Thursday, February 15, 2018

३ ऐवरेज अमेरिकन टीनएजर्स की कहानी : Ronnie रौनी , Raj राज़ और Radha राधा


आज जब अमरीकी स्कूलों में यह १८ वीं भयानक ' स्कूल - शूटिंग 'की दुःखद वारदात हुई है जब निर्दोष १७ बच्चों ने अपनी मासूम जानें गवाईं हैं  तब मेरी  टीनेजर्स पर लिखी कहानी प्रासंगिक हो गयी है।
श्रद्धांजलि और दिवंगत मासूम आत्माओं की सद्गति के लिए 
अश्रु  पूरित प्रार्थना सहित प्रस्तुत है ~    
Ronnie रौनी , Raj राज़ और Radha  राधा :  ( ३ ऐवरेज अमेरिकन टीनएजर्स की कहानी )
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Ronnie , रौनी आज अपनी नई कार चला कर स्कूल आया है ! जिस दिन रौनी के  युवा जीवन के १७ साल पूरे हुए थे  उसी दिन उसकी बर्थ डे पार्टी की शाम को,  तोहफे में, उसके डेड कुलदीप खुराना और मोम शरणजित ने अपने बेटे रौनी के लिए एक नई चमचमाती,  ब्ल्यू माज़दा स्पोर्ट्स कार खरीद कर उसे दी थी।  
            
उस नई गाड़ी की key - less entry -  कीलेस एन्ट्री का उपकरण रौनी के हाथ में थमाते हुए माता पिता बेहद प्रसन्न थे! जिस वक्त उस नई गाड़ी की चाबी अपने लाडले के हाथों में थमाई  थी तब कुलदीप खुराना जी को अपने जवानी के संघर्ष भरे दिनों की बरबस याद हो आई थी ! कितनी मेहनत  की थी कुलदीप ने पढ़ाई में ! नियम से पढ़ाई कर अच्छे नंबरों से पास हुए थे वे ! 
           
अक्सर  घर के कामों में हाथ बंटाना भी उनके जीवन का अहम् हिस्सा था। बाउजी और अम्मी की बातों का जवाब ' हाँ जी ' के अलावा कुलदीप के मुंह से कभी कुछ और नहीं निकल पाया था ! 
              
भारत में बड़ों की इज़्ज़त करना उन जैसे मध्यम वर्ग के परिवारों में रिवाज़ था।यही चलन था।अपनी संतान के लिए उनके  बचपन के दिनों में उंडेला ढ़ेर सा लाड - प्यार, अधिकतर भारतीय मध्य वर्ग के परिवारों में देखा जाता है और ये  एक आम  बात है। परन्तु जैसे जैसे परिवार में बच्चा बड़ा होने लगता है, उसे भी संस्कार, पारिवारिक रीति रिवाज़, बड़ों कीमर्यादा का महत्त्व ऐसी कई बातें समझ में आने लगतीं हैं। बड़ों की इज़्ज़त करना भी बच्चे सीख लेते हैं।यदि  रोज नहीं करते तो बच्चे अक्सर ख़ास  त्योहारों पर, जैसे दिवाली पर अपने बुजुर्गों के पैर  छू कर आशीर्वाद लेना, सीख लेते हैं। रीश्तेदारी में, पास पड़ौस के बड़ों को मान दे कर सम्बोधित करना जैसे सारे पुरुष अंकल कहलाते हैं और महिलाएं साड़ी आंटी जी कहलातीं हैं ये सब तो रोज के व्यवहार में बच्चों को सिखलाया जाता है!
    
 ' कुलदी ...  पे , इत्थे आ पुत्तर ! ' जब भी अम्मी या बाउजी की आवाज़ आती ' जी हाँ ' कहता छोटा सा कुलदीप आवाज़ की दिशा में खींचा चला जाता था।  
              
आज अमरीका में अपने १७ साल के जवान  बेटे रौनी  को देख कर ५० की उम्र के पड़ाव पर ठिठके हुए कुलदीप खुराना जी को अपना बचपन याद हो आया ! कित्ते  प्यारे दिन थे ! भारत के मध्य वर्गीय घर में बेशक उनके परिवार के पास ऐसी चमचमाती गाड़ियां न थीं पर अम्मी के प्यार से संवरा हुआ वो घर, जन्नत से कम न था। अम्मी का प्यार और बाउजी की काम करने की लगन से परिवार के सभी को सुख सुविधा मिल रहीं थीं। अपने स्नेह पाश में परिवार सभी को वह घर बांधे रखता था। सभी को आराम मिलता था वहां!  सभी अपनी अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते रहते थे।
       
कुलदीप के  बाउजी दिनभर जी तोड़ कर, खूब मेहनत  किया करते थे और अम्मी दिन भर रसोई घर में मिलतीं। सब के आराम की फ़िक्र करतीं ,खपती रहतीं थीं।पर हमेशा मुस्कुराया करतीं थीं! रिश्तेदारी, बियाह - त्यौहार, सब के जन्मदिन इन  सभी बातों का वे पूरा ख्याल रखा करतीं थीं। कोइ त्यौहार ऐसा नहीं जिसे वे ना मनातीं हों ! उन के उस छोटे  से परिवार में, उस पुरखों के घर में, अमन - चैन भारत की तेज़  धूप की मानिंद, पसरा रहता था ! अब इत्ते बरसों के बीतने पर कुलदीप के जहन में बचपन की, अपने उस घर की सुखद यादें ही बाकी रह गईं हैं। वे सोचने लगे, " इंसान को खुशी मिले उस के लिए सच, बहुत नहीं, बस थोड़ा सा सुख चाहिए होता है और क्या क्या जियादा चाहिए होता है जी? " 

कुलदीप खुराना जी बेटे समय को किसी धुंध में लिपटा सा देख रहे थे और उन्होंने एक संतोष भरी साँस लेते हुए, अपने मन को हठात आधुनिक समय में, आधुनिक परिवेश में, अमरीका के अपने आलीशान आवास के आँगन में खींच लिया था।
        अपने लाडले बेटे को आगे बढ़, खुराना साहब ने गले से लगा लिया तो रौनी की मोम शरणजित भी मुस्कुराने लगीं और कहा " बाप बेटे गले मिल लो जी - फिर आशीर्वाद देते हुए बोलीं " हैप्पी बर्डडे बेटे. मेरे सोने रौने  ~~ ज़िन्दा रहै पुत्तर ! " इस के साथ अब  मोम शरणजित रौनी के  गले लग  रहीं थीं ! 
         रौनी का असली नाम है रौनक !  पर यहां अमरीका में सब उसे '  रौनी ' ही बुलाते हैं। सुन्दर, गोरा, छरहरे बदन को जिम में एक्सरसाइज कर के तराशे हुए रौनी बड़ा हसमुख और हैंडसम टीनएजर है। 
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 आज रौनी अमरीका की खुली  साफ़ सड़कों पे, स्पीड से, अपनी स्पोर्ट्स कार चलाते हुए हाईस्कूल पहुंचा। वो १० वीं क्लास में है और अमरीका में १० वीं क्लास के छात्र कोसोफ़ोमोर sophomore कहते हैं। अमरीकी शिक्षा प्रणाली में प्रत्येक  छात्र के लिए, स्कूल से पास  होने का ११ वीं क्लास ही  अंतिम वर्ष होता है। 
       
स्कूल के के बाहर क्लास के कई लड़के, लड़कियां भी अपनी कारों को पार्क कर के भीतर स्कूल के बड़े से मकान में दाखिल हो रहे थे। सामने से रौनी को, क्लास मेट, राधा स्वामीनाथन आती दिखलाई दी तो रौनी ने हवा में हाथ लहराते हुए उसे ' हाय ' कहा तो दोनों वहीं रूक गए।
       
अमरीका में  राधा अपने नृत्य गुरु सुश्री जयश्री बाललिंगम जी से नृत्यालय  डान्स एकेडमी में भरतनाट्यम सीख रही थी। राधा लंबी दुबली पतली सांवली सी किशोरी है। तेज  नैन नक्शवाली राधा जब भी भारत नाट्यम नृत्य  के पारम्पारिक आभूषण  और वस्त्र पहनती है तब  खजुराहो में उकेरी प्राचीन प्रस्तर मूर्ति जीवित हो गयी हो ऐसी दीखलाई देती है।जब राधा के भौंहों तक खींचे नैन चहुँ दिशा में घूमते तब मानों सजीव हो उठते थे। नृत्य व अभिनय कला में दक्षता ही राधा स्वामीनाथन के आकर्षक नयनों की पहचान थी।Image result for American indian teenager wearing sweater

 राधा के नैन सब  बातों का पता रखते थे।  उसकी निगाह से कोइ बात छिपी न रह पाती थी।
अपनी उम्र के छात्रों में राधा उस स्कूल में, पढाई में सबसे तेज़ छात्रा थी! सभी  टीचर्स की वह फेवरिट थी !  इसीलिये सब कहते थे "  देख लेना इस साल यह राधा स्वामीनाथन ही '  वेलेडिक्टोरियन ' बनेगी। " 
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       अमरीकी स्कूलों में ' valedictorian ' वही छात्र बनता है जो हर विषय में और सारे छात्रों में सबसे ज्यादा, टॉप नंबर लाए और हर बात में सर्वश्रेष्ठ हो ! उसे स्कूल में छात्रों के अंतिम वर्ष में जब वे स्कूल से पास होकर आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज जाते हैं और उनका दीक्षांत समारोह या ग्रेज्यूएशन समारोह होता है उस में स्टूडेंट्स की ओर से अंतिम विदा - भाषण या फेरवेल स्पीच देने का अवसर भी उसी स्टूडेंट को  मिलता है जो हर क्षेत्र में, सब से अव्वल हो।

        

राधा को आगे अंतिम साल स्कूल जीवन की समाप्ति पे ऐसा मौका मिलनेवाला है ये सभी जानते थे और राधा को खूब मानते थे ! 

' सो राडा, वस्स्स्स'wasss 'up ? ' रौनी ने पूछा  .... 

' रो नई ' मीन्स ' डोन्ट क्राई ' i will call you ! ' राधा ने तुनक कर अपने नाम के गलत उच्चारण से, ग़लत प्रोनोउंससिएशन से खीज कर कहा! 

     

फिर आगे बोली, "say  राधा" ! ऐसे बोलो न ! मेरा नाम राधा है राधा! व्हाट रौनी, तुम तो देसी हो ! ये अमरीकन मेरा नाम ठीक से नहीं बोल पाते पर तुम तो सही सही बोलो ! " राधा ने मुस्कुराते हुए रौनी को सुधारते हुए छेड़ा! 

         

अमरीकन उच्चारण करने  में ' ध ' या भ ' अक्सर बोल नहीं पाते ! उन्हें ये स्वर बोलने में बहोत मुश्किल लगता है। कईयों से ' ढ ' और ' भ ' अगर नाम में हों तो ठीक से ऐसा नाम बोला ही नहीं जाता! 

अपनी मुस्कराहट छिपाते हुए ' ओके ओके ' रौनी ने कहा " ओके मैडम ! Done ! Radha "

अब राधा ने  आज की ताज़ा खबर देते हुए कहा " डू यू नो, there is a newbeeie in our class ! हमारी क्लास में एक  नया लड़का भारत से आया  है ! अभी सीधा इंडिया से आया " & oh his name is RAJ  ! " राधा ने पूरी खबर देते हुए कहा। 
' ओह then  ही इज़ a  FOB ! ' रौनी ने व्याख्या करते हुए तड़ से ' फ़ोब ' का तमगा जड़ दिया ! फ़ोब - FOB =  ' fresh of the boat ' होता है  !मतलब  जो अभी अभी ताज़ा नाव से उतरा हो ! मतलब अमरीका में नया आनेवाला भारतीय FOB कहलाता है 
राधा मुस्कुराई और बोली ,  ' राज़ is कच्चा नीम्बू ' , तूम  पक्का नीम्बू ' राधा ने फिर उसे छेड़ा ! फिर राधा आगे बोली , 
' एट लीस्ट राज़ इज़ नॉट ABCD  लाइक यू ! ' अमेरिकन बोर्न कन्फ्यूज़्ड देसी ' तेरे जैसा! ' 
' उफ्फ ' रौनी मन ही मन सोचने लगा ' अच्छा तो आज राधा उसे खूब परेशान करने के मूड में थी। चलो कोइ गल नीं ' रौनी की  माँ से सीखी पँजाबी, सोचते समय, जहन में आ गयी जो  मन में घुली हुई थी ! 
' जस्ट किडींग मेन ! टेक इट लाइटली ' राधा ने बात को खत्म करते हुए संधि प्रस्ताव रख दिया । 
          उसी वक्त, नया लड़का FOB का तमगा पाया हुआ राज़ भी वहीं उन दोनों के सामने आ कर खड़ा हो गया। घेऊं की सी रंगत लिए चेहरा, उस पर बड़ी आँखें ! कुछ कुछ  खुली हुईं सी थीं। जिनमें कुछ सहमी हुई इच्छाएं दबीं थीं।  उन आँखों में तैर रहा था आत्म विशवास जो इस मंझोले कद के लड़के के बिहेवियर में, उसके व्यक्तित्त्व में , भारतीय मध्य वर्ग की शालीनता का संगम लिए अमूमन मौजूद  थी। 
           
भारत से खरीद कर लाये कपड़े,  तन पर सलीके से पहन कर आज अमरीकी स्कूल में पहले दिन यह छात्र अपने परिवेश से मानों समझौता करने का प्रयास कर रहा था। अमरीका के स्कूल में, अमरीकन छात्रों के बीच, उसके भारत से खरीदे वस्त्रों की रंगत  कुछ अलग ही दीख रही थी। खुद राज भी, अमरीकी स्टूडेंट्स के बीच में कुछ अलग अलग सा दिख रहा था।मानों कोइ सिल्क के थान पे टाट का पैबंद लग गया हो !  
          
उनके शहर में ठण्ड शुरू हो चुकी थी पर राज़ ने चेक प्रिन्ट की पीली और लाल कमीज़ पे ब्राऊन स्वेटर जो शायद उसने भारत में कुछ वर्ष पहले खरीदा था और कई बरसों  पहन चुका था, आज भी उसने वही शान से पहन रखा था जो अमरीकी मौसम में पसरी ठण्ड से बचाव का असफल प्रयास कर रहा था। 
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राज के उस पुराने स्वेटर को देखते ही रौनी को एकदम से, दया आ गई ! झट से अपना किंमती नया लेधर जैकेट उतार कर उसने राज़ के सामने बढ़ाते हुए कहा ' यार ये पहन ले ! इट इज़ टू कोल्ड  टूडे ! ' 
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इस तरह, अचानक से दिया हुआ, कीमती तोहफा राज को सकपका गया ! पहली बार किसी से मिलने पे इतना महँगा चमड़े का कोट रौनी ने उतार कर थमाया तो  राज़ को बड़ा अजीब लगा। पर रौनी ने उसे अपने हाथों से, वहीं स्कूल के बाहर लोन पर खड़े ख़ड़े , अपना  जैकेट इस नए दोस्त को जबरन पहना ही दिया और अपने इस नए दोस्त को सजा संवार दिया और फिर रौनी, राज़ को लगभग ठेलते हुए अपने संग उनकी क्लास की ओर ले चला ! उस वक्त न जाने क्यूँ रौनी बहुत खुश था ! राज मानों उसका छोटा भाई था जो आज अचानक उसे मिल गया था ! कुछ ऐसे भाव रौनी के मन में आ - जा रहे थे। इन दोनों के पीछे पीछे, चहकती हुई, राधा भी उन दोनों के संग चल दी ! यही था राधा, राज़ और रौनी की दोस्ती का पहला दिन ! 
        साल पूरा होते तो तीनों भारतीय स्टूडेंट्स में गहरी दोस्ती हो गई।राज़ को अमरीकी सिस्टम के कई सारे ' राज़ ' भी इन्हीं दोनों ने धीरे धीरे बतलाए और सीखला दिए थे। 
     रौनी के मोम, डेड  ने जब से रौनी पैदा हुआ था उसकी आगे की पढ़ाई का सारा खर्चा जब रौनी बड़ा होकर कोलैज जाएगा बैंक में जमा करना शुरू किया था। अमरीकन कायदों में ऐसी बचत पर विशेष टैक्स छूट दी जाती है ताकि छात्र जीवन में आगे की पढ़ाई के लिए हरेक छात्र का भविष्य सुरक्षित हो। वैसे भी सर्कार हर इलाके में स्कूल चलाती है जहां बस सेवा , किताबें , स्कूल की पढ़ाई इत्यादि की फीस नहीं होतीं।  इलाके में रहनेवालों के टैक्स से बिना फीस की अमरीकी स्कूलों का निर्वाह होता है। यदि कोइ बच्चा १ या २ दिन से स्कूल न पहुंचे तो फ़ौरन उस प्रांत की शाखाएं सक्रीय होकर छानबीन शुरू कर देतीं हैं। कारण जानने  की पहल होती है। यदि माता, पिता गैर ज़िम्मेदार हों तो कठिन सज़ा और कोर्ट केस किया जाता है। यदि अभिभावक की गलती हो तब उन्हें जेल में भी जाना पड सकता है। माता, पिता बच्चों पर कदापि हाथ नहीं उठा सकते अन्यथा उन्हें जेल हो जाती है। ऐसे कड़े कानून अमरीका के ५२ प्रांतों में लागू किये गए हैं और उनका पालन सख्ती से किया जाता है और नागरिकों से करवाया जाता है । 

 रौनी खुराना एक रईस परिवार का बेटा था और अमरीका में इंजीन्यरींग की पढ़ाई संपन्न करने बाद कुलदीप  खुराना साहब ने  बड़ी अच्छी कम्पनी में काम किया था। कुलदीप खुराना जी ने कई अपने तरह के बुद्धिजीवी भारतीयों की तरह खूब तगड़ा वेतन पाते हुए, अपनी नौकरी में उत्तरोत्तर प्रगति करते हुए सफलता हासिल की थी। रहने के लिए अति शानदार और आरामदेह घर खरीद लिया था।  परिवार के सदस्यों के लिए हर तरह की सुविधा अपने बल बूते पर हासिल कर ली थी। अपने और परिवार के हर मौज और शौख को खुराना जी ने पूरा किया था। 
          
खुराना साहब के परिवार के विपरीत राज़ के पापा, श्री भाईलाल पटेलजी  को उनकी बहन श्रीमती सरोज पटेल ने अमरीका बुला लिया था। सरोज बहन ने खुद अमरीकन नागरिक बनने के बाद, अपने भाई भाईलाल जी को स्पॉन्सर किया था। जिसकी बदौलत भाईलाल पटेल  अमरीका में ग्रीन कार्ड लेने परिवार सहित चल निकले थे । भारत के  गुजरात प्रांत के अपने छोटे से शहर से इतनी दूर अमरीका तक आना, इस अनजान परदेस के नए शहर में आ कर बस जाना, पटेल परिवार के लिए एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण कदम था। बरसों से आबाद अपने गाँव के घर को, अपने मुल्क को छोड़, इस तरह नए सिरे से गृहस्थी बसाना बहुत कठिन काम था पर परिवार की उन्नति होगी ऐसे ख्याल से पटेल परिवार हिम्मत जुटाकर अपना पुरखों का गाँव और अपनी धरती छोड़कर इस पराई धरती अमरीका में, बसने के लिए, सात समंदर पार कर, लम्बी यात्रा करता हुआ आ पहुंचा था ! इस एक निर्णय से मानों पटेल परिवार की  पूरी दुनिया ही  बदल गयी थी ! नया नया था सब कुछ ! कुछ जीवन स्थायी हुआ पर तब भी संसाधनों के आभाव में झूझता पटेल परिवार अपनी इस प्रथम अवस्था में अमरिका में, अब तक तो अपने पैर, पूरी तरह जमा न पाया था ! हाँ कमर तोड़ कोशिश जारी थी और नए परिवेश में सफल होने की उम्मीद मन में लिए वे इस नए काम करने में व्यस्त थे।
          राज के पापा ने शुरू में जो काम मिला उसे स्वीकार कर लिया।भाईलाल पटेल जी ने अमरीकी वॉलमार्ट सुपर स्टोर में पहली जॉब ले ली थी। राज की बा मीनल बेन, पास पड़ौस के बच्चों की  बेबी सीटींग - मतलब बच्चों की देखभाल का काम करने लगीं। मीनल बेन गृह कार्य में दक्ष थीं पर वे ज्यादा पढी लिखी न थीं और गुजरात प्रांत का नडियाद गाँव उनका मूल निवास था।
         राज पटेल को स्कूल में दाखिल कर दिया गया और इस तरह भारत की माटी से पौधा अमरीकी धरा पर पनपने के लिए छोड़ दिया गया !
             
कुछ दिनों के बाद, राज़ को रौनी और राधा ने ही बतलाया था कि जो  अमरीकी छात्र स्कुल  से आगे की पढ़ाई मतलब यूनिवर्सिटी शिक्षा की फीस नहीं दे पाते वैसे ( निर्धन या कम आय वाले परिवारों के बच्चों के लिए )  प्रेसीडेंट  स्कॉलरशीप का सरकार द्वारा प्रायोजित प्रबंध है। यही राज को भी मिल सकता  है। यदि राज अप्लाई करेगा तो इस योजना के तहत उसका चयन हो सकता है।
           
अब क्या था, राज ने राधा और रौनी की मदद लेकर अप्लाई कर दिया। प्रेसीडेंट ओबामा उस  समय अमरीकी राष्ट्रपति थे। राज़ पटेल को हाईस्कूल पास कर ने के बाद, ' स्टूडेंट्स लोन ' मिल गई और वो उसी के सहारे, आगे की पढाई के लिए रौनी के ही  कोलिज  में दाखिला ले कर उस प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी को ज्वाइन कर  पाया था। राज के इतने अच्छे कोलिज पहुँच जाने  से पटेल परिवार  बहुत प्रसन्न हुआ। उन सब को बेहद खुशी थी कि उनका बेटा राज़ पटेल  परिवार का पहला सदस्य होगा जो कॉलेज के लेवल में पढ़ने जाएगा और वो भी इतनी अच्छी प्रतिष्ठित संस्था का छात्र बनेगा।  
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एक साल ऐसे ही और बीत गया और अब इन तीनों में, मित्रता गहराने लगी। रौनी, राधा और राज की दोस्ती का एक ज़िंदा त्रिकोण सा खींच गया था। एक सिरे पे था रौनी खुराना -  अमीर घराने का बिंदास बन्दा तो  दुसरे कोण पे थी तेज़ छात्रा  राधा स्वामीनाथन ! जो आगे डाक्टरी की पढाई करेगी ऐसा अंदेशा था। वह अपने चयनित विषयों की पढ़ाई  में व्यस्त थी और तीसरे कोण पे था अपने नए जीवन में स्ट्रगल करता हुआ राज़ पटेल ! कहते हैं न के जब इंसान का ' लक '  अच्छा हो तो दोस्त भी अच्छे मिलते हैं और उसी तरह इन २ समझदार दोस्तों ने मिलकर, राज की तकदीर संवारने में बहुत बड़ा रोल निभाया। राज़ जिस कॉलेज में था वहीं ये दोनों आ जाया करते और अक्सर राज को अपने संग कॉफी पिलाने ले चलते।
       
एक रोज़, राधा के घर पर, राज़ पटेल के परिवार को और खुराना परिवार को ख़ास निमंत्रण देकर डिनर पे बुलवाया गया। उस रोज़  रौनी के परिवार से पहली बार, पटेल परिवार के  लोग मिले। 

प्रथम मुलाक़ात के वक्त  भाईलाल पटेल, कुलदीप खुराना साहब का हाथ थामे उन्हें ' खूब खूब आभार ' कहते रहे तो खुराना जी को बरसों पहले, अपने देहली के घर में आबाद हुए अपने स्वर्गीय पिता की झलक भाईलाल पटेल जी के विनम्र चेहरे में दिखलाई दी ! उनकी याद फिर सजग हो गई !  खुराना जी की आँखें इस संभ्रांत भाईलाल पटेल जी को देखकर  नम हो गईं  और पंजाबी खुराना साहब , गुजरात से पधारे  पटेल साहब का हाथ थामे बड़ी देर तक खड़े रहे और भर्राये गले से बोले,
        ' पटेल सा'ब ये तो ज़िन्दगी है ! हम एन. आर. आई. NRI लोग किस्मत के बन्दे हैं ! ये किस्मत जित्थे ले जान्दी, उत्थे चल देते हैं ! आप हौसला रखो जी ! रब्ब दी मैहर हैग्गी ! त्वाडा राज़ देख लेना एक दी, खानदान दा नाम रोशन करेगा ! ओये रौनीये  जा पुत्तर, अंकल ते कोल्ड ड्रीन्क ला दे तो ! '  
        राधा के पिता पी. स्वामीनाथन जी और उनकी धर्मपत्नी सौदामिनी जी अपने मेहमानों की आवभगत करने में व्यस्त थे।उनके ह्रदय में उमड़े स्नेह की ऊष्मा से भरीं हों ऐसी नरम गरम इडली परोस रहीं सौदा जी, मैरून कांजीवरम सिल्क साड़ी में लिपटीं प्रसन्न वदना सद्गृहिणी आज राधा की बड़ी बहन सी लग रहीं थीं। आज दक्षिण भारत में जो सुगन्धित चमेली के फूलों की मालाएं , पुष्पहार मिलते हैं उन्हें पुष्पवल्ली मल्लिका कहते हैं उन सी ही सुन्दर लग रहीं थीं माँ और बेटी जो अपने सुन्दर सुघड़ डाइनिंग हॉल में मेहमानों के स्वागत में यहां वहां डोल रहीं थीं। वडाई, साम्भर, डोसा चटनी शानदार डाइनिंग टेबुल पर मेहमानों की प्रतीक्षा  करते  हुए पौष्टिक मंद मंद सुगंध फैला रहे थे और उनसे उठती भाप को हवा में तैरती हुई आकर्षण पैदा कर रही थी।स्वामीनाथन दम्पत्ति आदर्श मेजबान थे और स्नेह सहित आग्रह करते हुए, वे अपने अतिथि गणों को सुन्दर भोजन कक्ष में ले चले और सभी ने भर पेट सुस्वादु भोजन का आनंद लिया। बड़ी शानदार दावत रही !
       
कुछ समय और बीत गया और अब राधा, रौन और राज तीनों १८ साल के हो रहे थे।
      
एक रोज रौन, राज के घर के इलाके से गुजर रहा था तो उसने अपने दोस्त को टेक्स्ट  मेसेज बेज दिया, 
' यार राज , चाय पिलाएगा ? तेरे घर के नज़दीकसे गुजर रहा हूँ ! ' 
 राज ने फ़ौरन जवाब दिया ' आ जा दोस्त ! बा से कहता हूँ  चाय और नाश्ता दोनों रेडी रहेंगें ! '       
कुछ ही देर में , रौन, राज पटेल का परिवार जहां रहता था उस पहली मंजिल के छोटे से अपार्टमेंट के दरवाज़े पे पहुंचा। उसके इंतज़ार में राज को वहां मुस्कुराता हुआ देखा तो रौनी भी मुस्कुराया और अपने दोस्त के छोटे से घर में दाखिल हो गया। 
           
राज की बा ने, ४ लोग बैठे उतनी सी, एक टेबल पे चाय और गुजराती नाश्ते स्टील की तश्तरीयों पे  सजा कर बड़े करीने से रखे हुए थे।गुजराती व्यंजन थेपला, ढोकला और मोहनथाल मिठाई तश्तरियों में सजाये थे और पानी से भरे गिलास रेडी थे।उस रोज़, रौनी को उनके इस छोटे से घर में इतना स्नेह मिला की वह निहाल हो गया। कुछ दिनों बाद, रौन टेनिस क्लब में मैच खेल रहा था तो उसने देखा राज वहां स्पोर्ट्स क्लब के फ्रंट डेस्क पे काम कर रहा था। रौनी  ने सोचा ' चलो अच्छा है मेरे यार को पॉकेट मनी मिलेगी ! अभी से पढाई के साथ साथ काम भी करने लगा ये राज ! रेस्पोंसिबल है बन्दा ! '  उसे अपने मेहनतकश दोस्त पे गर्व हुआ। 
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      फिर  कुछ दिनों बाद  रौनी और राधा की फोन पे बात हो रही थी तब राधा ने ही बतलाया था की उनका दोस्त, राज, २ बसें बदल कर, स्पोर्ट्स क्लब पहुंचता है और वहां रोजाना पूरे ६ घंटे काम करता है और कॉलेज की क्लास अटेंड करने के बाद फिर घर जा कर आगे पढाई भी करता है !
         राधा और रौनी दोनों सुखी और समृद्ध परिवार से थे और उन्हें राज के इस तरह स्ट्रगल करने की बात को जान कर मन ही मन अपने दोस्त पे तरस  भी आ रहा था और बहुत गर्व भी हो रहा था।             
        राज और रौनी  कॉलेज के कई सब्जेक्ट की क्लास में एक साथ पढ़ाई किया करते थे। परंतु रौन ने कॉमर्स लिया था और राधा ने लिया था साईंस! राधा मेडीसीन में आगे डाक्टरी करने की सोच रही थी।
राज ने आर्कीटेक्चर यह अपने लिए मुख्य विषय चुन लिया था। कुछ सब्जेक्ट्स के लिए ये लोग साथ होते और दुसरे विषयों की क्लास में अलग होते। कौन जाने जीवन में आगे क्या होगा परन्तु जो होगा सो होगा !इस वक्त तो तीनों छात्र जम के अपना अपना काम करने में व्यस्त  थे। 
       
एक दिन की बात है जब कुलदीप खुराना जी का भाईलाल पटेल के मोबाइल पे फोन आया,  ' हेल्लो हेल्लो पटेल सा'ब रौनी आया है क्या आप के यहां ? '
खुराना जी के आवाज़ में एक अजीब बैचेनी और हड़बड़ाहट थी।    
' नहीं  तो खुराना भाई राज और रौनी कॉलेज से ४ बजे के पहले नहीं लौटते , क्यूँ क्या हुआ ? '  भाईलाल पटेल ने पूछा ! 
   ' आप फ़ौरन अभी अभी टीवी खोलो जी, देखो तो ये कैसी  न्यूज़ आ रही है ! अपने बच्चों की कॉलेज है न वहीं पे कोइ हादसा हो रहा है पटेल भाई ! स्कूल में  शूटिंग हो रहा है ! ' खुराना जी की आवाज़ में अब साफ़ चिंता और एकदम भय के भाव उभर आए थे। 
  ' शूं कहो छो साहेब! हे भगवान्, अरे टीवी चालु करो तो ' उन्होँने अपनी पत्नी को घबड़ाकर आदेश दिया और खुराना जी ने वही सुना  जो उनके घर पे रखे टीवी सेट से प्रसारित हो रहा था।  वहां पे भी न्यूज चैनल की रिपोर्टर वही सब बतला रही थी। रिपोर्टर की वही सधी परन्तु चिंतित आवाज़ पटेल जी के घर से भी आने लगी। मानों ये हादसे की खबर द्विगुणीत हो कर बार बार आगाह कर रही थी जिसे सुन कर दोनों घरों में, पेरेंट्स के कलेजे मुंह को आने लगे थे। 
               न्यूज़ यही थी कि एक गुस्से से पगलाए लड़के ने जिसका नाम ' सांग व्ही चो ' था उसने कॉलेज के ३२ छात्रों को गोलियों से भून दिया ! पुलिस का इमेरजैंसी दस्ता जिसे अमरीका में  स्वाट SWAT टीम कहते हैं वह तैनात था।  कई एम्ब्युलेंस, कई सारे पुलिस दस्ते, कॉलेज केम्पस को घेर कर चौकन्ने  तैनात थे। इस भयानक हादसे में  फंसे हुए छात्रों और  टीचरों और अन्य कार्यकर्ताओं को सलामती के दायरे तक पुलिस के लोग पहुंच रहे थे। चारों तरफ अफरातफरी का आलम था। 
          पटेल जी के घर और खुराना के घर पर २ जोड़ी माता और पिता अपने अपने भगवान् से हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे थे और अपने बच्चों की जान बचे इसकी दुआएं माँग रहे थे। 
       मानों भगवान ने इनकी प्रार्थनाएं सुन ली हों इस तरह  लगभग एक समय पे दोनों घरों में फोन की घंटियाँ बजने लगी ! 
' हेल्लो डेड , रौनी हूँ ! मैं ठीक हूँ , मैं ठीक हूँ ! डोन्ट वरी डेड , i love you & mom so much ! ' रौनी की ऊंची आवाज़ खुराना दंपति के कानों में मानों अमृत घोलने लगी।  
     दुसरी तरफ पटेल जी के घर पे ' हेल्लो पापा, मेरी बा से कहो मैं सलामत हूँ ! ' पटेल जी के घर में राज की आवाज़ गूंजी तो
 ' हे रणछोड़ राय लाज राखी रे ! ' राज की बा ने चीखते हुए हाथ पूजा की मुद्रा में ऊपर उठा लिए और मीनल बा जमीन पर ही धम्म से  गिर पड़ीं तो उन के आँसुओं के संग, मानों गंगा, यमुना ही बह चलीं ! 
     उनके बच्चे जब घर सही सलामत लौट आए तो राधा भी उन के साथ खुराना जी के घर आयी। उसी से क्या वाकया हुआ था उस पूरी घटना का खुराना और पटेल परिवार को पता चला।  
       राधा ने खुराना साहब को बतलाया कि  राज ने फाटक से बड़ी सी गन लेकर आते उस खतरनाक मुजरिम छात्र को जो उनकी कॉलेज का ही एक पूर्व छात्र था पर उसके असंयमित व्यवहार से नाराज़ होकर स्कूल ने उसे बाहर कर दिया था और शायद इसी कारण वह छात्र इतना क्रुद्ध था और दिमागी संतुलन खो बैठा था। उस को स्कूल के परिसर में दाखिल होते हुए ,सब से  पहले राज पटेल ने देख लिया था और तब राज फुर्ती से दौड़ता हुआ, लगभग छलाँग लगाता हुआ, सीधा  रौनी की क्लास की ओर भागा था।  
    रौनी के क्लास में पहुँच कर अपने दोस्त का हाथ पकड़ कर, लगभग खींचता हुआ, राज अपने संग दूसरे कई छात्रों को कोलिज के पिछले दरवाज़े से निकलने का इशारा करते हुए सभी को बचा कर बाहर खड़े पुलिस के ' सेफ ज़ोन ' तक लाने का बहादुरी का काम कर रहा था। उस वक्त राज ने जो किया था उसी के कारण  रौनी और  उसकी पूरी क्लास के ३२ छात्रों को उस खूनी दरिन्दे पगलाए, बन्दूक से गोलियों की बौछार से आनन् फानन में  जो सामने दिखा उन पे गोली दागते हुए, उस मौत के सौदागर से राज की सूझबूझ ने ही  आज रौनी और ३१ और छात्रों को बचा लिया था।मौत सामने विकराल रूप लिए खड़ी थी पर सूझबूझ से राज के उस हादसे के दौरान अपने छात्र मित्रों को बचाकर सेफ जोन में पहुंचाने से आती हुई भयानक मौत की परछाईं भी टल गई थी ! 
          राधा से इस हैरतअंगेज़ घटना का आँखों देखा विवरण सुनकरखुराना साहब और शरणजित जी भाव विह्वल हो गए ! राधा और उसके माता पिता, स्वामीनाथन परिवार खुराना परिवार मिलकर , अपनी  कारों में बैठ, फ़ौरन पटेल साहब के घर जा पहुंचे थे और वहां पहुँच कर कर सभी ने बारी बारी  से बहादुर राज को गले से लगा लिया था ! 
        भर्राये गले से, खुराना जी ने कहा ' बेटे राज, बड़े बहादुर हो तुम! दोस्त हो तो तुम जैसा ! तुमने मेरे रौनी को और इतने सारे बच्चों को एक वक्त पर बचा लिया। हम तुम्हारे ऋणी हैं बेटे ! '
        विनम्रता की मूरत से राज ने तब झुक कर अपने खुराना अंकल  के पैर छु लिए और कहा  ' अंकल जी, रौनी  मेरा बड़ा भाई है ! आप का बेटा  हूँ ! आज आप के आशीर्वाद मिले मुझे और क्या चाहिए ! ' 
    
अमरीका की ज़िन्दगी में ऐसे हादसे बहुत होते हैं। क्राइम ब्रांच के अनुसार १८ से अधिक स्कूलों में गैन से हिंसा की बारदातें हुईं हैं। ऐसे क्राइम आये दिन घट रहे हैं।  किन्तु यदाकदा ऐसे बीच  बचाव की घटनाएं भी सुनने में आतीं हैं। कईयों की हाज़िरजवाबी के , बहादुरी के किस्से भी सुनने को मिलते हैं। 

सच्ची इंसानियत पर भरोसा ऐसी बातों से ही आज भी कायम है। ऐसे मन को दुःख में डुबो देनेवाले हादसों के  बीच यदि ऐसा ' राम भरत मिलाप '  भी देखने को मिले तब तो भारतीय संस्कारों की लम्बी परम्पराओं पर हमें बेसाख्ता गर्व हो उठता  है ! 
सच तो यही है कि भारत की पावन माटी की खुशबु  दूर दूर तक आ फ़ैल चुकी है। जहां कहीं भी अच्छे भारतीय लोग जा जा कर बसे हैं और सच्ची मानवता का धर्म निभा रहे हैं, वहीं पर भारत की  सोंधी माटी की खुशबु भी पहुँच चुकी है ! 
ऐसी  कहानी है , तीन भारतीय अमरीकन टीनेजर्स की ! 
आप ये नाम अवश्य याद रखिएगा ~  रौनी , राज और राधा ! 
- लावण्या दीपक शाह 
संपर्क : ई मेल : Lavnis@gmail.com 
        

Tuesday, January 9, 2018

भारत और अमरीका की वर्षा ऋतु का फर्क : ( संक्षिप्त )

भारत और अमरीका की वर्षा ऋतु का फर्क : ( संक्षिप्त )
भारत मे हिन्द महासागर से उठकर मानसून हवाएं बादलों मे तब्दील हो जातीं हैं। 
घने काले मेघ, वर्षा का जल भरे हुए, साल के मध्य भाग में, माने जून माह के २ रे हफ्ते तक याने जून की १० से १४ तारिख के अास पास, बरखा की नन्ही नन्ही बूँदनियों का श्रृंगार किये कोमल बौछारों की सौगटी लिए भारत की धरती को भिगोने अा पहुंचते हैं। बूंदों का टप टप गिरना, धरा की भीनी महक़ वातावरण में चहुंओर बिखर जाती है और मादक आह्लाद का समां तारी हो जाता है। 
A visualisation of the South Asian Monsoon based on the Climate Hazards Group InfraRed Precipitation with Station data (CHIRPS) 30+ year quasi-global rainfall dataset, analysed and visualised using Google Earth Engine.
           भारत में  इसे मानसून सीजन कहा जाता  है। मानसून या रेनी सीज़न या  वर्षा - ऋतु के नाम से भारतीय जन  इसे पहचानते हैं और प्रखर ग्रीष्म ऋतु के ताप को सहन करते हुए, बेसब्री से बारिशों की प्रतीक्षा करते हैं और पहली फुहारों का हर्षोल्लास से भर कर आनंद - अतिरेक सहित स्वागत करते हैं। 
भारतीय बरखा ऋतु भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए जीवन और खुशहाली का सन्देश लिए आती है। 
कई भारतीय उत्सवों का इसी वर्षा - ऋतु के संग आगमन होता है। 
वर्षा के संग संग सर्वप्रथम श्री गणेश जी का आगमन होता है। विघ्नेश मँगलमूर्ति मोरिया ~ गणपति बाप्प्पा मोरिया पधारते हैं। उसके बाद आते हैं  श्रीकृष्ण का गोविंदा स्वरूप अगस्त माह में कृष्णजन्माष्टमी के समय उत्साह से घर घर में मानाया जाता है।बरखा का ज़ोर कम होते होते माँ जगदम्बा के आगमन का समय आ पहुंचता है। नव - रात्रों में धूमधाम से माता के पर्व का आयोजन किया जाता है। तब तक आकाश बादलों को स्वच्छ कर देता है। बरखा रानी फिर अगले वर्ष मौसम के बदलने के साथ आने का वादा करते हुए विदा लेतीं हैं और तब दीपावली का महा - पर्व भारत भूमि का प्रिय त्यौहार आता है। 
यह सारी बातें प्रत्येक भारतीय, वर्षा ऋतु के सम्बन्ध  में जानता है।भारतीय वर्षा ऋतु के अन्य त्योहारों के नाम इस प्रकार हैं  ~~ 
१ ) तीज २) नाग पंचमी ३) ओणम ४) रक्षा - बंधन
५)  नारियल पूर्णिमा ६) आदिपेरुकु ( तमिलनाड में ) 
७) हर्मिस ( लद्दाख में ) ८) मिंजर ( होमाचल प्रदेश में ) 
९) हरेली ( छत्तीसगढ़ में ) १०) बेह्दींनखालेम ( मेघालय में ) 

अमरीका में वर्षा - ऋतु का स्वरूप : 
अमरीका भूखंड भारत से ३ गुना अधिक विस्तृत एक अति विशाल उपखंड है। यहां वर्षा का अागमन भारत की तरह नियम बद्ध तरीके से नहीं होता।साल के अलग अलग  महीनों मे, उत्तर अमरीकी भूखण्ड के अलग अलग प्रांतों मे, वर्षा का अागमन होता रहता है। अमरीका की उत्तर दिशा के प्रांतों मे, मौसम अधिक ठंडा होता है। अत: यहां वर्षा के संग जल मिश्रित हिमपात  होता है। दक्षिण मे जितने प्रांत हैं, वहां उत्तरीय प्रांतों से अपेक्षाकृत ठंड कम होती है। अत:  वर्षा कहीं  कम तो किसी प्रांत में अधिक होती है। 
       
अमरीकी सूचना माध्यमों मे एक खास ऋतु चक्र होता है। उनसे संबंधित  विविध पहलूओं के  बारे मे दर्शकों  को अागाह  करती अाबोहवा के विषय पर समर्पित एक विशिष्ट चैनल  है। जो दिन भर मलब २४ घंटे दिनमान, अाबोहवा तथा उसके बदलाव और उनसे संबंधित चेतावनी का निरंतर प्रसारण करती रहती है।    

हवामान संबधित टीवी चैनल के निष्णात वर्षा के लिए एक खास नाम लेते हैं - वे अक्सर हवा मे जो नमी रहती है उसके लिए ' प्रेसीपिटेशन '  ऐसा ख़ास नाम उपयुक्त करते हैं। 
वसंत, ग्रीष्म , पतझड़ और शीतकाल यह ४ मुख्य ऋतुएं अमरीकी भूखंड पर तापमान के कम या अधिक होन के साथ महसूस की जा सकतीं हैं। 

अमरीका मे सब से  अधिक वर्षा हवाई द्वीप के वाईलेले इलाके मे, क्वाई नामक एक नन्हे से टापू पर औसतन ४६० " वर्षा के नाप से  सर्वाधिक वर्षा दर्ज की गयी है। 
यह जगह  " क्वाई " विश्व के अधिकतम वर्षा वाले प्रदेशों  मे से एक है। भारत मे चेरापूंजी नामक स्थल भी अधिकतम वर्षा वाले स्थान के लिए मशहूर है। अमेरिका मे बरखा के प्रकोप के विभिन्न रूप  ' थंडर स्टॉर्म, हरीकेन, कहलाते हैं। समुद्री लहरों के साथ  बाढ़ के पानी के साथ अाती भारी वर्षा है उसको टाइफून भी कहते हैं। 
हरीकेन भारी नुकसान करनेवाली   भयंकर वर्षा को अंग्रेज़ी वर्णमाला के अक्षरों से चुन कर उन्हें हर वर्ष ख़ास नाम दिए जाते हैं।जैसे - अमरीका में बसे दक्षिण पूर्वीय  न्यू अार्लीन्स के प्रांत मे जो  भीषण तबाही मचानेवाली वर्षा और तूफ़ान का कहर बरपा था उसे  'कैटरीना हरीकेंन  ' का  नाम दिया गया था। 
         अमरीका के पश्चिम मे पेसेफिक महासागर के  मध्य मे  ' हवाई '  मुख्य ६ टापूओ का समूह है।  जिनके नाम इस प्रकार हैं -- क्वाई, ओहाऊ ,मोलोकाई, लानाई, मावी और सबसे बडा टापू हवाई कहलाता है। हवाई  के अन्य हिस्सों मे सालाना २००" से अधिक  वर्षा नापी गयी है।   
      उत्तर अमरीका के मुख्य भूखंड मे पश्चिम मे वॉशिंगटन प्रांत और ओरेगन प्रांत मे हवाई के बाद २ और ३ नंबर मे अधिकतम वर्षा दर्ज हुई है। अलास्का के दक्षिण हिस्से के बारनोफ नामक  टापू मे २३०" वर्षा दर्ज हुई है। टेक्सास , ओक्लाहोमा प्रांतों मे क्लाउड बर्स्ट माने बादलों का मूसलाधार बरसना कई प्रांतों मे बाढ़ की भयावह स्थिति का निर्माण करता  है।  चित्र - २  स्कूल बस - बारिश जल मे निमग्न स्कूल बस 
Image result for school bus immersed in water
    अमरीकी शहरों मे ' सीएटल ' शहर को सर्वाधिक वर्षा वाला शहर कहा जाता है। इनके बाद फ्लोरिडा, लुईज़ीयाना, अलाबामा और ओक्लाहोमा  प्रांतों की गणना  अधिकतम वर्षा वाले प्रांतों मे की जाती है। 
इनसे विपरीत अमरीका के पश्चिम के प्रांतों मे जैसे केलिफोर्निया, मोंटाना, नेवेडा व  एरीजोना, प्रांतों मे अमरीकी भूखंड पर सबसे कम वर्षा होती है। 

 - श्रीमती लावण्या दीपक शाह 
       ओहायो उत्तर अमरीका 

Tuesday, November 28, 2017

श्रध्धेय स्व. नारायण देसाई जी का पत्र पढ़कर, उन्हें लिखा मेरा पत्र


स्व. नारायण देसाई का तेजस्वी जीवन २४  दिसम्बर १९२४  - १५  मार्च २०१५ तक भारत और विदेश में गाँधी जी के सन्देश को विश्व में बाँटता रहा। वे एक प्रख्यात गाँधीवादी थे। वे गाँधीजी के निजी सचिव और उनके जीवनीकार महादेव देसाई के पुत्र थे। नारायण देसाई भूदान आंदोलन और सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़े रहे थे।  ऊपर के चित्र में किशोर वय के श्री नारायण देसाई, महात्मा गाँधीजी के साथ हैं।प्रस्तुत है श्री नारायण देसाई जी लिखित पुस्तक 

स्वतंत्रता संग्राम का वसंत'का आवरण चित्र : 

 (श्री अफलातून जी के ब्लॉग से साभार जो श्रध्धेय नारायण देसाई जी के सुपुत्र हैं और हिंदी ब्लॉग ~ जगत के हमसफर व साथी रहे हैं। ) 
प्रस्तुत है ~ नारायण देसाई का दोस्तों के नाम पत्र :
संपूर्ण क्रान्ति विद्यालय - वेडछी २२.११.२०१०

प्यारे दोस्तों ,

सप्रेम जय जगत ।

मेरे बाद की पीढ़ी वाले, लेकिन विचारों में मुझसे आगे जानेवाले लोगों तक पहुंच पाने के मनोरथसे यह पत्र मैं अपने दो पुत्रों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक प्रसार माध्यम से भेज रहा हूँ । आशा है आपमें से कुछ को जरूर मेरा यह पागलपन छूएगा । तुकाराम ने गाया है : ” आम्ही बिगड़लो ,तुम्हीं बिघडाना ! “

दिन दहाडे स्वप्न देखना मुझे बुरा नहीं लगता । अक्सर जब लोग मुझे पूछते हैं कि ’ क्या गांधी आज प्रासंगिक हैं ? ’ तब मुझे उसके सीधे जवाब ’ जी हाँ ’ के अलावा और भी एक विचार आता है , कि गांधी विचार जो एकरूप में भूदान – ग्रामदान-ग्राम स्वराज आन्दोलनमें और दूसरे रूपमें संपूर्ण क्रांति आन्दोलन के रूपमें प्रकट हुआ था , वह न आज सिर्फ़ प्रासंगिक है , बल्कि आज उसे प्रासंगिक बनाया भी जा सकता है । संपूर्ण क्रांति के लिए मेरी कल्पनाकी व्यूहरचना के आधार पर वह नीचे प्रस्तुत है ।
आज का संकट सर्वक्षेत्रीय और संपूर्ण है , इसलिए उसका जवाब भी संपूर्ण होना चाहिए । संपूर्ण क्राम्ति के लिए व्यक्ति की मनोवृत्तिमें  तथा समाज के मूल्योंमें परिवर्तन होना चाहिए । इस दोहरी प्रक्रिया के लिए पंचविध कार्यक्रम हों , जिसके क्रममें  विविध स्थानो की विविध परिस्थिति के कारण क्रम परिवर्तन हो सकता है और हो
१ : 
प्रबोधन : ( कोन्सिएन्टाइज़ेशन ) : लोगों को असम्तोष है , लेकिन परिस्थिति का ठीक से विश्लेषण नहीं , न पूरा आकलन ही है ।हमें स्वयं अपने से शुरु कर लोगों को खुद अपनी गुत्थियां सुलझाने के लिए प्रवृत्त करना चाहिए । शासन , नेता या अवतार के आने का इन्तेजार करना नहीं चाहिए । लोकजागरण के हर संभव तरीके का प्रयोग करना चाहिए । मुखोमुखी बातचीत और चिट्ठी पत्र से लेकर गोष्ठियां , सभाएं तथा ’जात्रा’ , मेले, डिंडी आदि शताब्दियों से चले आये, लेकिन आजकल पुराने पड़ रहे माध्यमों से लेकर नाटक , पथनाट्य , छाया नाटक  मुशायरे , कवि सम्मेलन , 'तमाशे’, चौपाल , ’भवाई’,’दायरे’ इत्यादि सांस्कृतिक उपकरण एवं कार्टून प्रदर्शनियां,डॉक्यूमेन्टरी,फिल्म,रेडियो,टी.वी. तथा वेबसाइट आदि तक ।
२ : संगठन : प्रबोधन के साथ साथ ,एवं उसके आगे बढ़ने के बाद भी संगठन होते रहना चाहिए । पूरी क्रांति तो तब होगी जब लोग उसे उठा लेंगे ।लेकिन उसके अग्रदूतकी भी आवश्यकता रहेगी । लेकिन संगठन करने की हमारी प्रक्रियामें कुछ गुणात्मक परिवर्तन की जरूरत है । यह तो जाहिर है कि गांधी , विनोबा, जयप्रकाश नहीं हैं । इसीलिए संगठन की प्रक्रिया न सिर्फ़ आदर्शों की दृष्टिसे वरन व्यावहारिक आवश्यकतासे भी कुछ अलग होना जरूरी है । विनोबा ने ’गणसेवकत्व’ के विचार बीज बोये थे , लेकिन अभी तक का हमारा अनुभव बहुत कुछ एक नेतृत्व आधारित ही रहा है । तरुण शांति सेना और मेडिको फ्रेण्ड सर्कल नयी दिशामें कुछ गति कर रहे थे । लेकिन अभी लम्बी राह बाकी है । मेंसा लेखा के प्रयोग कुछ पथ प्रदर्शन कर सकते हैं । कालेजोंमें , छात्रालयोंमें , गाँवोंमें , मुहल्लोंमें आरंभ करना होगा । संगठन अहिंसा की अग्नि परीक्षा है – ऑर्गनाइजेशन इज़ द एसिड टेस्ट ऑफ़ नॉनवायल्न्स इस गांधी वाणी को निरंतर मद्देनजर रखकर आगे बढ़ना होगा ।
३ : नमूने प्रस्तुत करना : हमारा जीवन दर्शन हमारी जीवन शैलीसे गाढ़ संबध रखता है । जगह जगह ऐसे केन्द्र बनाने की कोशिश हो जहां व्यक्तिगत गुण संवर्धन , सामाजिक न्याय एवं शांति तथा सृष्टि के साथ संवादिता (हार्मनी) पैदा करने की सतत साधना होती हो । ऐसे नमूने निकट तथा दूर दोनों तरफ़ ध्यान आकर्षित कर सकते हैं तथा परस्पर अनुभवों के आदान-प्रदान से तो तात्कालिक लाभ मिल ही सकता है । इन नमूनों का आधार प्रयोगवीरों की गुणवत्ता पर होगा और यही उनका मानदण्ड भी होगा । व्यक्तिगत जीवनशैली के नमूने स्वावलम्बन , परस्परावलम्बन या ग्राम स्वावलम्बन के हो सकते हैं । वैकल्पिक उर्जा – सौर,पवन,जल,पशु, उर्जा आदि – के विविध प्रकार के प्रयोगों की आज अत्यन्त आवश्यकता है । हम में से कुछ लोग इन प्रयोगों के पीछे जीवन बिता सकते हैं । गांधी के सारे रचनात्मक कार्य नवसंस्करण की राह देख रहे हैं ।उन्हें इन्तेज़ार है उन प्राणवान हाथों की जिन्हें जीवन की ताकतों के लिए प्रयोग करने की ललक है ।
४ : संघर्ष : संपूर्ण क्रांति का मार्ग हमेशा सीधा या आसान तो होगा नहीं । वर्तमान व्यवस्था के अनेक पहलू उसके आडे आ सकते हैं । वैसे देखें तो संपूर्ण क्रांति अपने में ही यथास्थिति – स्टेटस को – केखिलाफ़ एक बगावत है । इसलिए अकसर शोषण , अन्याय , अनीति , भ्रष्टाचार के खिलाफ़ संघर्ष के मौके आते ही रहेंगे । हर संघर्ष के समय संपूर्ण क्रांतिकारी का ध्यान गांधी के बताये हुए उन तीन उसूलों पर स्थिर रहना चाहिए जो गांधी ने सत्याग्रही के लिए अनिवार्य माने थे । उनकी अपेक्षा थी कि स्त्याग्रही सत्यकी ठोस आधारशिला पर ही खड़ा रहेगा , व अपना ध्येय हासिल करने के लिए वह तीव्रतम कष्ट सहने के लिए तैयार होगा और उसके दिलमें अन्यायपूर्ण व्यवस्था के प्रति चाहे जितना आक्रोश हो , किन्तु प्रतिपक्षी के लिए तो निरा निर्मल प्रेम ही होगा । साधन शुद्धि ही संपूर्ण क्राम्तिकारी परख और वही उसकी कसौटी होगी ।
५ : 
प्रकाशन : इस सारे कार्यक्रम के लिए प्रचार एवं प्रकाशन की जरूरत होगी । यद्यपि गांधी का व्यक्तित्व तथा उनका जीवन ही प्रकाशन का उत्तम माध्यम बन जाता था , फिर भी यह ध्यान रहे कि उन्होंने लगभग आधे शतक तक प्रकाशन का कोई न कोई माध्यम सम्हाल कर अपने साथ रखा था ।प्रकाशन का एक व्यापक , विकेन्द्रित तंत्र खड़ा करना होगा । अनेक आधुनिक उपकरणों ने विकेन्द्रित प्रकाशन सुलभ बना दिया है । हममें से कइयों को इस काम में अपनी शक्ति और सामर्थ्य लगाने होंगे ।
सब से पहले तो इस समूचे विचार पर हमें आपकी बहुमूल्य टिप्पणी चाहिए । यह सारा प्रयास ही ’एक: अहम बहुस्याम’ का है । आपके विचारों से हमारे विचारों का स्पष्टीकरण , शुद्धीकरण एवं संशोधन होगा ।
फिर आपको यह सोचना होगा कि हम किस प्रकार इस अभियान में जुड़ सकते हैं । इसमें सब प्रकार के लोगों का उपयोग हो सकता है , आंशिक समय देनेवाले , एक नि्श्चित प्रकार का ही काम करनेवाले से ले कर इसी काम में पूरी शक्ति लगाने वाले तक की । अपने अलावा औरों को जुटाने वाले भी चाहिए ।
हमारे विद्यालय की दृष्टि से इसमें प्रशिक्षण पाने के लिए योग्य एवं उत्सुक प्रसिक्षार्थी चाहिए । हमारे काम में प्रत्यक्ष सहभागी बनने के लिए साथी चाहिए। आप अपने कुछ नये साथियों को हमारे खुले सहजीवन से परिचित कराके अपनी सेकण्ड लाइन तैयार करना सोचते हों तो एक दो साथियों को उस दृष्टि से यहां भेजिए और उपरोक्त पांचों प्रकार के कामों में अभिज्ञता रखनेवाले साथी तो इस अभियान के निहायत जरूरी है ही । अपने क्षेत्रों यदि आज तक ऐसा कुछ न कुछ शुरु न कर चुके हों तो आज से शुरु कीजिए। इस काम में क्या अड़चनें आ रही हैं उनके विषय में हम आपस में सलाह मशविरा तो करें । और यह भी खोजें कि कहां से किस प्रकार की सहायता मिल सकती है।स्व.श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ( हरिवंशराय बच्चन की पंक्तियां) की एक पंक्ति ने मुझे तो बरसों से क्या दशाब्दियों से प्रेरित किया है: 'आज लहरों में निमंत्रण, तीर पर कैसे रुकूँ मैं ?’
स्नेहसने सलाम,
- नारायण देसाई 
महात्मा गांधी के जीवन और जीवन संदेश को कथामय रूप में सुनाने के लिए नारायण भाई ने मंच पर  'गांधीकथा'  कहना आरम्भ किया।
नारायण देसाई गाँधी के आदर्शों पर अटूट श्रद्धा और विश्वास रखते थे। उन्होंने आपना जीवन महात्मा के बताये मार्ग पर व्यतीत किया और इन्ही आदर्शों का प्रसार करने में लगे रहे। उन्होंने 'तरुण शांति सेना' का नेतृत्व किया, वेडची में अणु शक्ति रहित विश्व के लिये एक विद्यालय की स्थापना की तथा गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, गांधी विचार परिषद और गांधी स्मृति संस्थान से जुड़े रहे। 
श्री नारायण भाई गुजरात विद्यापीठ के २३ जुलाई २००७ से, कुलाधिपति रहे।
सं २०१५ , तारीख १० दिसम्बर से वे कोमा में थे किन्तु पुनः चैतन्य होकर स्वास्थ्यलाभ कर रहे थे और चरखा चलाना उनकी नित्यक्रिया थी उसी का  चित्र : 
'गांधीकथा' शुरू करने वाले विख्यात गांधीवादी नारायण देसाई के स्वास्थ्य में सुधार हुआ। वे कोमा से बाहर आए। सेहत दुरस्त होने पर उन्हें आइसीयू से बाहर ले लिया गया । चिकित्सकों की निगरानी में उन्हें हल्का व्यायाम सिखाने का प्रयास किया गया। साथ ही फीजियोथैरपी भी दी गयी।  किन्तु गांधीमय नारायण भाई ने इसके लिए अलग ही उद्यम उठाया । उनके मन से तो चरखा चलाना ही फीजियोथैरपी थी। इसलिए वह ऐसी सेहत में भी चरखा चला कर बापू को याद करते रहे । श्री नारायण देसाई का दिसंबर-१४ से एक अस्पताल में उपचार चल रहा था।
पूजनीया कस्तूरबा पर लिखी उनकी पुस्तक का आवरण चित्र :उनके शब्द : ~~ 

" इस पुस्कत का अधिकतम अनुवाद वर्ष २०१३ के फरवरी से अप्रेल महीने के बिच पूरा हुआ | बा और बापू पुरे देश के है | उसमे भी बापू तो देश की सरहदों को पार करके पूरी दुनिया के; लेकीन १९२३ में जन्मी और सत्याग्रही माँ बेटी मै, अगर उन्हें मेरे निजी स्वजन माँनू और दोनों के थोड़े -बहुत लेकिन मधुर संस्मरणों को अपनी कीमती पूंजी समजू तो भला एश्में अजीब क्या है?
                  - नारायण देसाई.*******************************************************
श्रध्धेय स्व. नारायण देसाई जी का पत्र पढ़कर, उन्हें लिखा मेरा पत्र प्रस्तुत है 
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परम श्रध्धेय बापूजी ( श्री नारायण भाई ) को सादर नमन व चरण स्पर्श 
मैं, लावण्या, सुप्रसिद्ध
कवि स्व.पण्डित नरेंद्र शर्मा जी की पुत्री हूँ। मेरे पापा जी ने बापू की अहिंसक क्रान्ति में जुड़कर, २ वर्ष ब्रीटीश साम्राज्य से सजा पाते हुए, आगरा सेन्ट्रल जेल, देवली ड़ीटेंशन जेल और राजस्थान जेल में सहर्ष कारावास स्वीकार किया था और कारावास के दिनों में  १४ दिन का अनशन भी किया।                कारावास से पूर्व इलाहाबाद विश्वविद्यालय से, युवक नरेंद्र शर्मा ने स्वरचित हिंदी कविता पुस्तकों के प्रकाशन, सम्पादन कार्य एवं छात्रों को अध्यापन कराते हुए से अपनी पढ़ाई पूरी की थी। अंग्रेज़ी साहित्य से एम. ए. की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के पश्चात नरेंद्र शर्मा, पंडित जवाहर लाल नेहरू जी से आनंद भवन के लॉन पर सबसे पहली बार मिले थे। उस रोज वहीं २, ३ घंटे टहलते हुए, बातचीत करते हुए नेहरू जी ने उन्हें अपने हिंदी अधिकारी के रूप में चयनित कर लिया था ! अगले  ४ साल तक, नरेंद्र शर्मा आनंद भवन जो आज ' स्वराज भवन ' के नाम से पहचाना जाता है, जिसे श्री मोतीलाल नेहरू जी ने भारतवर्ष को भेँट किया है वहीं काम करते रहे और कांग्रेस की गतिविधियों में सक्रीय  योगदान देते रहे । पंडित नेहरू जी के  निजी सचिव नहीं थे और कांग्रेस कार्यकारिणी समिति में 'हिंदी अधिकारी' पद पर भी कार्यरत थे ।आनंद भवन में जो बैठकें होतीं उन में इस्तेमाल किये गए  अंगरेजी संभाषणों का आम जनता तक पहुंचाने का कार्य,  कार्यकारिणी समिति के हिन्दी अधिकारी के रूप में नरेंद्र शर्मा ने  संपन्न किया। फलस्वरूप उन्हें ब्रिटिश हुकूमत द्वारा, बिना कोर्ट कचहरी या मुकदद्मे की कार्रवाई को किये बिना सीधा वाईस रॉय के डायरेक्ट ऑर्डीनन्स से २ वर्ष का कठिन कारावास ये दण्ड मिला।  इस सजा की खबर नरेंद्र शर्मा के जन्म स्थान जहांगीरपुर, खुर्जा जिला और डिस्ट्रिक्ट बुलंद शहर तक भी कुछ समय पश्चात पहुँची।                     कारावास में नरेंद्र शर्मा ने आमरण अनशन आरम्भ किया। इस निर्णय के १ सप्ताह बाद, मेरी स्व. दादीजी गंगादेवी को भी ये खबर पहुँच गई ! नरेंद्र शर्मा १४ दिनों तक भूखे रहे और उनकी अम्माँजी , मेरी  दादी जी ने भी १ सप्ताह तक अपने पुत्र के अनशन में सहकार देते हुए, स्वयं भी १ सप्ताह के लिए अन्न त्याग किया था। ऐसे कितने ही नन्हे नन्हे सिपाही, हमारे परम पूज्य बापू की अहिंसक सेना के अंग रहे हैं जिनको आज भारतवर्ष भूल गया है !
        भारत और भारत के कई नागरिक आज  साम्राज्यवाद और बाजारवाद के दुहरे भंवर में डूब कर, पश्चिम का अँधा अनुसरण करने लगा है ! आज का भारत कुछ हद्द तक त्याग, बलिदान, समर्पण देश - प्रेम की उद्दात भावनाओं को बिसार चुका है ये कितने क्षोभ और दुःख की बात है ! 
        स्वयं बापू के कहे का अनुसरण भी बिरले लोग ही कर रहे हैं। आप जैसे हितैषी जब भी हमे आगाह करवाते हैं तब बोध होता है कि बापू की दूरदर्शिता और विश्व के सभी मनुष्यों के प्रति दया, करूणा व भाईचारे की भावना ने ही उन्हें ‘ महात्मा ‘ बनाया।वे हमारे लिए और समस्त विश्व के लिए पूजनीय हैं।कैसी उत्कट तथा विरल विश्व बंधुत्व की भावना, भारत वर्ष के लिए  देश - प्रेम की भावना और प्राणोत्सर्ग का हाथ और उनके लिए किये सत्याग्रह का यज्ञ, बापूजी ने किया था।ऐसे तपस्वी ' हे राम ' का उदगार करते हुए चले गए ! काश लोग उन्हें समझें !  
              मैं अपनी बात लम्बी न करते हुए यही कहूंगी, निजी स्तर पर मेरे लेखन से, अमरीकी निवासी होते हुए भी, सम्पूर्ण रूपेण भारतीयत मानस लिए, ‘ जय – जगत ‘ कहते हुए आपके प्रयासों में सहकार देने के लिए, मैं अपना भरसक प्रयास अवश्य करूंगी।  
    मैं, यदाकदा , अन्तराष्ट्रीय हिन्दी समीति ” विश्वा ” का सम्पादन कार्य भी करती रही हूँ और समीति के सदर्स्यों तक आपका पत्र पहुंचा रही हूँ। 
         आपके सुपुत्र भाई श्री अफलातून जी मेरे भ्राता हैं और मेरा बचपन, उन्हीं के बचपन के घर के समान एक पवित्र घर में, [जो  बंबई शहर में था] मेरे गांधीवादी, सत्य पूजक, कर्मठ पिता के, आश्रम जैसे पवित्र घर में बीता है। श्री अफलातून भाई की तरह मुझे भी, एक सत्य साधक की छत्र छाया में, पलकर बड़े होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। 
        मेरी नानी जी ” कपिला बा ” आजीवन अपने हाथ से बुने खादी की धागों से निर्मित साड़ी ही सदा, पहनतीं रहीं और उसी को ओढ़े हुए वे गयीं। 
         मेरे नाना जी श्री गुलाबदास गोदीवाला जी, ब्रीटीश राज्य काल में सेन्ट्रल रेलवे के चीफ़ वैगन एन्ड कैरिज इंस्पेक्टर अधिकारी के पद पर कार्य करते थे।     ब्रिटिश अफसरों के संग उनका उठना - बैठना था किन्तु नानाजी को, मेरी ' बा ' ने गांधीजी के सत्याग्रह आंदोलन से प्रभावित होकर भारतीयता की ओर मुड़ने के लिए बाध्य किया। नानाजी व नानीजी दोनों खादीधारी बने। स्वदेशी को पूर्णत: अपनाया।नानीजी ४ थी कक्षा तक पढ़ीं थीं किन्तु बंबई महानगर के अति व्यस्त ऐसे बांद्रा उपनगर में उनके आवास ' कपिलवस्तु ' रहते हुए , कांग्रेस कमिटी बांद्रा - महिला शाखा की वे अध्यक्षा रहीं। 
मेरी नानी जी हमारी 'बा ' ~ श्रीमती कपिला गुलाबदास गोदीवाला ~
~ महिला कोंगेस कमिटी में भाषण देते हुए 
मेरे मामाजी स्व. राजेन्द्र गोदीवाला जी ने ऋषितुल्य विनोबा जी के साथ झुम्पडी अलगट ग्राम में, सड़कें बनायीं, ग्राम - पाठशालाएं बनायीं  और भूदान  में हिस्सा लिया। अछूत उध्धार प्रयास विनोबा जी का साहसिक प्रयास था उस के लिए भी मामाजी राजेंद्र गुलाबदास गोदीवाला जी ने अभूतपूर्व योगदान दिया। 
       हरिजनों को लेकर मंदिर प्रवेश करते समय विनोबा जी के लिए उठीं, कई पागल ब्रह्मण दल की लाठियाँ , मेरे राजू मामाजी ने, अपनी पीठ पर झेलीं थीं। फल स्वरूप उनके पीठ की कई हड्डीयां टूट गयीं। उनकी  सेवा – सुश्रुषा, वर्धाश्रम पौनार में हुई और आदरणीया कुसुम्ताई देशपांडे की छोटी बहन शीला देशपांडे से मेरे मामा जी का विवाह होना इस घटना का एक सुखद उपसंहार बना !
          बापू जैसा न कोइ विगत शताब्दी में हुआ है और इस सदी में भी उनसे किसी के जन्म लेनेकी संभावना कम ही लग रही है !! जैसा आपने सही लिखा है कि
" कोइ 
 युगपुरुष ” उद्धार करने आनेवाला नहीं। " 
हमे परस्पर सहयोग करना होगा और आपके सुझाए ध्येय, इस मार्ग में सहायक सिध्ध होंगें इस में मुझे कतई भी संदेह नहीं है। 
बहुत आदर व श्रध्धा सहित आपकी एक भारतीय बेटी
उत्तर अमरीका से
– लावण्या शाह ( शर्मा )