी पर आधारित संमरणात्मक रेडियो वार्ता यूरोप के 

नैधरलैंड प्रांत से प्रसारित हुए ।  


वे , उत्तर अमरिका की '  अंतर राष्ट्र्रीय हिन्दी समिति ' द्वारा प्रकाशित मुख 

पत्रिका ' विश्वा ' में उप - सम्पादिका हैं। लिंक  :


कोलम्बस ओहायो शाखा में :


President — Smt. Lavanya Shah


कविता पुस्तक  " फिर गा उठा प्रवासी "  इन्होंने अपने पिता जी की 

प्रसिद्ध कृति " प्रवासी के गीत "  को समर्पित की हैं। 

उपन्यास ' सपनों के साहिल ' का प्रकाशन हो चुका है। उपन्यास का 

दीर्घकालीन फलक  सन १९२० के भारत से चलकर  स्वतन्त्र भारत की 

कहानी से जुड़ा २१ वीं सदी तक ४ पीढ़ियों की गाथा को  समेटे हुए है। 

लावण्या जी की प्रकाशनाधीन पुस्तकें : 

१) भारत के अमर युगल पात्र 

२ ) सुंदरकांड : भावानुवाद 

३ ) अधूरे अफ़साने - कथा संग्रह-  इत्यादी 


लावण्या दीपक शाह के ब्लॉग : 

१ ) अंतर्मन - अंतर्मन - लिंक : 


२ ) लावण्यम ~ अंतर्मन 


मेसन , ओहायो उत्तर अमरीका से