Thursday, March 15, 2018

सृजन-गाथा " के सफल सम्पादक श्री जयप्रकाश मानस

दर्पण के सामने
परिचय  : 
नाम :
जयप्रकाश मानस 
(मूल नाम जयप्रकाश रथ) 
जन्म : २  अक्टूबर, १९६५ 
शिक्षा :एम.ए. (भाषा विज्ञान), 
एम.एस.सी (आई.टी.)
 प्रकाशित कृतियाँकविता संग्रह : तभी होती है सुबह, 
होना ही चाहिए आँगन 
ललित निबन्ध: दोपहर मेँ गाँव (पुरस्कृत)
बाल गीत:
१)  चलो चलें अब झील पर
२)  सब बोले दिन निकला
३) एक बनेंगे नेक बनेंगे
४)  मिलकर दीप जलायें
 नव साक्षरोपयोगी:
 १ : यह बहुत पुरानी बात है
२ : छत्तीसगढ़ के सखा
३ : लोक साहित्य:
४ : लोक वीथी:
१ ) छत्तीसगढ़ की लोक कथायें (१०  भाग)
२) हमारे लोकगीत
भाषा एवं मूल्यांकन :
१ - छत्तीसगढ़ी: दो करोड़ लोगों की भाषा
२ - बगर गया वसंत (बाल कवि श्री वसंत पर एकाग्र)
छत्तीसगढ़ी:
कलादास के कलाकारी 
(छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रथम व्यंग्य संग्रह)
शीघ्र प्रकाश्य:
१) हिन्दी ललित निबन्ध
२) हिन्दी कविता में घर
संपादन:
१) विहंग (२० वीं  सदी की हिन्दी कविता में पक्षी)
२) महत्व: डॉ. बलदेव (समीक्षक)
३ ) महत्व: स्वराज प्रसाद त्रिवेदी (पत्रकार)
पत्रिका संपादन एवं सहयोग:
१ ) बाल पत्रिका, बाल बोध (मासिक) के १२  अंकों का संपादन
२) लघुपत्रिका प्रथम पंक्ति (मासिक) के २  अंकों का  संपादन
३) लघुपत्रिका पहचान: यात्रा (त्रैमासिक) में संपादन सहयोग
४) लघुपत्रिका छत्तीसगढ़: परिक्रमा (त्रैमासिक) में संपादन सहयोग 
५ ) अनुवाद पत्रिका सद्-भावना दर्पण (त्रैमासिक) में संपादन सहयोग
६) लघुपत्रिका सृजन:गाथा (वार्षिक एवं अब त्रैमासिक)  संपादन
अंतरजाल पत्रिका: १ ) सृजन:सम्मान का सम्पादन

कृषि आधारित पत्रिका काश्तकार को तकनीकी सहयोग

सृजनगाथा (मासिक) का प्रकाशन व सम्पादन
एलबम:आडियो एलबम : 
तोला बंदौं (छत्तीसगढ़ी) ,
 जय माँ चन्द्रसैनी (उड़िया)
वीडियो एलबम : घर:घर माँ हावय दुर्गा 
(छत्तीसगढ़ी) पुरस्कार एवं सम्मान:
कादम्बिनी पुरस्कार  (टाईम्स ऑफ़ इण्डिया), 
बिसाहू दास मंहत पुरस्कार, 
अस्मिता पुरस्कार, 
अंबेडकर फैलोशिप (दिल्ली), 
अंबिका प्रसाद दिव्य रजत अलंकरण एवं अन्य तीन 
सम्मान विशेष:
ललित निबन्ध संग्रह 'दोपहर में गाँव' पर रविशंकर 
वि.वि. रायपुर से लघु शोध
देश में ललित निबन्ध पर केन्द्रित प्रथम अ. भा. 
संगोष्ठी का आयोजन
आकाशवाणी रायपुर से शैक्षिक कार्यक्रम का २  
वर्ष तक साप्ताहिक प्रसार
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, नई दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय 
लेखन कार्यशाला में
प्रतिभागी राजीव गाँधी शिक्षा मिशन, मध्यप्रदेश में २  वर्ष तक राज्य स्त्रोत पर्सन का कार्य देश की प्रमुख सांस्कृतिक संगठन, 
सृजन - सम्मान का संस्थापक महासचिव: १९९५ से 
चयन मंडल में संयोजन:
एक लाख से अधिक राशि वाले ३०  प्रतिष्ठित एवं अखिल भारतीय साहित्यिक पुरस्कारों के चयन मंडल का संयोजक
शासकीय चाकरी: परियोजना निदेशक, संपूर्ण साक्षरता अभियान, जिला रायपुर
परियोजना निदेशक, राष्ट्रीय बाल श्रम उन्मूलन, जिला रायपुर
उप संचालक, शिक्षा, जिला रायगढ़
सचिव, छत्तीसगढ़ संस्कृत बोर्ड, छत्तीसगढ़ 
शासन, रायपुर सचिव, छ्त्तीसगढ़ी भाषा परिषद, छत्तीसगढ़  शासन, रायपुर
विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी छ.ग. हिन्दी ग्रंथ अकादमी, रायपुर,  अंजोर
(शिक्षा विभाग की त्रैमासिक पत्रिका)
हिन्दी चिट्ठाकारी के लिए भी जयप्रकाश मानस जी पुरस्कृत हो चुके हैं।
(श्री जय प्रकाश मानस)

सृजन-गाथा के चिट्ठाकार श्री जयप्रकाश मानस को उनकी हिन्दी चिट्ठाकारिता के लिए माता सुंदरी फ़ाउंडेशन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। विस्तृत समाचार यहाँ देखें।

श्री जयप्रकाश मानस जी को ढेरों बधाईयाँ व शुभकामनाएँ.

यह तथ्य स्पष्ट है कि श्री    जी, हिंदी साहित्य के  सफल व सशक्त हस्ताक्षर हैं और एक लोकप्रिय व सफल सम्पादक हैं। अंतरजालीय, साहित्यिक व सांस्कृतिक इत्यादि गतिविधियों पर बराबर उनकी आँख रहती है।अपनी पारखी नज़रों से, भाई जयप्रकाश जी, कई कार्यक्षेत्रों के बारे में, सुरुचिपूर्ण पत्रिका के माध्यम से, एक विशाल हिन्दी भाषीय क्षेत्र को साहित्य विषयक समाचार से, अवगत करवाते रहे हैं। 
 मुझे जयप्रकाश जी के निबंधों ने, उस में प्रयुक्त भाषा लालित्य ने तथा उनके लेखन में जो स्पष्टवादिता है साथ साथ जो एक सुलझी हुई परिपक्वता है उस लेखकीय ऊर्जा ने मेरा ध्यान उनके लेखन पर केंद्रित किया था।
      भारतीय माटी की सौंधी सुगंध उनकी रचनाओं का श्रृंगार है। भारतीय जीवन शैली से जो व्यक्ति जुड़ा रहता है वही अपनी रचनाओं में भारतीय समाज को प्रस्तुत कर पाता है। 
        दैनिक जीवन हो या कि  परिवेश जब उस पर लेखक की द्रष्टि रहती है तब वह रचनाओं को विशेष बना देती है। इसी प्रकार की प्रामाणिकता ने  सूक्ष्म सूझ - बुझ ने जयप्रकाश जी की प्रत्येक रचनात्मक विधा को, सरस एवं पठनीय बनाया है। 
        श्री जयप्रकाश मानस जी के लेखन में इन सारे लेखकीय गुणों का समावेश है। रचनाकार के लेखन के इन गुणों की सराहना लोक में और अन्य साहित्यकारों ने स्वागत करते हुए हिंदी साहित्य के उनके अवदान पर प्रशंशा की है।  
      " चिठ्ठियाँ गायब हुई " नाम से लिखे, कुछ ८ - १० कुछ मुक्तक पढ़े थे। मैंने यह रचनाकार श्री जयप्रकाश मानस जी का लिखा हुआ शायद  नेट पर पहली बार कुछ पढ़ा था और  हाँ शायद लेखक के पास आज भी वे सुरक्षित हों ! अब  इस बात को कई बरस बीत चुके हैं। 
          तदुपरांत उनके लिखे निबंध भी पढ़े। बेहद सधे  हुए, संतुलित विचारों का निरूपण करते और भारतीय वांग्मय व साहित्य के उद्धरणों सहित लिखे निबंध, विद्व्त्तापूर्ण थे पर बोझिल कहीं भी न थे। भाषाई गठन,  साहित्यक गुणवत्ता लिए, निबंध रसप्रद लगे और वे पाठकों को बांधे रखने की क्षमता लिए हुए भी थे। तो सोचा यह इस व्यक्ति विशेष की माने एक प्रबुद्ध रचनाकार की विशेषता ही है जो रचनाकर्म के प्रति लेखक का समर्पण और परिश्रम इंगित कर रहा है। हिंदी व भारत की अन्य भाषाओं में लिखते हुए,जयप्रकाश जी ने, हिंदी साहित्य समृद्धि में श्रीवर्धन किया है। 

निबंध : १  महिष को निहारते हुएhttp://www.srijangatha.com/LalitNibandh1_Aug2K8

        हिन्दी भाषा से सम्बंधित ब्लॉग, पत्रिका, वेब मेगेज़ीन पर जयप्रकाश जी का प्रचुर लेखन उपस्थित है। 
श्री जय प्रकाशजी का 
लिखा, यह 
" शब्द - चित्र "मन को छू गया ! ~
 "दादीमाँ भीड़ को चीरती हुई मेरे सम्मुख आ खड़ी हुई। उसके हाथ में थाल है।थाल में एक दीपक, कुछ दूर्वा, कुछ सुपाड़ी, कुछ हल्दी गाँठें, सिंदूर, चंदन, पाँच हरे-हरे पान के पत्र और एक बीड़ा पान।मुझे लगा, जैसे दादी के काँपते हाथों में समूची संस्कृति सँभली हुई है। "
          
तद्पश्चात जय प्रकाश जी ने ई  मेल से संपर्क किया। 
प्रस्तुत है उनका लिखा पत्र ~
"  आदरणीय लावण्या दीदी,
चरण स्पर्श
हम " सृजनगाथा´´ में एक नये स्तंभ – 'प्रवासी कलम ' की शुभ शुरूआत आपसे करना चाहते हैं । आपसे इसीलिए कि विदेश में बसे प्रवासियों में आप सबसे वरिष्ठ हैं । साथ ही भारत के प्रतीक पुरुष पं. नरेन्द्र शर्मा की पुत्री भी । भारतीयता का तकाजा है कि श्रीगणेश सदैव बुजुर्गों से ही हो । यह प्रवासी भारतीय साहित्यकारों से एक तरह की बातचीत के बहाने भारतीय समाज, साहित्य, संस्कृति का सम्यक मूल्यांकन भी होगा जो 
http://www.srijangatha.com/ के 1 जुलाई 2006 के अंक में प्रकाशित होगा । साथ ही हिन्दी के कुछ महत्वपूर्ण लघुपत्रिकाओं में। हम जानते हैं कि उम्र के इस मुकाम में आपको लिखने-पढ़ने में कठिनाई होती होगी। 
      पर यथासमय हमें किसी तरह आपके ई-मेल से उत्तर प्राप्त हो जाये तो यह एक ऐतिहासिक कदम होगा ।
      दीदी जी, इसके साथ यदि आपकी कोई तस्वीर अपने पिताजी के साथ वाला मिल जाये तो उसे भी स्केन कर अवश्य ई-मेल से भेज दें । आशा है आप हमारा हौसला बढा़येगीं । हम आपका सदैव आभारी रहेंगे। '
मैंने सहर्ष उत्तर लिख भेजे थे जिन में से कुछ प्रश्नोत्तर  प्रस्तुत हैं। 

प्रश्न- आप मूलतः गीतकार हैं । आपका प्रिय गीतकार (या रचनाकार) कौन ? क्यों ? वह दूसरे से भिन्न क्यों है ?
उत्तर - ४ ) अगर मैँ कहूँ की, मेरे प्रिय गीतकार मेरे अपने पापा, स्व. पॅँ नरेन्द्र शर्माजी के गीत मुझे सबसे ज्यादा प्रिय हैँ तो अतिशयोक्ति ना होगी ! हाँ, स्व. श्रेध्धेय पँतजी दादाजी, स्व. क्राँतिकारी कवि ऋषि तुल्य निरालाजी, रसपूर्ण कवि श्री बच्चनजी, अपरामेय श्री प्रसादजी, महान कवियत्री सुश्री महादेवी वर्मा जी, श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी विभूतियाँ हिँदी साहित्य गगनके जगमगाते नक्षत्र हैँ जिनकी काँति अजर अमर है।
 ( क्यों ?? ) इन सभी के गीतोँ मेँ माँ सरस्वती की वैखरी वाणी उदभासित है और सिर्फ मेरे लिये ही नहीँ, सभी के लिये उनकी कृतियाँ प्रणम्य हैँ। 
( वह दूसरे से भिन्न क्यों है ? )  भिन्न तो न कहूँगी  अभिव्यक्त्ति की गुणवत्ता, ह्रदयग्राही उद्वेलन, ह्रदयगँम भीँज देनेवाली, आडँबरहीन कल्याणकारी वाणी, सजीव भाव निरुपण, नयनाभिराम द्र्श्य दीखलाने की क्षमता, भावोत्तेजना, अहम्` को परम्` से मिलवानेकी वायवी शक्त्ति , शस्यानुभूति, रसानुभूति की चरम सीमा तक प्राणोँको, सुकुमार पँछी के, कोमल डैनोँ के सहारे ले जाने की ललक और, और भी कुछ अतिरिक्त जो वाणी विलास के परे है। वह सब इन कृतियोँ मेँ विध्यमान है। 
जैसा काव्य सँग्रह " प्यासा ~ निर्झर " की शीर्ष कविता मेँ कवि नरेँद्र कहते हैँ,
 "  मेरे सिवा और भी कुछ है , 
      जिस पर मैँ निर्भर  हूँ ~ 
     मेरी प्यास हो ना हो जग को,
      मैँ, प्यासा निर्झर हूँ " 
प्रश्न- लंबे समय तक हिन्दी-गीतों को नई कविता वालों के कारण काफी संघर्ष करना पड़ा था । आप इसे कैसे देखती हैं । गीत के भविष्य के बारे में क्या कहना चाहेंगी ? 
उत्तर -  नई कविता भी तो हिँदी की सँतान है  और हिँदी के आँचल मेँ उसके हर बालक के लिये स्थान है।  क्योँकि, मानव मात्र को, अपनी अपनी अनुभूति को पहले अनुभव मेँ रच बस कर, रमने का जन्मसिध्ध अधिकार है।  उतना ही कि जितना खुली हवा मेँ साँस लेने का !
ये कैसा प्रश्न है की किसी की भावानुभूति अन्य के सृजन मे आडे आये ?
नई कविता लिखनेवालोँ से ना ही चुनौती मिली गीत लिखनेवालोँको नाही कोई सँघर्ष रहा !
" किसी की बीन, किसी की ढफली,
    किसी के छँद कीसी के फँद ! "
~~ ये तो गतिशील जीवन प्रवाह है ,
 हमेँ उसमेँ सभी के लिये, एक सा ढाँचा नहीँ खोजना चाहीये। हर प्राणीको स्वतँत्रता है कि,
 वह, अपने जीवन और मनन को अपनाये। 
 यही सच्चा " व्यक्ति स्वातँत्रय " है।
बँधन तो निषक्रीयता का ध्योतक है और जब तक खानाबदोश व बँजारे गीत गाते हुए, वादियोँ मेँ घूमते रहेँगेँ, प्रेमी और प्रेमिका मिलते या बिछुडते रहेँगेँ, माँ बच्चोँ को लोरीयाँ गा कर सुलाया करेँगीँ
और बहने, सावन के झूलोँ पर अपने वीराँ के लिये सावनकी कजली गाती रहेँगीँ ...या, पूजारी मँदिरमेँ साँध्य आरती का थाल धरे, स्तुति भजन गायेँगेँ,
या गाँव मुहल्लेह भर की महिलाएं  .....बेटीयोँ की बिदाई पर " हीर " गायेँगीँ, "गीत " गूँजते रहेँगेँ ! 
ग़ीत प्रकृति से जुडे हैं और मानस के मोती की तरह मानव समुदाय के लिए पवित्रताम भेँट हैँ। उनसे कौन विलग हो पायेगा ?
 कृपया सम्पूर्ण कथोपकथन यहां पढ़ें ~ : http://antarman-antarman.blogspot.com/2007/03/blog-post_16.html

चित्र : पंडित नरेंद्र शर्मा पंडित 
एवं जवाहर लाल नेहरू जी 

एवं जवाहर लाल नेहरू जी   Image result for यह मेरा सौभाग्य है पंडित नरेंद्र शर्मा की बेटी हूँ
प्रस्तुत हैं श्री जयप्रकाश मानस जी के काव्य 
१ : वनदेवता

घर लौटते थके मांदे पैरों पर डंक मार रहे हैं बिच्छू
कुछ डस लिए गए साँपों से
पिछले दरवाज़े के पास चुपके से जा छुपा लकड़बग्घा
बाज़ों ने अपने डैने फड़फड़ाने शुरू कर दिए हैं
कोयल के सारे अंडे कौओं के कब्ज़े में
कबूतर की हत्या की साज़िश रच रही है बिल्ली
आप में से जिस किसी सज्जन को
मिल जाएँ वनदेवता तो
उनसे पूछना ज़रूर
कैसे रह लेते हैं इनके बीच ! 
२ : शहर 
यहाँ भी -
सूरज उगता है पर नगरनिगम के मलबे के ढेर से
चिड़िया गाती है पर मोबाईल के रिंगटोन्स में
घास की नोक पर थिरकता हुआ ओस भी दिखता है पर वीडियो क्लिप्स में
अल्पना से आँगन सजता है पर प्लास्टिक स्टीकरों वाली
थाली में परोसी जाती है चटनी, अचार पर आयातित बंद डिब्बों से
बड़े-बडे हाट भरते हैं पर कोई किसी को नहीं भेंटता
लोग-बाग मिलते हैं एक दूसरे से पर बात हाय-हैलो से आगे नहीं बढ़ती
चिट्ठियाँ खूब आती हैं पर ई-मेल में मन का रंग ढूँढे नही मिलता
खूब सजती हैं पंडालें पंडों की पर वहाँ राम नहीं होते
उठजाने की ख़बर सभी तक पहुँचाती हैं अखबारें पर काठी में कोई नहीं आता
इस पर भी शहर जाना चाहते हो जाओ
पर तुम्हें साफ-साफ पहचाना जा सके
जब भी लौट कर आओ। 

फेसबुक जैसे मनोविनोद के पोर्टल पर जयप्रकाश मानस जैसा सृजनशील  रचनाकार, अपनी अलग उपस्थिति लिए अपनी पोस्ट से अलग दिखता है। अतुल्य भारत शीर्षक से भारतीय जनजीवन के मार्मिक चित्र हों या आप फेसबुक पर क्यों हैं जैसे उनके प्रश्न जिनके उत्तर अनेक साहित्यकारों ने लिख भेजे ये नई तरह की पठनीय सामग्री एक निरंतर सृजनशील सम्पादक, लेखक ही परोस सकता है। श्री जयप्रकाश मानस जी ने 

रचनाकारों से ' मैं और मेरी पसंद ' - फेसबुक के लिए श्रृंखला का क्रम रचकर , फेसबुक ' जैसे माध्यम के द्वारा एक पठनीय पृष्ठ का श्रीगणेश किया है। फिर एक बार यह प्रश्न भी पूछा गया। 
प्रश्न : १ . २०१४ में आपने किन-किन रचनाकारों की, किस-किस विधा की कौन-सी किताब पढ़ी ?
उत्तर :
पंडित नरेंद्र शर्मा : सम्पूर्ण रचनावली - १६ खण्ड 
 इस वर्ष पढ़ी हुईं दुसरी पुस्तक अंग्रेज़ी भाषा से हैं। भारत का भौगोलिक मानचित्र दर्शनीय ही नहीं सनातन धर्म का जीता जागता साक्षी है। 
इस पर शिकागो की एक विदुषी प्रोफ़ेसर ने बृहत् पुस्तक लिखी है। वह भी साथ साथ पढ़ रही हूँ। 
एक और है प्रातः स्मरणीय रमण महर्षि जी की
 ' ऋभु गीता ' के छठे अंश का अंग्रेज़ी में रूपांतर और व्याख्या। 
लेखिका ज़ुम्पा लाहिड़ी की पुस्तक - Unaccustomed Earth - लघु कथाएँ 
 न्यू यॉर्क टाइम्स बुक रिव्यू ने इसे सर्वश्रेष्ठ कृति कहा है।  
आपकी फसबूक पोस्टों के जरिये भी अत्यंत रोचक, ज्ञानवर्धक जानकारियां, लघुकथाएँ वगैरह पढ़ने को मिलतीं रहतीं हैं। 
प्रश्न. इस किताब का कितना असर पाठक, समाज, भाषा और साहित्यिक दुनिया में हो सकता है ?

उत्तर : मैंने गत वर्ष बच्चन जी की रचनावली भी पढ़ी थी। साहित्य का असर तो तभी होगा न जब उसे पढ़ा जाए, समझा जाए और उस मे उद्धृत सही और क्रांतिकारी या सर्वकालिक समाज कल्याण के वरदान रूपी स्नेह सन्देश को जीवन में लाना संभव हो ! जो राजनैतिक उत्थान में सहायक हो। भाषा का विकास, समाज के नागरिक के विकास और भाषा को अपनाने से ही होता है। 
साहित्यिक विश्व में, जिन में विश्व भर में फैले हिन्दी भाषी भी सम्मिलित हैं उनका योगदान भी महत्त्वपूर्ण है। परन्तु मूल प्रश्न यही रह जाता है कि ' व्यक्तिवाद से ऊपर उठकर हम सम्पूर्ण समाज के हित के लिए क्या कर सकते हैं ? 
भारत वर्ष में सरकार के सदस्य चुनाव लड़ते हैं केंद्र में सत्ता  बदली  है और  हिन्दी भाषा के पुनरूत्थान के प्रति आज केन्द्रस्थ सरकार सजग एवं समर्पित है। इस बात से से मेरे मन में आशा बलवती हुई है कि अब भारत का सामाजिक उदय काल भी अवश्य होगा। सर्वोदय स्वप्न नहीं रहेगा। वास्विकता की धरा पर उसे हम फूलता फलता पल्ल्वित होता हुआ भी अवश्य देखेंगें। 
' आधा सोया आधा जागा देख रहा था सपना 
 विराट के भावि दर्पण पर देखा भारत अपना 
गाँधी जिसका ज्योति ~ बीज,
उस विश्व वृक्ष की छाया
सितादर्ष लोहित यथार्थ यह
नही सुरासुर माया !"
- पँ. नरेन्द्र शर्मा
 

 अंत में , भाई श्री जयप्रकाश जी के ब्लॉग से, एक पुरानी प्रविष्टी, प्रस्तुत करते, अपार हर्ष हो रहा है। 
आशा है आप सभी को, भाई श्री जयप्रकाश जी जैसे, प्रबुध्ध, साहित्यकर्मी से, उन्हीं के लिखे शब्दों से यहां परिचित होना अच्छा लगेगा।  अत: प्रस्तुत है उनके ब्लॉग से साभार ~~ 















" संसार गीतविहीन कभी था ही नहीं । गीत वेदों से भी सयाना है। निराला जी ने कभी कहा था- “गीत मानव की मुक्ति-गाथा का प्रथम प्रणव है”।
जो गाने-गुनगुनाने नहीं जानता या तो वह पाषाण है या फिर जीव होकर भी
जीवनहीन है ।
मेरी माँ बताती है- जब मैं जनमा तो मेरे रोने में उन्हें गाने की अनुभूति हुई ।
शायद हर माँ को शिशु का प्रथम रूदन एक शाश्वत गान ही लगता है। जो भी हो, मैं बचपन में मेले-ठेले जाता था तो सबसे अधिक रूचने वाली बात गीत ही होता था। वे लोकगीत होते थे। राउतनाचा के गीत, रथयात्रा के गीत, डंडागीत, सुवागीत और भी न जाने कितने तरह के गीत । उन दिनों लगता था कि मेरा जनपद लोकगीतों का जनपद है ।
घर में महाभारत, रामचरित मानस, लक्ष्मीपुराण या फिर सत्यनारायण की कथा होती थी तो पंडित जी या मंडली गीत ही तो गाते थे । माँ जब पवित्र तिथियों में मंगला (दुर्गा देवी) की व्रत रखती थी तो उडिया में जो मंत्रपाठ करती थी वह गीत ही तो था।
स्कूल में पढाई की शुरूवात गद्य से नहीं बल्कि पद्य यानी कि गीत से ही हुआ । शायद आप भी जानते हों इस गीत को ।
चलिए हम ही बताये देते हैं- ओणा मासी धम्म-धम्म, विद्या आये छम-छम ।  वह भी गीत ही था जो हमारे प्रायमरी स्कूल के गुरूजी हर नवप्रवेशी बच्चों को पहले दिन पढाते रहे यद्यपि यह गीत जैसा नहीं लगता किन्तु वे उसे ऐसे सिखाते थे कि मैं उसे गीत माने बिना नहीं रह सकता और यह गीत था- एक एक्कम एक, दो एक्कम दो , तीन एक्कम तीन, चार एक्कम चार.............. ।
शायद वे गद्य को पद्य बनाकर नहीं गाते तो शायद जाने कितने बच्चे आज भी अनपढ रह जाते ।स्कूल की ईबारत सीखते-सीखते जाने कब मैं जन-गण-मन से लेकर वंदे मातरम् और युवा होने से पहले-पहले दुलहिन गावहु मंगलाचार या फिर हेरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद न जाणे कोय आदि-आदि आत्मसात कर लिया पता ही नहीं चला । कुछ मन मचला तो किशोर दा के गीत भी मन को अतिशय भाने लगे और मैं भी गुनगुनाने लगा- जिंदगी के सफर में गूजर जाते हैं वे जो पल फिर नहीं आते । उन दिनों, जब प्रेम मन में अंगडाई लेने लगा और कभी तनहाई सताने लगी तो ये गीत भी खुब सुहाने लगे थेः आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज न दे ~~ 
  इस बीच कुछ-कुछ लिखने लगा।लघुकथायें लिखीं।कविता भी और आलेख भी।पर सच कहता हूँ मन तो गाना चाहता है । कविता, लघुकथा, आलेख, निबंध तो पढने की विधाएँ है । इन्हें थोडे न गाया जा सकता है । जीवन में पहली बार गीत लिखा। लगा मैं स्वर्गीय आनंद से भर उठा हूँ। गाकर सुनाया कवि मित्रों को तो मत पूछिए क्या हुआ । सबने गले से लगा लिया । कंठ तो ईश्वर से मिला ही है । लोग मंचों पर सुनाने का आग्रह करने लगा । तब से अब तक लगातार लिख रहा हूँ। क्या-क्या लिखा।कितना लिखा । कितना नाम कमाया और कितना दाम भी। उसकी चर्चा फिर कभी।आज तो बस मैं अपने उस प्रिय रचनाकार के गीत सुनाना चाहता हूँ जिनके बिना हिन्दी गीत-यात्रा अधूरी रह जाती । मेरे मन मानस मैं पैठे उस गीतकार का नाम है- पं.नरेन्द्र शर्मा। वे छायावाद काल के समापन के समय ही हिन्दी की दुनिया में प्रतिष्ठित हो चुके थे। इनके आरंभिक गीतों के केन्द्र में प्रेम हिलोरें मारता है। बाद के गीतों में लोक और परलोक के भी संदर्भ हैं।संयोग का उल्लास, मिलन की अभिलाषा, रूप की पिपासा, संयोग की विविध मनोदशायें तथा वियोग की पीडा नरेन्द्र शर्मा जी के गीतों का विषय है। वे केवल व्यक्तिवादी नहीं थे, उनमें सामाजिकता भी लबालब है । ऐसा कौन होगा जो हिन्दी का प्रख्यात टी.व्ही.सीरियल देखा हो और पंडित जी को न जानता हो । तो काहे की देरी। लीजिए ना उनके वे गीत जो मुझे बहुत पसन्द हैं। 
एक...
तुम रत्न-दीप की रूप-शिखा

तुम दुबली-पतली दीपक की लौ-सी सुन्दर
मैं अंधकार
मैं दुर्निवार
मैं तुम्हें समेटे हूँ सौ-सौ बाहों में, मेरी ज्योति प्रखर
आपुलक गात में मलय-वात
मैं चिर-मिलनातु जन्मजात
तुम लज्जाधीर शरीर-प्राण
थर्-थर् कम्पित ज्यों स्वर्ण-पात
कँपती छायावत्,रात,काँपते तम प्रकाश आलिंगन  भर
आँखे से ओझल ज्योति-पात्र
तुम गलित स्वर्ण की क्षीण धार
स्वर्गिक विभूति उतरीं भू पर
साकार हुई छवि निराकार
तुम स्वर्गंगा, मैं गंगाधर, उतरो, प्रियतर, सिर आँखों पर
नलकी में झलका अंगारक
बूँदों में गुरू-उसना तारक
शीतल शशि ज्वाला की लपटों से
वसन, दमकती द्युति चम्पक
तुम रत्न-दीप की रूप-शिखा, तन स्वर्ण प्रभा कुसुमित अम्बर
…………………

दो...
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे

आज से दो प्रेमयोगी अब वियोगी ही रहेगें
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

आयगा मधुमास फिर भी, आयगी श्यामल घटा घिर
आँख बर कर देख लो अब, मैं न आऊँगा कभी फिर
प्राण तन से बिछुड कर कैसे मिलेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

अब न रोना, व्यर्थ होगा हर घडी आँसू बहाना
आज से अपने वियोगी हृदय को हँसना सिखाना
अब आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे
न हँसने के लिए हम तुम मिलेंगे ।

आज से हम तुम गिनेंगे एक ही नभ के सितारे
दूर होंगे पर सदा को ज्यों नदी के दो किनारे
सिन्धु-तट पर भी न जो दो मिल सकेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

तट नही के, भग्न उर के दो विभागों के सदृश हैं
चीर जिनको विश्व की गति बह रही है, वे विवश हैं
एक अथ-इति पर न पथ में मिल सकेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

यदि मुझे उस पार के भी मिलन का विश्वास होता
सत्य कहता हूँ न में असहाय या निरूपाय होता
जानता हूँ अब न हम तुम मिल सकेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।
आज तक किसका हुआ सच स्वप्न, जिसने स्वप्न देखा
कल्पना के मृदृल कर से मिटी किसकी भाग्य रेखा
अब कहां संभव कि हम फिर मिल सकेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

आह, अंतिम रात वह, बैठी रही तुम पास मेरे
शीश कन्धे पर धरे, घन-कुन्तली से गाते घेरे
क्षीण स्वर में कहा था, अब कब मिलेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

कब मिलेंगे ?
पूछता जब विस्व से मैं विरह-कातर
कब मिलेंग ?गूँजते प्रतिध्वनि-निनादित व्योम-सागर
कब मिलेंगे प्रश्न उत्तर कब मिलेंगे ?
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।
…………………
तीन...
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर

शुन्य है तेरे लिए मधुमास के नभ की डगर
हिम तले जो खो गयी थीं, शीत के डर सो गयी थी
फिर जगी होगी नये अनुराग को लेकर लहर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर

बहुत दिन लोहित रहा नभ, बहुत दिन थी अवनि हतप्रभ
शुभ्र-पंखों की छटा भी देख लें अब नारि-नर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर
पक्ष अँधियारा जगत का, जब मनुज अघ में निरत था
हो चुका निःशेष, फैला फिर गगन में शुक्ल पर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर
विविधता के सत विमर्षों में उत्पछता रहा वर्षों
पर थका यह विश्व नव निष्कर्ष में जाये निखर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर
इन्द्र-धनु नभ-बीच खिल कर,
 शुभ्र हो सत-रंग मिलकर
गगन में छा जाय विद्युज्ज्योति के उद्दाम शर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर
शान्ति की सितपंख भाषा,
 बन जगत की नयी आशा
उड निराशा के गगन में,
 हंसमाला, तू निडर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर
~ श्रीमती लावण्या दीपक शाह : ओहायो प्रांत, उत्तर अमरीका से 

Thursday, February 15, 2018

३ ऐवरेज अमेरिकन टीनएजर्स की कहानी : Ronnie रौनी , Raj राज़ और Radha राधा


आज जब अमरीकी स्कूलों में यह १८ वीं भयानक ' स्कूल - शूटिंग 'की दुःखद वारदात हुई है जब निर्दोष १७ बच्चों ने अपनी मासूम जानें गवाईं हैं  तब मेरी  टीनेजर्स पर लिखी कहानी प्रासंगिक हो गयी है।
श्रद्धांजलि और दिवंगत मासूम आत्माओं की सद्गति के लिए 
अश्रु  पूरित प्रार्थना सहित प्रस्तुत है ~    
Ronnie रौनी , Raj राज़ और Radha  राधा :  ( ३ ऐवरेज अमेरिकन टीनएजर्स की कहानी )
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Ronnie , रौनी आज अपनी नई कार चला कर स्कूल आया है ! जिस दिन रौनी के  युवा जीवन के १७ साल पूरे हुए थे  उसी दिन उसकी बर्थ डे पार्टी की शाम को,  तोहफे में, उसके डेड कुलदीप खुराना और मोम शरणजित ने अपने बेटे रौनी के लिए एक नई चमचमाती,  ब्ल्यू माज़दा स्पोर्ट्स कार खरीद कर उसे दी थी।  
            
उस नई गाड़ी की key - less entry -  कीलेस एन्ट्री का उपकरण रौनी के हाथ में थमाते हुए माता पिता बेहद प्रसन्न थे! जिस वक्त उस नई गाड़ी की चाबी अपने लाडले के हाथों में थमाई  थी तब कुलदीप खुराना जी को अपने जवानी के संघर्ष भरे दिनों की बरबस याद हो आई थी ! कितनी मेहनत  की थी कुलदीप ने पढ़ाई में ! नियम से पढ़ाई कर अच्छे नंबरों से पास हुए थे वे ! 
           
अक्सर  घर के कामों में हाथ बंटाना भी उनके जीवन का अहम् हिस्सा था। बाउजी और अम्मी की बातों का जवाब ' हाँ जी ' के अलावा कुलदीप के मुंह से कभी कुछ और नहीं निकल पाया था ! 
              
भारत में बड़ों की इज़्ज़त करना उन जैसे मध्यम वर्ग के परिवारों में रिवाज़ था।यही चलन था।अपनी संतान के लिए उनके  बचपन के दिनों में उंडेला ढ़ेर सा लाड - प्यार, अधिकतर भारतीय मध्य वर्ग के परिवारों में देखा जाता है और ये  एक आम  बात है। परन्तु जैसे जैसे परिवार में बच्चा बड़ा होने लगता है, उसे भी संस्कार, पारिवारिक रीति रिवाज़, बड़ों कीमर्यादा का महत्त्व ऐसी कई बातें समझ में आने लगतीं हैं। बड़ों की इज़्ज़त करना भी बच्चे सीख लेते हैं।यदि  रोज नहीं करते तो बच्चे अक्सर ख़ास  त्योहारों पर, जैसे दिवाली पर अपने बुजुर्गों के पैर  छू कर आशीर्वाद लेना, सीख लेते हैं। रीश्तेदारी में, पास पड़ौस के बड़ों को मान दे कर सम्बोधित करना जैसे सारे पुरुष अंकल कहलाते हैं और महिलाएं साड़ी आंटी जी कहलातीं हैं ये सब तो रोज के व्यवहार में बच्चों को सिखलाया जाता है!
    
 ' कुलदी ...  पे , इत्थे आ पुत्तर ! ' जब भी अम्मी या बाउजी की आवाज़ आती ' जी हाँ ' कहता छोटा सा कुलदीप आवाज़ की दिशा में खींचा चला जाता था।  
              
आज अमरीका में अपने १७ साल के जवान  बेटे रौनी  को देख कर ५० की उम्र के पड़ाव पर ठिठके हुए कुलदीप खुराना जी को अपना बचपन याद हो आया ! कित्ते  प्यारे दिन थे ! भारत के मध्य वर्गीय घर में बेशक उनके परिवार के पास ऐसी चमचमाती गाड़ियां न थीं पर अम्मी के प्यार से संवरा हुआ वो घर, जन्नत से कम न था। अम्मी का प्यार और बाउजी की काम करने की लगन से परिवार के सभी को सुख सुविधा मिल रहीं थीं। अपने स्नेह पाश में परिवार सभी को वह घर बांधे रखता था। सभी को आराम मिलता था वहां!  सभी अपनी अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते रहते थे।
       
कुलदीप के  बाउजी दिनभर जी तोड़ कर, खूब मेहनत  किया करते थे और अम्मी दिन भर रसोई घर में मिलतीं। सब के आराम की फ़िक्र करतीं ,खपती रहतीं थीं।पर हमेशा मुस्कुराया करतीं थीं! रिश्तेदारी, बियाह - त्यौहार, सब के जन्मदिन इन  सभी बातों का वे पूरा ख्याल रखा करतीं थीं। कोइ त्यौहार ऐसा नहीं जिसे वे ना मनातीं हों ! उन के उस छोटे  से परिवार में, उस पुरखों के घर में, अमन - चैन भारत की तेज़  धूप की मानिंद, पसरा रहता था ! अब इत्ते बरसों के बीतने पर कुलदीप के जहन में बचपन की, अपने उस घर की सुखद यादें ही बाकी रह गईं हैं। वे सोचने लगे, " इंसान को खुशी मिले उस के लिए सच, बहुत नहीं, बस थोड़ा सा सुख चाहिए होता है और क्या क्या जियादा चाहिए होता है जी? " 

कुलदीप खुराना जी बेटे समय को किसी धुंध में लिपटा सा देख रहे थे और उन्होंने एक संतोष भरी साँस लेते हुए, अपने मन को हठात आधुनिक समय में, आधुनिक परिवेश में, अमरीका के अपने आलीशान आवास के आँगन में खींच लिया था।
        अपने लाडले बेटे को आगे बढ़, खुराना साहब ने गले से लगा लिया तो रौनी की मोम शरणजित भी मुस्कुराने लगीं और कहा " बाप बेटे गले मिल लो जी - फिर आशीर्वाद देते हुए बोलीं " हैप्पी बर्डडे बेटे. मेरे सोने रौने  ~~ ज़िन्दा रहै पुत्तर ! " इस के साथ अब  मोम शरणजित रौनी के  गले लग  रहीं थीं ! 
         रौनी का असली नाम है रौनक !  पर यहां अमरीका में सब उसे '  रौनी ' ही बुलाते हैं। सुन्दर, गोरा, छरहरे बदन को जिम में एक्सरसाइज कर के तराशे हुए रौनी बड़ा हसमुख और हैंडसम टीनएजर है। 
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 आज रौनी अमरीका की खुली  साफ़ सड़कों पे, स्पीड से, अपनी स्पोर्ट्स कार चलाते हुए हाईस्कूल पहुंचा। वो १० वीं क्लास में है और अमरीका में १० वीं क्लास के छात्र कोसोफ़ोमोर sophomore कहते हैं। अमरीकी शिक्षा प्रणाली में प्रत्येक  छात्र के लिए, स्कूल से पास  होने का ११ वीं क्लास ही  अंतिम वर्ष होता है। 
       
स्कूल के के बाहर क्लास के कई लड़के, लड़कियां भी अपनी कारों को पार्क कर के भीतर स्कूल के बड़े से मकान में दाखिल हो रहे थे। सामने से रौनी को, क्लास मेट, राधा स्वामीनाथन आती दिखलाई दी तो रौनी ने हवा में हाथ लहराते हुए उसे ' हाय ' कहा तो दोनों वहीं रूक गए।
       
अमरीका में  राधा अपने नृत्य गुरु सुश्री जयश्री बाललिंगम जी से नृत्यालय  डान्स एकेडमी में भरतनाट्यम सीख रही थी। राधा लंबी दुबली पतली सांवली सी किशोरी है। तेज  नैन नक्शवाली राधा जब भी भारत नाट्यम नृत्य  के पारम्पारिक आभूषण  और वस्त्र पहनती है तब  खजुराहो में उकेरी प्राचीन प्रस्तर मूर्ति जीवित हो गयी हो ऐसी दीखलाई देती है।जब राधा के भौंहों तक खींचे नैन चहुँ दिशा में घूमते तब मानों सजीव हो उठते थे। नृत्य व अभिनय कला में दक्षता ही राधा स्वामीनाथन के आकर्षक नयनों की पहचान थी।Image result for American indian teenager wearing sweater

 राधा के नैन सब  बातों का पता रखते थे।  उसकी निगाह से कोइ बात छिपी न रह पाती थी।
अपनी उम्र के छात्रों में राधा उस स्कूल में, पढाई में सबसे तेज़ छात्रा थी! सभी  टीचर्स की वह फेवरिट थी !  इसीलिये सब कहते थे "  देख लेना इस साल यह राधा स्वामीनाथन ही '  वेलेडिक्टोरियन ' बनेगी। " 
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       अमरीकी स्कूलों में ' valedictorian ' वही छात्र बनता है जो हर विषय में और सारे छात्रों में सबसे ज्यादा, टॉप नंबर लाए और हर बात में सर्वश्रेष्ठ हो ! उसे स्कूल में छात्रों के अंतिम वर्ष में जब वे स्कूल से पास होकर आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज जाते हैं और उनका दीक्षांत समारोह या ग्रेज्यूएशन समारोह होता है उस में स्टूडेंट्स की ओर से अंतिम विदा - भाषण या फेरवेल स्पीच देने का अवसर भी उसी स्टूडेंट को  मिलता है जो हर क्षेत्र में, सब से अव्वल हो।

        

राधा को आगे अंतिम साल स्कूल जीवन की समाप्ति पे ऐसा मौका मिलनेवाला है ये सभी जानते थे और राधा को खूब मानते थे ! 

' सो राडा, वस्स्स्स'wasss 'up ? ' रौनी ने पूछा  .... 

' रो नई ' मीन्स ' डोन्ट क्राई ' i will call you ! ' राधा ने तुनक कर अपने नाम के गलत उच्चारण से, ग़लत प्रोनोउंससिएशन से खीज कर कहा! 

     

फिर आगे बोली, "say  राधा" ! ऐसे बोलो न ! मेरा नाम राधा है राधा! व्हाट रौनी, तुम तो देसी हो ! ये अमरीकन मेरा नाम ठीक से नहीं बोल पाते पर तुम तो सही सही बोलो ! " राधा ने मुस्कुराते हुए रौनी को सुधारते हुए छेड़ा! 

         

अमरीकन उच्चारण करने  में ' ध ' या भ ' अक्सर बोल नहीं पाते ! उन्हें ये स्वर बोलने में बहोत मुश्किल लगता है। कईयों से ' ढ ' और ' भ ' अगर नाम में हों तो ठीक से ऐसा नाम बोला ही नहीं जाता! 

अपनी मुस्कराहट छिपाते हुए ' ओके ओके ' रौनी ने कहा " ओके मैडम ! Done ! Radha "

अब राधा ने  आज की ताज़ा खबर देते हुए कहा " डू यू नो, there is a newbeeie in our class ! हमारी क्लास में एक  नया लड़का भारत से आया  है ! अभी सीधा इंडिया से आया " & oh his name is RAJ  ! " राधा ने पूरी खबर देते हुए कहा। 
' ओह then  ही इज़ a  FOB ! ' रौनी ने व्याख्या करते हुए तड़ से ' फ़ोब ' का तमगा जड़ दिया ! फ़ोब - FOB =  ' fresh of the boat ' होता है  !मतलब  जो अभी अभी ताज़ा नाव से उतरा हो ! मतलब अमरीका में नया आनेवाला भारतीय FOB कहलाता है 
राधा मुस्कुराई और बोली ,  ' राज़ is कच्चा नीम्बू ' , तूम  पक्का नीम्बू ' राधा ने फिर उसे छेड़ा ! फिर राधा आगे बोली , 
' एट लीस्ट राज़ इज़ नॉट ABCD  लाइक यू ! ' अमेरिकन बोर्न कन्फ्यूज़्ड देसी ' तेरे जैसा! ' 
' उफ्फ ' रौनी मन ही मन सोचने लगा ' अच्छा तो आज राधा उसे खूब परेशान करने के मूड में थी। चलो कोइ गल नीं ' रौनी की  माँ से सीखी पँजाबी, सोचते समय, जहन में आ गयी जो  मन में घुली हुई थी ! 
' जस्ट किडींग मेन ! टेक इट लाइटली ' राधा ने बात को खत्म करते हुए संधि प्रस्ताव रख दिया । 
          उसी वक्त, नया लड़का FOB का तमगा पाया हुआ राज़ भी वहीं उन दोनों के सामने आ कर खड़ा हो गया। घेऊं की सी रंगत लिए चेहरा, उस पर बड़ी आँखें ! कुछ कुछ  खुली हुईं सी थीं। जिनमें कुछ सहमी हुई इच्छाएं दबीं थीं।  उन आँखों में तैर रहा था आत्म विशवास जो इस मंझोले कद के लड़के के बिहेवियर में, उसके व्यक्तित्त्व में , भारतीय मध्य वर्ग की शालीनता का संगम लिए अमूमन मौजूद  थी। 
           
भारत से खरीद कर लाये कपड़े,  तन पर सलीके से पहन कर आज अमरीकी स्कूल में पहले दिन यह छात्र अपने परिवेश से मानों समझौता करने का प्रयास कर रहा था। अमरीका के स्कूल में, अमरीकन छात्रों के बीच, उसके भारत से खरीदे वस्त्रों की रंगत  कुछ अलग ही दीख रही थी। खुद राज भी, अमरीकी स्टूडेंट्स के बीच में कुछ अलग अलग सा दिख रहा था।मानों कोइ सिल्क के थान पे टाट का पैबंद लग गया हो !  
          
उनके शहर में ठण्ड शुरू हो चुकी थी पर राज़ ने चेक प्रिन्ट की पीली और लाल कमीज़ पे ब्राऊन स्वेटर जो शायद उसने भारत में कुछ वर्ष पहले खरीदा था और कई बरसों  पहन चुका था, आज भी उसने वही शान से पहन रखा था जो अमरीकी मौसम में पसरी ठण्ड से बचाव का असफल प्रयास कर रहा था। Image result for indian nerd brown sweater
        
राज के उस पुराने स्वेटर को देखते ही रौनी को एकदम से, दया आ गई ! झट से अपना किंमती नया लेधर जैकेट उतार कर उसने राज़ के सामने बढ़ाते हुए कहा ' यार ये पहन ले ! इट इज़ टू कोल्ड  टूडे ! ' 
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इस तरह, अचानक से दिया हुआ, कीमती तोहफा राज को सकपका गया ! पहली बार किसी से मिलने पे इतना महँगा चमड़े का कोट रौनी ने उतार कर थमाया तो  राज़ को बड़ा अजीब लगा। पर रौनी ने उसे अपने हाथों से, वहीं स्कूल के बाहर लोन पर खड़े ख़ड़े , अपना  जैकेट इस नए दोस्त को जबरन पहना ही दिया और अपने इस नए दोस्त को सजा संवार दिया और फिर रौनी, राज़ को लगभग ठेलते हुए अपने संग उनकी क्लास की ओर ले चला ! उस वक्त न जाने क्यूँ रौनी बहुत खुश था ! राज मानों उसका छोटा भाई था जो आज अचानक उसे मिल गया था ! कुछ ऐसे भाव रौनी के मन में आ - जा रहे थे। इन दोनों के पीछे पीछे, चहकती हुई, राधा भी उन दोनों के संग चल दी ! यही था राधा, राज़ और रौनी की दोस्ती का पहला दिन ! 
        साल पूरा होते तो तीनों भारतीय स्टूडेंट्स में गहरी दोस्ती हो गई।राज़ को अमरीकी सिस्टम के कई सारे ' राज़ ' भी इन्हीं दोनों ने धीरे धीरे बतलाए और सीखला दिए थे। 
     रौनी के मोम, डेड  ने जब से रौनी पैदा हुआ था उसकी आगे की पढ़ाई का सारा खर्चा जब रौनी बड़ा होकर कोलैज जाएगा बैंक में जमा करना शुरू किया था। अमरीकन कायदों में ऐसी बचत पर विशेष टैक्स छूट दी जाती है ताकि छात्र जीवन में आगे की पढ़ाई के लिए हरेक छात्र का भविष्य सुरक्षित हो। वैसे भी सर्कार हर इलाके में स्कूल चलाती है जहां बस सेवा , किताबें , स्कूल की पढ़ाई इत्यादि की फीस नहीं होतीं।  इलाके में रहनेवालों के टैक्स से बिना फीस की अमरीकी स्कूलों का निर्वाह होता है। यदि कोइ बच्चा १ या २ दिन से स्कूल न पहुंचे तो फ़ौरन उस प्रांत की शाखाएं सक्रीय होकर छानबीन शुरू कर देतीं हैं। कारण जानने  की पहल होती है। यदि माता, पिता गैर ज़िम्मेदार हों तो कठिन सज़ा और कोर्ट केस किया जाता है। यदि अभिभावक की गलती हो तब उन्हें जेल में भी जाना पड सकता है। माता, पिता बच्चों पर कदापि हाथ नहीं उठा सकते अन्यथा उन्हें जेल हो जाती है। ऐसे कड़े कानून अमरीका के ५२ प्रांतों में लागू किये गए हैं और उनका पालन सख्ती से किया जाता है और नागरिकों से करवाया जाता है । 

 रौनी खुराना एक रईस परिवार का बेटा था और अमरीका में इंजीन्यरींग की पढ़ाई संपन्न करने बाद कुलदीप  खुराना साहब ने  बड़ी अच्छी कम्पनी में काम किया था। कुलदीप खुराना जी ने कई अपने तरह के बुद्धिजीवी भारतीयों की तरह खूब तगड़ा वेतन पाते हुए, अपनी नौकरी में उत्तरोत्तर प्रगति करते हुए सफलता हासिल की थी। रहने के लिए अति शानदार और आरामदेह घर खरीद लिया था।  परिवार के सदस्यों के लिए हर तरह की सुविधा अपने बल बूते पर हासिल कर ली थी। अपने और परिवार के हर मौज और शौख को खुराना जी ने पूरा किया था। 
          
खुराना साहब के परिवार के विपरीत राज़ के पापा, श्री भाईलाल पटेलजी  को उनकी बहन श्रीमती सरोज पटेल ने अमरीका बुला लिया था। सरोज बहन ने खुद अमरीकन नागरिक बनने के बाद, अपने भाई भाईलाल जी को स्पॉन्सर किया था। जिसकी बदौलत भाईलाल पटेल  अमरीका में ग्रीन कार्ड लेने परिवार सहित चल निकले थे । भारत के  गुजरात प्रांत के अपने छोटे से शहर से इतनी दूर अमरीका तक आना, इस अनजान परदेस के नए शहर में आ कर बस जाना, पटेल परिवार के लिए एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण कदम था। बरसों से आबाद अपने गाँव के घर को, अपने मुल्क को छोड़, इस तरह नए सिरे से गृहस्थी बसाना बहुत कठिन काम था पर परिवार की उन्नति होगी ऐसे ख्याल से पटेल परिवार हिम्मत जुटाकर अपना पुरखों का गाँव और अपनी धरती छोड़कर इस पराई धरती अमरीका में, बसने के लिए, सात समंदर पार कर, लम्बी यात्रा करता हुआ आ पहुंचा था ! इस एक निर्णय से मानों पटेल परिवार की  पूरी दुनिया ही  बदल गयी थी ! नया नया था सब कुछ ! कुछ जीवन स्थायी हुआ पर तब भी संसाधनों के आभाव में झूझता पटेल परिवार अपनी इस प्रथम अवस्था में अमरिका में, अब तक तो अपने पैर, पूरी तरह जमा न पाया था ! हाँ कमर तोड़ कोशिश जारी थी और नए परिवेश में सफल होने की उम्मीद मन में लिए वे इस नए काम करने में व्यस्त थे।
          राज के पापा ने शुरू में जो काम मिला उसे स्वीकार कर लिया।भाईलाल पटेल जी ने अमरीकी वॉलमार्ट सुपर स्टोर में पहली जॉब ले ली थी। राज की बा मीनल बेन, पास पड़ौस के बच्चों की  बेबी सीटींग - मतलब बच्चों की देखभाल का काम करने लगीं। मीनल बेन गृह कार्य में दक्ष थीं पर वे ज्यादा पढी लिखी न थीं और गुजरात प्रांत का नडियाद गाँव उनका मूल निवास था।
         राज पटेल को स्कूल में दाखिल कर दिया गया और इस तरह भारत की माटी से पौधा अमरीकी धरा पर पनपने के लिए छोड़ दिया गया !
             
कुछ दिनों के बाद, राज़ को रौनी और राधा ने ही बतलाया था कि जो  अमरीकी छात्र स्कुल  से आगे की पढ़ाई मतलब यूनिवर्सिटी शिक्षा की फीस नहीं दे पाते वैसे ( निर्धन या कम आय वाले परिवारों के बच्चों के लिए )  प्रेसीडेंट  स्कॉलरशीप का सरकार द्वारा प्रायोजित प्रबंध है। यही राज को भी मिल सकता  है। यदि राज अप्लाई करेगा तो इस योजना के तहत उसका चयन हो सकता है।
           
अब क्या था, राज ने राधा और रौनी की मदद लेकर अप्लाई कर दिया। प्रेसीडेंट ओबामा उस  समय अमरीकी राष्ट्रपति थे। राज़ पटेल को हाईस्कूल पास कर ने के बाद, ' स्टूडेंट्स लोन ' मिल गई और वो उसी के सहारे, आगे की पढाई के लिए रौनी के ही  कोलिज  में दाखिला ले कर उस प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी को ज्वाइन कर  पाया था। राज के इतने अच्छे कोलिज पहुँच जाने  से पटेल परिवार  बहुत प्रसन्न हुआ। उन सब को बेहद खुशी थी कि उनका बेटा राज़ पटेल  परिवार का पहला सदस्य होगा जो कॉलेज के लेवल में पढ़ने जाएगा और वो भी इतनी अच्छी प्रतिष्ठित संस्था का छात्र बनेगा।  
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एक साल ऐसे ही और बीत गया और अब इन तीनों में, मित्रता गहराने लगी। रौनी, राधा और राज की दोस्ती का एक ज़िंदा त्रिकोण सा खींच गया था। एक सिरे पे था रौनी खुराना -  अमीर घराने का बिंदास बन्दा तो  दुसरे कोण पे थी तेज़ छात्रा  राधा स्वामीनाथन ! जो आगे डाक्टरी की पढाई करेगी ऐसा अंदेशा था। वह अपने चयनित विषयों की पढ़ाई  में व्यस्त थी और तीसरे कोण पे था अपने नए जीवन में स्ट्रगल करता हुआ राज़ पटेल ! कहते हैं न के जब इंसान का ' लक '  अच्छा हो तो दोस्त भी अच्छे मिलते हैं और उसी तरह इन २ समझदार दोस्तों ने मिलकर, राज की तकदीर संवारने में बहुत बड़ा रोल निभाया। राज़ जिस कॉलेज में था वहीं ये दोनों आ जाया करते और अक्सर राज को अपने संग कॉफी पिलाने ले चलते।
       
एक रोज़, राधा के घर पर, राज़ पटेल के परिवार को और खुराना परिवार को ख़ास निमंत्रण देकर डिनर पे बुलवाया गया। उस रोज़  रौनी के परिवार से पहली बार, पटेल परिवार के  लोग मिले। 

प्रथम मुलाक़ात के वक्त  भाईलाल पटेल, कुलदीप खुराना साहब का हाथ थामे उन्हें ' खूब खूब आभार ' कहते रहे तो खुराना जी को बरसों पहले, अपने देहली के घर में आबाद हुए अपने स्वर्गीय पिता की झलक भाईलाल पटेल जी के विनम्र चेहरे में दिखलाई दी ! उनकी याद फिर सजग हो गई !  खुराना जी की आँखें इस संभ्रांत भाईलाल पटेल जी को देखकर  नम हो गईं  और पंजाबी खुराना साहब , गुजरात से पधारे  पटेल साहब का हाथ थामे बड़ी देर तक खड़े रहे और भर्राये गले से बोले,
        ' पटेल सा'ब ये तो ज़िन्दगी है ! हम एन. आर. आई. NRI लोग किस्मत के बन्दे हैं ! ये किस्मत जित्थे ले जान्दी, उत्थे चल देते हैं ! आप हौसला रखो जी ! रब्ब दी मैहर हैग्गी ! त्वाडा राज़ देख लेना एक दी, खानदान दा नाम रोशन करेगा ! ओये रौनीये  जा पुत्तर, अंकल ते कोल्ड ड्रीन्क ला दे तो ! '  
        राधा के पिता पी. स्वामीनाथन जी और उनकी धर्मपत्नी सौदामिनी जी अपने मेहमानों की आवभगत करने में व्यस्त थे।उनके ह्रदय में उमड़े स्नेह की ऊष्मा से भरीं हों ऐसी नरम गरम इडली परोस रहीं सौदा जी, मैरून कांजीवरम सिल्क साड़ी में लिपटीं प्रसन्न वदना सद्गृहिणी आज राधा की बड़ी बहन सी लग रहीं थीं। आज दक्षिण भारत में जो सुगन्धित चमेली के फूलों की मालाएं , पुष्पहार मिलते हैं उन्हें पुष्पवल्ली मल्लिका कहते हैं उन सी ही सुन्दर लग रहीं थीं माँ और बेटी जो अपने सुन्दर सुघड़ डाइनिंग हॉल में मेहमानों के स्वागत में यहां वहां डोल रहीं थीं। वडाई, साम्भर, डोसा चटनी शानदार डाइनिंग टेबुल पर मेहमानों की प्रतीक्षा  करते  हुए पौष्टिक मंद मंद सुगंध फैला रहे थे और उनसे उठती भाप को हवा में तैरती हुई आकर्षण पैदा कर रही थी।स्वामीनाथन दम्पत्ति आदर्श मेजबान थे और स्नेह सहित आग्रह करते हुए, वे अपने अतिथि गणों को सुन्दर भोजन कक्ष में ले चले और सभी ने भर पेट सुस्वादु भोजन का आनंद लिया। बड़ी शानदार दावत रही !
       
कुछ समय और बीत गया और अब राधा, रौन और राज तीनों १८ साल के हो रहे थे।
      
एक रोज रौन, राज के घर के इलाके से गुजर रहा था तो उसने अपने दोस्त को टेक्स्ट  मेसेज बेज दिया, 
' यार राज , चाय पिलाएगा ? तेरे घर के नज़दीकसे गुजर रहा हूँ ! ' 
 राज ने फ़ौरन जवाब दिया ' आ जा दोस्त ! बा से कहता हूँ  चाय और नाश्ता दोनों रेडी रहेंगें ! '       
कुछ ही देर में , रौन, राज पटेल का परिवार जहां रहता था उस पहली मंजिल के छोटे से अपार्टमेंट के दरवाज़े पे पहुंचा। उसके इंतज़ार में राज को वहां मुस्कुराता हुआ देखा तो रौनी भी मुस्कुराया और अपने दोस्त के छोटे से घर में दाखिल हो गया। 
           
राज की बा ने, ४ लोग बैठे उतनी सी, एक टेबल पे चाय और गुजराती नाश्ते स्टील की तश्तरीयों पे  सजा कर बड़े करीने से रखे हुए थे।गुजराती व्यंजन थेपला, ढोकला और मोहनथाल मिठाई तश्तरियों में सजाये थे और पानी से भरे गिलास रेडी थे।उस रोज़, रौनी को उनके इस छोटे से घर में इतना स्नेह मिला की वह निहाल हो गया। कुछ दिनों बाद, रौन टेनिस क्लब में मैच खेल रहा था तो उसने देखा राज वहां स्पोर्ट्स क्लब के फ्रंट डेस्क पे काम कर रहा था। रौनी  ने सोचा ' चलो अच्छा है मेरे यार को पॉकेट मनी मिलेगी ! अभी से पढाई के साथ साथ काम भी करने लगा ये राज ! रेस्पोंसिबल है बन्दा ! '  उसे अपने मेहनतकश दोस्त पे गर्व हुआ। 
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      फिर  कुछ दिनों बाद  रौनी और राधा की फोन पे बात हो रही थी तब राधा ने ही बतलाया था की उनका दोस्त, राज, २ बसें बदल कर, स्पोर्ट्स क्लब पहुंचता है और वहां रोजाना पूरे ६ घंटे काम करता है और कॉलेज की क्लास अटेंड करने के बाद फिर घर जा कर आगे पढाई भी करता है !
         राधा और रौनी दोनों सुखी और समृद्ध परिवार से थे और उन्हें राज के इस तरह स्ट्रगल करने की बात को जान कर मन ही मन अपने दोस्त पे तरस  भी आ रहा था और बहुत गर्व भी हो रहा था।             
        राज और रौनी  कॉलेज के कई सब्जेक्ट की क्लास में एक साथ पढ़ाई किया करते थे। परंतु रौन ने कॉमर्स लिया था और राधा ने लिया था साईंस! राधा मेडीसीन में आगे डाक्टरी करने की सोच रही थी।
राज ने आर्कीटेक्चर यह अपने लिए मुख्य विषय चुन लिया था। कुछ सब्जेक्ट्स के लिए ये लोग साथ होते और दुसरे विषयों की क्लास में अलग होते। कौन जाने जीवन में आगे क्या होगा परन्तु जो होगा सो होगा !इस वक्त तो तीनों छात्र जम के अपना अपना काम करने में व्यस्त  थे। 
       
एक दिन की बात है जब कुलदीप खुराना जी का भाईलाल पटेल के मोबाइल पे फोन आया,  ' हेल्लो हेल्लो पटेल सा'ब रौनी आया है क्या आप के यहां ? '
खुराना जी के आवाज़ में एक अजीब बैचेनी और हड़बड़ाहट थी।    
' नहीं  तो खुराना भाई राज और रौनी कॉलेज से ४ बजे के पहले नहीं लौटते , क्यूँ क्या हुआ ? '  भाईलाल पटेल ने पूछा ! 
   ' आप फ़ौरन अभी अभी टीवी खोलो जी, देखो तो ये कैसी  न्यूज़ आ रही है ! अपने बच्चों की कॉलेज है न वहीं पे कोइ हादसा हो रहा है पटेल भाई ! स्कूल में  शूटिंग हो रहा है ! ' खुराना जी की आवाज़ में अब साफ़ चिंता और एकदम भय के भाव उभर आए थे। 
  ' शूं कहो छो साहेब! हे भगवान्, अरे टीवी चालु करो तो ' उन्होँने अपनी पत्नी को घबड़ाकर आदेश दिया और खुराना जी ने वही सुना  जो उनके घर पे रखे टीवी सेट से प्रसारित हो रहा था।  वहां पे भी न्यूज चैनल की रिपोर्टर वही सब बतला रही थी। रिपोर्टर की वही सधी परन्तु चिंतित आवाज़ पटेल जी के घर से भी आने लगी। मानों ये हादसे की खबर द्विगुणीत हो कर बार बार आगाह कर रही थी जिसे सुन कर दोनों घरों में, पेरेंट्स के कलेजे मुंह को आने लगे थे। 
               न्यूज़ यही थी कि एक गुस्से से पगलाए लड़के ने जिसका नाम ' सांग व्ही चो ' था उसने कॉलेज के ३२ छात्रों को गोलियों से भून दिया ! पुलिस का इमेरजैंसी दस्ता जिसे अमरीका में  स्वाट SWAT टीम कहते हैं वह तैनात था।  कई एम्ब्युलेंस, कई सारे पुलिस दस्ते, कॉलेज केम्पस को घेर कर चौकन्ने  तैनात थे। इस भयानक हादसे में  फंसे हुए छात्रों और  टीचरों और अन्य कार्यकर्ताओं को सलामती के दायरे तक पुलिस के लोग पहुंच रहे थे। चारों तरफ अफरातफरी का आलम था। 
          पटेल जी के घर और खुराना के घर पर २ जोड़ी माता और पिता अपने अपने भगवान् से हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे थे और अपने बच्चों की जान बचे इसकी दुआएं माँग रहे थे। 
       मानों भगवान ने इनकी प्रार्थनाएं सुन ली हों इस तरह  लगभग एक समय पे दोनों घरों में फोन की घंटियाँ बजने लगी ! 
' हेल्लो डेड , रौनी हूँ ! मैं ठीक हूँ , मैं ठीक हूँ ! डोन्ट वरी डेड , i love you & mom so much ! ' रौनी की ऊंची आवाज़ खुराना दंपति के कानों में मानों अमृत घोलने लगी।  
     दुसरी तरफ पटेल जी के घर पे ' हेल्लो पापा, मेरी बा से कहो मैं सलामत हूँ ! ' पटेल जी के घर में राज की आवाज़ गूंजी तो
 ' हे रणछोड़ राय लाज राखी रे ! ' राज की बा ने चीखते हुए हाथ पूजा की मुद्रा में ऊपर उठा लिए और मीनल बा जमीन पर ही धम्म से  गिर पड़ीं तो उन के आँसुओं के संग, मानों गंगा, यमुना ही बह चलीं ! 
     उनके बच्चे जब घर सही सलामत लौट आए तो राधा भी उन के साथ खुराना जी के घर आयी। उसी से क्या वाकया हुआ था उस पूरी घटना का खुराना और पटेल परिवार को पता चला।  
       राधा ने खुराना साहब को बतलाया कि  राज ने फाटक से बड़ी सी गन लेकर आते उस खतरनाक मुजरिम छात्र को जो उनकी कॉलेज का ही एक पूर्व छात्र था पर उसके असंयमित व्यवहार से नाराज़ होकर स्कूल ने उसे बाहर कर दिया था और शायद इसी कारण वह छात्र इतना क्रुद्ध था और दिमागी संतुलन खो बैठा था। उस को स्कूल के परिसर में दाखिल होते हुए ,सब से  पहले राज पटेल ने देख लिया था और तब राज फुर्ती से दौड़ता हुआ, लगभग छलाँग लगाता हुआ, सीधा  रौनी की क्लास की ओर भागा था।  
    रौनी के क्लास में पहुँच कर अपने दोस्त का हाथ पकड़ कर, लगभग खींचता हुआ, राज अपने संग दूसरे कई छात्रों को कोलिज के पिछले दरवाज़े से निकलने का इशारा करते हुए सभी को बचा कर बाहर खड़े पुलिस के ' सेफ ज़ोन ' तक लाने का बहादुरी का काम कर रहा था। उस वक्त राज ने जो किया था उसी के कारण  रौनी और  उसकी पूरी क्लास के ३२ छात्रों को उस खूनी दरिन्दे पगलाए, बन्दूक से गोलियों की बौछार से आनन् फानन में  जो सामने दिखा उन पे गोली दागते हुए, उस मौत के सौदागर से राज की सूझबूझ ने ही  आज रौनी और ३१ और छात्रों को बचा लिया था।मौत सामने विकराल रूप लिए खड़ी थी पर सूझबूझ से राज के उस हादसे के दौरान अपने छात्र मित्रों को बचाकर सेफ जोन में पहुंचाने से आती हुई भयानक मौत की परछाईं भी टल गई थी ! 
          राधा से इस हैरतअंगेज़ घटना का आँखों देखा विवरण सुनकरखुराना साहब और शरणजित जी भाव विह्वल हो गए ! राधा और उसके माता पिता, स्वामीनाथन परिवार खुराना परिवार मिलकर , अपनी  कारों में बैठ, फ़ौरन पटेल साहब के घर जा पहुंचे थे और वहां पहुँच कर कर सभी ने बारी बारी  से बहादुर राज को गले से लगा लिया था ! 
        भर्राये गले से, खुराना जी ने कहा ' बेटे राज, बड़े बहादुर हो तुम! दोस्त हो तो तुम जैसा ! तुमने मेरे रौनी को और इतने सारे बच्चों को एक वक्त पर बचा लिया। हम तुम्हारे ऋणी हैं बेटे ! '
        विनम्रता की मूरत से राज ने तब झुक कर अपने खुराना अंकल  के पैर छु लिए और कहा  ' अंकल जी, रौनी  मेरा बड़ा भाई है ! आप का बेटा  हूँ ! आज आप के आशीर्वाद मिले मुझे और क्या चाहिए ! ' 
    
अमरीका की ज़िन्दगी में ऐसे हादसे बहुत होते हैं। क्राइम ब्रांच के अनुसार १८ से अधिक स्कूलों में गैन से हिंसा की बारदातें हुईं हैं। ऐसे क्राइम आये दिन घट रहे हैं।  किन्तु यदाकदा ऐसे बीच  बचाव की घटनाएं भी सुनने में आतीं हैं। कईयों की हाज़िरजवाबी के , बहादुरी के किस्से भी सुनने को मिलते हैं। 

सच्ची इंसानियत पर भरोसा ऐसी बातों से ही आज भी कायम है। ऐसे मन को दुःख में डुबो देनेवाले हादसों के  बीच यदि ऐसा ' राम भरत मिलाप '  भी देखने को मिले तब तो भारतीय संस्कारों की लम्बी परम्पराओं पर हमें बेसाख्ता गर्व हो उठता  है ! 
सच तो यही है कि भारत की पावन माटी की खुशबु  दूर दूर तक आ फ़ैल चुकी है। जहां कहीं भी अच्छे भारतीय लोग जा जा कर बसे हैं और सच्ची मानवता का धर्म निभा रहे हैं, वहीं पर भारत की  सोंधी माटी की खुशबु भी पहुँच चुकी है ! 
ऐसी  कहानी है , तीन भारतीय अमरीकन टीनेजर्स की ! 
आप ये नाम अवश्य याद रखिएगा ~  रौनी , राज और राधा ! 
- लावण्या दीपक शाह 
संपर्क : ई मेल : Lavnis@gmail.com