Wednesday, February 3, 2010

दूसरा नोबल पुरस्कार ? इस पुरस्कार को सम्मानित करनेवाली एक भारतीय महिला हैं रुथ मनोरमा


दूसरा नोबल पुरस्कार ?

जी हां , इस पुरस्कार को सम्मानित करनेवाली एक भारतीय महिला हैं रुथ मनोरमा ।
नारी के पक्ष में हैं रुथ मनोरमा । हर प्राताडित इंसान के लिए कार्य करतीं हैं वे --
आपने शायद इनका नाम भी न सुना हो ।

परंतु इन्होंने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है और उनकी खुलकर सराहना की गयी है ।

नारी के लिए समाज में संघर्ष करना, आवश्यक भी है।

किन्तु , अबला , जब् सबला हो जाती है तब , नये पथ पर चल निकलती है ।

दूसरी अबला महिलाओं को सहारा देकर, उनके उत्थान के लिए कार्य करना , उन्हें सही दिशा में आगे ले जाना उसके बाद की अवस्था है ।
ऐसी ही एक साहसी महिला हैं रुथ मनोरमा ।





उन्होंने दलित महिला के संघर्ष को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ने में भारत में और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी परिस्थिति से उभरने में सहायता की है ।

रुथ मनोरमा जी ११ वी भारतीय नागरिक हैं जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ है ।
$ २७५ ,००० की धन राशि , ब्राजील के नागरिक ,
चीको व्हीटेकर और उत्तर अमेरीकी नागरिक
डेनियल एल्ज्बर्ग के बीच बांटी गयी ।

अब ये दूसरा नोबल क्या है उस के बारे में जान लें .

पहले नोबल के बारे में हम , जानते ही हैं ।

क्लिक : करें और देखें : http://nobelprize.org/


इस वर्ष शांति प्रयासों के लिए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को ये नोबल दिया गया है और भारत के कवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टगोर को उनकी पुस्तक ' गीतांजलि ' के लिए भी साहित्य के लिए ये नोबल मिल चुका है ।

परंतु ये दूसरा नोबल क्या है ?

इसका उद्देश्य है " सही जीवन प्रणाली पुरस्कार "

ये नाम बौध्ध धर्म में सूचित आदेशानुसार है ।

यही कई धर्म में भी कहा गया है कि , ऐसे कर्म से आजीविका मिले जिससे ना तो पर्यावरण का नुक्सान हो नाही किसी अन्य जीव का !
वही सर्वोत्तम है ........... धरती का भला हो, लोक कल्याण भी हो ! वही सर्वोत्तम है ..............
जहां सदा ही संधर्षों का सामना करना पड़ता है ऐसे जीवन में , सही जीवन प्रणाली का चुनाव भी ,
अति आवश्यक है ।

आइये अब मिलते हैं एक अन्य विश्व नागरिक से, जिसके सीने में , दूसरों के दर्द के लिए अपार ममता व सहानूभूति रही । अपने , जीवन से, अपने उसूलों से जिसने , अपने जीवन की तथा कईयों के जीवन की दिशा बदलने का महान कार्य किया ।

" एक दीप सौ दीप जलाए, मिट जाए अंधियारा " ~~

दद्दा , कविवर मैथिली शरण गुप्त जी का कहना यहां सच हुआ दीखलाई दे रहा है --


जेकब वान उक्ज्हाल नामक यूरोपीयन सामूहिक पार्लियामेंट के सदस्य रहे और वे, डाक टिकट एकत्र करने का शौक भी रखते थे ।


उन्हें नोबल पुरस्कार की जानकारी थी और ये भी पता था के पश्चिम के विकसित देशों के वैज्ञानिकों को अकसर ये पुरस्कार मिलता रहा है जिससे , पश्चिम के देशों का ही लाभ ही अधिकाँश , होता आया है - आधुनिक व्यवसायी जगत के उसूलों से पनपे, उसीको परिष्कृत करते ये सम्मान , उसी पध्धति के जडमूल को सींचते रहे हैं । उन्हें , इस पूरे प्रबंधन में बड़ी भारी कमी दीखाई दी ।

विश्व शांति व उसके लिए कीये जाने वाले प्रयास, हवा, पानी, जमीन से सम्बंधित कई मसले
जिन्हें लोग , सीधे , उसी आबोहवा में जीते हुए , उसे सुरक्षित और बेहतर बनाने के प्रयास में ,
विषम परिस्थितियों में रहते हुए , जूझ रहे थे , ऐसे लोगों पर, जेकोब का ध्यान केन्द्रीत हो गया
मानवीय अधिकारों की अवहेलना, अणु विज्ञान से उपजे आधुनिक युग के भयंकर परिणाम,
हिंसा , गरीबी का प्रकोप और प्रताड़ित वर्ग की अनदेखी .........
-- अति , जिससे समाज के धनिक वर्ग में शोषण व उपभोग की बढ़ती हुई मनस्थिति और अप व्यय , धनिक वर्ग में फैलती हुई धार्मिक तथा दया भावना के प्रति उदासीनता जैसे , अति गंभीर तथ्यों पर जेकब महाशय का ध्यान केन्द्रीत हो गया था ।


- अब क्या किया जाए ?
सर्व प्रथम उन्होंने नोबल कमीटी से , इन अम्भीर मुद्दों पर कार्य कर रहे ख़ास व्यक्तियों को
पुरस्कार / सम्मान देने की सूची में शामिल करने पर सुझाव दिया --
उस नये एवार्ड की धन राशि देने की तत्परता भी दीखलाई , परंतु नोबल कमिटी ने
प्रस्ताव , अस्वीकार किया - जेकोब ने फिर भी हार न मानी ।

अपना बहुमूल्य डाक टिकटों का संग्रह जेकब ने बेच दिया और १९८० में
अपने न्यास की स्थापना कर " सही जीवन प्रणाली पुरस्कार " आरम्भ करने की घोषणा कर दी


जेकब वान उक्ज्हाल जर्मन तथा स्वीडीश नागरिक हैं अत: स्वीडन की लोकसभा में नोबल इनाम से ठीक एक दिन पहले " सही जीवन प्रणाली पुरस्कार " की घोषणा होने लगी ।


अब रुथ मनोरमा जी के पुरस्कार की बात करें ।


भारत में स्त्री संघर्ष की गाथा , सदीयों पुरानी होते हुए भी आधुनिक समाज के लिए भी उतनी ही पेचीदा है जितनी सदीयों पहले थी ।

एक तो नारी और ऊपर से अगर दलित वर्ग में जन्म हुआ हो तब समाज में संघर्ष अत्याधिक होना स्वाभाविक बन जाता है । तब अपने हित के लिए,
यह वर्ग , फैसले भी ले पाने की स्थिति में नहीं होते ।

कई सुधार तथा समाज के प्रताडित वर्ग में उत्थान के प्रयास भी इस गंभार मामलों को सुलझाने में अक्षम रहते हैं ।

बदलाव , बहुधा धीमी गति से आता है । शोषित वर्ग , कई मामलों में ,
पहले से भी ज्यादा शोषण किया जाए , ऐसी स्थिति में और नीचे गिर जाता है ।

उत्थान से जुडी कारवाही + बातें, फाइल में और मीटिंग में या , भाषण बाजी ,
नारेबाजी और कुछ आलेखों में सिमट कर , धीरे धीरे , भूला दिए जाते हैं ।

तेजी से बदल रहे समाज में , जिनकी स्थिति बिलकुल नीचले तबक्के में कैद है
उन पर , किसे समय है सोचने का ??
उन की ओर देखने का या उनके लिए ?? कोइ ठोस कार्य करने का ?

तब बदलाव आते भी बहुत विलम्ब हो जाना , ही अकसर हर मामले में देखा जाता है ।

फिर भी , बदलाव आ रहा है ...........देखिये ये लिंक :



रूथ मनोरमा ऐसी ही स्त्रियों के लिए तथा शोषित समाज के लिए संघर्षरत हैं ।


देखिये ये लिंक :

http://www.livemint.com/2009/06/26222115/If-I-were-FM--Fight-poverty.html

जीवन : जन्म : १९५२ स्थान : चेन्नई :
शिक्षा : एम्. ए. मद्रास विश्वविधालय से
विषय : समाज सेवा
शिक्षा उपरान्त रूथ मनोरमा ने मद्रास के CSO से कार्य आरम्भ किया ।

फिर अपना संगठन ' नारी की आवाज़ ' स्थापित किया ।

स्थानीय , घरों में काम करनेवाली महिलाओं को संगठित किया ।
ट्रेड यूनियन की स्थापना भी की ।
स्वयं दलित वर्ग से थीं अत: नॅशनल फेडरेशन ऑफ़ दलित वूमन भी स्थापित किया
ताकि , अपने हक्कों की लड़ाई, सही तरीकों से की जा सके ।
वे तभी से , आजीवन , संघर्ष से जुडी रहीं हैं ।
असंख्य संगठनों का निर्माण व स्थापना करतीं गयीं हैं ।

बेघर आवामों के लिए, गरीब बस्ती के लोगों के हक्क व आवास के लिए,
असंगठित हर कार्यकर्ता के लिए भी रूथ मनोरमा ने कार्य किया ।

जब् अश्वेत अमरीकी महिलाओं के जीवन की त्रासदी से उनका परिचय हुआ तब

उन्होंने ये कहा कि, " समाज कहीं का भी हो ये त्रासदी हर जगह देखी है । "

अब वे यूनाईटेड नेशंस की सभाओं में भी अपना भाषण देतीं हैं और खुलकर इन शोषित व प्रताडीत वर्ग की ओर , समाज का ध्यान केन्द्रीत कराकर , उनकी सहायता के प्रयास करतीं हैं ।

अन्य भारतीय जिन्हें ये एवार्ड पहले मिल चुका है उनमे प्रमुख नाम है बाबा आमटे का ।


और नर्मदा बचाओ आन्दोलन से जिनका नाम सुर्ख़ियों में आया है -' मेधा पाटकर '
-वे भी ये एवार्ड , प्राप्त कर चुकीं हैं ।

हर साल, " सही जीवन प्रणाली पुरस्कार " ४ गणमान्य , इंसानों को दिया जाता है ।

रूथ मनोरमा के साथ ये इनाम ब्राजील के चीको व्हीटेकर फेरेरा जिन्होंने
' विश्व सामाजिक फोरम ' की स्थापना की
डेनियल एल्ज्बर्ग अमरीकी , जो युध्ध के खिलाफ हैं और कोलंबिया में
काव्य - सभा आयोजन किया
[ the Festival Internacional de Poesia de Medellin। ]
उन्हें, ये एवार्ड , साथ साथ मिला ।


-- लावण्या




Sunday, January 31, 2010

आखिर ये `मुहब्बत ' है क्या बला ?

क्या है, न, हमें भी आदत थी , आप में से कईयों की तरह , कि कहीं कोइ बेहतरीन शेर या कविता पढी उसे सहेज लिया - - ऐसी ही किसी घड़ी में, ये शेर , हमने दर्ज कर लिए थे ...
शायद आपने पहले भी सुने होंगें , पर आज यही आपके सामने प्रस्तुत करने का मन हुआ ..

वीकेंड , यहां आराम करने से जियादा ,
बाज़ार में सौदा लाने में, अगले सप्ताह की तैयारी में ही अकसर बीत जाता है
आज भी , बाज़ार में गये तो हर तरफ, लाल और गहरे गुलाबी रंग में सजी , अनगिनती चीजें दीखलाई दीं ...

सोचा, बाहर ठण्ड है ...बर्फ है और ये क्या मांजरा है ?
हरसू लाल ही लाल और गुलाबी रंग बिछा हुआ है ?
तब ध्यान आया,
अरे ! ये तो अमरीकी महा - पर्व की पूर्व तैयारी और स्वागत में सजाया बाज़ार है !!
और याद आया " वेलेन्टाईन डे " ...

जो अभी २ सप्ताह की दूरी पर है ...परंतु , दुकानदार भाईलोग अभी से ग्राहक लुभाने के
विभिन्न पैंतरे रचते हुए , मगन हुए जा रहे हैं और क्या तो डायरी , और क्या तो केंडी ,
सब लाल , गुलाबी आभा लिए लकदक , जगर मगर ,
बेतरतीब , बिखरे , हर खरीदार को लुभाने में , व्यस्त हैं ....

तो सोचा , चलिए , आप में से , किसी को , प्यार भरा संदेस भेजना हो तो उनकी मदद ही की जाए ;-)

ये पुराने शेर जो नोट कर रखे थे , उन्हें , पुरानी डायरी से आज़ाद किया जाए ....

तो पेशे खिदमत हैं ये मुहब्बत पे रचे कुछ चुनींदा शेर ........
आपकी नज़र करते हुए ..............
आज आपसे एक ही विनम्र इल्तजा है,
शेर सुनिए और आपके बहुमूल्य कमेन्ट में, आपका लिखा हुआ
या फिर, आपका पसंदीदा , इश्क, मुहब्बत , प्यार पर एक शेर भी सुनाते जाईये ,
शायद औरों के काम आ जाए :-)
.............बस ... इतना ही कहना था ...
अब आगे , चलते हैं ................


१ ) "बेहज़ाद " साहिब मुहब्बत की पहचान इस अंदाज़ में कराते हैं -
"अश्कों को मेरे लेकर दामन पर ज़रा जांचो ,
जम जाए तो ये खून है , बह जाये तो पानी है !"

२ ) मुहब्बत और मजबूरी का दामन और चोली का साथ है . इसी बारे में -
"मजबूरी -ए -मुहब्बत अल्लाह तुझ से समझे ,
उनके सितम भी सह कर देनी पड़ी दुआएं ."

३ ) आगे वो कहते हैं की इश्क का ख्याल इबादत में भी पीछा नहीं छोड़ता -
"अब इस को कुफ्र कहूं या कहूं कमले इश्क ,
नमाज़ में भी तुम्हारा ख्याल होता है ."

४ ) मुहब्बत की हद्द कहाँ तक है , देखिये --
"जान लेने के लिए थोड़ी सी खातिर कर दी ,
रात मूंह चूम लिया शमा ने परवाने का ."

५ ) ग़ालिब का ये शेर तो आपके ज़ेहन से न जाने कितनी बार गुज़रा होगा -
"इश्क पर जोर नहीं , है ये आतिश ग़ालिब ;
के लगाए न लगे और बुझाये न बुझे ."

६ ) अर्श मल्स्यानी का यह शेर शायद पसंद आये -
"तवाजुन खूब ये इश्क -ओ -सजाए -इश्क में देख ,
तबियत एक बार आई मुसीबत बार बार आई ."

७ ) लेकिन आखिर ये `मुहब्बत ' है क्या बला ?
इकबाल साहिब का ये शेर काबिल -ए -तारीफ़ है -
"मुहब्बत क्या है ?
तासीर -ए -मुहब्बत किस को कहते हैं ?
तेरा मजबूर कर देना , मेरा मजबूर हो जाना ."

८ ) और `आदम ' साहिब भी ढून्ढ रहे हैं
"वो आते हैं तो दिल में कुछ कसक मालूम होती है ,
मैं डरता हूँ कहीं इसको मुहब्बत तो नहीं कहते !"

उनको तसल्लीबख्श जवाब नहीं मिला -

९ )
"अय दोस्त मेरे सीने की धड़कन को देखना ,
वो चीज़ तो नहीं है मुहब्बत कहें जिसे ."

१० ) कहते हैं की इश्क अँधा होता है
लेकिन ? -
"इश्क नाज़ुक है बेहद , अक्ल का बोझ , उठा नहीं सकता ."

११ ) एक ज़माना था के इश्क के मारों की जुबां पर
`दाग 'साहिब का ये शेर बेसाख्ता निकल जाता था -
"दिल के आईने में है तस्वीरे यार ,
जब् ज़रा गर्दन झुकाई देख ली तस्वीरे यार ! "

१२ ) मेरे नोजवान दोस्तों , ये याद रखना -
"मुहब्बत शौक़ से कीजे मगर एक बात कहती हूँ ,
हर एक खुश -रंग पत्थर , गौहर -ओ -नीलम नहीं होता ."

१३ ) और ये भी याद रखना जैसे के इकबाल साहिब ने ताकीद की है -
"खामोश अय दिल ! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा ,
अदब पहला करीना है मुहब्बत के क़रीनों में "

१४ ) आखिर में ,
फैज़ साहिब के इस शेर के साथ बात ख़त्म करती हूँ
जिसमें मानो सारी कायनात एक तरफ
और मुहब्बत ? :-))
"और क्या देखने को बाक़ी है ,
आप से दिल लगा के देख लिया !"

संकलन :
- लावण्या

Sunday, January 24, 2010

ऐ अमरों की जननी, तुमको शत-शत बार प्रणाम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

जीवन की अंधियारी

रात हो उजारी!

धरती पर धरो चरण

तिमिर-तम हारी

परम व्योमचारी!

चरण धरो, दीपंकर,

जाए कट तिमिर-पाश!

दिशि-दिशि में चरण धूलि

छाए बन कर-प्रकाश!

आओ, नक्षत्र-पुरुष,

गगन-वन-विहारी

परम व्योमचारी!

आओ तुम, दीपों को

निरावरण करे निशा!

चरणों में स्वर्ण-हास

बिखरा दे दिशा-दिशा!

पा कर आलोक,

मृत्यु-लोक हो सुखारी

नयन हों पुजारी!

स्व. पंडित नरेंद्र शर्मा -

मातृ-भू, शत-शत बार प्रणाम
ऐ अमरों की जननी, तुमको शत-शत बार प्रणाम,
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
तेरे उर में शायित गांधी, 'बुद्ध औ' राम,
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

हिमगिरि-सा उन्नत तव मस्तक,
तेरे चरण चूमता सागर,
श्वासों में हैं वेद-ऋचाएँ
वाणी में है गीता का स्वर।
ऐ संसृति की आदि तपस्विनि, तेजस्विनि अभिराम।
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

हरे-भरे हैं खेत सुहाने,
फल-फूलों से युत वन-उपवन,
तेरे अंदर भरा हुआ है
खनिजों का कितना व्यापक धन।
मुक्त-हस्त तू बाँट रही है सुख-संपत्ति, धन-धाम।
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

प्रेम-दया का इष्ट लिए तू,
सत्य-अहिंसा तेरा संयम,
नयी चेतना, नयी स्फूर्ति-युत
तुझमें चिर विकास का है क्रम।
चिर नवीन तू, ज़रा-मरण से -
मुक्त, सबल उद्दाम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

एक हाथ में न्याय-पताका,
ज्ञान-द्वीप दूसरे हाथ में,
जग का रूप बदल दे हे माँ,
कोटि-कोटि हम आज साथ में।
गूँज उठे जय-हिंद नाद से -
सकल नगर औ' ग्राम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

--भगवती चरण वर्मा

भगवती चरण वर्मा का जन्म ३० अगस्त १९०३ को उन्नाव जिले (उ. प्र.) के शफीपुर गाँव में हुआ था । वर्माजी ने इलाहाबाद से बी.ए., एल. एल. बी. की डिग्री प्राप्त की और प्रारम्भ में कविता लेखन किया । फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात । १९३३ के करीब प्रतापगढ़ के राजा साहब भदरी के साथ रहे । १९३६ के लगभग फिल्म कारपोरेशन, कलकत्ता, में कार्य । कुछ दिनों ‘विचार’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन-संपादन, इसके बाद बंबई में फिल्म-कथालेखन तथा दैनिक ‘नवजीवन’ का सम्पादन, फिर आकाशवाणी के कई केंन्दों में कार्य । बाद में, १९५७ से मृत्यु-पर्यंत स्वतंत्न साहित्यकार के रूप में लेखन ।

‘चित्रलेखा’ उपन्यास पर दो बार फिल्म-निर्माण और ‘भूले-बिसरे चित्र’ साहित्य अकादमी से सम्मानित । पद्मभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त ।

निघन : ५ अक्तूबर, १९८

समय की धारा में बहते बहते
हम आज यहां तक आये हैं -
बीती सदीयों के आँचल से कुछ
आशा के फूल , चुराकर लाये हैं

हो मंगलमय प्रभात पृथ्वी पर
मिटे कलह का कटु उन्माद ,
वसुंधरा हो हरी - भरी , नित,
चमके खुशहाली का प्रात !
- लावण्या

Sung By : Bhupen Hajarika

विस्तार है अपार.. प्रजा दोनो पार.. करे हाहाकार...
निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई,
निर्लज्ज भाव से , बहती हो क्यूँ ?

इतिहास की पुकार, करे हुंकार,
ओ गंगा की धार, निर्बल जन को, सबल संग्रामी,
गमग्रोग्रामी,बनाती नहीँ हो क्यूँ ?

विस्तार है अपार ..प्रजा दोनो पार..करे हाहाकार ...
निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई,
निर्ल्लज्ज भाव से , बहती हो क्यूँ ?

इतिहास की पुकार, करे हुंकार गंगा की धार,
निर्बल जन को, सबल संग्रामी, गमग्रोग्रामी,बनाती नहीं हो क्यूँ ?
इतिहास की पुकार, करे हुंकार,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?

अनपढ जन, अक्षरहीन, अनगिन जन,
अज्ञ विहिन नेत्र विहिन दिक` मौन हो क्यूँ ?
व्यक्ति रहे , व्यक्ति केन्द्रित, सकल समाज,
व्यक्तित्व रहित,निष्प्राण समाज को तोड़ती न क्यूँ ?
ओ गंगा की धार, निर्बल जन को, सबल संग्रामी,
गमग्रोग्रामी,बनाती नहीं हो क्यूँ ?

विस्तार है अपार ..प्रजा दोनो पार..करे हाहाकार ...
निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?

अनपढ जन, अक्षरहीन, अनगिनजन,
अज्ञ विहिननेत्र विहिन दिक` मौन हो कयूँ ?
व्यक्ति रहे , व्यक्ति केन्द्रित, सकल समाज,
व्यक्तित्व रहित,निष्प्राण समाज को तोडती न क्यूँ ?

विस्तार है अपार.. प्रजा दोनो पार.. करे हाहाकार...
निशब्द सदा , ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?
कविता : स्व. पंडित नरेन्द्र शर्मा

२६ जनवरी आते ही , भारतीय गणतंत्र दिवस की याद

उभर आती है .......भारत आबाद रहे, भारतीय जन गण मन खुशहाल रह

यही शुभकामना है ..साथ प्रस्तुत है देश प्रेम से रंगी रचनाएं ..
आनंद लीजिये और हमारी मात्रु भूमि को शत शत वंदन कीजिए...............
- लावण्या



Sunday, January 17, 2010

कविता : स्व. पंडित नरेन्द्र शर्मा / कविता - कोष " की पूरी टीम को मेरी हार्दिक बधाई

एक गीत का आनंद लीजिये , कृपया क्लीक करीए

http://www.sopanshah.om/lavanya/1949.wma

Mid-Night Moon - beauty, cool, warm

तुम उसे उर से लगा स्वर साधतीं--

 उठते सिसकते स्वर तुम्हारे मधुर बेला के!          मूक होती कथा मेरी,         शून्य होती व्यथा मेरी,         चीर निशि-निस्तब्धता जो,  तीर-से आते सिसकते स्वर तुम्हारे मधुर बेला के!          चाँद भी पिछले पहर का,         मुग्ध हो जाता, ठहराता!         क्या विदा-बेला न टलती  यदि कहीं आते सिसकते स्वर तुम्हारे मधुर बेला के?          बनी रहती चाँदनी भी         गगन की हीरक-कनी भी         ओस बन आती अवनि पर  चाँदनी, सुनकर सिसकते स्वर तुम्हारे मधुर बेला के?          रुद्ध प्राणों को रुलाते,         आज बाहर खींच लाते         निमिष में अंगार उर-सा  सूर्य, यदि आते सिसकते स्वर तुम्हारे मधुर बेला के?

कविता : स्व. पंडित नरेन्द्र शर्मा
कविता कोष में जिसे देखकर सुखद आश्चर्य हुआ
चूंकि ये कविता मैंने , वहीं पहली बार देखी है
पूज्य पापा जी की अनगिनत कवितायेँ हैं - कई ऐसी हैं जिन्हें पढ़कर अचानक ध्यान आ जाता है
अरे , ये वाली तो याद नहीं ..पर हैं उन्हीं की ...आज इन्हें आपके सामने प्रस्तुत करते खुशी हो रही है
और " कविता - कोष " की पूरी टीम को मेरी हार्दिक बधाई

भरे जंगल के बीचो बीच,
न कोई आया गया जहां,
चलो हम दोनों चलें वहां।

जहां दिन भर महुआ पर झूल,
रात को चू पड़ते हैं फूल,
बांस के झुरमुट में चुपचाप,
जहां सोये नदियों के कूल;

हरे जंगल के बीचो बीच,
न कोई आया गया जहां,
चलो हम दोनों चलें वहां।

विहंग मृग का ही जहां निवास,
जहां अपने धरती आकाश,
प्रकृति का हो हर कोई दास,
न हो पर इसका कुछ आभास,

खरे जंगल के के बीचो बीच,
न कोई आया गया जहां,
चलो हम दोनों चलें वहां।

कविता : स्व. पंडित नरेन्द्र शर्मा

सूरज डूब गया बल्ली भर-
सागर के अथाह जल में।
एक बाँस भर उठ आया है-
चांद, ताड के जंगल में।

अगणित उंगली खोल, ताड के पत्र, चांदनी में डोले,
ऐसा लगा, ताड का जंगल सोया रजत-छत्र खोले

कौन कहे, मन कहाँ-कहाँ
हो आया, आज एक पल में।

बनता मन का मुकुर इंदु, जो मौन गगन में ही रहता,
बनता मन का मुकुर सिंधु, जो गरज-गरज कर कुछ कहता,

शशि बनकर मन चढा गगन पर,
रवि बन छिपा सिंधु तल में।

परिक्रमा कर रहा किसी की, मन बन चांद और सूरज,
सिंधु किसी का हृदय-दोल है, देह किसी की है भू-रज

मन को खेल खिलाता कोई,

सुनकर सिसकते स्वर तुम्हारे मधुर बेला के?

रुद्ध प्राणों को रुलाते,

आज बाहर खींच लाते

निमिष में अंगार उर-सा सूर्य,

यदि आते सिसकते स्वर तुम्हारे मधुर बेला के?

Midnight Moon, 48"x48" , acrylic on canvas, 2006

Tuesday, January 12, 2010

दिल हुआ आशनां !

दिल हुआ आशनां !
-------------------------
बुझते चरागों से उठता धुआं , कह गया अफ़साने, ....रात के !
कि , इन गलियों में, कोई आकर, चला गया था !
रात भी थमने लगी थी, सुनके मेरी दास्ताँ ,
चाँद भी थमने लगा था, देखकर उठता धुंआ !
बात वीराने में की थी, लजा कर दी थी सदा,
आप भी आये नहीं थे, दिल हुआ था, आशनां !
रात की बातों का कोई गम नहीं
दिल तो है प्यासा, कहें क्या आपसे,
अब...हम भी तो हैं हम नहीं
रूई के नर्म फाहों जैसे मेरे अहसास
और तु, मिट्टी के इतर की शीशी -
समाती है खुशबु सारे कायनात की ,
बिखर जाती है खयालातों में , मेरे

तुझ से मिलने का मौसम, बिछुड़ने के पल भी ,
हसीं ख़्वाबों में , लिपटी तारों की बारात
वह हल्की सी बारिश , हल्का धुंधलका भी
कोहरे से भरी , तेरे काजल में डूबी सी रात

बहारें आयेंगीं, मुझे फिर ले जायेंगीं
उन मस्त अमिया के बागों में चुपचाप,
आँख मिचौनी खेला करते थे हम तम,
आँखों में हंसतीं थी , हर मुबारक रात

तेरा देर से आना, आकर , चले जाना,
वादों और कसमों के लम्बे सिलसिले
और मुकर जाना , हर वादे पे , रूठना
क्यूं करतीं थीं झूठे बहाने, हर रात ?
रात को
---------------------------
रातको शबनम झरेगी
जब् महकते गेसूओं पे,
थर्थारायेगी बाँहें तुम्हारी
कांप कर वीराने में

कब हम तम एक साथ
झुक कर खिडकियों से
देखेंगें अश्कों को बहते ?
सूखते -- एक दूजे के चेहरों पे ?
कोइ
--------------------------------------
रश्क होने लगा है हमें , अश्कों की सौगातों के लिए,
नाम महफ़िल में आया आपका, हमारे खो जाने के लिए
भीग जायेगी हीना हथेली पे, रंग और निखरेगा अभी
कहतें हैं माटी से मिल उठती है घटा , बरसने के लिए

क्यूं पूछा था , उसने , मुझसे , रुकूं या मैं चलूँ ?
दिल लेके चल देते हैं जो , मिलके बिछुड़ने के लिए
कितनी दूर तलक चला था मेरा साया , अनजाने में,
लौट आया है कोइ मेहमान बन दिल में समाने के लिए


- लावण्या

Thursday, January 7, 2010

-- ५० * तापमान ?? बा बा रे ....ऐसा पहली बार हुआ है, १७, १८ सालों में ...

A homeless man bundles up trying to stay warm as he makes his ...
त्तारीख : ६ , जनवरी ,२०१० ,
दक्षिण अमरीका के तालाहास्सी फ्लोरीडा में , यहां का एक गरीब इंसान , पूरा कम्बल ओढ़ कर , कडाके की ठण्ड से अपनी सुरक्षा करने का प्रयत्न कर रहा है -- ध्यान से देखिये , उसने स्नीकर माने जूते पहन रखे हैं , जींस भी पहनी है और सूरत दीख रही है और बतला रही है वह राष्ट्रपति ओबामा और मिसेज ओबामा , मिशेल की तरह यहां की , अश्वेत प्रजा में से एक, इंसान है --
उत्तर अमरीका के आयोवा , नब्रेसका और उत्तर डकोटा प्रांत, भारी बर्फबारी की चपेट में आ कर रोजमर्रा की जीवन के लिए जरूरी , परिस्थितियों से जूझ रहे हैं .........
ऐसा पहली बार हुआ है, १७, १८ सालों में ............
-- ५० * तापमान .........बा बा रे .... !!!!
नतीजन, बर्फ हटाकर . वाहन व्यवहार फिर कुछ कुछ सामान्य हो उसके लिए ,
बर्फ हटानेवाली ट्रक , बड़े बड़े फावड़ों से लैस , काम कर रहीं हैं
- मुख्य सड़कों पर नमक के साथ कंकड़ पत्त्थर मिलाकर, उस मिश्रण का छिडकाव किया जाता है ...
ताकि मार्ग पर दौड़ रहे वाहन , फिसले नहीं
अब, यह कार्य हरेक प्रांत की जिम्मेवारी रहने से , खर्चा भी बहुत बढ़ जाता है और अमरीकी मंदी की मार से त्रस्त कई प्रान्तों के बजेट , ऐसे भी , लाल रंग दिखला रहे हैं
[- माने उनके पास धनराशि का अभाव है] --
स्थिति गंभीर है ..परंतु , केन्द्रीय सरकार , ऐसे वक्त , मदद करती है और उबार लेती है ताकि परिस्थितियाँ सामान्य बनीं रहें और जन जीवन चलता रहे -- "
" जीवन चलने का नाम, चलते रहो, सुबहो शाम " ................
A man walks down a snow covered road in Benson, southern England, ...

Images

Beach buddies

A woman plays with a dog at the beach as a container ship sails past near in the northern German city of Cuxhaven.

ऐसे विशाल जहाजी सामान से लैस बेड़ों से दुनिया का व्यापार विनिमय संपन्न होता है

न्यू - योर्क , जिसे बीग एप्पल कहते हैं , उसके ऊपर , गगन में , निश्चिंत उड़ता हुआ कपोत ...






Gleb Garanich / Reuters

अब सोवियत संघ / रशिया की बात करें तो वहां से भी , ये समाचार आ रहे हैं ..........

भारी बर्फबारी की चपेट में आकर रोजमर्रा की जीवन के लिए जरूरी , परिस्थितियों से जूझ रहे हैं ये निरीह और मूक पशु ....










अब भारत की बात करें तो वहां से भी , ये समाचार आ रहे हैं .........

North India -- 100 PPL died due to severe cold ......makes me SAD :-((

कोपन हेगन में , दुनियाभर के वरिष्ठ नेता इकत्रित हुए ,
ग्लोबल वोर्मींग " पर विचार विमर्श किये गये .
हम लोग समाचार पढ़ते हैं और गंभीर होते हैं फिर हमारी दिनचर्या में लगे रहते हैं .
जीवन चलता रहता है
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परंतु जो सबसे कमजोर वर्ग है, गरीबी की रेखा के नीचे जिनका अस्तित्त्व है
उन्हीं को कठिनाईयों का सामना कर कष्ट उठाना पड़ता है
ये एक कटु सत्य है . जिससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते -
- कई संस्थाएं , मदद करतीं हैं - कई दयालु लोग , अपने अपने तरीके से , मदद करते हैं
कई लोग इतने ज्यादह , अपने उद्देश्यों को लेकर , गुस्सा हो जाते हैं कि, राजनेताओं की मंत्रणा हो रही हो वहां पहुँच कर , उग्र प्रदर्शन भी करते हैं
जैसे पर्यावरण [ enviornment ] के प्रति सजग कुछ व्यक्तियों ने , जापानी व्हेल मछली का शिकार कर रहे जहाजी बेड़े का समुद के मध्य में पीछा किया -- और उस जापानी जहाजी बेड़े ने , अपनी गतिविधि छिपाने की चेष्टा करते हुए, पलट वार करते हुए, समुद्र में , घूम कर , समुद्र की उताल तरंगों के मध्य में उन पर जवाबी हमला किया - और पर्यावरण के सजग रक्षकों की नाव को , जो तेजी से उनका पीछा कर रही थी , २ टुकड़ों में , काट कर चीर कर रख दिया --
शायद ये समाचार आपने भी देखा हो --
ऐसे ही संघर्ष , आधुनिक जीवन में दो खेमों में बंटे , विरोधी विचार धारा को , [कस कर थामे हुए , गुटों के बीच , हो रहे संघर्षों के समाचार ] , नित्य घटित होते हम , देखते हैं --
आम इंसान क्या करे ?
ये प्रश्न हमारे लिए, आज भी प्रश्न ही बना रहता है ---
This handout photo received and taken on January 6...This handout photo received and taken on January 6, 2010 from the Sea Shepherd Conservation Society shows the Sea Shepherd's ship Ady Gil (bottom), a wave-piercing boat formerly known as "Earthrace", after it was rammed by Japanese whaling vessel Shonan Maru No. 2 (background) in Antarctic waters. The space-age powerboat sent to harass Japanese whalers was rammed and sliced in two in its very first clash, activists said, dramatically escalating hostilities in icy Antarctic seas.

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