Thursday, January 7, 2021

" पृथ्वीराज रासौ : सँयोगिता - पृथ्वीराज की वीर गाथा : अमर युगल पात्र ग्रन्थ से

 ॐ 

चंदरबरदाई कृत " पृथ्वीराज रासौ " से प्रेरित ~  काव्य कृति तब अमरता प्राप्त कर लेती है जब कथा - नायक व कथा - वस्तु तथा कहनेवाला भी दिव्य हो ! चारण चंद्रबरदाई रचित " पृथ्वीराज रासौ " ऐसी ही, अमर कृति  है।  ६१ सर्गों में  विभाजित महाकाव्य में काव्य कवित्त छप्पय, दोहा, तोमर, त्रोटक, गाहा व  आर्या का प्रयोग  ' रासौ '  महाकाव्य में चंद्र बरदाई  ने किया  है। जैसे कादंबरी के संबंध में प्रसिद्ध है कि उसका पिछला भाग बाण भट्ट के पुत्र ने पूरा किया है, वैसे  प्रचलित है कि " रासो " के पिछले भाग को चंदबरदाई  के पुत्र ' जल्हण ' ने  पूरा  किया । 

रचयिता राव चंद बरदाई भट्ट, जो चंडिसा राव के कलादी गौत्र से थे व पृथ्वीराज के बचपन के अनन्य मित्र भी थे,  पृथ्वीराज के राज दरबार के वे, राजकवि थे। अपने महाराज की युद्ध यात्राओं के समय, वीर रस की कविताओं से सेना को प्रोत्साहित किया करते थे। चंदरबरदाई अपने मित्र पृथ्वीराज चौहान के कवि  मित्र थे जिन्होंने अपने सखा को सुख व दुःख के क्षणों में, हानि तथा लाभ में 
एक सा स्नेह दिया तथा अपने मित्र को उन्हें बारम्बार विषम परिस्थितियों के मध्य भी साहस एवं धैर्य के साथ सम्हाला था। 
 पृथ्वीराज रासौ कथा के नायक, वीर राजा पृथ्वीराज  के चरित्र चित्रण पर केंद्रित है। कथा में नायक के संग उनकी प्रेमिका तथा पत्नी संयोगिता भी नायिका हैं ! कथानक के एक महत्त्वपूर्ण पात्र स्वयं कवि चंदरबरदाई  हैं !
' रासौ ' महाकाव्य में, छः रस हैं किन्तु प्रधानता वीर रस की है। सर्वप्रथम चंदरबरदाई को बिरदावली से अभिसिक्त करें। 
  " ति कबि आई कवियही संपत्ते 
     नव रास भाख ज पुच्छन  लत्ते 
    कवी अनेक बहु बूढी गुन  रत्ते  
     कहि न एक कवी चन्द समत्ते "
भारतवर्ष की प्राचीन भूमि पर चाहमान वंश में, शाकम्भरी नगरी में श्री सोमेश्वर नामक राजा राज करते थे। राजमाता का नाम था कर्पूर देवी ! इनके दो पुत्र थे। पृथ्वीराज तथा यशराज !
पृथ्वीराज चौहाण : को उनके नाना अनंगपाल ने दत्तक लिया था। 
जन्म१२/३/१२२० भारतीयपञ्चाङ्ग के अनुसार,
१/६/११६३ आङ्ग्लपञ्चाङ्ग के अनुसार
पाटण, गुजरातराज्य 
तब पाटण पत्तन अण्हिलपाटण के नाम से प्रसिद्ध था। ११९१-९२ में, जयंक नामक कश्मीरी कवि ने " पृथ्वीराज विजय महाकाव्य " लिखा था उसी का श्लोक है ~ 

ज्येष्ठत्वं चरितार्थतामथ नयन-मासान्तरापेक्षया,

ज्येष्ठस्य प्रथयन्परन्तपकया ग्रीष्मस्य भीष्मां स्थितिम्। 
द्वादश्यास्तिथि मुख्यतामुपदेशन्भोनोः प्रतापोन्नतिं,
तन्वन्गोत्रगुरोर्निजेन नृपतेर्यज्ञो सुतो जन्मना॥ "

पुत्र के जन्म के पश्चात् पिता सोमेश्वर अपने पुत्र का भविष्यफल बताने के लिए राजपुरोहितों को निवेदन करते हैं। उसके पश्चात् बालक का भाग्यफल देख कर राजपुरोहितों ने "पृथ्वीराज" नामकरण किया।" पृथ्वीराज विजय महाकाव्य " में नामकरण का उल्लेख  इस प्रकार है ~~ 


" पृथ्वीं पवित्रतान्नेतुं राजशब्दं कृतार्थताम्। 

   चतुर्वर्णधनं नाम पृथ्वीराज इति व्यधात् "

' पृथ्वीराज रासो' काव्य में  नामकरण का वर्णन करते हुए चन्द्रबरदाई लिखते हैं


 ' यह लहै द्रव्य पर हरै भूमि। 

  सुख लहै अंग जब होई झूमि॥'

अर्थात ~ पृथ्वीराज नामक बालक महाराजाओं के छत्र, अपने बल से हर लेगा। सिंहासन की शोभा को बढाएगा अर्थात् कलियुग में पृथ्वी में सूर्य के समान देदीप्यमान होगा।

पृथ्वीराज की बाल्यावस्था :  कुमारपाल के शासन में चालुक्यों के प्रासाद में जन्मा, पृथ्वीराज बाल्यावस्था से ही वैभवपूर्ण वातावरण में पलने लगा ।वैभव सम्पन्न प्रासाद में, पृथ्वीराज के चारों ओर, परिचायिकाओं का बाहुल्य था।
दुष्ट ग्रहों से बालक की रक्षा करने के लिए, सेविकाएँ  विभिन्न मार्गों का अवलम्बन लेतीं थीं। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य में महाकवि जयानक द्वारा ये वर्णन प्राप्त है।
" महाविष्णु के दशावतार का मुद्रण किया हुआ  कण्ठाभरण = कण्ठ का आभूषण बालक पृथ्वीराज को पहनाया गया था। दुष्टग्रहो से रक्षा हेतु, व्याघ्रनख से निर्मित आभरण  सेविकाओं ने बालक को पहनाया था। व्याघ्र के नख को धारण करना मङ्गल मानते है। अतः राजस्थान में परम्परागत रूप से व्याघ्र के नख को सुवर्ण के आभरण में पहनते थे। बालक के कृष्ण केश और मधुकर वाणी, सभी के  मन को मोहित करते थे।शिशु के  सुन्दर ललाट पर लगाया हुआ ' तिलक ' बालक के सौन्दर्य में अभिवृद्धि करते । उज्जवल दन्त हीरक समान आभायुक्त थे। नेत्र में किया  ' अञ्जन ' आकर्षण को अधिक बढाता था। घुटनों द्वारा जब बालक यहाँ वहाँ घुमता था, तब उसके वस्त्र धूलिकामय होते थे। खेलते हुए पुत्र को देख कर माता कर्पूरदेवी अपने पुत्र का कपोल चुम्बन लेतीं थी।


" मनिगन कंठला कंठ मद्धि, केहरि नख सोहन्
       घूंघर वारे चिहूर रुचिर बानी मन मोहन्त

    केसर समुंडि शुभभाल छवि दशन जोति हीरा हरन। 
   नह तलप इक्क थह खिन रहत, हुलस हुलसि उठि उठि गिरत॥
     रज रंज्जित अंजित नयन घुंटन डोलत भूमि। 
      लेत बलैया मात लखि भरि कपोल मुख चूमि॥"


इस प्रकार अण्हिलपाटण के सहस्र लिङ्ग सरोवर से  अलङ्कृत सोपानकूप के मध्य में स्थित राजप्रासाद के विशाल भूभाग में पृथ्वीराज का बाल्य काल सुखपूर्वक व्यतीत हुआ। कुछ बड़े होने पर पृथ्वीराज का अध्ययन अजयमेरु प्रासाद में  विग्रहराज द्वारा स्थापित सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ में संपन्न हुआ। युद्धकला व शस्त्र विद्या का ज्ञान पृथ्वीराज ने प्राप्त किया। यद्यपि आदिकाल से ही शाकम्भरी के चौहान वंश स्रामाज्य की राजभाषा संस्कृत थी। उस काल में उस भूखण्ड पर  संस्कृतप्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी तथा अपभ्रंश भाषाएँ प्रचलित थीं। पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लेख है कि,मृगशिरा नक्षत्र व सिद्धयोग में कुमार पृथ्वीराज, राजा पृथ्वीराज  पंद्रह वर्ष  की आयु में राज्य सिंहासन पर आरूढ हुए। 


सं. ११७८ से ११९२ के कालावधि पर्यन्त, पृथ्वीराज चौहान वंश के हिंदू क्षत्रिय राजा थे। उत्तर भारत में, १२ वीं सदी के उत्तरार्ध में, वे, अजमेर (अजयमेरु ) व दिल्ली पर राज्य करते थे। पृथ्वीराज इन नामो से प्रसिद्ध हैं ~  भारतेश्वर, पृथ्वीराजतृतीय, हिन्दूसम्राट्, सपादलक्षेश्वर, राय पिथौरा इत्यादि। वे भारतवर्ष  के अंतिम - प्रमुख, हिन्दू राजा थे। पृथ्वीराज ' योगिनीपुर ' ( आज की दिल्ली ) पर राज्य  करते थे। उन के धवल राजमहल के द्वार पर ' न्याय का घंटा ' बंधा रहता था। प्रजा वत्सल पृथ्वीराज  न्यायप्रिय राजा थे  व बलवान, वीर तथा धनुर्विधा में अत्यंत कुशल थे। कैवांस नामक मंत्री राजकरण में पृथ्वीराज के संग कार्य करता था। पृथ्वीराज के पास एक चपल तेज गति से दौड़नेवाला अश्व था जिसका नाम ' नाटरामभश्व ' था। अपने बाहुबल पर आश्वस्त पृथ्वीराज आखेट के लिए निकलता तो ऐसा भास् होता मानों वन सिंहों के मध्य नरसिंह का आगमन हुआ हो ! 
तुर्क देश के  राजा शहाबुद्दीन को युद्ध में सात, सात बार पराजित करनेवाले पृथ्वीराज ने सुवर्ण की बेड़ियोँ में उसे बाँधा था किन्तु राजमाता कर्पूर देवी अत्यंत दयालु व् धार्मिक प्रकृति की थीं उनके आदेश पर सातों बार शहाबुद्दीन को जीवनदान देते हुए पृथ्वीराज ने रिहा किया।
संयोगिता के लिए इमेज परिणाम 
जयचंद राठौड़ ~ उसी कालखण्ड में, भारतवर्ष के एक अन्य क्षेत्र कन्नौज में राजा जयचंद सप्त क्षेत्र का सेवन करता था। महाराष्ट्र, थट्टा , नीमच, वैरांगर, कर्णाट, करवीर , गुण्ड व गुर्जर, मालव, मेवाड़ , मण्डोवर  के सभी राजाओं पर जयचंद अपना प्रभुत्त्व स्थापित कर चुका था। अपने यश व कीर्ति  को  सुदृढ़ रूप देने के लिए अब जयचंद ने राजसूय यज्ञ करने का निश्चय किया। उसने सभी  राजाओं को अपने नगर में होनेवाले राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होने का आदेश दूतों द्वारा  सन्देश भिजवाया। जयचंद  जैन धर्म का पालन करता था।उसकी पुत्री, राजकुमारी  संयोगिता रूपवती व बहादुर राज कन्या थी।
संयोगिता ~कईयों की मान्यता है कि ' संयुक्ता ' अप्सरा रम्भा थीं। संयोगिता, इतिहास में तिलोत्तमा, कान्तिमती, संजुक्ता या संयुक्ता आदि नामों से सुप्रसिद्ध हुईं।
जयचंद का आदेश व निमंत्रण लेकर दूत निकले उस समय संयोगिता अपने पालतू मृग शावकों को, राजमहल के अपने उद्यान में,  हरी हरी पत्तियाँ ले चबैना खिला रही थी।  एक सेविका ने आकर संयोगिता से कहा, ' राजकुमारी जी की जय हो ! महाराजश्री ने अपने कई दूतों को राजसूय यज्ञ के निमंत्रण पत्र देकर, चारों दिशाओं में राज कर रहे राजाओं को हमारे कनौज आने का आमंत्रण दिया है  किन्तु एक चौहानवंश के दिल्लीपति, वीर पृथ्वीराज को आमंत्रित नहीं किया। ' 
        संयोगिता ने अनेकों के मुख से पृथ्वीराज की वीरता के किस्से सुन रखे थे। पृथ्वीराज की वीरता से संयोगिता पहले से प्रभावित थी। वह वीर राजपूतानी थी। ऐसी वीरता के चर्चे सुन अपना ह्रदय, मन ही मन ~  पृथ्वीराज से जोड़ चुकी थी। उसने प्रण लिया ~ 
" संयोगि जोग वर तुम्ह आज 
   ब्रत  लिअउ वरण प्रथीराज राज " 
एक दूत पृथ्वीराज के दरबार में जा पहुंचा तथा बढ़ाचढ़ाकर अपने महाराज जयचंद के राजसूय यज्ञ के बखान करने लगा। राजयसभा में उपस्थित गुरुजन गोविंदराज ने दूत का प्रस्ताव  सुनते ही  उसका विरोध किया।  कहा,
               " जानहिं न राई जयचंद मूल, 
                  जानहिं त  देसु जोगिनी पुरेसु 
                   जु  प्रथिमी नहीं चहुआन कोइ ?
                      देषई संभ्ह ते हि सिंघ रूप। 
                      मानहिं न जग्गु मनि अन्न भूप। "
   अर्थात ~ हम जयचंद के राज्य को मुख्य नहीं मानते। हम तो योगिनीपुर के पृथ्वीराज को आदर्श मानते हैं। क्या पृथ्वी पर कोइ चौहाण शेष नहीं रहा ? सभी हमारे पृथ्वीराज को सिंघ के समान रूप से देखते हैं। किसी अन्य को हम जगत्पति राजा नहीं मानते। वयोवृद्ध गोविंदराज के इस वीरोचित्त उद्गार सुनकर जयचंद के दूत त्वरित गति से निकल भागे। 
         कनौज पहुंचकर दूतों ने अपने महाराज जयचंद के समक्ष हाथ जोड़ कर पृथ्वीराज की सभा में जो कुछ घटित हुआ सो वह सब डरते डरते  कह सुनाया। जयचंद दूतों के मुख से पृथ्वीराज की बिरदावली सामान गोविंदराज का कथन सुनकर आग बबूला हो उठा। सभा को समाप्त कर शीघ्र अपने अन्तः पुर में चला आया। वहाँ उद्यान में बैठे अपना क्रोध शाँत कर रहे महाराज जयचंद ने उसी उद्यान में अपनी पुत्री संयोगिता की दो सेविकाओं के मुख से, अपनी चहेती पुत्री राजकुँवरी संयोगिता ने पृथ्वीराज से विवाह करने का जो प्रण लिया था, उस के बारे में सारा वृतांत सुना। दासियाँ हाथ मटका मटका कर बार बार दुहरा रहीं थीं ~" संयोगि जोग वर तुम्ह आज  ब्रत  लिअउ वरण प्रथीराज राज "  
दासियों की उक्ति सुनते ही अब तो जलते में मानों घी पड़ा! जयचंद का क्रोध शाँत होने की अपेक्षा महाज्वाला बन कर धधकने लगा। जयचंद के आमात्यों ने आकर अपने महाराज के क्रोध का शमन करने हेतु समझाया ' हे महाराज आप अपना राजसूय यज्ञ का शुभ व्रत पूर्ण कीजिए।उस चौहाण से हम बाद में निपट लेंगें। ' जयचंद ने उनके कथन को योग्य माना। किन्तु मन में पृथ्वीराज चौहाण के प्रति जो कटुता एवं वैमनस्य था उस के प्रतिरूप समान, पृथ्वीराज के कद काठी की एक सुवर्ण प्रतिमा बनाने का आदेश, अपने स्वर्णकारों  दिया। पृथ्वीराज को छोटा दर्शाने के लिए एक मंत्री को आदेश दिया ' इस सुवर्ण प्रतिमा को, द्वारपाल के स्थान पर रखा जाए। '
कनौज के राजमहल के प्रतोली द्वार पर तैयार हुई स्वर्ण प्रतिमा को द्वारपाल के स्थान पे रख दिया गया। राजसूय यज्ञ के साथ साथ अपनी पुत्री राजकन्या संयोगिता
का स्वयंवर भी घोषित कर दिया। राजमहल के प्रवेश द्वार पर  पृथ्वीराज की प्रतिमा को रखवाया गया। 
यज्ञ का शुभ दिवस देव पंचमी के दिन सूर्य के पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करनेवाले थे
तथा चन्द्रमा के तीसरे गृह में स्थिर होने के  शुभ अवसर को पण्डितों ने चुना था। पृथ्वीराज को कनौज के राजसूय यज्ञ तथा संयुक्ता - संयोगिता के स्वयंवर की सारी जानकारियां उसके गुप्तचरों ने आकर बतलाईं थीं। जयचंद ने अपनी पुत्री के पृथ्वीराज से विवाह के प्रण व हठ के कारण, संयुक्ता को, गंगा नदी के किनारे एक ऊंचे आवास में रहने के लिए भेज दिया था। पृथ्वीराज के चुनिंदा सामंतो ने कहा , 
' तिहि पुतिय सुनी गन इतउ, टाट वचन तजि काज 
   कइ वहि गंगहि संचरहुँ , कइ पानि गहऊँ प्रथीराज। '  
अर्थात - जयचंद की पुत्री संयोगिता के बारे में सुना है वह यहां तक कहने लगीं  है कि,' पिता के वचन व स्वयंवर के कार्य का त्याग कर या तो मैं गंगा में बह लूंगी या पृथ्वीराज को वरूंगी '
यह सुनते पृथ्वीराज को अपार आश्चर्य हुआ। वही भाव,  अनुराग बना। मन ही मन सोचा, ' दम्भी जयचंद ने भले ही जो सोचा हो दैव ( भावि ) में अवश्य  कुछ भिन्न संजोग है '
जयचंद  ने संयोगिता के मन से पृथ्वीराज की छवि हटाने के अनेकों प्रयास किये। 
संयोगिता मानिनी थीं। साम, दाम दण्ड भेद के प्रयोग से, पृथ्वीराज के  प्रति संयोगिता के सम्मोहन से हाथ छुड़ाने के प्रयत्नों में सेविकाएं, दासियाँ जुट गईं ।  किन्तु संयोगिता की दृढ हठ  के आगे सारे उपाय विफल हुए। 
                पृथ्वीराज अपने संग से चुनिंदा शूरवीर राजपूत सूरमाओं को लेकर, इक्कीस योजन की दूरी तीन दिन व तीन रात्रि में पार करते हुए कनौज आ पहुंचे।
कनौज शहर के समीप बहते गँगा मैया के दर्शन हुए तो पृथ्वीराज ने प्रणाम किया। वहीं च
कते हुए घड़ों में, गँगा जी का जल भरती हुई स्त्रियाँ दिखलाई दीं। नगर नारियों के वस्त्र लाल, पीले व नीले रंगों के थे जो प्रातः काल के  स्वच्छ  प्रकाश में आभा बिखेर रहे थे। चंदरबरदाई कवि मित्र भी महाराज  पृथ्वीराज के संग, यह मनोरम दृश्य देख रहे थे।  कवि  ह्रदय चितेरा होता है, सो सहसा चंद बोले,
' इन सुंदरियों की पीठ पर झूलती वेणी ऐसे प्रतीत हो रहीं हैं मानों उनका शरीर स्वर्ण से निर्मित हुआ हो तथा उनके स्वर्णिम स्तम्भ पर सूर्यदेव चढ़ कर महाराज आपके विजयश्री की घोषणा कर रहे हैं ' पृथ्वीराज अपने कवि सखा के उपमाओं पर ठठाकर हंस पड़े उत्तर दिया, ' अरे मित्र चंद रहने भी दो ! अभी तो तुमने कनौज की यशस्विनी नारियों को देखा ही नहीं! मात्र इस प्रदेश की  पनिहारियाँ  ही देखीं हैं ! ' चंदबरदाई अपने मित्र के कटाक्ष पर मुस्कुराने लगे। कहा,' आज्ञा दो,  मित्र ! राजपरिवार की टोह लेकर आता हूँ ' 
अपने सखा से आज्ञा लेकर चंदबरदाई जयचंद के राजदरबार में छद्म नाम से पहुंचे। दरबार में भिन्न नाम से बरदाई ने पृथ्वीराज की वीरता तथा महाराज जयचंद की वीरता के गीत गाये। अपनी प्रशंसा सुनकर तो जयचंद प्रसन्न हुआ किन्तु  पृथ्वीराज का बखान अनसुना कर दिया।  चारण की प्रशंसा
सुन क जयचंद, चंदबरदाई की कवितावली से प्रभावित हुआ था अतः पूछने लगा, 
' चारण आप किस स्थान पर ठहरे हैं ? ' चंदबरदाई ने ठिकाना बतलाया तो अगली प्रातः जयचंद चंदबरदाई की छावनी में आ पधारे ! छावनी में उपस्थित पृथ्वीराज के गठीले शरीर तथा रौबदार राजपूती बड़ी बड़ी मूंछों को देखकर जयचंद का माथा ठनका ! उसने प्रश्न किया,  ' यह सैनिक कौन है ? '
चंदबरदाई ने मन के भावों को भली प्रकार छिपाते हुए कहा, ' महाराज जयचंद ! यह मेरा अनुचर है। मैं, अपनी सुरक्षा के लिए इसे अपने संग लिए भ्रमण करता रहता हूँ ! ' 
जयचंद को चंदबरदाई के कथन पर अविश्वास हुआ। किन्तु अगले दिवस राजसूय यज्ञ था। अतः जयचंद ने सोचा, ' आज नहीं  ! कल यज्ञ, पूर्ण हो जाए, पश्चात  मैं इस छावणी के सभी जन पर,  धावा बोल कर, इन्हें बंदी बना लूंगा। कल की पूजा निर्विघ्न समाप्त कर, तद्पश्चात इन्हें बंदी बना लूँगा ' इतना सोचकर जयचंद छावणी से प्रस्थान कर गया ! संध्या होने लगी। जयचंद के लौट जाने पर, पृथ्वीराज अपने मित्र चंदबरदाई को गले लगाकर खूब हँसे। 
         रात्रि का एक प्रहर बीत चुका था। संयोगिता के नयनों से निद्रा ओझल थी। वह अपनी सखी से कहने लगी, ' हे आली, मेरे मन के  गुप्त भाव गुरुजनों से कह नहीं पाती। हाँ एक मात्र तुम्हें कह सकती हूँ। जिसने मेरे पिता के चमकीले खडग के भय से आत्म समर्पण नहीं किया उसी नर - वीर को मैं चाहती हूँ ! '
सखी मुँहलगी थी कहने लगी, ' हे बुध्धिहीना अबोध राज कुंवरी ! कहाँ वह लघु कुल का वंशज तथा कहाँ आप ! आप कनौज नरेश की पुत्री हैं, हमारी राजदुलारी हैं।  हमारी राजेश्वरी  हैं ! ' तब तड़प कर संयोगिता बोली, ' अरी दुष्टा,  रहने दे ! उसी सूरमा नर वीर ने, अजमेर राज्य में धूम मचा रखी है ! मंडोवर राज्य को उन्हीं ने पराजित किया। मोरी के राजा से कर वसूल किया!  रणथम्भोर के  रण मैदान में विजयश्री  प्राप्त की ! कालिंजर को जल निमग्न किया ! अरे, उस शूरवीर चौहाण की कृपाण तो राजाओं के खेत रुपी  राज्यों को काटनेवाली ' हँसिया ' बनी हुई है। ' अपनी राजकुमारी से पृथ्वीराज चौहाण की प्रसंशा सुनकर वही सखी मुस्कुराने लगी। बोली, ' कुँवरी आपके मन के भाव आज शब्दों में आ ही गए ! जिस प्रकार चंद्र्मा के खिलने पर पावन गँगा जी में कमलिनीयाँ आतुरता से खिल उठतीं हैं तथा मुग्ध भाव से इन्दु ( चंद्र ) की शीतल किरणों का पान कर, चंद्र देव का ध्यान करतीं  हैं, उसी प्रकार हे कुँवरी, आपकी समस्त बुद्धिमता, चतुरता तथा वाणी बस एकमात्र पृथ्वीराज का बखान करतीं रहतीं हैं ! हे सखी, आप के इन सुँदर अंग प्रत्यंग पर, मदन - ज्वर  व्याप्त  है। यह उसी प्रेम रोग का प्रताप है '
 
रात्रि बीत चली। उसी  समय गँगा जी की पावन जलधारा पर प्रतिध्वनित होता हुआ सैनिक वाद्य बजने लगा। संयोगिता शर्वरी ( रात्रि ) में उठ रही इस वीर ध्वनि से प्रभावित होकर अपने  झरोखे पर आ खड़ी हुईं व गँगा धारा पर दृष्टिपात किया। संयोगिता आश्चर्चकित हो, निहारतीं रहीं ~ गँगा जी की पवित्र जल ~ धारा  के मध्य खड़े, कामदेव के समान सुँदर, हर ( शिवजी ) के सामान बलिष्ठ, एक नर को, जो गँगा जी की उत्ताल तरंगों को, अपने हाथों से उछाल रहा था तथा अपने हाथों से एक, एक मोती, जलधारा में बह रहीं मछलियों के मुख में डाले जा रहा था। इस प्रयास में कुछ मोती जल धारा में डूबे  जा रहे थे। चंद्रमा की चांदनी में ऐसा अलौकिक दृश्य देख कर संयोगिता, ठगी सी रह गईं ! संयोगिता के संग अन्य दासियाँ भी यह दृश्य देख रहीं थीं।  
किसी ने कहा,' यह तो कोइ सिद्ध मुनि लगते हैं। किसी ने कहा,' दानव हैं या स्वर्ग से उतरे कोइ देवता हैं ? ' परन्तु एक चतुर दासी ने कहा, ' यह नरेंद्र पृथ्वीराज हैं ! ' यह सुनते ही संयोगिता शर्मा कर भय से थर थर काँपने लगी। अपने नेत्रों को अपने कोमल करों से मूँद लिया। क्षणार्ध पश्चात राजकुँवरी संयुक्ता ने अपनी एक दासी के हाथों, मोतीयों से  भरा थाल, वहीं भिजवाया जहां पृथ्वीराज जल धारा में अब भी खड़े थे। दासी चुपचाप पृथ्वीराज के निकट जाकर खड़ी हो गयी। पृथ्वीराज भी मस्त हो, मोती लुटाता रहा। जब थाल के सारे मोती चूक गए तब दासी ने अपनी मोती माला उतार कर थमा दी।
अब पृथ्वीराज ने मुड़कर पूछा, ' तुम कौन हो ? ' दासी ने अपना परिचय दिया  सादर प्रणाम किया तथा कहा ' महाराज मैं कनौज राजकुमारी संयोगिता की दासी हूँ ' पृथ्वीराज बोले ' आपकी कुँवरी से मिलने ही तो कनौज आया हूँ चलो वहीं ले चलो राजकुमारी के पास '
सँयोगिता के भवन में पृथ्वीराज ने साधिकार प्रवेश किया। दासी पीछे पीछे चल रही थी।सँयोगिता अब पृथ्वीराज के समक्ष उपस्थित थीं। पृथ्वीराज ने उसे आलिंगनबद्ध किया। मानों दर्द को रिध्धि प्राप्त हुई। दोनों के मिलन पर मानों पवित्र पाणिग्रहण संस्कार पूर्ण हुआ। सँयोगिता ने बिदाई के ताम्बूल अर्पित किये। 
   " पायातु पंग पुत्रीय जयति जयति योगिनी पुरेस 
      सर्व विधि निषेधस्य यः तम्बोलस्य समादायं। " 
                              अर्थात ~ पंगपुत्री ( सँयोगिता ) की रक्षा करें। 
हे योगिनीपुर ( दिल्ली ) के स्वामी ! आपकी जय हो, जय हो ! सभी प्रकार से आपको रोक रही हूँ उसके प्रतीक  इस ताम्बूल को स्वीकार कीजिए ! "  इतना कहते हुए, सँयोगिता ने विवाह कंकण, पृथ्वीराज के सशक्त हाथों पर बाँध दिया।
पृथ्वीराज अपनी छावणी
पर आ कर अपने सामंतों से जा मिले। उन में से एक कान्ह ने पूछा,' महाराज यह क्या है ? "  तब पृथ्वीराज ने बतलाया की, ' मैंने जयचंद की बाला का वरण  किया।  उस का प्रण पूरा किया। अभी मैं उसे विलाप करते हुए उसे छोड़ कर यहां आया हूँ। ' तब वीर कान्हा उत्तेजित होकर बोलै,
' महाराज हम सौ सुरमा राजपूतों के रहते हमारी भाभीसा रोवें ! यह कैसे हो सकता है ? क्या हम ने  यूं ही दिखावे की तलवारें बाँध रखीं हैं?  महाराज चलें जयचंद की सेना से युद्ध  तो हम करते रहेंगें किन्तु  पहले आपकी ब्याहता, हमारी भभीसा को छुड़ाते हैं ! '

सँयोगिता ने वीर राजपूतों की टोली को आते देखा तो भय कातर होकर सखियों से कहने लगी ' सखियों 
मेरे प्रिय पर लोग ऊँगली ना उठावें ! लोग ये ना कहें की युद्ध के भय से इन्होंने मेरे आवास की शरण ली ! ' किन्तु वहां पधारे वीर योद्धा
 कान्ह ने समीप आ कर कहे वक्तव्य , ' हे भाभीमाँ आप कहें तो कनौज को योगिनीपुर बना दूँ ! आप योगिनिपुर पति के संग सिंहासन पर आसीन हों ! मैं तथा मेरे साथी निर्भय हैं। हम युद्ध से कदापि भयभीत नहीं होते । हम तो  आपको हमारे संग लिवाने के लिए ही यहां आये हैं। ' यह  वीरोचित राजपूत की वाणी सुनकर राजकुँवरी से राजरानी पद पर आसीन हुईं सँयोगिता के नयनों से हर्ष के अश्रु बहने लगे। पृथ्वीराज से कर - बद्ध प्रार्थना करते हुए वे बोलीं,
 ' हे नाथ ! कनौज के जन समाज से भरे दरबार के समक्ष, आपकी प्रतिमा के गले में मेरी विजय माला से आपका अभिनंदन कर, आपको पति रूप में वरूँगी। प्रतिज्ञा है, कल सँयोगिता  स्वयंवर का  यह दृश्य सभी देख लें। ' पृथ्वी राज ने संयोगिता का स्वीकार किया। 
अगले दिवस सँयोगिता  के राजसी स्वयंवर में जो पृथ्वीराज को अपमानित करने की भावना से उनकी स्वर्ण  प्रतिमा निर्मित की गयी थी उसे द्वारपाल के स्थान पर रखा गया था उसी स्थान पर,  पृथ्वीराज स्वयं आ कर खड़े हुए। संयोगिता ने राजसभा में उपस्थित सभी राजाओं को अनदेखा करते हुए,  द्वारपाल की प्रतिमा की दिशा में चरण बढाए तथा अपने कोमल करों में थामी सुगन्धित जयमाला महारा  पृथ्वीराज के गले में पहना दी । अब असली पृथ्वीराज ने अपनी पत्नी सँयोगिता का हाथ थाम कर उसे अपने संग लिया। इस भाँति पृथ्वीराज - सँयोगिता का विवाह भरी सभा के मध्य हुआ।  पृथ्वीराज ने सँयोगिता का हरण कर, उसे अपने प्रिय अश्व नाटरामभश्व पर बैठाल लिया। स्वामीभक्त अश्व, योगिनीपुर की दिशा में स्वतः अपनी स्वामिनी तथा स्वामी को लिए हुए मुड़कर तेज गति से दौड़ पड़ा। 
संयोगिता स्वयंवर के लिए इमेज परिणाम
 पृथ्वीराज ने अपने श्वसुर जयचंद के लिए सँदेसा भिजवाया ~ ' दहेज़ के रूप में तुमसे युद्ध की आकांक्षा है ! मेरी स्वर्ण प्रतिमा द्वारपाल के स्थान पर रखकर मुझे अपमानित करने की यही सजा है ! '
पृथ्वीराज के सँयोगिता को हर कर अपने संग ले जाने से जयचंद की सेना उनके पीछे दौड़ पडी। पृथ्वीराज के वीर सामंतों ने कहा , ' हे हमारे साम्भर राज, हम सेना को रोकेंगे। आप महारानी को लेकर शीघ्र हमारे नगर पहुंचें ' ! 
गुहलौत,  नागौर का दाहिमा, चंद्रपुण्डीर 
सोलंकी का सूरमा सारंग, कूरंभ,
राज पालन देव, यह वीर योद्धा प्रथम दिवस के युद्ध में, वीरगति को प्राप्त कर गए ।
अन्य साथी सामंतों वीरों की तलवारें झनझनाने  लगीं। दूसरे दिन के युद्ध में गुर्जर का माल चंदेल, थट्टा का भूपाल भाण भट्टी, सामळा शूर, अच्छ परमार  व धार का निरवान वीर, देहत्याग कर युद्ध स्थल में गिरे। पृथ्वीराज के अनेक वीर सामंतों ने वीरता से युद्ध क्षेत्र में, हँसते हुए अपने  प्राण खोये किन्तु इस युद्ध के होते हुए महाराज पृथ्वीराज महारानी संयोगिता के संग अपनी राजधानी योगिनीपुर सकुशल पहुँच गए। निराश होकर सीने में प्रतिशोध भाव से धधकती ज्वाला लिए जयचंद कनौज खाली हाथ लौट आया। 
       विवाह पश्चात पृथ्वीराज, राजकार्य भूल गए। भोग विलास में रात्रि दिवस बीतने लगे। छः ऋतुएँ वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर आ आ कर लौ गईं परन्तु पृथ्वीराज सँयोगिता की भोग - विलास समाधि ना टूटी ! 
     एक दिन चंद्रबरदाई अपने मित्र महाराज पृथ्वीराज के महल में राजगुरु को संग लेकर आये। महाराज के लिए अन्तः पुर में एक सन्देश एक कहला भेजा  ~ 
" गोरी रत्तउ तुव धरा, तुं गोरी अनुरत्त " अर्थात " गोरी तुझ पर राजी है या तेरी भूमि पर ? तू गोरी पर मर मिटा ! ' आगे पत्र में लिखा था ~  " अप्पज वान चहुआन सुनि, प्रान रषिक प्रारम्भ करि - सामंत नहीं सा - मंत करि, जिनि बोलइ ढिल्लिय जु धरि " अर्थात ~' हे चौहान सुन ! बाण तो अपने अधीन हैं। उद्योग कर, अपने प्राणों की रक्षा कर  ~ संतों से मंत्रणा कर कि तेरे कारण ये साम्राज्य, ये धरा डूब न जाए ' पत्र सन्देश पढ़ते ही लज्जा वश पृथ्वीराज भूमि पर गिर पड़े। उठकर अपना तरकश सम्हाला। सोया हुआ पौरुष जागा मानों सोया हुआ सिंह जाग उठा !  
सँयोगिता उसे रोकने की चेष्टा में कहने लगी, 
  ' कहु सु प्रियह पउमिनिय कंत धनु धरउ तउ न धनु 
       सुष सुषमार आरोहु असर सँसार मरन मन। 
       दिन दिनिनयर दिन चंदु रयनि दिन दिन हि आवहि। 
       जंतु जंतु इह रमनि स्रवन लग्गावि समझावहि। 
        अरधंग  धरा अरधंग  हम  अरधनगी अरधंग भरि। 
        जस हंस हंस तह हँसिनी सर सुक्कई पंकज न परि '
अर्थात ~ वही धन, धन है जो भोगा जाय। काम सुख सच्चा सुख है। प्रेम रहित जीवन मृत्यु  समान है। मनुष्य जीवन उस क्षण समाप्त हो जाता है। यदि धरा पृथ्वीराज की पत्नी है, तो सँयोगिता भी पत्नी है। मुझे सार्थक कीजिए नाथ ! 
हँस ~ हँसिनी  का जोड़ा मरने तक साथ रहता है ! '  
पृथ्वीराज ने अपना जी कड़ा कर उत्तर दिया, ' हे वीर पत्नी, तूने मुझे मेरे बाहुबल के कारण वरण  किया। आज युद्ध में जाने से मुझे  क्यों रोक रही हो ? हे क्षत्राणी ! हे वीर राजपूत रमणी ! अब प्रणय की बेला गई ! विजयश्री तिलक लगाकर प्रस्थान करने दें, यही आप को शोभा देता है, यही उचित है '
        अपने प्राण नाथ के वचन सुन नयनों से उमड़ते हुए अश्रुधारा में अपने रक्त को मिला कर सँयोगिता ने अपने स्वामी पृथ्वीराज के प्रशस्त भाल पर विजय तिलक लगा दिया । पृथ्वीराज ने प्रस्थान किया। 
पति पत्नी बिछुड़े। चंद्रबरदाई रचित ' पृथ्वीराज रासौ ' में यही इस पवित्र दंपत्ति युगल पात्रों का अंतिम मिलन दर्शाया गया है। 
        प्रतिशोध की ज्वाला लिए जयचंद ने विश्वासघात किया। जयचंद ने तुर्की शहाबुद्दीन को पृथ्वीराज के नगर प्रवेश के गुप्त रहस्य बतलाये। जिस शाहबुद्दीन को अपनी माता महारानी कर्पूर देवी के कहने बार पृथ्वीराज ने सात, सात बार जीवनदान दिया था उसी दुष्ट ने, अब किले के भेद जान कर, पृथ्वीराज को युद्ध में परास्त किया।  तथा बंदी बनाकर कारागार में  डाला। तद्पश्चात अपने नगर ले चलकर आग में तपती  हुई सलाखें गर्म कर, उन से पृथ्वीराज के  दोनों नयनों को निर्ममता से छेद दिया,  जिससे पृथ्वीराज अंध हो गया। अत्याचारी के सीने में तब भी आग बाकी थी । चित्र : चंद्र बरदाई 

कुछ काल पश्चात चारण चंद्रबरदाई, अपने मित्र पृथ्वीराज की शोध में, अपने महाराज व प्रिय सखा को खोजता  हुआ, तुर्क शहाबुद्दीन के नगर तक आ पहुंचा। पृथ्वीराज  कारागार में है यह जानकार उसे अत्यंत शोक हुआ। किसी प्रकार बंदीगृह पहुँच कर वह अपने परम  मित्र से मिला।    
            पृथ्वीराज का मनोबल परास्त हो चुका था व पृथ्वीराज, अत्यंत शोकाकुल था। अपना सर्वस्व  हार चुका था। वह अपने प्राणों के प्रति मोह को भी खो चुका था ' चन्द्रबरदाई ने  उसे भड़काया, कहा ' हे बंधे हुए सिँह, तू काल से भी विकराल काल स्वयं है ! पापी शहाबुद्दीन ने छल से सिँह को कैद कर लिया ! इस छल का बदला लेना होगा। मैं तेरे साथ हूँ मित्र  ! ' अपने मित्र की उत्साहवर्धक बातें सुनकर पृथ्वीराज का सोया हुआ पौरुष जाग उठा।  दोनों ने आपस में मंत्रणा की। तद्पश्चात चंद्रबरदाई शाहबुद्दीन के समक्ष उपस्थित हुआ। बोलै, ' हे बादशाह ! तुम्हारा कैदी पृथ्वीराज अँधा हो गया तो क्या हुआ ? वह  तुम्हारे सरे सैनिकों से अब भी बेहतर निशाना लगा सकता है। वह अचूक निशानेबाज है - मेरे वचन को आजमा कर देख लो ! '   चंद्र बरदाई की बात सुनकर शहाबुद्दीन का कौतुहल जागा। अब चंद्र ने आगे कहा, ' हे बादशाह आपके शाही फरमान पर ही यह पृथ्वीराज बाण पकड़ने को राजी हुआ है। सो अब आप ही आदेश दें - आपके स्वर में यह बाण चलाने का आदेश गूंजे, तभी वह अपने अचूक निशाने का करतब दिख्लायेगा '   
शहाबुद्दीन ने पृथ्वीराज के अचूक निशाने को परखने के लिए उसे धनुष्य बाण  दिए। आयोजन किया गया। अब कवि मित्र  चंद्रबरदाई ने अपना कवित्त बांचा ~ “ चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान”
 
अर्थात् ~ चार बांस, चैबीस गज व  आठ अंगुल जितनी दूरी के ऊपर सुल्तान बैठा है ~  इसलिए चौहान तुम चूकना नहीं !  अपने लक्ष्य को हासिल करो। '
पृथ्वीराज चौहान ने इसी कवित्त  के आधार पर निशाना साधकर तीर छोड़ा।
जो सीधे ऊँचाई पर बैठे गौरी के सीने में जा लगा। दरअसल, चंदबरदाई की कविता से पृथ्वीराज को गौरी की दूरी का तो अंदाज़ा हो गया था, लेकिन वो किस दिशा में यह पता लगाना अभी बाकी था। तब चंद्रवरदाई ने गौरी से कहा कि, 'पृथ्वीराज आपके बंदी हैं, सो आप इन्हें आदेश दें ! तभी पृथ्वीराज  आपकी आज्ञा प्राप्त कर अपने शब्द भेदी बाण का प्रदर्शन करेंगे। ' इस पर ज्यों ही घोरी  ने पृथ्वीराज को प्रदर्शन की आज्ञा का आदेश दिया।  प्रदर्शन के दौरान घोरी के " शाबास शुरू  करो " लफ्ज के उद्घोष से  पृथ्वीराज को घोरी  किस  दिशा में बैठा है यह मालूम हो गया उन्होंने तुरन्त बिना एक पल की भी देरी किये, अपने एक ही बाण से मुहम्मद घोरी के अपने एक बाण के वार से प्राण हर लिए और उसे, मार गिराया ! 
                        शहाबुद्दीन के प्राण गंवाकर गिरते ही उसका सचिव, तातार खां क्रोध में लपक कर आया। उसने पृथ्वीराज के प्राण लेने चाहे। किन्तु तब तक चंद्रबरदाई लपक कर अपने मित्र पृथ्वीराज के पास आ चुके थे।

दोनों ने अपनी अपनी छिपी हुई कृपाण निकाल लीं तथा तुरंत एक दूसरे के ह्रदय में उन तीक्ष्ण कटार को खोंप दिया। कटार के तेज प्रहार से दोनों ने एकसाथ, उसी क्षण, ' हर हर महादेव ' का जय घोष  करते हुए अपने अपने प्राण खोये  ! दोनों एक साथ स्वर्ग सिधारे।   

भारत वर्ष के गरिमामय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ में शूरवीरता की ज्वलंत कथा का एक अध्याय जुड़ गया। लोकोक्ति है कि, " चंद्र से अलग पृथ्वी नहीं ! चंद्रबरदाई से विलग सखा पृथ्वीराज नहीं !"
  " पृथ्वीराज रासौ " इसी कथा की यशस्विनी कीर्तिगाथा है। वीर रस से सभर एक उच्च स्तर की शौर्य गाथा है। नव रस से निर्मित " पृथ्वीराज रासौ " एक अपूर्व ग्रन्थ ही नहीं है अपितु एक महाकाव्य है।  इस में प्रयुक्त छंदों को चंद्रबरदाई ने अपने रक्त समर्पण द्वारा अमृतदान दिया है। श्रृंगार,  वीर रस से निर्मित,करूण रस से भींजा हुआ, बीभत्स रस समेटे, भय, अद्भुत एवं शाँत ऱस को काव्य में सिंचित किये ' पृथ्वीराज रासौ '  भारतीय काव्य परम्परा का अद्भुत साहित्यिक आभूषण  है।
" रासउ असंभु नवरस सरस् छंदु चहुँ किअ अमिअ सम। 
                   श्रृंगार, वीर, करुणा, विभछ , भय , अद्भुतह संत सम। " 

पृथ्वीराज संयोगिता की पुत्री ' बेला'  के लिए यह प्रसिद्ध है कि, वह कुतुबमीनार पर चढ़ कर, प्रातः गँगा मैया के दर्शन करने के पश्चात  अन्न ग्रहण किया करती थी।
      आज के आधुनिक समय में जिसे देहली नगर का ' लाल किल्ला ' कहते हैं उसे पृथ्वीराज के शासन काल में, ' लालकोट ' के नाम से पुकरा जाता था। उसी किले में, महारानी सँयोगिता तथा उनकी ननद जी पृथ्वीराज की बहन ' पृथा ' को पृथ्वीराज के प्राण त्याग का अशुभ सन्देश मिला तो दुर्ग में, मृत्यु सा भयंकर सन्नाटा छा गया। पृथ्वीराज के दुश्मन आततायी आक्रमण करेंगें यह निश्चित था। अनेकों प्राणों की विनाश लीला, स्त्रियों के शील भंग की संभावना भी थी। अतः वीरांगना राजपूत रमणियों ने, जौहर कर, अपने अपने पवित्र शरीरों को,पवित्र अग्नि - स्नान द्वारा अग्नि देव की कोख में समर्पण करने का प्रण लिया। चिताएँ शरीर  पर्यन्त धू धू कर जलतीं रहीं , शेष रहीं भारतीय इतिहास के ज्वलंत अमर युगल दंपत्ति की वीर गाथा !
शत शत  प्रणाम  !
" सँयोगिता - पृथ्वीराज की वीर गाथा ! प्रणाम  ! चंद्रबरदाई के महानायक - महानायिका अमर  रहें ! 
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- लावण्या ~   : आगामी पुस्तक : अमर युगल पात्र :

Tuesday, April 28, 2020

५ - अनुवादित कविताएँ ~ लावण्या शाह

 सर्वप्रथम : प्रस्तुत है कवि पाबलो नेरुदा की दो कविताओं का हिंदी अनुवाद
प्रश्न : पाब्लो नेरुदा कौन थे ?

उत्तर : नेफताली रीकर्डो रेइस या पाबलो नेरुदा
 दक़्शिण अमरीका भूखँड के सबसे सुप्रसिध्ध कवि हैं।उन का जन्म पाराल, चीले, आर्जेन्टीना मेँ सं.१९०४ के समय मेँ हुआ।  पाबलो नेरुदा ने, अपने जीवन मेँ कई यात्राएँ कीँ थीं।
रुस, चीन, पूर्वी युरोप की यात्रा कीं।  सन्` १९७३ मेँ निधन हुआ।
भारत के श्री रवींद्रनाथ ठाकुर की भाँति भाषा व साहित्य सर्जन  लिए,
विश्वविख्यात  नोबल इनाम सन्` १९७१ मेँ पाब्लो नेरुदा को मिला ।
कविता के लिये वे कहते हैं कि, " एक कवि को भाइचारे व  एकाकीपन के बीच एवम्` भावुकता व धुर्र कर्मठता के बीच, तथा अपने आप से लगाव के साथ
समूचे विश्व से सौहार्द व कुदरत के उद्घघाटनोँ के मध्य सँतुलित रहते हुए
रचना कर्म करना जरूरी होता है।
वही कविता होती है  "
         (१)
कविता : " दोपहर के अलसाये पल "
" दोपहर के अलसाये पल "
तुम्हारी समँदर -सी गहरी आँखोँ मेँ,

फेँकता पतवार मैँ,
उनीँदी दोपहरी मेँ -
उन जलते क्षणोँ मेँ,
मेरा ऐकाकीपन , घना होकर,
जल उठता है -
डूबते माँझी की तरहा -
लाल दहकती निशानीयाँ,
तुम्हारी खोई आँखोँ मेँ,
जैसे "दीप ~ स्तँभ" के समीप,
मँडराता जल !
मेरे दूर के सजन,
तुम ने अँधेरा ही रखा
तुम्हारे हाव भावोँ मेँ उभरा यातनोँ का किनारा
--- अलसाई दोपहरी मेँ,
मैँ, फिर उदास जाल फेँकता हूँ --
उस दरिया मेँ , जो
तुम्हारे नैया से नयनोँ मेँ कैद है !

रात के पँछी, पहले उगे तारोँ को,
चोँच मारते हैँ -ढर वे,
मेरी आत्मा की ही तरहा,
ढर दहक उठते हैँ !
रात, अपनी परछाईँ की ग़्होडी पर
सवार दौडती है ,
अपनी नीली फुनगी के
रेशम - सी लकीरोँ को छोडती हुई !
२) व्यथा - गीत :
-----------------------------------------------------
तुम्हारी याद आसपास फैली रात्रि से उभरती हुई
--नदिया का आक्रँद, जिद्दी बहाव लिये, सागर मेँ समाता हुआ
बँदरगाह पर सूने पडे गोदाम ज्यूँ प्रभात के धुँधलके मेँ
-और यह प्रस्थान - बेला सम्मुख, ओ छोड कर जाने वाले !

भीगे फूलोँके मुखसे बरसता जल, मेरी हृदय कारा पर,
टूटे हुए सामान का तल, भयानक गुफा, टूटी कश्ती की
-तुम्हीँ मेँ तो सारी उडाने, सारी लडाइयाँ, इक्ट्ठा थीँ
-तुम्हीँ से उभरे थे सारे गीत, मधुर गीत गाते पँछीयो के पर
-एक दूरी की तरहा, सब कुछ निगलता यथार्थ --
दरिया की तरह ! समुद्र की तरह ! डूबता सबकुछ, तुम मेँ
वह खुशी का पल, आवेग और चुम्बन का !
दीप - स्तँभ की भाँति प्रकाशित वह जादु - टोना !

उस वायुयान चालक की सी भीति, वाहन चालक का अँधापन,
भँवर का आँदोलित नशा, प्यार भरा, तुम्हीँ मेँ डूबता, सभी कुछ!-

शैशव के धूँधलके मेँ छिपी आत्मा, टूते पँखोँ - सी ,
ओ छूट जानेवाले, खोजनेवाला , है- खोया सा सब कुछ!
दुख की परिधि तुम -- जिजिविषा तुम
-- दुख से स्तँभित - तुम्हीँ मेँ डूब गया , सब कुछ !

परछाइयोँकी दीवारोँ को मैँने पीछे ठेला
--मेरी चाहतोँके आगे, करनी के आगे, और मैँ , चल पडा !
ओ जिस्म ! मेरा ही जिस्म ! सनम! तुझे चाहा और, खो दिया
-- मेरा हुक्म है तुम्हे , भीने लम्होँ मेँ आ जाओ ,
मेरे गीत नवाजते हैँ -बँद मर्तबानोँ मेँ सहेजा हुआ प्यार
- तुम मेँ सँजोया था --
और उस अकथ तबाही ने, तुम्ही को चकनाचूर किया !
वह स्याह घनघोर भयानकता, ऐकाकीपन, द्वीप की तरह
-और वहीँ तुम्हारी बाँहोँने सनम, मुझे, आ घेरा
--वहाँ भूख और प्यास थी और तुम, तृप्ति थीँ !
दुख था और थे पीडा के भग्न अवशेष , पर करिश्मा ,
तुम थीँ !ओ सजन! कैसे झेला था तुमने मुझे, कह दो
-- तुम्हारी आत्मा के मरुस्थल मेँ, तुम्हारी बाँहोँ के घेरे मेँ
-मेरी चाहत का नशा, कितना कम और घना था
कितना दारुण, कितना नशीला, तीव्र और अनिमेष!
वो मेरे बोसोँ के शम्शान, आग - अब भी बाकी है,
कब्र मेँ --फूलोँ से लगदे बाग, अब भी जल रहे हैँ,
परवाज उन्हेँ नोँच रहे हैँ !वह मिलन था
-- तीव्रता का,
अरमानोँ का -जहाँ हम मिलते रहे ,
गमख्वार होते रहे
-और वह पानी और आटे सी महीन चाहत ,
वो होँठोँ पर, लफ्ज्` कुछ, फुसफुसाते गुए
-यही था, अहलो करम्, यही मेरी चाहतोँ का सफर
-तुम्हीँ पे वीरान होती चाहत, तुम्हीँ पे उजडी मुहब्बत !
टूटे हुए, असबाब का सीना, तुम्हीँ मेँ सब कुछ दफन !
किस दर्द से तुनम नागँवारा, किस दर्द से, नावाकिफ ?
किस दर्द के दरिया मेँ तुम, डूबीँ न थीँ ?
इस मौज से, उस माँझी तक, तुम ने पुकारा ,
गीतोँ को सँवारा, कश्ती के सीने पे सवार,
नाखुदा की तरह
-- गुलोँ मेँ वह मुस्कुराना, झरनोँ मेँ बिखर जाना,
तुम्हारा,उस टूटे हुए, सामान के ढेर के नीचे,
खुले दारुण कुँएँ मेँ !
रँगहीन, अँधे, गोताखोर,, कमनसीब, निशानेबाज
भूले भटके, पथ - प्रदर्शक, तुम्हीँ मेँ था सब कुछ, फना !

यात्रा की प्रस्थान बेला मेँ, उस कठिन सर्द क्षण मेँ,
जिसे रात अपनी पाबँदीयोँ मेँ बाँध रखती है
समँदर का खुला पट - किनारोँ को हर ओर से घेरे हुए
और रह जाती हैँ, परछाइयाँ मेरी हथिलियोँ मेँ,
कसमासाती हुईँ --सब से दूर --- सभी से दूर
---इस बिदाई के पल मेँ !
आह ! मेरे, परित्यक्यत्त जीवन !!!
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दो ~ गुजराती गीतों का हिंदी काव्यानुवाद :
(१) कवि  કૃષ્ણ-રાધા / પ્રિયકાન્ત પ્રેમચંદ મણિયાર
(जन्म : २८-१-१९२९मृत्यु : २५-६-१९७६ ) 
कवि प्रियकांत मणियार का जन्म, अमरेली प्राँत के वीरमगाम स्थान मेँ हुआ  !  सुप्रसिध्ध आरती मेँ श्री कृष्ण व राधा के प्रति कवि की भक़्ति अपूर्व लालित्य लिये नये नये उपमा एवं प्रतीकोँ से सुसज्ज पदावली द्वारा अनोखा माधुर्य प्रदान कर रहीं  हैं।  प्रमुख काव्य सँग्रह - प्रतीक, अशब्द -रात्रि, प्रबल -गति, व्योमलिपि इत्यादि
प्रियकाँत  मणियार ~ परिचय : गुजरती भाषा में ~

પ્રિયકાંત મણિયાર (૨૪-૧-૧૯૨૭ થી ૨૫-૬-૧૯૭૬) ની આ અતિપ્રસિદ્ધ આરતી છે.  દરેક કવિસંમેલનના અંતે પ્રિયકાંત આ આરતી સ્વકંઠે અવશ્ય ગાતાં. પ્રિયકાંત જ્યારે ગીત લખે છે ત્યારે ખીલે છે. વિરમગામમાં જન્મ, અમરેલીના વતની અને અમદાવાદમાં વર્ષો સુધી  મણિયારનો વ્યવસાય એમણે કર્યો. સજીવ સૌન્દર્યચિત્રો દોરીને સજાવાયેલા ઘાટીલાં કાવ્યો નવીન પ્રતીકો અને લલિત પદાવલીથી વધુ ધ્યાનાકર્ષક બને છે.
કૃષ્ણ અને રાધા માટેનો એમનો મીરાં જેવો અદકેરો પ્રેમ અમનાં અસંખ્ય ગીતોમાં રજૂ થયો છે.  ‘નભ’થી ઉઘાડ પામીને આ કાવ્ય ‘લોચન’માં વિરમે એ દરમ્યાનમાં પ્રકૃતિથી  માનવ-મન સુધી પ્રેમભાવ અદભૂત રીતે વિસ્તરે છે.
કાવ્યસંગ્રહો : ‘પ્રતીક’, ‘અશબ્દ રાત્રિ’, ‘પ્રબલગતિ’, ‘વ્યોમલિપિ’ વિ.

कवि प्रियकांत मणियार की गुजराती कविता

આ નભ ઝૂક્યું તે કા’નજી ને ચાંદની તે રાધા રે.
આ સરવર જલ તે કા’નજી ને પોયણી તે રાધા રે.
આ બાગ ખીલ્યો તે કા’નજી ને લ્હેરી જતી તે રાધા રે.
આ પરવત શિખર કા’નજી ને કેડી ચડે તે રાધા રે.
આ ચાલ્યાં ચરણ તે કા’નજી ને પગલી પડે તે રાધા રે.
આ કેશ ગૂંથ્યા તે કા’નજી ને સેંથી પૂરી તે રાધા રે.
આ દીપ જલે તે કા’નજી ને આરતી તે રાધા રે.
આ લોચન મારાં કા’નજી ને નજરું જુએ તે રાધા રે.

प्रियकांत मणियार की गुजराती कविता का हिंदी अनुवाद :

"यह झुका हुआ नभ कान्हजी और चाँदनी हैँ राधा रे!
यह सरवर जल हैँ कान्हजी और पद्मपुष्प हैँ राधा रे!
यह खिला बाग है कान्हजी और लहरी बहे वो राधा रे!
यह चले चरण वो कान्हजी और पगछाप दीखे वो राधा रे!
" ये गूँथे केश हैँ कान्हजी और भरी माँग हैँ राधा रे! "
यह जलता दीप हैँ कान्हजी और आरती हैँ राधा रे ~
        ( २ )
गुजरात का सुप्रसिद्ध लोक गीत " मेंहदी रँग लाग्यो रे " ~
 
   हिन्दी अनुवाद ~
" ओ भाभी मोरी महावर रचाई ल्यो"
  मेहन्दी बोई थी मालव मेँ
  उसका रँग गया गुजरात रे,
  भाभी मेरी महावर रचाई लो !
   कुट पीस के भरी कटोरीयाँ,
  ओ भाभी रचालो ना तुम्हारे हाथ रे
    भाभी,  मेहँदी लगा लो !"
      पूरा  लोकगीत ~
तन है रूप की लोरी आंखों में मद अपार
घूंघट में यौवन की ज्वाला, पायल की  झंकार
लंबा आँचल चुनरी का, गजरों की बहार
लटक मटक चाल चलती, देखो गुर्जरी नार !
मेहंदी बोयी मालवे में, इस का रंग निखरा गुजरात
लाडला देवर लाया मेहंदी का बिरवा रे
आहा मेहंदी तेरा रंग लगा रे !
कूट पीस कर भरी कटोरी, भाभी अब रंग लो हाथ
आहा मेहंदी तेरा रंग लगा रे!
लंबा कोट , मूंछें बांकी,सिर पे पगड़ी लाल
एक एक बोल, तौल कर बोले, छैलछबीला गुजराती
तन छोटा पर मन बडा खमीरवन्त है जाति
भले ही लागूँ मै भोला भाला, मैँ हूँ छैलछबीला, गुजराती !
भाभी : इन हाथोँ को रँग के वीराँ क्या करूँ ?
इन्हेँ देखनेवाला गया है रे परदेस रे
हाय  ~ मेहंदी तेरा रंग लगा रे!
गुजराती शब्द ~

તન છે રૂપનું હાલરડું ને આંખે મદનો ભાર
ઘૂંઘટમાં જોબનની જ્વાળા ઝાંઝરનો ઝમકાર
લાંબો છેડો છાયલનો, ને ગજરો ભારો ભાર
લટકમટકની ચાલ ચાલતી જુઓ ગુર્જરી નાર
મેંદી તે વાવી માળવે ને એનો રંગ ગયો ગુજરાત રે
મેંદી રંગ લાગ્યો રે
નાનો દિયરડો લાડકો જે, કંઇ લાવ્યો મેંદીનો છોડ રે
… મેંદી …
વાટી ઘૂંટીને ભર્યો વાટકો ને ભાભી રંગો તમારા હાથ રે …
મેંદી
હે… લાંબો ડગલો, મૂછો વાંકડી, શિરે પાઘડી રાતી
બોલ બોલતો તોળી તોળી છેલછબીલો ગુજરાતી
હે॥ .......
તન છોટુ પણ મન મોટું, છે ખમીરવંતી જાતી
ભલે લાગતો ભોળો, હું છેલછબીલો ગુજરાતી
હાથ રંગીને વીરા શું રે કરું?
રે મેંદી રંગ લાગ્યો રે. more information : 
   ****  श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर***********************
 
श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर (१८६१ -१९४१ )
श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर की मूल बांग्ला कविता जन्मकथा : का अनुवाद ~
श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर (१८६१ -१९४१ ) काव्य पुस्तक "गीतांजलि "बांग्ला कवि  गुरूदेव #रवीन्द्रनाथ #टैगोर की सर्वाधिक प्रशंसित और पठित पुस्तक है। सं. १९१० में, विश्व प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार संस्था द्वारा विश्व के सर्वोत्तम साहित्य सृजन के लिए श्री  रवीन्द्रनाथ टैगौर को पुरस्कृत किया गया । तद्पश्चात  अपने समग्र  जीवन काल में वे भारतीय साहित्याकाश पर धूमकेतु सदृश्य छाए रहे। साहित्य की विभिन्न विधाओं, संगीत और चित्र कला में सतत् सृजनरत रहते हुए उन्होंने अन्तिम साँस तक सरस्वती की साधना की तथा भारतवासियों ने उन्हें ' गुरू देव'  के सम्बोधन से सम्मानित किया तो भारतवासियों के अगाध स्नेह स्वरूप वे सदा के लिए प्रतिष्ठित हो गए ।
प्रकृति, प्रेम, ईश्वर के प्रति निष्ठा, एवं  मानवतावादी मूल्यों के प्रति समर्पण भाव से सम्पन्न काव्य पुस्तक "गीतांजलि"  के सभी गीत,  पिछली एक सदी से बांग्लाभाषी जनों की आत्मा में रचे ~ बसे हुए हैं। रवींद्र संगीत इसी से उत्पन्न होकर आज एक सशक्त संगीत विधा कहलाता है। विभिन्न भाषाओं में हुए गीतांजलि के गीतों के
काव्य अनुवादों के माध्यम से, समस्त  विश्व के सह्रदय पाठक  अब गुरुदेव श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर जी की के भाव सभार गीतों व कविताओं का रसास्वादन कर संपन्न हो चुके हैं।प्रस्तुत अनुवाद हिंदी में भिन्न है कि इसमें मूल बांग्ला रचनाओं के गीतात्मकता को बरकरार रखा गया है, जो इन गीतों का अभिन्न हिस्सा है, इस गेयता के कारण आप इन गीतों को भलीभाँति याद रख सकते हैं। 

श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर की मूल बांग्ला कविता बँगाल के कवि रत्न, साहित्य के लिये, नोबल इनाम से सुशोभित, ख्याति प्राप्त, श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखी कविता ~ जन्मकथा : का काव्यानुवाद ~
           जन्मकथा :
" बच्चे ने पूछा माँ से , मैं कहाँ से आया माँ ? "
माँ ने कहा, " तुम मेरे जीवन के हर पल के संगी साथी हो !"
जब मैं स्वयं शिशु थी, खेलती थी गुडिया के संग, तब भी,
और जब शिवजी की पूजा किया करती थी तब भी,
आँसू  और मुस्कान के बीच बालक को,
कसकर, छाती से लिपटाए हुए, माँ ने कहा,

" जब मैंने देवता पूजे, उस वेदिका पर तुम्हीं  आसीन थे !
मेरे प्रेम, इच्छा और आशाओं में भी तुम्हीं तो थे !
और नानी माँ और अम्मा की भावनाओं में भी, तुम्हीं  थे !
ना जाने कितने समय से तुम छिपे रहे !
हमारी कुलदेवी की पवित्र मूर्ति में ,
हमारे पुरखों  की पुरानी हवेली मेँ तुम छिपे रहे !
जब मेरा यौवन पूर्ण पुष्प सा खिल उठा था,
तुम उसकी मदहोश करनेवाली मधु गँध थे !
मेरे हर अंग प्रत्यंग में तुम बसे हुए थे
 तुम्हीं में हरेक देवता बिराजे हुए थे
तुम, सर्वथा नवीन व प्राचीन हो !
उगते रवि की उम्र है तुम्हारी भी,
आनंद के महासिंधु की लहर पे सवार,
ब्रह्माण्ड के चिरंतन स्वप्न से ,
तुम अवतरित होकर आए थे।
अनिमेष द्रष्टि से देखकर भी
एक अद्भुत रहस्य रहे तुम !
जो मेरे होकर भी समस्त के हो,
एक आलिंगन में बध्ध, सम्बन्ध,
मेरे अपने शिशु , आए इस जग में,
इसी कारण मैं, व्यग्र हो, रो पड़ती हूँ,
जब, तुम मुझ से, दूर हो जाते हो...
कि कहीँ, जो समष्टि का है
उसे खो ना दूँ कहीँ !
कैसे सहेज बाँध रखूँ उसे ?
किस तिलिस्मी धागे से ?
अनुवाद :- लावण्या
Poem  : Birth Story : Original in Bengali
'Janmkatha ' by Rabindranath Tagore ~
Transcreation by : Kumud Biswas :
kid asks his mum,‘From where did I come,
Me where did you find?’
Holding him tight in an embrace
In tears and laughter
The mum replies,‘You were in my mind
As my deepest wish।
You were with me When I was a childA
nd played with my dolls।
When worshiping Shiva in the morning
I made and unmade you every moment।
You were with my deity on the altar
And with him I worshiped you too।
You were in my hopes and desires,
You were in my love,
And in the hearts of my mum and grand mum।
I don’t know how long You kept yourself hiding
In our age old home
In the lap of the goddess of our family
When I bloomed like a flower in my youth
You were in me like its sweet smell
With your softness and sweetness
You were in my every limb।
You are the darling of all gods
You are eternal yet new
You are of the same age as the morning Sun
From a universal dream
To me you came floating On the floods of joy
That eternally flows in this world।
Staring at you in wonder
I fail to unfold your mystery
How could one come only to me Who belongs to all?
Embracing your body with my body You have come
to this world as my kid
So I clasp you tightly in my breast
And cry when you are away for a moment
I always remain in fear I may loose
One who is the darling of the world।
I don’t know how shall I keep you
Binding in what magic bond।’

Tuesday, April 7, 2020

गीतों और गज़लों से सजी हिन्दी चित्रपट की दुनिया का सुरीला सफ़र


ज हम हिंदी सिनेमा जगत में गीत और ग़ज़लों के लिखनेवाले , कुछ जाने पहचाने और कुछ सदाबहार कलाकारों को याद करते हुए चलें , संगीत और सृजन की, एक अनोखी, सुरीली , संगीतमय यात्रा पर !
आपने भी कई बार , इन कलाकारों के रचे, गीतों को गुनगुनाया होगा - ये मेरा विशवास है - जैसा की अकसर होता है, जब भी हमारी जिंदगी में , ऐसे पल आते हैं जिनसे गुजरते हुए,
अनायास ही हमारे जहन में, कोइ भूला - बिसरा गीत,उभर आता है और हम, हमारी संवेदना को उसी गीत में ढालकर , गीत, गुनगुनाने लगते हैं !....ये कितने आश्चर्य की बात है कि, अकसर हमारे मन में चल रही हलचल को, कोइ ना कोइ गीत, या कोइ ग़ज़ल, हूबहू, उसी के अनुरूप, किसी ख़ास अंदाज़ में मिल ही जाती है और अकसर ये गीत साहित्य या हिंदी फिल्मों से सम्बंधित होता है !
आज हम, कई सारे मशहूर कलाकारों को याद करेंगें जिनके गीत और ग़ज़ल हमारे जीवन में ऐसे रच बस गए हैं मानो वे हमारे परिवार और हमारे जीवन का अभिन्न अंग ही हों ! हाँ, कई ऐसे कालाकार और उनके नाम आज हम चाहकर भी न ले पायेंगें क्यूंकि ये असंभव सी बात है सभी का नाम लेना और उनके गीत याद करना ! अगर सभी का नाम लूं, तब तो मेरा आलेख बहुत लंबा हो जाएगा और आपका समय भी तो कीमती है !
आज बस यही समझें , संगीत की बगिया से फूल नहीं, महज कुछ पंखुरियां ही चुन कर, आपके सामने पेश कर रही हूँ --
मुझे याद है बचपन में देखी फिल्म "जागृति " जिसके तकरीबन सारे गीत, हर भारतीय ने बचपन से लेकर, अपनी जीवन यात्रा के हर मुकाम पार करते हुए ,गुनगुनाये होंगें !
" आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झाँकी हिंदुस्तान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम ..."
और
" दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तू ने कर दिया कमाल
आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ..."...और
" हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के
तुम ही भविष्य हो मेरे भारत विशाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के "
इन अमर गीतों के साथ याद कर लें और नमन करें कवि प्रदीप जी की लेखनी को !
ऐसे ही, देश - प्रेम या भारत प्रेम का जज्बा कुछ और गहराता है जब जब हम गाते हैं ,
" सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है

वक़्त आने पर बता देंगे तुझे ओ आसमाँ
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है "
श्री राम प्रसाद "बिस्मिल " के त्याग और बलिदान के रंग में रंगे ये अक्षर समय के दरिया से भी ना धुन्धलायेंगें !
मुगलिया सल्तन के शाही तख्तो ताज के उजड़ने कि कहानी अगर कोइ चाँद लफ्जों में बयान करे तब यही कहेगा
" उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इंतज़ार में
दो आरज़ू में कट गये
कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिये
दफ़्न के लिये
दो ग़ज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में -
लगता नहीं है जी ..."
और ये बेनूरानी के सबब से ख्यालात थे हिन्दोस्तान के अंतिम मुगलिया बादशाह ,
बहादुर शाह जफर के --
गीत और गज़लों की यही तो खूबी है जो महज चाँद लफ्जों से वे हमारे जहन में उभार देते हैं
एक सदी का पूरा इतिहास !
दरिया की रवानी सी बहती गीत की तर्ज पे हम डूबते उतरते हुए सिन्धु से गंगा और वोल्गा से नाईल पार करते हुए, एमेजोन और मिसिसिपी या तैग्रीस और होआन्ग्हो भी घूम आते हैं  और
श्री भारत व्यास
और हिंदी संगीत निर्देशकों के पितामह
श्री अनिल बिस्वास
द्वारा रचा ये गीत भी नदी किनारे पर सुन लें
"घबराए जब मन अनमोल,
और ह्रदय हो डाँवाडोल,
तब मानव, तू मुख से बोल,
बुद्धम सरणम गच्छामी.....
बुद्धम सरणम गच्छामी,
धम्मम सरणम गच्छामी,
संघम सरणम गच्छामी." फिल्म थी ' अंगुलीमाल "
संत ज्ञानेश्वर फिल्म में ये गीत था~ 
"ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो
राह में आए जो दीन दुखी, सबको गले से लगाते चलो "
" हरी भरी वसुंधरा पर नीला नीला ये गगन
   के जिसपे बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन
    दिशाएं देखो रंग भरी
    दिशाएं देखो रंग भरी चमक रहीं उमंग भरी
   ये किसने फूल फूल से किया श्रृंगार है
    ये कौन चित्रकार है ये कौन चित्रकार"
फिल्म : " बूँद जो बन गयी मोती " से
प्रकृति के सौन्दर्य की पूजा का गीत है और भारत व्यास जी की लेखनी राजस्थान की रंगोली परोसते हैं ऐसे उत्कृष्ट प्रणय गीत से
फिल्म थी "दुर्गादास " और गीत के शब्द हैं,
" थाणे काजळियो बणालयूं म्हारे नैणा में रमाल्यूं -२
    राज पळकां में बन्द कर राखूँली
    हो हो हो, राज पळकां में बन्द कर राखूँली "
और फिल्म नवरंग का ये सदाबहार गीत
"आधा है चंद्रमा रात आधी
रह न जाए तेरी मेरी बात आधी, मुलाक़ात आधी
आधा है चंद्रमा..."
और तब नयी " परिणीता "( यही शीर्षक भी था ) का मनभावन रूप इन शब्दों में ढलता है ~
" गोरे-गोरे हाथों में मेहंदी रचा के
नयनों में कजरा डाल के
चली दुल्हनिया पिया से मिलने
छोटा सा घूँघट निकाल के -२
गोरे-गोरे हाथों ..में."
फैज़ अहमद फैज़ के लफ्जों पे गौर करें --
" ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो
राह में आए जो दीन दुखी, सबको गले से लगाते चलो "
और नूरजहाँ की आवाज़ में "कैदी " फिल्म की ये ग़ज़ल
 क्या खूब है, अल्फाज़ फिर फैज़ साहब के हैं
" लौट जाती है इधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न, मग़र क्या कीजे - २
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग "
" ख़ूँरेज़ करिश्मा नाज़ सितम
ग़मज़ों की झुकावट वैसी ही
पलकों की झपक पुतली की फिरत
सूरमे की घुलावट वैसी ही"~ 
"हुस्ने ए जाना " प्राइवेट आल्बम से जिस गाया छाया गांगुली ने और तैयार किया मुज़फ्फर अली ने~  शायरी नजीर अकबराबादी साहब के कमाल का ये नमूना क्या खूब है !
अब आगे चलें, सुनते हुए,
" मुझपे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई है
   ऐ मुहब्बत तेरी दुहाई है
    मुझ पे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई है ."
इस ग़ज़ल के बोल लिखे थे, जां निसार अख्तर साहब ने फिल्म 'यास्मीन"  में और संगीत से सजाया था सी. रामचन्द्रने और आवाज़ है  स्वर साम्राज्ञी लता जी की !
जनाब जां निसार अख्तर के साहबजादे जावेद अख्तर साहब, अपने अजीम तरीम वालीद से भी ज्यादह  मशहूर हुए और कई खूबसूरत नगमे उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपने हुनर से पेश कीं थीं वे आज भी अपने लेखन में, मसरूफ हैं~ 
" ऐ जाते हुए लम्हों ज़रा ठहरो ज़रा ठहरो
    मैं भी तो चलता हूँ ज़रा उनसे मिलता हूँ
     जो एक बात दिल में है उनसे कहूं
       तो चलूं तो चलूं हूं हूं हूं हूं
        ऐ जाते हुए लम्हों ..."
गायक रूप कुमार राठोड के स्वर, फिल्म - बॉर्डर, संगीत अनु मल्लिक का और फिल्म " सिलसिला" का ये लोकप्रिय गीत
" देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए
   दूर तक निगाहों में हैं गुल खिले हुए
     ये ग़िला है आप की निगाहों का 
     फूल भी हों दर्मियां तो फ़ासले हुए "
जगजीत सिंह जी की आवाज़ में "साथ साथ फिल्म का ये गीत,
संगीत कुलदीप सिंह का, एक अलग सा माहौल उभारता है
" तुम को देखा तो ये ख़याल आया 
  ज़िंदगी धूप तुम घना साया
    तुम को..."
राजा मेहेंदी अली खान साहब के इन दोनों गीतों को जब लता जी का स्वर मिला तो मानो सोने में सुगंध घुल मिल गई  
संगीत मदन मोहन का था और फिल्म  " वह कौन थी ? "
" नैना बरसें, रिमझिम रिमझिम
नैना बरसें, रिमझिम रिमझिम
पिया तोरे आवन की आस
नैना बरसें, रिमझिम रिमझिम
नैना बरसें, बरसें, बरसें "
और अनपढ़ का ये गीत ,
" आप की नज़रों ने समझा, प्यार के काबिल मुझे
दिल की ऐ धड़कन ठहर जा, मिल गई मंज़िल मुझे
आप की नज़रों ने समझा .."
फिल्मों में उर्दू ग़ज़लों की बात चले और शकील बदायूनी और साहीर लुधियानवी साहब का नाम ना आये ये भी कहीं हो सकता है ? साहीर ने कितनी बढिया बात कही ,
" तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा
इन्सान की औलाद है इन्सान बनगा "
संगीत एन. दता का  फिल्म "धर्मपुत्र " गायक मुहम्मद रफी -
गीता दत्त का गाया पुरानी देवदास का गीत जिसे संगीत में ढाला सचिन दा ने इस भजन में,
" आन मिलो आन मिलो श्याम सांवरे ... आन मिलो " भी साहीर का लिखा था और " वक्त " का ये रवि के संगीत से सजा सदाबहार नगमा
" ऐ मेरी ज़ोहरा-ज़बीं
  तुझे मालूम नहीं
तू अभी तक है हंसीं
   और मैं जवाँ
तुझ पे क़ुरबान मेरी जान मेरी जान
   ऐ मेरी ..."
" साधना " फिल्म का लता जी के स्वर में, ये नारी शोषण के लिए लिखा गीत
" औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा कुचला मसला, जब जी चाहा दुत्कार दिया "
और
' रेलवे प्लेटफोर्म' का गीत : मनमोहन कृष्ण और रफी के स्वर में मदन मोहन का संगीत
" बस्ती-बस्ती पर्वत-पर्वत गाता जाए बंजारा
ले कर दिल का इकतारा
बस्ती-बस्ती पर्वत-पर्वत ..." ये सारे गीत और गज़लें ,
साहीर साहब की अनोखी प्रतिभा के बस, नन्हे से नमूने हैं -
शकील बदायूनी की ये पाक इल्तजा फिल्म "मुगल ए आज़म " में लता जी की आवाज़ में सदीयों गूंजती रहेगी
" ऐ मेरे मुश्किल-कुशा, फ़रियाद है, फ़रियाद है
   आपके होते हुए दुनिया मेरी बरबाद है
   बेकस पे करम कीजिये, सर्कार-ए-मदीना
    बेकस पे करम कीजिये
   गर्दिश में है तक़दीर भँवर में है सफ़ीना -२
   बेकस पे करम कीजिये, सर्कार-ए-मदीना
    बेकस पे करम कीजिये "
और उमा देवी ( टुनटुन ) का स्वर और नौशाद का संगीत "दर्द" फिल्म में सुरैया जी की अदाकारी से सजा
" अफ़सान लिख रही हूँ (२) दिल-ए-बेक़रार का
आँखोँ में रंग भर के तेरे इंतज़ार का
अफ़साना लिख रही हूँ "

बैजू बावरा " फिल्म के संगीतकार, नौशाद , शायर शकील ,और गायक रफी ने ये सिध्ध कर दिया की कला और संगीत किसी भी मुल्क , कॉम या जाति बिरादरी में बंधे नहीं रहते वे आजाद हैं - हवा और बादल की तरह और पूरी इंसानियत पे एक सा नेह लुटाते हैं !
" मन तड़पत हरि दरसन को आज
मोरे तुम बिन बिगड़े सकल काज
आ, विनती करत, हूँ, रखियो लाज, मन तड़पत..."

सुरीली गायिका आशा भोसले का स्वर और जयदेव का संगीत,
हिंदी कविता की साक्षात सरस्वती महादेवी जी के गीतों को
नॉन फिल्म गीत देकर , अमर करने का काम कर गयी है -
" मधुर मधुर मेरे दीपक जल !
  युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल,
   प्रियतम का पथ आलोकित कर !
   सौरभ फैला विपुल धूप बन,
   मृदुल मोम सा घुल रे मृदु तन;
   दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
     तेरे जीवन का अणु अणु गल !
    पुलक पुलक मेरे दीपक जल ! "
डाक्टर राही मासूम रजा ने कहा जगजीत ने गाया नॉन फिल्म गीत : " हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद - २
अपनी रातकी छत पर कितना, तनहा होगा चांद हो  ओ  ओ
हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद ..."
और निदा फाजली का लिखा जगजीत का गाया ये भी नॉन फिल्म गीत
" ओ मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की, बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये, जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है, बाहों भर संसार "
तलत का गाया गालिब का कलाम, भी नॉन फिल्म गीत
" देखना क़िस्मत कि आप अपने पे रश्क आ जाये है
    मैं उसे देखूँ भला कब मुझसे देखा जाये है "
  ये भी एक स्वस्थ परिपाटी की और इशारा करते हैं और हमें ये बतलाते हैं कि, जरुरी नहीं है के हरेक गीत सिनेमा में हो !
परंतु फिल्म से जुड़े कलाकोरों ने, ऐसे कई सुन्दर गीत और कलामों को संजोया है, जो हम श्रोताओं के लिए  नायाब तोहफा ही तो है !
इन्टरनेट पर हिंदी फिल्म में गीत और ग़ज़ल , लिखनेवालों पर , पिछले कुछ समय में , स - विस्तार और काफी महत्वपूर्ण सामग्री दर्ज की गयी है।
मेरे पापा जी, स्व. पण्डित नरेंद्र शर्मा का नाम "न " अक्षर से खोजते समय, मुझे, इतने सारे नाम और भी मिले !
आप भी गर चाहें और अपने प्रिय गीतकार या संगीतकार या गायक पर खोज करना चाहें तब ये देखिये
लिंक :
Pt. Narendra Sharma
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Songs of Pt. Narendra Sharma as a lyricist

baa.Ndh priiti phuul Dor: text, हिंदी,
chhabi terii madhur ... man me.n mere a.ngaare hai.n: text, हिंदी,
gun gun gun gun bole re bha.nwar: text, हिंदी,
hai kahii.n par shaadamaanii aur kahii.n naashaadiyaa.N: text, हिंदी,
ham chaahe.n yaa na chaahe.n: text, हिंदी,
jaa re cha.ndr, jaa re cha.ndr, aur kahii.n jaa re: text, हिंदी,
jo samar me.n ho gae amar - - Lata: text, हिंदी,
jyoti kalash chhalake jyoti kalash chhalake: text, हिंदी,
koii banaa aaj apanaa: text, हिंदी,
mai.n yauvan ban kii kalii: text, हिंदी,
man me.n mere a.ngaare hai.n (chhabi terii madhur): text, हिंदी,
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ये भी दुसरे कई सारे गीतकार व गज़लकारों पर लिंक हैं --
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एम. जी. हशमतमजरुह सुलतानपुरी
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मीर तकी मीरमिर्जा शौक
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प्रेम धवनपं. नरेन्द्र शर्मा
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साहिर लुधियानवीसमीर
संतोष आनंदसावन कुमार
शहरयारशैलेन्द्र
शैली शैलेन्द्रशकिल बदायुनी
शेवान रिझवीवसंत देव
योगेश

आशा है आपको ये गीत व ग़ज़ल कि दुनिया से जुडी दीलचस्प बातें पसंद आयी होंगीं। आप अपने सुझाव तथा प्रश्न, यहां लिख कर भेज सकते हैं। ई मेल : lavnis@gmail.com
फिर मिलेंगें -- आज इतना ही। ..  .. 
" जिंदगी एक सफ़र है सुहाना,
यहां कल क्या हो किसने जाना ! "
स - स्नेह,
- लावण्या