Tuesday, January 9, 2018

भारत और अमरीका की वर्षा ऋतु का फर्क : ( संक्षिप्त )

भारत और अमरीका की वर्षा ऋतु का फर्क : ( संक्षिप्त )
भारत मे हिन्द महासागर से उठकर मानसून हवाएं बादलों मे तब्दील हो जातीं हैं। 
घने काले मेघ, वर्षा का जल भरे हुए, साल के मध्य भाग में, माने जून माह के २ रे हफ्ते तक याने जून की १० से १४ तारिख के अास पास, बरखा की नन्ही नन्ही बूँदनियों का श्रृंगार किये कोमल बौछारों की सौगटी लिए भारत की धरती को भिगोने अा पहुंचते हैं। बूंदों का टप टप गिरना, धरा की भीनी महक़ वातावरण में चहुंओर बिखर जाती है और मादक आह्लाद का समां तारी हो जाता है। 
A visualisation of the South Asian Monsoon based on the Climate Hazards Group InfraRed Precipitation with Station data (CHIRPS) 30+ year quasi-global rainfall dataset, analysed and visualised using Google Earth Engine.
           भारत में  इसे मानसून सीजन कहा जाता  है। मानसून या रेनी सीज़न या  वर्षा - ऋतु के नाम से भारतीय जन  इसे पहचानते हैं और प्रखर ग्रीष्म ऋतु के ताप को सहन करते हुए, बेसब्री से बारिशों की प्रतीक्षा करते हैं और पहली फुहारों का हर्षोल्लास से भर कर आनंद - अतिरेक सहित स्वागत करते हैं। 
भारतीय बरखा ऋतु भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए जीवन और खुशहाली का सन्देश लिए आती है। 
कई भारतीय उत्सवों का इसी वर्षा - ऋतु के संग आगमन होता है। 
वर्षा के संग संग सर्वप्रथम श्री गणेश जी का आगमन होता है। विघ्नेश मँगलमूर्ति मोरिया ~ गणपति बाप्प्पा मोरिया पधारते हैं। उसके बाद आते हैं  श्रीकृष्ण का गोविंदा स्वरूप अगस्त माह में कृष्णजन्माष्टमी के समय उत्साह से घर घर में मानाया जाता है।बरखा का ज़ोर कम होते होते माँ जगदम्बा के आगमन का समय आ पहुंचता है। नव - रात्रों में धूमधाम से माता के पर्व का आयोजन किया जाता है। तब तक आकाश बादलों को स्वच्छ कर देता है। बरखा रानी फिर अगले वर्ष मौसम के बदलने के साथ आने का वादा करते हुए विदा लेतीं हैं और तब दीपावली का महा - पर्व भारत भूमि का प्रिय त्यौहार आता है। 
यह सारी बातें प्रत्येक भारतीय, वर्षा ऋतु के सम्बन्ध  में जानता है।भारतीय वर्षा ऋतु के अन्य त्योहारों के नाम इस प्रकार हैं  ~~ 
१ ) तीज २) नाग पंचमी ३) ओणम ४) रक्षा - बंधन
५)  नारियल पूर्णिमा ६) आदिपेरुकु ( तमिलनाड में ) 
७) हर्मिस ( लद्दाख में ) ८) मिंजर ( होमाचल प्रदेश में ) 
९) हरेली ( छत्तीसगढ़ में ) १०) बेह्दींनखालेम ( मेघालय में ) 

अमरीका में वर्षा - ऋतु का स्वरूप : 
अमरीका भूखंड भारत से ३ गुना अधिक विस्तृत एक अति विशाल उपखंड है। यहां वर्षा का अागमन भारत की तरह नियम बद्ध तरीके से नहीं होता।साल के अलग अलग  महीनों मे, उत्तर अमरीकी भूखण्ड के अलग अलग प्रांतों मे, वर्षा का अागमन होता रहता है। अमरीका की उत्तर दिशा के प्रांतों मे, मौसम अधिक ठंडा होता है। अत: यहां वर्षा के संग जल मिश्रित हिमपात  होता है। दक्षिण मे जितने प्रांत हैं, वहां उत्तरीय प्रांतों से अपेक्षाकृत ठंड कम होती है। अत:  वर्षा कहीं  कम तो किसी प्रांत में अधिक होती है। 
       
अमरीकी सूचना माध्यमों मे एक खास ऋतु चक्र होता है। उनसे संबंधित  विविध पहलूओं के  बारे मे दर्शकों  को अागाह  करती अाबोहवा के विषय पर समर्पित एक विशिष्ट चैनल  है। जो दिन भर मलब २४ घंटे दिनमान, अाबोहवा तथा उसके बदलाव और उनसे संबंधित चेतावनी का निरंतर प्रसारण करती रहती है।    

हवामान संबधित टीवी चैनल के निष्णात वर्षा के लिए एक खास नाम लेते हैं - वे अक्सर हवा मे जो नमी रहती है उसके लिए ' प्रेसीपिटेशन '  ऐसा ख़ास नाम उपयुक्त करते हैं। 
वसंत, ग्रीष्म , पतझड़ और शीतकाल यह ४ मुख्य ऋतुएं अमरीकी भूखंड पर तापमान के कम या अधिक होन के साथ महसूस की जा सकतीं हैं। 

अमरीका मे सब से  अधिक वर्षा हवाई द्वीप के वाईलेले इलाके मे, क्वाई नामक एक नन्हे से टापू पर औसतन ४६० " वर्षा के नाप से  सर्वाधिक वर्षा दर्ज की गयी है। 
यह जगह  " क्वाई " विश्व के अधिकतम वर्षा वाले प्रदेशों  मे से एक है। भारत मे चेरापूंजी नामक स्थल भी अधिकतम वर्षा वाले स्थान के लिए मशहूर है। अमेरिका मे बरखा के प्रकोप के विभिन्न रूप  ' थंडर स्टॉर्म, हरीकेन, कहलाते हैं। समुद्री लहरों के साथ  बाढ़ के पानी के साथ अाती भारी वर्षा है उसको टाइफून भी कहते हैं। 
हरीकेन भारी नुकसान करनेवाली   भयंकर वर्षा को अंग्रेज़ी वर्णमाला के अक्षरों से चुन कर उन्हें हर वर्ष ख़ास नाम दिए जाते हैं।जैसे - अमरीका में बसे दक्षिण पूर्वीय  न्यू अार्लीन्स के प्रांत मे जो  भीषण तबाही मचानेवाली वर्षा और तूफ़ान का कहर बरपा था उसे  'कैटरीना हरीकेंन  ' का  नाम दिया गया था। 
         अमरीका के पश्चिम मे पेसेफिक महासागर के  मध्य मे  ' हवाई '  मुख्य ६ टापूओ का समूह है।  जिनके नाम इस प्रकार हैं -- क्वाई, ओहाऊ ,मोलोकाई, लानाई, मावी और सबसे बडा टापू हवाई कहलाता है। हवाई  के अन्य हिस्सों मे सालाना २००" से अधिक  वर्षा नापी गयी है।   
      उत्तर अमरीका के मुख्य भूखंड मे पश्चिम मे वॉशिंगटन प्रांत और ओरेगन प्रांत मे हवाई के बाद २ और ३ नंबर मे अधिकतम वर्षा दर्ज हुई है। अलास्का के दक्षिण हिस्से के बारनोफ नामक  टापू मे २३०" वर्षा दर्ज हुई है। टेक्सास , ओक्लाहोमा प्रांतों मे क्लाउड बर्स्ट माने बादलों का मूसलाधार बरसना कई प्रांतों मे बाढ़ की भयावह स्थिति का निर्माण करता  है।  चित्र - २  स्कूल बस - बारिश जल मे निमग्न स्कूल बस 
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    अमरीकी शहरों मे ' सीएटल ' शहर को सर्वाधिक वर्षा वाला शहर कहा जाता है। इनके बाद फ्लोरिडा, लुईज़ीयाना, अलाबामा और ओक्लाहोमा  प्रांतों की गणना  अधिकतम वर्षा वाले प्रांतों मे की जाती है। 
इनसे विपरीत अमरीका के पश्चिम के प्रांतों मे जैसे केलिफोर्निया, मोंटाना, नेवेडा व  एरीजोना, प्रांतों मे अमरीकी भूखंड पर सबसे कम वर्षा होती है। 

 - श्रीमती लावण्या दीपक शाह 
       ओहायो उत्तर अमरीका 

Tuesday, November 28, 2017

श्रध्धेय स्व. नारायण देसाई जी का पत्र पढ़कर, उन्हें लिखा मेरा पत्र


स्व. नारायण देसाई का तेजस्वी जीवन २४  दिसम्बर १९२४  - १५  मार्च २०१५ तक भारत और विदेश में गाँधी जी के सन्देश को विश्व में बाँटता रहा। वे एक प्रख्यात गाँधीवादी थे। वे गाँधीजी के निजी सचिव और उनके जीवनीकार महादेव देसाई के पुत्र थे। नारायण देसाई भूदान आंदोलन और सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़े रहे थे।  ऊपर के चित्र में किशोर वय के श्री नारायण देसाई, महात्मा गाँधीजी के साथ हैं।प्रस्तुत है श्री नारायण देसाई जी लिखित पुस्तक 

स्वतंत्रता संग्राम का वसंत'का आवरण चित्र : 

 (श्री अफलातून जी के ब्लॉग से साभार जो श्रध्धेय नारायण देसाई जी के सुपुत्र हैं और हिंदी ब्लॉग ~ जगत के हमसफर व साथी रहे हैं। ) 
प्रस्तुत है ~ नारायण देसाई का दोस्तों के नाम पत्र :
संपूर्ण क्रान्ति विद्यालय - वेडछी २२.११.२०१०

प्यारे दोस्तों ,

सप्रेम जय जगत ।

मेरे बाद की पीढ़ी वाले, लेकिन विचारों में मुझसे आगे जानेवाले लोगों तक पहुंच पाने के मनोरथसे यह पत्र मैं अपने दो पुत्रों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक प्रसार माध्यम से भेज रहा हूँ । आशा है आपमें से कुछ को जरूर मेरा यह पागलपन छूएगा । तुकाराम ने गाया है : ” आम्ही बिगड़लो ,तुम्हीं बिघडाना ! “

दिन दहाडे स्वप्न देखना मुझे बुरा नहीं लगता । अक्सर जब लोग मुझे पूछते हैं कि ’ क्या गांधी आज प्रासंगिक हैं ? ’ तब मुझे उसके सीधे जवाब ’ जी हाँ ’ के अलावा और भी एक विचार आता है , कि गांधी विचार जो एकरूप में भूदान – ग्रामदान-ग्राम स्वराज आन्दोलनमें और दूसरे रूपमें संपूर्ण क्रांति आन्दोलन के रूपमें प्रकट हुआ था , वह न आज सिर्फ़ प्रासंगिक है , बल्कि आज उसे प्रासंगिक बनाया भी जा सकता है । संपूर्ण क्रांति के लिए मेरी कल्पनाकी व्यूहरचना के आधार पर वह नीचे प्रस्तुत है ।
आज का संकट सर्वक्षेत्रीय और संपूर्ण है , इसलिए उसका जवाब भी संपूर्ण होना चाहिए । संपूर्ण क्राम्ति के लिए व्यक्ति की मनोवृत्तिमें  तथा समाज के मूल्योंमें परिवर्तन होना चाहिए । इस दोहरी प्रक्रिया के लिए पंचविध कार्यक्रम हों , जिसके क्रममें  विविध स्थानो की विविध परिस्थिति के कारण क्रम परिवर्तन हो सकता है और हो
१ : 
प्रबोधन : ( कोन्सिएन्टाइज़ेशन ) : लोगों को असम्तोष है , लेकिन परिस्थिति का ठीक से विश्लेषण नहीं , न पूरा आकलन ही है ।हमें स्वयं अपने से शुरु कर लोगों को खुद अपनी गुत्थियां सुलझाने के लिए प्रवृत्त करना चाहिए । शासन , नेता या अवतार के आने का इन्तेजार करना नहीं चाहिए । लोकजागरण के हर संभव तरीके का प्रयोग करना चाहिए । मुखोमुखी बातचीत और चिट्ठी पत्र से लेकर गोष्ठियां , सभाएं तथा ’जात्रा’ , मेले, डिंडी आदि शताब्दियों से चले आये, लेकिन आजकल पुराने पड़ रहे माध्यमों से लेकर नाटक , पथनाट्य , छाया नाटक  मुशायरे , कवि सम्मेलन , 'तमाशे’, चौपाल , ’भवाई’,’दायरे’ इत्यादि सांस्कृतिक उपकरण एवं कार्टून प्रदर्शनियां,डॉक्यूमेन्टरी,फिल्म,रेडियो,टी.वी. तथा वेबसाइट आदि तक ।
२ : संगठन : प्रबोधन के साथ साथ ,एवं उसके आगे बढ़ने के बाद भी संगठन होते रहना चाहिए । पूरी क्रांति तो तब होगी जब लोग उसे उठा लेंगे ।लेकिन उसके अग्रदूतकी भी आवश्यकता रहेगी । लेकिन संगठन करने की हमारी प्रक्रियामें कुछ गुणात्मक परिवर्तन की जरूरत है । यह तो जाहिर है कि गांधी , विनोबा, जयप्रकाश नहीं हैं । इसीलिए संगठन की प्रक्रिया न सिर्फ़ आदर्शों की दृष्टिसे वरन व्यावहारिक आवश्यकतासे भी कुछ अलग होना जरूरी है । विनोबा ने ’गणसेवकत्व’ के विचार बीज बोये थे , लेकिन अभी तक का हमारा अनुभव बहुत कुछ एक नेतृत्व आधारित ही रहा है । तरुण शांति सेना और मेडिको फ्रेण्ड सर्कल नयी दिशामें कुछ गति कर रहे थे । लेकिन अभी लम्बी राह बाकी है । मेंसा लेखा के प्रयोग कुछ पथ प्रदर्शन कर सकते हैं । कालेजोंमें , छात्रालयोंमें , गाँवोंमें , मुहल्लोंमें आरंभ करना होगा । संगठन अहिंसा की अग्नि परीक्षा है – ऑर्गनाइजेशन इज़ द एसिड टेस्ट ऑफ़ नॉनवायल्न्स इस गांधी वाणी को निरंतर मद्देनजर रखकर आगे बढ़ना होगा ।
३ : नमूने प्रस्तुत करना : हमारा जीवन दर्शन हमारी जीवन शैलीसे गाढ़ संबध रखता है । जगह जगह ऐसे केन्द्र बनाने की कोशिश हो जहां व्यक्तिगत गुण संवर्धन , सामाजिक न्याय एवं शांति तथा सृष्टि के साथ संवादिता (हार्मनी) पैदा करने की सतत साधना होती हो । ऐसे नमूने निकट तथा दूर दोनों तरफ़ ध्यान आकर्षित कर सकते हैं तथा परस्पर अनुभवों के आदान-प्रदान से तो तात्कालिक लाभ मिल ही सकता है । इन नमूनों का आधार प्रयोगवीरों की गुणवत्ता पर होगा और यही उनका मानदण्ड भी होगा । व्यक्तिगत जीवनशैली के नमूने स्वावलम्बन , परस्परावलम्बन या ग्राम स्वावलम्बन के हो सकते हैं । वैकल्पिक उर्जा – सौर,पवन,जल,पशु, उर्जा आदि – के विविध प्रकार के प्रयोगों की आज अत्यन्त आवश्यकता है । हम में से कुछ लोग इन प्रयोगों के पीछे जीवन बिता सकते हैं । गांधी के सारे रचनात्मक कार्य नवसंस्करण की राह देख रहे हैं ।उन्हें इन्तेज़ार है उन प्राणवान हाथों की जिन्हें जीवन की ताकतों के लिए प्रयोग करने की ललक है ।
४ : संघर्ष : संपूर्ण क्रांति का मार्ग हमेशा सीधा या आसान तो होगा नहीं । वर्तमान व्यवस्था के अनेक पहलू उसके आडे आ सकते हैं । वैसे देखें तो संपूर्ण क्रांति अपने में ही यथास्थिति – स्टेटस को – केखिलाफ़ एक बगावत है । इसलिए अकसर शोषण , अन्याय , अनीति , भ्रष्टाचार के खिलाफ़ संघर्ष के मौके आते ही रहेंगे । हर संघर्ष के समय संपूर्ण क्रांतिकारी का ध्यान गांधी के बताये हुए उन तीन उसूलों पर स्थिर रहना चाहिए जो गांधी ने सत्याग्रही के लिए अनिवार्य माने थे । उनकी अपेक्षा थी कि स्त्याग्रही सत्यकी ठोस आधारशिला पर ही खड़ा रहेगा , व अपना ध्येय हासिल करने के लिए वह तीव्रतम कष्ट सहने के लिए तैयार होगा और उसके दिलमें अन्यायपूर्ण व्यवस्था के प्रति चाहे जितना आक्रोश हो , किन्तु प्रतिपक्षी के लिए तो निरा निर्मल प्रेम ही होगा । साधन शुद्धि ही संपूर्ण क्राम्तिकारी परख और वही उसकी कसौटी होगी ।
५ : 
प्रकाशन : इस सारे कार्यक्रम के लिए प्रचार एवं प्रकाशन की जरूरत होगी । यद्यपि गांधी का व्यक्तित्व तथा उनका जीवन ही प्रकाशन का उत्तम माध्यम बन जाता था , फिर भी यह ध्यान रहे कि उन्होंने लगभग आधे शतक तक प्रकाशन का कोई न कोई माध्यम सम्हाल कर अपने साथ रखा था ।प्रकाशन का एक व्यापक , विकेन्द्रित तंत्र खड़ा करना होगा । अनेक आधुनिक उपकरणों ने विकेन्द्रित प्रकाशन सुलभ बना दिया है । हममें से कइयों को इस काम में अपनी शक्ति और सामर्थ्य लगाने होंगे ।
सब से पहले तो इस समूचे विचार पर हमें आपकी बहुमूल्य टिप्पणी चाहिए । यह सारा प्रयास ही ’एक: अहम बहुस्याम’ का है । आपके विचारों से हमारे विचारों का स्पष्टीकरण , शुद्धीकरण एवं संशोधन होगा ।
फिर आपको यह सोचना होगा कि हम किस प्रकार इस अभियान में जुड़ सकते हैं । इसमें सब प्रकार के लोगों का उपयोग हो सकता है , आंशिक समय देनेवाले , एक नि्श्चित प्रकार का ही काम करनेवाले से ले कर इसी काम में पूरी शक्ति लगाने वाले तक की । अपने अलावा औरों को जुटाने वाले भी चाहिए ।
हमारे विद्यालय की दृष्टि से इसमें प्रशिक्षण पाने के लिए योग्य एवं उत्सुक प्रसिक्षार्थी चाहिए । हमारे काम में प्रत्यक्ष सहभागी बनने के लिए साथी चाहिए। आप अपने कुछ नये साथियों को हमारे खुले सहजीवन से परिचित कराके अपनी सेकण्ड लाइन तैयार करना सोचते हों तो एक दो साथियों को उस दृष्टि से यहां भेजिए और उपरोक्त पांचों प्रकार के कामों में अभिज्ञता रखनेवाले साथी तो इस अभियान के निहायत जरूरी है ही । अपने क्षेत्रों यदि आज तक ऐसा कुछ न कुछ शुरु न कर चुके हों तो आज से शुरु कीजिए। इस काम में क्या अड़चनें आ रही हैं उनके विषय में हम आपस में सलाह मशविरा तो करें । और यह भी खोजें कि कहां से किस प्रकार की सहायता मिल सकती है।स्व.श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ( हरिवंशराय बच्चन की पंक्तियां) की एक पंक्ति ने मुझे तो बरसों से क्या दशाब्दियों से प्रेरित किया है: 'आज लहरों में निमंत्रण, तीर पर कैसे रुकूँ मैं ?’
स्नेहसने सलाम,
- नारायण देसाई 
महात्मा गांधी के जीवन और जीवन संदेश को कथामय रूप में सुनाने के लिए नारायण भाई ने मंच पर  'गांधीकथा'  कहना आरम्भ किया।
नारायण देसाई गाँधी के आदर्शों पर अटूट श्रद्धा और विश्वास रखते थे। उन्होंने आपना जीवन महात्मा के बताये मार्ग पर व्यतीत किया और इन्ही आदर्शों का प्रसार करने में लगे रहे। उन्होंने 'तरुण शांति सेना' का नेतृत्व किया, वेडची में अणु शक्ति रहित विश्व के लिये एक विद्यालय की स्थापना की तथा गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, गांधी विचार परिषद और गांधी स्मृति संस्थान से जुड़े रहे। 
श्री नारायण भाई गुजरात विद्यापीठ के २३ जुलाई २००७ से, कुलाधिपति रहे।
सं २०१५ , तारीख १० दिसम्बर से वे कोमा में थे किन्तु पुनः चैतन्य होकर स्वास्थ्यलाभ कर रहे थे और चरखा चलाना उनकी नित्यक्रिया थी उसी का  चित्र : 
'गांधीकथा' शुरू करने वाले विख्यात गांधीवादी नारायण देसाई के स्वास्थ्य में सुधार हुआ। वे कोमा से बाहर आए। सेहत दुरस्त होने पर उन्हें आइसीयू से बाहर ले लिया गया । चिकित्सकों की निगरानी में उन्हें हल्का व्यायाम सिखाने का प्रयास किया गया। साथ ही फीजियोथैरपी भी दी गयी।  किन्तु गांधीमय नारायण भाई ने इसके लिए अलग ही उद्यम उठाया । उनके मन से तो चरखा चलाना ही फीजियोथैरपी थी। इसलिए वह ऐसी सेहत में भी चरखा चला कर बापू को याद करते रहे । श्री नारायण देसाई का दिसंबर-१४ से एक अस्पताल में उपचार चल रहा था।
पूजनीया कस्तूरबा पर लिखी उनकी पुस्तक का आवरण चित्र :उनके शब्द : ~~ 

" इस पुस्कत का अधिकतम अनुवाद वर्ष २०१३ के फरवरी से अप्रेल महीने के बिच पूरा हुआ | बा और बापू पुरे देश के है | उसमे भी बापू तो देश की सरहदों को पार करके पूरी दुनिया के; लेकीन १९२३ में जन्मी और सत्याग्रही माँ बेटी मै, अगर उन्हें मेरे निजी स्वजन माँनू और दोनों के थोड़े -बहुत लेकिन मधुर संस्मरणों को अपनी कीमती पूंजी समजू तो भला एश्में अजीब क्या है?
                  - नारायण देसाई.*******************************************************
श्रध्धेय स्व. नारायण देसाई जी का पत्र पढ़कर, उन्हें लिखा मेरा पत्र प्रस्तुत है 
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परम श्रध्धेय बापूजी ( श्री नारायण भाई ) को सादर नमन व चरण स्पर्श 
मैं, लावण्या, सुप्रसिद्ध
कवि स्व.पण्डित नरेंद्र शर्मा जी की पुत्री हूँ। मेरे पापा जी ने बापू की अहिंसक क्रान्ति में जुड़कर, २ वर्ष ब्रीटीश साम्राज्य से सजा पाते हुए, आगरा सेन्ट्रल जेल, देवली ड़ीटेंशन जेल और राजस्थान जेल में सहर्ष कारावास स्वीकार किया था और कारावास के दिनों में  १४ दिन का अनशन भी किया।                कारावास से पूर्व इलाहाबाद विश्वविद्यालय से, युवक नरेंद्र शर्मा ने स्वरचित हिंदी कविता पुस्तकों के प्रकाशन, सम्पादन कार्य एवं छात्रों को अध्यापन कराते हुए से अपनी पढ़ाई पूरी की थी। अंग्रेज़ी साहित्य से एम. ए. की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के पश्चात नरेंद्र शर्मा, पंडित जवाहर लाल नेहरू जी से आनंद भवन के लॉन पर सबसे पहली बार मिले थे। उस रोज वहीं २, ३ घंटे टहलते हुए, बातचीत करते हुए नेहरू जी ने उन्हें अपने हिंदी अधिकारी के रूप में चयनित कर लिया था ! अगले  ४ साल तक, नरेंद्र शर्मा आनंद भवन जो आज ' स्वराज भवन ' के नाम से पहचाना जाता है, जिसे श्री मोतीलाल नेहरू जी ने भारतवर्ष को भेँट किया है वहीं काम करते रहे और कांग्रेस की गतिविधियों में सक्रीय  योगदान देते रहे । पंडित नेहरू जी के  निजी सचिव नहीं थे और कांग्रेस कार्यकारिणी समिति में 'हिंदी अधिकारी' पद पर भी कार्यरत थे ।आनंद भवन में जो बैठकें होतीं उन में इस्तेमाल किये गए  अंगरेजी संभाषणों का आम जनता तक पहुंचाने का कार्य,  कार्यकारिणी समिति के हिन्दी अधिकारी के रूप में नरेंद्र शर्मा ने  संपन्न किया। फलस्वरूप उन्हें ब्रिटिश हुकूमत द्वारा, बिना कोर्ट कचहरी या मुकदद्मे की कार्रवाई को किये बिना सीधा वाईस रॉय के डायरेक्ट ऑर्डीनन्स से २ वर्ष का कठिन कारावास ये दण्ड मिला।  इस सजा की खबर नरेंद्र शर्मा के जन्म स्थान जहांगीरपुर, खुर्जा जिला और डिस्ट्रिक्ट बुलंद शहर तक भी कुछ समय पश्चात पहुँची।                     कारावास में नरेंद्र शर्मा ने आमरण अनशन आरम्भ किया। इस निर्णय के १ सप्ताह बाद, मेरी स्व. दादीजी गंगादेवी को भी ये खबर पहुँच गई ! नरेंद्र शर्मा १४ दिनों तक भूखे रहे और उनकी अम्माँजी , मेरी  दादी जी ने भी १ सप्ताह तक अपने पुत्र के अनशन में सहकार देते हुए, स्वयं भी १ सप्ताह के लिए अन्न त्याग किया था। ऐसे कितने ही नन्हे नन्हे सिपाही, हमारे परम पूज्य बापू की अहिंसक सेना के अंग रहे हैं जिनको आज भारतवर्ष भूल गया है !
        भारत और भारत के कई नागरिक आज  साम्राज्यवाद और बाजारवाद के दुहरे भंवर में डूब कर, पश्चिम का अँधा अनुसरण करने लगा है ! आज का भारत कुछ हद्द तक त्याग, बलिदान, समर्पण देश - प्रेम की उद्दात भावनाओं को बिसार चुका है ये कितने क्षोभ और दुःख की बात है ! 
        स्वयं बापू के कहे का अनुसरण भी बिरले लोग ही कर रहे हैं। आप जैसे हितैषी जब भी हमे आगाह करवाते हैं तब बोध होता है कि बापू की दूरदर्शिता और विश्व के सभी मनुष्यों के प्रति दया, करूणा व भाईचारे की भावना ने ही उन्हें ‘ महात्मा ‘ बनाया।वे हमारे लिए और समस्त विश्व के लिए पूजनीय हैं।कैसी उत्कट तथा विरल विश्व बंधुत्व की भावना, भारत वर्ष के लिए  देश - प्रेम की भावना और प्राणोत्सर्ग का हाथ और उनके लिए किये सत्याग्रह का यज्ञ, बापूजी ने किया था।ऐसे तपस्वी ' हे राम ' का उदगार करते हुए चले गए ! काश लोग उन्हें समझें !  
              मैं अपनी बात लम्बी न करते हुए यही कहूंगी, निजी स्तर पर मेरे लेखन से, अमरीकी निवासी होते हुए भी, सम्पूर्ण रूपेण भारतीयत मानस लिए, ‘ जय – जगत ‘ कहते हुए आपके प्रयासों में सहकार देने के लिए, मैं अपना भरसक प्रयास अवश्य करूंगी।  
    मैं, यदाकदा , अन्तराष्ट्रीय हिन्दी समीति ” विश्वा ” का सम्पादन कार्य भी करती रही हूँ और समीति के सदर्स्यों तक आपका पत्र पहुंचा रही हूँ। 
         आपके सुपुत्र भाई श्री अफलातून जी मेरे भ्राता हैं और मेरा बचपन, उन्हीं के बचपन के घर के समान एक पवित्र घर में, [जो  बंबई शहर में था] मेरे गांधीवादी, सत्य पूजक, कर्मठ पिता के, आश्रम जैसे पवित्र घर में बीता है। श्री अफलातून भाई की तरह मुझे भी, एक सत्य साधक की छत्र छाया में, पलकर बड़े होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। 
        मेरी नानी जी ” कपिला बा ” आजीवन अपने हाथ से बुने खादी की धागों से निर्मित साड़ी ही सदा, पहनतीं रहीं और उसी को ओढ़े हुए वे गयीं। 
         मेरे नाना जी श्री गुलाबदास गोदीवाला जी, ब्रीटीश राज्य काल में सेन्ट्रल रेलवे के चीफ़ वैगन एन्ड कैरिज इंस्पेक्टर अधिकारी के पद पर कार्य करते थे।     ब्रिटिश अफसरों के संग उनका उठना - बैठना था किन्तु नानाजी को, मेरी ' बा ' ने गांधीजी के सत्याग्रह आंदोलन से प्रभावित होकर भारतीयता की ओर मुड़ने के लिए बाध्य किया। नानाजी व नानीजी दोनों खादीधारी बने। स्वदेशी को पूर्णत: अपनाया।नानीजी ४ थी कक्षा तक पढ़ीं थीं किन्तु बंबई महानगर के अति व्यस्त ऐसे बांद्रा उपनगर में उनके आवास ' कपिलवस्तु ' रहते हुए , कांग्रेस कमिटी बांद्रा - महिला शाखा की वे अध्यक्षा रहीं। 
मेरी नानी जी हमारी 'बा ' ~ श्रीमती कपिला गुलाबदास गोदीवाला ~
~ महिला कोंगेस कमिटी में भाषण देते हुए 
मेरे मामाजी स्व. राजेन्द्र गोदीवाला जी ने ऋषितुल्य विनोबा जी के साथ झुम्पडी अलगट ग्राम में, सड़कें बनायीं, ग्राम - पाठशालाएं बनायीं  और भूदान  में हिस्सा लिया। अछूत उध्धार प्रयास विनोबा जी का साहसिक प्रयास था उस के लिए भी मामाजी राजेंद्र गुलाबदास गोदीवाला जी ने अभूतपूर्व योगदान दिया। 
       हरिजनों को लेकर मंदिर प्रवेश करते समय विनोबा जी के लिए उठीं, कई पागल ब्रह्मण दल की लाठियाँ , मेरे राजू मामाजी ने, अपनी पीठ पर झेलीं थीं। फल स्वरूप उनके पीठ की कई हड्डीयां टूट गयीं। उनकी  सेवा – सुश्रुषा, वर्धाश्रम पौनार में हुई और आदरणीया कुसुम्ताई देशपांडे की छोटी बहन शीला देशपांडे से मेरे मामा जी का विवाह होना इस घटना का एक सुखद उपसंहार बना !
          बापू जैसा न कोइ विगत शताब्दी में हुआ है और इस सदी में भी उनसे किसी के जन्म लेनेकी संभावना कम ही लग रही है !! जैसा आपने सही लिखा है कि
" कोइ 
 युगपुरुष ” उद्धार करने आनेवाला नहीं। " 
हमे परस्पर सहयोग करना होगा और आपके सुझाए ध्येय, इस मार्ग में सहायक सिध्ध होंगें इस में मुझे कतई भी संदेह नहीं है। 
बहुत आदर व श्रध्धा सहित आपकी एक भारतीय बेटी
उत्तर अमरीका से
– लावण्या शाह ( शर्मा )

Tuesday, October 31, 2017

कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में

ॐ 
कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में 
यादों के पीपल लहराते खड़े हैं यूं ध्यान में 
सघन बदली दबे पाँव आती लुटाती कोष जब , 
कुछ नमी लिए संध्या छम से उतरती छाँव से !
अमुवा बगिया से सरसराती बयार, धीमे बहती 
कोयल कूकती सुनाती गीत मीठा महुवे की डाल से 
मयूर टेर उठती बरखा जल लिए ठुमकती मोरनी , 
किसे लुभाती ' के आऊँ ', मोरनी चपल चलती शान से 
मोर संग चलती मोरनी प्रकृति की विजय है सामने ! 
मेरे गाँव के पेड़ों से लिपटी हैं ये अनगिनत कहानियां 
कुछ सुनीं दादी से रात में दुबक कर गोद में कम्बल लपेटे 
कुछ घड़ी मन ने मेरे , शैशव से चलीं , फिर , बदलीं 
कितने खेल खेले , मिटाए , कुछ बनीं अपने आप भी 
याद है ,कौन वो , नित आता दूर से चल कर वहां पर 
पेड़ की ओट से छिप निहारता मूक मौन जो है खड़ा 
पोखर पे मधुरिमा खडी थी औ' जल में छाया पडी थी 
कब भूल सका है मन , खत, उसके बहाए उसी जल में !
डोली उठी वो दुल्हिन बनी पराये देस जा कर बस गयी 
आज भी थामे डालियों को देखता सूने पथ को मैं अकेला 
फिर फिर याद आते हैं घर आंगन के वे विस्तृत पेड़ सारे 
दादा की धूप सी खिलती हंसी औ ' राज गद्दी , चारपाई 
दादी ने जो सुखायीं अमिया मिरच, आंगनकी धूप में 
ये पुराने पेड़ नहीं , हैं मेरे बचपन के मेरे संगी साथी
छूटे कुछ, कुछ आबाद हैं लिए संग अपने नाते - नातिन !
- लावण्या

Thursday, October 19, 2017

टूटा सिपाही : बाल कहानी

               एक था लड़का,  ८ या कह सकते हैं कि लगभग ९ वर्ष का होने ही वाला था। उसकी साल गिरह आने में बस १ महीने का समय बाकी था। उसे घर में प्यार से सब 'मुन्ना' कह कर पुकारा करते थे। परन्तु, स्कूल में उसके सहपाठी दोस्त उसे मनोज ही कहते।Image result for a young indian boy
 मनोज के पास ढेरों खिलौने थे। उसके पापा वीरेन्द्र और मम्मी गिरिजा उसे तरह-तरह के मनपसंद खिलौने बाजार से खरीद कर ला देते थे। खिलौनों में मुन्ना के पास थे, रंग-बिरंगी कंचे, कई सारी छोटी कारें, एक फुटबाल, २ या ३ गेंद, इलेक्ट्रिक ट्रेन, कमाण्डो, गन, बोर्ड गेम - लूडो, कैरम, लेगो, बैड  मिन्टन के रेकेट और कई सारे शटल और भी न जाने क्या-क्या मुन्ना के लिए उन्होंने खरीद लिया था। जब भी मुन्ना को समय मिलता, वह अपनी पसंद का खिलौना उठाता और खूब खेलता। हाँ अक्सर वीडीयो गेम्स में भी उसका समय अधिक बीत जाता। कभी कराटे की क्लास में भी मम्मी उसे ले चलती। जब मुन्ना घर पर रहता तब वह कोमिक्स भी पढता। कभी जिमखाना जाकर मुन्ना स्वीमिंग भी सीखता और अब तैराकी में भी मुन्ना कुशल हो गया है। सन्डे को पापा, मम्मी अच्छी पिक्चर लगी हो, तो उसे सिनेमा दिखलाने भी ले चले जाते थे। वहां पॉपकोर्न, आईसक्रीम और चोकलेट भी उसे अवश्य मिलतीं। स्कूल की पढ़ाई, खेल और मनोरंजन के अनगिनत साधन मुन्ना के लिए उपलब्ध थे। मुन्ना की ज़िन्दगी भरीपूरी थी और बड़े मज़े में चल रही थी। 

       अपने ढेरों खिलौनों में, मुन्ना को एक खेल सबसे ज्यादा पसंद था। उसके पास दस टीन के (पतरे के) बने हुए रंगीन सिपाही थे। सिपाहियों ने ऊपर लाल कोट, नीचे, काली पतलून पहन रखी हो इस तरह उन्हें रंगा गया था। उन सिपाहियों के सर पर बड़ा-सा, काला टॉप लगा हुआ था जो अंडे के आकार का लंबा गोल टोपा था। सिपाही बड़े सुन्दर शक्ल और आकार के थे। 
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जब भी मुन्ने को समय मिलता तब वह मुड में आ जाता और अपने बिस्तर के एक तरफ राजा के पांच सिपाही और दुसरी ओर राणा के पांच सिपाही बिठलाता। ये खेल मुन्ने को बेहद अच्छा लगता था जो उसने अपने आप खोज निकाला था। खेल-खेल में, अक्सर,  राजा और राणा के सिपाहियों के बीच घनघोर लड़ाई छिड़ जाती। दोनों पक्ष बड़े बलवान और बहादुर थे। सो भई युद्ध भी भयानक होता ! पांच-पांच सिपाही अलग-अलग पैंतरे बदलते तब,  युद्ध और भी अधिक भीषण हो जाता। 
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मुन्ना कभी राजा के पक्ष से लड़ता तो कभी राणा के सिपाहियों को बचाव करने में मदद करता। कभी चिल्लाता 'ये मारा ..ले वो मारा ' ..'अरे बचो ..अरे बचाओ' अरे मरा रे ..अरे ये गिरा' ऐसी आवाजों को सुनकर मम्मी भी दरवाजे पर आ खडी होतीं और मुस्कुरातीं। यह खेल, खेलते हुए मुन्ना के दिमाग में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती मानों इस युद्ध की बागडोर थामे, वही लड़ाई का संचालन कर रहा हो ! मुन्ना की कल्पना-शक्ति, मानों उसे लड़ाई के मैदान में अपने पंखों पर बिठला कर ले चलती। आहा ! मुन्ना तो सचमुच रण मैदान में उतर पड़ा है ! 
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यकायक मुन्ना के मनोलोक में सारे सिपाही जीवित हो गये और मुन्ना उन के संग अपने आप को खड़ा हुआ देखने लगा। यह सिपाही तो अब पतरे के माने टीन के न होकर सजीव दीखलायी पड़ने लगे ! 

            मुन्ना आश्चर्य से उनके चेहरों को देखने लगा। एक के मुँह पर ये बड़ी-बड़ी मूँछें हैं ! दुसरे के हाथ में उठी हुई संगीन माने गन है। सामने राणा की फ़ौज से एक सिपाही राजा के सिपाहियों से भिड़ने को उतावला हुआ सामने भागा आ रहा है और चिल्ला रहा है ...'फायर फ़ायर ' आग आग ' ..चौथा घुटनों के बल बैठ निशाना साध रहा है, तभी बन्दूक से एक गोली निकल कर पाँचवें सिपाही की कनपटी के नज़दीक से सुं ...सूँ ..आवाज़ करती गुजर जाती है। ' धाँ य '..का ज़ोरदार स्वर सुनते ही मुन्ना उस पाँचवें सिपाही की और मुड़कर देखने लगा और यह क्या ! पांचवा सिपाही तो घायल हो गया ! उसके दाहिने पैर पे गोली लग गयी थी !  घाव से बेतहाशा खून बहे जा रहा था। सिपाही जमीन पर पड़ा हुआ अब कराहने लगा। 

 अब तो कल्पना-लोक से उतर कर मुन्ना उछल कर अपने सिपाहियों की ओर दौड़ा। उसे अपने मन के आईने में देखी कहानी सच लगने लगी। उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।

      अब वह सच की दुनिया में लौट आया था। मुना ने आहिस्ता से औन्धे मुँह,  पीछे की ओर गिरे हुए, उस पांचवे सिपाही को उठा लिया। परन्तु उसकी आँखें विस्मय से फ़ैल गईं ! दिल अब भी तेज धड़क रहा था। आश्चर्य ! इस सिपाही की टाँगें, घुटनों के पास से सचमुच टूट गयी थी। यह देख कर अब मुन्ना सचमुच परेशान हो गया। 

    मुन्ने ने अपना टूटा सिपाही, गोद में उठाकर रख लिया। मुन्ना की आँखों से टप टप आंसू बह चले। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह अब क्या करे ! किससे कहे ? उसे पता था कि मम्मी-पापा उस की किसी भी बात को समझेंगें नहीं। बड़ों की दुनिया बच्चों की दुनिया से अलग होती है। यह बात मुन्ना जानता था। परेशान मुन्ने को कमरे के दरवाजे से देख रही माँ गिरिजा जी उसी समय कमरे के भीतर आ गयीं। 

पहले तो उन्होंने कमरे में चारों तरफ फ़ैली चीजें बटोर कर उन्हें सही जगह पर रखना शुरू किया। टूटे सिपाही को थाम कर बैठे मुन्ना पर अब माँ की निगाह पड़ी। 

         टूटे सिपाही को देख कर गिरिजा माँ कुछ सोच में पड गयीं। माँ ने अपना सर हिलाया और समीप आयीं तो माँ की साड़ी का नर्म आँचल मुन्ना के सर पे लहरा गया। माँ ने पूछा- 'मुन्ना ! क्या हुआ बेटा ? ' 
   
 माँ के ममतामय स्वर से मुन्ना सम्हला उस ने सजल आँखों से माँ की ओर देख कर कहा, ' मम्मी देखो न मेरे बहादुर सिपाही को चोट लग गयी! 'माँ ने मुन्ने के हाथों से टूटा सिपाही उठा लिया और कहा, ' अरे मुन्ने तू चिंता न कर ..बहुत खेल हो गया। चलो खाना तैयार है ! पापा हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। तुम हाथ धोकर जल्दी से आ जाओ' इतना कहते हुए माँ ने उस टूटे सिपाही को खिड़की के पास उठाकर रखते हुए कहा 'अब ये बहादुर सिपाही कुछ देर आराम करेंगें।' 

भोजन समाप्त करने के बाद मुन्ना फ़ौरन अपने कमरे में आ पहुँचा और अपने घायल सिपाही के पास जा कर मुन्ना खड़ा हो गया। उसने देखा वह टूटा सिपाही बेबस निगाहों से उसी को ताक रहा था। मुन्ने ने कमरे में इधर-उधर देखा और टूटी हुई टांग का हिस्सा उसे दिखलायी दिया तो उसे भी उठाकर उसने खिड़की पर रख दिया। फिर अपने टूटे सिपाही के पास मुँह लाकर फुसफुसाकर वह बोला, 'अब तुम भी आराम करो अच्छा मेरे बहादुर सिपाही ! मैं अब सोने जा रहा हूँ ! कल स्कूल है न जल्दी उठना है'  इतना कह कर मुन्ना बिस्तर पर जा कर लेट गया। उदास मुन्ना को नींद आने में आज देर हो रही थी। पर आखिरकार वह बच्चा था, सो गया।   
          
मुन्ने की आँख लगते ही उसे यूँ लगा मानों वह तेज हवा के संग कहीं दूर उड़ा जा रहा है। फिर धमाके से वह नीचे गिर पडा। गिरा भी तो पानी में ..ये तो अच्छा था कि मुन्ना स्वीमिंग करना जानता था। पानी की तेज धारा मुन्ना को घसीट कर नीचे की ओर ले चली। मुन्ना ने साँस रोक ली। वह नीचे की ओर चला जा रहा था। वह और नीचे सरकने लगा। इसी तरह मुन्ना तैरता हुआ बहुत दूर चला गया। डर के मारे अब तो मुन्ना ने कस कर आँखें बंद कर लीं। फिर कुछ मिनटों के बाद आँखें आहिस्ता से खोलीं तो देखा वह किसी नई दुनिया में आ पहुँचा था।  

 'अरे ये मैं कहाँ आ गया ? 'मुन्ना सोचने लगा। उसने देखा तो चारों तरफ नीले पानी के अन्दर उसे सब कुछ शंखों और सीपियों से बना दिखलाई दिया। मुन्ना के ऊपर, नीचे, लाल, सुनहरी, हरी, नीली, पीली, नारंगी, काली रूपहली, अरे हर रंग की मछलियाँ तैर रहीं थीं। सामने बड़ी सीपी का मुँह आधा खुला हुआ था जिस पर आधी लडकी जिसके नीचे के हिस्से में मछली जैसी पूँछ थी, वैसी जलपरी या अंग्रेज़ी में जिसे 'मरमेड' कहते हैं वह  आराम से वहाँ बैठी थी।  

 मुन्ना को देखते ही वह जलपरी/ मरमेड मुस्कुराई। उसके सुनहरे बाल पानी पर लहरा रहे थे और उसकी भूरी भूरी आँखें मुन्ना को देखे जा रहीं थीं। उसी वक्त तैरती हुईं और भी बहुत सारी सुन्दर जलपरियाँ भी वहाँ आयीं। सभी बड़ी सुन्दर थीं। वे तैरती हुई, मुस्कुराती हुई आयीं और मुन्ना का हाथ थामे अपने राजा के पास ले चलीं। 

जलपरी : मरमेड 
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 एक जलपरी मुन्ना से बोली, ' मुन्ना , ये हमारे राजा जी वरूण देव हैं। 'लोग इन्हें' नेपच्यून भगवान भी बुलाते हैं ! वे जल सागर, दरिया, समंदर सभी के स्वामी हैं। जल में जितने भी जीव जंतु और प्राणी रहते हैं वे वरूण देवता को अपना पिता मानते हैं।  
वरूण देव : नेपच्यून भगवान
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          इतना सुनते ही, मुन्ना ने झट से वरूण देवता को नमस्ते किया। उसने देखा के वरुण देवता एक बहुत बड़ी सोने के रंग की चमचमाती सीप से बने राज सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके ठीक सामने टेबल की जगह बहुत बड़ा विशाल मोती चमक रहा है। मोती में से कभी गुलाबी, कभी सुनहरी और कभी नीली और पीली रोशनी निकल रही है और चारों तरफ प्रकाश फैल रहा है। चाँदनी जैसी आभा आस-पास झिलमिला रही है। मुन्ना ऐसा सुन्दर दृश्य देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने झुककर जैसे माँ ने उसे भगवान् जी की पूजा करते वक्त सिखलाया था उसी तरह अदब के साथ वरुण देवता को प्रणाम किया। मुन्ना बोला ' नमस्ते वरुण देवता।'
वरुण देव ने मुस्काराते हुए कहा ' क्यों मनोज, कैसे हो बेटा ? '

मुन्ना बोला 'अरे वाह ! आप को मेरा नाम भी मालूम है ! क्या आप मुझे पहचानते हो अंकल ? 

वरूण देव ने कहा, ' मुन्ना हम तुम्हें अच्छी तरह पहचानते हैं और हमे ये भी पता है कि तुम बड़े स्मार्ट हो ! अच्छे लडके हो। हम और भी कई सारी बातें जानते हैं। पर तुम बताओ, आज हमारी नगरी में कैसे आना हुआ?'

मुन्ना बोला ' वरुण देवता जी ! मैं नहीं जानता, मैं यहाँ कैसे आ गया ! मैं तो सो रहा था, सच्ची ..और आँखें झपकते ही न, पता नहीं कैसे, मैं यहाँ आ गया ! ये पानी का दरिया बहाकर मुझे आप के पास ले आया ...'

वरुण देव बोले ' बेटा, आज तुम बहुत उदास थे ना, सो हम ने तुम्हें यहाँ बुलाया है। जब भी तुम्हारे जैसे प्यारे प्यारे छोटे, बच्चे, उदास होते हैं, तब हमारे महल में बंधी एक घंटी टन टन कर बजने लगती है। हमें पता लग जाता है कि आज कौन बच्चा उदास है ! घंटी के पास एक शीशे में तुम भी दिखलाई दिए थे सो हमने बुला लिया '

मुन्ना बोला ' वरुण देव, आप को तो सब पता है। आज मेरे बहादुर सिपाही की टाँग टूट गयी न, उस की टूटी हुई टांग देख, मैं सेड हो गया। आज न मैं इसीलिए उदास हूँ ! '

वरुण देव बोले ' मुन्ना हम जानते हैं आप बड़े अच्छे हो। गुड बॉय हो ! अरे सुनहरी जलपरी। मेरी जादुई छड़ी लाना तो .. मुन्ना तुम चिंता मत करो ! मैं तुम्हारे सिपाही की टाँग पहले जैसी जोड़ कर उसे बिलकुल ठीक कर दूँगा ! '
मुन्ना खुश हो गया ताली बजा कर बोला ' सच ? '
तभी सुनहरी जलपरी सोने की छड़ी जिस पर एक चमकता हुआ लाल सितारा भी लगा हुआ था उसे वरुण देवता के सामने ले आयी और वरुण देवता को जादू की छड़ी थमा दी। 
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तब वरुण देवता ने छड़ी को अपने एक हाथ में उठाकर उसे गोल-गोल घुमाया और बोले .. 
' छम छम छाम छूं ..कर दे सही सिपाही की टाँगे तू' .
फिर मुन्ना से कहा 'लो भई मुन्ना अब ये बहादुर सिपाही ठीक हो जाएगा ' 

मुन्ना के आश्चर्य का ठिकाना न रहा वह बोला ' सच ! आपने मेरे सिपाही को ठीक कर दिया ! अब मैं बहुत खुश हूँ ..' थैंक यू '   और इतना कहते ही मुन्ना पानी के भीतर से ऊपर उठने लगा और ऊपर… और ऊपर उठता गया ...  .. अब मुन्ना खुश हो कर तालियाँ बजाने लगा। 
 
' हे ... हे .... वाह वह ..'.... बोल रहा मुन्ना नींद में भी हँसने लगा और उछलने लगा और ऐसा करते हुए मुन्ना अपने बिस्तर से धड़ाम से नीचे गिर पडा ! 

उस के पलंग के साथ लगी नरम कालीन पर गिरने से उसे चोट नहीं आयी। होश संभाल कर मुन्ना जमीन से उठा और सबसे पहले उसकी नज़र खिड़की पर रखे टूटे सिपाही पर गयी। 

मुन्ना ने देखा तो 'अरे ! टूटा सिपाही तो वहाँ नहीं था ! कहाँ चला गया ? अब तो मुन्ना ' माँ माँ ' चिल्लाता हुआ अपने कमरे से बाहर भागा। जोरों से पुकारते हुए पूछने लगा ' मोम  ..मोम   ..तुम कहाँ  हो मम्मा  ?   

गिरजा माँ ने उत्तर दिया ' मुन्ना ..मैं यहाँ रसोई  में हूँ, नाश्ता लगा रही हूँ, क्या बात है बेटा ? ' 

मुन्ना पास जाकर बोला ' मम्मा आपने मेरा टूटा सिपाही देखा है? कल रात खिड़की पर रखा था पर वो वहाँ नहीं है '
माँ ने हँसते हुए कहा ' जा कर, ठीक से देख !  खिड़की पर नहीं तो शायद फर्श पर गिर पड़ा होगा ! '
मुन्ना बोला ' अच्छा मैं देखता हूँ वहां तो देखा ही नहीं ! ' और मुन्ना फिर कमरे की ओर भागने ही वाला था तो माँ ने याद दिलाते हुए कहा ' अरे ब्रश भी कर लीजो और नहाना भी तो है ' ..

उसी समय मुन्ने के घर के दरवाजे की घंटी दनदना कर बजने लगी। आहो डाक्टर चाचा आये होंगें सोच कर मुन्ना ने जा कर फ़ौरन दरवाजा खोल दिया। 

डाक्टर आशुतोष बेनर्जी सुबह शाम मुन्ना के दादा जी शिवनारायण जी की तबियत की जांच करने आया करते थे। वही दरवाजे के पास चौखट पर खड़े थे और वे हाथों में उनका बड़ा सा काला बैग भी थामे हुए थे।

कल रात भी  वे मुन्ना के सो जाने बाद आये थे और आज सुबह सुबह फिर आये थे। उनका यही नियम था। 
डाक्टर चाचा ने कहा ' गुड मोर्निंग मनोज बेटे ! कैसे हो ? '
 मुन्ना ने नमस्ते करते हुए कहा ' मैं ठीक हूँ डाक्टर अंकल। '
डाक्टर चाचा बोले ' अरे भई मुन्ना देखिये, क्या ये सिपाही आपका है ? आज सुबह हमारी क्लीनिक की मेज पर जनाब खड़े थे। शायद अपनी जांच पड़ताल करवाने आयें हों ! मैं यहीं आ रहा था तो इन्हें भी साथ ले आया। संभालो अपने सिपाही को ! ' ये कहते हुए डाक्टर चाचा ने सिपाही, मुन्ना के हाथों में थमा दिया ! मुन्ना आश्चर्य से दो टांगों पर खड़े अपने सिपाही को देखता ही रह गया ! और खुशी के साथ उछल कर बोला ,
' मम्मा ..देखो तो मेरा सिपाही ठीक हो गया ! उसकी टांगें टूटी नहीं ..वाह वाह वाह ! ' 
मुन्ना को प्रसन्न देख कर गिरिजा माँ और डाक्टर बेनर्जी हल्के से एक दुसरे की और देख कर मुस्कुराने लगे।

     मुन्ने को नहीं पता था की, डाक्टर चाचा, डाक्टरी करने के साथ  पुरानी,  टूटी फूटी चीजों को रिपेयर करना भी बखूबी जानते थे। ये उनकी होबी थी। उनका शौक था। टूटी-फूटी चीजों को जोड़ कर उन्हें दुबारा सही करने का अच्छा तजुर्बा डाक्टर चाचा को था। मुन्ना की माँ यह बात जानतीं थीं। कल रात जब डाक्टर बेनर्जी दादा जी की जांच करने आये थे तब माँ ने इस टूटे सिपाही को उठा कर डाक्टर बेनर्जी क हाथ में रखते हुए पूछा था, 
 'डाक्टर साहब, देखिये तो, इस टूटे सिपाही की टांगें आप से, ठीक हो पाएंगीं? '

डाक्टर बेनर्जी ने हँसते हुए कहा था ' लो जी ! अब तो हम खिलौनों के डाक्टर भी बन गये ! भाभी जी आप फ़िक्र ना करें। इस सिपाही की टूटी हुई टांगें बड़ी आसानी से जुड़ जायेंगीं ! आप मुन्ने से कुछ न कहना। सुबह हम मुन्ने को एक सुखद भेंट देंगें और मुन्ने को खुश हुआ देखेंगें। ' 
     
दादा जी ने मुस्काराते हुए अपनी बात कही
 ' डाक्टर साहब, हम सभी ईश्वर के खिलौने हैं। आप हमारे परिवार के सदस्य हैं। 
आप के उपकार हम सदैव याद रखेंगें।आप जैसे डाक्टर बेटे, ईश्वर हर परिवार को दें मैं यह प्रार्थना करता हूँ। '
अब डाक्टर बेनर्जी कुछ धीमी आवाज़ में बोले 'दादा जी आप मुस्कुराते रहिये और हम सब आपको मुस्कुराता देख प्रसन्न होते रहें। मैं, ईश्वर से यही माँगता हूँ।' और अपना डॉकक्टरों वाला बेग उठाकर घर से बाहर जाने के लिए वे निकल पड़े थे ।
आज दिन भर मुन्ना को स्कूल में दोस्तों के साथ खेलते हुए भी न जाने क्यों उसके डाक्टर बेनर्जी चाचा की याद आती रही ! मुन्ना सोचता रहा ' अरे डाक्टर चाचा की शक्ल वरुण देवता से कितनी मिलती है ! कितने सेम दिखते हैं दोनों ...!'
 - लावण्या

Tuesday, October 3, 2017

खिलती कलियाँ :

खिलती कलियाँ : ( बच्चों के लिए कहानी )
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यवनिका उठते गीत संगीत से शुभारम्भ : बच्चों के समवेत स्वर :
 " हम फूल हैंहम फूल हैं
    हम फूल हैं इस बाग़ के - ( ३ ) 
     आओ....सब आओ सब मिल कर गाओ 
      इस जीवन में कुछ बन करइस देश का मान  बढाओ 
          आओ आओ आओ आओ ....
             है देश हमारा प्यारा इसे खुशहाल बनाओ 
              कुछ हैं पिछड़े कुछ भूखे इनका माथा सहलाओ ..
                आओ आओ आओ आओ .... 
                 है काम बड़ा अब हमकोहै आगे बढ़ते जाना 
                   बीती है समय की आंधी फिर बाग़ नया लगाओ 
                      आओ आओ आओ आओ ....
                          है भारत मेरा प्याराहम हैं तुझ पे बलिहारी 
                       यह  भूमि है स्वर्ग से प्यारी इसे स्वर्ग से मधुर बनाओ 
                            आओ आओ आओ आओ ....
                                    हम फूल हैं इस बाग़ के - ( ३ ) " 
सूत्रधार : 
बच्चों आज हम ज्ञान की विज्ञान की और आनंद और उमंग से भरी बातें करेंगें।  क्या आप सब तैयार हो हमारे संग एक लम्बे सफ़र के लिए 
भईजर होंशियार हो जाओ ! वो  देखो चाचा मस्ताना आ रहे हैं ! 
चाचा मस्ताना :"  आहा ! मेरे प्यारे बच्चों नमस्ते !
 मैं हूँ आपका चाचा मस्ताना ! आप सब का हमसफ़र  और दोस्त ! 
 मुझे बच्चों के संग रहना बहुत अच्छा लगता है ! मैं हमेशा 'मस्तमाने खुश रहता हूँ  इसलिए मेरा नाम है " मस्ताना " ! 
आप सब मुस्कुराते रहीये खुश रहीये ...हां हां ऐसे  ही !  तकलीफों सेमुसीबतों से गभराना कैसा हम सदानिडर रहें और आगे बढें ! आप सब हमारे प्यारे भारत देश की खिलती कलियाँ हों ! रंगबिरंगी फूलों सी कोमल  आपकी मुस्कान है !  आप सब को यूं मुस्कुराता हुआ देख कर मुझे बड़ी  प्रसन्नता हो रही है ! 
एक बालक : चाचा मस्तानाचचा नेहरू अपने  सुफेदकोट मेंलाल गुलाब का फूल  लगाते थे ना 
चाचा मस्ताना : अरे शाबाश ! खूब याद किया राकेश ! चाचा नेहरू को !
                     बिलकुल सही ! उन्हें बच्चे बड़े ही प्रिय थे ! वे भारत को खुशहालआबाद देखना  चाहते थे और गांधी बापू तो बच्चों के संगबच्चा हो कर खेलने लग जाते थे !  तब गांधी बापू  कुछ समय  के लिए अंग्रेजों को भी भूल जाते थे। जिनसे आज़ादी हासिल करवाने का बड़ा काम किया बापू ने  ... 

कन्याओं के स्वर : " भरा समुन्दरगोपी चंदरबोल मेरी मछली कितना पानी 
एक कन्या उत्तर देते कहती है : "  इतना पानी ..इतना पानी " ..
 आहा ! यहां मछली रानी आ गयी ..
   " मछली जल की रानी हैजीवन उसका पानी है ,
      हाथ लगाओ तो डर जायेगीबाहर निकालो तो मर जायेगी ! " 
 ( हाहाहा ...बच्चे तालियाँ बजा करकिलकारियां लेते हुए ,  खूब हँसते हैं ...) 
चाचा मस्ताना :  " बच्चों पानी से एक कहानी याद आ रही है.  सुनोगे 

एक समय की बात है।एक थे महा पुरुष " मनु " ! भारत भूमि  पर  प्राचीन काल था। मनु महाराज, ' कृतमाला नदी में स्नान कर रहे थे। उन्होंने ज्यूं ही पानी में हाथ डाला कि एक सुन्दर सी,  छोटी सीप्यारी सी,  चमकते हुए रंगोंवाली एक मछली उनके हाथों में आ गयी !  उस रंगीन मछली को देखकर मनु महाराज  बड़े प्रसन्न हुए ! वे  उसे आपने महल में ले आये और एक कांच के बड़े से बर्तन में मछली को साफ़ जल भरवाकर उस में रख दिया और मछली तैरने  लगी तो उसे देख सभी बड़े प्रसन्न हुए। पर जानते हो आगे क्या हुआ ? वह मछली तो भई,  दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती ही चली गयी !तब मनु महाराज ने उस मछली को बर्तन से निकालकर, अपने महल के पास फैले एक  सुंदर सरोवर में रखा। पर  ये क्या !  वहां भी  वह मछली खूब बड़ी सी हो गई और बस फिर तो वह  बढ़ती ही  चली गयी ! मनु महाराज परेशान हो गए पर उनहोंने हिम्मत नहीं हारी  !  पुन: मछली को सरोवर से हटाकर उनके महल से दूर बहती हुई नदी में ले जाया गया। फिर दो दिन बीते और मछली तो अब अत्यंत विशाल  हो गई !  फिर तो वह नदी भी छोटी पड़ गई ! अब  तो मनु महाराज सेवकों की सहायता से मछली को विस्तरित सागर किनारे  ले आये !
बच्चोंउस चमत्कारी मछली की पूँछ और शरीर अब अतिशय विशाल हो गया था ! जानते हो बच्चोंये मछली स्वयं भगवान महाविष्णु थे जो मत्स्य अवतार लेकर धरती पर अच्छे लोगों की रक्षा करने आये थे !
उन्होंने मनु राजा से कहा,
 
'  हे राजन ! आप का मन पवित्र है। मैं आपकी रक्षा करने आया हूँ। आप जगत के हर प्रकार के प्राणियों के जोड़े जैसे २ मोर२ गैया२ बंदर२ भालू२ शेरों को लेकर एक बडी सी  नौका पे  सवार हो जाइए। नौका को मेरे शरीर से बाँध लें।
आप सावधान होकर सुनें इस धरती पे अब प्रलय वर्षा होगी। आपकी नौका और उस मे सवार सारे प्राणी मुझ से बंधी नौका में सुरक्षित रहेंगें। मैं आप सभी की रक्षा करूंगा। " मनु महाराज ने यह सुनकर प्रणाम किया और भगवान की आज्ञा का पालन किया।
 
संत महात्मा महाराज मनु  ने मत्स्य के पीछे अपनी नौका बांध दी और जैसा भगवान् ने चेताया था धरती पर खूब वर्षा हुई ! हर तरफ  बाढ़  आई ! सारे प्रदेश डूबने लगे परंतु मनु महाराज की नाव को मत्स्य भगवान् की कृपा सेरक्षा का छत्र मिला और वे बच गये और उनकी नाव में सवार कई  तरह के प्राणी भी जीवित रहे ! 
एक बच्चा : सारी दुनिया डूब गयी ! हाय राम ! 
एक लडकी : मैं नहीं डूबूँगी ! मैं तो मेरे पापा के संग स्वीमींग करती हूँ ....
चाचा मस्ताना : अरे वाह ! बच्चों आप सब भी तैरना अवश्य सीखना, बड़े काम का है और व्यायाम भी है ! 
बच्चे समवेत : हां हां हम भी तैरना  सीखेँगेँ ..फिर हम नहीं डूबेंगें !    
चाचा मस्ताना : अच्छा बच्चों ये बतलाओ ,
                   पानी  पे झिलमिलाते सितारे देखे हैं आप ने 
कुछ बच्चे : जी हां चाचा मस्ताना हमें तारे बहोत पसंद हैं ! 
एक बालक " मैं गाऊँ चाचा मेरे माँ ये गीत गातीं हैं  ...
अले लल्ला लल्ला लोरीदूध की कटोरीदूध में पतासामुन्नी करे तमासा "  चन्दा मामा दूर केपूए पकाए भुर केआप खाओ थाली में,  मुन्ने को दें प्याली में " 
कुछ बालक : जगमग जगमग करते तारेकितने सुन्दर कितने प्यारे ! 
                किसने सूरज चाँद बनाए ?  किसने काली रात बनायी 
                किसने  सारा जगत बनाया किसने बोलो किसने 
मंच के परदे पे निहारिकाएंतारा मंडल और ग्रहोंउप ग्रहों को घूमता हुआ द्रश्य दीर्घा पट दीखलायी देता है )
 " आओ प्यारे तारे आओआकर मीठे सपन सजाओ,
 जगमग जगमग करते जाओहमें  अपना गीत सुनाओ " 
एक बड़ा सा प्रकाशमय तारा आकर रूकता है :
"  बच्चों क्या आप मेरी कहानी सुनोगे ?  मैं सदैव उत्तर दिशा में ही दिखाई देता हूँ और हमेशा  स्थिर रहता हूँ।  मैं ध्रुव तारक ' हूँ !  
एक बालक : हां मेरी स्कुल में सिखलाया था - आप तो " नोर्थ - स्टार " हो ! है ना
ध्रुव तारा : मुझे सब जानते हैंमुझ से उत्तर दिशा को पहचानते हैं ! मेरी कहानी सुनाऊँ 
समवेत बच्चे : हां हां सुनाईयेना ....
सूत्रधार का स्वर :
एक समय की बात है एक थे राजा जिनका नाम था उत्तानपाद जिनकी २ रानियाँ थीं !  एक थीं सुरुचि और दूसरी थीं सुनीति ' !
ध्रुव सुनीति के पुत्र थे और उत्तम सुरुचि के !  राजा उत्तानपाद उत्तम को बहुत प्यार करते। उसे गोदी में बैठालते पर ध्रुव को  ऐसा नहीं करते जिससे बालक ध्रुव के मन को दुःख पहुंचताथा।  
एक दिन की बात है।  राज सिंहासन पे माहराज उत्तानपाद उत्तम को गोद में लेकर बैठे थे तो बालक ध्रुव भी वहां आया। 
ध्रुव : पिताजी ...पिताजी मुझे भी बैठना है मुझे भी गोदी ले लो ना ! ध्रुव ने बड़े प्यार से अनुरोध किया। 
राजा उत्तानपाद : रूक  जाओ  ध्रुव ..देखो अभी तुम्हारा छोटा भैया यहां बैठा है ...राजा ने समझाते हुए ध्रुव से कहा।  
रानी सुरूचि :  " ध्रुव ! तुम बड़े हठी हो ! चलो भागो यहां से ...परेशान मत करो ...'फिर धीमे से वो बोली , ' अपने पिता जी की गोदी में बैठने के लिए तुम्हे नया जन्म लेना पडेगा ..हूंह ....'     
ये कड़वी बात को बालक ध्रुव ने सुन लिया और वह रूठ कर वहां से दूर चल दिया और जाते जाते फफक कर रोने लगा। 
अब ध्रुव अपनी माँरानी सुनीति के पास पहुंचा जो महाविष्णु की आराधना - पूजा करते आँखें मूंदें हाथ जोड़े हुए महाविष्णु की सुन्दर प्रतिमा के समक्ष बैठीं हुईं  थीं।  
अपने पुत्र की रूलाई के स्वर से माता सुनीति का ध्यान भंग हो गया। उन्होंने ध्रुव को बाहों में भर लिया और माथा चुम लिया और माँ उसे प्यार करने लगीं। 
ध्रुव रोते  हुए : "  माँमाँ ...पिताजी मुझसे प्यार नहीं करते ! ...आज उन्होंने मुझे गोदी में नहीं बिठलाया वे सिर्फ भैया को प्यार करते रहे ! ध्रुव ने रोते हुए कहा। 
माँ सुनीति : " मेरे बेटेईश्वर तुम्हे प्रेम करते हैं। साधारण मनुष्यों के स्नेह से ईश्वर के प्रेम की क्या तुलना होगी बेटे ! शांत हो जा ! "
माता सुनीति ने अपने पुत्र ध्रुव को महाविष्णु की प्रतिमा की ओर सम्मुख करते हुए बहुत सारा स्नेह जतलाया और कहा ये ईश्वर हैं बेटेइन्हें  प्रणाम करो 
ध्रुव : माँ मैं महाविष्णु से पूछना चाहता हूँ क्या वे मुझे प्रेम करते हैं मैं जा रहा हूँ तपस्या करूंगा और प्रभू के दर्शन करूंगा ! 
सुनीति : अरे रूक जा मेरे लाल ! बेटे ध्रुव ! तू अबोध बालक है ! किस प्रकार ऐसी कड़ी तपस्या कर पायेगा !.. रूक जाओ पुत्र ! देखो यूंहठ ना करो ...मैं तुम से प्रेम करती हूँ ...सच ! अब मान भी  जा बेटे ! 
माँ ने लाख समझाया परंतुबालक ध्रुव ने एक ना मानी और महाविष्णु के दर्शन करने का प्रण करते हुए घोर तपस्या करने गहन वन में बालक ध्रुव चल दिया।
तपस्या करते महाविष्णु का नाम बार बार जपते हुए ध्रुव ने लंबा समय व्यतीत किया जिससे स्वयं ईश्वर महाविष्णु बालक ध्रुव की तपस्या और लगन  देख कर वे ध्रुव  के समक्ष एक दिन साक्षात प्रकट हो गये  और मुस्कुराते हुए महाविष्णु ने ध्रुव के माथे पर अपना हाथ रख दिया और प्यार से ध्रुव का माथा सहलाया।  
महाविष्णु :पुत्र ध्रुव ! आँखें खोलो ..मैं आया हूँ और तुम मुझे,  सर्वाधिक प्रिय हो ! तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई है , मांगो क्या चाहते हो ?' 
ध्रुव ने प्रभू के कँवल जैसे सुन्दर व दिव्य चरण थाम कर अश्रू पूरित स्वर से कहा 
हे प्रभो मैं आपके पास रहना चाहता हूँ 
महाविष्णु : तथास्तु पुत्र ! अब तुम्हारा स्थान उत्तर दिशा को प्रकाशित करते हुएमेरे समीप सदैव  अचल रहेगातुम अमर रहोगे मेरे पुत्र ध्रुव ! 
चाचा मस्ताना : तो बच्चोंइस तरह उत्तर दिशा में " राजकुमार ध्रुव " तारक बन कर इस तरह स्थिर हो गये और आज भी ध्रुव वहीं हैं ! 
एक बालक : " चाचा जीतब ध्रुव कितने यर्ज़  ( साल ) का था ?  " 
चाचा मस्ताना : अरे बेटे तपस्या करते हुए ध्रुव की उम्र थी बस पाँच साल की जब उसने इतनी कठोर तपस्या की थी ! अगर वह ५ साल का अबोध बालक ऐसी कड़ी तपस्या कर सकता है तो बताओस्कूल का होम - वर्क क्या भला कोई कठिन काम है आप सब अपना रोज का स्वाध्याय = मतलब होम - वर्कनियमित रूप से किया करो तब खूब तरक्की करोगे  और उसी से एक दिन बहुत बड़े इंसान बनोगे। तो बच्चों आप  मन लगाकर अपना काम करना। 
मेरे बच्चों ...सुनो 
                    ' मेहनत से जो करते कामजग में होता उनका नाम
                      परबत की छाती को फोड़ऊपर जो है धारा आती ,
                       बाधाओं से लड़नेवालीवह जीवन झरना कहलाती 
                       कलकल करती रहती हरदमकभी नहीं करती आराम  
                       सात समुन्दर को कर पारजो आता लेकर आलोक,
                       उस सूरज को किसी मोड़ परअन्धकार न सकता रोक !
                       आता लेकर सुबह सुहानीजाता हमें दे कर मीठी शाम। 
                        कितनी छोटी ये चींटी रानीपर हैं बडी लगन की पक्कीं,
                        हो गर्मी सर्दी बरखा हर दिन चलती रहती जीवन चक्की 
                        उनके काम के आगे भारी भरकम हाथी हो जाता नाकाम ! 
                        मेहनत से जो करते कामजग में होता उनका नाम .... " 
चाचा मस्ताना : अच्छा बच्चों अब बतलाओआपको कौन से खेल पसंद हैं  ?
                    बबलू     ..आप बताओ . 
बबलू : मुझे तो लुका छिपी सबसे अच्छी गेम लगती हैं ! 
चाचा : खूब कही बबलू जी ! हम भी खूब खेला करते थे पर अब तो चाचीहमें पकड कर आऊट कर देतीं हैं !  अच्छा अब आगे सुनोएक दिन एक बहादुर बच्चे को उसके दुष्ट पिता ने  चोरी - छिपे   भगवान की पूजा करते हुए देख लिया था। 
कुछ बच्चे : कौन था वो बालक चाचा जी 
मस्ताना : एक समय की बात सुनोएक था राक्षस - उसका नाम था हिरण्यकश्यपु ! वह दुष्ट बड़ा ही बलशाली था।  वह बड़ा घमंडी था।  अपने बाहुबल के कारण वह मनमानी करने लगा।  भगवान के नाम स्मरण से वह चिढ जाता और उस दुराचारी ने पूजा - पाठ ही बंद करवाने का  हुक्म दे दिया ! वह दुष्ट और घमंडी कहने लगा 
मुझे प्रणाम करो ! ईश्वर कोई नहीं हैं ! बस मेरा ही सब ध्यान धरो " 
एक बालक : मेरी मम्मी उसकी बात कभी नहीं मानतीं 
                 वो तो रोज कृष्ण जी की पूजा करतीं हैं ! 
दूसरा बालक : मेरी मम्मी गिरजाघर जातीं हैं।  मोमबतियां जलातीं हैं 
तीसरा बालक : मेरी अम्मी रोजाना नमाज पढ़तीं  हैं ....
चौथा बालक :  हम गुरूद्वारे जाकर " वाहे गुरु दा खालसा जपते हैं जी ! " 
पांचवा बालक : मेरी मम्मी पापा और मैं, ' अगियारी ' जाते हैं। हम अग्नि देव                                   की पूजा करते हैं।  
चाचा मस्ताना : बच्चोंरास्ते अलग अलग हैं पर भगवान एक हैं ! यूं  समझ लो एक                     सुंदर बाग़ है जिस बाग़ के बीचों बीच एक  सुंदर पानी का फव्वारा है।                    अलग अलग रास्तों से चलकर हम सब वहां फव्वारे के पास पहुँचते हैं।                        पानी पीते हैं और अपनी प्यास बुझाते हैं।  हाँ अब कहो ,                                        ' पानी ' तो  एक सा  ही रहेगा न ?  जिस किसी रूप में आप सब                            को परम पिता ईश्वर पसंद हों उन्हें पूजो।  ईश्वर ही हमें सत्य का                         रास्ता दिखलाते हैं। उसी सत्य के रास्ते पे चलना सीखना मेरे बच्चों  !  
बच्चे : हां चाचा जी फिर आगे क्या हुआ कहानी तो अधूरी रह गयी ! 

चाचा मस्ताना : हां तो उस दुष्ट राक्ष्स  के घरएक सुंदर नन्हा साकोमल साभोला भाला,  बालक ' प्रहलाद ' पैदा हुआ जो जन्म से ही सदा  हरिनाम ' हरि ' हरि ' जपा करता था और ईश्वर का नाम लिया करता ! 
  ' बालक प्रहलाद की भक्ति से उसके पिता हिरण्यकश्यपु नाराज होते रहे। उस निर्दयी ने अपने ही फूल से कोमल बालक कोपहाडी से नीचे फिंकवा दिया पर प्रभू ने प्रहलाद की रक्षा की और प्रहलाद बच गया ! 
             " जाको राखे सांईयामारी सके न कोई " ये सच हुआ ! 
कुछ बच्चे : कैसा दुष्ट था ये राक्षस ! हाय ! 
चाचा मस्ताना : अब तो बच्चोंउस दुष्ट राक्षस का क्रोध और अधिक बढ़ गया।  उसने अपनी बहन प्रहलाद की बुआ होलिका को बुलवाने सेवकों को भेज दिया। वो आयी ! इसे प्रभू से वरदान मिला था किअग्नि से वह नहीं  जलेगी। तो वह दुष्ट बुआ होलिकाप्रहलाद को गोदी में लेकर आग के भीतर जाकर  बैठ गयी ! पर आश्चर्य ! प्रहलाद का बाल भी बांका न  हुआ और यही  होलिका धू - धू करती हुई आग की प्रचंड लपटों में जल कर भस्म हो गई  ! इस दारूण घटना को देखकरभगवान जी को भी क्रोध आ गया ! शेर का मुख धरेआधे सिंह और नीचे बलवान पुरुष का रूप लिएभगवान नरसिंह स्वरूप लेकर प्रकट हुए ! हिरण्यकस्यप के राजमहल के एक खम्भे को चीर कर नरसिंह बाहर निकले और जोर से चिंघाड़े ..तो दसों दिशाएं भी भय  से थर थर कांपने लगीं !
भगवान नरसिंह : हे पापी  हिरण्यकस्यप ! अब तेरा अंतकाल आया ! 'और उसी क्षण अपने शेर के रूप लिए, तीखे नुकीले नाखूनों सेनरसिंह भगवान ने उस गंदे राक्षस को मार दिया ! तब, प्रहलाद ने आकर नरसिंह भगवान की स्तुति की तो भगवान् शांत हुए और अपने चतुर्भुज स्वरूप में आकर नरसिंह भगवान ने अपना असली सुन्दर कल्याणकारी स्वरूप दिखलाया।  वे ' महाविष्णु ' स्वरूप में चतुर्भुज रूप में  निर्मल, मधुर स्मित लिए प्रकट हुए  और उन्होंने प्रहलाद को ' राजा ' बना कर सिंहासन पर बैठाल  दिया। 
समवेत बच्चे : हे  ! हे !! हम भी राजा बनेंगें ....हम भी राजा बनेंगें ....
सूत्रधार :
चाचा मस्ताना बच्चों को लेकर एक उड़ने वाली कालीन पे जा खड़े हुए तो वह
 उड़ने लगी और अब वह भारत से आगे पश्चिम दिशा में उड़ चली।  
चाचा : अरे ! ये हम कहाँ आ पहुंचे बताओ बच्चोंहम कहां हैं ?  
बच्चे : ( नीचे झांकते हुए ) ये तो अरबस्तान लग रहा है चाचा जी ....... 
घूँघरूओं की दिलरुबा की और मुरली जैसे सुरीले वाध्य यन्त्रों के स्वर सुनायी दीये और बच्चों ने देखा किरेत ही रेत बिछी हुई थी और ऊंटों के काफिले गुजर रहे थे।  खजूर के पेड़ों से कहीं कहीं हरियाली भी थी जहां चश्मों का पानी बह कर नन्ही झील बनी हुई थी। 
चाचा : बच्चोंयहीं पर हजरत मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था उन्होंने इंसानियत को इस्लाम का पाक पैगाम दिया था और कुराने शरीफ भी यहीं की सरज़मीन से आयी है। वे फ़रिश्ते थे जिनके पैगाम ने हज़ारों लोगों को अमन चैन का रास्ता दीखलाया !
अय खुदा.. . तू है कहांहम तेरे बंदें हैं 
ये आसमां तेरा है सारा ये नूर तेरा है  -
 अय खुदा ...अय खुदा ...
अय खुदा हम तेरे दामन में हैं पले
तेरी बदौलत हम सभी तेरा नाम लेकर चले 
अय खुदा ....अय खुदा  ...." 
एक बालक : मैं ईद के चाँद को देख कर खुश होता हूँ बड़े अब्बू को सलाम करता हूँ   मौलवी चाचा के साथ इबादत करता हूँ ! 
मौलवी : शाबाश मेरे बच्चे ..खुश रहो ...फूलो फलो ...
सूत्रधार : 
अरे ये चाचा आगे बढ़ते तेजी से कहाँ चल दीये अब कौन देस पहुंचे जनाब ?

चाचा : ये लो हम आ पहुंचे येरूस्शालेम ! ईसा की भूमि ! यहीं वे पैदा हुए थे 
ज़ोनतुम  बतलाओ, ईसा माने जीज़स क्राइस्ट ! उनके बारे में कुछ बतलाओ हाँ जॉन कहो ...कहोशरमाओ नहीं ...

ज़ोन : ईसा मसीह मुझे बहुत प्यारे लगते हैं। उन्हें सलीब पर देख मेरी आँखें भर आतीं हैं। ईसा मसीहमाता मरीयम के बेटे थे। ईसू ने भाईचारे व प्रेम का पाठ पढ़ाया था।  हमारी बाईबल में बहुत सी सुंदर कहानियां हैं। सुनोगे एक कथा ? लो सुनो 
 ' एक समय की बात है। .. एक बारएक बीमार आदमीसडक परथक कर गिर पडा ! वहां से एक सेठ गुजर रहे थे उन्होंने इस बीमार को देखा पर उन्हें दया नहीं आयी और वे उस बीमार आदमी को अनदेखा कर वहाँ से दूर चले गये। 
इसी तरह कई  सारे लोग आये और किसी ने भी मदद नहीं की और सब चले गये। कुछ देर बादवहां से एक गरीब आदमी गुजरा। वह बीमार आदमी के नजदीक आया। उसे सहारा देकर बैठायापानी पिलाया और अपनी रोटी तोडकर उसे खीलायी। फिर उस बीमार के घावों को साफ कर, इन घावों पर पट्टी भी बाँध दी तब वह बीमार स्वस्थ लगने लगा और उठ कर खड़ा हो गया ! रास्ते पर जो राहगीर लोग थे वे चकित होकर देखने लगे तो ! वहां  प्रकाश की किरणें छाने लगीं और वही  बीमार आदमी खुद, भगवान बन गये ! उस गरीब आदमी का हाथ पकड़ कर वे उसे अपने संग ' स्वर्ग में माने ' हेवन ' में ले गये !
चाचा : अरे वाह ज़ोन बड़ी उम्दा कहानी सुनायी तुमने ! इस कथा को  " ध गुड समारीटन " कहा है धर्म ग्रन्थ बाईबल में !
तो बच्चों इस कथा से हमें ये सबक मिलता है किहमेशा हमसे जो भी बन पड़ेहर किसी जरूरतमंद की सहायता  करें ! जो हमसे कमजोर है उन पर दया भाव रखें ..
सुनो 
         ' मिलजुल कर हम काम करें तोकोई काम कठिन नहीं रहता 
            एक दूजे का हाथ बंटाएं तो कोई मुश्किल काम नहीं रहता ! 
           क्यों बच्चोंसही कह रहा हूँ ना 
एक लडकी : गुरप्रीत क्या इस राखी पे मैं तुम्हें राखी बाँध सकती हूँ 
गुरप्रीत : हां बहना ,  जरूर बाँधना ! मैं तेरी रक्षा करूंगा ...
             मेरी लाडली बहना के लिए जान भी  कुरबान है ..
लडकी : ना ना मेरा वीरमेरा भईयासौ साल जीये  ...खूब मज़े करे 
             मेरा भाई बड़ा बलशाली है भईया ...भईया ....
             है बहन बांधती राखी जिसकोवही उसका सच्चा भाई 
             हर मुश्किल में आकर सहलातावही है मेरा प्यारा भाई
             भैया मेरेमेरे गहनादेखूं मैं तुझे हरदम यूं  मेरे अंगना   
             आया सावन झूला लेकरभैया घर तेरेमेरे सूना  रे अंगना 
बच्चे : झूला हमें कितना प्यारा लगता है जिस बच्चे ने झूला नहीं झूला हो उसका कैसा बचपन ! 
चाचा : झूला झूलते हमें न भूल जाना ! 
बच्चे : नहीं चाचाहम आपके दोस्त हैं  ! आपको कभी नहीं भूलेंगें न ही छोड़ेंगें ! 
चाचा " बेहराम ,बेटेथक गये हो क्या तुम भी कुछ बोलो न ..
बेहराम : मैं हूँ पारसी ..भारत भूमि पर हमारे पडदादा ईरान से आये थे और भारत में घुलमिल गये। पारसी लोग गुजरात प्रांत के संजाण नामके बंदरगाह पेउतरे थे। 
एक छोटी बच्ची : बंदर कहाँ है बंदर 
चाचा : अरे छुटकी! बंदरगाह का मतलब है समुद्र किनारे जो धरती सागर से मिलती है वह सागर का किनारा बंदरगाह कहलाता है।वही जहां बड़ी बड़ी नाव किनारे आतीं हैं।  
तुतलाकर : मैं बोट में एक बाल पानी में घूमने गयी थी ...
दूसरी : हां ...ऐसे ही एक बोट आयी थी उसकी कहानी बेहराम सुना रहा है अब सुनो 

बेहराम : संजाण के राजा ने दूध से भरा कटोरापारसी भाईयों के पास भेजा मतलब  था कि मेरा नगर इस लबालब भरे  हुए कटोरे की तरह लोगों से भरा हुआ है  इस में जगह ही नहीं ! तब हमारे गुणी दादाओं ने उसी दूध से भरे कटोरे में थोड़ी चीनी मिला दी !  मतलब उनका जवाब था कि, ' हम दूध में शक्कर  घुल जाती है उस तरह घुलमिल कर रहेंगें। '
एक बच्चा : देखूं क्या तू भी शक्कर जैसा मीठा है क्या बेहराम काटूं तुझे 
चाचा : अरे भाई अब हल्ला गुल्ला मत शुरू कर देना !  बेहराम शाबाश बेटे -शाबाश 
 अच्छा अब यह कथा सुनो !
 एक थे बालक अष्टावक्र!  नहीं सुना उनका नाम वे थे एक ऋषि के पुत्र ! अष्टावक्र के पिता बड़े ही विद्वान और महात्मा थे। अब अष्टावक्र का नाम ऐसे क्यूं रखा गया था पता है क्या ? नहीं कोई बात नहीं।  चलो मैं बतलाता हूँ क्योंकिउस कुमार का शरीर आठ जगह से वक्र माने टेढा मेढ़ा था! पाँव,हाथकमरगरदनमूंह वगैरह ..कई लोगों को इसी तरह बीमारी के  कारण शरीर ऐसे टेढ़ा हो जाता है !
बच्चे : हाय बेचारा अष्टावक्र ! 
चाचा : न न ...वह बेचारा नहीं था , वह था अष्टावक्र परम ज्ञानी ऋषि कुमार ! 
 
एक दिन महाराज जनक  के राज दरबार  में अष्टावक्र आ पहुंचा। उसे देख कर पहले तो सब हंसने लगे। कुछ बुरे और शैतान लोगों ने अष्टावक्र का मज़ाक भी उड़ाया पर बच्चों परम् ग्यानी बालक अष्टावक्र शांत ही  रहा।  
फिर उसने ऐसी ज्ञान ,विज्ञान की बातें सुनाईं तो सभा में जितने भी  लोग जमा हुए थे सब चकित रह गए ! अष्टावक्र के ज्ञान पूर्ण बातों को सुन सब सन्न रह गये !
बड़े बड़े पंडितों को बात करते हुए अष्टावक्र ने जो  प्रश्न पूछे उन के  उत्तर उन भरी सभा में बैठे किसी भी पंडित को नहीं मालूम थे !  
तब शर्मिंदा होकर बड़े लोगों ने  जनक राजा के दरबार में बैठे बड़े बड़े पंडितों नेसब ने अपनी  हार मान ली और अपने अपने कान पकड़े और जनक राजा ने और सभी ने उठकर  अष्टावक्र को आदर सहित सर झुकाकर प्रणाम किया और उस वीर ज्ञानी बालक का बहुत सन्मान किया। 
तो बच्चोंकिसी के आँख न होकान न होहाथपाँव न हों या किसी के शरीर  के अवयवों में कमी को कोई कमजोरी हो उनका कभी मज़ाक नहीं करना!
किसी की कमज़ोरी का मज़ाक उड़ाना  ये  बहुत बुरी बात है ! 
कई  फूल खिलने से पहले मुरझा जाते हैं ..समझे ना 
चाचा : गांधी बापू किसी को छोटा या बड़ा नहीं मानते थे सब के साथ एक सा व्यवहार किया करते थे। किसी का काम ऊंचा नहीं किसी का नीचा नहीं ! 
तो बच्चोंकोइ ऊंचा नहीं कोइ नीचा नहीं है !
एक लडकी : चाचा जी मैं फ्लोरेंस नाईटिंगेल " की तरह नर्स बनना  चाहती हूँ और मेरे देश के सैनिकों को घाव लगेगा तो मैं उनकी सेवा करूंगी। 
सुनिए ये गीत ..
              " चाह नहीं  मैं सुरबाला के घनों में गूंथा जाऊं 
                 चाह नहीं प्रेमी माला में बींध प्यारी को ललचाऊँ 
                 मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक 
                 मातृभूमि पर शीश चढाने जिस पथ जाएँ वीर अनेक 
                      जिस पथ जाएँ वीर अनेक ...." 
एक लडका : चाचा मेरे बापू खेती करते हैं।  वे  एक किसान हैं। मैं भी किसान बनूंगा  लड़का गीत गाने लगता है ~
"
 एय किसान गाये जा, प्यारे हल चलाये जा , आज धूप तेज है 
  पर तुझे खबर कहाँ चल रही है लू चलेतुझको उसका डर कहाँ 
 एय किसान गाये जा....गाये जा....   गाये जा....   गाये जा....   " 
चाचा : बच्चों हमारा राष्ट्र गीत रवीन्द्रनाथ टैगौर ने लिखा है एक बार जब वे तुम्हारी तरह छोटे थे तब जिद्द करने लगे कि वो जिस पेन से लिखेंगें उस में नीली स्याही नहीं बल्केफूलों का रस भरा जाएगा ! उनके चाचा जी ने बच्चे का मन रखते हुए ऐसा ही किया।कुछ  फूलों से रस निकाला गया और पेन में भरा गया पर अरे , धत्त तेरे की ...फूलों के रस से तो  कुछ लिखा ही न गया !   

बच्चे : जन गण मन अधिनायक जय हे ये राष्ट्र - गीत उन्हीं ने बड़े होकर लिखा है न पर  चाचा जी अभी हमारी बातें ख़त्म नहीं हुई अभी ये गीत हम नहीं गाएंगें हम तो आप से और कहानियां सुनना चाहते हैं चाचा मस्ताना ! कुछ और सुनाईये ना ! 

चाचा मस्ताना : बच्चों समय भागा जा रहा है। अब ये आख़िरी कहानी सुनाता हूँ।  भारत देश का नाम कैसे पडा जानते हो नहीं तो ध्यान से सुनो !  
एक थे राजा दुष्यंत उनकी पत्नी थीं शकुन्तला उन्हीं का बालक था वीर भरत वह बचपन मेंसिंहों के साथ खेला करता था ...  
हमारे भारत देश मेंगंगायमुनानर्मदागोदावरीकावेरीकृष्णा जैसी महान नदियाँ हैं ! उन्नत शिखर उठाये हिमालय की परबत मालिका हैं  और सह्याद्री, सतपुडा और विन्ध्याचल से परबत हैं !
इसी भारत भूमि पर  श्री रामश्री कृष्ण के रूप में स्वयं भगवान अवतरित हुए हैं और उन्हीं सा मधुर बचपन हमारे देश के बच्चों का हो ! ये हमारी प्रार्थना है। हमारे भारत देश की हर माता बड़े प्यारदुलार से फूलों की तरह सम्हाल कर अपने शिशुओं  को पालती पोसतीं हैं !
सच बच्चों हमारे धन्य भाग्य है कि इस भारत - वर्ष में हम 
साथ साथ मिलजुल कर स्वतन्त्र भारत में रहते हैं। बच्चों हमें भारत को  एक सशक्त और गौरवशाली देश बनाना है। हम भारत माँ की सदैव सेवा करें ! हम भारत को अब कदापि पराधीन न होने देंगें ! आगे बढेंगेंहम  मिलजुल कर  बड़े बड़े काम करेंगें। ऐसे काम करना कि तुम्हारे माँ पिता का सर ऊंचा हो जाये ! 
                      समवेत स्वरों में गीत :
      " तुम में हिम्मत है पहाड़ों कीतुम में ताकत है हवाओं की 
                तुम मीठी बातें बोलोगेजग को प्यार से जीतोगे 
                यह भारत अपना देश हैतुम भारत का  नया सवेरा हो 
भारत के स्त्री एवं पुरुष : हम तो पीछे रह जायेंगें 
                                तुम को आगे जाना होगा 
                              आगे बढना यह नारा है,
                              भारत हमको प्यारा है 
                               जगती के भू मंडल पर
                             ये दमकता हुआ सितारा है 
                                 
                             हम भारतीय ! हम भारतीय  !
                                हैं भारतीय हम भारती ! 
                                 मातृभूमि के चरणों में
                                 कोटि वंदन हमारा है !