( 2 ) Lata remembers Papa Pt Narendra Sharma In this remarkable interview legendry singer Lata Mangeshkar nostalgically talks about her early life and how Pt Narendra Sharma encouraged her in the days of her struggle। It was a special relationship। Lata called the great Hindi poet as Papa as she saw in him the image of her father। In this very informal interview with Pt Narendra Sharma's daughter Lavanya Shah Lata opens her heart। The interview was first broadcast at Radio Cincinnati's Indian programme Swaranjali। To Listen click here (Hindi)
Sunday, May 11, 2008
२ रेडियो इंटरव्यू
( 2 ) Lata remembers Papa Pt Narendra Sharma In this remarkable interview legendry singer Lata Mangeshkar nostalgically talks about her early life and how Pt Narendra Sharma encouraged her in the days of her struggle। It was a special relationship। Lata called the great Hindi poet as Papa as she saw in him the image of her father। In this very informal interview with Pt Narendra Sharma's daughter Lavanya Shah Lata opens her heart। The interview was first broadcast at Radio Cincinnati's Indian programme Swaranjali। To Listen click here (Hindi)
Saturday, May 10, 2008
भारतीय धर्म, सँस्कार की खुशबु,आज विश्वव्यापी बन पाई है

मां को क्या कोइ सिर्फ़ एक दिन ही याद करता है ? या पिता को ? या गुरु को ? नहीं ..जी ।
ये तो, महज बहाना है वेस्टर्न सभ्यता का , अगर यहां ऐसे दिन ना रखते तब, व्यस्त , मशीनी जिन्दगी र हे लोग , शायद , इस एक दिन के लिए भी समय निकाल न पाते ..ऐसा भी नही लोग अपने माता , पिता को याद नही करते , करते भी हैं और जीवन की आपाधापी में समय अभाव में , या अन्य कारणों से व्यस्त हो जाते हैं ॥
आज, " माता ओं के ख़ास दिवस पर
" मेरी जन्मभूमि, मेरी , भारत माता को मेरे सलाम "
नरसिँह मेहता भी कह गये,
"गोळ विना सुनो कँसार्,
मात् विना सुनो सँसार
मात विना ते शो अवतार ? "
आपके आसपास की हर माँ को , अवश्य कहियेगा, " ओ माँ तुझे सलाम " !
http://www।indianera.com/slideshow/april/08041001/index.asp महात्मा गाँधी की जीवनी आज , भारत ही नही विदेश मेँ भी, हर किसी को प्रेरित करती है. न्यू योर्क शहर मेँ " टमारीन्ड कला दीर्घा " के सौजन्य से, गाँधी जी की विरासत क्या है उस से जुडे चित्रोँ की प्रदर्शनी लगायी गयी . जिस मेँ गाँधी बापू उपवास मेँ , दुर्बल अवस्था मेँ भी प्रसन्न मुद्रा मेँ लेटे हुए हैँ ये देखकर , दर्शकोँ के विस्मय ने तुरन्त गौरव व स्वाभिमान की भावना का स्थान ले लिया. कई भारतीय तथा विदेशी अतिथि गण गाँधी के प्रति श्रध्धा वचन कहते हुए अपने को धन्य महसूस कर रहे थे. ये देखेँ : ~~ http://www.indianera.com/slideshow/april/08041001/index.asp भारतीय धर्म, सँस्कार की खुशबु, हर प्राँत से निकलकर आज विश्वव्यापी बन पाई है जिसका आधार है भारतीयोँ का देशाटन तथा अपने सँस्कारोँ की धरोहर को हर भौगोलिक भूखँड पर बसते हुए भी, अपने देश से जो सौगात लेकर चले हैँ उस उद्दात परँपराओँ को सहेजे रखना ! कार्य क्षमता मेँ दक्ष भारतीय, चाहे युरोपीय देशोँ मेँ रहेँ या औस्ट्रेलिया, न्यूझीलैन्ड जैसे पूर्वीय छोर के द्वीपीय महाखँडोँ मेँ जा पहुँचे या कि, उत्तर अमरीका के कनाडा या अमरीका के ही क्योँ ना नागरीक बनेँ, हर परिस्थिती मेँ, भारतीय मूल के स्त्री व पुरुष, एक सफल कार्यकर्ता होने के साथ, आदर्श नागरीक तथाअपने मूल वतन भारत के प्रतिनिधि भी बन ही जाते हैँ. भारत के प्रति प्रेम, सदभाव, भारत के अतीत से जुडे सँस्कारोँ की विरासत को भी ये भारतीय जन अपने ह्र्दय से लगाये रखते हैँ . दोहरी भूमिका, दोहरा बोझ, अनेक विषम परिस्थितीयोँ मेँ भी हँसते हुए , द्रढ मनोबल से उठाये रखते हैँ और भारत के ज्वलँत प्रश्नोँ व समस्याओँ के प्रति भी सदा जागरुक रहते हैँ. जो धन कमाया उसका सद्` उपयोग भी कई प्रकार अपने नये अपनाये देश के अन्य नागरिकोँ के हित मेँ करते हुए, अपनी जिम्मेदारीयाँ उठाते हुए, भारत के करोडोँ भाई बहनो के लिये भी , अमरीका हो या इन्ग्लैँड या कि सिँगापोर या खाडी के अन्य मुल्क, वहाँ से हर भारत माँ का सच्चा सपूत या सुपुत्री भारत माँ के लिये अपने श्रम की बूँदोँ की कतरेँ , सेवा भाव से , चरण कमलोँ पर निछावर करती आयी है. ये देखेँ तेलेगु कौम का " सर्वधारी उगादी पर्व महोत्सव " : http://www.indianera.com/slideshow/april/08042102/index.asp तेलेगु भाई बहन उगादी मनाते हैँ तो गुजराती कौम सोत्साह स्वामीनारायण सँस्था से जुडकर , कच्छ के भूकँप की तबाही जैसे दारुण कुदरती हादसोँ के वक्त अपना श्रम दान्, धन दान करते नजर आते हैँ http://www.indianera.com/slideshow/april/08040501/index.asp ये चित्रमय लोकापर्ण है श्री बाल्मिकी प्रसाद सिँह की पुस्तक " बहुधा और " ९ / ११ के बाद " पुस्तक के बारे मेँ : और भारत से दूर रहते हुए भी अगली पीढी को होली के रँग भरे मस्ती के आनँद से भी इस तरह अवगत कराया गया देखिये लिन्क http://www.indianera.com/slideshow/08032405/index.asp
केरल से कई भारतीय खाडी मुल्कोँ मेँ काम करने जाते हैँ उनकी कार्य स्थिति के बारे मेँ बहारीन के श्रम मँत्री मजिद अल अलावी से परदेश मँत्री वायलार रवि जी ने (जो भारतीय कार्योँ से सँबँधित हैँ) उन्होँने, कई नये मुद्दोँ पर करार स्थापित किया -- करीब २८०, ००० भारतीय केरल से बहारीन मेँ काम कर रहे हैँ - व्यापार और वाणिज्य मँत्री कमल नाथ जी का तो ये कहना है कि अगर आफ्रीकी पिछडे और अकाल व युध्ध की दोहरी मार से व्यथित प्राँतोँ को अगर खाडी के देश , अरब गण राज्य और भारत मिलकर सहायता करते हैँ तब अफ्रीका मेँ राहत जो मिल सकती है और स्थिती पलट सकती है। ऐसी बातेँ सुनकर भविष्य के प्रति आशा बँधती है कि अगर विश्व अगर सचमुच एक ईकाई बनता जा रहा है और भूमँडलीकरण और वैश्वीकरण बाजार के साथ साथ विश्व बँधुत्व की भावना का प्रेणेता बनता जाये तब , २१ वीँ सदी मेँ, मनुष्य अनेक समस्याओँ के साथ जूझते हुए भी शायद , एक सँतोषकारक दिशा की ओर अग्रसर हो पायेगा। शायद मैँ आशावान हूँ, इसलिये, अनेक विडँबना और वर्जनाओँ के मध्य भी , आशा की हल्की किरण देखने की आदी हूँ ! चूँकि, सूरज वहीँ उस किरण के पीछे ही तो कुहासे से ढँका हुआ, एक नई सुबह का इँतज़ार कर रहा है! जहाँ से एक नया सुनहरा " मानव दिवस" अवश्य प्रकट होगा
-- लावण्या
Friday, May 9, 2008
ग्रीष्म की एक रात
रात उतर आयी गहरी कालिमा
साथ उमस लाई पीली नीलिमा
विवश थकान भरे तन मन मेरे,
अश्रु सुषुप्त मन बालू में
मन जगा , भागे अविरल चेतक सा -
नेत्र खींच ले पलक बिछोना,
हे मन, होंगें, ऐसे कितने प्राणी
बोझ लिए मंथन का !
हर तरफ़ ग्रीष्म जलन फ़ैली,
पीली तपन बिखरती,
गहरी सुनहरी, दिन भर ,
फ़िर, रात उतर आयी थकी बुझी ,
चाँद मुरझाया ,
गगन पे मैली सी चांदनी,
रात उतर आयी गहरी कालिमा
आज रात ...
-- लावण्या
Thursday, May 8, 2008
जीवंत प्रकृति


खिले कँवल से, लदे ताल पर,
मँडराता मधुकर~ मधु का लोभी.
गुँजित पुरवाई, बहती प्रतिक्षण
चपल लहर, हँस, सँग ~ सँग,
हो, ली !
एक बदलीने झुक कर पूछा,
"ओ, मधुकर, तू ,
गुनगुन क्या गाये?
"छपक छप -
मार कुलाँचे,मछलियाँ,
कँवल पत्र मेँ,
छिप छिप जायेँ !
"हँसा मधुप, रस का वो लोभी,
बोला,
" कर दो, छाया,बदली रानी !
मैँ भी छिप जाऊँ,
कँवल जाल मेँ,
प्यासे पर कर दो ये, मेहरबानी !"
" रे धूर्त भ्रमर,
तू,रस का लोभी --
फूल फूल मँडराता निस दिन,
माँग रहा क्योँ मुझसे , छाया ?
गरज रहे घन -
ना मैँ तेरी सहेली!"
टप, टप, बूँदोँ ने
बाग ताल, उपवन पर,
तृण पर, बन पर,
धरती के कण क़ण पर,
अमृत रस बरसाया -
निज कोष लुटाया !
अब लो, बरखा आई,
हरितमा छाई !
आज कँवल मेँ कैद
मकरँद की, सुन लो
प्रणय ~ पाश मेँ बँधकर,
हो गई, सगाई !!
Wednesday, May 7, 2008
पुष्प की अभिलाषा : श्री माखनलाल चतुर्वेदी

पुष्प की अभिलाषा : श्री माखनलाल चतुर्वेदी
चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर, है हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।
कवि ने " सुर बाला" शब्द क्यों इस कविता में इस्तेमाल किया है " पुष्प की अभिलाषा" काव्य में श्री माखनलाल लाल जी ने ?? ....
उसके बरे में मेरी समझ अनुसार , यह " संकेत " है -- सांकेतिक शब्द चयन से स्वर्गीय , अप्सरा सम - - सुन्दरी का आभास स्पष्ट हो जाता है . देवों के सिर पर पुष्प चढाया जाता है ...किंतु , पुष्प की अभिलाषा है ....किसी वीर सैनिक की वह , चरण धूलि बने ..
काव्य - शिल्प का एक सशक्त चरण येही है कि , " IMAGE " याने कि , " अदृश्य - दृश्य " को भाव प्रवण व मुखरित कर जाए ऐसे शब्दों से , जो कवि कहना चाहता है , वह पाठक , के सामने स्पष्ट = साफ दिखायी देने लगता है । जब् कोई चित्र , आंखों के सामने होता है , उस समय , रंग , आकर , आकृति , दृश्य बहुत कुछ कह जाते हैं -- किंतु , उस के द्वारा उभरते दृश्य की जो प्रतिध्वनि और प्रतिसाद दर्शक के ह्रदय से भावों को आंदोलित करते हैं और जो भाव उठते हैं वही चित्र का स्थायी असर है .
Both POEM & PAINTINGS are ART forms. The effect they impart & the conotation they generate r " ABSTARACT " . The more successful is the attempt in creating SUCH art , the deeper emotion it invokes in the viewer's heart & leaves more lasting impression.
" चाह नही मैं ...सुर - बाला के गहनों में गूंथा जाऊं " इस पंक्ती के द्वारा , कवि कहते हैं कि , गहनों के साथ - साथ स्वर्ण तथा सुन्दरी का सामीप्य , व संनिन्ध्य भी पुष्प के लिए वाँछित नही ....जितना मातृ- भूमि पर शीश चढाने वाले , वीर सैनिक की चरण - रज बनना उसके लिए श्रेयस कर है । ऐसी उद्दात भावना से ही ये कविता कालजयी बन पायी है जिस का असर सदीयाँ बीत जाने पर भी दमकता रहेगा -
परम आदरणीय, हिन्दी के मूर्धन्य कवि श्री माखन लाल चतुर्वेदी जी को शत शत प्रणाम !
-- लावण्या
Monday, May 5, 2008
चोर का गमछा
ये चित्र प्रसिध्ध कवि श्री अशोक चक्रधर जी ने खीन्चा है --
बहुत कम ऐसा होता है जब् आप कोइ कविता पढ़ें और आप को , बखूबी हंसी के साथ साथ, करुना का भाव भी मन में आए !॥
ये कविता जब् मैंने पढी कविता - कोश में, जिसका कार्य भाई श्री ललित कुमार ने , शुरू किया जो आज , कई और लोगों की सहायता से , तैयार हो रहा है अगर आपने कविता - कोश न देखा हो तो मेरी आपसे नम्र इल्तजा है , आप अवश्य देखें इस साइट को ! यहां बहुत सारी कविता और कवि आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं --
आज , ये कविता आपके साथ शेर कर रही हूँ जो मुझे बहुत पसंद आयी और मन को छू गयी
चोर का गमछा छूट गया
जहां से बक्सा उठाया था उसने,
वहीं-एक चौकोर शून्य के पास
गेंडुरियाया-सा पड़ा चोर का गमछा
जो उसके मुंह ढंकने के आता काम
कि असूर्यम्पश्या वधुएं जब, उचित ही, गुम हो गई हैं इतिहास में
चोरों ने बमुश्किल बचा रखी है मर्यादा
अपनी ताड़ती निगाह नीची किए
देखते, आंखों को मैलानेवाले
उस गर्दखोरे अंगोछे मेंगन्ध है उसके जिस्म की
जिसे सूंघ/पुलिस के सुंघिनिया कुत्ते शायद उसे ढूंढ निकालें
दसियों की भीड़ में, हमें तो
उसमें बस एक कामगार के पसीने की गन्ध मिलती है
खटमिट्ठी
हम तो उसे सूंघ/केवल एक भूख को
बेसंभाल भूख को
ढूंढ़ निकाल सकते हैं दसियों की भीड़ में
रचनाकार: ज्ञानेन्द्रपति
"कविता कोश " से लिया गया
पता : www।kavitakosh।org


