Monday, April 17, 2017

" एक थी तरू " पुस्तक आदरणीया माँ जी श्रीमती सरस्वती प्रसाद जी ' की स्मृति में


" एक थी तरू  " पुस्तक आदरणीया माँ जी 
श्रीमती सरस्वती  प्रसाद जी ' की स्मृति में मातृ तर्पण  रूपी पुस्तक, माँ जी की पुत्री लेखिका रश्मि प्रभा जी ने छपवाई है। 

सौ. रश्मि प्रभा जी ने जब मुझे  भूमिका लिखने का आग्रह किया तब मैंने यह आलेख लिखा। 
" आज , मैं , लावण्या , परम आदरणीया माँ जी ' श्रीमती सरस्वती  प्रसाद जी ' की स्मृतियों की बगिया में सैर करने निकली हूँ। अमरीका में दिसंबर का महीना है और बाहर  ६ इंच बर्फ गिरी है।   स्वच्छ , धवल बर्फ की सफेदी चारों ओर  हर वस्तु को अपने में समेटे शांत है। शान्ति बिखरी हुई है। प्रकृति  निस्तब्धता के परों  पर चतुर्दिक फ़ैली हुई है !  
मेरे प्रिय भारत से, मेरी भौगोलिक दूरियाँ मीलों लम्बी हैं और सात समुन्दर पार बैठी हुई मैं, आज माँ जी स्व . सरस्वती  प्रसाद जी के हिंदी ब्लॉग मैं और मेरी सोच...को पढ़ रही हूँ ! 
सच,  आधुनिक युग के आविष्कार www या इंटरनेट के जरीये,यह  सम्पूर्ण विश्व एक घर सा प्रतीत होता है।  विश्व के हर कोने से लिखे जा रहे, ब्लॉग याने  जाल घरों को हम कहीं से भी पढ़ पाते हैं और कितना कुछ जान लेते हैं ! 
एक सजग रचनाकारा, एक भावपूर्ण कवयित्री, सशक्त लेखिका और एक वात्स्ल्यमयी  माँ और गर्विता पत्नी की छवि  माँ जी सरस्वती जी के लेखन से उजागर है। एक के बाद एक उनकी प्रविष्टियों को पढ़ते हुए उनकी भव्य एवं पावन जीवन यात्रा की मनोरम छवि, इंटरनेट के माध्यम से, दूर से ही भले, मैं  देख रही हूँ पढ़ रही हूँ और मन हर्षित है! जब कभी हम कुछ ऐसा पढ़ते हैं जो हमारे अंतर्मन को छू जाता है तब ऐसे ही भाव ह्रदय में हिलोर लेते हैं ! 
      
मेरे सामने खुला है उनका एक रंगीन चित्र ! उनके भावपूर्ण शब्द और उनकी पसंद का गीत लिंक स्वर साम्राज्ञी लता दीदी जी के सुमधुर स्वरों में बज रहा है - ' मेरा छोटा सा देखो ये संसार है ' .... गीत की स्वर लहरियों को  सुन  कर मेरे नयन बार बार, अनायास सजल हो उठते हैं ! मेरे मन में श्रध्धा का भाव उमड़ रहा है !
 परन्तु एक प्रेम की प्रतिमा , एक वात्सल्य की देवी स्वरूपा माँ को कोइ किन शब्दों में याद करते हुए अंजलि दे ? यही सोच रही हूँ ! जब मैं अपनी भावांजलि माँ जी सरस्वती  जी को दे रही हूँ  … 
        
मेरी अनुजा एक सजग, उर्मिशील रचनाकार सौ . रश्मि प्रभा के आग्रह पर उनकी तथा मेरी, परम आदरणीया माता जी सरस्वती सदृश माँ जी की पुस्तक के लिए यह आलेख लिख रही हूँ।
गहन  सोच में लीन हो आखिरकार इस निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि, माँ जी के शब्दों से ही आपको उनका परिचय करवाऊं, यही सबसे अच्छा रहेगा। 

सो आगे, उन्हीं की वाणी को, मुखर किये देती हूँ। माँ जी के ब्लॉग से चुन चुन कर आप के संग श्रध्धा सुमन बाँट रही हूँ।
छायावाद के सुप्रसिध्ध स्तम्भ कविराज श्री सुमित्रानंदन पंत जी को मैं , ' दादा जी ' पुकारा करती थी।  मेरे पिता जी, स्व. पंडित नरेंद्र शर्मा और पंत जी दादा जी में अपूर्व घनिष्ठता थी। प्रबुध्ध रचनाकारा सुश्री सरस्वती जी के पारिवारिक संबंध भी पंत जी दादा जी के संग वैसे ही मधुर रहे हैं जैसे हमारे परिवार के संग रहे हैं । अत : हम दोनों परिवार  श्रद्धेय ' पंत ' जी की स्नेहाशीष रूपी रश्मि की डोरों से बंधे हुए हैं।
माँ जी सरस्वती जी की बिटिया
 का नामकरण  ' रश्मि प्रभा '  भी पंत जी के वरद मन का दिव्य प्रसाद है ! ये पंत जी जैसे ' हिंदी भाषा के संत कविवर की विलक्षण प्रतिभा की एक झलक मात्र है पंत जी ने कुछ चुने हुए विलक्षण नाम दिए हैं। पहले भी ' रश्मि प्रभा '  जैसा एक काव्यात्मक , अनोखा नाम चुन कर रखा था पंत जी ने याद दिलाऊं ? एक और  नाम पंत जी का दिया हुआ है - ' अमिताभ ' ! 
अब चलें माँ जी के शब्दों में उनके  अंतर्मन की यात्रा की और चलें  ~~~ 
 
पूजनीया  जी के शब्द  :   आप भी सुनें। 

' आरा शहर की एक संकरी सी गली के तिमंजिले मकान में मेरा जन्म २८ अगस्त को हुआ था। समय के चाक पर निर्माण कार्य चलता रहा। किसी ने बुलाया 'तरु' (क्योंकि माता-पिता की इकलौती संतान होने के नाते मैं उनकी आंखों का तारा थी)। स्कूल (पाठशाला) में नामांकन हुआ 'सरस्वती' और मेरी पहचान - सरू,तरु में हुई।  ' 
 कवि पन्त ने मुझे अपनी बेटी माना...और तभी संकलन निकालने का सुझाव दिया, इस आश्वासन के साथ  की भूमिका वे लिखेंगे.. मेरी रचना "नदी पुकारे सागर" हाल में प्रकाशित हुई..

मेरे मान्य पिता श्री. पन्त इसकी भूमिका नहीं लिख सके पर उनकी अप्रकाशित कविता जो उन्होंने मेरे प्रयाग आगमन पर लिखी थी..इस संकलन में हैं जो भूमिका की भूमिका से बढ़कर हैं...'   
वे आगे लिखतीं हैं ~~~ 
' मेरी आँखें बहुत सवेरे पड़ोस में रहनेवाली नानी की 'पराती' से खिलती थी। नानी का क्रमवार भजन मेरे अन्दर अनोखे सुख का संचार करता था । मुंह अंधेरे गलियों में फेरा लगनेवाले फ़कीर की सुमधुर आवाज़ इकतारे पर - 
' कंकड़ चुन-चुन महल बनाया
लोग कहे घर मेरा है जी प्यारी दुनिया
ना घर मेरा ना घर तेरा , 
चिडिया रैन बसेरा जी
प्यारी दुनिया ......' । 
मेरे बाल-मन में किसी अज्ञात चिंतन का बीजारोपण करती गई। फ़कीर की जादुई आवाज़ के पीछे - पीछे मेरा मन दूर तक निकल जाता था।
मुझे लगता था सूरज का रथ मेरी छत पर सबसे पहले उतरता है। चाँद अपनी चांदनी की बारिश मेरे आँगन में करता है। तभी मैं अपने साथियों के साथ 'अंधेरिया-अंजोरिया'का खेल खेलते हुए मुठ्ठी में चांदनी भर-भर कर फ्रॉक की जेब में डालती थी और खेल ख़त्म होने पर उस चांदनी को निकालकर माँ के गद्दे के नीचे छुपा देती थी....' 
आगे 
' उम्र के २५ वे मोड़ पर आकर मेरी कलम ने लिखा -
"शून्य में भी कौन मुझसे बोलता है,
मैं तुम्हारा हूँ, तुम्हारा हूँ
किसकी आँखें मुझको प्रतिपल झांकती हैं
जैसे कि चिरकाल से पहचानती हैं
कौन झंकृत करके मन के तार मुझसे बोलता है
मैं तुम्हारा हूँ,तुम्हारा हूँ.........."

आगे ,
मैं घर गृहस्थी के साथ १९६१ में कॉलेज की छात्रा बनी । हिन्दी प्रतिष्ठा की छात्रा होने के बाद कविवर पन्त की रचनाएं मेरा प्रिय विषय बनीं । ६२ में साथियों ने ग्रीष्मावकाश के पहले सबको टाइटिल दिया ।कॉमन रूम में पहुँची तो सबों ने समवेत स्वर में कहा ' लो, पन्त की बेटी आ गई'...... अब ना मेरी माँ थी और ना बाबूजी । साथियों ने मुझे पन्त की बेटी बनाकर मेरी भावनाओं को पिता के समीप पहुँचा दिया। उस दिन कॉलेज से घर जाते हुए उड़ते पत्तों को देखकर होठों पर ये पंक्तियाँ आई ," कभी उड़ते पत्तों के संग,मुझे मिलते मेरे सुकुमार"......
"उठा तब लहरों से कर मौन
निमंत्रण देता मुझको कौन"..........
अगले ही दिन मैंने पन्त जी को पत्र लिखा , पत्रोत्तर इतनी जल्दी मिलेगा-इसकी उम्मीद नहीं थी। कल्पना ऐसे साकार होगी,ये तो सोचा भी नहीं था.....'बेटी' संबोधन के साथ उनका स्नेह भरा शब्द मुझे जैसे सपनों की दुनिया में ले गया। अब मैं कुछ लिखती तो उनको भेजती थी,वे मेरी प्रेरणा बन गए । वे कभी अल्मोडा भी जाते तो वहां से मुझे लिखते.......हमारा पत्र-व्यवहार चलता रहा। पिता के प्यार पर उस दिन मुझे गर्व हुआ , जिस दिन प्रेस से आने पर 'लोकायतन' की पहली प्रति मेरे पास भेजी,जिस पर लिखा था 'बेटी सरस्वती को प्यार के साथ'
फिर , और आगे , 
M.A में नामांकन के बाद ही मेरे साथ बहुत बड़ी दुर्घटना हो गई,अचानक ही हम भंवर में डूब गए - इसके बाद ही हम इलाहबाद गए थे। पिता पन्त जब सामने आए तो मुझे यही लगा , जैसे हम किसी स्वर्ग से उतरे देवदूत को देख रहे हैं। उनका हमें आश्वासित करना,एक-एक मृदु व्यवहार घर आए कुछ साहित्यकारों से मुझे परिचित करवाना,मेरी बेटी को रश्मि नाम देना, और बच्चों के नाम सुंदर पंक्तियाँ लिखना और मेरे नाम एक पूरी कविता....
जिसके नीचे लिखा है 'बेटी सरस्वती के प्रयाग आगमन पर' यह सबकुछ मेरे लिए अमूल्य धरोहर है। उन्होंने मुझे काव्य-संग्रह निकालने की सलाह भी दी,भूमिका वे स्वयं लिखते,पर यह नहीं हो पाया। ' 
 सरस्वती  जी के काव्योद्गार : 
' डूबते चाँद का पता पूछो
 एक मुसाफिर यहीं पे सोया है
 नभ की खिड़की से सर टिका करके
 जाने कौन सारी रात रोया है! '


यह मैं हूँ...


ज़िंदगी के मेले में - " अपनी खुशी न आए थे " पर आए।  किसी ने बुलाया ' सरु ' , किसी ने ' तरु ' और इसी के साथ माता - पिता के इकलौती बेटी की एक पहचान बन गई। अपना खेल , कौतुक , कौतुहल ... मैं वह छोटी चिडिया बन जाती थी जो अपनी क्षमता से अनभिज्ञ नभ के अछोर विस्तार को माप लेना चाहती हैं।  


मेरा एक प्यारा सा खेल था कुछ एक खाली कमरों में दौड़ लगते मैं ज़ोर से आवाज़ देती थी - माँ sssssssssssssssssssssssssss............. उसकी गूँज मुझे रोमांचित और विस्मृत करती थी।  बाद में माँ ने मेरे प्रश्न पर बताया - मेरे साथ वह बोलती हैं। हर्षातिरेक से भर कर मैं उससे लिपट गई थी। आगे चल कर मेरी यही सोच मेरे शब्दों में उतरी - 

एक और भक्ति भाव से पूरित कविता - जिसका शीर्षक है ~~ ' दाता  '

लकी नींद के आगोश से रात १२.१५ में उठकर लिखने पर विवश सी हो गई.......
शायद मैंने हाथ बढाये थे-
दर्द का दान देकर तुमने मुझे विदा कर दिया !
यह दर्द, निर्धूम दीपशिखा के लौ की तरह
तुम्हारे मन्दिर में अहर्निश जलता है।
कौन जाने, कल की सुबह मिले ना मिले
अक्सर तुमसे कुछ कहने की तीव्रता होती है
पर.......... सोचते ही सोचते,
वृंत से टूटे सुमन की तरह
तुम्हारे चरणों में अर्पित हो जाती हूँ ! '


जो स्नेह करता हैं,
वही दुःख पाता हैं,
उसकी ही साँसें गिनती हैं घड़ियाँ,
वही चुना करता हैं,
आँसुओं के फूल,
छेड़ दिल के तारों को,
दर्द भरा गीत वही गाता हैं,
जो स्नेह करता हैं,
वही दुःख पाता हैं!
माना कि तुम-कोई कवि नहीं हो,
पर स्नेहसिक्त अनुभूतियों से अजनबी नहीं हो-
इस बात को तुम कैसे झुठलाओगे?
-नदी के उस पार ,
जब विश्वास का दिया जलता हैं,
तो सुना हैं मैंने-
"टूटा हुआ आदमी भी चलता हैं!"

"बेटी सरस्वती (यानी मैं) के प्रयाग आगमन पर!"

विजयादशमी का दिन था वह। पितृवत पन्त के पास बैठी थी मैं , कितनी कवितायेँ गा-गा कर उन्होने सुनाई।मेरे आग्रह पर - यह सुप्रसिद्ध रचना भी सुनाई "यह धरती कितना देती हैं" मेरी छोटी बेटी मिन्नी को नाम दिया - रश्मि। हमारी उपस्थिति में वहाँ प्रेमचंद जी के सुपुत्र अमृतराय जी आये तो पन्त जी ने परिचय दिया - "आओ अमृत,इनसे मिलो ,यह मेरी बेटी सरस्वती हैं.मुझसे मिलने सपरिवार आई हैं." महादेवी जी से फ़ोन पर उनकी बातें हुई.कभी-कभी यथार्थ भी स्वप्नवत लगता है-हम वहाँ हो कर भी जैसे किसी स्वप्नलोक में विचरण कर रहे थे...उनके आग्रह पर खाया,साथ-साथ चाय पी। "भरतमिलाप" देखने चलने को उन्होने कहा पर हमें लौटना था और...!हमें विदा करने आये तो अपनी गेट पे तब तक खड़े रहे जब तक हम आँखों से ओझल न हुए । "लोकायतन" की पहली प्रति मुझे उपहार स्वरूप भेजी । "चिदाम्बरा" पर जब पुरस्कार मिला तो मुझे लिख भेजा - "कुछ मांगो"।
दिल के दौरे के बाद जब डॉक्टर ने उन्हें लिखने को मना किया तो उनके पत्रों का आना कम हो गया और फिर... वे रहे नहीं। दाता की अनुपम देन है यह कि मेरी ज़िन्दगी की पुस्तक में इतने मधुरतम क्षण अंकित हैं। ' 
आदरणीया माँ जी सरस्वती  जी की यह , भावपूर्ण  कविता जो उनके जीवन का दर्पण है , 
 सुनाते हुए आपसे सादर स स्नेह विदा लेती हूँ 
 ' मैंने बहुत प्यार किया हैं
 अपनी माँ को , अपने दोस्तों को , पास - पड़ोस को ,
 परिवार को …..
बिना सोचे समझे ख़ुद को न्योछावर किया हैं !!!
हर बार
मन की छोटी चिडिया फुर्र्र्र्र से उड़कर वहाँ पहुच जाती हैं
जहाँ बचपन बीता था
कोई पकड़ लेगा , इस बात का
डर नही लगता !
तुम मानो या न मानो
हमारे पास तितलियों के पंखो जैसे
कुछ मोहक सपने थे
सपने , जो पराये नही अपने थे .
आज हम जहाँ से गुजर रहे हैं
जिधर से गुजर रहे हैं
बेशुमार भीड़ हैं , शोर हैं , भागम भाग हैं
सभी के पास समय का आभाव हैं
किसी के पास पल दो पल ठहरना
किसी के मन की बात सुनना
इतना अवकाश हैं कहाँ ???
संबंधो के रेशमी ताने - बाने
जो भटकते मन को एक ठहराव देते थे
माथे की शिकन को
अपने स्नेहिल स्पर्श से मिटा देते थे वो अपनी अलग पहचान बनाने को
मुखौटों में जीने लगे हैं !
यहाँ हर चीज़ मुँह मांगी कीमत देकर
खरीदी जा सकती हैं
सिर्फ़ चाहने भर की बात हैं !
तुम शायद सोचते हो ,
इन सहज उपलब्धियों को देख कर
मुझे ईर्ष्या हैं , इसलिए दुःख हैं ...
किसी का सच ,
कौन पढ़ पाता हैं भला ?
और वह सच
धड़कते दिल के भीतर
बस , एक धड़कन बन कर रह जाता हैं !
इश्वर न करे , ऐसी नियति
कभी किसी को मिले
इसका दर्द मैंने सहा हैं ,
अकेलेपन को भूलने के लिए 
यादों को साथी बनाया हैं
कलम से दोस्ती की हैं
अगर यह भी नही होता
तो मैं क्या करती ?
मन की दशा भरे भरे मेघों सी हैं
यह कहीं खुल कर बरस जाना चाहता हैं
छोटी चिडिया तिल्लियों को तोड़ कर
उड़ जाना चाहती हैं !
माँ जी सरस्वती  जी की यह ,भावपूर्ण  कविता जो उनके जीवन का दर्पण है , 
 सुनाते हुए आपसे सादर स स्नेह विदा लेती हूँ  ~~ 
तुम यहाँ जब भी आओ
आज या कल या बरसों बाद
पाओगे दरवाज़े पर बैठी दो प्रतीक्षित आँखें
खारे पानी में तिरती
दो बेचैन पुतलियाँ एक माँ की...
जिसका बेटा कह कर गया
"ठहरो माँ मैं अभी आया"
चाहे तुम जब भी आओ..
आज या कल या बरसों बाद....
कलरव में डूबी भोर हो...
या अंगारे उगलती दोपहर...
बरसती हुई शाम हो या ठिठुरती हुई रात...
ये प्रतीक्षारत आँखें
कभी हटती नहीं, थकती नहीं, झिपती नहीं...
ध्यानावस्थित बैठी रहती हैं...
निराश नहीं होती...
ये दो आँखें,माँ की हैं न...
जिसका बेटा कह कर गया...
"ठहरो माँ मैं अभी आया"
तुम यहाँ जब भी आओ
आज या कल या बरसों बाद
पाओगे किसी बेसहारा टूटे सितारे सी एक भटकती आत्मा...
घर के इर्द गिर्द,पास पड़ोस पिछवाडे..
रूंधे कंठ से घर लौट आने वाले को आवाज़ देती हुई
दरवाज़े पर बैठी दो प्रतीक्षित आँखें...
खारे पानी में तिरती दो बेचैन पुतलियाँ' 
एक माँ की...
जिसका बेटा कह कर गया
"ठहरो माँ मैं अभी आया"
- सरस्वती प्रसाद
(प्रकाशित "नदी पुकारे सागर" में)











संकलन - सुश्री रश्मि प्रभा जी के सौजन्य से 
आलेख संरचना : श्रीमती लावण्या दीपक शाह 
 सम्प्रति : ओहायो , यु .एस .ए  से 
ई मेल : Lavnis@gmail.com 

Monday, December 19, 2016

आम्रपाली ~ " पारस - स्पर्श " : लेख मालिका :

आम्रपाली
दोहा: " मोरे तुम प्रभु गुरु पितु माता जाऊँ कहाँ तजि पद जल जाता
जेहि के जेहि पर सत्य सनेहु सो तेहि मिलत न कछु सन्देहू "
[RMR-D18.jpg]
आज आम्रपाली का मन उद्विग्न है,  विकल है। लिच्छवी नगर की सुप्रसिध्ध सौँदर्य सामाज्ञी, नगर वधू आम्रपाली अधीर हो रही है। उसे अपने पैरोँ पे बँधे घुँघरू, विषैले बिच्छू की भाँती दृष्टिगोचर हो रहे हैँ।  आम्रपाली के रक्त रंजीत  कोमल पांवों पर दंश देने  मानोँ उतावले हुए हैँ। आम्रपाली के घने काले केशोँ मेँ बँधी वेणी के फूल, गुलाब व मोगरे, इस क्षण उसे मानों फ़ूंफकारते हुए नागों  का आभास दे रहे हैँ।  आम्रपाली, झुंझला  कर, स्वयं पर क्रोधित हो , स्वयं के  केशों  में बंधी वेणी को बलात उतार  फेँकती है।  आम्रपाली की विशाल , निद्रा से शिथिल हुये नयनों मेँ सजा कपूर मिश्रित काजल  सूख चला है। आज अपने ही पैरों पे बंधे  चिरपरिचित कँकणों की ध्वनि से आम्रपाली के कान असहय  वेदना का अनुभव कर रहे हैँ। नर्तकी की लम्बी छरहरी  उँगलियोँ मेँ फँसा , गले का रत्नजटित कँठहार , वह बार बार मध्यमा पर लपेट कर अन्यमस्क सी होकर बारम्बार आवेष्टित कर रही  है। इस उद्विग्नता से दोहराये क्रिया कलाप से आखिरकार कंठहार की  मणियोँ टूट जातीं है।  अब हार थक कर वह चँदन की पीठिका पर बैठ जाती है। मन ही मन बुदबुदाते हुए कहे जा रही है 
आम्रपाली : " मैँ, लिच्छवी साम्राज्य की कुलवधू, आम्रपाली !
" मैँ, अजात शत्रु की प्रेमिका आम्रपाली !"
" मैँ, स्वर्ण व रजत से तौली जानेवाली आम्रपाली !
मैँ, जीवन को भरे हुए, मादक प्याले की तरह पीनेवाली, आम्रपाली ! आज, यह क्या मनोमंथन मेरे मन की शान्ति को भांग किये हुए है ?  मैँ, आम्रपाली,  इतनी उग्विग्न क्यों हूँ ? क्या है  जीवन ?
 क्योँ है है ये जीवन ? मेरा अस्तित्त्व क्या है ? ' आम्रपाली  ' कौन है ?  एक रुपजीविका ? रुप, मोह, प्रेम, लालसा, वासना, सुख और दु:ख ,  क्या है ? यह भावनाएँ क्यूँ उभरतीं  हैँ जीवन मेँ ? 
मैँ आज इनका उत्तर चाहती हूँ।  "
तभी एक चेरी ( दासी ) आकर प्रणाम करती है। 
मँजरी : " देवी की जय हो ! नगर के बाहर, आम्रवन मेँ तथागत का आगमन हुआ है। " चेरी सविनय प्रश्न करती है , " क्या मेरी देवी को  प्रभु  दर्शन की इच्छा है  ? "
आम्रपाली: " कौन ? गौतम बुध्ध पधारे हैं ? ओह ! तथागत के आगमन से वैशाली ग्राम धन्य हुआ ! मेरे अहोभाग्य जो प्रभु पधारे ! "
 स्वत: ' क्या मैँ  अज्ञात सँकेत की प्रतीक्षा मे थी ?  ' 
अपनी दासी की ओर आमुख हो आम्रपाली ने अपना मन खोला और कहा , 
' इतने वर्ष व्यतीत हुए।  इस राज नर्तकी आम्रपाली ने सुनो मँजरी, कई राज पुरुषोँ को देखा है।  
किन्तु किसी वीर पुरुष में मैंने , सत्व को उजागर होते इस क्षण पर्यन्त नहीं देखा। "
फिर आगे कुछ याद करते हुए कहा ' 
" लोग कहते है ' प्रभु बुद्ध ' अवर्णनीय आलोक से व्याप्त हैं। चलो मंजरी,  दिव्यत्मा,  तथागत के दर्शन अवश्य करना चाहूँगी !  चल मँजरी, इसी क्षण चल ! "
आम्रपाली एवं मंजरी दोनोँ उसी दिशा मेँ चल पडे जहाँ एक पेड के नीचे, नेत्र मूँदे, भगवान बुध्ध समाधिस्थ  हैँ। आम्रपाली ने समीप जाकर भगवान के चरण छूए।  भगवान के दर्शन करते ही असीम शान्ति का प्रसार आम्रपाली के मुरझाये तन पर हुआ और अनिमेष नयन से आम्रपाली ' बुद्ध भगवान ' को एकटक देखती रही। उसे भान भी न रहा कि कब उसके नयनों से अश्रुधारा झरने लगी ! अरे क्या वह  रो रही है ?  
वह एकटक बुध्ध भगवान की शाँत सौम्य, सरल मूर्ति को देखती रही। चरण वंदना कर आम्रपाली ने अनुनय भरे स्निग्ध स्वरों से कहा ,
आम्रपाली: " प्रभु  ! प्रभु ! नेत्र खोलिये - प्रभु ! "
बुध्ध : ( आँखेँ खोलते हैँ - मुस्कुराते हैँ ) " देवी ! स्वस्थ हो ! "
आम्रपाली : " प्रभु, आपकी वाणी का सम्मोहन असँख्य राग रागिनियोँ से अधिक मधुर है। आपका आर्जव, नेत्रोँ की करुणा, तथा उन्नत ललाट का तेज अपार है! मैँ आम्रपाली, आज पाप की नगरी को छोडती हूँ, मैं आपकी शरण हूँ "
बुध्ध: " देवी ! प्रथम अपने मन का समाधान करो ! " इतना कहते  हुए बुध्ध ने  समक्ष झुके हुए आम्रपाली के मस्तक को सहलाया। मानों माता अपने शिशु को सांत्वना दे रही हो ऐसे भाव उठे।  
आम्रपाली उस पल , फुट फुट कर क्रंदन करने लगी। 
आम्रपाली : " हे थथागत ! अपके नयनोँ की कोर मेँ, वात्स्लय के अश्रु कैद हैँ ! हे दीव्यात्मा ! आपकी अथाह करुणा ने मेरे मन के मैल को धो दीया "
बुध्ध: " जीवन भटकाव का नाम नहीँ है देवी , जीवन ठहराव है ! उसी से परम शाँति की उत्पत्ति होती है।  उस परम शान्ति का उपाय करो। सारे संताप पिघल जायेंगें। "
बुध्ध के भिक्खु बोलते हैँ। आम्रपाली बौद्ध भिख्खू के संग चैत विहार की ओर चल देती है। 
" बुध्धँ शरणँ गच्छामि, धम्मम शरणँ गच्छामि, सँघम शरणँ गच्छामि, " की ध्वनि से संध्या का केसरिया गगन गूंजायमान हो उठता है। आम्रपाली हाथ जोड कर, झुक कर दुहराती है। 
" बुध्धँ शरणँ गच्छामि, धम्मम शरणँ गच्छामि, सँघम शरणँ गच्छामि, " 
प्रभु ने पतिता को उबार लिया उसे धर्म से नाता जोडना सीखालाया। पारस स्पर्श होने से लोहा, लोहा नहीँ रहता, खरा सोना बन जाता है। तभी बाबा तुलसी दास जी ने राम चरित मानस के अँत मेँ ये गाया है कि,
" मैँ जानौउँ निज नाथ सुभाऊ, अपराधिहे पर कोह न काऊ
अब प्रभे परम अनुग्रह मोरे, सहित कोटि कुल मँगल मोरे,
दैहिक दैविक भौतिक तापा , राम राज नहिँ काहुकि ब्यापा
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती, जासु कृपा नहिँ कृपा अघाती
जिन्ह कर नाम लेत जग माँही, सकल अमँगल मूल नसाँही !
~~~ * ~~~~~~~~ * ~~~~~~~~~~~
 " पारस - स्पर्श " : लेख मालिका : 
रचना : - लावण्या दीपक शाह 

Tuesday, October 4, 2016

माँ दुर्गा नौ शक्तियों का वर्णन /उत्तर अमरीका गणराज्य में भारतीय परंपराएं व त्यौहार

ॐ 
भारत विविधता में एकता समेटे हुए एक महादेश है।भारत के विशाल उपखंड पर अनेक त्यौहार एवं  उत्सव, भारत के प्रत्येक प्रांत में बसे हुए विभिन्न कौम के नागरिकों द्वारा अलग अलग तरीकों से मनाए जाते हैं। भारतीय मूल के लोग अब विश्व के सातों खण्डों में बस गए हैं।वे अपने संग भारतीय परंपराएं , तीज त्यौहार और धार्मिक अनुष्ठानों को भी दैनिक जीवन में खूब मन से सम्पूर्ण आयोजन कर , संपन्न करते हैं। 
        उत्तर अमरीका गणराज्य के ५० प्रांत हैं। इन प्रत्येक प्रान्त में  भारतीय मूल के लोग भारत से आकर बसे हुए हैं। 
गुजरात से अमरीका आकर बसी प्रजा गरबा , डांडिया के लोक नृत्यों का सामूहिक आयोजन कर माँ अम्बिका भवानी की आरती करते हुए श्रद्धा विगलित हुए , प्रसाद धरते हैं और पारंपरिक लोक गीतों को जो मध्यकालीन भारत में प्रत्येक गाँव और छूटे बड़े जनपदों में गाया जाता रहा है उन्हीं गीतों को अब अमरीका में भी सहर्ष , सोल्लास गाते हुए गोलाकार में प्राचीन लोक नृत्य करते हैं। हर्षित होते हैं। 
पंजाब से आये हुए भारतीय लोग नवरात्रि में माता का जगराता आयोजित करते हैं।माँ  को नई चुनरी चढ़ाई जाती है और अखंड भजन पाठ किया जाता है। कई श्रद्धालु ९ दिन उपवास रख कर फलाहार और उपवास के व्यंजन ही खाते हैं। उनकी श्रद्धा और आस्था में कोइ फर्क नहीं आया कि अब यह भारतीय भारत में नहीं रहते बल्कि वे अब अमरीकी नागरिक हो गए हैं ! वही जोश, वही परंपराएं और वही माहौल कायम है ! 
     बंगाल से आये लोग माँ दुर्गा की स्थापना करते हैं और बंगाल में प्रात: काल में जो बंगाली भद्र लोक  माँ दुर्गा की स्तुति सुना करते थे अब वे अमरीका में स्थानांतरित होकर भी यही स्तुति सुनते हैं। 
महादेवी नव रात्रि के पावन ९ दिनों में ९ स्वरूपों में पूजित हैं।जिनके नाम इस प्रकार हैं। 
१ ) शैलपुत्री : सती स्वरूप में शिव पत्नी और प्रजापति की कन्या सती योगाग्नि में भस्म हो गईं और पुनर्जन्म पर्बतराज  हिमालय की बेटी बनकर देवी का जन्म हुआ। शैल या पर्बत की पुत्री शैलपुत्री कहलाईं।उनके अन्य नाम भवानी, हेमावती, पार्वती, सती व परा प्रकृति है।ललाट पर अर्ध चंद्र , दाऐं हस्त में त्रिशूल व बाएं में कमल धरे नंदी बैल पर विराजमान देवी माँ 
मूलाधार चक्र कीअधिष्ठात्री देवी हैं। 

ध्यान

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥
पूर्णेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

कवच

ओमकार: में शिर: पातु मूलाधार निवासिनी।
ह्रींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥
श्रींकार पातु वदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।
फट्कार पात सर्वांंगे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥
शैलपुत्री देवी 
मूलाधार चक्र कीअधिष्ठात्री 
Shailaputri Sanghasri 2010 Arnab Dutta.JPG
माँ दुर्गा की नौ ९ शक्तियों का वर्णन २) दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है।
ब्रह्मचारिणी द्वितीय
ब्रह्मचारिणी देवी
 यहाँ ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रह्मचारिणी अर्थात तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल है।

ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गांं त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।
३) माँ दुर्गा की तृतीय शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। 
चंद्रघंटा तृतीय
देवी चंद्रघंटा
 नवरात्रि विग्रह के तीसरे दिन इन का पूजन किया जाता है। माँ का यह स्वरूप शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी लिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनका शरीर स्वर्ण के समान उज्ज्वल है, इनके दस हाथ हैं। दसों हाथों में खड्ग, बाण आदि शस्त्र सुशोभित रहते हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने वाली है। इनके घंटे की भयानक चडंध्वनि से दानव, अत्याचारी, दैत्य, राक्षस डरते रहते हैं।

ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

कवच

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥
४) माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है। कूष्माण्डा देवी
अपनी मन्द हंसी से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारंण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण से भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। जब सृष्टि नहीं थी और चारों ओर अंधकार ही अंधकार था तब इन्होंने ईषत हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। यह सृष्टि की आदिस्वरूपा हैं और आदिशक्ति भी। इनका निवाससूर्य मंडल के भीतर के लोक में है। सूर्यलोक में निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। 

ध्यान

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

कवच

हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिगिव्दिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजं सर्वदावत
५) पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। 
स्कन्दमाता पंचम
स्कन्दमाता देवी
न्हें स्कन्द कुमार कार्तिकेय नाम से भी जाना जाता है। यह प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे 
ध्यान
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥
शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥
अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥
नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥
सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥
तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥
पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥

६) कात्यायनी षष्टम : 

६) कात्यायनी षष्टम
कात्यायनी देवी

ध्यान

ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।कवच

हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥
वाणंवपणमृते हुं फट्‌ बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥
शास्त्रों में कहा गया है कि इस चक्र में अवस्थित साधक के मन में समस्त बाह्य क्रियाओं और चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है और उसका ध्यान चैतन्य स्वरूप की ओर होता है, समस्त लौकिक, सांसारिक, मायाविक बन्धनों को त्याग कर वह पद्मासन माँ स्कन्दमाता के रूप में पूर्णतः समाहित होता है। साधक को मन को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।

ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

कवच

कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥

कालरात्रि सप्तम
कालरात्रि देवी
विवरणनवरात्र के सातवें दिन माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप 'कालरात्रि' की पूजा होती है।
स्वरूप वर्णनइनके शरीर का रंग काला, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जोब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं, जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं। इनका वाहन 'गर्दभ' (गधा) है। दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में खड्ग है।
पूजन समयचैत्र शुक्ल सप्तमी को प्रात: काल
धार्मिक मान्यताभगवती कालरात्रि का ध्यान, कवच, स्तोत्र का जाप करने से 'भानुचक्र' जागृत होता है। इनकी कृपा से अग्नि भय, आकाश भय, भूत पिशाच स्मरण मात्र से ही भाग जाते हैं।
संबंधित लेखकाली देवी
अन्य जानकारीइस दिन साधक का मन सहस्त्रारचक्र में अवस्थित होता है। साधक के लिए सभी सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है।
७) दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है। इनके शरीर का रंग घने अंधकार की भाँति काला है, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं, जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं। इनकी नासिका से श्वास, निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं। इनका वाहन 'गर्दभ' (गधा) है। दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में खड्ग है। माँ का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है किन्तु सदैव शुभ फलदायक है। 

ध्यान

करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

स्तोत्र पाठ

ह्रीं कालरात्रि श्रींं कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥
कामबीजजपान्दा कामबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं ह्रीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

कवच

ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥
८) महागौरी 

महागौरी देवी

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥

स्तोत्र पाठ

सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, हृदयो।
क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो॥
९ ) सिद्धिदात्री नवम
सिद्धिदात्री देवी
   
९) दुर्गा की नवम शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली माता इन्हीं को माना गया है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां होती हैं। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। इन्हीं की अनुकम्पा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वह संसार में अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। माता सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी नीचे वाली भुजा में चक्र, ऊपर वाली भुजा में गदा और बांयी तरफ नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्पहै। नवरात्रि पूजन के नवें दिन इनकी पूजा की जाती है। भगवती सिद्धिदात्री का ध्यान, स्तोत्र व कवच का पाठ करने से 'निर्वाण चक्र' जाग्रत हो जाता है।

ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥
परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

कवच

ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो।
हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥
महादेवी दुर्गा आश्विन माह की अमावस्या के बाद सप्तमी, अष्टमी और नवमी को अपने भक्तों के पास पृथ्वी पर आती हैं और दशमी को लौट जाती हैं।महालया से नवरात्रि का आरम्भ होता है और भक्तजन सप्तशती के पाठ का आरम्भ कर देवी महाशक्ति के प्राकट्य  व देवी के स्वागत  में सजग हो जाते हैं।
माँ  देवी सद्यः सृजन हैं।  सद्यः विनाश हैं। वे भीमकान्त हैं। वे परम सुन्दरी हैं। वे विकट -विकराल हैं। उनकी काया कान्त है, उनकी काया अस्थिमात्र है। वे भव्य हैं ,अभव्य हैं। वे वस्त्रवेष्टित सुमनोहरा हैं। वे मुक्तकेशी, रौद्रमुखी, महोदरी, अग्निज्वाला हैं। अमेयविक्रमा हैं।  क्रूर हैं, सिंहवाहिनी, सर्वमंत्रमयी हैं ,वे चामुंडा हैं , वाराही हैं, वे देवमाता हैं, सर्वविद्यामयी हैं, सर्वास्त्रधारिणी हैं, पुरुषाकृति हैं, वे असाध्य हैं साध्य हैं वे सर्वस्वरूपा हैं , सर्वेश हैं।
 दुर्गमच्छेदिनी,दुर्गतोद्धारिणी,
दुर्गमध्यानदा,दुर्गमा,दुर्गमार्गप्रदा,
दुर्गमोहादुर्गमांगी,दुर्गभीमा दुर्गा हैं।
जब महादैत्य ने भैसे का विकराल रूप धारण कर समस्त लोकों को विक्षोभित कर दिया तब देबी मधुपान करने लगीं। उनका चेहरा मदप्रभाव से लाल होगया, वाणी लडखडाने लगी और वे जोर -जोर से हँसती  हुई बोलीं-
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिवाम्यहम।
मया त्वयि हतेत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः।
ऐ मूढ! जबतक मैं मद्यपान कर रही हूँ ,तबतक क्षणभर तू गरज ले।यहीं मेरे हाथों तुम्हारे वध के पश्चात  देवता गर्जन करेंगे।
दुर्गा सप्तशती महातेजस स्थिति का विस्फूर्जन है।यह शब्दों की सीमा से पार का महानाद है।यह चित्तोत्कर्ष का चरम है । यह महानन्द का अविरल निनाद है ।
 ‘नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्यै नमोनमः’ की पुनः पुन: उच्चारणावृत्ति श्रोता को चरम भावदशा के लोक में प्रक्षेपित कर देती है।
वहाँ वाणी रूपादि से परे अनहद नाद बन जाती है। एक ऐसी गूँज बनकर भीतर प्रतिध्वनित होती है जो हमें जन्मजन्मान्तरों से जोड देती है।शरीर संवेग में परिणत होकर अनुभूति मात्र बन कर रह जाता है।
Durga 009 by TARUNYAM
Durga by TARUNYAM


बीरेन्द्र कृष्ण भद्र महालया के शुभ प्रभात में आकाशवाणी कोलकाता से 'महिषासुर मर्दिनी' का प्रसारण होता रहा है । वीरेन्द्र कृष्ण भद्र जी की सावेश और आरोह - अवरोहपूर्ण वाणी में दुर्गासप्तशती का पाठ सुनना सही अर्थों में एक असाधारण और रोमांचक अनुभव है। 
सुदूर दक्षिण में बसे तमिलनाडु में  नवरात्रि  के नौ दिनों में  दुर्गा माँ की सहायता करने आये असंख्य देवी देवताओं का मानों जमघट लग जाता है जिसकी  झांकी ' गोलू - पूजा ' कहलाती है। गोलू पूजा में अपने घर के कक्ष में देवी देवताओं की मूर्तियों को सजाया जाता है। सजाते हैं और अतिथि गैन को चाय कॉफी नाश्ता जलपान करवाते हैं। आरती - प्रसाद नैवेद्य से ९ दिन माता दुर्गा की आराधना पूजा , व्रत किया जाता है। ७ सीढियां बनाई जातीं हैं जिन पर यह खिलौने सजाए जाते हैं।   खिलौनों की शोभा , आहा देखते ही बनती है। 
इस बार अमरीकी चुनावों की झांकी भी प्रदर्शित की गई ! देखें -- 
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