Sunday, August 10, 2014

सत्य

क्या आप हमेशा सच बोलते हैं? बोल पाते हैं ? क्यूँ 
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कोशिश तो यही रहती है की सच बोलूं और अगर कुछ अप्रिय सत्य है तब 
' ना ही बोलूं तो अच्छा हो ' ये उम्र बढ़ते हुए सीख लिया है। 
तब सही उत्तर तो यही रहेगा कि अभ्यास से मन और विचारों को केन्द्रीत करते हुए 
' सत्य ' बोलने की कोशिश रहती है। बोल पाती भी हूँ और इसके लिए क्यों तो सरल सा उत्तर है कि ' सत्य हमेशा जैसा हमारे स्वयं के लिए सही और उपयुक्त रहता है वैसे ही हम समानभाव से अन्य को भी देखते रहें तब वही ' सत्य '  दूसरों के लिए भी सही और उपयुक्त रहता है। जीवन में शान्ति, संतोष और स्वभाव में दया ममता वात्सल्य एवं करूणा जैसे अच्छे भावों का उदय भी ' सत्य ' व्रती होने से संभव हो जाता है।
 
आधुनिक युग २१ वीं सदी का आरम्भ काल अत्याधिक बदलाव और असमंजस भरा समय है। आजकल किसी के पास समय ही कहाँ है कि , किसी की सुनें ! इसलिए बेहतर है कि अवसर और पात्र को देख कर व्यक्ति या तो बोलें , चुप रहैं , सुने या गुनें। 
यह भी संभव है कि अगर व्यक्ति , अप्रिय या कटु सत्य बोले तब वहां सुनने के लिए  ठहरेगा भला कौन ?
आज का समय २१ वीं सदी तक आकर सम्प्रेषणाओं, त्वरित फैलते समाचार व्यूह के दमन चक्र और घात एवं प्रतिघातों का समय है। सच का स्वरूप तो वही रहा परन्तु उक्त ' सत्य ' को दर्शाने के जरिये कई विध हो गए। टेलीविजन, फेसबुक ट्वीटर जैसे संसाधनों ने विश्व में दिन रात हो रही हलचलों को ' ब्रेकिंग न्यूज़ ' का मसाला बना लिया है और दिन रात जनता के समक्ष विभिन्न देशों की सरकारें और समाज व्यवस्था अपने ढंग से जो हो रहा है उसका आँखों देखा हाल जारी किये जा रही है।  
आवश्यकता है उस समय एकचित्त होकर अपने अंतर्मन में एक तटस्थ द्वीप स्थापना की। उस द्वीप में शाश्वत मूल्यों का एक दीप स्तम्भ भी अवश्य जला रहे जो भावनाओं के प्रतिघातों के सुनामी के मध्य भी स्थिर खड़ा रहे। सुनें सब की परन्तु अपने अंतर आत्मा में बैठे , एक अन्तर्यामी प्रभु की शरण में मन रहे। इस का ध्यान रहे।
अब , कई विभिन्न ग्रंथों व व्यक्तिओं के ' सत्य ' पर लिखे सुविचार जो जग प्रसिद्ध हैं। 
उन्हें भी देखते चलें और उन्हें पुन : याद कर लें।
'सत्यं वद, धर्मं चर', सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, मा ब्रूयात सत्यमप्रियम्। ‘
सत्य बोलो, प्रिय बोलो किंतु अप्रिय सत्य तथा प्रिय असत्य मत बोलो।’ 
‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।’ 
यानी प्रिय-सत्य एक साथ नहीं हो सकते। जब सत्यता कटु है और असत्य में माधुर्य है तो क्या करना चाहिए? 
सत्य अप्रिय और असत्य प्रिय होता है, इसीलिए असत्य का बोलबाला है। 
‘‘मधुर वचन है औषधी, कटुक वचन है तीर।’’ 
यानी सत्य हानिकारक शस्त्र है और असत्य लाभदायक औषधि है। 
बाबा तुलसी ने स्पष्ट कर दिया, 
‘‘सचिव वैद गुरु तीन जो प्रिय बोलें भय आश। 
राज धर्म तन तीन कर होय वेग ही नाश।।’’
सत्-चित्-आनंद यानी सच्चिदानंद स्वरूप वह परमतत्व है, जिसे परब्रह्म परमात्मा या परमेश्वर कहते हैं। ‘‘सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्या’’ यह वेदबाक्य स्पष्ट करता है कि सत् रूप ब्रह्म है, सत् से सत्य शब्द बना अर्थात् जो सत् (ब्रह्म के योग्य है वही सत्य है। यह सत् जब मन-वाणी-कर्म ही नहीं बल्कि श्वांस-श्वांस में समा जाता है तब किसी तरह द्विविधा नहीं रहती। सिर्फ सत् से ही सरोकार रह जाय, तब ‘सत्यं वद’ को कंठस्थ हुआ मानो।
सन्मार्ग से विचलित न होना सत्स्वरूप परमेश्वर की कृपा से ही संभव है। सन्मार्ग पर पहला कदम है सद्विचारों का आविर्भाव होना। विचारों से दुबुद्धि का सद्बुद्धि के रूप में परिवर्तन दिखाई देगा। बुद्धि से संबद्ध विवेक में सत् का समावेश होगा और वह सत्यासत्य का भेद करने की राजहंसीय गति प्राप्त कर लेता है। 
अष्टांग योग प्रथमांग यम का प्रथम चरण ही सत् है, सत् पर केंद्रित होने की दशा में ही ‘योगश्चित्त वृत्तिः निरोधः’ सद्बुद्धि ही चित्तवृत्तियों को नियंत्रित करती है। 
अन्तःचतुष्टय में बुद्धि के बाद चित्त, अहंकार में ब्रह्मरूपी सत् समावेश होते ही मन पर नियंत्रण पाया जा सकता है। मन पर केंद्रित हैं, कामनायें। जो इन्द्रियों की अभिरुचि के आधार पर प्रस्फुटित होती है। कामनाओं का मकड़जाल ही तृष्णा है। संतोष रूपी परमसुख से तृष्णा का मकड़जाल टूटता है। मन द्वारा कामनाओं के शांत हो जाने से आचरण नियंत्रित हो जाता है। 
‘‘आचारः परमो धर्मः’’ आचरण में सत् का समावेश ही सदाचार कहा गया है। ऐसे में कदाचार की कोई गुंजाइस नहीं रहती, मनसा-वाचा-कर्मणा लेश मात्र भी कदाचार दिखे तो मान लो कि यहां सत्यनिष्ठा का सिर्फ दिखावा है। सदाचार स्वच्छ मनोदशा का द्योतक है। जबकि कदाचार की परधि में अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार और भ्रष्टाचार अदि आते हैं। 
सत्-जन मिलकर ' सज्जन '  शब्द बनता है। प्रत्येक व्यक्ति सज्जन नहीं होता। इसी तरह सत् युक्त होने पर सन्यास की स्थिति बनती है। 
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि सत्यनिष्ठा ही धर्मनिष्ठा, कर्मनिष्ठा और ब्रह्मनिष्ठा है। क्योंकि धर्म, कर्म ही ब्रह्मरूप सत् है। सत्य परेशान भले हो मगर पराजित नहीं होता। तभी तो ‘‘सत्यमेव जयते’’ के बेदवाक्य को राष्ट्रीय चिन्ह के साथ जोड़ा गया। यह भी विचारणीय है- सत्य परेशान भी क्यों होता है? अध्यात्म विज्ञान स्पष्ट करता है कि सत्यनिष्ठा में अंशमात्र का वैचारिक प्रदूषण यथा सामथ्र्य परेशानीदायक बन जाता है। 
सत्यनिष्ठा का सारतत्व यह है-‘‘हर व्यक्ति सत्य, धर्म व ज्ञान को जीवन में उतारे। 
 यदि सत्य-धर्म-ज्ञान तीनों न अपना सकें तो सिर्फ सत्य ही पर्याप्त है क्योंकि वह पूर्ण है सत्य ही धर्म है, और सत्य ही ज्ञान। सदाचार से दया, शांति व क्षमा का प्राकट्य होता है। वैसे सत्य से दया, धर्म से शांति व ज्ञान से क्षमा भाव जुड़ा है। सत् को परिभाषित करते हुए रानी मदालिसा का वह उपदेशपत्र पर्याप्त है जो उन्होंने अपने पुत्र की अंगूठी में रखकर कहा था कि जब विषम स्थिति आने पर पढ़ना। ‘‘संग (आसक्ति) सर्वथा त्याज्य है। यदि संग त्यागने में परेशानी महसूस हो तो सत् से आसक्ति रखें यानी सत्संग करो इसी तरह कामनाएं अनर्थ का कारण हैं, जो कभी नहीं होनी चाहिए। कामना न त्याग सको तो सिर्फ मोक्ष की कामना करो।’’ 
अनासक्त और निष्काम व्यक्ति ही सत्यनिष्ठ है। आसक्ति और विरक्ति के मध्य की स्थिति अनासक्ति है। जो सहज है, ऋषभदेव व विदेहराज जनक ही नहीं तमाम ऐसे अनासक्त राजा महाराजा हुए है। आज भी शासन, प्रशासन में नियोजित अनासक्त कर्तव्यनिष्ठ नेता व अफसर हैं जिन्हें यश की भी कामना नहीं है।
अब कुछ अपने मन की बात :
मेरी कविता द्वारा मन में हिलोरें लेतीं अनुभूतियाँ कहतीं हैं ,
घना जो अन्धकार हो तो हो  रहे, हो रहे 
तिमिराच्छादित हो निशा भले हम वे सहें  
चंद्रमा अमा का लुप्त हो आकाश से तो क्या 
हूँ चिर पुरातन, नित नया रहस्यमय बिंदु मैं 
हूँ मानव ! ईश्वर का सृजन अग्नि शस्य हूँ मैं! 
काट तिमिर क्रोड़ फोड़ तज  कठिन कारा , 
नव सृजन निर्मित करूं निज कर से पुनः मैं !
हैं बल भुजाओं में  वर शाश्वत शक्ति पीठ का  
हे माँ ! दे मुझे वरदान ऐसा हूँ शिशु अबोध तेरा  
कन्दराएँ फोड़ निर्झर सा बहूँ  ऐसा वरदान दे !
अब हम ' सत्य ' को परिभाषित करें तब कहेंगें कि  ' सत्य ' ईश्वर का अंश है।  
' ईश्वर सत्य है , 
  सत्य ही शिव है ,
  शिव ही सुन्दर है 
जागो उठ कर देखो जीवन ज्योति उजागर है 
सत्यम शुवम् सुंदरम ' 
यह गीत रचना मेरे पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा जी की है जिसमे संक्षिप्त में ' सत्य ही सुन्दर है क्यों कि सत्य में ' शिवतत्व ' का वास है यह प्रतिपादित किया गया है। 
इंसान असत्य बोलता है तो वह भी ' सत्य ' का आधार लेकर और ये सोचकर कि संभवत; उस के झूठ को शायद सच मान लिया जाएं ! 
' तीन चीजें ज्यादा देर तक नहीं छुप सकती, सूरज, चंद्रमा और सत्य ! ' ये कहा था भगवान गौतम बुद्ध ने ! 
' सत्य अकाट्य है। द्वेष इसपे हमला कर सकता है, अज्ञानता इसका उपहास उड़ा सकती है, लेकिन अंत में सत्य ही रहता है। ' ये कहा विन्सेंट चचिल ने। 
' मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है। सत्य मेरा भगवान है। अहिंसा उसे पाने का साधन। ' ये कहा महात्मा गांधी जी ने।  
मुन्डकोपनिषद के मुंडक ३ के पांचवें श्लोक का अवलोकन करें-
सत्यमेव जयति नानृत
सत्येन पन्था विततो देवयानः
येनाक्रममन्त्यृषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानाम् ।।
सत्य (परमात्मा) की सदा जय हो, वही सदा विजयी होता है। अनृत - असत् (माया) तात्कालिक है उसकी उपस्थिति भ्रम है। वह भासित सत्य है वास्तव में वह असत है अतः वह विजयी नहीं हो सकता. ईश्वरीय मार्ग सदा सत् से परिपूर्ण है। जिस मार्ग से पूर्ण काम ऋषि लोग गमन करते हैं वह सत्यस्वरूप परमात्मा का धाम है।
मांडूक्य उपनिषद में  १२ मन्त्र समस्त उपनेषदीय ज्ञान को समेटे हैं  जाग्रत , स्वप्न एवं सुषुप्त मनुष्य अवस्था हर प्राणी का सत्य है और इस सत्य के साथ ही निर्गुण पर ब्रह्म व अद्वैतवाद भी जुडा हुआ है  ऊंकार ही हर साधना , तप एवं ध्यान का मूल मन्त्र है यह मांडूक्य उपनिषद की शिक्षा है 
अथर्ववेद : ‘ गणपति उपनिषद ‘ का समावेश अथर्व वेद में किया गया है  अंतगोत्वा यही सत्य पर ले चलते हुए कहा गया है कि, ईश्वर समस्त ब्रह्मांड का लय स्थान है ईश्वर सच्चिदान्द घन स्वरूप हैं , अनंत हैं, परम आनंद स्वरूप हैं 
सीता उपनिषद : सीता नाम प्रणव नाद , ऊंकार स्वरूप है । परा प्रकृति एवं महामाया भी वहीं हैं । ” सी ” – परम सत्य से प्रवाहित हुआ है । ” ता ” वाचा की अधिष्ठात्री वाग्देवी स्वयम हैं । उन्हीं से समस्त ” वेद ‘ प्रवाहित हुए हैं ।सीता पति ” राम ” मुक्ति दाता , मुक्ति धाम , परम प्रकाश श्री राम से समस्त ब्रह्मांड , संसार तथा सृष्टि उत्पन्न हुए हैं जिन्हें ईश्वर की शक्ति ‘ सीता ‘ धारण करतीं हैं कारण वे हीं ऊं कार में निहित प्रणव नाद शक्ति हैं।  श्री रूप में, सीता जी पवित्रता का पर्याय हैं। सीता जी भूमि रूप भूमात्म्जा भी हैं । सूर्य , अग्नि एवं चंद्रमा का प्रकाश सीता जी का ‘ नील स्वरूप ‘ है । चंद्रमा की किरणें विध विध औषधियों को , वनस्पति में निहित रोग प्रतिकारक गुण प्रदान करतीं हैं । यह चन्द्र किरणें अमृतदायिनी सीता शक्ति का प्राण दायक , स्वाथ्य वर्धक प्रसाद है । वे ही हर औषधि की प्राण तत्त्व हैं सूर्य की प्रचंड शक्ति द्वारा सीता जी ही काल का निर्माण एवं ह्रास करतीं हैं । सूर्य द्वारा निर्धारित समय भी वही हैं अत: वे काल धात्री हैं । पद्मनाभ, महा विष्णु, क्षीर सागर के शेषशायी श्रीमन्न नारायण के वक्ष स्थल पर ‘ श्री वत्स ‘ रूपी सीता जी विद्यमान हैं । काम धेनू एवं स्यमन्तक मणि भी सीता जी हैं ।
वेद पाठी , अग्नि होत्री द्विज वर्ग के कर्म कांडों के जितने संस्कार, विधि पूजन या हवन हैं उनकी शक्ति भी सीता जी हैं । सीता जी के समक्ष स्वर्ग की अप्सराएं जया , उर्वशी , रम्भा , मेनका नृत्य करतीं हैं एवं नारद ऋषि व तुम्बरू वीणा वादन कर विविध वाध्य बजाते हैं चन्द्र देव छत्र धरते हैं और स्वाहा व स्वधा चंवर ढलतीं हैं ।
राजकुमारी सीता : रत्न खचित दिव्य सिंहासन पर श्री सीता देवी आसीन हैं । उनके नेत्रों से करूणा व् वात्सल्य भाव प्रवाहमान है । जिसे देखकर समस्त देवता गण प्रमुदित हैं । ऐसी सुशोभित एवं देव पूजित श्री सीता देवी ‘ सीता उपनिषद ‘ का रहस्य हैं । वे कालातीत एवं काल के परे हैं ।
यजुर्वेद ने ‘ ऊं कार ‘ , प्रणव – नाद की व्याख्या में कहा है कि ‘ ऊं कार , भूत भविष्य तथा वर्तमान तीनों का स्वरूप है । एवं तत्त्व , मन्त्र, वर्ण , देवता , छन्दस ऋक , काल, शक्ति, व् सृष्टि भी है ।
सीता पति श्री राम का रहस्य मय मूल मन्त्र ” ऊं ह्रीम श्रीम क्लीम एम् राम है । रामचंद्र एवं रामभद्र श्री राम के उपाधि नाम हैं । ‘ श्री रामं शरणम मम ‘
श्रीराम भरताग्रज हैं । वे सीता पति हैं । सीता वल्लभ हैं । उनका तारक महा मन्त्र ” ऊं नमो भगवते श्री रामाय नम: ” है । जन जन के ह्दय में स्थित पवित्र भाव श्री राम है जो , अदभुत है ।
श्री सीता - स्तुति :
सुमँगलीम कल्याणीम सर्वदा सुमधुर भाषिणीम
वर दायिनीम जगतारिणीम श्री रामपद अनुरागिणीम
वैदेही जनकतनयाम मृदुस्मिता उध्धारिणीम
चँद्र ज्योत्सनामयीँ, चँद्राणीम नयन द्वय, भव भय हारिणीम
कुँदेदुँ सहस्त्र फुल्लाँवारीणीम श्री राम वामाँगे सुशोभीनीम
सूर्यवँशम माँ गायत्रीम राघवेन्द्र धर्म सँस्थापीनीम
श्री सीता देवी नमोस्तुते ! श्री राम वल्लभाय नमोनम:
हे अवध राज्य ~ लक्ष्मी नमोनम:
हे सीता देवी त्वँ नमोनम: नमोनम: ii
[ सीता जी के वर्णन से सँबन्धित श्लोक  /  मेरी कविता आप के सामने प्रस्तुत कर रही हूँ। ]
” ॐ नमो भगवते श्री नारायणाय “  - ” ऊं नमो भगवते वासुदेवाय “
[ ये सारे मन्त्र, अथर्व वेद में श्री राम रहस्य के अंतर्गत लिखे हुए हैं । ]
' जिस क्षण से देखा उजियारा 
  टूट गए रे तिमिर जाल 
  तार तार अभिलाषा टूटी 
  विस्मृत गहन तिमिर अन्धकार 
 निर्गुण बने, सगुण वे उस क्षण 
 शब्दों के बने सुगन्धित हार 
 सुमनहार अर्पित चरणों पर 
 समर्पित जीवन का तार तार ! ' 
-  लावण्या 
सच कहा है , ' सत्य निर्गुण है। वह जब अहिंसा, प्रेम, करुणा के रूप में अवतरित होता है तब सदगुण कहलाता है।'  भारतीय गणराज्य का प्रतीक भी यही कहता है ,  सत्य की  विजय सर्वदा निश्चित है।  
'सत्यमेव जयते' मूलतः मुण्डक-उपनिषद का सर्वज्ञात मंत्र ३ .१ .६  है। 
पूर्ण मंत्र इस प्रकार है:
सत्यमेव जयते नानृतम सत्येन पंथा विततो देवयानः।
 येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत् सत्यस्य परमम् निधानम् ।
अर्थात अंततः सत्य की ही जय होती है न कि असत्य की। यही वह मार्ग है जिससे होकर आप्तकाम (जिनकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों) मानव जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। 

' सत्यमेव जयते '
अगर हम मुक्ति की जगह सत्य को ढूंढे तो सबसे अच्छा होगा। क्योंकि सत्य के बिना अपने बुद्धि और भावना से मुक्ति शब्द को परिभाषित करे तो वह सही न होगा। एक समय की बात है जब भारत में श्वेतकेतु नामक युवक रहता था । उसके पिता उद्दालक थे। उन्होंने एक दिन प्रश्न किया, " क्या तुम्हे रहस्य ज्ञात है ? जिस प्रकार सुवर्ण के एक कण की पहचान से समस्त वस्तुएं जो सुवर्ण से बनी हों उनका ज्ञान हो जाता है भले ही नाम अलग हों, आकार या रूप रेखा अलग हों।  सुवर्ण फ़िर भी सुवर्ण ही रहता है। यही ज्ञान अन्य धातुओं के बारे में भी प्राप्त होता है। यही सत्य का  ज्ञान है ।
उद्दालक , अरुणा के पुत्र ने ऐसा प्रश्न अपने पुत्र श्वेतकेतु से किया। 
उद्दालक : "पुत्र, जब हम निद्रा अवस्था में होते हैं तब हम 
उस तत्त्व से जुड़ जाते हैं जो सभी का आधार है ! हम कहते हैं, अमुक व्यक्ति सो रहा है परन्तु उस समय वह व्यक्ति उस परम तत्त्व के आधीन होता है । पालतू पक्षी हर दिशा में पंख फडफडा कर उड़ता है आख़िर थक कर, पुन: अपने स्थान पर आ कर, बैठता है । ठीक इसी तरह, हमारा मन, हर दिशा में भाग लेने के पश्चात्  अपने जीवन रुपी ठिकाने पर आकर पुनः बैठ जाता है।  जीवन ही व्यक्ति का सत्य है। 
मधुमखियाँ मध् बनाती हैं। विविध प्रकार के फूलों से वे मधु एकत्रित करतीं हैं जब उनका संचय होता है तब समस्त मधु मिल जाता है और एक रस हो जाता है। इस मधु में अलग अलग फूलों की सुगंध या स्वाद का पहचानना तब कठिन हो जाता है। बिल्कुल इसी प्रकार हर आत्मा जिसका वास व्यक्ति के भीतर सूक्ष्म रूप से रहता है।  अंततः परम आत्मा में मिलकर , विलीन हो कर, एक रूप होते हैं ।  शेर , बाघ, भालू, कीट , पतंगा, मच्छर, भृँग, मनुष्य सभी जीव एक में समा जाते हैं !  किसी को इस ज्ञान का सत्य , विदित होता है, अन्यों को नहीं !  वही परमात्मा बीज रूप हैं बाकी सभी उसी के उपजाए विविध भाव हैं ! वही एक सत्य है - वही आत्मा है - हे पुत्र श्वेतकेतु, वही सत्य तुम स्वयं हो ! 
तत्` त्वम्` असि ! 

नाम : लावण्या दीपक शाह 

Monday, August 4, 2014

साहित्यकार: श्री अमृतलाल नागर जी


 जन्म : १७ अगस्त १९१६  / २३  फ़रवरी, १९९० सुप्रसिध्ध साहित्यकार श्री अमृतलाल नागर जी का जन्म सुसंस्कृत गुजराती परिवार में  
सन १७ अगस्त १९१६ को गोकुलपुरा, आगराउत्तर प्रदेश में इनकी ननिहाल में हुआ था। इनके पितामह पण्डित शिवराम नागर 1895 ई. से लखनऊ आकर बस गए। इनके पिता पण्डित राजाराम नागर की मृत्यु के समय नागर जी कुल १९  वर्ष के थे। 
शिक्षा : अमृतलाल नागर की विधिवत शिक्षा अर्थोपार्जन की विवशता के कारण हाईस्कूल तक ही हुई, किन्तु निरन्तर स्वाध्याय द्वारा इन्होंने साहित्यइतिहास,पुराण , पुरातत्त्व, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान आदि विषयों पर तथा हिन्दीगुजरातीमराठीबा ंग्ला एवं अंग्रेज़ी आदि भाषाओं पर अधिकार प्राप्त किया।
उनके एक उपन्यास ' भूख ' की भूमिका में श्रध्धेय नागरजी लिखते हैं 
  भूमिका : आज से इकहत्तर वर्ष पहले सन् १८९९ -१९०० ई० यानी संवत्१९५९ -  १९५६  वि० में राजस्थान के अकाल ने भी जनमानस को उसी तरह से झिंझोड़ा था जैसे सन्’४३  के बंग  दुर्भिक्ष ने। इस दुर्भिक्ष ने जिस प्रकार अनेक साहित्यकों और कलाकारों की सृजनात्मक प्रतिभा को प्रभावित किया था उसी प्रकार राजस्थान का दुर्भिक्ष भी साहित्य पर अपनी गहरी छाप छोड़ गया है। उस समय भूख की लपटों से जलते हुए मारवाड़ियों के दल के दल एक ओर गुजरात और दूसरी ओर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नगरों में पहुँचे थे। कई बरस पहले गुजराती साहित्य में एक वरेण्य कवि, शायद स्व० दामोदरदास खुशालदास बोटादकर की एक पुरानी कविता पढ़ी थी जो करुण रस से ओत- प्रोत थी। सूखे अस्थिपंजर में पापी पेट का गड्ढा धंसाए पथराई आँखों वाले रिरियाते हुए मारवाड़ी का बड़ा ही मार्मिक चित्र उस कविता में अंकित हुआ है।
 सन ’४७  में आगरे में अपने छोटे नाना स्व० रामकृष्ण जी देव से मुझे उक्त अकाल से संबंधित एक लोक-कविता भी सुनने को मिली थी जिसकी कुछ पंक्तियां इस समय याद आ रही हैं 
‘ आयो री जमाईड़ों धस्क्यों जीव कहा से लाऊ शक्कर घीव-
  छप्पनिया अकाल फेर मती आइजो म्हारे मारवाड़ में।'
( १९४६ ) पँचु गोपाल मुखर्जी  एक पाठशाला के निर्माण के बाद हेड मास्टरी करते हुआ, बँगाल की भूखमरी को जीते हैँ। जिसे पाठक उन्हीँ की नज़रोँ से देखता है। इस उपन्यास को आजतक, हिन्दी के खास दस्तावेज की तरह आलोचक व पाठक उतनी ही श्रध्धा से पढते हैँ जितना कि जब उसे पहली बार पढा गया होगा ! 

अमृत और विष  
कन्नड "अमृत मट्टु विष" पी. अदेश्वर राव द्वारा लिखित कथा का हिन्दी अनुवाद - जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ 
किस्से कहानियाँ,लघु कथाएँ, नाटक, निबँध, आलोचना लिखनेवाले हिन्दी के प्रसिध्ध साहित्यकार जिन्हेँ भारत सरकार ने "पद्म भूषण" पुरस्कार से नवाज़ा है। सोवियत लेन्ड अवार्ड सन १९७० मेँ मेरे चाचाजी को मिला था। तब वे बम्बई रुके थे और पापाजी से मिलने आये थे और रशिया से एक बहुमूल्य रत्न " ऐलेक्ज़ान्ड्राइट" भी लाये थे । ये  बेहद सुन्दर रत्न होता है जो रंग बदलता रहता है। मेरे चाचाजी को पापाजी के विस्तृत रत्न व ग्रहोँ के ज्ञान के बारे मेँ पता था। आज, वह "ऐलेक्ज़ान्ड्राइट "  रत्न, मेरी बड़ी बहन स्व.वासवी मोदी के पुत्र मौलिक के पास है !
मेरे चाचाजी भी ऐसे ही बहुमूल्य "रत्न " थे !
हिन्दी साहित्य जगत के असाधारण प्रतिभाशाली साहित्यकार थे वे !"प्रतिभा जी" के पतिदेव! लखनऊ शहर के गौरव स्तँभ !अनगिनत उपन्यास,कथा कहानियाँ, संस्मरण, बाल वार्ताएं, फ़िल्मी पटकथाएं, फिल्म के संवाद क्या कुछ उनकी कलम ने नहीं लिखा ! अरे ,कविताएँ भी लिखा करते थे मेरे परम आदरणीय नागर जी चाचा जी ! आपको अचरज हो रहा होगा पर मेरी बात सोलहों आने सच है! अपने मित्र ज्ञानचन्द्र जैन जी को वे बंबई और पुणे प्रवास के दौरान नियमित पत्र लिखा करते थे और पुस्तक ' कथा शेष ' में ज्ञानचंद जैन जी ने उनकी एक पत्र रूपी कविता प्रकाशित की है। नवलकिशोर प्रेस के प्रकाशन विभाग अथवा ' माधुरी ' में प्रवेश न मिल पाने पर श्री अमृतलाल नागर जी ने अपनी मनोदशा इस तरह अभिव्यक्त करते हुए एक पत्र - कविता रूप में लिखा था..     '
 ज्ञान मेरे 
खत तुम्हें मैं लिख रहा हूँ जब  है खता औसान मेरे माधुरी की धुरी टूटी मैं गिरा अनजान एकदम कह दिया प्रोपराईटर ने रख नहीं सकते तुम्हें हम वह खर्च घटाते अपना   सूखते हैं प्राण मेरे ! '  -अमृतलाल नागर 
अब , अगर आप सोच रहें हैं कि  हिन्दी साहित्य जगत के विलक्षण लेखक, एक असाधारण  प्रतिभाशाली साहित्यकार, श्री अमृतलाल नागर जी से भला, मेरा परिचय कब हुआ होगा ? तब उत्तर में, मैं , यही कहूँगी कि, जब से मैंने होश सम्भाला था तभी से उन्हें प्रणाम करना सीख लिया था! मेरे नन्हे से जीवन का एकमात्र सौभाग्य यही है कि मैं  लावण्या , पंडित नरेंद्र शर्मा जैसे संत कवि की पुत्री बन कर इस धरा पर आयी! पूज्य पापा जी और मेरी अम्मा सुशीला की पवित्र छत्र छाया में पल कर बड़े होने का सौभाग्य मुझे मिला!
   पापा जी के बम्बई आगमन के बाद कवि शिरोमणि श्रध्धेय सुमित्रानंदन पन्त जी दादा जी भी उनके संग रहने के लिए सन १९३६ से बम्बई आ गये थे। पापाजी और पन्त जी दादा जी तैकलवाडी , माटुंगा उपनगर में शिवाजी पार्क उद्यान के करीब पहले मंजिल के एक फ्लैट में कई वर्ष साथ रहे। बंबई में हिन्दी फिल्म निर्माण संस्थाएं विकसित हो रहीं थीं और साहित्यकार श्री अमृतलाल नागर जी, श्री भगवती चरण वर्मा इत्यादी भी बंबई में रहते हुए फिल्मों के लिए कार्य कर  रहे थे। उस समय भारत स्वतन्त्र नहीं हुआ था। परन्तु अंग्रेज़ी सरकार के शोषणकारी अध्याय का अंतिम अध्याय लिखा जा रहा था।  
चित्रलेखा उपन्यास के सर्जक श्री भगवती चरण वर्मा जी, श्री अमृतलाल नागर जी, श्रध्धेय सुमित्रानंदन पन्त जी तथा नरेंद्र शर्मा की साहित्यिक , सांस्कृतिक मित्रता भरे बंबई शहर में गुजरे इन दिनों के क्या कहने ! कुछ समय के लिए मद्रास में भी  ये लोग साथ साथ यात्रा पर गये थे।  श्री अरविन्द आश्रम पोंडिचेरी तक आदरणीय नागरजी ने उस दौरान यात्रा की थी।  फलस्वरूप इन सभी का आपस में सम्बन्ध और अधिक घनिष्ट हो गया । 
  बंबई के प्रिंस ऑफ़ वेल्स म्यूजियम के क्यूरेटर , भारतीय पुरातत्व और संस्कृति के उदभट विद्वान भार्तेन्दु  हरीश्चंद्र के प्रपौत्र , अपने व्यक्तित्व में बनारसी मौज - मस्ती के साथ विद्वत्ता का घुला मिला रूप लिए कला मर्मज्ञ  और साहित्यिक मनीषी,  डा.मोतीचंद्र जी  भी  बंबई के माटुंगा उपनगर में रहते थे जहां भगवती बाबू उनके पडौसी थे और अमृतलाल नागर, भगवती बाबू, मोतीचंद्र जी , नरेंद्र शर्मा जी की गोष्ठीयां कई बार प्रिंस ऑफ़ वेल्स म्यूजियम से सटे  एक बंगले पर जमती और वातावरण साहित्यमय, कलामय और संस्कृतिमय हो उठता ! 
 आदरणीय पन्त जी दादा जी के आग्रह से ही एक गुजराती परिवार की कन्या सुशीला से , प्रसिध्ध गीतकार नरेंद्र शर्मा का विवाह १२ मई १९४७ के शुभ दिन हुआ था। उसी वर्ष पराधीन भारत माता, देश भक्त भारतीयों के अथक प्रयास से और सत्याग्रह आन्दोलन के अनूठे प्रयास से सफल हो , गुलामी की जंजीरों से आज़ाद हुईं थीं!
          पूज्य अमृत लाल नागर चाचाजी ने अपने संस्मरण में लिखा है कि,' जिस दिन भारत स्वतन्त्र हुआ वे और उनके परम सखा कवि गीतकार नरेंद्र शर्मा, ( मेरे पूज्य पापाजी ) बाहों में बाहें डाले, बंबई की सडकों पर, बिना थके, प्रसन्न मन से, पैदल, बड़ी देर तक घूमे थे। उसी पावन क्षण, उन्होंने प्रण लिया था कि अब से वे अपना समय, साहित्य सेवा, या हिन्दी लेखन को समर्पित करेंगें। चाहे जो बाधा आये वे इस निर्णय से नहीं डीगेंगे  !' 
        तब तक नागरजी चाचा जी फिल्मों के लेखन से ऊब चुके थे।  जहां ४ या ५ फिल्मों के लिए संवाद , पटकथा लेखन करते हुए पैसा तो मिल जाता था पर मन की शांति और चैन छीन गया था। एक जन्मजात साहित्यकार और नित नया सृजन करनेवाले रचनाकार के लिए स्वान्त: सुखाय लेखन ईश्वर आराधना से कम नहीं होता। इस पवित्र धारा प्रवाह से विमुख होकर वे क्षुब्ध थे और एकमात्र यही मार्ग उन्होंने आने वाले अपने समय के लिए निश्चित करने का संकल्प किया था!  
         हमारी आँखें ना जाने क्या क्या दृश्य देखतीं रहतीं हैं और मन ना जाने कितनी सारी स्मृतियाँ संजोये रखता है! डायरी में बंद पन्नों की तरह! अगर हम इन पन्नों को एक बार फिर खोल कर नजरें घुमाएं, तब बीता हुआ अतीत , फिर सजीव होकर स्पष्ट  हो जाता है। यही हम इंसानों के जीवन का रोमांचकारी रहस्य है और जीवन वृन्तात का कुल जमा उधार है।
आप इस दृश्य से एकाकार हो लें तब आपको मेरे शैशव की कुछ अनमोल स्मृतियों के दृश्य जो अभी मेरे अंतर्मन में उभर रहे हैं उनसे परिचित करवाऊं ! 
           मेरे शैशव के दिनों की याद,  मेरे साथ है जहां चाचा जी , जो अक्सर बम्बई आया करते थे वे भी यादों के कोलाज में सजीव  दीखलाई देते हैं।
       कई बार नागर जी चाचाजी बंबई की उमस भरी गर्मियों के ताप को सहर्ष स्वीकारते हुए उनके बंबई के आवास ' सेरा विला ' से पैदल चलते हुए पापा जी के घर तक आ जाया करते थे। 
   मेरे पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा का घर, खार उपनगर में १९ वें रास्ते पर स्थित है। खार उपनगर का छोटा सा , एक स्टेशन भी है जहां बंबई की लोकल ट्रेन रूकती है। वहीं से चल कर, रेलवे स्टेशन से कुछ दूरी पर, श्रीमान मोतीलाल बनारसी जी की मिठाई की दूकान 'बनारसी स्वीट मार्ट ' भी है। इनके रसगुल्ले और समोसे बड़े प्रसिध्ध हैं! हाँ याद आया, रबडी भी! इसी दूकान से अक्सर नागर जी चाचाजी  कोइ रसीली मिठाई भी मिट्टी की हँड़िया में भरवा कर कि जिस हांडी पर एक हरा पात मुख को ढांके रहता था, हाथों में उठाये, हमारे घर आ पहुँचते थे। पसीने से तरबतर,  भीषण गर्मी में चल कर आते आते , उनका श्वेत कुर्ता भीग जाता था ! उन्हें देखते ही हम सब ' नमस्ते चाचा जी ' कहते और वे ' खुश रहो ' कहते हुए आशीर्वाद देते।  घर के भीतर आकर स्वागत कक्ष में पंखा खोल देने पर,  चाचा जी आराम से बैठ जाते और उनके चेहरे पर मुस्कान खिल उठती! सारा परिश्रम तेज घुमते पंखे की हवा के साथ हवा हो जाता! रह जाता सिर्फ उनका वात्सल्य और सच्चा स्नेह! 
          मेरी अम्मा ने ही हम से कहा था ' अरे , रे रे.. देखो तो, मीलों पैदल चल कर आये हैं नागर जी! पर बस से या टेक्सी से नहीं आये और अपने मित्र के लिए मिठाई लेते आये। कैसा निश्छल स्नेह करते हैं। ' 
           मेरी अम्मा श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा और पापा जी किसी अभिनन्दन समारोह में शामिल होने के लिए एक बार लखनऊ गये थे। अम्मा ने लौटने के बाद हमे बतलाया था कि उन्हें  इतना स्नेह मिला था सौ. प्रतिभा जी व पूज्य नागर जी चाचा जी के घर के अम्मा,पापा जी अभिभूत हो उठे थे। उनके आतिथ्य का बखान करते मेरी अम्मा थकतीं न थीं! वहां ( लखनऊ ) उस समय, आम का मौसम था और एक एक आम अपने हाथों से घोल कर स्नेह पूर्वक, आग्रह करते हुए नागर दम्पति ने उन्हें आम खिलाये थे। यह भी समझने की बात है कि आम खाने से भी अधिक प्रसन्नता, उन चारों को एक दुसरे के साथ मिलकर हुई होगी! उन चारों में,  प्रगाढ़  स्नेह था। चूंकि जब मेरी अम्मा , कुमारी सुशीला गोदीवाला का विधिवत पाणिग्रहण संस्कार हुआ था तब सारा कार्य भार भी नागर जी चाचा जी और प्रतिभा जी ने ही अपने जिम्मे सहर्ष स्वीकार कर लिया था। मेरी अम्मा सुशीला अत्यंत रूपवती थीं और गुजराती कन्या सुशीला गोदीवाला को दुल्हन के भेस में देख सभी प्रसन्न थे।  प्रतिभा जी ने नव परिणीता नव वधु को गृह प्रवेश करवाया तब सुकंठी सुरैया जी और दक्षिण की गान कोकिला एम. एस. सुब्भालक्ष्मी जी ने मंगल गीत गाये थे! इस मित्रों से घिरे परिवार के बुजुर्ग थे हिन्दी काव्य जगत के जगमगाते नक्षत्र कविवर श्री सुमित्रा नंदन पन्त जी ! 
             हिन्दी साहित्य, बंबई की  फ़िल्म नगरी के गणमान्य प्रतिनिधि जैसे चेतनानन्द जी, दिलीप कुमार, अशोक कुमार जैसे कई महानुभाव इस शानदार बरात में शामिल हुए थे। श्रीयुत सदाशिवम,सुब्भालक्ष्मी जी की नीली शेवरलेट गाडी को सुफेद फूलों से सजाया गया। उसी फूलों से सजी कार में सवार होकर शर्मा दम्पति अपने घर तक आये। 
बहुत बरसों बाद जब हम बड़े हुए, अम्मा ने आगे ये भी बतलाया था कि  प्रतिभा जी ने उस रात उन्हें फूलों के घाघरा ओढ़नी पहनाकर उन्हें  सजाया था।  तो पन्त जी दादा जी ने कहा  था कि ' मैं सुशीला जी को एक बार देखना चाहता हूँ ' और मुंह दीखाई में आशीर्वाद देते हुए कहा  था ' शायद वनकन्या शकुन्तला भी ऐसी ही सुन्दर रहीं होंगीं ! ' 
     बरसों बीत गये !  हम चार भाई बहन बड़ी वासवी, मैं लावण्या, मंझली, छोटी बांधवी और हमारा अनुज परितोष बड़े हुए।  हम  वयस्क  हो गये तब अम्मा ने हमे यह अतीत के भावभीने संस्मरण सुनाये थे। सुनाते वक्त , अम्मा , अपने युवावस्था के उन सुनहरे पलों में खो सी जातीं थीं। 
  अम्मा और पापा जी की शीतल छत्रछाया का एक आश्रय  स्थान , हमारा  घर, जो  १९ वे रस्ते पे आज भी खड़ा हुआ है , उस घर के संग,  अनेक स्वर्णिम स्मृतियाँ जुडी हुईं हैं और जब कभी नागर जी चाचा जी हमारे यहाँ पधारे तब  उन्हें , पापा जी के घर के स्वागत कक्ष में बिछे मैरून रंग के पर्शियन कारपेट पर , पालथी मारे बैठे हुए,  आज भी मैं मन की आँखों से देख पाती हूँ। [यह पर्शियन कारपेट युसूफ खान माने दिलीप कुमार जी तोहफे में अम्मा पापा जी की शादी पर दे गये थे। अपनी कार में वे , कई सारे कारपेट लाये थे और पापा जी ने अम्मा से इशारा कर मना किया था परन्तु जब युसूफ अंकल ने बहोत आग्रह किया तब अम्मा ने जो सबसे छोटी कारपेट थी वही युसूफ अंकल के  अनुनय के बाद ले ली थी]   
  श्रध्धेय नागर जी चाचा जी  की उन्मुक्त , निर्दोष हंसी भी सुनाई देती है और बातों का सिलसिला , जो  परम - स्नेही  सखाओं के बीच जारी था, जिसे समझने की उमर तो मेरी कदापि न थी पर यादें हैं जो एक स्वर्णिम आभा में रँगी हुईं आज भी चटख रंग लिए,  दमक  रहीं हैं। बीते हुए  पल , आज मुझे जादुभरे क्षणों से जान पड़ते हैं। 
  प्रधान मंत्री श्रीमती इन्दीरा गांधी के लिए उनका प्यार भरा संबोधन भी स्मृति की शाखों पे महकते फूल सा आज भी टिका हुआ है और चाचा जी का स्वर सुनाई पड़ता है,' हमारी बिटिया सरकार ' …  ऐसा घना  अपनत्व, कोमल ममता  से गूंथे पलछिन,  मेरे जीवन के अनमोल धरोहर रूपी वरदान की तरह मेरे साथ हैं।  आज वे पल , मेरे ह्रदय में पवित्रता बिखेरते हुए सुरक्षित हैं। काश मैं,अपने प्यारे नागर जी चाचा जी की विद्वत्ता या साहित्यिक अवदान के बारे में आप से कुछ कह  पाती! परन्तु ये कार्य और ज्ञानी जन के हवाले करती हूँ ! उनके साहित्य पर, उनके अवदान पर,  सांस्कृतिक मूल्यों  वगैरह पर  विद्वान लोग चर्चा करते रहेंगें  इस बात का मुझे विशवास है। मेरे लिए तो उनकी और मेरे पापा जी की मित्रता, एक घर के सदस्यों सी घनिष्टता ही मुझे बरबस याद आती है। उनके भाई श्री रतन नागर जी अच्छे कलाकार थे और मेरी अम्मा भी हलदनकर इंस्टीटयूट से ४ साल चित्रकला सीखीं थी। श्री  रतनलाल नागरजी  श्री  साउंड स्टूडियो में फोटोग्राफर थे और  तीन दिनों की बीमारी में चल बसे थे।  श्री रतन नागर जी का बनया हुआ एक चित्र ' अर्धनारीश्वर '  शायद आज भी पापा जी के घर के सामान में कहीं अवश्य होगा। 
एक बार मद्रास  यात्रा का एक रोचक  किस्सा भी सुनाया था जिसे आप भी सुनें  ! 
 पापा जी और नागर जी एक मद्रासी सज्जन के घर , अतिथि बन कर पहुंचे थे। भिन्न प्रकार के खाद्यान्न परोसे गये थे जिनमे एक शायद नीम के पत्तों का पानी था! बेहद कडुवा और कसैला! तब चाचाजी और पापा जी , दोनों ने सोचा कि , पहले इसे ही पी कर समाप्त किया जाए फिर बाकी की बानगी खायेंगें। परन्तु जैसे ही वे कडवे पानी की कटोरी को पी लेते , उनकी कटोरी दुबारा भर दी जातीं! तब तो दोनों बहुत घबडाए और बंबई आने के बाद उस प्रसंग को याद कर काफी हंसी मजाक होता रहा।
 ये किस्सा भी मुझे  याद है और पापा जी का कहना कि 
' बंधू उस बार तो हम चीं  बोल गये !' आज भी चेहरे पे मुस्कराहट ला देता  है।      
हम बच्चों से हमारी  स्कूल के बारे में, मित्रों के बारे में, हम कौन सी पुस्तक पढते हैं , हमारी पसंद ,नापसंद इत्यादी के बारे में भी चाचा जी प्रश्न पूछते और हम से बहुत स्नेह पूर्वक  बात करते उस वक्त हमे लगता जैसे हमारे परिवार के वे बड़े हैं , हमारे अपने हैं!     
हाँ, एक बात बतला दूं,  उनका लिखा उपन्यास  ' सुहाग के नुपूर ' जिस दिन मैं ने पूरा पढ़ लिया था उस दिन से आज तक, वही मेरा सर्वकालिक- सर्व प्रिय उपन्यास है और मेरी ये भी दिली ख्वाहिश है कि मेरी बड़ी बहन पूज्य अचला दीदी इस उपन्यास की पटकथा  लिखें और उस पे एक बढिया फिल्म बने। उनकी बडी सुपुत्री, डो. अचला नागर जी ने  फिल्म "निकाह" की पटकथा लिखी है और ऋचा  नागर ने अपने प्रिय "दद्दु" से प्रेरणा लेकर,'आओ बच्चोँ नाटक लिखेँ' बाल नाट्य अकादमी संस्था स्थापित की है-  लिंक  http://www.tc.umn.edu/~ nagar/index.htmlजिस तरह आज भी मन तो यही चाहता है कि मैं फिर लौट जाऊं उन बचपन की सुनहरी गलियों में, जहां मेरे पापा जी का घर उसी दिन की तरह हमारे आदरणीय पूज्य नागर जी चाचा जी, पन्त जी दादा जी जैसी विभूतियों से जगमगाता, दमकता मेरी स्मृतियों में झांकता रहता है। पर बीते दिन क्या कभी किसी के लौटे हैं ? हाँ,  यादें रह जातीं हैं जिन्हें आज आप से साझा करने का सुअवसर मिला है जिसके लिए मैं कृतज्ञ हूँ!  मेरे शत शत प्रणाम एक सच्चे साहसी वीर, धीर साहित्य मनीषी को और मेरा ढेर सारा प्यार मेरे पूज्य नागर जी चाचा जी को। 
- लावण्या दीपक शाह 

सीनसीनाटी, ओहायो यु. एस. ए.
इ मेल : Lavnis@gmail.com  

Wednesday, July 9, 2014

Indian Traditional Sarees

Andhra  Pradesh Pochampalli, Venkatagiri, Kalamkari
 Gujarat Rajkot, Bandhini, mirror work, Patola, Gurjari block  print
 Karnataka Kasuti embroidery, Dharwad, Mysore crepe, Ilkal,  Mankaala mooru, mysore silk
 Madhya  Pradesh Tassar, Chanderi, Maheshwari
 Maharashtra Narayanpethi, Jijamata, puneri, Paithani, Sindhi  embroidery
 Orissa sambalpuri, kotki
 Rajasthan Kota, Sanganeer block print, Bandhej
 Tamil Nadu Kanjeevaram silk, Kanjeevaram thread work in cotton,  Coimbatore cotton, Salem cotton silk, Dharmavaram
 West Bengal Baluchari, bengal cotton, tangail,  dhakai (well,  actually from Dhaka)

-- Indian traditional saree: Juhi Chawla in Bollywood Maharashtriyan Saree  

Indian Traditional Sarees


  
Indian traditional sarees(saris) are draped at festivalsweddings and many other ceremonies. Bengalis wear a Bengali traditional sarees(saris) for the DurgaPooja. They wear traditional indian saris on all the five days. It could be a white and red-bordered saree for one of the days. It should have intricate work that gives it an elegant look. Traditional white sarees are worn while going for sad gatherings. Trendy sarees or traditional Benarasi sarees are hot during wedding. They are classified as traditional wedding sarees.Traditional embroidered sarees are quite famous for sangeet and party wear. Traditional silk sarees from Bangalore, chennai make a woman's wardrobe complete. Bandhej  are the tremendous sarees of Rajasthan.
Indian traditional saree
Indian traditional saree

Indian traditional saree: Aishwarya in Bollywood bengali saree
Indian traditional saree: Juhi Chawla in Bollywood Maharashtriyan Saree
Indian traditional saree: Rani Mukharji in Bollywood Rajasthani Saree
Indian traditional saree: Madhuri Dixit in Juhi Chawla in Bollywood Maharashtriyan Saree  Bollywood old Saree: Jayaprada  bollywood saree  Bollywood old Saree: Hema malini  bollywood saree

sabina-chopra-sabyasachi-fall-09-lakme-fashion-week
- लावण्या 

Saturday, June 14, 2014

' बहुत रात गये ' कविता संग्रह से: ग्राम चित्र :

ॐ नमस्ते
 पंडित नरेंद्र शर्मा मेरे पापा जी ने ' बहुत रात गये ' कविता संग्रह अपने बन्धु बच्चन जी को समर्पित किया है।
 आज उसकी एक कविता आप सभी के संग साझा करने का मन हुआ। अवश्य पढियेगा और आपके विचार से अवगत भी करवाईएगा। 
 पितृ दिवस पर मेरे पूज्य पिता के लिए सादर दुलार सहित, अर्पित 

 ग्राम चित्र  : 
मक्का के पीले आटे  - सी 
धूप ढल रही साँझ की !
देवालय में शंख बज उठा,
घंट - नाद ध्वनि झांझ की !

गाय रंभाती आती , ग्वाला 
सेंद  चुरा कर खा रहा !
पथवारी पर बैठा जोगी 
गीत ज्ञान के गा रहा !

कहीं अकेले , कहीं दुकेले 
सारस पोखर में खड़े !
पोखर के उस पार, गाँव में 
घर घर दीये हंस पड़े !

सर पर धरे घड़ा करी का 
घर आ रहा किसान है !
बांयें एक उदुम्बर, दायें 
देवी माँ का थान है !
दोनों और आषाढी धरती 
बाट देखती बीज की !
आई याद बहु की, जो पीहर 
गयी हुई है तीज की ! 

दिखे ज्वार के भूठ्ठे , दिखती 
बाल बाजरे की भरी;
दिखी छरहरी अरहर, रहती 
जो दो सौ दिन तक हरी !

बन के खेत, बाद है सन की,
फ़ैली - फूली   तोरई 
बेल या कि सूए में कोई 
सुतली हरी पिरो गई ! 

छूटने को तैयार, हार में 
खेती मक्का की खड़ी;
हरी - भरी सुंदरी इकहरी,
काया मोती की लड़ी ! 

लड़ी सचित्र मधुर सुधियों की,
प्यास आस - औलाद की;
जी भर आया, हुई अचानक,
मोम देह फौलाद की !

भागा आया छोटा भाई,
बन्नू जिसका नाम है;
भौजी आई हैं - यों  कह  कर,
भागा उलटे पाँव है ! 

गमकी धरती, चमका अम्बर,
सधा - बंधा चलता कृषक,
घर आते किसान के मन में,
बैलों के तन में थिरक!

फूला नहीं समाता , पर वह 
लेता सध कर सांस है;
बनता जैसे वह न क्वार में 
फूला केवल कांस है ! 

जैसे कुछ न हुआ हो, ऐसे 
आया वह चौपाल पर;
गया कुऐं पर, सर पर से वह,
बोझ चरी का डाल कर ! 

आधा कुआँ घेर में, आधा 
बाहर सारे, गाँव का
आधा अपना, आधा जग का 
कृषक जीव दो पाँव का ! 

देख बहू  को अनदेखा - सा 
करता धनिया का धनी;
मन में जो सोने की मूरत ,
दिखलावे को काकणी !

फेर रही दो हाथ प्यार से 
कृषक - वधूटी जोट पर;
कभी देख लेती किसान को 
घूँघट पट की ओट कर !
भुस में हरी चरी की कुट्टी,
पूरी भरी लड़ावनी;
बड़ी बड़ी आँखें बैलों की 
भोली भली लुभावनी !

बँधी थान पर दुही धेनु के 
थन भर आते प्यार से;
पीता वत्स पिलाती माता -
चाट उसे अपनाव से !
हाथ - पाँव धो कर, चौके में 
आया स्वस्थ किसान भी; 
तीन तीन तीमन तरकारी,
थाली में पकवान भी !

भरी - पूरी थाली किसान की,
धरती जैसे क्वार की !
हुई नई हर साल कहानी 
सूर्य - धरा के प्यार की !

माँ - बेटा बैठे बतराते,
माँ की सोयी सुधि जगी - 
न्योराती की रात सातवीं 
लछमन को सकती लगी !

हनुमान लाये उपाड  कर,
भारी बहुत पहाड़ था;
छोटी - सी बूटी संजीवनी,
नौ अंगुल का झाड़ था !

बेटा बोला ' क्या भारी था 
हनुमान बलवान को !
पर, माँ, वह भी याद करेंगें 
बली भरत के बाण को !

भरत भक्त धरती का बेटा,
भक्त भरत के बान - सा !
अपने आपे को धरती पर,
किले कौन किसान - सा ?

बीच गाँव में पंचायत- घर 
गूँजा जयजयकार से;
राम - बान सा वह भी निकला 
अपने घर के द्वार से !

क्या देखा, रह गई न धरती 
अन्धकार के पाश में !
जौ के आटे की लोई - सा 
चाँद चढ़ा आकाश में ! 

झाँझी लेकर कन्या आई,
लांगूरा टेसू लिए;
नौ नगरी सौ गाँव बसेंगे,
सदा भवानी पूजिये !

जागे लछमन जती, गाँव का 
पंचायत - घर खिल गया;
राजा रामचन्द्र की जय में,
एक और स्वर मिल गया !

कथा विसर्जित हुई, नीम पर 
हिन्नीपैना आ गया;
बूढ़े बड़ की घनी जटा में 
ढलता चन्दा समा गया !

पति की पैछर सुन कर धनियाँ 
चुपके साँकल खोलती;
खड़ी कटोरा लिये दूध का,
आखर एक न बोलती !

सास - ननद - देवर के डर से 
चूड़ी खनकाती नहीं ;
पति के पास खड़ी है गुमसुम,
बहुत पास आती नहीं !

अन्धकार सागर जीवाशय,
दो लहरें टकरा रहीं;
किस विदेह से आंदोलित हो,
देह निकटतर आ रहीं !

स्ववश कौन ! ऊर्जा - तरंग में ,
विवश देह मन की लगन ! 
है पीड़ा में पुलक, दाह में 
दीप्ति, शान्ति देती अगन ! 

रीति सनातन, नया नहीं कुछ,
धरती पर, आकाश में;
तत्त्व पुरातन बनता नूतन 
अनुभव में, अभ्यास में !

ऊर्जा - पुंज सूर्य आ निकला 
क्रोड तिमिर का फोड़ कर,
लिए हुए हल - बैल कृषक भी 
खड़ा हुआ नौतोड़ पर !

वह न अहंकारी, सूरज को 
सादर शीश नवा रहा !
हलवाहे को सोच नही यह - 
उसको काल चबा रहा !

कुछ मुंह में कुछ गोद , खलक सब 
बना चबेना काल का ! 
नहीं बीज का, है शायद यह
हाल पात का डाल का !

वैकल्पिक कुछ नहीं जगत में 
सब दैवी संकल्प है !
हँसी - खेल में काम कराता,
प्रभु न कौतुकी स्वल्प है !

कब जोता ? कब बोया ? कैसे -
नई फसल उठ आ रही - 
ऊर्जा - अणु बन प्राण - पिंड को 
माया खेल खिला रही ! 

माया झूठी नहीं , नहीं तो 
सत्य छोड़ देता उसे ! 
अगर ऐंठ कर चलती ठगनी 
सत्य तोड़ देता उसे !

निर्विकल्प भव लीन कृषक का 
जीवन सहज समाधि है ;
क्षेत्र बीज से कतराने में 
आठों पहर उपाधि है ! 

देहभूमि या नेहभूमि या 
भूमि अगम आकाश की,
क्षेत्र - बीज - सम्बन्ध निबाहे ,
बिना, मुक्ति कब दास की ?

तन से दास , भक्त हैं मन से 
आत्मा से अविभक्त हैं;
क्षेत्र - बीज की तरह परस्पर 
नारी - नर आसक्त हैं !

ग्राम चित्र अंकित है जिस पर, 
वह ऊपर का पर्त् है ,
अंतर्हित गंगा - यमुना से 
सिंचित ब्रह्मावर्त है ! 

एक छमाही बीत गई है 
लगी दूसरी चैत में ,
गति में द्वैत, किन्तु गति - परिणति  
है केवल अद्वैत में !
         
जो अद्वैत, द्वैत उसको प्रिय;
बनता एक अनेक है ;
एक गीत, कड़ियाँ अनेक हैं -
एक सभी के टेक है !

चैत मास की नौरती है,
साधों का त्यौहार है;
हंसी - खुशी त्यौहार मनाना 
गाँवों का व्योहार है !

चढ़ती धुप घुले बेसन- सी
लिपी खेत खलिहान पर;
हैं किसान के नयन निछावर 
धरती के वरदान पर !

कहीं चल रही दाँय पैर में,
कहीं अन्न का ढेर है;
देर भले ही हो प्रभु के घर,
किन्तु नहीं अंधेर है !

लढ़िया भर भर रास आ रही 
हर किसान के द्वार पर;
स्वर्ण निछावर है गाँवों के 
मटमैले संसार पर !

छाती बढ़ी बहू की, घर के 
हर कोने में नाज है;
सास महाजन, जिसके मन में 
बड़ा मूल से ब्याज है !

सतमासा है छोटा बेटा,
इसे याद कर डर गई;
गुड - गेहूँ - घी चौअन्नी ले,
वह पंडित के घर गई !

आज रामनौमी है, पंडित बोला -
सुखिया जान ले !
वह नौ दिन नौ मास कोख में 
राज करेगा मान ले ! 

सावन - धोय मैल कटेंगे 
पंडित बोला प्रेम से - 
राम नाम का जप कर सुखिया,
साँझ - सवेरे नेम से !

बीती ताहि बिहार, राम जी 
तेरी मनचीती करें !
तेरे पोते के प्रताप से ,
सुखिया दोनों कुल तरे !

देवर और ननद भाभी का 
हाथ बटाते काम में !
अब की साल बहुत कम इमली,
खूब फल लगे आम में !

गेहूं बेच पटाया पोता,
गिरिधर का सीना तना - 
घर में भर गोजइ , चनारी 
मटरारी , बेझर , चना !

हाथ पसारा नहीं , कर्ज में,
पाँव नहीं जकड़े गये;
न्योली में नगदी, गठरी में 
चीज - बस्त, कपड़े नए ! 

संवतत्सर शुभ है, घर - घर में 
अन्न भरा कोठार में;
पांत बाँध कर खाया सब ने 
गाँव गाँव ज्योनार में !

अब के बरस बहुत साहे हैं 
मासोत्तम बैसाख में;
गाँव - गाँव में ब्याह हुए हैं 
दस बारह हर पाख में !

बैठा ज्यों ही जेठ, चुट गई,
अरहर, सन नुकने लगा;
सूने पड़े खेत, कृषकों का 
काम - काज चुकने लगा !

चार पहर तक चढ़ी कढ़ी- सी 
पीली आंधी आ गई;
जंगल गैल गाँव पर पीले 
पर्त धुल की छा गई !
जेठ दसहरा, नहर नहाने 
निकले घर के सब जने;
बाँट बंदरों को गुड़धानी 
खाते सब लाई - चने !
बहू मांगने लगी सिंघाड़ा,
कहाँ  सिंघाड़ा जेठ में ?
सास हंस पड़ी - तेरा ससुरा 
आया तेरे पेट में !

धनिया बनी लाज की गठरी 
ककड़ी नरम चबा रही;
हरे जवासे की हरियाली 
उसके मन को भा रही !

जेठ मास में चढ़े तवे - सी 
भूमि, तप रही रोहिणी;
बहुत दूर है मैदानों से 
श्याम  घटा मनमोहिनी !

पंथी के पांवों में छाले,
पंख पखेरू के जले ! 
ग्वाल और गोधन जा बैठे - 
सीरक में बरगद तले ! 

दोपहरी में छिपते सब, ज्यों  
भेद भरम के भेदिया;
बियाबान में लू के झोंके,
जैसे भूखे भेड़िया !

कहीं बवंडर उठते, जैसे 
हाबूङों की टोलियाँ;
बबरीबन में पवन बोलता 
बनमानस की बोलियाँ !

साँझ हुए निकले सब प्राणी 
फिर जीने की आस में;
धनिया के पांवों में बिछुआ,
बिछुआ है आकाश में !

पवन चला पुरवैया नय्या 
बनती नभ में घन - घटा;
काशीफल - सा पेट बहू का,
पीला पड कर तन लटा !

शोभित है आषाढ़ मुँड़ासा 
बाँध ज़री का जामनी;
बैठा है कुछ दूर, पारा पर कितना 
धनिया का धनी !

कौंधा का चौंधा, गड़ - गड घन,
बरसा पानी टूट के;
बह  निकले परनाले नाले 
जैसे पैसे लूट के !

जल जंगल हो गये , एक ,
बगिया में टपका आम था;
पैडा खाकर पंडित बोला,
बछड़ा घर के काम का !

आया नया किसान बंद जिसकी,
मुठ्ठी में बीज है !
छोरी आन गाँव की बछिया -
दान - मान की चीज है !

दादी ने पोते को देखा,
दादा की उनहार थी !
सुधि का बादल उमड़ा मन में,
आँखों में जलधार थी !

कर तिहायला हलुआ, पहला 
ग्रास खिलाया गाय को;
फिर चुपचाप खिलाया अपनी 
बहू - लाल की धाय को !
पुरुष बीज , नारी धरती है;
जनम जनम की प्रीती है !
नई फसल पर सृष्टि रीझती 
यही पुरानी  रीत है !
दिया सास ने सोंठ और गुड,
लिया बहू ने चख लिया;
पंडित ने नन्हे किसान का 
नाम रामधन रख दिया !

यही कहेंगें लोग, चित्र यह 
केवल विगताभास है;
किन्तु हुआ जो, होगा भी फिर,
यह मेरा विशवास है ! 
- पं . नरेंद्र शर्मा