Tuesday, June 18, 2019

सिने-संगीत इंद्र का घोड़ा है : 'विविध भारती' के प्रधान नियोजक और कवि नरेंद्र शर्मा से इन प्रश्नों के उत्तर सुनिए


शीर्षक : 
सिने-संगीत इंद्र का घोड़ा है,
उसे रेस का घोड़ा बनाना क्या उचित है?
क्या सिने-संगीत प्रभावशाली नहीं, लोकप्रिय नहीं? क्या सिने-संगीत मनोरंजन नहीं करता? क्या सिने-संगीत स्तर का नहीं होता? क्या सेंसरबोर्ड की तीक्ष्ण दृष्टि के आगे से वह नहीं गुज़रता? फिर क्या कारण है कि सेंसर हुए सिने गीत भी कई बार रेडियो से प्रसारित नहीं होते ? 'विविध भारती' के प्रधान नियोजक और कवि नरेंद्र शर्मा से ही अपने इन प्रश्नों के उत्तर सुनिए, विशेष रूप से लिखे लेख में...
जत-पट हो या रेडियो पर मनोरंजन के साधनों में सिने-संगीत का स्थान बहुत महत्त्व का है। सिने-संगीत निस्संदेह लोकप्रिय है। सिने-संगीत में विविधता है। कार्यकौशल ऊँचे दर्जे का होता है और प्रतिभा तथा परिश्रम का मणि प्रबाल-संयोग भी दर्शनीय होता है। रजत-पट पर मधुर धुन को सुंदर अक्षर चार चाँद लगा देते हैं। गायक-गायिका, संगीतकार-गीतकार, वाद्य-यंत्रों के हुनरमंद कलावंत और यंत्रों से ध्वन्यांकन करने वाले अञ्जयस्त इंजीनियर और फिर भरपूर आर्थिक साधन सिने-संगीत सचमुच बहुमूल्य बना देते हैं।
       सिने-संगीत हर तरह की रुचि को संतोष देने की क्षमता रखता है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि उत्तर और दक्षिण भारत में एक-सी ही इसकी शैली है। इसकी रचना में सामूहिक प्रयास और प्रयोग होता है, यानि टीमवर्क। इस प्रकार सिने-संगीत मध्ययुगीन की अपेक्षा आधुनिक है। अपने देश में ही नहीं, भारतीय संगीत एशिया और अफ़्रीक़ा के अन्य देशों में भी लोकप्रिय है। रजत-पट की यह ध्वन्यात्मक उपलद्धि रेडियो पर भी समान रूप से लोकप्रिय है और रेडियो पर लाखों श्रोताओं के मनोरंजन का साधन है।
अपने ही घर पराये ~
औसत दर्जे का सिने-संगीत ख़ासा अच्छा होता है। अखरता सिर्फ़ वह है कि ऊँचे दर्जे की उपज इसमें अपेक्षाकृत कम और अनुकरण की प्रवृत्ति अंधाधुंध बहुत अधिक होती है। इसलिए शिखर को छू सकने वाली रचनाएँ इनी-गिनी और औसत से नीचे दर्जे की या घटिया रचनाएँ बहुत अधिक होती है। स्थिति और भी विषम इसलिए हो जाती है कि सिने-गीतों की पैदावार, फिल्मों की संख्या के अनुपात में, ज़रूरत से ज़्यादा होती है।
इतनी अधिक संख्या में सिने-गीतों की रचना करता हँसी-खेल नहीं है। परंपरागत सुगम शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, रंगमंच-संगीत, रवींद्र संगीत, इत्यादि नयी-पुरानी शैलियों का तो आधार लिया ही जाता है, अरबी और पाश्चात्य सुगम संगीत से भी प्रेरणा ग्रहण की जाती है। कभी-कभी तो ऐसा भी देखने में आता है कि एक ही आधार पर दो-चार संगीतकार कई एक संगीत-रचनाएँ तैयार कर डालते हैं। नयी रचनाओं के लिए कभी-कभी अपनी निजी सूझ से भी काम लिया जाता है, पर विदेशी धुनों का अनुकरण बढ़ता ही जाता है।
संगीत में स्वदेशी और विदेशी का विचार नैतिक और अनैतिक के आधार पर न भी करें, तो भी इतना तो सोचना ही होगा कि भारतीय श्रोता के रुचि-संस्कार के हिसाब से कैसा संगीत, कितना अनुकूल पड़ता है। अपने देश के दृश्यों और ध्वनि-वैभव से कतराकर क्या हम अपने ही घर में पराये नहीं बन रहे हैं? क्या हम अपने ही दर्शक-श्रोता समाज को अपने ही देश से अपरिचित नहीं बना रहे हैं? अपनी भूमि के दृश्यों से आँख चुराना और अपने देश की ध्वनियों को अनसुना करना क्या उचित है? क्या यह अतिपरिचय की प्रतिक्रिया है जो हम अब अवज्ञा और अपरिचय की दिशा में अविवेक के साथ आगे बढ़े चले जा रहे हैं।

गाँव-देहात को तो हम बिसरा ही चुके हैं, छोटे क़स्बे और प्रादेशिक नगरों पर भी अब हमारे आँख-कान नहीं लगते। बड़े शहर ही दिखाई देते हैं और वे भी ऐसे रूप कि पेरिस, न्यू यार्क और लंदन के उपनगर प्रतीत हों। सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा आज हमारे मन की बात नहीं कहता। आज हिंदुस्तान से बाक़ी जहान अच्छा है, या यों कहिये की वह साम्राज्यवादी संपन्न देश, जो एशिया और अफ़्रीक़ा को दास बनाये हुए थे, वही हमें आकर्षित करते हैं। पहले हम उनके राजनीतिक दास थे, अब हम उनके सांस्कृतिक दास हैं। विदेशी के प्रति मोह इसी तरह से बढ़ता रहा तो अजब नहीं कि हम अपनों के लिए अजनबी बन जाएँ।

संगीत की ध्वनियाँ नाभि से निकलती हैं और प्राणों में समा जाती है। संगीत का असर बहुत ही गहरा होता है। इसलिए आवश्यक है इस संगीत के विषय में खिलवाड़ की अपेक्षा विवेक और विचार से काम लिया जाये। क्यों न हम सिनेमा और रेडियो के प्रभाव-क्षेत्र, लक्ष्य, उद्देश्य और दर्शक और श्रोता की आवश्यकताओं पर विचार करें? सिनेमा देखने वालों और रेडियो सुनने वालों की परिस्थिति और मन:स्थिति में बहुत अंतर होता है। आँख और कान में चार अंगुल का अंतर तो होता ही है।

घर और बाज़ार ~
सिनेमा देखने वाले अपने पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार घर से बाहर निकलकर किसी सिनेमाघर में जाते हैं। मनोरंजन का यह साधन नि:शुल्क नहीं होता। सिनेमाघर में पहले पैसे रखवा लिये जाते हैं। सिनेमाघर के भीतर हम सपरिवार बैठे हुए भी, अपरिचितों की संगत में बैठते हैं। वहाँ आत्मीय और परिचित कम और अजनबी अधिक होते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वैयक्तिक और पारिवारिक रुचि-संस्कार गौण हो जाते हैं और लज्जा और लिहाज़ के बिना तमाशा देखने की प्रवृत्ति मुख्य हो जाती है। अपरिचितों के बीच, अँधेरे में तमाशा देखने से इस प्रवृत्ति को बल मिलता है। गाँव की अपेक्षा हम शहर में अधिक स्वच्छंद होते हैं, क्योंकि शहर में भी आत्मीय कम और अजनबी ज़्यादा होते हैं। यही बात मेले-ठेले के विषय में भी कही जा सकती है।
सिनेमाघर में हम स्वेच्छा से नज़रबंद रहते हैं। ऐसे दर्शक प्रेक्षक समाज को पाश्चात्य समाजशास्त्री 'कैप्टिव ऑडियेंस' कहते हैं। परायी जगह में पराधीन होकर बैठने वालों का व्यक्तिगत और पारिवारिक दायित्व भाव बहुत कम हो जाता है और सामूहिक निर्वैयक्तिक भाव जादू की तरह सिर पर चढ़कर बोलने लगता है। ऐसी परिस्थिति में बहुत कुछ चल जाता है। मन:स्थिति तमाशबीन की हो जाती है, विवेकी व्यक्ति या गृहस्थ की नहीं।

रेडियो सुनने वालों का समाज इस प्रकार एक साथ नहीं बैठता। वह पारिवारिक एकांशों में बँटा हुआ, अलग-अलग स्थानों में बंट-छंट कर, घरों के भीतर बैठता है। यह घरेलू श्रोता-समाज है। पूरा परिवार या परिवार के कुछेक सदस्य रेडियो-कार्यक्रम सुनते हैं। जो अन्य किसी काम में लगते है, वे भी अपने कानों में रुई नहीं डाल लेते। बड़े छोटों के प्रति उत्तरदायी हैं और छोटों को बड़ों का लिहाज़ है। बहन-भाई, बाप-बेटी, माँ-बेटों, सास-बहू न जाने कितने आत्मीय संबन्धों के तार श्रोता-समाज के हर एकांश के ताने-बाने में सदैव विद्यमान रहते हैं।
यह वह परिस्थिति नहीं है, जो अजनबी-दर्शकों के समूह में बैठे हुए व्यक्ति या छोटे से परिवार की होती है। इसलिए स्वाभाविक है कि रजत-पट के दर्शक से रेडियो के श्रोता की मन: स्थिति भिन्न हो। उत्तान-शृंगार, ज़रूरत से ज़्यादा बेतकल्लुफ़ी की बातें और ज़ूमानी पंक्तियाँ श्रोता-परिवार को अधिक असहनीय हो सकती है। बहुत कुछ है, जो बाहर चलता है, लेकिन घर में नहीं।
सिनेमाघर नगरों और बड़े-बड़े क़स्बों तक ही सीमित हैं, पर इसके विपरीत, दूर-दूर विस्तृत जनपदों के ग्रामों और गिरिवन-प्रांतरों और अन्य प्रादेशिक अंचलों में, रेडियो सुनने वाले यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। उन सुनने वालों की आवश्यकताएँ और रुचि-संस्कार शहर के शौक़ीन दर्शकों की तुलना में बहुत भिन्न हैं। भारत में घर और बाहर, ग्राम और नगर, आत्मीय और अजनबी और छोटे और बड़े की दुनिया में बहुत अंतर है। रेडियो सुनने वालों के लिए 'ए' और 'यू' की कोटि में बँटे हुए कार्यक्रम सुन सकने की सुविधा भी नहीं है। घर और बाजार के विचार-व्यवहार और नियम-क़ायदे अलग-अलग हैं।
सिने-संगीत में बोल का महत्त्व शास्त्रीय-संगीत की अपेक्षा बहुत अधिक होता है। बोलों के कहने का ढंग भी कम महत्त्व नहीं रखता। एक ही बात को कई एक तरह से कहा जा सकता है, सहज स्वाभाविक ढंग की शालीनता से भी और हेकड़ी और शोहदेपन से भी। कहानी के मोड़ और चरित्र-चित्रण के जोड़-तोड़ गीतों की शैली को प्रभावित करते हैं। गीतों का रंग रजत-पट की आवश्यकताओं के अनुसार बदलता रहता है। बोल, धुन और वाद्य-यंत्र तथा उनका प्रयोग कहानी में बदलती हुई परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है।

रेडियो पर सिने-संगीत सुनने वालों के लिए कहानी, चरित्र-चित्रण और परिस्थितिगत वातावरण की उपस्थिति नहीं है। उसके लिए तो गीत केवल एक गीत है। किसी चरित्रहीन पात्र का गीत कहानी में शायद इसलिए रखा गया है कि अंतत: उस पात्र को कुपात्र सिद्ध होना है। किंतु कहानी के सदंर्भ के बिना रेडियो सुनने-वाला उसे कैसे ग्रहण करेगा? पागल, शराबी, हत्यारा कहानी में अपने चरित्र-चित्रण के अनुसार गा सकता है, लेकिन उसके गाये हुए गीत का कहानी के संदर्भ के बिना क्या अर्थ है? किसी वर्ग विशेष का कोई व्यक्ति किसी घृणित पात्र की भूमिका में है और उसके विरोध में शिकायती गीत गाया जाता है, जिसकी लपेट में पूरा वर्ग आ जाता है। रेडियो सुनने वाले का उससे क्या प्रयोजन है? प्रादेशिक उच्चारण या गायन पद्धति का विद्रूपगत प्रयोग रेडियो पर वर्जित होना ही चाहिए, क्योंकि ऐसी चीज़ों से रेडियो सुनने वाले को ठेस भी पहुँच सकती है और उनके मन में पारस्परिक विद्रूप की भावना भी भड़क सकती है।
संगीत की ध्वनियाँ और लयकारियाँ मन को शांत भी कर सकती हैं और अशांत भी। अफ़्रीक़ा के वनवासियों के वासना-विह्वल और कामोद्दीपित उन्मत्त संगीत का प्रभाव पाश्चात्य संगीत पर पड़ा और उससे मन को भड़काकर, तन के चिथड़े-चिथड़े कर देने वाले संगीत की सृष्टि हुई। सुना है कि उसे सुनकर युवतियाँ बेहोश होने लगीं और युवक कपड़े फाडऩे लगे। उस संगीत की लहरें, पागल हाथी की सांढ़ों की तरह भारतीय सिने-संगीत से भी आ टकरायीं। ऐसे कामोन्मादक संगीत को किस हद तक प्रोत्साहित किया जाये, संगीतकार के लिए यह विचारणीय होना चाहिए।

युग-संधि और वय-संधि की बेला में एक विचित्र प्रकार का मानस-मंथन होता है। जैसे समुद्र-मंथन से अमृत, विष और सुरा की उत्पत्ति होती है, वैसे ही मानस-मंथन से भी कल्याणकारी और अकल्याणकारी भावों की निष्पत्ति होती है। आज कालकूट को पीने वाले शिव दिखायी नहीं देते; कालकूट को बेचने वाले और बाँटने वाले बहुत हैं।

इंद्र के घोड़े की नियति?
कैबरे और नाइट-क्लब देश में बहुत नहीं हैं, लेकिन सिनेमा में इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। इनके वातावरण में जो संगीत प्रस्तुत किया जाता है, उसे कहानी में तो शायद दूसरे प्रकार के संगीत के द्वारा संतुलित भी कर दिया जाता है, लेकिन रेडियो-कार्यक्रम में ऐसी संभावना नहीं होती, क्योंकि वहाँ कहानी का संदर्भ नहीं है। एक गीत सिर्फ़ एक गीत है।

रेडियो सुनने वाला अपने घर में बैठा हुआ सुनता है। वह शायद ही पसंद करे कि उसका घर सिनेमाघर, अजायबघर, कैबरे या नाइट-क्लब बन जाये।

भारतीय जीवन का ढर्रा इतना बदल गया है कि ढिक-त्योहार, विवाहोत्सव की धूम-धाम, तीर्थयात्रा, मेला-दसहरा, देव-मंदिर, देवलीलाएँ, शाम की सैर, बाग़बहार, लावणी-कजली, ख़याल के दंगल, महफ़िल, मुजरा इत्यादि जीवन के रंगारंग पहलू अब रजतपट पर ही शेष हैं। रजतपट से बहुत कुछ आशा की जाती है। भारतीय जीवन के इन और अन्यान्य पहलुओं की ओर से आँख चुराकर भारतीय सिनेमा घटिया पाश्चात्य सिनेमा का अंधानुकरण करे, तो परिणाम भला नहीं हो सकता। सिने-संगीत की सृष्टि में रचनाकारों को इस विषय में सोच-विचार अवश्य करना चाहिए।

सोच-विचार को बिसारकर सिने-संगीतकार प्रचार और पैसे के लिए और उनके बल पर व्यावसायिक होड़ में फँसते जा रहे हैं, पर धंधे की धांधली भारतीय सिने-संगीत को कहाँ ले जायेगी? उनके पास एक अत्यंत शक्तिशाली और लोकप्रिय माध्यम है। सिने-संगीत इंद्र का घोड़ा है, उसे रेस का घोड़ा बनाना क्या उचित है?

कहा जाता है कि यह धंधा है। यह पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता या होड़ाहोड़ी की व्यावसायिक दुनिया है। यह करोड़ों को प्रभावित करने वाला, लाखों का खेल है। हो सकता है कि यह ठीक हो, लेकिन रेडियो के माध्यम को धंधे-व्यवसाय की घुड़दौड़ में घसीटना कहाँ तक ठीक होगा, विचारशील व्यक्ति इस पर विचार करें।

सिने-संगीतकार-सम्मेलन के प्रधान श्री सी. रामचंद्र ने कल्याणजी-आनंदजी अभिनंदन-समारोह में ठीक ही कहा था कि सिने-संगीत के क्षेत्र में धंधेबाज़ी की धांधली अच्छे-बुरे संगीत के विषय में खोटे सिक्के उछलते हैं और टकसाली खरे सिक्के दब जाते हैं।

रजतपट व्यावसायिक है, किंतु भारत में रेडियो लोक-सेवा का नि:शुल्क माध्यम है। दोनों की रीति-नीति और मानदण्ड अलग-अलग हैं। सिने-गीतों के बल पर चल-चित्र चलते हैं और रेडियो-प्रसारण से सिने-गीत चलते हैं। लेकिन क्या किसी व्यक्ति या वर्ग के लाभ के लिए नि:शुल्क रेडियो-प्रसारण का उपयोग होना चाहिए? रेडियो इस व्यापारिक और व्यावसायिक होड़ में पड़ेगा, तो पैसे और प्रचार को प्रबल शक्तियाँ जीतेंगी और अच्छे सिने-संगीत की हार होगी। मेरे गीत चलाओ, इतना लो और मेरे प्रतिद्वंद्वी के गीत न चलाओ, इतना लो। इस ले-दे में रेडियो पड़ेगा, तो और किसी का हित हो न हो, श्रोता का हित तो नहीं ही होगा।

कहा जाता है कि भारतीय सेंसरबोर्ड ने रजतपट पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए जो कुछ निरापद माना है, उसे रेडियो-प्रसारण के लिए भी ठीक मानना चाहिए। कहने वाले यह भूल जाते हैं कि सार्वजनिक प्रदर्शन और सार्वजनिक प्रसारण दो अलग चीज़ें हैं। प्रदर्शन का लक्ष्य दर्शक है और प्रसारण का लक्ष्य श्रोता है। दोनों की परिस्थिति और मन:स्थिति का भेद स्पष्ट किया जा चुका है। इसके साथ ही यह भी न भूलना चाहिए कि प्रदर्शन व्यावसायिक धंधा है और वर्ग नि:शुल्क नहीं है। रेडियो का प्रसारण लोक-सेवा का अंग है और हमारे देश में यह नि:शुल्क सेवा है, जिसका प्रेरणा-वाक्य या 'मोटो' 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' है। थोड़े से लोगों के मुनाफ़े और हित-सुख के लिए रेडियो माध्यम का उपयोग अब तक तो उचित नहीं ही माना गया है।

भारतीय सेंसरबोर्ड पटकथा को संपूर्णता से, सम्यक दृष्टि से, देखता है। भले-बुरे तत्त्वों का नाटक में एक संतुलन रहता है। संदर्भ से हटा दीजिए, तो बुरा ही रहेगा। रेडियो-प्रसारण गीत को कहानी के संदर्भ के बिना एक गीत की तरह से ही प्रसारित कर सकता है। रेडियो को बिना पासंग की तोल से बचना ही पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति में यह प्रस्ताव किया जा सकता है कि जैसे रजतपट पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए अच्छे बुरे का विवेक करने वाला एक सेंसर बोर्ड है, वैसा ही एक सेंसरबोर्ड सार्वजनिक उपयोग की श्रवण सामग्री के लिए भी नियुक्त किया जाये। रजतपट और रेडियो दो अलग-अलग माध्यम हैं।

शृंगार और शृंगार का भेद ~
रेडियो से बहुत तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं। मोटे तौर पर कहें तो रेडियो का कार्यक्रम पंचसूत्री होता है। इसमें राष्ट्रीय महत्त्व के मौलिक और मूल्यगत कार्यक्रम होते हैं, जिनमें साहित्य, संगीत, चिंतन की आधारभूत उपलब्धियाँ प्रस्तुत की जाती हैं। सूचना और समाचार देने वाले कार्यक्रम होते हैं। क्षेत्रीय महत्त्व के व्यक्तित्व और कृतित्व को सामने रखने-वाले कार्यक्रम होते हैं, जिनमें क्षेत्र की भाषा, संस्कृति और भूमि को महत्त्व दिया जाता है। विशेष श्रोता-वर्गों के लिए कार्यक्रम होते हैं, जैसे स्त्रियों और बच्चों के लिए या मज़दूरों और श्रमिकों के लिए या स्कूल और कॉलेज के छात्रों के लिए। सार्वजनिक मनोरंजन के विविधतापूर्ण कार्यक्रम पाँचवाँ सूत्र प्रस्तुत करते हैं। मनोरंजन का यह कार्यक्रम सिने-संगीत को अधिक प्रस्तुत करता है और सामग्री के उपयोग के लिए मालिक या निर्माता को पूर्वनिश्चित शुल्क देता है, लेता कुछ नहीं है कि उससे धंधे के प्रचार-प्रसार की अपेक्षा की जाये।

रेडियो-प्रसारण के लिए गीतों का चुनाव और सेंसर का फ़ैसला दो अलग बातें हैं। रेडियो चुनाव या चयन करता है, सेंसर या बैन नहीं करता। रेडियो के कार्यक्रम पत्र-पत्रिकाओं के विभिन्न स्तंभों के समान होते हैं, जिनके लिए उपयुक्त और आवश्यक सामग्री का चयन-संकलन संपादक की सूझ-बूझ रुचि-अरुचि और पत्र या पत्रिका की रीति-नीति पर निर्भर रहता है। रेडियो के कार्यक्रम-नियोजक और पत्र-संपादक की स्थिति बहुत-कुछ मिलती-जुलती है। संपादक अपने संस्थान के उद्देश्य और पाठक के हित-सुख के प्रति जागरूक रहता है। इसी प्रकार की मर्यादाएँ और सीमाएँ रेडियो के कार्यक्रम-नियोजक के लिए मान्य होनी चाहिए। संपादक की दृष्टि में जो पाठक का स्थान है, नियोजक के लिए वही स्थान श्रोता का है। मुद्रित सामग्री के लिए संपादक पारिश्रमिक देता है। प्रसारित गीतों के लिए रेडियो रॉयल्टी देता है।

यह तर्क भी सामने आता है कि काव्य-साहित्य और लोक-साहित्य में भी शृंगार की कमी नहीं है। शृंगार जीवन का संजीव अंग है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। नारी-सौंदर्य के प्रति आकर्षण अस्वाभाविक नहीं है और न इसको वर्णित करना वर्जित है। किंतु शृंगार-शृंगार में भेद करना होगा। सौंदर्य-कलिकाओं को मसलने का भाव या उन्हें रौंद डालने की वासना शृंगार नहीं है। अजी, जाओ तुमसे बहुत देखे! यह है ऐसी मनोवृत्ति का परिचायक, जिससे उद्दण्ड छिछोरापन सामने आता है और शृंगार दब जाता है। जीवन-सौंदर्य और भाव गरिमा के प्रति अवज्ञा, नर-नारी के संबंधों में हलका पन और प्रेमाकर्षण को बायें हाथ का खिलवाड़ बना देना बहुत आसान है, लेकिन इसके बुरे-भले पक्ष पर विचार करना आज कठिन हो गया है। किंतु क्या हम अपने जीवन-मूल्यों की ओर से बहुत दिनों तक बेख़बर रह सकते हैं? सिनेमा और रेडियो का संबंध बहुजन-समाज से है। इनकी चपेट में पूरा समाज आता है, जिसमें छोटी-बड़ी आयु और परिपक्व-अपरिपक्व बुद्धि के बहुत लोग शामिल रहते हैं। साहित्य का संबंध समाज के एक छोटे से वर्ग से होता है। साहित्य का उपयोग वैयक्तिक होता है। साहित्य एकांत में पढ़ा जाता है। साहित्य के प्रसार की सीमाएँ हैं। बाज़ारूपन या भद्दी भड़क साहित्य में असहनीय है और इसके साथ ही यह भी स्मरणीय है कि साहित्य का भी सब कुछ प्रसारणीय नहीं होता। इस क्षेत्र में भी चयन और चुनाव प्रसारणार्थ होता है।

वर्ग का हित या समाज का हित ~
अलिखित लोककाव्य भौगोलिक दृष्टि से परिबद्ध और अपने प्रचार-प्रसार में सीमित होता है। भोले लोगों का सामयिक ग्राम्य विलास बनफूल की तरह खिलता और बुझता है। उसे व्यापार की वस्तु बनाकर, शहरी फूलदान में रखना कहाँ तक उचित है? परिश्रमी किसान जिसे कल सबेरे तक भूल जाएँगे, शहरी निठल्ले उसका महीनों मजा लेंगे। स्थायी भाव को क्षणिक और क्षणिक को स्थायी बनाने की व्यवसायी भावना अप्राकृतिक ही कही जायेगी। सहज स्वाभाविक रूप में यथार्थ चित्रण एक बात है और व्यावसायिक हित में 'शॉप विंडो' सजाना दूसरी बात है।

सिनेमा, रेडियो, टी.वी. सार्वजनिक महत्त्व के अत्यंत शक्तिशाली माध्यम हैं। टी.वी. में तो रेडियो और सिनेमा की संयुक्त शक्ति का समावेश है। इन माध्यमों के साथ समाज के हित और सुख का प्रश्न सदा जुड़ा रहेगा। किसी व्यक्ति और वर्ग का स्वार्थ, सार्वजनिक हित और सुख से बढ़कर नहीं समझा जा सकता। जो सिद्धांत शरीर को पुष्ट और स्वस्थ बनाने वाले भोजन के संबंध में मान्य हो, वही सिद्धांत मन की भूख बुझाने यानी भारत के सामान्य जन का मनोरंजन करने वाले संगीत के विषय में भी मान्य होना चाहिए। रजतपट पर प्रदर्शन होटल या रेस्तराँ के षड्रस छत्तीस व्यंजनों के समान शुल्क-साध्य और घर के बाहर प्राप्त होने वाला है। उसकी तुलना में रेडियो-प्रसारण घर की रसोई है, नि:शुल्क और सहज सुलभ। दोनों के हेतु और मानदण्ड अलग-अलग हैं।

कहा जाता है कि प्रसारणीय न समझे जाने वाले बहुत से मज़ेदार सिने-गीतों को छोटे बच्चे भी गाते हैं। इस तर्क के उत्तर में दो बातें कही जा सकती हैं। एक तो यह कि कहीं-कहीं छोटे बच्चे भी सिगरेट पीते दिखाई देते हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि सिगरेट पीना उनके लिए लाभदायक है। दूसरी बात यह है कि भोले-भोले छोटे शिशु तो सांप से भी खेल लेते हैं और सांप भी उन्हें नहीं काटता। भोले की रक्षा भगवान करते हैं।
भगवान कृष्ण ने रास और गोपी-विलास करने से पहले कालिया नाग को नाथा। क्या सिने गीतकार-संगीतकार नाथे हुए नाग को नाथ और पगहे से मुक्त करके अनाथ जनता पर छोड़ना चाहेंगे?
(माधुरी, 21 अप्रैल, 1967 में प्रकाशित)

Monday, June 17, 2019

प्रवासी साहित्य पर केंद्रित पत्रिका में लावण्या शाह का साक्षात्कार

प्रवासी साहित्य पर केंद्रित पत्रिका में  लावण्या शाह का साक्षात्कार ~

हिंदी -साहित्य की सुपरिचित कवयित्री लावण्या शाह सुप्रसिद्ध कवि
स्व० श्री नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं और वर्तमान में ओहायो प्रांत , उत्तर अमेरिका में रह कर अपने पिता से प्राप्त
काव्य-परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। समाजशा्स्त्र और मनोविज्ञान में बी. ए.(आनर्स) की उपाधि प्राप्त लावण्या जी ने प्रसिद्ध पौराणिक धारावाहिक  ”महाभारत” के लिये कुछ दोहे भी लिखे हैं । 
इनकी कुछ रचनायें और स्व० नरेन्द्र शर्मा और स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी से जुड़े संस्मरण रेडियो से भी प्रसारित हो चुके  हैं। इनकी  काव्य पुस्तक “फिर गा उठा प्रवासी” प्रकाशित हो चुकी है जो इन्होंने अपने पिता जी की प्रसिद्ध कृति  ”प्रवासी के गीत” को श्रद्धांजलि देते हुये लिखी है।
उपन्यास -’ सपनों के साहिल '  प्रकाशित हो चुका है। 
उपन्यास : सपनों के साहिल प्रकाशिका हैं
श्रीमती गायत्री राकेश एम. ए. एम. फिल.
पता : ' कविता ' भारती  नगर , मैरिस रोड, अलीगढ़ - २०२००१ 
संपादक : प्रो . शिवकुमार शांडिल्य 
पूर्व अध्यक्ष , हिन्दी विभाग , ए. एम. यू. अलीगढ़ 
मंगलाभवन, शताब्दी नगर, अलीगढ़
कहानी संग्रह ‘ अधूरे अफ़साने ‘ प्रकाशित हो चुकी है।
गत वर्ष सुन्दर ~ काण्ड : भावानुवाद का प्रकाशन हुआ। 
आगामी " अमर युगल पात्र " पुस्तक शीघ्र प्रकाशित होगी।
जीवन से जुड़े
' संस्मरण '  प्रकाशाधीन हैं।

प्रश्न—लावण्या जी  आप कवयित्री कैसे बनीं ?
उत्तर–   कवियित्री कैसे बनी प्रश्न के उत्तर में यही कह सकती हूँ  कि , उस एक अज्ञात का  ही किया – करना है जो सब कुछ घटित होता है  इस सृष्टि मे उसकी डोर किसी ओर के हाथ मे है !
गुजरात के संत कवि नरसिंह मेहता ने कहा , ” हूँ करूं , हूँ करूं , ए ज अज्ञानता शकट नो भार जेम श्वान ताणे  ”
जिसे हिन्दी मे  कहें तो, ” मैं ने किया, मैं ने किया , यह अज्ञानताभरे वचन हैं।  जैसे एक बैलगाडी के नीचे चल रहा श्वान या   कुकर यह  समझे कि बैल गाडी,  उसकी वजह से चल रही है “

सो,  हम क्या करेंगें, करवानेवाला तो  वही एक – अज्ञात -  प्रभु है !

प्रश्न—आपको क्या अपनी कोई प्रारंभिक रचना याद है ?  याद है तो सुनाईये।
उत्तर– : प्रारंभिक रचनाओं मे से एक याद आ रही है,
चाँद मेरा साथी है..
और अधूरी बात सुन रहा है,
चुपके चुपके, मेरी सारी बात!
चाँद मेरा साथी है..
चाँद चमकता क्यूँ रहता है ?
क्यूँ घटता बढता रहता है ?
क्योँ उफान आता सागर मेँ ?
क्यूँ जल पीछे हटता है ?
चाँद मेरा साथी है..
और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके,
मेरी सारी बात!

क्योँ गोरी को दिया मान?
क्यूँ सुँदरता हरती प्राण?
क्योँ मन डरता है, अनजान?
क्योँ परवशता या अभिमान?
चाँद मेरा साथी है..
और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके,
मेरी सारी बात!

क्यूँ मन मेरा है नादान ?
क्यूँ झूठोँ का बढता मान?
क्योँ फिरते जगमेँ बन ठन?
क्योँ हाथ पसारे देते प्राण?
चाँद मेरा साथी है…
और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके,
मेरी सारी बात! …

प्रश्न—साहित्य की किस – किस विधा में आप लिखती है ? 
कौन सी विधा आपको अधिक प्यारी है।
उत्तर–  यात्रा वृन्तांत , संस्मरण , कहानी , कविता , निबंध इत्यादि सभी लिखा है और जो भी लिखा है।  सच्ची अनुभूति और अभिव्यक्ति से ही संभव हुआ है। विधा कोई भी हो, अपनी बात कहने की प्रक्रिया आत्म संतुष्टि और सुख का कारण होने के कारण, सदा ही,  अच्छी और सुखकर लगती  है ।

प्रश्न–पंड़ित नरेन्द्र शर्मा जी  (एक महान गीतकार)  की बेटी होना आपको कैसा महसूस होता है  ?
उत्तर—शायद यह एक सत्य मेरे नन्हें से जीवन का परम सौभाग्य रहा है ऐसा  महसूस करती हूँ ।

प्रश्न — आपके पिताश्री नरेन्द्र शर्मा महान गीतकार थे। उनका कोई ऐसा गीत जिसने आपके मन पर अमिट प्रभाव छोड़ा हो ।
उत्तर–  पूज्य पापा जी के कई सारे गीत,  मेरे मन मे समाये हुए हैं परंतु इस  एक गीत को सुन,  मैं बहुत ज्यादा भावुक हो जाती हूँ …शायद आपने भी सुना हो ….
फिल्म है ' भाभी की चूडीयां ' और मशहूर अदाकारा मीना कुमारी जी अंतिम साँसें गिन रहीं हैं। उनके सामने बैठे  देवर अपनी भाभी माँ के लिए गा रहे हैं यह गीत  जिसे स्वर दिया,  स्वर्गीय श्री मुकेश चन्द्र जी ने, शब्द हैं
‘ दर भी था , थीं दिवारें भी , तुमसे ही घर , घर कहलाया …
माँ , तुमसे , घर , घर कहलाया ….’

लिंक : http://www.youtube.com/watch?v=v323AKmk5E0
प्रश्न— आपने बी .आर . चोपड़ा के महाभारत सीरियल में कुछ  दोहे लिखे हैं । पाठकों के मनोरंजन के लिए कृपया उस के एक – दो दोहे सुनाईये ।
उत्तर— : मैंने , ये दोहे लिखकर दिए जिन्हें , महाभारत टी वी धारावाहिक में , शामिल किया गया । हाँ, मेरा नाम , कहीं शीर्षक में ना ही देखा होगा आपने । परन्तु , मुझे आत्म संतोष है इस बात का कि मैं अपने दिवंगत पिता के कार्य में अपने श्रद्धा सुमन रूपी , ये दोहे , पूजा के रूप में , चढ़ा सकी । 
ये एक पुत्री का पितृ – तर्पण था।  
-प्रसंग था - द्रौपदी और सुभद्रा का सर्व प्रथम मिलन टीवी धारावाहिक में यह दोहा लिया गया था। 
” गंगा यमुना सी मिलीं , धाराएं अनमोल ,
द्रवित हो उठीं द्रौपदी , सुनकर मीठे बोल “ 
और सबसे प्रथम दोहा जो सुभद्रा हरण के प्रसंग पर लिखा था उसके शब्द हैं ।
‘ बिगड़ी बात संवारना , सांवरिया की रीत ,
पार्थ सुभद्रा मिल गए , हुई प्रणय की जीत
लिंक -
http://www.youtube.com/watch?v=ufGYTrmb3Gc&feature=player_embedded
जरासंध – वध प्रसंग पर
' अभिमानी के द्वार पर, आए दीन दयाल,
  स्वयं अहम् ने चुन लिया, अपने हाथों काल “

द्रौपदी चीर हरण प्रसंग पर - ” सत असत सर्वत्र हैं , अबला सबला होय
नारायण पूरक बनें, पांचाली जब रोये “
मत रो बहना द्रौपदी , जीवन है संग्राम
धीरज धर , मन शांत कर , सुधरेंगें , बिगड़े काम ' 
ये दोहा भी आपने धारावाहिक में सुना  होगा जो श्री कृष्ण द्रौपदी को सांत्वना देते हुए पांडवों के वनवास के समय मिलने आते हैं तब कहते हैं
कीचक वध प्रसंग पर 
” चाहा छूना आग को गयी कीचक की जान,
द्रौपदी के अश्रू को मिला आत्म -सम्मान ! “
भीष्म पितामह जब घायल हुए उस प्रसंग पर एक दोहा लिखा था ,
जो यूँ है, [ ये सिर्फ़ मेरी  डायरी में कैद है ] ,
‘ जानता हूँ, बाण है यह प्रिय अर्जुन का,
नहीं शिखंडी चला सकता एक भी शर ,
बींध पाये कवच मेरा किसी भी क्षण,
बहा दो संचित लहू, तुम आज सारा …’
प्रश्न– क्या कविता छंद में लिखी जानी चाहिए ?
उत्तर— : ‘ कविता ‘ , सच कहूं तो , स्वत : उभरती है  और कविता अगर छंद मे हो तो अच्छी बात है पर महाप्राण निराला जी ने हिन्दी भाषा की गरिमा बढाने वाली कविताओं से,  छंद  मुक्त काव्य का प्रसाद दिया है। जो  आज भी उनकी रम्य भव्यता लिए, मनीषा को मुग्ध करने मे सक्षम है।  
सो , सच्चा काव्य वही है जो  सदा सर्वदा  ह्रदय को छू लेता है।  अर्थ लाघव भाषा के प्राण हैं और काव्य है ,  प्राणों का कम्पन !
प्रश्न– कविता में कई बदलाव आए हैं. कभी वह प्रयोगवादी बनी और कभी अकविता आजकल गज़ल का वर्चस्व है। गज़लकारों की भीड़ ही भीड़ है।  इस भीड़ में कौन-कौन से गज़लकार अपनी राह बनाते हुए आपको दिखाई देते हैं ?
उत्तर –ग़ज़ल विधा मे लिखने वाले कइयों की ग़ज़लें  बेहद खूबसूरत हैं जिन्हें पढ़कर या अगर किसी ने उसे आवाज़ दे कर संजोया हो तो दिल को बड़ा सुकून मिला है …जैसे , श्री  राजेन्द्रनाथ  रहबर जी के अलफ़ाज़ को रोशनी देनेवाले जगजीत सिंह की अदायगी दिल  थाम के …सुनें …
लिंक : http://www.youtube.com
प्रश्न—- हिन्दी के  कुछ विद्वान हिन्दी की दशा और दिशा की बात करतें हैं लेकिन वे स्वयं लम्बे-लम्बे पत्र अंग्रेजी में लिखते हैं इससे बढकर हिन्दी की और क्या दुर्दशा होगी ?  इस बारे में आपका क्या कहना है ?
उत्तर – : हिन्दी भाषा को भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित करना अत्यंत आवश्यक है। हिन्दी भाषीय प्रान्तों मे भी अंग्रेजी हुकूमत और आम जनता की हिन्दी के प्रति उपेक्षा व उदासीनता की भावना पनप रही है जी के कारण आज हिन्दी की ये दशा है जो हम ऐसे प्रश्न पूछ रहे हैं ।
बाजारवाद , भूमंडलीकरण वैश्विक दूर संचार के विविध उपकरणों की पहुँच ने , एक तरह से , लोगों को स्व- केन्द्रीत और पहले से अधिक , स्वार्थ रत बनाया है। साथ ही साथ हम या आप , किसी पर , अपनी बात मनवाने के लिए दबाव तो कर नहीं सकते हां हिन्दी भाषा जब वित्त व्यवस्था के संसाधनों से जुड़ेगी और मान्यता प्राप्त कर लेगी उस दिन, वास्तव में भारत का स्वर्णोदय भी होगा उस मे संशय नहीं ।
प्रश्न—आजकल  हिन्दी में युवा लेखकों की स्थिति क्या है ? क्या वे ऐसा साहित्य रच रहे हैं जैसा कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास ,बिहारीलाल, भारतेन्दुहरिश्चन्द्र ,रामचंद्र शुक्ल, मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला , नरेन्द्र शर्मा इत्यादि-इत्यादि साहित्य रचे गए हैं ?
उत्तर— : प्रत्येक रचनाकार अपने समय और समाज की उपज है और  उसी समाज और समय से जुडा हुआ उसका अपना अस्तित्त्व भी होता है। 
 आपने जो नाम ऊपर लिखे हैं वे सभी प्रात : स्मरणीय व प्रणम्य हैं ।आजकल के युवा , आज के समय को अपने अनुभव से तराशकर , पेश कर रहे हैं जो उनकी सोच समझ पर निर्भर है।  उनके  सामाजिक परिवेश तथा उनके  निजी अनुभवों से उभरा  बिम्ब है ये साहित्य,कि  जिसकी  स्थिति तो अच्छी ही  है। देखिये न,  आजकल के आपाधापी और कोलाहल भरे युग मे भी, बांसुरी की टेर सरीखा कोई काव्य,  कोई गीत , कोई छंद उभर कर आ ही आ जाता है । ये मेरी समझ से , युवा रचनाशील पीढी की  उपलब्धि ही कहलायेगी ।

प्रश्न–अमेरिका में हिन्दी भाषा की उन्नति को लेकर उसका कैसा भविष्य दिखाई देता है ?
उत्तर– : इस बात से संतोष है कि, यहां बसे भारतीय भरसक प्रयास कर रहे हैं कि हिन्दी भाषा जीवित रहे, फूले – फले ! …
कवि सम्मलेन, हिन्दी नृत्य नाटिकाएँ, हिन्दी फिल्मों पर बच्चों द्वारा किये नाच गाने ये सभी हिन्दी को, भारतीय प्रवासी समाज के सम्मुख रखने मे सफल हुए हैं।कई विश्वविद्यालयों मे हिन्दी एक विषय है और पढ़ाया जा रहा है । कई सारे  अध्यापक हैं जो कड़ी मेहनत करते हैं ।
कई घरों मे , मंदिरों मे, हिन्दी भाषा पढ़ाने का काम भी हो रहा है । कई हिन्दी पत्रिकाएँ भी निकलतीं हैं 
जिनमें से ‘ विश्वा ‘ त्रैमासिक के कुछ अंकों का सम्पादन मैंने किया है और मेरा  सहयोग दिया है।
 मैं ,  अपना  हिन्दी ब्लॉग ” लावण्यम – अंतर्मन ” नियमित रूप से लिखती हूँ और अपने अनुभवों को साझा करती हूँ ..
लिंक : http://www.lavanyashah.com
मुझ जैसे और भी कई समर्पित हिन्दी प्रेमी हैं अमरीका में परंतु सवाल है अगली पीढी का। क्या आनेवाली नस्लें भी  हमारी हिन्दी से हमरे जितना प्रेम करेगी ?
इस प्रश्न का उत्तर  तो भविष्य ही बतलायेगा ।  अन्यथा , अमरीका मे अमरीकी प्रयोग मे प्रचलित अंग्रेज़ी ( जो ब्रिटेन की अंग्रेज़ी से भिन्न है )  उसी का बोलबाला और वर्चस्व है । मैं ,  सत्य – वक्ता हूँ इसी कारण जो देखा है वही कह रही हूँ।   भविष्य ही अपना निर्णय लेगा जिसे आप और हम देखेंगें। हमारे प्रयास जारी हैं।

प्रश्न– अंत में एक व्यक्तिगत प्रश्न-आप लावण्या शर्मा से लावण्या शाह कब और कैसे हुईं ?
उत्तर–: सन १९७४ के ९ नवम्बर के दिन आर्यसमाज मंदिर मे,  मेरी गुजराती स्कूल के सहपाठी , दीपक शाह से , विवाह हुआ और मैं ‘ कुमारी लावण्या नरेंद्र शर्मा ‘ से , श्रीमती लावण्या दीपक शाह कहलाने लगी।
मेरे पति, दीपक जी और मैं, पहली कक्षा से, एक ही स्कूल में साथ साथ पढ़कर बड़े हुए हैं । मेरी अम्मा गुजराती परिवार से थीं और पापा ने हम ३ बहनों को  गुजराती माध्यम की पाठशाला मे शिक्षा ग्रहण करने भेजा था। उनका कहना था, ‘ मातृभाषा सीख लो, तो आगे चल कर तुम्हें,  विश्व की  हर भाषा आसान लगेगी ‘ पापा हम लोगों से हमेशा हिन्दी भाषा मे बातचीत किया करते थे और हमने अम्मा से गुजराती और पापा जी से हिन्दी में बोलना , होश सम्भालने के साथ ही सीख लिया था।  खैर ! वह दिन कुछ और आज का दिन है भी कुछ और है वर्तमान है, आज का दौर है  !
आज परिवार मे अमरीकी दामाद ब्रायन भी शामिल है और  अब मेरे परिवार में , हिन्दू जाट परिवार की बहूरानी भी आ गयीं हैं और १३ वर्ष के बालक ' नोआ ' तथा  ५ वर्ष के ओरायन "की मैं नानी व् दादी हूँ।
 जीवन मे आज भी बहुत  कुछ नया अनुभव कर रही हूँ और  सीख रही हूँ ..

आपने  मुझे आज अवसर प्रदान किया और मेरी बातों को  सुना  जिसके लिए
आपका … सच्चे ह्रदय से आभार।

विनीत
– लावण्या शाह

 

Friday, May 17, 2019

फिल्म निर्माण संस्था #बॉम्बे #टाकीज़ में गीतकार #नरेंद्र #शर्मा,

ॐ 
गीतों की रिम झिम, यादों की गलियों में जब् जब् अपनी सुमधुर कर्णप्रिय किंकिणी ध्वनि लिए बजतीं हैं तब अतीत के चलचित्र सजीव होकर उभर आते हैं। आज एक विहंगम दृष्टिपात करेंगें मेरे परम आदरणीय पिता, सुप्रसिद्ध रचनाकार पंडित नरेंद्र शर्मा की साहित्यिक कृतियों के बारे में ! गीतकार एवं  साहित्यकार नरेंद्र शर्मा के सृजन की !
 पंडित नरेंद्र शर्मा जी की १९ काव्य पुस्तकें, अब पंडित नरेंद्र शर्मा सम्पूर्ण रचनावली ' में संगृहीत हो चुकीं हैं। यह स्तुत्य कार्य उनके पुत्र श्री परितोष नरेंद्र शर्मा की १६ वर्षों से अधिक समय तक किये गए अथक परिश्रम, समर्पण एवं निस्वार्थ पितृभक्ति से ही संभव हो पाया है। धन भी परितोष ने स्वयं ही एकत्रित कर इस महत्वपूर्ण कार्य में लगाया है।
१/ प्रथम काव्य संग्रह : शूल - फूल सं. १९३४
२/ द्वितीय काव्य संग्रह : कर्ण फूल। सं.१९३६ की सुकोमल युवा कवि ह्रदय की कोमल अभिव्यक्ति से आरम्भ होती हुई भावनाएँ 
३/ तृतीय काव्य संग्रह : प्रभात - फेरी - सं. १९३८ स्वाधीनता संग्राम के देशप्रेम से सभर गीतों को संगृहीत किये पुस्तक है इस की कवितायेँ भारत के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी को अत्यंत प्रिय थीं। स्व. श्री अटल जी ने ख़ास तौर से उल्लेख किया है इन पंक्तियों का ' आओ हथकड़ियां तड़का दूँ , जागो रे नतशिर बंदी ! '
४/ चतुर्थ काव्य संग्रह : " प्रवासी के गीत "-  सं. १९३९ जिसे साहित्य प्रेमी सुधी पाठकवर्ग ने अत्याधिक सराहा व यह काव्य संग्रह कवि नरेंद्र शर्मा की सभी काव्य पुस्तकों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय सिद्ध हुई है। इसी पुस्तक की एक कविता," आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगें " जैसे विरह कातर ह्रदय को उर्मि तरंगों से उद्वेलित करता हुआ एक सर्वोत्तम विरह गीत आज भी श्रगय पाठकों के मन को बाँध लेने में सक्षम है। कालजयी सिद्ध हुआ है। इस संग्रह में हिन्दी काव्य जगत के शीर्ष प्रेम गीत मौजूद हैं।  तथा अन्य असंख्य लय व छन्द में बंधे सुमधुर गीत हैं। 
५/ पञ्चम काव्य संग्रह :
पलाश वन :

६/ षष्ठम काव्य संग्रह :
मिटटी और फूल :
 
७/ सप्तम काव्य संग्रह : लाल निशाँन : ( जन-गीतों का संग्रह)   
८/ अष्टम काव्य संग्रह :  'कामिनी' ('मनोकामिनी') (खंडकाव्य)
 
कामिनी  खण्ड काव्य : स्वतंत्रता सेनानी पंडित नरेंद्र  शर्मा द्वारा ब्रिटिश जेल से लिखी हुई  पुस्तक है। देवली दीटेंशन जेल राजस्थान व आगरा की ब्रिटीश जेल की सलाखों के पीछे मर्म मधुर " कामिनी " काव्य संग्रह, जेल में दिए गए, पन्नों पर, एक छोटी सी खुली खिड़की से यदा कदा झांकते चंद्रमा के नीचे खिली मधुर गंध लिए पुष्पित कामिनी की तरह, कवि नरेंद्र की कविता के रूप में आज भी महकती हुई आज भी सजीव है।
९ / नवम काव्य संग्रह : सं १९४६ 'हंसमाला' (कविता-संग्रह)
१०/  दशम काव्य संग्रह : 'रक्त-चंदन' (कविता-संग्रह)   " रक्त चन्दन " सं.१९४९ महात्मा गाँधी बापू के निर्मम हत्याकाण्ड से व्यथित हो उनके निधन पर लिखी श्रद्धांजलि स्वरूप काव्यांजलि रूपी पुस्तक। 

११ / एकादश  काव्य ग्रन्थ : सं. १९५० 'अग्निशस्य' (कविता-संग्रह)
इस वर्ष द्वितीय पुत्री, लावण्या का ( मेरा )  जन्म हुआ।
   
१२/ द्वादश काव्य संग्रह : सं १९५३ 'कदली-वन' (कविता-संग्रह)   
(कवि नरेंद्र के विवाहीत जीवन की खुशियाँ समेटे कविता संग्रह )
१३/ त्रयोदश काव्य संग्रहद्रौपदी खण्ड काव्य : सं. १९६०

१४ / चतुर्दश काव्य संग्रह  : प्यासा निर्झर सं. १९६४ १५/ पञ्चादश  काव्य संग्रहउत्तर जय : खंड काव्य
उत्तर - जय ' जय गाथा ' महाभारत'  की विशाल कथा के अंत में आनेवाला प्रसंग दुर्योधन की मृत्य के पश्चात की कथा है।
१६ / शष्टादश काव्य संग्रह : बहुत रात गये :सं. १९६७  
१७/ सप्तदश काव्य संग्रह सुवर्णा : सं. १९७१ :  सुवर्णा नामक मिथकीय बृहत काव्य ! सुवर्णा एक ऐसा विस्तृत मिथकीय काव्य है कि जिसकी नायिका ' सुवर्णा ' महाभारत के मुख्य पात्र महारथी कर्ण द्वारा, शिविर में बंदी बनाई गयी एक राज कन्या है।  राज कुमारी के पिता महाराज को तथा सुवर्णा के राज्य को पराजित करने के पश्चात ' कर्ण ' इस राजकन्या पर आसक्त हुआ। मगर सुवर्णा ने, पिता के हत्यारे को रोष सहित, तिरस्कृत किया। महाभारत कथा के ग्रन्थ में कुरुक्षेत्र के रण में कौरव शिविर में कर्ण  के शिविर में बंदी बनाकर राखी गई राजकन्या सुवर्णा अन्तत: कर्ण से समय बीत्ततेप्रेम करने लगती है तथा कर्ण के वध के पश्चात्, यही सुवर्णा, विलाप करती हुई कर्ण की चिता में सती हो जाती है ऐसी लोक कथा है ।
' सुवर्णा कथा का बीज या उपज एक  लोक कथा के मूल में है। दक्षिण भारत के एक ग्रन्थ में यह जनश्रुति का रूप लिए लघु बीज रूप में, लोक कथा आती है जिसे पंडित नरेंद्र शर्मा ने अपने दक्षिण भारत के प्रवास में सुनी थी। सुवर्णा की कथा तथा प्रेम में  विरोधाभास लिए यह अलौकिक कथा कवी पंडित नरेंद्र शर्मा के मन मस्तिष्क में कहीं गहरा प्रतिसाद छोड़ कर सुरक्षित रही। धरती में गड़े बीज की भाँति कथा - बीज, प्रस्फुटन की कामना लिए रह तो गया था किन्तु रह रह कर ' सुवर्णा ' का पात्र मुखर होना चाहता था । अतः कुछ समय के अंतराल के पश्चात ' सुवर्णा ' का पात्र एक बृहत काव्य रूप ले कर अवतरित हुआ। सुवर्णा पुस्तकाकार  में सुवर्णा को उभरना था। अतः पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा के कवि मन ने इसे एक  काव्य पुस्तक का रूप दे ही दिया।
उसी वर्ष
मोहन दास करमचंद गांधी ( जीवनी १९६७ ) कथा में महात्मा गाँधी बापू की जीवनी अत्यंत सरल एवं रोचक ढंग से लिखी गई।
१८ / अष्टादश काव्य संग्रह : 
सुवीरा सं. १९७३ कथा काव्य राजमाता सुवीरा के मुख्य पात्र पर केंद्रित है। वे अपने भीरु व कायर राज पुत्र को वीरता का पाठ सीख्लातीं हैं। 
  
१९ / उन्नीसदाश काव्य पुस्तक : 'मुट्ठी बन्द रहस्य' (कविता-संग्रह)
२० / बीसवीं मरणोपरांत काव्य पुस्तक :
' देश द्वादशी' :
पंडित नरेंद्र शर्मा जी कवि  रूप से अधिक प्रसिद्ध हैं किन्तु कवि ने कुछ सरस कथाएँ भी रचीं हैं जिन्हें पुस्तक
१)  " कड़वी मीठी बातें " व २) ज्वाला परचूनी पुस्तक में 
संगृहीत किया गया। उस वक्त इलाहाबाद कहलानेवाला तीन नदियों के पवित्र संगम स्थल पर  शताब्दियों से बसे आज ' प्रयाग राज ' के अपने पुरातन नाम से पुनः पहचाने जानेवाले सांस्कृतिक शहर से उदयीमान कवि नरेंद्र शर्मा ने काव्य रचनाओं का सृजन आरम्भ किया था।
पंडित नरेंद्र शर्मा जी की आरंभिक काल की कविताएँ सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्य के मानदंड सामान " सरस्वती " पत्रिका में तथा पत्रिका  " चाँद " में छपीं थीं। 
सं. १९३४ में वे अभ्युदय पत्रिका के लिए प्रयाग में उपसंपादक पद पर कार्यरत रहे। 
सं. १९३८ से सं १९४० पर्यन्त वे, "अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी"  में, हिन्दी अधिकारी केपर कार्यरत पद रहे। 
सं १९४० से सं. १९४२ इन दो वर्ष की अवधि में नरेंद्र शर्मा ब्रिटीश जेल में स्वतंत्रता सेनानी रहे तथा ब्रिटिश बंदी गृह में कैद रहे यह कवि मानस की अग्नि परिक्षा का काल रहा। देवली डिटेंशन जेल राजस्थान प्रांत तथा आगरा जेल में, कवि नरेंद्र शर्मा जी ने कारावास भोगा।  जहां १४ दिन के अनशन किया जिस में, प्राण गंवाने की घड़ी आते ही, जेल के गोरे अधिकारीयों ने, उन्हें जबरन सूप पिलाकर, हाथ पैर, निर्ममता से बाँध कर नलियों द्वारा मुंह से द्रव्य पिलाकर, देशभक्त नरेंद्र को, जेलरों ने  " एक और शहीद न हो जाए " यह  सोचकर, उन्हें, जीवीत रखा। देवली जेल से लिखी कामिनी पुस्तक से काव्य " बंदी की बैरक " से यह पंक्तियाँ बंदी जीवन अनुभव समेटे हुए है ~
" यहां कँटीले तार और फिऱ खींची चार दीवार
  मरकत  के गुम्बद से लगते हरे पेड़ उस पार " और

" एक और दिन आया प्यारे, यह जीवन दिनमान जैसे 

  हुई सुबह पीलो उड़ आई मेरे पुलकित प्राण जैसे !
  खींचे कँटीले तार सामने, चुभते से से शूल जैसे ! "
         
गाँव जहांगीरपुर में नरेंद्र की माता जी गंगादेवी को १ सप्ताह पश्चात पता चला के उनके लाडले इकलौते पुत्र ने अन्न त्याग किया है और आहार छोड़ दिया है! अब देशभक्त बेटा भूखा हो तब माँ कैसी खातीं ? सो, अम्मा जी ने भी १ सप्ताह के लिए अन्न त्याग कर दिया।
जेल से बीमार और कमजोरी की हालत में नरेंद्र को मुक्त किया तो वे सीधे गाँव,अपनी स्नेहमयी अम्माँ जी के दर्शन करने, खुर्जा से जहांगीरपुर आ पहुंचे। देशभक्त नरेंद्र शर्मा का, गाँव के लोगों ने मिलकर बन्दनवारों को सजा कर भव्य स्वागत किया।
अम्माँ जी अपने साहसी, देशभक्त पुत्र  नरेन को गले लगा कर रोईं तो गँगा जल समान पवित्र अश्रुकणों ने यातनाभरे ब्रिटिश जेल का सारा अवसाद धो कर स्वच्छ कर दिया। अचानक हिंदी साहित्य जगत के बँधु,श्री भगवती चरण वर्मा जी, उपन्यास “चित्रलेखा” के सुप्रसिद्ध लेखक -  गीतकार नरेंद्र शर्मा की   तलाश में वहाँ आ पहुंचे। भगवती बाबू ने बतलाया कि बॉम्बे टॉकीज़ फिल्म निर्माण संस्था की मालकिन अभिनेत्री, निर्देशिका, निर्मात्री देविका रानी ने आग्रह किया है कि, ” भगवती बाबू अपने संग गीतकार नरेंद्र शर्मा को बंबई ले आएं।"भगवती बाबू का प्रस्ताव सुन, नरेंद्र शर्मा को बड़ा आश्चर्य हुआ।
बंबई जाने का निमंत्रण बॉम्बे ताक़ीज़ संस्था से सामने से आया था। गीतकार नरेंद्र शर्मा के लिए अपनी प्रतिभा दिखलाने का अवसर आया था। हिंदी फिल्म चित्रपटों के लिए गीत लेखन का बुलावा आया था, परन्तु नरेंद्र शर्मा के मन में कुछ संकोच था।  चित्र : श्री भगवती चरण वर्माजी गीतकार नरेंद्र शर्मा के साथ ~

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भगवती बाबू के आग्रह पर, कवि नरेंद्र शर्मा अपने युवा जीवन में अब कुछ नया अनुभव लेने कुछ नया सीखने के इरादे से मायानगरी बंबई के लिए ट्रेन में बैठकर, चल दिए .....
रेलगाडी की छुक छुक की ताल से, ऊंगलियों का ठेका लगाते हुए,
उर्दु भाषा के शब्द लिए एक गीत का मुखडा भी वहीं यात्रा में लिखा ....
" अय बादे सबा ....इठलाती न आ ...मेरा गुंचाए दिल तो सूख  गया "
सं १९४३ से सं. १९४६ की अवधि तक " बोम्बे टाकिज फिल्म निर्माण संस्थाने  मालकिन निर्मात्री व सिने तारिका तारिका " देविका रानी "द्वारा  कवि नरेंद्र शर्मा को गीत व पटकथा लेखन के लिए अनुबंधित किया ।
सं. १९३४ बॉम्बे टॉकीज़, उस वक्त बंबई कहलानेवाले महानगर के उपनगर मलाड में था। इस प्रकार नरेंद्र शर्मा के कवि कर्म में सिनेमा जगत के लिए गीत लेखन का नया अध्याय आरम्भ हुआ।
बॉम्बे टॉकीज़ फिल्म निर्माण संस्था : भारतीय सिने जगत की यशस्वी आधारशिला स्वरूप संस्था थी।
निर्माता  हिमांशु राय और देविका रानी ने मिलकर बांबे टॉकीज बैनर की स्थापना की। इसी संस्था से अनेकानेक मशहूर व गुणी कलाकारों ने अपने कार्य का आरम्भ किया था। मशहूर गायिका
सुरैया, राज कपूर , अशोक कुमार, लीला चिटनिस, दिलीप कुमार, मधुबाला, मुमताज़ आदि कलाकार फ़िल्म जगत् को बांबे टाकीज की ही देन हैं। अनिल बिस्वास, संगीतज्ञ, उनकी बहन गायिका पारुल घोष, गीतकार नरेंद्र शर्मा, बांसुरी बादक पन्ना लाल घोष
मुख्य फ़िल्में :
अछूत कन्या' १९३६, 'इज्जत' (१९३७ ), 'सावित्री' १९३८ , 'निर्मला' १९३८  आदि।
  नायिका, निर्मात्री, गायिका एवं अद्भुत कलाकार देविका रानी चौधरी रोरिच  को सर्व प्रथम भारत रत्न उपाधि से अलंकृत भारतीय होने का गौरव प्राप्त है। 





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देविका रानी चौधरी रोरिच  
~
( क्लीक करें नाम पर )

जन्म- ३०  मार्च,  सं. १९०८  विशाखापत्तनम - मृत्यु- ९  मार्च, सं. १९९४  बैंगलोर में )
देविका रानी के पिता कर्नल मन्मथ नाथ (एम.एन.) चौधरी, ब्रिटिश राज्य काल के प्रथम भारतीय नस्ल के सर्जन जनरल थे और रवींद्र नाथ टैगौर की बहन, सुकुमारी देवी के पुत्र थे।
देविका रानी की माँ  श्रीमती लीला चौधरी इंदुमती चौधरी, सौदामिनी गंगोपाध्याय जी भी रवीन्द्रनाथ टैगौर की बहन थीं। इस नाते, रवींद्र नाथ टैगौर दोनों संबंधों से
देविका रानी  के पड़ दादा थे।
देविका रानी का जन्म-सं १९०८,  ३०  मार्च,   विशाखापत्तनम के वॉल्टेर नामक शहर में हुआ। मृत्यु- ९  मार्च, सं १९९४  बैंगलोर में। देविका रानी, भारतीय रजतपट की पहली स्थापित नायिका हैं। वे  अपने युग से कहीं आगे की सोच रखने वाली अभिनेत्री थीं।  उन्होंने अपनी फ़िल्मों के माध्यम से, जर्जर सामाजिक रूढ़ियों और मान्यताओं को चुनौती देते हुए, नए मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को स्थापित करने का काम किया था। देविका रानी कवि शिरोमणि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के परिवार से थीं।  टैगौर देविका रानी के परदादा थे।

नव (९) वर्ष की बालिका देविका को, परिवार ने उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया । युवा होते ही देविका ने सं. १९२० में, रॉयल एकेडमी ऑफ़ ड्रामेटिक आर्ट्स संस्था से कला, स्थापत्य शास्त्र, कपड़ा निर्माण, साज सज्जा जैसे विषय ले कर युवती देविका स्नातक हुईं।
" एलिज़ाबेथ आर्डन " नामक सुप्रसिद्ध सौंदर्य प्रसाधन निर्माण की वैश्विक संस्था में भी देविका ने शिक्षा ली। सं. १९२७ तक देविका कई  विविध विषयों की शिक्षा लेतीं रहीं।
सं. १९२८ में हिमांशु राय जो बैरिस्टर  भी थे व फिल्म निर्माता भी थे वे
" थ्रो ऑफ़ डाइस " फिल्म के निर्माण में संलग्न  थे उन से देविका की मुलाक़ात हुई। देविका रानी ने फिल्म निर्माण प्रक्रिया में हिमांशु राय का साथ दिया। दोनों जर्मनी गए। बर्लिन शहर में जी. डब्ल्यू पैबस्ट तथा फ़्रिट्ज़ लेंग नामक प्रसिद्ध निर्माताओं से मिलने पर उन्हें फिल्म निर्माण की तकनीकी जानकारी व ज्ञान में इजाफा हुआ। हिमांशु राय देविका रानी ने एक नाटक में साथ काम किया जिसे # स्वीट्ज़रलैंड था स्केंडिनेविया जैसे मुल्कों में अपार ख्याति मिली।
अब देविका रानी व हिमांशु राय ने विवाह कर लिया।
सं १९३३ में फिल्म ' कर्मा ' प्रथम इंग्लैण्ड में निर्मित भारतीय निर्माता की फिल्म थी जिसे भारतीय, जर्मन व इंग्लैण्ड के साझा सहकार से निर्मित किया गया था। फिल्म "कर्मा"  से देविका रानी ने नायिका तथा अंग्रेज़ी व हिंदी गीत की गायिका के रूप में अपनी कारकिर्दी शुरू की थी। फिल्म ' कर्मा ' को हिंदी भाषा में इस नाम से '  नागिन की रागिनी '  परदे पर उतारा गया। किन्तु फिल्म विदेश में सफल रहते हुए भी भारत में असफल रही।
बी. बी. सी. ब्रिटिश प्रसारण सेवा ने देविका रानी को विशिष्ट प्रसारण कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया।  यह लिंक है  देविका रानी : अनजान फिल्म का गीत गाते हुए ~~ https://www.youtube.com/watch?v=fPzGFWNYZs4

सं १९३४ में हिमांशु राय ने " बॉम्बे टाकीज़ फिल्म निर्माण संस्था को बंबई में
स्थापित किया। संस्था के फिल्म निर्माण स्टूडियो उस वक्त समस्त भारत में तकनीकी उपकरणों से लैस ऐस  सर्वश्रेष्ठ  संस्था थी । बंगाली निरंजन पाल पटकथा लेखक  व फ्रांज़ ऑस्टीन छायांकन विशेषज्ञ भी अनुबंधित किये गए। 
Bombay Talkies" बॉम्बे टाकीज़"- संस्था की प्रथम फिल्म ' जवानी की हवा ' का छायांकन ट्रेन में हुआ था
फिल्म में देविका रानी के साथ नज़्म उल हक्क नायक थे। संस्था की दुसरी फिल्म ' जीवन नैया ' फ़िर दोनों को नायक नायिका लेकर बनी।शीर्षक
 के अनुरूप असल जीवन में यह फिल्म जीवन नैया हिमांशु राय व देविका रानी के जीवन मंझधार में हिचकोले लेती हुई आयी । क्योंकि फिल्म आधी बनी थी तब देविका रानी  अपने फिल्म के नायक नज़्म उल हक्क के संग कलकत्ता भाग गयीं ! जीवन नैया असल जीवन और फ़िल्मी जीवन में डावांडोल होने लगी !   
बॉम्बे टाकीज़ में उस समय बंगाली बाबू शशधर मुखर्जी ( नायिका काजोल के दादा जी ) स्वर संधान के सहकारी कर्मचारी इस पद पर कार्यरत थे।
देविका रानी व शशधर मुखर्जी दोनों बंगाली भाषी होने से, शशधर के समझाने बुझाने  पर, देविका रानी, किसी तरह पुनः बंबई, हिमांशु राय के घर लौटीं ~ परन्तु दोनों के सम्बन्ध अब, मात्र औपचारिक रह गए थे।
देविका रानी की अन उपस्थिति से, बॉम्बे टाकीज़ संस्था की फ़िल्में रुक गईं थीं और लेनदारों से, पैसे उधार लेने के कारण,  संस्था को भारी नुक्सान भी हुआ था। आखिरकार, कलाकार  अशोक कुमार को नायक बनाकर, फिल्म
जीवन नैया को जैसे तैसे पूरा कर, प्रदर्शित किया गया।
उसके बाद सं १९३६ में बनी फिल्म " अछूत कन्या" नायक  अशोक कुमार व देविका रानी के साथ बनी।
सं १९३७ में फिल्म जीवन प्रभात में फिर दोनों की जोड़ी परदे पर लाई गयी।  आगे अशोक कुमार के साथ देविका रानी ने कुल १० फिल्मों में काम किया।
सं १९३७ में फिल्म ' इज़्ज़त'  आई। सं १९३८ में २ और फ़िल्में  ' निर्मला ' व ' 'वचन' आयी। सं १९३९  में फिल्म ' दुर्गा ' बनी।
सं. १९४०म  में हिमांशु राय का निधन हुआ।
सं १९४१ में शशधर मुखर्जी का सहकार लेकर फिल्म ' अनजान '  नायक अशोक कुमार के साथ बनी।
सं १९३४ में निर्मित फिल्मों ' बसंत ' व 'किस्मत 'को सफलता हासिल हुई। यह देविका रानी की नायिका के किरदार में बनीं अंतिम फिल्म थी।
सं. १९४३ में निर्मित हुई फिल्म " हमारी बात " ! "
हमारी बात" युवा कवि नरेंद्र शर्मा के गीतों से सजी उनकी हिंदी सिनेमा जगत में पदार्पण करती हुई उनके यशस्वी कारकिर्दी के आरम्भ की सर्व प्रथम फिल्म थी। सुप्रसिद्ध अभिनेता, नूरमाता, निर्देशक श्री राज कपूर साहब ने इसी  फिल्म हमारी बात के लिए, एक छोटे से पात्र में पहले पहल अभिनय किया था।
श्री #राज #कपूर ने सं १९३० में इसी बोम्बे टोकीज़ में क्लप्पेर बॉय तथा सहायक कर्मचारी बन कर अपने  फिल्मी कारकीर्दी की शुरुआत की थी और सुरैया ने भी बाल कलाकार के रूप में, यहीं काम किया था
सं. १९४४ में एक नवोदित कलाकार #दिलीप #कुमार को लेकर फिल्म
" ज्वार - भाटा" का निर्माण हुआ जिस के सभी गीत #नरेंद्र #शर्मा जी ने लिखे - 
युसूफ खान को यह नाम दिलीप कुमार नरेंद्र शर्मा ने ही सुझाया था। 
३ नाम चुने गए थे १) जहांगीर २) वासुदेव ३) दिलीप कुमार !
ज्योतिष शसस्त्र के अच्छे जानकार नरेंद्र शर्मा ने आग्रह किया कि दिलीप कुमार नाम से कारकिर्दी शुरू कीजिए तब अपार सफलता हासिल होगी ! यह कहा था
"तुम्हारे नाम का डंका बजेगा ! "  और समय साक्षी है इस भविष्यवाणी का और यह नरेंद्र शर्मा जी की कल कही बात, आज सौ /  १०० प्रतिशत सच निकली है यह हम सब जानते और मानते हैं।
Bombay Talkies :

 देविका ने दस वर्ष के अपने फ़िल्मी कैरियर में कुल १५  फ़िल्मों में ही काम किया। लेकिन उनकी हर फ़िल्म को क्लासिक का दर्जा हासिल है। विषय की गहराई और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी उनकी फ़िल्मों ने अंतरराष्ट्रीय और भारतीय फ़िल्म जगत् में नए मूल्य और मानदंड स्थापित किए।  देविका रानी को ' सत्यम शिवम् सुंदरम को चरितार्थ करनेवालीं दूरद्रष्टा सफल नारी के दृष्टांत से भारत ही नहीं विश्व भर में मान्यता प्राप्त हुई। 
देविका रानी हिंदी फ़िल्मों की पहली ' स्वप्न सुंदरी' कहलाईं तथा उन्हें प्यार भरा विशेषण ' पटरानी '  भी मिला ! वे ' ड्रैगन लेडी '  जैसे विशेषणों से भी अलंकृत हुईं। देविका को उनकी ख़ूबसूरती, शालीनता तथा  धाराप्रवाह अंग्रेज़ी सम्भाषण के लिए आज भी याद किया जाता है।  अभिनय कौशल के लिए देविका रानी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितनी लोकप्रियता और सराहना मिली उतनी कम ही अभिनेत्रियों को नसीब हो पाती है।आगे कुछ समय पश्चात  देविका रानी ने रशियन चित्रकार रोरिच से विवाह किया।








दक्षिण भारत के कर्नाटक प्रांत में ४५० एकड़ फैले विशाल टाटागुनी एस्टेट में देविका रानी व रोरिच मृत्यु पर्यन्त रहे। 

अब आप समझे ये कनेक्शन ? कई वर्षों पश्चात हिंदी सिनेमा जगत के " ग्रेटेस्ट शो मेन " कहलानेवाले सुप्रसिद्ध निर्माता, निर्देशक, नायक, श्री राज कापूरजी ने " सत्यम शिवम् सुंदरम " शीषक से फिल्म बनाई। उन की फिल्म उक्त फिल्म का शीर्षक गीत भी तब राज सा'ब ने पं. नरेंद्र शर्मा से ही लिखवाया तथा उनकी फिल्म भी इसी शीर्षक से बनी थी।  
गीतकार  नरेंद्र शर्मा ने, देवानंद , चेतनानन्द की नई फिल्म कम्पनी " नव केतन " द्वारा निर्मित फिल्म आँधियाँ के गीत लिखे जिसे संगीतज्ञ अली अकबर खां ने संगीतबद्ध किया ।
भारतीय सुर - संगीत के महागुरु,  बाबा अल्लाउद्दीन खां के अली अकबर खां सुपुत्र हैं। सगीत विशारद, संतूर विशेषज्ञ अन्नपूर्णा जी, अली अकबर खां की बहन हैं और सुप्रसिद्ध सितार वादक श्री रविशंकर जी बाबा अल्लाउद्दीनन के शिष्य रहे।  
स्व. सुधीर फडके और पापा -- दूरदर्शन पर एक साथ देखिये --
फिल्म : भाभी की चूडियाँ का  मेरा सबसे प्रिय गीत भी सुन लीजिये~~ 
सं. १९५१ में बनी फिल्म ' मालती माधव' चित्रपट की पटकथा नरेंद्र शर्मा ने लिखी। उसी फिल्म का यह कर्णप्रिय गीत 
" बाँध प्रीति फूल डोर, मन लेके चित्त चोर, दूर जाना ना,"
का यह गीत, संगीतकार श्री सुधीर फडकेजी  और स्वर साम्रागी पूज्य लता मंगेशकर जी ने अत्यंत मनमोहक स्वरों से सजाया है~

सं १९४० में, देविका रानी जी के पति श्री हीमान्शु रोय का देहांत हो गया और देविका रानी को, सहायता थी अच्छे कार्यकर्ताओं की! ताकि, वे, कम्पनी का कार्य, फिल्म निर्माण जारी रख सकें। इसी हेतु से,लेख़क और कवि श्री भगवती चरण वर्मा ने कवि नरेंद्र को भी आमंत्रित किया के ' बंधू, आप भी मेरे संग, बंबई चलिए 'इस प्रकार नरेंद्र शर्मा का उत्तर प्रदेश से बंबई की मायानगरी में आना हुआ था।
बंबई आगमन के पश्चात कवि नरेंद्र शर्मा जी ने असंख्य फिल्मी गीत लिखे जिन्हें स्वर कोकीला सुश्री सुब्बलक्ष्मी जी,स्वर साम्राग्नी लता मंगेशकर जी, बंगाल की सुमधुर बुलबुल, सुश्री पारुल घोषजी जो सुप्रसिध्ध बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष की पत्नी थीं तथा फिल्म संगीत के जो भीष पितामह रहे हैं ऐसे संगीत संयोजक श्री अनिल बिस्वास जी की वे बहन थीं।
संगीतज्ञ श्री अनिल बिस्वास जी ने ही गायक तलत महमूद तथा मुकेश जी को पहली बार अपने स्वर संयोजन में गीत गवाकर सिने संसार में प्रसिध्धि दिलवाई थी  और स्वर कोकिला आदरणीया लता जी तो यह भी कहतीं हैं के उन्हें सांस पर कंट्रोल करना अनिल दा ने ही सिखलाया था !
संगीतकार श्री अनिल दा और नरेंद्र शर्मा के गीत संगीत से सजी फिल्म
" ज्वार  - भाटा " में, एक नया चेहरा बतौर नायक पेश किया गया जिनका नामकरण भी नरेंद्र शर्मा ने किया था और वह थे युसूफ खान यह भी हम पढ़ चुके हैं !! जिन्हें विश्व आज दिलीप कुमार के मशहूर नाम से पुकारता है !
भारत के अन्य सभी श्रेष्ठ गायिकाएँ व गायकों ने नरेंद्र शर्मा के लिखे गीतों का अपना स्वर दिया है। हमारी लाडली, श्री आशा ताई भोंसले जी, श्री मन्ना डे बाबू, श्री हेमंत कुमार, श्री मुकेश चन्द्र माथुर से लेकर सुरेश वाडकर तक के गायकों ने पण्डित नरेद्र शर्मा रचित गीतों को गाया है। सुरीली गायिका सुरैया जी का गाया तथा गीतकार नरेंद्र शर्मा का लिखा यह गीत सुनिए~~ 
http://www.downmelodylane.com/suraiyya.html

" नैना दीवाने एक नहीं माने, करे मन मानी, माने ना ! "
इसके अलावा आकाशवाणी के सुगम संगीत के लिए कई ख्यात नाम गायकों ने भी आगे गीतकार नरेंद्र शर्मा रचित गीत गाये।
 जैसे अनिल दा की पत्नी मीना कपूर जी ने यह गीत गाया था
" चौमुख दीवला बाट धरूंगी, चौबारे पे आज,
   जाने कौन दिसा से आयें, मेरे राज कुमार "
( ये गीत आकाशवाणी रेडियो सेवा से अकसर बजता था )
गायिका छाया गांगुली जी ने गाया " मेरी माटी की कुटिया में राम राज करे "
मीना कपूर जी की आवाज़ सुनिए - फिल्म है परदेसी --
संगीत अनिल दा का और नायिका नर्गिस दत्त
सं. १९४९ में युवावस्था में नरेंद्र शर्मा एक बार काशी गए थे। वहां वैराग्य की प्रबल भावना जगी जिसे एक संत के यह कहने पर कि " अभी तुम्हे कई महत्त्वपूर्ण कार्य करने हैं। अत: संसार त्याग की बात मन से निकाल दो " युवक  नरेंद्र शर्मा  ने इसे ईश्वरीय संकेत व आदेश समझ कर संत की कही बात मान ली। सं. १९४६ से सं. १९५३ तक कवि नरेंद्र शर्मा ने स्वतन्त्र लेखन किया। सं. १९५३ से सं. १९७१ तक  नरेंद्र शर्मा आकाशवाणी के मुख्य प्रबंधक, निर्देशक के पद पर रहते हुए, कार्य करते रहे।          
मेरे अनुज परितोष ने स्वयं, देहली के प्रकाशकों से, आकाशवाणी स्टाफ से, दूर दर्शन से, दुर्लभ जानकारियां एकत्रित कर उन्हें पंडित नरेंद्र शर्मा सम्पूर्ण रचनावली में समाहित किया है। इप्टा से सम्बंधित तथा रवि शंकर जी तथा उदय शंकर जी के सबसे छोटे भाई सचिन शंकर जी
के साथ भी पं. नरेंद्र शर्मा जी ने लेखन कार्य किया। नृत्य  विशारद सचिन  शंकर जी की नृत्य नाटिका के लिए पंडित नरेंद्र शर्मा जी ने कई पटकथाएं लिखीं। 
१ -
मछेरा और जलपरी
:  जिसका संगीत सलिल चौधरी जी ने दिया है।  गीत पंडित नरेंद्र शर्मा जी जी के थे और अन्य २ और नाटिकाएँ भी थीं इनके नाम भूल रही हूँ!
आगे विविधभारती प्रसारण सेवा के लिए असंख्य रूपक भी पंडित नरेंद्र शर्मा जी ने लिखे। विविधभारती प्रसारण सेवा से जुड़े जनाब  रि‍फत सरोश जी के शब्दोँ मेँ आगे की कथा सुनिये ~~
" नरेन्द्र जी हमारे हिन्दी विभाग के कार्यक्रमोँ मेँ स्वेच्छा से आने लगे - एक बार नरेन्द्र जी ने एक रुपक लिखा " चाँद मेरा साथी " उन्होँने चाँद के बारे मेँ अपनी कई कवितायेँ जो विभिन्न मूड की थीँ, एक रुपक लडी मेँ इस प्रकार पिरोई थी कि मनुष्य की मनोस्थिति सामने आ जाती थी।  वह सूत्र रुपक की जान था ! मुझे रुपक रचने का यह विचित्र ढँग बहुत पसँद आया और आगे इस का प्रयोग भी किया। मैँ बम्बई रेडियो पर हिन्दी विभाग मेँ स्टाफ आर्टिस्ट था और अब्दुल गनी फारुकी प्रोग्राम असिस्टेँट !
फारुकी साहब नरेन्द्र जी से किसी प्रोग्राम के लिये कहते,
वे फौरन आमादा हो जाते !आते, और अपनी मुलायम मुस्कुराहट और शान्त भाव से हम सब का मन मोह लेते ! आकाशवाणी की रंगारंग सेवा विविध भारती का शुभारम्भ हुआ। सर्व  प्रथम प्रसार - गीत, जो रेडियो से बजावह यह गीत था ~~ 
" नाच रे मयूरा
खोल कर
सहस्त्र नयन,
देख सघन गगन मगन
देख सरस स्वप्न
जो के आज हुआ पूरा,
नाच रे मयूरा "
श्री मन्ना डे के स्वर में गूंजा इसी गीत से AIR / ए. आई. आर. रेडियो प्रसारण सेवा विविध भारती का श्री गणेश हुआ ! 'विविध भारती' के साथ-साथ, इसके अन्य कार्यक्रमों जैसे 'हवामहल', 'मधुमालती', 'जयमाला', 'बेला के फूल', 'चौबारा', 'पत्रावली', 'वंदनवार', 'मंजूषा', 'स्वर संगम', 'रत्नाकार', 'छायागीत', 'चित्रशाला', 'अपना घर' आदि का नामकरण भी नरेन्द्र शर्मा ने ही किया और देखते-देखते देश भर में रेडियो सीलोन के श्रोता 'विविध भारती' सुनने लगे। 'आकाशवाणी' के इतिहास में 'विविध भारती' की यह सफलता स्वर्णिम अक्षरों में लिखी जायेगी, जिसका श्रेय नरेन्द्र जी के अतिरिक्त और किसी को नहीं मिल सकता।    
पण्डित  नरेन्द्र शर्मा जी ज्योतिषी भी थे। 'विविध भारती' प्रोग्राम २ अक्टूबर १९५७ को शुरू होने वाला था। फिर तारीख़ बदली। आख़िर 
उन्होंने अपनी ज्योतिष विद्या की रोशनी में तै किया कि यह प्रोग्राम ३ अक्टूबर १९५७ के शुभ दिन शुरू होगा और प्रोग्राम का शुभारंभ हुआ
इस समस्त लेखन के अलावा  पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा जी के निजी कागजातों से छांट कर,४० पुस्तक तैयार हों उतनी सामग्री, एकत्रित हुई है। प्रचुर साहित्यिक सामग्री को सुव्यवस्थित ढंग से संपादित करने के बाद, १६ खण्डों में पण्डित नरेंद्र शर्मा : सम्पूर्ण रचनावली : उनके पुत्र श्री परितोष नरेंद्र शर्मा के १८  वर्षों के अथक परिश्रम से साहित्यकार की साधना स्वरूप नरेंद्र शर्मा समग्र रचनावली तैयार हुई  है प्रकाशित हो चुकी है तथा भारत की विभिन्न संस्थाओं विश्व विद्यालयों के पुस्तकालयों में पहुँच चुकी हैं। 
मेरे अनुज परितोष ने आभार तथा प्राक्कथन  लिखा है।परितोष को अम्मा और पापा जी के पत्र भी मिलें हैं। उसका काहना है के वे अद्`भुत हैं !!
अम्मा, पापा जी, पिछले जन्म के कर्म पूरे करने इस जन्म में आकर मिले थे। दोनों की पवित्र आत्माएं, घुलमिल गयीं थीं।
ऐसे पवित्र माता और पिता की संतान हिवा मेरे इस छोटे से जीवन का परम सौभाग्य है मैं ऐसा मानती हूँ। बड़े होते हुए मैंने उन्हें कभी ऊंची आवाज़ में घर में बोलते सुना नहीं !
पापा जी बेहद संवेदनशील, दुसरे की भावनाओं की क़द्र करनेवाले और उन्हें आदर देनेवाले,परम दयालु, परोपकारी, सांसारिक बंधनों से निर्लिप्त, कँवल की तरह, निर्लिप्तविश्व की हर गंदगी से बहुत ऊपर खिले रहकर एकमात्र  ईश्वर में अपनी चेतना को पिरोये, सादा तथा सात्विक जीवन जीनेवाले महापुर्ष, परम योगी एवं एक संत कवि थे। और मेरी अम्मा उन्हीं की प्रतिछाया सी थीं! मानों वे दोनों अमर युगल वसिष्ठ अरुंधती थे ! - आजके आधुनिक युग के ! मेरी अम्माँ कहानियाँ भी बहुत सुन्दर लिखतीं थीं और प्रसिद्ध पत्रिकाएं नवनीत तथा धर्मयुग में छपीं भी उनकी कहानियां ! पर चित्रकला में अम्मा की रूचि ज्यादा रही और घर की देखभाल, हम बच्चों की स्नेह मिश्रित अनुशाशन से परवरीश, पाक कला में साक्षात अन्नपूर्णा सी --
जिस की कुटिया में पधारे हर अतिथि के लिए दिन के समय अनुसार भोजन, चाय, नारियल का ताज़ा शीतल जल, नीम्बू शरबत, नाश्ता, शाकाहारी~  सुस्वादु भोजन हमेशा सुलभ रहता था। - ये करना कितना कठिन होगा. ! ... जब् यूं समझिये, ये घर भी हमारे सुदामा के घर जैसा घर था। घर भी कैसा ? तो कहूं के , ' आश्रम जैसा ' - शांति और सात्विक पवित्रता से भरा - भरा ! मंद अगरबतीयों की महक और अम्मा की बगिया के सुगंधी पुष्पों से सजा हुआ और इतनी शांति रहती थी की हर आगंतुक कुछ पल के लिए, यहां प्रवेश करते ही, मानसिक व शारीरिक विश्राम पा लेता था। 
हमारे अम्माँ पापा जी के घर का नंबर था -- ५९४ !
१९ वे रास्ते खार उपनगर में बसा यह  घर जिस का वातावरण ऐसा सात्विक था उस का कारण मेरी अम्मा का अथक परिश्रम तथा एक कुशल गृहिणी का न्याययुक्त उदार मना शासन था।
पापा जी तो हमारे, भोले भंडारी थे! उनकी पुस्तकें, उनके मित्र, साहित्य, कला जगत, सुबह में चाय और अखबार, सादा भोजन -
यही, सब उन्हें प्रिय था!
मेरे कोटि शत  कोटि प्रणाम करते हुए अब आज्ञा ~~
~~ लावण्या