Sunday, July 26, 2015

“ आमने-सामनेः लावण्या बनाम घुघूती बासुती ”


July 11, 2008 | Tarun

आमने-सामने के एपिसोड ३ में आज सवालों के जवाब देने के लिये आमने सामने हैं - लावण्या जी और घुघूती बासुती जी। आज से एक परिवर्तन ये किया है कि नो मोर वोटिंग, सिर्फ और सिर्फ चिट्ठाकारों के मजेदार जवाबों का लुत्फ।
अगर आप पहली बार इसे पढ़ने आये हैं तो जरूर सोच रहे होंगे ये भला क्या है? तो आपको ये सब इन लिंकों से पता चल जायेगा। आमने-सामने के बार में जानने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये
आमने-सामने एपिसोड 1: फुरसतिया बनाम उड़नतश्तरी
आमने-सामने एपिसोड 2: पंगेबाज बनाम दुर्योधन की डायरी
अब शुरू करते हैं सवाल-जवाबों का सिलसिला, जवाब थोड़ा लंबे जरूर हैं, लेकिन हैं मजेदार।
प्रश्न १: आपकी नजर में नारी के सौलह श्रृंगार क्या होने चाहिये?
लावण्याः अब पूरे सोलह गिनवाने पडेँगे क्या !! :-)) अच्छा चलिये, इन्हेँ एक पँक्ति मेँ खडा हुआ देखेँ ..ना कि कौन सा गुण पहले हो और कौन सा बाद मेँ -
१) नारी का सबसे प्रथम आभूषण मृदुता लिये मिठास
२) कोमलता
३) लज्जा
४) शील
५) विनय
६) सौम्यता
७) सादगी
८) शालीनता
९) व्यवहार कुशलता
१०) स्वछता
११) बडा दिल
१२) मुस्कान
१३) खाना बनाने मेँ कुशलता
१४) सँगीत प्रेम
१५) श्रध्धा (अँध श्रध्धा नहीँ! )
१६) सर से पैर तक का सारा बनाव सिँगार :)
घुघूती बासुतीः सोलह ! कुछ अधिक नहीं हैं क्या ? मुझे तो केवल स्नान,बाल एक चुटिया में गूँथना व उन्हें एक जूड़े में खोंस देना,टैल्क,कोई भी वस्त्र पहन लेना, घर से बाहर जाना है तो साड़ी अपने गिर्द घुमाकर उसमें कैसे तो भी समाना, बिन्दी व बहुत हुआ तो लिपस्टिक लगा लेने का पता है। हाँ कानों व गले में कुछ स्थाई या अस्थाई रूप से टाँगा भी जा सकता है। कितने हो गए ? शेष के बारे में तो आप ही मुझे बताएँ।
हाँ, मैं पुरुष के श्रृंगार के बारे में अधिक बता सकती हूँ। तो भाई, नाक, कान में छेद करवाकर कुछ भी पहन डालिए। मैंने सेफ्टीपिन भी पहने देखा है। बाल कुछ चिपकाऊ तत्व से चिपकाकर उन्हें किसी मॉडर्न आर्ट की शक्ल दे डालिए। शेविंग क्रीम, आफ्टर शेव, पावडर, सुगन्धी, (यह पुरुषों के लिए आवश्यक है,cause they sweat and stink easily !deodourant too will do) टाई आदि से सुसज्जित होइए। यदि युवा हैं तो एक बाइक व हैल्मेट को भी बाहर निकलते समय अपने श्रृंगार का हिस्सा बनाइए। हाँ स्नान को मत भूलिए।
प्रश्न २: “साड़ी बिच नारी है कि नारी बिच साड़ी है, साड़ी ही की नारी है कि नारी ही कि साड़ी है”, स्कूल के दौरान हम क्या समझे थे याद नही, आज आप अपने तरीके से समझायें आखिर ये पहेली क्या है?
लावण्याः अरे ये किसीने गीत की तुकबँदी रच डाली है ..बेचारे मर्द क्या जानेँ ६ वार की साडी या कभी ९ वारी साडी को लपेटना क्या होता है!
” सारी इज़ अन आर्ट , व्हेर अ फीमेल बीकम्ज़ एन आर्ट व्हेन शी वेयरज़ साडी ! ”
पर सच कहूँ तो नारी की शोभा सबसे ज्यादा साडी मेँ ही निखरती है ! कहाँ से स्त्री की शारिरीक सुँदरता शुरु होती है और कहाँ साडी उस सौँदर्य को उभारती है उसे पृथक्क करना कठिन है इसिलिये तो आँचल जैसे शब्दोँ का अन्य भाषाओँ मेँ पर्याय ही नहीँ मिलता !
दिये को साडी की ओट मेँ छिपाये ले जाती साँध्य सुँदरी हो या शिशु को आँचल से ढाँपे दूध पिलाती माँ या माँ का आँचल कसके थामे, स्कूल जाते नन्हे बहादुर बच्चे, या दीदी के आँचल से भोजन के बाद हाथ पोँछता भैया या बीमार देवर को अपने आँचल से पँखा झलती भाभी …है किसी अन्य तहजीब मेँ ऐसे द्रश्य ?
ये तो बस भारतीय स्त्री गरिमा की जीती जागती यशोगाथा है और समाज का इतिहास भी…. जहाँ किसी द्रौपदी के चीर हरण को सिर्फ श्री कृष्ण ही रोक पाते हैँ और बची रहती है नारी की अस्मिता अक्षुण्ण् .. और ..तब, बस गीत याद रह जाते हैँ ….
घुघूती बासुतीः यह भी क्या स्कूल में पढ़ाया जाता था? हमें तो सस्ते में निपटा दिया हमारे अध्यापकों,अध्यापिकाओं ने!किसी ने यह पढ़ाया ही नहीं। मैं स्कूल से फीस वापिस करने को कहूँगी।
वैसे यह साड़ी और नारी की समस्या में कौन किससे अधिक परेशान है, नारी साड़ी से या साड़ी नारी से पता नहीं। अपनी कहूँ तो मैं साड़ियों से व साड़ियाँ मुझसे परेशान हैं और हम दोनों से परेशान है हमारा धोबी। उसे ६ मीटर को इस्तरी करना पड़ता है, मुझे उसे लपेटना पड़ता है और उन्हें मुझे अपने में लपेटना पड़ता है। सो सभी इस साड़ी की लपेट में आ जाते हैं। हाँ मुझ जैसी गृहणी के साड़ी पुराण के लपेटे में पति भी आ जाते हैं, उन्हें साड़ियाँ खरीदनी व उपहार देनी पड़ती हैं। यदि आप यह अंग्रेजी वाली बिच की बात कर रहे हैं तो साफ बता दूँ कि हमारी अंग्रेजी वाली बिच को साड़ी से कोई प्यार नहीं था। प्यार तो मुझे भी नहीं है। यह तो एक बिनसिला कपड़ा उस जमाने की निशानी है जब सिलाई मशीन का आविष्कार नहीं हुआ था और न ही जिम का। उस जिम नामक पुरुष की बात नहीं कर रही मैं। वह वजन घटाकर साड़ी के अलावा भी किसी भी सिले वस्त्र में समाने में सहायता करने वाला जिम। सो साड़ी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि ४० किलो से कम वजन वाली बिटिया या प्रियतमा के लिए खरीदो और वह ७० किलो की होकर भी पहनकर इतरा सकती है। क्या धोती (जो साड़ी का ही गरीब चचेरा भाई है)के सिवाय कोई और वस्त्र आप ३० या ४० किलो वजन बढ़ाकर भी पहन सकते हैं?
हमारी टिप्पणीः घुघूती जी, हमारे ख्याल से ये किसी अलंकार का उदाहरण था, उस अलंकार का हिन्दी नाम तो याद नही लेकिन वो कन्फ्यूजन या भ्रम टाईप के लिये होता है। हिन्दी के मास्टर मास्टरनी शायद सही नाम बता पायें, अगर वो इसे पढ़ेंगे तब।
प्रश्न ३: दूसरे एपिसोड के खिलाड़ी पंगेबाज, पंगा लेना चाहते हैं ये पूछकर कि “सिंदूर का रंग लाल कयो होता है हरा क्यो नही?”
लावण्याः शुक्रिया पँगेबाज जी :) ,सिँदुर का रँग लाल होता है क्यूँकि अन्य सारे पुरुष, उसे देखेँ तो सही पर दूर ही रुक जायेँ - वो भी अदब से !:) और सिँदुर बनता है गँधक जो कि स्त्री तत्त्व है , पार्वती का स्वरुप है उसके पारे यानि कि शिव तत्त्व के पौरुषेय से मिलन को सिँदुर कहते हैँ और यही सुहागिन का प्रतीक बना हमारे समझदार ऋषि मुनियोँ का सार — और हर नारी के लिये प्रसाद !आज २१ वीँ सदी मेँ, नारी सिँदुर लगाये या ना लगाना चाहे ये सर्वथा दूसरी बातेँ हैँ ..पर आशीर्वाद , आज नहीँ सदियोँ पहले मिल चुका है
घुघूती बासुतीः अब पंगेबाज हैं तो पंगा तो लेंगे ही ! वैसे आपको हम यह बता दें कि हमने उन्हें नेट पर जहाँ जहाँ नाम बँटते हैं हर उस जगह पर जाकर पंगेबाज नाम को हथिया लेने की बढ़िया सलाह दी थी। शायद उन्हें याद हो। अरे, मुझपर गुस्सा होकर आलू प्याज फेंकने ही हैं तो बड़े साइज के फेंको। मैंने तो केवल नाम हथियाने की सलाह दी थी, पंगे, वह भी हमसे,लेने की सलाह नहीं दी थी।
भाई पंगेबाज,यह सिन्दूर के रंग का रहस्य तो हमें भी पता नहीं। सिन्दूर लाल तो कतई नहीं होना चाहिए। आपने क्या कभी सिन्दूरी रंग नहीं देखा? वह लाल नहीं हनुमान जी के रंग का होता है। बिहार में मैंने बहुत सी स्त्रियों को उस रंग का असली सिन्दूर लगाते देखा है। यह लाल रंग का सिन्दूर तो मुझे बंगालिनों की कोई चाल नज़र आता है। शायद कुछ अधिक ही राजनीति से प्रभावित होकर उन्होंने लाल रंग का सिन्दूर प्रचलित कर दिया। क्या नाम है वह बड़ी बिंदी वाली कम्यूनिस्ट बहन का(वृंदा कारत),उनसे पूछना पड़ेगा।
वैसे यह पुरुषों की कोई गहरी चाल ही मुझे लगती है जो स्त्रियों पर लाल सिंदूर थोप दिया। देखिये ना कितने होशियार है। लाल सिन्दूर देखकर कोई भी भाई किसी विवाहिता पर अपना समय बर्बाद न करे,इसलिए लाल झँडी सा हमारे सिर पर रख दिया। पुरुषों के भाईचारे की इससे बड़ी मिसाल कोई नहीं मिल सकती। अब यदि हरा होता तो सभी सोचते कि हरी बत्ती जल रही है और अपना अमूल्य समय अविवाहिताओं पर ही ना लगाकर विवाहिताओं पर भी बर्बाद करते।
मेरा वश चले तो मैं तो चाहती कि पुरुष भी सिन्दूर से मांग भरें। परन्तु इसमें कुछ प्रैक्टिकल कठिनाइयाँ हैं। विवाह तक तो जैसे तैसे पुरुष अपने बाल किसी तरह दवा आदि खाकर,बत्रा क्लिनिक जाकर, सहेज कर रखते हैं, परन्तु एक बार शादी हुई नहीं कि फिर गंजेपन से कोई परहेज नहीं। सो जिनका सारा सिर ही एक मांग में परिवर्तित हो गया हो वह सिन्दूर भला कहाँ भरेगा?
प्रश्न ४: अच्छी ही नही बल्कि लंबी लंबी बातें (पोस्ट) बनाने वाले फुरसतिया यानि अनुप जी का सवाल है कि “आपको कैसे पति/आदमी /पसन्द हैं अच्छा खाना बना लेने वाले या अच्छी बातें बना लेने वाले?”
लावण्याः अनुप जी - शुक्रिया, अगर इन दो बातोँ को ध्यान मेँ रखती तब तो दीपक , जो मेरे पति हैँ , उनको कैसे पसँद करती ? :-) ना ही वे खाना बनाते हैँ नाही लँबी बातेँ ही बनाते हैँ :) एक अच्छे पति का, मेरे मत मेँ , सबसे पहले, एक अच्छा और सँवेदनाशील इन्सान होना ज्यादा जरुरी है।
घुघूती बासुतीः अरे,यह भी कोई पूछने की बात है। बिल्कुल अच्छी बातें बना लेने वाले ही पसन्द हैं। खाना बनवाने के लिए तो हम अच्छी बातें बना लेने वाले से अच्छी बातें बनाकर खानसामा भी रखवा सकते हैं परन्तु अच्छा खाना बनाने वाले से अच्छी बात बनाने वाला तो नहीं रखवा सकते न!
प्रश्न ५: उड़नतश्तरी यानि समीर जी को तो अभी तक नही मिला लेकिन ये जानना चाहते हैं, “यदि आपको जिन्न मिल जाये और एक वर (वरदान) मांगना हो, तो क्या मांगियेगा और क्यूँ?”
लावण्याः शुक्रिया समीर भाई - भई व्व्वाह!! …कमसे कम..इस एपिसोड खेलने मेँ ऐसा प्रश्न मिला जिससे कुछ पल के लिये ही सही, ऐसी दुनिया मेँ खो गयी जहाँ कोयी दुखी, भूखा, प्यासा या लाचार नहीँ ..सब तरफ बस खुशियाँ ही खुशियाँ हैँ ..बिलकुल जैसे आप हँसानेवाली पोस्ट लिखते हैँ उसे पढकर खुलकर हँसी आती है वैसे! मैँ जिन्न से ऐसी दुनिया का सच होना माँगूँगी ….” वो सुबहा कभी तो आयेगी ………वो सुबहा कभी तो आयेगी “………………
घुघूती बासुतीः ‘मिल जाए तो’ का क्या मतलब? हमें तो यह जिन्न ३० साल पहले ही मिल गया था। जब हमारा कन्यादान हुआ था तो आप क्या सोचते हैं हम बस दान ही हुए चले जा रहे थे ? अरे भाई मेरे, हमें जब ‘वर’ दान मिला तभी तो हम दान हो गए। अन्यथा क्या ऐसे ही दान में अपना बलिदान कर देते? अब देखिए ना उस जिन्न ने कैसा वर दिया कि आज तक हम मांगे चले जा रहे हैं और ‘वर’ हमें देता ही चले जा रहा है। यह कम्प्यूटर जिसपर हम ठकाठक अक्षरों को टंकणाएँ जा रहे हैं, यह नेट का कनैक्शन, कोई जिन्न थोड़े ही दे गया है, वह तो बस ‘वर’ दे गया था और हम वर माँगते जा रहे हैं उस ‘वर’ से जिससे हमने स्वयंवर रचाया था। अब ऐसे ‘वर’ के होते और क्या वरदान चाहिए?
तो ये था इन दो धुरंधरों महिला चिट्ठाकारों के सवाल जवाब का सिलसिला, आशा है आपको मजा आया होगा।
अब आप भी अगर इसमें हिस्सा लेना चाहते हैं तो टिप्पणी में वही ईमेल छोड़िये जिसे आप रेगुलर चेक करते हैं और उसके बाद हमारी मेल का करिये इंतजार क्या पता अगले एपिसोड में आप का ही नंबर हो।

“आमने-सामनेः लावण्या बनाम घुघूती बासुती”

Tuesday, March 10, 2015

नोर्थ केरोलाईना, साउथ कैरोलाईना : यात्रा / भाग - १

 यात्रा : नोर्थ केरोलाईना, साउथ कैरोलाईना : भाग - १ 
अमरीका के पहले कभी न देखे हुए प्रांत नोर्थ केरोलाईना  और साउथ कैरोलाइना को देखा। अटलांटिक महासागर के किनारे ~~ 

 साउथ कैरोलाईना और नार्थ कैरोलाइना प्रांत की यात्रा पर हम २९ लोग अपनी अपनी गाड़ी से अमरीका की दक्षिण पूर्वीय दिशा में बसे इलाके की और बढ़ते जा रहे थे। मेरे पति दीपक जी की मित्र मंडली के सारे साथी  एवं उनके परिवार के सदस्य हमारे  संग थे। ये सभी मित्र हर इतवार को टेनिस खेलते हैं।  एक बार इन्होने सुझाया कि ' क्यों न हम लोग इकठ्ठे यात्रा पर चलें ? ' जब सब ने सहमति जताई की अब की गर्मियों की छुट्टी होगी तब अवश्य जायेंगें तो यात्रा का कार्यक्रम निश्चित हो गया। तो बस , उन्हीं सब के संग हम लोग यहां आये हुए थे।
इस ग्रूप में  ३, या ४ डाकटर हैं और सभी, उच्च शिक्षा प्राप्त नौकरीपेशा लोग हैं।                                        अधिकाँश दक्षिण भारत के भिन्न भिन्न प्रांतों से हैं ! कोई बेंगलूर से है तो कोई चैन्नई से ! कोई विशाखापटटनम से तो कोई पॉन्डिचेरी से ! कोई तिरुपत्तनम से तो कोई त्रिवेंद्रम से तो कोई केरल से है ! इनमे से कुछ ' हिन्दी भाषा ' बोल , समझ लेते हैं और कुछ बिलकुल नहीं जानते !इसी तरह , अमरीका में भारत के हरेक इलाके से आया व्यक्ति आपको मिल जाएगा। 

               हम जहां रहते हैं उस ओहायो प्रांत से,  दक्षिण पूर्व अमरीका की दिशा में यात्रा करते हुए हम लोग यहाँ पहुँचे तो देखा कि अमरीका में हरेक प्रांत में उगे हुए पेड़ ,पौधे सर्वथा अलग किस्म के होते हैं।
           दक्षिण अमेरिका की आबोहवा में भी काफी फर्क महसूस हुआ। अमरीका के ५२ प्रांतों में कुछ के नाम एक समान हैं। नाम एक सा है जिनके आगे ' साउथ ' और ' नार्थ ' जोड़ दिया गया है। उदाहरणार्थ - साउथ डकोटा और नार्थ डकोटा  ! यह दोनों डकोटा  प्रांत ,  विशाल अमरीकी भूखंड के उत्तर मध्य दिशा में स्थित प्रांतों के नाम हैं।
        हमें , नार्थ कैरोलाइना प्रांत की हवा में हमारे ओहायो प्रांत से अधिक नमी महसूस हुई और मौसम भी ज्यादह तापमान लिए ज्यादह गरम लगा । सूर्य की किरणें भी यहाँ अत्यंत प्रखर थीं ऐसा लगा  ! नार्थ कैरोलाइना प्रांत , साउथ कैरोलाइना से उत्तर दिशा में है।  
 यह प्रांत हमारे प्रांत से जो काफी उत्तर दिशा में स्थित है , ग्रीष्म ऋतु में बहुत अधिक गर्म हो जाता है और उमस भरे दिन के बाद जोरों की बरखा भी यहां अक्सर होती है। 

अट्लाण्टिक महासागर के किनारे, मुख्य प्रदेश से बाहर निकला हुआ एक  द्वीप है जिसका  नाम है ' हिल्टन हेड आइलैंड ' वह हमारी यात्रा का लक्ष्य था।  हम लोगों ने ६ , ७ परिवारों ने अटलांटिक महासागर के किनारे बसे इस पर्यटन स्थल पर किनारे से सटे हुए ' रिज़ॉर्ट ' में ६ दिनों के लिए एक कॉटेज रिज़र्व कर रखा था। वहीं हमे आगे जाकर पहुंचना था। एक पुल या  ब्रिज पार करते ही एक अलग दुनिया में ये मार्ग ले चलता है।  सागर का जल हिल्टन हैड में मटमैला है और सागर के साहिल पे बिखरी रेत भी हमारे जुहू / बंबई जैसी ही लगी। पूर्व के मुकाबले पश्चिम अमरीका और पेसेफिक महासागर अधिक स्वच्छ , गहरे पारदर्शक फिरोजी फेनिल जल से प्लावित हैं और एक  अलग किस्म के रंग की  आभा लिए सुदूर पश्चिम में धूप में चमकते रहते हैं ।
      अमरीका के दक्षिणतम भूभाग में स्थित ' गल्फ ऑफ़ मेक्सिको ' और  करेबीयन समुद्र भी अलग रंगत लिए अटलांटिक और पेसेफिक महासागरों से छोटे होने से उन्हें समद्र और ज़मीन से घेरे हुए सागर को ' गल्फ ' कहा जाता है। मन और नयन ये सारे विलक्षण और अद्भुत नजारे कैद करने में व्यस्त है। साथ है सेल फोन कैमरा ! जी हाँ ! अब तो सेल फोन में भी कैमरा है तब चित्र लिए बिना  यात्रा अधूरी न रह जाएगी ? इसलिए हमने भी जी भर कर चित्र लिए। 
             खैर ! अभी तो हम नार्थ कैरोलाइना तक ही सफर में पहुंचे थे।  इसी नार्थ कैरोलाइना प्रांत के ' एशविल ' नामक सुन्दर शहर में हमें रूकना था।  यह हमारी यात्रा का प्रथम चरण था।              अमरीका के अत्यंत धनाढ्य वेंडरबिल्ट परिवार का  ८,००० एकड़ ज़मीन पर फैला हुआ भव्य , ग्रीष्म कालीन आवास है जिसका नाम है '  बिल्टमोर एस्टेट  ' ! यह  उत्तर अमरीकी भूखंड का, सब से विशालतम, नीजी आवास है।
3 people horseback riding on grounds
Walled Garden

कुछ वर्ष पूर्व बाहर से इस आलीशान आवास की बस एक झलक देखकर, हम अपनी एक यात्रा के दौरान आगे बढ़ गए थे।  परन्तु इस बार हमने, बाकायदा , टिकट खरीद कर इस विशेष आवास को जी भर कर देखना निश्चित क्या था। जिन पहाड़ियों पर ' बिल्टमोर ' बसा हुआ है उन पहाडियों  को ' ब्लू - रीज़ ' माउंटन ' कहते हैं।
चित्र में -- बिल्टमोर एस्टेट के प्रवेश द्वार पर हम --













बाहर आपके स्वागत के लिए फूल मुस्कुरा रहे हैं। 

Lagoonview winter snow

अब भीतरी कक्ष का दृश्य : सुंदर लकड़ी का काम और भित्ती चित्र भी देखें - 
Chair in front of the fireplace
अधिक जानकारी के लिए , कृपया देखें यह लिंक : 
http://www.biltmore.com/
आगे क्रमश : ~~ 

Saturday, January 17, 2015

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई 
रूठ कर रात बन्नो भी नींद में खोई हुई 

उसने कहा था ' आ जाऊंगा ईद को  
माहताब जी भर देखूंगा, कसम से।'
 फीकी रह गई ईद, हाय, वो न आये 
सूनी  हवेली,सिवईयें  रह गईं अनछुई !

नई दुल्हन का सिंगार फीका बोझिल गलहार  
डूबते आफताब सी वीरां,फीकी, ईद की साँझ। 
अश्क सूखे इंतज़ार करते नैन दीप अकुलाए थे 
मोगरे के फूल पर सोई हुई थी चांदनी उस रात !
- लावण्या 

Saturday, October 18, 2014

आकर्षण करोति इति श्रीकृष्ण

ॐ 
हरी भक्ति गंगा 
~~~~~~~~~~~~~~~~
आकर्षण करोति इति श्री कृष्ण 
कालो वा कारणम राज्ञो 
नमो भगवते तस्मै 
नारायणं नमस्कृत्यम
नारायणं सुरगुरुं जग्देकनाथं 
सत्यम सत्यम पुन: सत्यम II
   वामन पुराण में महाविष्णु नारायण के स्वरूप का वर्णन है I ईश्वर के विविध आयुध जो वे सदैव ग्रहण किये रहते हैं उनमे से एक सुदर्शन चक्र भी है I इसे कालचक्र भी कहते हैं I सुदर्शन चक्र छ: नुकीले नोकों वाला तीक्ष्ण आयुध हैI जिसके छ : विभक्त भाग छ : ऋतुओं के द्योतक हैं I 
१२ निहित हिस्से १२ देवताओं, अग्नि, सोम, मित्र, वरुण इंद्र, इन्द्राग्नी, वायु, विश्वदेव, प्रजापति व धन्न्वंतरी इत्यादि का प्रतिनिधित्व करते हैं I चक्र का मध्य भाग वज्र धातु से बना है जिसके गुण हैं भृवि माने समता,
भग माने तेज, 
निर्देश माने गति और सम्पदा ! सुदर्शन चक्र की हर नोक पर " सहस्त्रात हुं फट " अक्षर लिखे हुए हैं I विभिन्न कोणों में नारी शक्तियों का निवास है जिसका वर्णन इस प्रकार है ..
१ ) योगिनि - शक्ति क्रिया जो परिपूर्ण है 
२ ) लक्ष्मी - लक्ष्य प्राप्ति की शक्ति जो परम सत्य का                    द्योतक है।  
३ ) नारायणी - सर्वत्र व्याप्त महाशक्ति 
४ ) मुर्धिनी - मस्तिष्क रेखा से रीढ़ की हड्डी तक व्याप्त शक्ति 
५ ) रंध्र - ऊर्जा की वह गति जो सूक्ष्मतर होती रहती है वह 
६ ) परिधि - ' न्र ' शक्ति का स्वरूप 
७ ) आदित्य - तेज जो कि प्रथम एवं अंतहीन है 
८ ) वारूणी -चतुर्दिक व्याप्त जल शक्ति जिस के कारण सुदर्शन की गति अबाध है 
९ ) जुहू - व्योम स्थित तारामंडल से निस्खलित अति सूक्ष्म , ज्योति शक्ति व गति 
१० ) इंद्र - सर्व शक्तिमान 
११ ) नारायणी - दिग्दिगंत तक फ़ैली हुई पराशक्ति ऊर्जा या कुंडलिनी शक्ति 
१२ ) नवढ़ा - नव नारायण , नव रंग, नव विधि की एकत्रित शक्ति  स्वरूप ऊर्जा 
१३ ) गंधी - जो पृथ्वी तत्व की भांति चलायमान है 
१४ ) महीश - महेश्वर में स्थित आदि शक्तियाँ 
Maha Sudarshan Jaap & Yagya

आकार : सुदर्शन चक्र का व्यास सम्पूर्ण ब्रह्मांड तक व्याप्त होकर उसे ढँक सकने में समर्थ है और इतना सूक्ष्म भी हो सकता है कि, वह एक तुलसी दल पर भी रखा जा सकता है I
सुदर्शन प्रयोग व् महत्ता  : 
१ ) गोवर्धन परबत उठाने के प्रसंग में श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत के नीचे सुदर्शन चक्र को आधार बना कर रखा था I
२ )  शिशुपाल का वध इसी सुदर्शन चक्र से किया गया था I 
३ ) जयद्रथ वध के समय सुदर्शन चक्र का प्रयोग सूर्य को ढँक कर सूर्यास्त करने में हुआ था I

४ ) अर्जुन ने जो दीव्यास्त्र महाभारत युध्ध के समय प्रयुक्त कीये उन बाणों के घने आवरण को श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र  आधार देकर उन्हें अभेध्य कर दीये थे I 
५ ) राजा अम्बरीष पर दुर्वासा ऋषि क्रोधित हुए तब श्रीकृष्ण ने, विष्णु रूप से दुर्वासा ऋषि पर सुदर्शन चक्र से प्रहार किया था I 
६ ) नाथ सम्प्रदाय के परम तेजस्वी  महागुरु गोरखनाथ जी ने अपनी शक्ति से 
     सुदर्शन चक्र को स्तंभित कर दिया था I 
सामवेद में उल्लेख किया गया है कि, जब आहत और अनाहत ऊर्जा तरंगें 
एक साथ बहने लगतीं हैं उन्हें ' वासुदेव ' कहते हैं I 
श्रीकृष्ण : श्रावण अष्टमी को श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ था I श्री कृष्ण के मामा कंस ने अपनी बहन देवकी व जीजा वसुदेव जी को कारागार में कैद कर रखा था उसी काल कोठडी में आंठवें पुत्र रूप में परमात्मा नारायण ने या माहाविष्णु ने श्रीकृष्ण स्वरूप में आगमन किया था I 
राजा उग्रसेन व उनकी महारानी पवनकुमारी को एक दानव से कंस पैदा हुआ था I इस आसुरी सता का अन्य पापात्माओं सहित नाश करने के लिए ही ईश्वर का धरती पर पूर्ण अवतार रूप में एवं  जगत का उद्धार करने के लिए , संतों को सुख पहुंचाने के लिए, श्री हरि का  आगमन हुआ I  पिता वासुदेव  बाबा ने मध्य रात्रि में आंधी तूफ़ान और बरखा  बौछारों के बीच बालक कृष्ण को यमुना पार करवा कर नन्द जी  भारी ह्रदय से छोड़ दिया था। 
 
    महात्मा गर्ग ऋषि ने वासुदेव की दुसरी पत्नी रोहिणी व देवकी के पुत्रों का नामकरण किया I ज्येष्ठ भ्राता बलराम आदिशेष के अवतार हुए और नन्हे बाल कृष्ण ! रोहिणी जी व नवजात शिशुओं  को वासुदेव जी,  मध्य रात्रि में ही जन्म पश्चात , नन्द लाला जी व माता यशोदा जी के घर छोड़ आये थे I माता देवकी अपने पुत्र कृष्ण के वियोग में विलाप करतीं कारागृह में ही रहीं I नन्द बाबा का ग्राम जहां पवित्र  गौएं चरा करतें थीं वह भूभाग अति पवित्र  ' व्रजभूमि ' कहलाता है I  व्रजभूमि में कयी दानवों के वध की अलौकिक कथा लीला श्रीकृष्ण द्वारा की गईं थीं I 
       श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं के प्रसंगों में से जो माताओं को अति प्रिय है वह है मिट्टी खाना ! 
जब मैया यशोदा ने श्री कृष्ण को मिट्टी खाते देखा तब हठात कान्हा का मुख खुलवाया उस समय श्रीकृष्ण के मुखमंडल में माता यशोदा सम्पूर्ण ब्रह्मांड को घूमता हुआ देखकर अवाक रह गईं और मूर्च्छित हो गईं थी I yashoda and little krishna
            एक और प्रसंग है जहां कंस ने अदभुत पराक्रमी बालक कृष्ण को पकड़ने के हेतु से अपने सैनिक व गुप्तचर भेजे थे तब बृज के कई  गोप बालकों  ने श्रीकृष्ण की तरह अपने शीश पर ' मयूरपंख ' धारण कर लिया ताकि गुप्तचरों को ' मयूर पंख धारी बाल कृष्ण ' की पहचान ही न होने पाए कि ,
 कृष्ण कौन है ! 
            अन्य प्रसंगों में श्रीकृष्ण का चाणूर को मुष्ठीयुध्ध द्वारा वध करने से वे ' चाणूर मर्दनम ' कहलाये हैं तथा आगे असुर वक्रदन्त को गदा युध्ध से हराने का भी उल्लेख है I  
     पूतना वध , तृणाव्रत का वध , दूध भरी मटकी की बैलगाड़ी को उलट देना , फल बेचनेवाली के फल लेकर माई को धान के कण देना जो रत्नों  में बदल गये थे, माखन चोरी कर माखन को गोप बालकों के संग बाँट कर खाना और जब गोपियाँ शिकायत लेकर माँ यशोदा के घर पहुंचतीं हैं तब बाल कृष्ण घर के भीतर से निर्दोष रूप में निकल कर आते हैं इत्यादी कई लीलाएं, बाल कृष्ण रूप में कान्हा ने कीं थीं और समस्त बृज वासियों को महाआनंद का  रस पान करवाया थाI 
           पावन यमुना जी  का जल श्रीकृष्ण के सानिंध्य से पवित्र हो उठा और कालिया मर्दन लीला कर कान्हा ने दूषित जल को स्वच्छ किया और प्रकृति के हर तत्त्व को निर्मल कर दिया थाI गोवर्धन परबत के नीचे ब्रज के नर नारियों को मूसलाधार वर्षा एवं इंद्र के कोप से रक्षा प्रदान कर श्री कृष्ण ने पर्यावरण की सुरक्षा का पाठ आधुनिक युग  से बहुत पहले ही समाज के सामने एक महत्वपूर्ण मुद्दे की तरह उपस्थित किया थाI 
            शाल और तोशाल को , कंस द्वारा शासित मथुरा नगरी में  मल्ल युध्ध में परास्त किया तब कंस ने वासुदेव व नन्द बाबा को कैद कर उनके वध का आदेश दिया और उसी समय श्रीकृष्ण ने कंस के राज सिंहासन पर कूद कर कंस पर प्राणान्तक प्रहार किया कंस की गर्दन मरोड़ कर , कार्तिक शुक्ल दसमी के दिवस क्रूर आत्मा कंस  का वध किया था I कंस के नौ लघु भ्राताओं ने कृष्ण बलराम पर हमला किया परंतु उन्हें भी मृत्यु प्राप्त हुईI  
       कंस वध पश्चात , राजा उग्रसेन को पुनह मथुरा नरेश बनाया गया और माँ देवकी व वासुदेव जी को मुक्त किया गया उस समय श्रीकृष्ण १८ वर्ष के थे I
           गर्गाचार्य ने श्रीकृष्ण - बलराम का यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न कियाI तद्पश्चात उन्हें ऋषि सांदीपनी कश्यप के आश्रम में विद्याभ्यास के लिए प्रस्थान करते देख कर माता देवकी और यशोदा मैया के नयनों में अश्रु का ज्वार उमडा था I 
      सांदीपनी ऋषि ने धनुर्विद्या , वेदाभ्यास, धर्म, नीति शास्त्र  की शिक्षा से उन्हें पारंगत किया और श्रीकृष्ण ने कई नये आयुधों  की रचना भी  वहीं आश्रम में की थी जिसमे ' सुदर्शन चक्र ' भी है I
         ऋषि पुत्र पूर्णदत्त का अपहरण होने पर और नाग वंश की कुंवरी से विवाहित होने पर सांदीपनी उदास रहने लगे तब श्रीकृष्ण ऋषि पुत्र को आश्रम लौटा लाये और गुरु देव को प्रसन्न किया था I 
     वासुदेव जी के भाई देवभागा के पुत्र थे उद्धव !  जो कृष्ण के अनन्य सखा थे I मगध नरेश जरासंध ने अपने दामाद कंस की मृत्यु का बदला लेने, मथुरा पर आक्रमण किया तब यशोदा माई व गोप गोपियों की कुशल पूछने के लिए उद्धव को कृष्ण द्वारा, वृन्दावन  भेजा गया था I 
        दूसरी ओर अक्रूर जी को विदुर व मौसी कुंती  के पुत्र पांच पांडवों के कुशल क्षेम के लिए हस्तिनापुर भेजा गया था और धृतराष्ट्र ने अक्रूर जी को बतलाया कि वे कौरवों को मनमानी करने से रोक नहीं पाते हैंI इसी घटनाओं के आगे महाभारत की गाथा भी श्री कृष्ण के संग आगे बढती हैI महासमर के आरम्भ से पूर्व श्री कृष्ण ने अभूतपूर्व ' गीता ज्ञान ' दे कर अपने प्रिय सखा अर्जुन को ' कर्म का मर्म ' समझाया था और अंत में ' विराट स्वरूप ' के दर्शन दे कर स्वयं के ईश्वरतत्व की पुष्टी की थी I जय जय श्री कृष्ण ! 
Krishna and Arjuna at the Battlefield of Kurukshetra
- लावण्या  दीपक शाह 

Saturday, September 20, 2014

सुश्री देवी नागरानी जी

ॐ 
आदरणीया देवी नागरानी जी मेरी बड़ी बहन हैं। वे एक बेहतरीन रचनाकार , ग़ज़लगो , कहानीकार , अनुवादक और एक सजग समर्पित साहित्यकार एवं भारतीय भी हैं यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा का मिलाजुला स्वरूप है।  बड़ी हैं और साहित्य मर्मज्ञ भी इस कारण वे मेरे लिए सदैव प्रेरणा का स्त्रोत रहीं हैं। यह  उनके स्नेह से आगे चलकर और अधिक सिंचित व पल्ल्वित हुआ।  
 अब बीते दिनों को याद करूँ तो, उनसे मेरी सर्व प्रथम मुलाक़ात, विश्व प्रसिद्ध संस्था यूनाइटेड नेशनसँ के मुख्य सभागार, न्यू यॉर्क शहर में आयोजित अष्ठम हिन्दी अधिवेशन के दौरान हुई थी। पूज्य देवी जी को सामने से चलकर आते हुए देखा ,  उन का लिखा बरबस आँखों के सामने कौंध उठा। 
 “न बुझा सकेंगी ये आंधियां ये चराग़े‍‍ दिल है दिया नहीं” 
    और 
दर्दे दिल की लौ ने रौशन कर दिया सारा जहाँ  
इक अंधेरे में चमक उट्ठी कि जैसे बिजिलियाँ  "       लौ दर्दे दिल की ' देवी बहन का प्रथम ग़ज़ल संग्रह है।
डा मृदुल कीर्ति जी सुश्री देवी नागरानी जी के लिए कहतीं हैं ,
लौ दर्दे – दिल की '
शब्द सादे भाव गहरे,  काव्य की गरिमा मही,
‘लौ दर्दे दिल की’ संकलित, गजलों में ‘देवी’ ने कही
न कोई आडम्बर कहीं, बस बात कह दी सार की,
है पीर अंतस की कहीं,  पीड़ा कहीं संसार की.
आघात संघातों की पीड़ा, मर्म में उतरीं घनी, उसी आहत पीर से ‘लौ दर्दे-दिल की’ गजलें बनीं .
जीवन-दर्शन को इतनी सहजता और सरलता से कहा जा सकता है, यह ‘देवी’ जी की लेखन शैली से ही जाना. जैसे किसी बच्चे ने कागज़ की नाव इस किनारे डाली हो और वह लहरों को अपनी बात सुनाती हुई उस पार चली गयी हो. कहीं कोई पांडित्य पूर्ण भाषा नहीं पर भाव में पांडित्य पूर्ण संदेशं हैं. क्लिष्ट भावों की क्लिष्टता नहीं तो लगता है, मेरे अपने ही पीर की बात हो रही है और मैं इन पंक्तियों में जीवंत हो जाती हूँ . जब पाठक स्वयं को उस भाव व्यंजना में समाहित कर लेता है, तब ही रचना में प्राण प्रतिष्ठा होती है.
देवी जी के ही शब्दों में —–
करती हैं रश्क झूम के सागर की मस्तियाँ
पतवार बिन भी पार थी कागज की कश्तियाँ .
यह  ‘ दर्दे दिल की लौ’  उजाला बनने को व्याकुल है , सबके दर्द समेट लेने चाहत ही किसी को सबका बनाती है,  परान्तः-सुखाय चिंतन ही तो परमार्थ की ओर वृतियों को ले जाती हैं और शुद्ध चिंतन ही चैतन्य तक जीव को ले जाता है. औरों के दर्द से द्रवित और उन्हें समेट लेने की चाह में ही,’ मालिक है कोई मजदूर कोई, बेफिक्र कोई मजबूर कोई.’ संवेदना कहती है ‘ बहता हुआ देखते है सिर्फ पसीना, देखी है कहाँ किसने गरीबों की उदासी’ . ठंडे चूल्हे रहे थे जिस घर के, उनसे पूछा गया कि पका क्या है’ यह सब पंक्तियाँ देवी जी के अंतस को उजागर करतीं हैं.  वे सारगर्भित  मान्यताओं  की भी पक्षधर है कि व्यक्ति  केवल अपने कर्मों से ही तो उंचा होता है. ‘ भले छोटा हो कद किरदार से इंसान ऊँचा हो, उसी का जिक्र यारों महफ़िलों में आम होता है’ .
जीवन के मूल सिद्धांतों के प्रति गहरी आस्था है, सब इनका पालन क्यों नहीं करते इसकी छटपटाहट है, साथ ही यथार्थ से भी गहरा परिचय रखतीं है तब ही तो लिख दिया 
‘ उसूलों पे चलना जो आसान होता,
जमीरों के सौदे यकीनन ना होते,
कसौटी पे पूरा यहाँ कौन ‘देवी ‘
 जो होते, तो क्यों आइने आज रोते’.
सामाजिक, सांप्रदायिक , न्यायिक  और  राजनैतिक दुर्दशा के प्रति आक्रोश है, धार्मिक मान्यताओं के प्रति उनके उदगार नमन के योग्य हैं.’ वहीँ है शिवाला, वहीँ एक मस्जिद , कहीं सर झुका है, कहीं दिल झुका है.’पुनः है जहॉं मंदिर वहीँ है पास में मस्जिद कोई , साथ ही गूंजी अजाने , शंख भी बजते रहे. न्यायिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है. तिजारत गवाहों की जब तक सलामत क्या इन्साफ कर पायेगी ये अदालत.
भारतीयता,  हिंदी  देश प्रेम, वतन और शहीदों के प्रति रोम-रोम से समर्पित भावनाएं उन्हें प्रणम्य बनाती है. " 
देवी नागरानी एक प्रबुद्ध व्यक्तित्व है, बुद्ध का अर्थ बोध गम्यता. इस मोड़ पर जब चिंतन वृत्ति आ जाती है तो सब कुछ आडम्बर हीन हो जाता है, भावों को सहजता से व्यक्त करना एक स्वभाव बन जाता है. कितनी सहजता है, ‘ यूँ तो पड़ाव आये गए लाख राह में, खेमे कभी भी  हमने लगाए नहीं कहीं’ . वे मानती हैं कि  अभिमान ठीक नहीं पर स्वाभिमान की पक्षधर हैं, ‘ नफरत से अगर बख्शे कोई, अमृत भी निगलना मुश्किल है , देवी शतरंज है ये दुनिया,  शह उससे पाना मुश्किल है’ 
- डा मृदुल कीिर्ति 
 फिर आगे , ' चराग़े दिल ' से देवी जी के ग़ज़लों की खुशबु गुलाब की पंखुड़ियों सी सारी साहित्य की दिशाओं को और फ़िज़ां को महकाने लगीं। देवी जी की एक और किताब  ' “चराग - दिल”  का भारतीय विदेश राज्य मंत्री श्री आँनंद शर्मा ने अपने हाथों से  ८ वें हिन्दी अधिवेशन में , विमोचन किया था।
लेखिका सुश्री इला प्रसाद जी के शब्दों में सुनिए ,
 ' चरागे दिल देवी नांगरानी का हिन्दी में पहला ही गजल संग्रह है जिसके माध्यम से उन्होंने बतला दिया है कि उनकी लेखनी का चराग बरसों बरस जलता रहने वाला है। उनकी सोच का फ़लक विस्तृत है और उनकी गजलें जीवन के तमाम पहलुओं को छूती हैं। उन्होंने औरों के काँधों पर चढ़कर विकास नहीं किया। वे अपने पैरों से चली हैं , जिन्दगी की धूप – बारिश झेली है और आग में तप कर निकली हैं। उन्हीं के शब्दों में, " कोई नहीं था ‘देवी’ गर्दिश में मेरे साथ बस मैं, मिरा मुकद्दर और आसमान था। " जब जीवन-डगर कठिन हो और मन सम्वेदनशील, तो अभिव्यक्ति का ज़रिया वह खुद ढूढ़ लेता है। इस संग्रह में ढेरों ऐसी गजले हैं जो पाठकों को अपनी अनुभूतियों के करीब लगेंगी। आज चाहे देवी जी कहती हों कि “शोहरत को घर कभी भी हमारा नहीं मिला” 
- इला प्रसाद
अब सुनिए डा॰ अंजना संधीर का देवी जी के बारे में  ,
सिंधी का लहजा और मिठास उनकी जुबान में है। न्यूयॉर्क के सत्यनारायण मंदिर में कवि सम्मेलन- २००६  में अपने कोकिल कंठ से जब उन्होंने गजल सुनाई तो महफिल में सब वाह-वाह कर उठे। किसी की फरमाइश थी कि वे सिंधी की भी गजल सुनाएँ और तुरंत एक गजल का उन्होंने हिंदी अनुवाद पहले किया और सिंधी में उसे गाया। सब लोगों को देवी की गजल ने मोह लिया। तो ये थी मेरी देवी से रूबरू पहली मुलाकात। हमने एक दूसरे को देखा न था, बस बातचीत हुई थी। मेरी कविता पाठ के बाद वो उठकर आईं, मुझे गले लगाया और बोलीं- 
 ' अंजना, मैं तुम्हें मिलने ही इस कवि सम्मेलन में आई हूँ।  ' 
 समर्पण, निर्मल मन, भाषा के लगाव का परिणाम आपके सामने है ' चिरागे दिल। 
 देवी आध्यात्मिक रास्तों पर चलने वाली एक शिक्षिका का मन रखने वाली कवयित्री हैं, इसलिए उनकी गजलों में सच्चाई और जिंदगी को खूबसूरत ढंग से देखने का एक अलग अंदाज है। उनकी लेखनी में एक सशक्त औरत दिखाई देती है जो तूफानों से लड़ने को तैयार है। गजल में नाजुकी पाई जाती है, उसका असर देवी की गजलों में दिखाई पड़ता है। उदाहरण के तौर पर देखिए-
 ‘भटके हैं तेरी याद में जाने कहाँ-कहाँ, तेरी नजर के सामने खोए कहाँ-कहाँ। " अथवा
 ‘न तुम आए न नींद आई निराशा भोर ले आई, 
तुम्हें सपने में कल देखा, उसी से आँख भर आई। " अथवा 
" उसे इश्क क्या है पता नहीं, कभी शमा पर वो जला नहीं। " 
‘देवी की गजलों में आशा है, जिंदगी से लड़ने की हिम्मत है व एक मर्म है जो दिल को छू लेता है। ' 
डा॰ अंजना संधीर   
Charage-Dil


श्री गणेश बिहारी “तर्ज़” लखनवी साहिब ने ‘चराग़े-दिल’ के लोकार्पण के समय श्रीमती देवी नागरानी जी के इस गज़ल-संग्रह से मुतासिर होकर बड़ी ही ख़ुशबयानी से उनकी शान में एक कत्ता स्वरूप नज़्म तरन्नुम में सुनाई थी। 

लफ्ज़ों की ये रानाई मुबारक तुम्हें देवी

रिंदी में पारसाई मुबारक तुम्हें देवी

फिर प्रज्वलित हुआ ‘चराग़े‍-दिल’ देवी

ये जशने रुनुमाई मुबारक तुम्हें देवी.

 अश्कों को तोड़ तोड़ के तुमने लिखी गज़ल

पत्थर के शहर में भी लिखी तुमने गज़ल

कि यूँ डूबकर लिखी के हुई बंदगी गज़ल

गज़लों की आशनाई मुबारक तुम्हें देवी

ये जशने रुनुमाई मुबारक तुम्हें देवी.

 शोलों को तुमने प्यार से शबनम बना दिया

एहसास की उड़ानों को संगम बना दिया

दो अक्षरों के ग्यान का आलम बना दिया

‘महरिष’ की रहनुमाई मुबारक तुम्हें देवी

ये जशने रुनुमाई मुबारक तुम्हें देवी.

- श्री गणेश बिहारी “तर्ज़” लखनवी

  देवी जी के ग़ज़ल संग्रह ,हिन्दुस्तानी और  सिंधी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू  और सिंधी जैसी  सभी भाषाओं में देवी जी सिध्धहस्त हैं। वर्षों से सृजन प्रक्रिया में देवी जी व्यस्त रहीं हैं। इस वर्ष  दिनांक १२ अप्रैल, २०१४ को चाँदीबाई हिम्मतलाल मनसुखानी कॉलेज में देवी नागरानी के सिन्धी कहानी संग्रह अपनी धरती का लोकार्पण समारोह सम्पन्न हुआ।

13. Pahinji Dharti 

सुश्री देवी नागरानी के अनुदित कहानी संग्रह “बारिश की दुआ” में भारत के अनेक प्रान्तों से स्थापित १७  कहानीकरों की कहानियाँ हिन्दी से सिन्धी भाषा में अनुवाद की हुई हैं। पुस्तक का स्वरूप सिंधी अरबी लिपि में है।

Baarish Ki Dua दिनांक-रविवार ९  जून २०१३  सीता सिंधु भवन, सांताक्रूज, मुम्बई के एक भव्य समारोह में सुश्री देवी नागरानी के अनुदित कहानी संग्रह “बारिश की दुआ” का लोकार्पण संपन्न हुआ। 



अनेक साहित्यकारों पर देवी जी ने मार्मिक कथन लिखा है जैसे साथी स्व श्री मरीयम गज़ाला, 
स्व श्री महावीर जी तथा लंदनवासी  ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा ,पिंगलाचार्य श्री महरिष जी, 
श्री जीवतराम सेतपाल जी , सुश्री सुधा ढींगरा , डा अंजना संधीर इत्यादी। 
अपने साथी रचनाकारों की प्रशंशा में देवी जी मुखर रहीं हैं  और उनके साहित्यिक अवदान के प्रति देवी जी सदैव सचेत रहतीं हैं। 
           मुम्बई हो या अमरीका का पूर्व में बसा न्यू जर्सी शहर हो या मध्य अमरीका का शिकागो शहर हो या कि पश्चिम अमरीका कैलीफोर्निया का मिलटीपास शहर हो उन्होंने की साहित्य सभाओं में शिरकत करते हुए सफल यात्राएं संपन्न कीं हैं। 
 चित्र  में देवी जी व अन्य साहित्यकार  मिल्टीपास केलिफोर्निया में - 
Cali-1सुदूर नॉर्वे हो या गोवा रायपुर या  जयपुर ,अजमेर या अमदावाद , या फिर  बेलापुर हो या  तमिलनाडु  ! देवी जी ने विभिन्न मंचों से अपनी रचनाओं का स स्वर पाठ किया है और श्रोताओं और साहित्यकारों ने उन्हें सुना और सराहा है। लिंक http://sindhacademy.wordpress.com2013. april Ajmer
             अखिल भारत सिंधी बोली प्रचार सभा की और से देवी नागरानी जी की ' भजन - महिमा ' पुस्तक का लोकार्पण संत शिरोमणि युधिष्ठिर लाल जी हस्ते संपन्न हुआ। देवी जी गाती बहुत बढ़िया हैं।  भजन हों या गीत ग़ज़ल या कविता उनके स्वर में ढलकर हर रचना , श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करतीं रहीं हैं और सभा में, वाहवाही लूट लेतीं हैं। उदाहरणार्थ , शुक्रवार दिनांक ९  नवम्बर २०१२ , रवीद्र भवन मडगांव, गोवा में ‘अस्मिता’ कार्यक्रम सुबह १०  बजे से दो बजे तक सफलता पूर्ण सम्पन्न हुआ वहां देवी नागरानी  जी ने (सिन्धी) भाषा का प्रतिनिधत्व किया। 
Sahity Setu Sanmaan
साहित्य सेतु सन्मान 
तमिलनाडू हिन्दी अकादमी एवं धर्ममूर्ति राव बहादुर कलवल कणन चेट्टि हिन्दू कॉलेज, चेन्नई के संयुक्त तत्वधान में आयोजित विश्व हिन्दी  दिवस एवं अकादमी के वर्षोत्सव का यह भव्य समारोह (१०  जनवरी २०१३  में देवी जी का सन्मान हुआ )  श्रीमती देवी नागरानी ग़ज़ल के विषय में ख्यालात कुछ इस तरह हैं -- 
  कुछ खुशी की किरणें, कुछ पिघलता दर्द आँख की पोर से बहता हुआ, कुछ शबनमी सी ताज़गी अहसासों में, तो कभी भँवर गुफा की गहराइयों से उठती उस गूँज को सुनने की तड़प मन में जब जाग उठती है तब कला का जन्म होता है।  सोच की भाषा बोलने लगती है, चलने लगती है, कभी कभी तो चीखने भी लगती है। यह कविता बस और कुछ नहीं, केवल मन के भाव प्रकट करने का माध्यम है, चाहे वह गीत हो या ग़ज़ल, रुबाई हो या कोई लेख, इन्हें शब्दों का लिबास पहना कर एक आकृति तैयार करते हैं जो हमारी सोच की उपज होती है। ” दर्दे दिल की लौ ने रौशन कर दिया सारा जहाँ, इक अंधेरे में चमक उट्ठी कि जैसे बिजिलियाँ "
रचनाकार देवी जी के कहानी संग्रह संस्कार सारथी संस्थान ट्रस्ट, राज॰ के तत्वधान में पुस्तक लोकार्पन एवं साहित्यकार सन्मान समारोह में  सन्मान   समारोह में  दिनांक-मंगलवार, १२  मार्च २०१३  गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक भाव्य समारोह को अंजाम दिया गया।  सुश्री देवी नागरानी के अनुदित कहानी संग्रह “और मैं बड़ी हो गई” का लोकार्पण संपन हुआ  और अक्षर शिल्पी सन्मान से उन्हें नवाजा गया।
     साहित्य के प्रति देवी नागरानी जी के विविध आयामी  योगदान को देखते हुए  सं २०१४ इसी वर्ष दिनांक रविवार ३१  अगस्त २०१४  अखिल भारत सिंधी बोली एवं साहित्य प्रचार की ओर से ११२  सेमिनार -“साहित्य व साहित्यकार " के तहत , जानी मानी नामवर लेखिका व शायरा देवी नागरानी पर यह सेमिनार आयोजित हुआ।
31 Ag-2014  
photo 4            
भारतीयता, साहित्यिक मनोभूमि, सर्व लोक उथ्थान के निर्मल भाव से ओतप्रोत देवी जी के उदगार सुनिए ,

' हमें अपनी हिंदी ज़ुबाँ चाहिये

सुनाए जो लोरी वो माँ चाहिये

कहा किसने सारा जहाँ चाहिये

हमें सिर्फ़ हिन्दोस्ताँ चाहिये

तिरंगा हमारा हो ऊँचा जहाँ

निगाहों में वो आसमाँ चाहिये

मुहब्बत के बहते हों धारे जहाँ

वतन ऐसा जन्नत निशाँ चाहुये

जहाँ देवी भाषा के महके सुमन

वो सुन्दर हमें गुलसिताँ चाहिये ' 

देवी जी के शब्दों में बसी तमाम उम्र भर की सच्चाई उनकी ग़ज़लों में यूं मुखरित हुई है , 

' यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था

इक मैं ही तो नहीं जिसे सब कुछ मिला ना था.

लिपटे हुए थे झूठ से कोई सच्चा न था

खोटे तमाम सिक्के थे, इक भी खरा न था '  

देवी जी ने साहित्य की हरेक विधा में सृजन किया है। देवी जी का लिखा  एक सुन्दर हाइकु प्रस्तुत है , ' श्रम दिव्य है  , जीवन सुँदर ये , मंगल धाम '

 देवी जी ने साहित्यकार साथियों की पुस्तकों पर  सशक्त एवं निष्पक्ष समीक्षाएं भी लिखीं हैं। सामसायिक हिन्दी व अन्य साहित्य पर उनकी पैनी नज़र रहती है। यहां प्रस्तुत चित्र में अमेरिका के प्रवासी भारतीयों के हिन्दी साहित्य में हिन्दी कविता संगोष्ठी में अपना व्यक्तव्य पढ़ते हुए 

देवी जी~

Pravsi Sahity par alekh padhteडा अंजना संधीर द्वारा संपादित एवं प्रकाशित पुस्तक ' प्रवासिनी के बोल ' एक अनोखा प्रयास इस कारण रहा चूंकि इस पुस्तक में तमाम प्रवासिनी साहित्यकाराओं के उदगार संगृहीत हैं।  देवी जी ने इस पुस्तक में कई साथी रचनाकाराओं पर अपने विचार लिखे हैं।  मेरे लिए उनका लिखा मेरे मिए मनोबल को सुदृढ़ करनेवाला पाथेय है , बड़ी बहन के स्नेह रूपी वाक्यों का प्रसाद ही समझती हूँ। 
 ' हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार पं॰ नरेंद्र शर्मा जी की सुपुत्री लावण्या शाह जो Cincinati-Ohio में रहती हैं। लावण्या जी को पढ़ते ही लगता है जैसे हम अपने आराध्य के सामने मंदिर में उपस्थित हुए हैं, सब कुछ अर्पित भावना को लेकर उनके साथ कह रहे हैं—-           
ज्योति का जो दीप से /मोती का जो सीप से /वही रिश्ता मेरा, तुम से !                   
 प्रणय का जो मीत से /स्वरों का जो गीत से /वही रिश्ता मेरा, तुम से !                             
 गुलाब का जो इत्र से /तूलिका का जो चित्र से /वही रिश्ता मेरा, तुम से !                          
 सागर का जो नैय्या से /पीपल का जो छैय्याँ से /वही रिश्ता मेरा, तुम से !      
- लावण्या शाह       
किसी ने खूब कहा है ‘कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है, कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता। लावण्या जी की शब्दावली का गणित देखिये कैसे सोच और शब्द का तालमेल बनाए रखता  है। '
- देवी नागरानी 
प्रवासिनी के बोल की समीक्षा पर अधिक विस्तार से  इस लिंक पर  : http://charagedil.wordpress.com/2012/03/
भारतीय भाषा संस्कृति संस्थान–गुजरात विध्यापीठ अहमदाबाद में देवी नागरानी का काव्य पाठ अवसर  
(संस्थान के निर्देशक श्री के॰ के॰ भास्करन, प्रोफेसर निसार अंसारी (Urdu Dept),
 मुख्य मेहमान देवी नागरानी, डॉ॰ अंजना संधीर)
न्यू जर्सी, अमेरिका की प्रवासी साहित्यकार देवी नागरानी को ग़ज़ल लेखन के लिए १६-१७ फरवरी को देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक संस्था सृजन-सम्मान द्वारा ' सृजन-श्री '  से अलंकृत किया गया । उन्हें सम्मानित किया   धर्मयुग, नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक व वर्तमान में नवनीत के संपादक, विश्वनाथ सचदेव, वरिष्ठ आलोचक व प्रवासी साहित्य विशेषज्ञ कमलकिशोर गोयनका जी ने !  
 उत्तरप्रदेश के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार केशरीनाथ त्रिपाठी दिनांक १३ मार्च, २०१० रविवार सिन्धी नव वर्ष “चेटी चाँद” के अवसर पर फिल्म “जय झूलेलाल” का उद्घाटन उत्सव एवं देवी नागरानी के सिन्धी काव्य संग्रह “मैं सिंध की पैदाइश हूँ ” का लोकार्पण समारोह संपन्न हुआ !"
सिंध की मैं पैदाइश हूँ  का विमोचन  नोर्वे में  ( Indo-Norwegian Informaion and Cultural फोरम) के मंच पर  स्वतंत्रता दिवस एवं टैगोर जयंती के मनाया गया। 
नार्वे की लेखक गोष्ठी में देवी नागरानी जी सम्मानित हुईं। 



 आप ये ना समझियेगा कि सुश्री देवी नागरानी जी की साहित्य यात्रा का रथ रूका है या थमा है।  आज भी देवी नागरानी के जहन में अनेक सुन्दर गीत , मधुर गज़लें और गीत लहरा रहे हैं और पाठकों को रसपान करवाने को आतुर हैं।  ऐसी कर्मठं साहित्य सेवी , मिलनसार तथा आज भी नया देखने, सुनने और समझने को सदा सजग रहतीं, मेरी बड़ी बहन सुश्री देवी नागरानी जी को मेरे स्नेह एवं अादर पूर्वक नमस्कार ! उनकी साहित्य सृजन प्रक्रिया अबाध गति से आगे बढ़ती रहे यह  मेरी विनम्र  शुभकामनाएं भी सहर्ष प्रेषित करती हूँ।  
 - श्रीमती लावण्या दीपक शाह 
  सिनसिनाटी , ओहायो प्रांत 
  उत्तर अमरीका 
ई मेल : Lavnis@gmail.com