Thursday, February 14, 2019

श्रीयंत्र रहस्यम

~ श्रीयंत्र रहस्यम ~
ईश्वर एक हैं । सब जीवों को उन तक पहुँचने का रास्ता अलग हो सकता है। पर जो केंद्रबिंदु हैं, उसी से ये समस्त ब्रह्माण्ड उद्भव ले कर प्रकाशमान हुआ है।
ईश्वर की  परम ऊर्जा ' पराशक्ति ' हैं।  वे ही माँ भगवती हैं भव तरिणी हैं।
वे शिवा भी हैं ! उन्हें कुछ मनुष्य ' श्री रासेश्वरी राधे महारानी ' बुलाता है
तो कोई राम भक्त उस आदि पराशक्ति को ' सीता माई ' कहता है।
कोई उस परम प्रकृति या ईश्वरीय ऊर्जा को '
 माता मरीयम ' कहता है।
 
पर अन्त में, यदि जीव, आत्मा में समाये, अपने ईश्वर को श्र्ध्धा तथा विश्वास से भजेगा, तब प्रत्येक जीव, केंद्रस्थ ईश्वर के प्रति समर्पित हो पाएगा।
 व एकमात्र ' परम सत्य ' है उसे  पहचान पाएगा ।
 वेदोक़्त सूत्र है “ एकम सत्य, विप्रा बहुधा वदंति “ - सत्य  एक है !
 अनुभव से या ज्ञान द्वारा जो, विशुद्ध तर्क द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
वे सभी इस एक सत्य को विविध प्रणाली से प्रतिपादित करते हैं।
 " अंग्रेज़ी में " Truth is One ☝️ those who experience or arrive at this conclusion with rationale mind know & interpret it in many different ways. "
       
फरवरी माह , २०१९ में  " श्रीयंत्र " जिसे १ वर्ष के कठिन परिश्रम पश्चात, रिटायर्ड वैज्ञानिक विशेषज्ञ,  हमारे एक मित्र, श्री रमाकांत जायसवाल भाईसाहब ने अमरीका में रहते हुए, रंगीन कांच के ३०० टुकड़ों को जोड़ कर, बड़ी श्रद्धा भक्ति पूर्वक १ वर्ष की मेहनत से इस श्री यंत्र को  निर्मित किया।
इसे ' स्टैन ग्लास ' विधा कहते हैं। मित्र मण्डली के मध्य, इस कलाकृति का विधिवत उदघाटन हुआ। मुझ से आग्रह किया गया कि, " श्रीयंत्र " पर
 मैं कुछ कहूँ। अतः मैंने रिसर्च कर यह जानकारियां एकत्रित की हैं,
जिन्हें अब आगे  प्रस्तुत कर रही हूँ। 

श्रीयंत्र १२,००० हज़ार वर्षों से भी अधिक प्राचीन है।ऋग्वेद में श्रीयंत्र का उल्लेख है।
श्रीयंत्र की संरचना प्राचीन एवं पवित्र ' ज्यामितीय ' आधार पर है। मध्य युग में
जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य जी ने " सौंदर्यलहरी "  में माँ भगवते, पराशक्ति अम्बिका
की स्तुति में, श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री देवी, शक्ति की उपासना करते हुए
 कई श्लोक लिखे हैं। आधुनिक युग में श्रीअरविन्द जैसे मर्मज्ञ द्वारा
' श्रीयंत्र ' आराधना हुई है। 
श्रीयंत्र में, देवी ललिता, महिषासुर सुंदरी, महात्रिपुरसुँदरी,महयोगमाया, कामेश्वरी,अम्बिका, देवी पराशक्ति,
१६ वर्षीय षोडशी केंद्र में स्वयं विराजित हैं। 
श्रीयंत्र के केंद्र को ' बिंदु ' कहते हैं।
बिंदु के मध्य में, परमशिव एवं पराशक्ति संयुक्त स्वरूप में बिराजित हैं।
 श्रीयंत्र में ४३ त्रिकोण हैं। २८ मर्म स्थान हैं, २४  संधि स्थान हैं।
(जहां ३ रेखाएं मिलतीं हैं उसे संधि स्थान कहते हैं।)
शाक्त व तंत्रोक्त उपासना विधि में, श्रीयंत्र का सर्वोच्च स्थान है।
 श्रीयंत्र अखिल ब्रह्माण्ड = कॉसमॉस cosmos +
मानव = ह्यूमन Human + कुण्डलिनी  इन तीनों का स्वरूप है। 
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डॉ.हेन्स जैनी ने " ऊंकार = प्रणव नाद " का रिवर्स इंजीनीयरींग से ज्योमेट्रिकल
आकार में परिवर्तित करने का एक्सपेरीमेंट किया तब श्रीयंत्र की आकृति का
स्वरूप प्राप्त किया था।
वैज्ञानिक महाशय निकोला ' टैसला ' को श्रीयंत्र आकृति  अत्यंत तेज प्रकाश
 में दिखलाई दी थी जो वे बाद में समझे थे के यह " श्रीयंत्र " है।
 
निकोला टेस्ला : एक महान वैज्ञानिक थे।  जन्म सं १८५६  में
तत्कालीन सर्बिया में हुआ।
 अपनी मातृभाषा सर्बो के साथ-साथ
वे  इंग्लिश, फ्रैंच, जर्मन जैसी आठ भाषाएं जानते थे।
 गणित व विज्ञान में तो उनकी विशेषज्ञता थी।
उन्होंने आस्ट्रिया के ग्रेज स्थित, पॉलिटेक्निक संस्थान से
' इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग ' विषय में उच्च शिक्षा ग्रहण की थी। 

' अल्टरनेट करेंट (एसी) ' का इस्तेमाल, व्यवहारिक बनाकर
 धरती के कोने-कोने तक बिजली पहुंचाने वाले ' निकोला टेस्ला ' थे। 

उनके द्वारा विकसित किए गए " एसी ट्रांसफॉर्मर " और " एसी मोटर " ने
 जैसे बिजली की उपयोगिता को नए पंख दे दिए थे।
 बिना इनके, हम औद्योगिक क्रांति की कल्पना नहीं कर सकते।
टेस्ला ने इसके बाद ‘टेस्ला क्वॉइल’ का आविष्कार किया।
यह ऐसी खोज थी जिसका इस्तेमाल " एक्स रे" से लेकर
" वायरलेस कम्यूनिकेशन " तक में आगे चलकर हुआ।
टेसला,  वेदांत की वैज्ञानिक व्याख्या करना चाहते थे।  
निकोला टेस्ला के कुछ आलेखों में ‘आकाश’ और ‘प्राण’ जैसे
संस्कृत शब्द मिलते हैं और कहा जाता है कि अमेरिका में
उनकी स्वामी विवेकानंद से  मुलाकात हुई थी।
स्वामी विवेकानंद लिखते हैं ~~
‘ मिस्टर टेस्ला सोचते हैं कि वे गणितीय सूत्रों के जरिए
बल और पदार्थ का ऊर्जा में  रूपांतरण साबित कर सकते हैं।
मैं अगले हफ्ते उनसे मिलकर उनका यह नया गणितीय प्रयोग
देखना चाहता हूं " -- (विवेकानंद रचनावली, वॉल्यूम – V)
विवेकानंद इसी पत्र में आगे कहते हैं कि, " टेस्ला का यह प्रयोग
वेदांत की वैज्ञानिक जड़ों को साबित करेगा जिसके मुताबिक
यह पूरा विश्व एक अनंत ऊर्जा का रूपांतरण है। "
स्वामी विवेकानंद ने एक पत्र में लिखा है कि "यदि टेस्ला
अपने प्रयोग में कामयाब होते हैं  तो वेदांत की
वैज्ञानिक जड़ों की पुष्टि हो जाएगी। "
Swami #Vivekananda, late in the year l895
wrote 
in a letter to an English friend,
 
"Mr. Tesla thinks he can demonstrate
mathematically 
that force and matter
are reducible to 
potential energy.
 I am to go and see him next week 
to get this new mathematical demonstration.In that case the Vedantic cosmology
will be placed 
on the surest of foundations. I am working a good deal now upon
 
the cosmology and eschatology of the Vedanta.
I clearly see their perfect union with modern science
and the elucidation of the one will be followed
 
by that of the other." (Complete Works, Vol. V, Fifth Edition, 1347, p. 77).Here Swamiji uses the terms
" force " and " matter "
for the Sanskrit terms
 " Prana " and " Akasha "   

एक बार एक मित्र ने दक्षिण भारत के एक प्राचीन पंदिर की
स्थापत्य कला के चित्र 
में ग्रेनाइट के अत्यंत चमकीले खम्भों को देखते हुए
 आश्चर्य जतलाते हुए पूछा ' अरे घोर आश्चर्य 
 है !
इन्हें आधुनिक उपकरणों के अभाव में, प्राचील काल में
किस तरह,  
इतना चमकीला पोलिश किया होगा ?'
 मेरा उत्तर था, " भारतवर्ष की भूमि पर हमारे  
ऋषि मुनियों ने
' श्रीयंत्र " के दर्शन कर उसकी आकृति को समझाया था
तब ग्रेनाईट को 
पोलिश करना कौन सा मुश्किल कार्य है ! "
 हमारे प्राचीन वांग्मय में उल्लेख है कि,
 
सदा शिवशंकर ने ' श्रीयंत्र ~ रहस्यम ' माँ पार्वती जी को समझाया था।
दक्षिण भारत में 
ऋषि अगस्त्य को, महाविष्णु ने,' हयग्रीव अवतार स्वरूप ' में
 तथा योगाचार्य पतंजलि को, 
शिवजी ने,' श्रीयंत्र रहस्य साधना' विधि
का ज्ञान प्रदान किया था। । कहते हैं " योग साधना की 
उच्चावस्था में,
माँ पराशक्ति, " श्रीयंत्र स्वरूप "के दर्शन करवा कर,
 साधक को मुक्ति 
प्रदान करतीं हैं।
श्रीयंत्र साधक को केंद्र से ब्रह्माण्ड की दिशा में ले चलते हुए,
आत्मज्ञान 
के प्रकाशित द्वार से आगे ले चलकर, परमशिव से
 साक्षात्कार करवातीं हैं। 
श्रीयंत्र का संक्षिप्त मूल मन्त्र  है : ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं
 
पूरा मन्त्र : ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमल कमलालायै
प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। 
श्रीयंत्र कामाक्षी मंदिर, मंगदु, चेन्नई में विराजित है।
काली मंदिर जयपुर में है। 
तिरुपती बालाजी मंदिर, तिरुपती में है।
 
कलिकम्बल मंदिर, चेन्नई  में है।  

निमिशम्बा मंदिर, श्रीरंगपत्तन, मैसूर में विराजमान है।
श्रृंगेरी मठ में शंकराचार्य ने प्रथम श्रीयंत्र की स्थापना की थी।
श्रीयंत्र परमात्मा की साक्षात शक्ति है। 

महाविद्या = supreme knowledge है। विश्वमोहिनी, राजराजेश्वरी,
त्रिलोकसुन्दरी देवी पाश (noose), अंकुश ( goad )
 तथा धनुषबाण धारिणी हैं।

देवी की स्तुति का श्लोक ~
" पाप हारिणीं देवी भुक्तिमुक्ति प्र्दायिनीम।
अनंता विजयां शुद्धधाम शरण्यां शिवदाम शिवाम। "

बाइबल धर्म ग्रन्थ कहता है," In the beginning
 was the WORD and the WORD was GOD "
परन्तु प्रश्न उठता है कि "यह वर्ड - शब्द क्या था ?
" उत्तर है " ॐ कार " !

ॐ 'अ ' =  व्यापक / all pervasive = spread everywhere
 ' उ ' = सूक्ष्म / minutest particle / law = नियम / intellect = बुद्धि / चेतना 

 ' म ' = अनंत / infinite / अमर = immortal अविनाशी 
अ उ म के संयुक्त होने पर ' ॐ'  उभरता है।
ॐ कार - >expands into -> 52 = बावन मूलाक्षर 

प्रश्न : अक्षर क्या है ? जो अविनाशी है।= that which never ceases - 
प्रश्न : क्षर क्या है ? वह जो क्षण क्षण झरता या समाप्त होता रहता है।
That which is becoming   less - like our human life
- every second. अक्षर = अविनाशी हैं।
that which will remain constant,
always be there - is - Alphabets अक्षर !


श्वेतेश्वरा उपनिषद, ब्रह्माण्ड पुराण महाललिता त्रिपुरसुन्दरी का रहस्य
उद्घाटित करते हुए  कहता है कि, ~~
"शिव + शक्ति = संयुक्त यंत्र को " नवयोनि मन्त्र "  कहते हैं।"
 नवयोनि = जिसमें ४ उर्ध्वगामी त्रिकोण शिव के प्रतीक हैं।
 ५  अधोगामी त्रिकोण देवी के प्रतीक हैं। श्रीयंत्र के मध्य में स्थित 

बिंदु = central dot के केंद्र में, शिव, शिवा संयुक्त स्वरूप में विराजित हैं।
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 श्रीयंत्र ध्यान में साधक की चेतना को केंद्रित करने में सहायक होता है।
 ध्यान करने से व्यक्ति में, दया करुणा,सहानुभूति, प्रेम, सत्य के प्रति आग्रह,
सत्याचरण, सु - स्वास्थ्य इत्यादि सद्गुणों का विकास होता है। 

जगद्गुरु शंकराचार्य ने ' सौंदर्य लहरी ' में पराशक्ति जगदम्बिका का
नखशिख वर्णन किया है। उदाहरणार्थ ~ 

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते ।

मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे॥
शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यंकनिलयां ।
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीं ॥८॥

सुधासागर बीच जो नंदन विपिन के
कल्पविटपों  से घिरा मणिद्वीप सुन्दर
मध्य उसके नीपतरुआवृत
सुचिन्तामणि सदन है
शिवाकार वहाँ त्रिकोणाकृतिकृता मंचस्थिता जो
हे पराम्बा चिदानन्दलहरी !
धन्य हैं वे, ध्यान जो धरते तुम्हारा 
महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं ।

स्थितं स्वाधिष्टाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि ॥
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं ।
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि ॥९॥

भेदकर तुम चक्र मूलाधार में जो स्थित धरा है
वारि जो मणिपूर, स्वाधिष्ठान में जो ज्वलित पावक
उर अनाहत चक्र का पवमान ऊपर गगनमण्डल
भेदती सब मन भृकुटि के मध्य आज्ञाचक्र में रख
सकल कुल कुण्डलिनि-पथ अवरोध का करती विभंजन
तुम परमशिव स्वपति के संग
सहस्रार सरोज में
करती रमण हो
( अनुवादक : 
~ श्री हिमांशु कुमार पाण्डेय )
ब्रह्माण्ड की समस्त ऊर्जा की स्त्रोत देवी हैं।
Parashakti is resplendant in HER DIVINE
Magnificent Glory.
Worshiping श्रीयंत्र awakens '
 Kundalini. '
श्रीयंत्र साधना से कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होती है।
कुंडलिनी शक्ति ७ चक्रों को भेदकर ऊपर उठती है।
 १) मूलाधार ~ मूलाधार चक्र : चार पंखुड़ियों वाले कमल के फूल के समान है।
यह चतुर्भुज  आकार का है। जिसके अन्दर एक त्रिकोण है। (योनि का प्रतिरूप)
 त्रिकोण में एक शिवलिंग अवस्थित है जिस पर सर्पआकार की कुण्डलिनी
 लिपटी रहती है। मूलाधार चक्र में चार नाड़ियां मिलती हैं।
 इसमें चार ध्वनियां – वं, शं, षं, सं होती हैं।
 यह ध्वनि मस्तिष्क और हृदय के भागों को कंपित करती हैं।
शरीर का स्वास्थ्य इन्हीं ध्वनियों पर निर्भर करता है।
 यह एडरीनल ग्रंथि को नियंत्रित रखता है।
रस, रूप, गंध, स्पर्श, भावों व शब्दों का मेल है।  
२) स्वाधिष्ठान ~इसके देवता श्री ब्रह्मा और सरस्वती हैं। बीज मंत्र ' वं ' है।
  ६ नाड़ियां, मिल कर ६  पंखुड़ियों वाले कमल के फूलक संरचना  करती हैं, 

 जो  दल की द्योतक है। फूल के भीतर अलग-अलग आकार के
 दो वृत्तों से बना श्वेत  अर्द्ध चन्द्र स्थित होता है।
 आकार गोल  व रंग नारंगी  है। अर्द्ध चन्द्र इसका यंत्र है।
 इस चक्र में ध्वनियां – बं, भं, मं, यं, रं, लं आती रहती हैं।

स्वाधिष्ठान चक्र अवचेतना और भावना से सम्बंधित है।
 यह मूलाधार चक्र से सम्पर्क रखता है।
स्वाधिष्ठान चक्र में संस्कार सुषुप्त रहते हैं और मूलाधार में वे अभिव्यक्त होते हैं।

३)मणिपुर ~ मणिपुर चक्र नाभि में स्थित होता है।
इसमें १०  पंखुड़ियों वाला कमल होता है जिस का रंग पीला होता है।
 
चिन्ह नीचे की ओर इंगित करता त्रिकोण है,
 जिसमें तीनो तरफ ' स्वास्तिक ' बना होता है।
 इस चक्र में ध्वनियां – डं, ढं, तं, थं, धं, नं, पं, फं, बं निकलती हैं।
यह अग्नि तत्व प्रधान है और सूर्य तथा अहंकार का द्योतक है।
यह चक्र सूर्य की भांति पूरे शरीर में, प्राण ऊर्जा का संचार करता है
तथा पोषण करता है। यह आमाशय, यकृत, पित्ताशय,
अग्न्याशय और अधिवृक्क से सम्बंधित है।
 
इसके देवता श्री विष्णु लक्ष्मी हैं और बीज मंत्र ' रं ' है।

४) अनाहत (ह्रदय ) ~ चक्र में १२  पंखुड़ियां वाला कमल  है।
 इस स्थान पर १२  नाड़ियां मिल कर १२  पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की
 आकृति बनाती हैं। चिन्ह दो त्रिकोण हैं, एक नीचे इंगित करता है
तो दूसरा ऊपर इंगित करता है। यह मध्य चक्र है।
अर्थात तीन चक्र इसके ऊपर और तीन चक्र इसके नीचे होते हैं।
इसका रंग हरा होता है, द्वितीय चक्र का  रंग गुलाबी है।
इसका व्यास छः सेंटीमीटर होता है।
इस चक्र से ध्वनियां – कं, खं, गं, घं, डं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं निकलती हैं।
इस चक्र की देवी श्री जगदम्बा माँ हैं व  बीज मंत्र ' यं ' है।
५) विशुद्ध चक्र  आज्ञाचक्र ( दो भौंहों के मध्य बिंदु में स्थित)  ~
 इसमें १६  पंखुड़ियों वाला कमल होता है। इसका रंग आसमानी होता है।
 चिन्ह अर्द्धचंद्र है। इसका व्यास छः सेंटीमीटर  है।
इस चक्र में अ से अः तक १६  ध्वनियां निकलती हैं।यह चक्र आकाश तत्व प्रधान है। इस तत्व पर मन को एकाग्र करने से
 मन आकाश तत्व के समान शून्य व  शुद्ध हो जाता है। 
इस चक्र के देवता श्री कृष्ण राधा हैं और बीज मंत्र ' हं ' है। 
६) आज्ञाचक्र : गुरु ग्रंथि : शिव नेत्र : दिव्य  चक्षु :
इसकी दो पंखुड़ियां आत्मा-परमात्मा, तर्क-वितर्क,
पिनियल-पिट्यूट्री, इड़ा-पिंगला और नर-नारी को इंगित करती है।
सारी द्विविधता (Duality) यहीं मिलती है।
 इसमे एक त्रिकोण है, जो योनि का द्योतक है।
इस त्रिकोण में एक श्वेत लिंग है।
इसका रंग गहरा नीला होता है।
मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव करती है।
 यह हार्मोन सोने या जागने की क्रिया को नियंत्रित करता है।
 
इस स्थान पर पिनियल और पिट्यूट्री ग्रंथियां मिलती हैं।मूलाधार से इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना अलग-अलग प्रवाहित होती हुई
इसी चक्र पर मिलती हैं और चैतन्यता की एक धारा के रूप में
" सहस्रार " को जाती हैं। योग में इस चक्र को ' त्रिवेणी '  कहा गया है।
 योग ग्रंथ में इसके बारे में यह कहा गया है। ।

" इड़ा भागीरथी गंगा पिंगला यमुना नदी।
    तर्योमध्यगत नाड़ी सुषुम्नाख्या सरस्वती।।"
इड़ा को गंगा, पिंगला को जमुना और सुषुम्ना नाड़ी को सरस्वती कहा गया है।
 
योगियों को ईश्वरीय अन्तरदृष्टि व  श्रुतिप्रकाश इसी चक्र से मिलता है।
 यहीं पहुंच कर मनुष्य को मोक्ष का द्वार दिखलाई देता है।
यहीं चरमानन्द, अतिसंवेदन-बोध, सूक्ष्म दृष्टि, अतीन्द्रिय श्रवण,
अन्तरज्ञान तथा असाधारण शक्तियां प्राप्त होती हैं।
इसी छठे चक्र में मनुष्य को दूरबोध (Telepathy) ज्ञान प्राप्त होता है।
 जीव को " पुनर्जन्म का ज्ञान " होता है।
आज्ञा चक्र मन व  बुद्धि का मिलन स्थान है।
यह उर्ध्व शीर्ष बिन्दु ~  मन का स्थान है अतः  इसे ' रुद्र ग्रंथि ' कहते हैं।
सुषुम्ना मार्ग से आती हुई कुण्डलिनी शक्ति का अनुभव - योगी को
यहीं आज्ञा चक्र में होता है। 
संवेदनाओं और पांच तत्वों के परे
छठा चक्र, सूर्य और चन्द्रमा से प्रभावित होता है।
इसकी धातुएं स्वर्ण व  रजत हैं। इसका बीज मंत्र ' शं ' है।

इसे " pineal gland " कहते हैं - 

यहां तक कुंडलिनी शक्ति, इड़ा व पिंगला तथा मध्य में स्थित
 सुषुम्ना नाड़ी से उठती हुई, ऊपर की दिशा में - आगे बढ़ती है।
मनुष्य के शरीर में 'pineal gland ' अति महत्त्वपूर्ण स्थान है।

Pineal Gland पर एक अति महत्त्वपूर्ण लिंक  :
http://powerthoughtsmeditationclub.com/the-pineal-gland-symbol-of-manifestation-the-sri-yantra/
आज्ञा चक्र से आगे बढ़कर, कुण्डिलिनी शक्ति, " सहस्त्रसार "
मस्तिष्क के ऊपर पहुँचती है।
कुंडलिनी के सहस्त्रसार पहुँचने से, आत्मा का ब्रह्माण्ड से ऐक्य स्थापित होता है।
सहस्त्रसार : सहस्रार चक्र, मस्तिष्क के ऊपर ' ब्रह्मरंध ' में उपस्थित होता है।
६  सेंटीमीटर व्यास के, एक अध खुले हुए कमल के फूल के समान होता है।
ऊपर से देखने पर, इसमें कुल ९७२  पंखुड़ियां दिखाई देतीं  है।
नीचे ९६०  छोटी-छोटी पंखुड़ियां व उनके ऊपर मध्य में
१२  सुनहरी पंखुड़ियां ~  सुशोभित रहती हैं।
इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहते हैं।
इसका चिन्ह खुला हुआ कमल का फूल है।यह  असीम आनन्द का केन्द्र  है।
इस में इंद्रधनुष के सारे रंग दिखाई देते हैं लेकिन प्रमुख रंग बैंगनी होता है।
 इस चक्र में ' अ से क्ष ' तक के  सभी स्वर व ' वर्ण ध्वनि ' उत्पन्न होती है।
 पिट्यूट्री और पिनियल ग्रंथि का आंशिक भाग, इससे सम्बंधित है।
 यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा है और दाई आंख को नियंत्रित करता है।
यह आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, एकीकरण, स्वर्गीय अनुभूति के विकास का
 मनोवैज्ञानिक केन्द्र है।
 आत्मा का उच्चतम स्थान है।इसका विस्तार, रंग, गति, आभा और बनावट देख कर व्यक्ति की चैतन्यता,
आध्यात्मिक योग्यता और अन्य चक्रों से समन्वय का अनुमान लगाया जा सकता है।
अच्छा योगाभ्यास करने वाले साधक का चक्र, ओजस्वी और चमकदार होता है।
यह ईश्वरधाम और मोक्ष का द्वार है। साधक अपनी कुण्डलिनी
जाग्रत कर लेते हैं तो कुण्डलिनी पहले बाल रूप बाला त्रिपुरा सुन्दरी के रूप में
 ऊपर उठती है। थोड़ा और ऊपर पहुंचने पर, वह यौवन को प्राप्त कर
 ' राजराजेश्वरी ' का रूप धरती है।  सहस्रार चक्र तक वह संपूर्ण स्त्री
' माता ललिताम्बिका ' का रूप धरती है।
जो साधक कुण्डलिनी को सहस्रार तक ले कर आते हैं,
वे परमानन्द को प्राप्त करते हैं।  जिसकी सर्वोच्च अवस्था समाधि है।
 कुण्डलिनी के इस जागरण को, शिव और शक्ति का मिलन कहते हैं।
 इस मिलन से 'आत्मा का स्वतंत्र अस्तित्व ' समाप्त  हो जाता है।
आत्मा ~  परमात्मा में लीन हो जाती है। 
यह वास्तव में चक्र नहीं है ~
 बल्कि साक्षात तथा सम्पूर्ण परमात्मा और आत्मा है।
इसके देवता श्री भगवान शिव हैं और बीज मंत्र ' ॐ ' है।

प्र
त्येक चक्र को एक विशेष रंग में प्रदर्शित किया जाता है एवं उसमे
कमल की एक निश्चित संख्या में पंखुड़ियां होती हैं।
हर पंखुड़ी में, संस्कृत का एक अक्षर लिखा होता है।
 इन अक्षरों में से एक अक्षर उस चक्र की मुख्य ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है।
ये चक्र प्राण ऊर्जा के कैंद्र हैं। यह प्राण ऊर्जा, कुछ वाहिकाओं में बहती है,
जिनको नाड़ियां कहते हैं। सुषुम्ना एक मुख्य नाड़ी है, जो मेरुदन्ड में
अवस्थित रहती है, दो पतली इड़ा और पिंगला नाम की नाड़ियां हैं
जो मेरुदन्ड के समानान्तर क्रमशः बाई और दाहिनी तरफ उपस्थित रहती हैं।
इड़ा और पिंगला मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों से, संबन्ध बनाये रखती हैं।
पिंगला, बहिर्मुखी सूर्य नाड़ी है जो बाएं गोलार्ध से संबन्ध रखती है।
 इड़ा, अन्तर्मुखी चंद्र नाड़ी है , जो दांयें गोलार्ध से संबन्ध रखती है। 
कुंडलिनी चक्र के लिए इमेज परिणाम

यह सप्त चक्र, संस्कृत देववाणी के बावन ५२ मूलाक्षरों के प्रतीक हैं।
५२ मूलाक्षर पुनः 
एक ॐ कार में विलीन हो जाते हैं।
 यह word sound - ॐ है।  

प्रश्न : मन्त्र क्या हैं ?
उत्तर :  मन्त्र कविता है  वाणी है  या पद्य स्वरूप हैं। वे  हमें शरीर के बंधन से
           मुक्ति के द्वार तक ले चलने में सहायक होते  हैं। 

Q : What are MANTRAS ?
A: " Mantra are set as speech, poem or verse
which set us free of 
physical bondage
they help us to think, meditate, & realize 

our potential & help us from Being to Becoming ! "
प्रश्न : श्लोक क्या हैं ? वे  २ पंक्तियों के होते हैं तथा  छंद बद्ध होते हैं।
वैदिक छंद :  अतिजगती, गायत्री, त्रिष्टुप, द्विपदा विराट, धृति, पंक्ति,प्रस्तार पंक्ति,
               बृहती, महाबृहती, श्कचरी, अतिशक्वरी, उष्णिक्, अत्यष्टि, अनुष्टुप
                  इत्यादि हैं।  उदाहरण : अनुष्टुप छंद   ऋग्वेद, वाल्मिकी रामायण,
                   महाभारत इत्यादि अनेक ग्रंथों में प्रयुक्त हुआ है।
Q: what is a SHLOKA ?
A: Shloka is made up of 2 lines + set to a meter. 

Here are some exampleas of meters from
 the Vedic time.
Ati Jagti, Gayatri, Trishtup,Dwipada,Virat,
Dhruti,Pankti
Prastar Pankti, Brihati,Maha Brihati,
Shakchri, Ati Shakchari
Ushnik, Atyashti, Anushtup etc.
Anushtup Meter is used in
Rig Veda, Valmiki Ramayan & Mahabharat
& many old Texts
The Unseen, the Omnipotent, the unexplainable
 or GOD 
can not be explained,
comprehended nor understood 

with our feeble thoughts, ideas, and limited language
nor can we humans  rationalize precisely
or set in expression 
which is most difficult to define
or comprehend with our logic 

or with limitations of our human mind.
If I succeed in my humble explanation
of this most complex
ENTITY of  " SHREE  YANTRA "
here & now then me & you ,
may get NIRVANA here & now !
Let us PRAY & invoke the
Blessings of " THAT ONE
 " = सच्चिदानंद = SAT CHITT ANAND
 ~~~~ * THAT ART THOU =तत त्वं असि।* ~~ ~ 
 ॐ तत सत ! ॐ।  
~~ लावण्या : Lavanya

 


 

Tuesday, September 25, 2018

सँस्मरण : भारतीय हिंदी और अमरीका

सँस्मरण : भारतीय हिंदी और  अमरीका :

प्रश्न : भारतीय जन - उत्तर अमरीका कब पहुंचे ? 
उत्तर : सं. १७९० मेँ, सबसे पहले, काला सागर पार कर के, भारतवर्ष के दक्षिण पूर्व में बसे मद्रास शहर  जिसे आज चेन्नई नाम से पहचाना जाता है वहाँ  से चले के एक अनाम व्यक्ति, उत्तर अमरीकी धरा के उत्तर पूर्वीय दिशा में स्थित अटलांटिक महासागर किनारे पर बसे मेसेच्य्सेट्स प्रांत के सेलम शहर की गलियोँ मेँ पहली बार पहुँचे थे।  
      
समय की धारा आगे बढती रही  और सं. १८२० से १८९८ तक ५२३ और भारतीय लोग अमरीका तक आये। सं. १९१३ तक ७००० और भारतीय भी अमरीका आ पहुंचे। 
सं. १९७१ मेँ, अमरीका में स्थापित केंद्र सरकार जिसे ' कोन्ग्रेस ' कहते हैं  इस कॉंग्रेस समिति ने भारतीयों के अमरीका आगमन पर रोक लगाई ।  
       
समय आगे बढ़ा।  सं. १९४३ मेँ जब चीन के अमरीका में आये अप्रवासीयोँ पर से रोक हटाई गई तब प्रेसीडेन्ट रुज़वेल्ट के बाद प्रेसीडेंट ट्रूमेन का  शासन काल था। 
३ जुलाई १९४६ मेँ " एशियन अमेरीकन सिटीज़नशीप एक्ट " पारित किया गया। भारतभूमि पर सं. १९४३ में,  ब्रिटिश हुकूमत की पकड़ इस समय कायम थी। विश्व युद्ध से सम्पूर्ण विश्व में अशाँति का वातावरण फैला हुआ था। 
                           
उत्तर अमरीका के पश्चिमी छोर पर, उस वक्त  "हिन्दी असोशीयेन फ पसेफिक कोस्ट " सँस्था की स्थापना हो चुकी थी। इस सँस्था  ने तारीख १ नवम्बर १९१३ में अपनी मुख पत्रिका "गदर"  मेँ निम्न घोषणा प्रकाशित की थी ~ 
" हम आज विदेशी भूमि पर अपनी भाषा मेँ, 
ब्रिटीश सरकार के विरुध्ध युध्ध की घोषणा करते हैँ "  इस सँस्था से सँबध्ध रखनेवाले भारतीय व्यक्ति थे ~ लाला हरदयाल, दलित श्रमिक मँगूराम और १७ वर्षीय इँजीनीयर करतार सिँह सरापा जैसे साहसी  कार्यकर्ता । 
'स्वातंत्र्यवीर  सरापा ' का नाम इतिहास की विशाल पोथी में कहीं खो गया है किन्तु आज हम श्रद्धा से नमन करते हुए, वीर सरापा को कर बद्ध श्रद्धांजलि देते हैं। 
 १६ नवम्बर १९१५ के अपयशी दिन, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपने स्वतन्त्र विचार प्रकट करने के जुर्म में - १९ वर्षीय सरापा को भारत मेँ, फाँसी की सज़ा देते हुए मौत की सज़ा हुई । शहीद भगत सिँह -वीर  सरापा को अपना गुरु मानते थे । 
 वीर सरापा का अँतिम गीत था,  
" यही पागे, मशहर मेँ जबाँ मेरी बयाँ मेरा,
मैँ बँदा हिन्दीवालोँ का हूँ खून हिन्दी, जात हिन्दी,
यही मज़हब, यही फिरका,यही है, खानदाँ मेरा !
मैँ इस उजडे हुए भारत के खँडहर का ही ज़र्रा हूँ 
यही बस पता मेरा, यही बस नामोनिशाँ मेरा !"

ना जाने सरापा की अस्थियाँ गँगा मेँ मिलीँ या नहीँ ?? :-((
     सँत विनोबा भावे जी का कहना है कि " हिन्दी भाषा भारती, सँस्कृत की ज्येष्ठ पुत्री है ! आज हिन्दी भाषा की भागीरथी ~ विश्व के हर भूखँड मेँ बह रही है !जहाँ कहीँ एक भारतीय बसता है। हिँदी बोलनेवाला जहां कहीं भी रहता है, हिंदी भाषा वहां आबाद है। मेरी कविता ने कहा है, हम भारतीय जन मन मेँ कहीँ गँगा छिपी हुई है 
गँगा आये कहाँ से रे गँगा जाये कहाँ रे, लहराये पानी मेँ जैसे धूप ~ छाँव रे "
गायक श्री हेमँत दा की सौम्य स्वर लहरी जब भी सुनतीँ हूँ तब हिन्दी भाषा का मनोमुग्धकारी विन्यास, मन को ठीठका देता है, स्तँभित कर देता है !
यादें ~~ 
केलेन्डर के पन्ने सरसर्राते हुए, सालोँ की समँदर सी फैली धारा को पार करते 
सं. २००७ मई माह के समापन पर रुकी है। जून माह के बाद जुलाई मेँ, अँतराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन न्यु -योर्क शहर मेँ सम्पन्न हुआ था । 
यह हिन्दी का " परदेस " की भूमि पर हो रहा "महायज्ञ "ही  था। पिछले कई इसी तरह के सम्मेलनोँ मेँ-  हिन्दी की महान कवियत्री आदरणीया श्री महादेवी वर्मा जी ने भी समापन भाषण दिया था। 

 भाषा - भारती "हिन्दी" को युनाइटेड नेशन्स मेँ स्थान मिले ये कई सारे भारतीय मूल के भारतीयोँ की एक महती इच्छा है। यह  स्वप्न सत्य हो यह  आशा आज बलवती हुई जा रही है।  इस दिशा मेँ बहुयामी प्रयास यथासँभव  जारी हैँ। देखना यह  है कि उत्तर अमरीका के न्यु -योर्क शहर मेँ स्थित -  अन्तर्राष्ट्रीय सँस्था U.N.O. = ( यु.एन्.. )कितनी शीघ्रता बरतता है "हिन्दी" को स्वीकार करने मेँ ! 


न्यु योर्क शहर का इलाका जो मुख्य है उसे "मेनहेट्टन " कहा जाता है। 

इस का बृहद प्रदेश " न्यु -योर्क " कहा जाता है। 
न्यु -योर्क  का चहेता नाम है,  'बीग ऐपल" या फिर "गोथम सीटी '
 
 भौगोलिक स्तर पर यह  भूभाग पाँच खँडो मेँ बँटा हुआ है। जिन्हें  "बरोज़" कह्ते हैँ  नाम हैँ ~ ब्रोन्क्स, ब्रूकलीन,मनहट्टन, क्वीन्स और स्टेटन आइलेन्ड। 
इस भूभाग को ' डच ' मूल के लोगोँ ने सं. १६२५ मेँ बसाया। कुल  ३२२ क्षेत्रफल या ८३० किलोमीटर मेँ फैला यह विश्व का बृहदतम शहरी इलाका है जिसकी आबादी 
१८ .८ कोटि जन से अधिक है। यहाँ विश्व के हर देश व भूखंड से आये  लोग आपको दिखाई देंगें।
       ऐसे महानगर मेँ भारतीय दूतावास के सौजन्य से व भारतीय विध्या भवन के सँयोजन से (जिसके कर्णधार श्रध्धेय डो.जयरामन जी हैँ ), 
हिन्दी भाषा अंतर राष्ट्रीय सम्मेलन  होने जा रहा है। इस सम्मेलन मेँ कई सारे लोग, कमिटी मेँ काम कर रहे हैँ। स्वेच्छा से कार्य भार उठाये अपने रोजमर्रा के बहुयामी, व्यस्त जीवन से समय प्रदान करते हुए सहर्ष - सारी गतिविधियोँ मेँ हिस्सा ले रहे हैँ। 
जाहिर है कि जो सारे हिन्दीवाले न्यु योर्क शहर के आस पास रहते हैँ वे श्रमदान देने मेँ सक्षम हैँ। मेरी तरह हज़ारोँ मील दूरी के शहर मेँ रहनेवाले हिन्दी प्रेमीयोँ को इस समय बेसब्री से इँतज़ार करना ही नसीब है और सोचना कि, ' कब हम इस भव्य कार्यक्रम मेँ शामिल होंगें ! 'उत्साह इस बात का भी है और एक तरह की उत्कँठा भी है कि, " क्या होगा वहाँ पर ?"
आयोजन की सफलता पर सँदेह नहीं। परँतु यह  आशँका है कि, इस सम्मेलन के बाद अँतराष्ट्रीय स्तर पर  क्या हिन्दी को सम्मानित दर्जा, मिल सकेगा ?? या सिर्फ बुध्धीजीवी वर्ग की चेतना से जुडी हिन्दी भाषा -महज  सीमित दायरोँ मेँ बध्ध होकर प्रबुद्ध या ईलीट वर्ग की भाषा ही रह जायेगी? 
             हिन्दी के उत्थान मेँ कार्यरत अनेक हिन्दी प्रेमीयोँ से वहाँ मुलाकात होगी ये तथ्य उत्साह दे रहा है। "अभिव्यक्ति " व अनुभूति " की सँपादीक कवियत्री श्रीमती पूर्णिमा बर्मन जी सुना है शारजाह ( यु.ए.ई.) से पधार रहीँ हैँ। जिन से मेरी मुलाकात "काव्यालय" जाल घर के सौजन्य से करीब सं. १९९३ के करीब हुई थी। जब मैँने उन के लिखे कुछ दोहे उनकी वेब - पत्रिका पर  पढे और "ई- मेल"  से सम्पर्क किया था। जालघर ' काव्यालय ' = जिसे वाणी मुरारका जी ने स्थापित किया है और  वे कलकत्ता से संचालित  करतीँ हैँ काव्यालय पर  कई सारी हिन्दी काव्य रचनाओं का अनूठा  सँग्रह उपस्थित है।सुश्री वाणी मुरारका ने प्रोध्योगिकी विषय का सफ़ल उपयोग करते हुए व विश्वजाल मेँ हिन्दी के बढते कदम की नीँव रखी है और अपने जालघर पर अथक परिश्रम किया है। वे खुद भी अच्छी कविताएँ लिखतीँ हैँ और अपने वेब -मगेज़ीन मेँ निश्पक्षता से कई हिन्दी लिखनेवालोँ को स्थान देतीँ आयीँ हैँ और हिन्दी के लिये गहरी सँवेदना रखतीँ हैँ। 
        ख्यातनामा हास्य रस के सम्राट श्रीमान अशोक चक्रधर जी का आगमन भी सँभाव्य है ! अनुमान है कि, वे कवि सम्मेलन मेँ हमेशा की तरह छा जायेँगे और एक बार फिर, अपना लोहा मनवाते हुए सुननेवालोँ को हँसाते हुए लोट पोट करेँगे। 
 उनकी हास्य कविता मे समाज की विषम परिस्थितीयोँ को परखने की तीव्र द्र्ष्टि है जो हल्के से बात कह जाती है और बाद मेँ श्रोतागण देर तक सोचते रह जाते हैँ !
" सृजनगाथा " के भीष्म पितामह श्रीमान जयप्रकाश मानस  जी के आगमन से हिन्दी के कार्य को बल मिलेगा।  उनकी पैनी निगाह से विश्वजाल की कोई भी प्रगति, दिशा या आविष्कार अछूता नहीँ ! वे बहुआयामी पत्रिका के सफल सँपादक ही नही है, अपितु बडे धैर्य से छत्तीसगढ जैसे भारत के एक ग्रामीण व शहरी अँचलोँ की दोहरी सँस्कृति को समेटे, अपने निबँधो मेँ सँयत भाषा प्रयोग करते हुए, कम शब्दोँ मेँ बहुत कुछ कह जाते हैँ। 
 हिन्दी के इस महायज्ञ मेँ इन सारे महानुभावोँ की " आहुति", " यज्ञ ज्वाला "  को परिमार्जित करते हुए यशस्वी बनायेगी ये मेरा विश्वास है। 
      यहाँ अमरीका मेँ बसे, श्री अनूप भार्गव जी, डो. अँजना सँधीर जी,रससिध्ध कवि श्रीमान राकेश जी खँडेलवाल, कनाडा से कवियत्री श्रीमती मानोशी चटर्जी,श्री समीर लाल जी इत्यादी कई सारे लोगोँ के आने की सँभावना है। 
भारत सरकार के बाहरी गतिविधियोँ के मँत्री मँडल ने ( External Affairs Ministry ) यह आँठवा -८वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन, १३, १४ और १५ जुलाई के तीन दिनोँ मेँ न्यु योर्क शहर मेँ आयोजित करना तय किया तब उस स्थल का भी चुनाव हुआ जहां सभागार होगा। 
" फेशन इन्स्टीट्य्ट फ टेक्नोलोज़ी "  (जो कि २७ वीँ गली - ७ वेँ एवेन्यु पर स्थित है ), वहाँ सम्पन्न होना निस्चित्त किया गया है। 
उत्तर अमेरीका के प्रमुख सँघ जैसे कि,  " अँतराष्ट्रीय हिन्दी समिती" "विश्व हिन्दी न्यास " - "विश्व हिन्दी समिती "  इत्यादी को भारतीय विध्या भवन के अँतर्गत, इस कार्यक्रम को सफल बनाने की जिम्मेदारी सौँपी गयी है। 
       हर हिन्दी भाषा के चाहनेवालोँ की दुआएँ, प्रार्थनाएँ  इस अंतर राष्ट्रीय सम्मेलन से साथ सँलग्न हैँ। सभी की इच्छा यही है कि आगे, हिन्दी का मार्ग प्रशस्त हो !
सँभावनाएँ कई हैँ ! किन्तु
, आगे, मार्ग सर्वथा अनदेखा व अन्चिन्हा है ! परँतु हिंदी भाषा के प्रति प्रेम उत्साह व समर्पण एक निस्वार्थ परिश्रम से जुड़ा हुआ है व हिन्दी प्रेम के सम्बल में  लिपटा हुआ है।  
     यदि हिन्दी भाषा जीवित रहेगी, फूलेगी - फलेगी तभी तो हमारी भारतीय सँस्कृति, हमारा वाङमय, हमारी धरोहर इत्यादि भी सुरक्षित रह पाएंगें व् आगामी पाढ़ी तक आगे जायेंगें  !
      जीवन यापन की आपाधपी मेँ, भारतमाता के बालक, दुनिया के सात सँमँदर पार कर के, विभिन्न प्रेदेशोँ मेँ जा बसे हैँ ! परन्तु भारतीय जन जहां कहीं भी रहें हों  
अपने त्योहारोँ को मनाते समय, वे भारत भूमि से सीधा सँबँध स्थापित कर लेते हैँ। 

   गहरे महासागर के जल के ठीक बीचोँबीच एक शाँत, द्वीप की भाँति हमारी सभ्यता का दीप प्रज्वलित है।भारतीय अस्मिता का  प्रतीक " भारतीय सभ्यता स्वरूप माटी का एक नन्हा दीप " भारत वर्ष की अखँड महा ज्योति का प्रकाश फैलाता, विश्व के कोने कोने में अहर्निश ~ अकँपित जलता रहा है। इस दीप की ज्योति, भारतीय मानस की ज्योति है। हमारे पुरखोँ के पुण्यबल की आस्था  का प्रतीक है यह माटी का दीपक !
         परमात्मा श्री कृष्ण से यही माँगती हूँ कि इस " दिये " का तेल कभी ना घटे !
सं. २००७ से इस दीप का प्रकाश और भी प्रखर होकर विश्व की पीडित, दमित, थकी हुई प्रजा को भौगोलिक परिस्थितीयोँ से परे ले जाकर, आत्म विश्लेक्षण का अवसर दे भारत वर्ष के तपः पूत ऋषियों के उदगार ॐ शान्तिः शान्तिः का चिर शाँति  पाठ पुनः दोहराया जाये।  जिस से "विश्व - शाँति " का बीज, पल्लवित हो ! 
         भारत के विशाल वटवृक्ष - बरगद की तरह  भारतीय सभ्यता विश्व में बसे प्रत्येक प्राणी को छाँव देने की क्षमता पुनः स्थापित करे और विश्व शाँति चिर स्थायी हो ! अस्तु .........आइये, हम और आप, हर प्रकार की पूर्व ग्रँथि को खोलकर, एक जुट हों। हम यथासँभव योगदान करेँ ताकि भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का परचम विश्व पर माँ के आँचल की सी सुखद छाया बन कर फहराए और भारत भारती - अँतराष्ट्रीय स्तर पर अपना गौरवपूर्ण स्थान ग्रहण कर सके। 
हिन्दी भाषा की गरिमा फिर एक बार, भारतेन्दु हरिस्चन्द्र जी के शब्दोँ को चरितार्थ करे " निज भाषा उन्नति ही उन्नति का मूल है "
, प्रण करेँ हिन्दी सेवा का, हिन्दी प्रेम का !
" जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरीयसी".
...........सत्यमेव जयते !

Friday, August 31, 2018

माँ धरती प्यारी

कितनी सुँदर अहा, कितनी प्यारी,
ओ सुकुमारी, मैँ जाऊँ बलिहारी
नभचर, थलचर,जलचर सारे,
जीव अनेक से शोभित है सारी,
करेँ क्रीडा कल्लोल, नित आँगन मेँ,
माँ धरती तू हरएक से न्यारी !
अगर सुनूँ मैँ ध्यान लगाकर,
भूल ही जाऊँ विपदा,हर भारी,
तू ही मात, पिता भी तू हे,
भ्राता बँधु, परम सखा हमारी !
 [Frangipani+Flowers.jpg]

दिवा -स्वप्न
~~~~~~~~~~~~
बचपन कोमल फूलोँ जैसा,
परीयोँ के सँग जैसे हो सैर,
नर्म धूप से बाग बगीचे खिलेँ
क्यारीयोँ मेँ लता पुष्पोँ की बेल
मधुमय हो सपनोँ से जगना,
नीड भरे पँछीयोँ के कलरव से
जल क्रीडा करते खगवृँद उडेँ
कँवल पुष्पोँ,पे मकरँद के ढेर!
जीवन हो मधुबन, कुँजन हो,
गुल्म लता, फल से बोझल होँ
आम्रमँजरी पे शुक पीक उडे,
घर बाहर सब, आनँद कानन हो!
कितना सुखमय लगता जीवन,
अगर स्वप्न सत्य मेँ परिणत हो!

तुहीन और तारे 
~~~~~ ~~~~~~ ~~~~ 
आसमाँ पे टिमटिमाते अनगिनत 
क्षितिज के एक छोर से दूजी ओर 
छोटे बड़े मंद या उद्दीप्त तारे !
जमीन पर हरी डूब पे बिछे हुए 
हर हरे पत्ते पर जो हैं सजीं हुईं 
भोर के धुंधलके में अवतरित धरा 
पर चुपचाप बिखरते तुहीन  कण !
देख उनको सोचती हूँ मैं मन ही मन 
क्यों इनका अस्त्तित्त्व, वसुंधरा पर ?
मनुज भी बिखरे हुए जहां चहुँ ओर 
माँ धरती के पट पर विपुल विविधत्ता 
दिखलाती प्रकृति अपना दिव्य रूप 
तृण पर, कण कण पर जलधि जल में !
हर लहर उठती, मिटती संग भाटा या 
ज्वार के संग कहती , श .... ना कर शोर !
-- लावण्या दीपक शाह 

Monday, August 27, 2018

सत चित्त आनंद = सच्चिदानंद

ॐ 
सत~ चित्त~ आनंद = सच्चिदानंद 


ईश्वर का स्वरूप क्या है ? क्या हो सकता है ? जब ऐसा प्रश्न अंतर्मन में रमण करे तब जानिये कि, आप पर परम कृपालु ईश्वर की महती कृपा है। 
ईश्वर क्या है ? इस प्रश्न  को हमारे भारत वर्ष के पुरातन युग से आधुनिक युग पर्यन्त, हर सदी में मनीषियों ने, धर्म पिपासु जन ने, धर्म पथ पर चले वाले हर जीव ने, हरेक मुमुक्षु व संत जनों ने, अपनी प्रखर साधना से, अपने ही अंत:करण में देखा ! यह विस्मयकारी सत्य को  माना कि, जीव भी परब्रह्म का अंश है  ! 
        
परंतु जो सर्वत्र व्याप्त है, जो सर्व शक्तिमान है, अनंत है  व कल्पनातीत है, हर व्याख्या से परे है जिसे परमात्मा कहते हैं उन्हें हम मनुष्य, साधारण इन्द्रियों द्वारा पूर्णतया जान नहीं पाते ! यह सत्य,  ज्ञानी व मुमुक्षु ही जान पाए !      कुछ विरले, परमहंस, स्वानुभूति से उस परम पिता ईश्वर  के
 ' सच्चिदान्द स्वरूप को पहचान पाए और उन्होंने कहा कि, 
यही ' ईश्वर ' हैं, परमात्मा हैं - आनंदघन ' हैं ! 
     ॐ नमो भगवते वासुदेवाय :
Picture
सच्चिदानंद रुपाय  विश्वोतपत्यादि हेतवे
तापत्रय विनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नमः
भावार्थ : वह जो संपूर्ण जगत की उत्पति, पालन एवं प्रलय के हेतु हैं, जो तीनो प्रकार के ताप (भौतिक, दैविक एवं आध्यात्मिक) को मिटाने वाले हैं उन सच्चिदानंद परमात्मा श्री कृष्ण को नमन है|
 

        अत: ईश्वर  का सामीप्य व सायुज्य प्राप्त  करने के लिए जीव के लिए आवश्यक हो जाता है क, सदैव सजग रहने के साथ साथ हम मनुष्य, तन धारी जीव, अपनी आत्मा के भले के लिए सदैव उस पूर्ण आनन्द स्वरूप  ' सच्चिदान्द ' परमात्मा को प्राप्त करने, प्रयास रत रहें। 


                
जीवात्मा को  ध्यान ये रखना है कि, सच्चा आनंद, विषय सुख या विषय प्राप्ति या  विषयों के उपभोग से नहीं किन्तु सद्गुणों के निरंतर विकास से ही संभव है। जितने भी सद्गुण हैं वे परम कृपालु ईश्वर कृपा से संभाव्य हैं। 
उन्हीं की कृपा से दीप्त हैं और उन्हीं के अंश से  उजागर हैं। अब ये भी जानना आवश्यक है कि, सद्गुण कौन, कौन से हैं ? तो वह हर जीव को सदैव ' प्रियकर ' लगते हैं वही सद्गुण कहलाते हैं। जो हमें स्वयम के लिए रुचिकर लगता है वही अन्य जीव को भी लगता है। जैसे हर जीवात्मा को मुक्त रहना सहज लगता है। बंधन कदापि सुखद नहीं लगता ! ठीक वैसे ही प्रत्येक जीवांश को मुक्त रहना पसंद है ! अन्य सद्गुण भी हैं  जैसे दया, करूणा, ममता, आत्मीयता, मानवता, स्वछता, वात्सल्य, अक्रोध, अशोच्य, सहिष्णुता इत्यादि। सर्व जीवों के प्रति आत्मीय भाव होना, बहुत बड़ा सद्गुण है। यह आत्मीयता का बोध, ईश्वर के अंश से ही दीप्तिमान है। जब उपरोक्त  सद्गुण से मनुष्य, या जीवात्मा, प्रत्येक जीव के प्रति आत्मीयता का भाव साध लेता है तब वह परब्रह्म को जानने के दुर्गम मार्ग पर अपने पग बढाने लगा है यह भी प्रकट हो जाता है। इस कारण, त्याज्य दुर्गुणों से सदा सजग रहें जो जीवात्मा के उत्त्थान में बाधक हैं। 
         जीवात्मा को यथासंभव, आत्मा का जहां निवास है उस शरीर का जतन करते हुए, अर्जुन की तरह लक्ष्य संधान कर, अपना सारा ध्यान परम कृपालु परमात्मा, सच्चिदानंद, परब्रह्म, ईश्वर की ओर सूरजमुखी के पुष्प की भाँति अनिमेष, अहर्निश, द्रष्टि को बांधे हुए, चित्त को एकाग्र भाव से अपने  दैनिक कर्म करते रहना चाहीये। तब आप विषयों के प्रति आसक्ति से मुक्त होकर, तटस्थता प्राप्त करने में सफल हो पायेंगें हर जीव के लिए अनेकानेक व्यवधान व बाधाएं उत्पन्न होकर, आत्मा के उत्सर्ग में बाधक बनतीं हैं।उन बाधाओं से आँखें मिलाकर, चुनौती स्वीकार कर, आत्म उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहना सच्ची  वीरता है। 
गुजरात भूमि के संत कवि नरसिंह मेहता  ने गाया है, 
' हरी नो मारग छे शूरा नो, ( आत्म उन्नति = प्रभु भक्ति, वीरों का मार्ग है )
  नहीं कायर नू काम जोने,( यह - कायरों के बस की बात नहीं ! )
  परथम पहलु मस्तक मुकी ( ओखली में मस्तक रख दो )
 वलती न लेवून नाम जोने " ( उसके पश्चात किसी बात की चिंता न करना )[ अर्थात : हरी का मारग दुर्गम है, जो  कायरों के लिए दुष्कर है। 
 प्रथम अपना मस्तक प्रभु चरणों में रखते हुए, पीछे मुड कर देखना नहीं ।  
     
दृढ प्रतिज्ञ, दृढ निश्चय, कृत संकल्प, जीव को हर पग, आगे बढ़ना है। 
       
अत: मेरी प्रार्थना ना सिर्फ मेरे आत्म हित के लिए है अपितु संसार के हर भूले भटके, जीव को ईश्वर और संत योगी व गुरू कृपा प्राप्त हो।सच्चे गुरुजन की सीख, प्रत्येक जीव को  सन्मार्ग पर चलते रहने के लिए प्रेरित करे। 
प्राणी आत्म उत्थान के पथ पे अग्रसर हों ये प्रार्थना है। 
आप सभी का आभार प्रकट करते हुए, इस महा - यात्रा में, आनंद प्राप्ति का सच्चिदानंद ईश्वर के प्रेम का सायुज्य प्राप्त हो यही शुभकामना शेष है। 
ओ मेरे साथी व सहयात्री ...इस सच्ची व मौन प्रार्थना स्वीकार करें !  
सविनय, 

- लावण्या के नमन