Saturday, April 6, 2019

नित प्रियम भारत भारतम्

 नित प्रियम भारत भारतम् - 

नित प्रियम भारत भारतम्
मुझे, भारत बडा ही प्रिय है इस तथ्य का कारण बडा सीधा है, चूँकि, भारत , भारत है, और मैँ -मैँ हूँ !
भारत वह भूमि है, जहाँ पर मैँने जन्म लिया। वहीँ पर मैँ पल कर बडी हुई।
मेरी आत्मा, मेरा शरीर, मेरा लहू, मेरी हड्डियोँ का ये ढाँचा और मेरा मन, भारत के आकाश तले ही पनपे।  भारत, मेरे पूर्वजोँ की पुण्यभूमि  है।  भारत मेँ  मेरे पित्री जन्मे और चल बसे ! भारत ही वह भूमि है, जहाँ मेरे पिता व माता जन्मे और पल कर बडे हुए।
श्री राम ने जब स्वर्णसे दमकती हुई लँकानगरी देखी थी तब उन्हेँ अपनी जन्मभूमि
" अयोध्या" याद आई थी तब अपने अनुज लक्ष्मण से कहा था, 
" हे लक्ष्मण ! न मे रोचते स्वर्णमयी लँका !
 जननी ! जन्मभूमिस्च, स्वर्गादपि गरीयसी !"
भारत ने मुझे यादोँ के भरपूर खजाने दिये हैँ ! मुझे याद आती है उसकी शस्य श्यामला भूमि ! जहाँ घने, लहलहातेवृक्ष, जैसे, विशाल वटवृक्ष, चमकीला कदली वृक्ष,
आमोँ के मधुर भार से दबा, आम्रवृक्ष, आकाशको प्रणाम करता देवदारु, शर्मीला नीम, अमलतास, कनेर, नारिकेल, पलाश तथा और भी न जाने कितने ! ऐसे अनेकानेक वृक्ष प्रत्येक भारतीय को स्नेह छाया दे प्यार से सरसराते, झूमते रहते हैँ !
कभी याद आती है, भारतवर्ष के मनोरम फूलोँ की ! वे सुँदर फूल, जैसे, कदम्ब, पारिजात, कमल, गुलाब, जूही, जाई, चमेली, चम्पा, बकुल और भीनी भीनी, रात की रानी ! और भी कितनी तरह के फूल अपने चित्ताकर्षक छटासे, अपनी भोली मुस्कान से, व मदमस्त सुगँध से हर भारतीय की आत्मा को तृप्त करते रहे हैँ !
मुझे याद हैँ वे रस भरे, मीठे फल जो अपने स्वाद व सुगँध मेँ सर्वथा 
बेजोड हैँ ! सीताफल, चीकू, अनार, सेब, आम, अनानास, सँतरा, अँगूर, अमरुद,पपीता, खर्बूजा,जामुन,बेल,नासपाती और भी कई जो मुँहमेँ रखते ही,
मनको तृप्ति और जठराग्नि को शाँत कर देते हैँ। 
मुझे याद आती है वह भारतीय रसोईघरों  से उठती मसालोँ की पोषक सुगँध ! कहीँ माँ, या कहीँ भाभ, तो कहीँ बहन या प्रेयसी के आटे सने हाथोँ पर खनकती वह चूडियोँ की आवाज! साथ, हवा मेँ तैरती, भारतीय घरों की पाकशाला में जीरे, कालिमीर्च, लौँग, दालचीनी, इलायची, लाल व हरी मिर्च, अदरख, हीँग, धनिये, सौँफ, जायफल, जावन्त्री वगैरह से उठती उम्दा गँध! तरकारी व दाल के साथ, फैलकर, स्वागत करती, आरोग्यप्रद, वे सुगँधेँ जिसे हर भारतीय बालक ने जन्म के तुरँत बाद, पहचानना  शुरु किया था !
भारत की याद आती है तब और क्या क्या याद आता है बतलाऊँ ?
हाँ, काश्मीर की फलो और फूलोँसे लदी वादियाँ और झेलम नदी का शाँत बहता जल जिसे शिकारे पर सवार नाविक अपने चप्पू से काटता हुआ, सपनोँ पे तैरता सा गुजर जाता है ! कभी यादोँ मेँ पीली सरसोँ से सजे पँजाब के खेत हवा मेँ उछलकर
 मौजोँ की तरँगोँ से हिल हिल जाते हैँ। 
उत्तराखँड के पहाडी मँदिरोँ मेँ, कोई सुहागिन प्राचीन मँत्रोँ के उच्चार के साथ शाम का दीया जलाती दीख जाती है। तो गँगा आरती के समय, साँध्य गगन की नीलिमा दीप्तीमान होकर, बाबा विश्वनाथ के मँदिर मेँ बजते घँटनाद के साथ होड लेने लगती है। - मानोँ कह रही है," हे नीलकँठ महादेव! आपकी ग्रीवा की नीलवर्णी छाया,
 आकाश तक व्याप्त है!"
कभी राजस्थान व कच्छ के सूनसान रेगिस्तान लू के थपेडोँ से गर्मा जाते हैँ और गुलाबी, केसरिया साफा बाँधे नरवीर, ओढणी ओढे, लाजवँती ललना के संग,
गर्म रेत पर उघाडे पग, मस्ती से चल देता है !
कभी गोदावरी, कृश्णा, कावेरी मेँ स्नान करते ब्राह्मण, सरयू, नर्मदा या गँगा- यमुना मेँ गायत्री वँदना के पाठ सुनाई दे जाते हैँ। 
 कालिँदी तट पर कान्हा की वेणु का नाद आज भी सुनाई पडता है।  यमुना के लहराते जल के साथ, भक्तों की न जाने कितनी ही अनगिनत प्रार्थनाएँ घुलमिल जातीँ हैँ। 
आसाम, मेघालय, मणिपुर, अरुणाँचल की दुर्गम पहाडीयोँ से लोक -नृत्योँ की लय ताल, सुनाई पड़ती है और वन्य जँतुओँ व वनस्पतियोँ के साथ ब्रह्मपुत्र के यशस्वी घोष से ताल मिलातीं हुईं घरी भरी घाटियों को  गुँजायमान करती हैँ !
सागर सँगम पर बँगाल की खाडी का खारा पानी, गँगामेँ मिलकर, मीठा हो जाता है। 
 दक्षिण भारत के दोनोँ किनारोँ पर नारिकेल के पेड, लहराते, हरे भरे खेतोँ को झाँककर हँसते हुए प्रतीत होते हैँ। 
भारत का मध्यदेश, उसका पठार, ह्र्दय की भाँति पल पल, धडकता है. 
भारत के आकाश का वह भूरा रँग, संध्या को जामुनी हो उठता है, गुलाबी, लाल, फिर स्वर्ण मिश्रित केसर का रँग लिये, उषाकाश सँध्या के रँगोँ मेँ फिर नीलाभ हो उठता है। हर रात्रि, काली, मखमली चादर ओढ लेती है जिसके सीने मेँ असँख्य चमकते सितारे मुस्कुरा उठते हैँ  और रात गहरा जाती है !
कौन है वह चितेरा, जो मेरे प्यारे भारत को 
इतने, विविध रँगोँ मेँ भीगोता रहता है ?
मुझे प्यार है, भारत के इतिहास से! भारतीय सँस्कृति, सभ्यता तथा भारत की जीवनशैली, गौरवमयी है !संबंधित इमेज
      २१ वीँ सदी के प्रथम चरण के द्वार पर खडा भारत, आज विश्व का सिरमौर देश बनने की राह पर अग्रसर है। उसके पैरोँ मेँ आशा की नई पदचाप सुनाई दे रही है।  भारत के उज्ज्वल भविष्य के सपने, प्रत्येक  भारतीय की आँखोँ मेँ कैद हैँ ! आशा की नव किरण हर भारतीय बालक की मुस्कान मेँ  छिपी हुई  है। 
            भारत की हर समस्या, हर मुश्किल मेरा दिल दहला जातीँ हैँ। 
भारत से दूर रहकर भी मुझे उसकी माटी का चाव है ! मेरा मन लोहा है और भारत, सदा से लौहचुम्बक ही रहा !
 भारत की रमणीयता, एक स्वछ प्रकाश है और मेरा मन, एक बैचेन पतँगा है ! भारत ही मेरी यात्रा का, अँतिम पडाव है। भारत भूमि के प्रति मेरी लालसा , मेरी हर आती जाती, साँसोँ से और ज्यादा भडक उठती है। इसी पावन देवभूमि पर, भारत भूमि पर ही, मेरा ईश्वर से साक्षात्कार हुआ।  ईश्वर प्रदत्त, इन्द्रीयोँ से ही मैँने, "पँचमहाभूत" का परिचय पाया और अँत मेँ यह स्थूल शरीर सूक्ष्म मेँ विलीन हो जायेगा ! लय की गति, ताल मेँ मिल जायेगी रह जायेँगेँ बस सप्त स्वर!
भारतभूमि मेरी, माता है और मैँ एक बालक हूँ जो बिछूड गया है। 
भारत, हरे बाँस की बाँसुरी है और मेरे श्वास, उसमेँ समा कर, स्वर बनना चाहते हैँ !
 
मेरी आत्मा का निर्वाण, भारता ही तो है !
 प्रेम व आदर से भरे मेरे यह शब्द, उसका बखान, उसकी प्रशस्ती, मेरे तुच्छ विचार ये सभी मिलकर भी अपने मेँ असमर्थ हैँ  जो मैँ, बात सिर्फ इतनी ही कहना चाहती हूँ कि, मुझे, भारत क्योँ प्रिय है ?bharat mata के लिए इमेज परिणाम
      कितना गर्व है, मुझे, भारत के महान व्यक्तियोँ पर ! अनँत दीपशिखा की तरह उनकी लौ, अबाध व  अटूट है  ! श्री राम, श्री कृष्ण, बुध्ध, महावीर, कबीर, मीराँ, नानक, तुलसीदास, चैतन्य,रामकृष्ण, विवेकानँद, और अन्य कईयोँ की ज्योति, 
 भारत माता की महाज्वाला को,  आज भी प्रकाशित किये हुए है। 
भारत के बहादुर, सूरमा , शूरवीर पुत्रोँ की यशो गाथाओँ से आज भी सीना गर्वसे तन जाता है ! चँद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, चाणक्य, हर्षवर्धन, पृथ्वीराज, प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, सुभाषचँद्र बोज़, भगत सिँह की देशभक्ति आज भी गद्`गद्` किये देती है। भविष्य में कई " महाप्राण "भारत क मँच पर, प्रकट होने के लिये तैयार खडे हैँ! भारत, तपस्वीयोँ, शूरवीरोँ, योगियोँ की पुण्यशीला भूमि थी,
 है, और रहेगी। - अमर आत्माएँ शृँखला मेँ बँधी हैँ और भविष्य भी बँधा है भारत के गौरव के संग एक अटूट डोर से ! 
भारत के ऋषि मुनियोँ ने, "ॐ" शब्द की " महाध्वनि" प्रथम बार अनुभव सिध्ध की थी।  महाशिव ने, "प्रणव मँत्र " की दीक्षा दे कर, ऋक्`- साम्` - यजुर व अथर्व वेदोँ को, वसुँधरा पे अवतीर्ण किया था। 
 ब्रह्माँड, ईश्वर का सृजन है।  इस विशाल ब्रह्माँड मेँ, अनेकोँ नक्षत्र, सौर मँडल, आकाश गँगाएँ, निहारीकाएँ, व ग्रह मॅँडल हैँ। इन अगणित तारकोँ के मध्य मेँ पृथ्वी पर, भारत ही तो मेरा उद्`भव स्थान है !
इस समय के पट पर " समय" आदि व अँतहीन है।  इस विशाल उथलपुथल के बीच, जो कि, एक महासागर है जिसका न ओर है न छोर, मैँ एक नन्ही बूँद हूँ जिस बूँद को भारत के किनारे की प्यास है, उसी की तलाश है।
 मुझे, भारत हमेशा से प्रिय है और रहेगा ! समय के अँतिम छोर तक! भारत मुझे प्रिय रहेगा ! मेरी अँतिम श्वास तक, भारत मुझे प्रिय रहेगा, नित्` प्रिय रहेगा !
" नित प्रियम भारत भारतम ...
स्वागतम्, शुभ स्वागतम्, आनँद मँगल मँगलम्`,
नित प्रियम भारत भारतम , नित प्रियम्, भारत्, भारतम "

( यह  गीत एशियाड खेल के समय, भारत गणराज्य की राजधानी दिल्ली मेँ बजाया गया था। शब्द :  मेरे स्वर्गीय पिता पँडित नरेन्द्र शर्माजी के
जिन्हें  स्वर बध्ध किया था पँडित रविशँकर जी ने !
 इसी गीत के अँग्रेजी अनुवाद को पढा था श्री अमिताभ बच्चन जी ने ) 
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         lavanya

Monday, March 25, 2019

संस्मरण : महीयसी आदरणीया महादेवी वर्मा जी

ॐ 
संस्मरण पुस्तक : शीर्षक : स्मृति दीप 
चित्र : महीयसी आदरणीया महादेवी वर्मा जी
एवं 
श्रद्धेय कवि श्रेष्ठ श्री सुमित्रानंदन पंतजी दादाजी 
 मेरे जीवन का एक अनमोल स्मृति पृष्ठ :  आदरणीया महादेवी जी की यादें !
        मुझे जहां तक याद पड़ता है कि मेरी उम्र होगी ७  या ८  वर्ष की  सं १९५७, ' ५८ का कालखण्ड था।
         एक शुभ प्रातः हमसे बतलाया गया कि, आदरणीया महादेवीजी वर्मा हिंदी साहित्य की विभूति, पूज्य पापा जी के घर, पापा जी से व हम सभी से मिलने, पधारनेवालीन हैं। 
हिन्दी साहित्य जगत की साक्षात सरस्वती,  हिंदी भाषा भारती को अपने उच्च स्तरीय, अलौकिक काव्य श्रृंगार वैभव से सजाने सँवारनेवालीं, परम विदुषी, आदरणीया कवियत्री, सुश्री महादेवी वर्मा जी, स्वयं  बंबई, पधारेंगीं। यह समाचार सुनकर पापाजी पं. नरेंद्र शर्मा व हमारी अम्माँ सुशीला अत्यंत प्रसन्न थे।
आदरणीय दीदी जी का बम्बई नगरी में शुभागमन हुआ था। अब पूज्य पापाजी व मेरी अम्माँ को पुजनीया दीदी जी से मिलने की उत्कंठा भी तीव्र होने लगी थी।
चित्र : मेरी अम्माँ पापाजी

अपने बंबई - प्रवास के दौरान हमारे घर अपने अनुज माने मेरे पापाजी पं. नरेंद्र शर्मा से मिलने हम सब को आशीर्वाद देने पधारने वालीं थीं। 
पापाजी का आवास, अब बंबई से देवी मुम्बा के नाम से ' मुम्बई कहलाने लगा है। घर अपतिमित जनसंख्या की आबादीवाले भारत के इस  महानगर के
पश्चिम कोण  में स्थित तथा जुहू के समुद्र किनारे तथा डाँडा नामक मछुआरों की बस्ती के मध्य बसे एक छोटे से उपनगर ' खार ' के 
१९ वें रास्ते पर,  दाहिने हाथ पर,
 अगर हम मुड़ें तो वहां से हमारा घर ठीक ५ वां पड़ता है। 
आज उस घर में, मेरा अनुज, मुझ से ५ वर्ष छोटा  परितोष नरेंद्र शर्मा रहता है। उस घर के संग, मेरे शैशव की अनगिनत अनमोल स्मृतियाँ जुडी हुईं हैं।
आज जब उम्र के ६० दशक पार कर पीची मुड़कर देखती हूँ तब महसूस करती हूँ कि,
 उन यादों 
की ओजस्विता में न तो प्रकाश कम हुआ है नाहि, नेह के नातों की डोर में कोई शिथिलता ही आयी है। 
घर से जितनी दूरी तन की
उतना समीप रहा मेरा मन, धूप~छाँव का खेल जिँदगी क्या वसँत,क्या सावन! नेत्र मूँद कर कभी दिख जाते, वही मिट्टी के घर आँगन, वही पिता की पुण्य~छवि, 
सजल नयन पढ़ते रामायण !  अम्मा के लिपटे हाथ आटे से फिर सोँधी रोटी की खुशबु बहनोँ का वह निश्छल हँसना साथ साथ,रातोँ को जगना ! वे शैशव के दिन थे न्यारे आसमान पर कितने तारे! कितनी परियाँ रोज उतरतीँ मेरे सपनोँ मेँ आ आ कर मिलतीँ ! किसको भूलूँ किस को याद करूँ ? मन को या मन के दर्पण को ? ~~ * ~~ * ~~ * ~~ * ~~
खार के उस घर नंबर ५९४  से पहले हम लोग जब मेरी उम्र ४ से ५ वर्ष की थी तब, आये थे। उससे पहले हम  माटुंगा नामक उपनगर के ' शिवाजी पार्क, इलाके के पास  ' तैकलवाडी ' में रहते थे।' शिवाजी पार्क ' वह उद्यान है जहाँ भारत के मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर अपने बचपन में बल्ला पकड़ने का अभ्यास करते हुए युवा हुए हैं । हम वहीं से, खार रहने आ गए थे ।         हमारे नए  घर का प्लाट नंबर है ५९४ ! आज भी इसी पते पर डाक पहुंचती है। कारण यह है कि इस घर का नामकरण हुआ ही नहीं ! पापाजी को ' पुनर्वसु ' जो एक नक्षत्र का नाम है, वह पसंद था और अम्मा को पसंद था ' सुविधा ' नाम ! बस, इन दोनों ने कभी अपनी पसंद बदली नहीं तो  इस कारण  इस नए घर का विधिवत नामकरण भी न हो पाया ! अक्सर हम देखते हैं कि अधिकाँश भारतीय घरों के साथ यह होता है कि सरकार जो  घर का नंबर देती है उस के साथ प्रत्येक गृहस्वामी एक ख़ास नाम भी चुनकर रख ही देते हैं। कालान्तर में यह चुना हुआ नाम फ़िर  घर की एक ख़ास और अलग पहचान बन जाता है। तो इस ५९४, १९ वां रास्ता, खार, मुम्बई के  इस घर को अब भी नंबर ५९४ से ही याद किया करतीं हूँ। वहाँ, जब महीयसी महादेवी जी का आगमन हुआ था तब हम बच्चों में  काफी उत्साह था।हमारी प्यारी अम्मा सुशीला  ने हमे समझा दिया था कि,
" बच्चों भारत की महानतम कवयित्री पूज्य महादेवी जी हमारे  घर पर पधार रहीं हैं।
जब दीदी आएं, न  
तब तुम सभी, पूजनीया दीदी जी के पैर छूकर, उन्हें ठीक से सादर प्रणाम करना समझे ? " और आगे अम्माँ ने हमें यह भी कुछ कड़क आवाज़ में समझा  दिया था कि, ' यदि पूज्य दीदी यदि कुछ देने लगें न  तो मना करना, समझ गए ना ?' 

हम अम्माँ और पापाजी के आज्ञाकारी व अच्छे  बच्चे थे। पापाजी हमें कम ही डाँटते थे।अम्माँ ही हम सभी पर कड़ा अनुशाशन रखा करतीं थी। काफी बड़े होने पर कॉलेज के दिनों में भी अम्माँ के हाथ की चपत खाई है वह भी मुझे  याद है !सो, 
चपत लगाना, डाँट - फटकार करना, धमकाना ये डिपार्टमेंट  अम्म्मा के हाथों में था। पापा जी ने कभी हमें डाँटा नहीं ! उनकी एक वक्र या क्रुद्ध द्रष्टि, हमारे आंसूओं का बाँध तोड़ कर, सैलाब बहाने के लिए पर्याप्त थी। तब 
भला हम हमारी प्यारी अम्माँ की हिदायत का पालन, कैसे न करते ? सो हमने वैसे ही करने का निश्चय किया। 
        श्रद्धेय महादेवी जी का भव्य आगमन हुआ। उनके घर पधारते ही हम सभी ने खूब झुक कर, बारी बारी से, आदरणीया दीदी जी के चरण स्पर्श किए। वे अत्यंत प्रसन्न हुईं। हम सब को आशिष दिए।
         पापाजी का जो बैठकखाना था, जहां अक्सर हमारे घर पधारनेवाले महान व्यक्ति 
आ कर विराजित होते, वहीं आदरणीया दीदी जी आईं तथा विराजित हुईं। उस कमरे में पापाजी की असंख्य चुनिंदा पुस्तकें थीं। एक अत्यंत कलात्मक, हाथीदाँत से निर्मित, आधे हाथ जितनी ऊंची देवी सरस्वती जी की सुँदर प्रतिमा थी सरस्वती देवी की कलात्मक प्रतिमा, दक्षिण भारत से बंबई हमारे घर पधारीं थीं। तमिळ भाषा से, हिंदी में डब की हुई, सुप्रसिद्ध व अविस्मरणीय  फिल्म मीराँ कि, जिस में मुख्य किरदार भारत रत्न सुश्री एम. एस. सुबबीलाक्षमी जी ने निभाया थाउक्त फिल्म के निर्माण के दौरान पापाजी दक्षिण भारत से, चेन्नई प्रवास के समय  उस प्रतिमा को बंबई लाये थे। चित्र : चेन्नई मद्रास में भारत रत्न सुश्री एम. एस. सुबबीलाक्षमी जी के आवास पर, पं. नरेंद्र शर्मा, हिंदी के मूर्धन्य कविश्रेष्ठ श्री सुमित्रानंदन पंत जी तथा सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री अमृतलाल नागर जी चाचाजी 

 आदरणीया दीदी जी कुछ समय रुकीं। उन्होंने पूज्य पापा जी से अंतरंग बातें भी कीं। 
सत्यवादी व स्पष्टवक्ता होने से उन्होंने अपने अनुजवत नरेंद्र शर्मा को यह सलाह भी दीं थीं  कि,
 ' नरेन तुम्हारा साहित्यिक विकास इस महानगर में, अवरूद्ध न हो इस बात का तुम्हें  ध्यान रखना है। 
इलाहाबाद में जो तुम्हारे काव्य का बिरवा पल्ल्वित हुआ है, वह यहां महानगर में पनपे व विकसित हो इसके प्रयास तुम्हें परिश्रम पूर्वक करने होंगें। '  यह मुझे आज भी याद है। 
आदरणीया पूज्य दीदी जी का पहनावा भी याद मेरी स्मृति में झलक रहा है। सुफेद ख़द्दर - की सूती साड़ी, सीधा पल्ला, माथे को ढांके  हुए, एक आदर्श एवं सर्वथा भारतीय सन्नारी की छवि उपस्थित कर रहा था ! 
मुखमण्डल  पर अपार बौद्धिक तेज की आभा थी। नासिका पर टिका हुआ, काले फ्रेम का चश्मा पहनें हुए थीं जिससे  झाँकतीं हुए कुशाग्र आँखें, सब कुछ सजग हो परख रहीं थीं।  इन नयनों में कविता के स्वप्न लोक में विचरण करने की अलौकिक क्षमता तो थी ही परन्तु इस ठोस यथार्थ से भरे विश्व को बखूबी भाँपने  का माद्दा भी वे रखतीं थीं। आदरणीया दीदी जी की प्रखर चेतना, अपना प्रत्येक कार्य सुचारु रूप से, करने में सक्षम थीं। होंठों पर मंद हास्य उद्भासित था। अंतर्मन के वातसल्य का प्रतीक, मुख के आभामंडल को स्निग्धता लिए, महिमा मंडित कर रहा था।उनकी पावन छवि, जो  आज बरसों पश्चात धूमिल नहीँ हुई, जिसे शैशव अवस्था में मैंने देखा था, उसे आज अंतर्मन के शीशे पर,  पापाजी के घर के बारामदे में, गहरे मरून  कलर के फर्श पर, पूर्ण आलोक सहित विराजित देख रही हूँ। 
         मैं, उस पवित्र छवि को, हाथ जोड़कर, मस्तक झुका कर, सादर प्रणाम करती हूँ।
उस वक्त तो बाल सुलभ मानस में यह विचार आये न होंगें किन्तु बच्चे, अक्सर बड़ों को बहुत ध्यान से देखते हैं और अपने जीवन में मिले हर व्यक्ति को याद भी रखते हैं।  

आज सोच रही हूँ, यह मेरा पम सौभाग्य नहीं तो और क्या है जो मैंने ऐसी विलक्षण प्रतिभा के, बचपन में दर्शन कर लिए ! जानती हूँ कि 
पूज्य पापा जी की बिटिया होने का सौभाग्य ही मुझे ऐसे अलौकिक अवसर प्रदान करवा गया ! यह सत्य, है। 

साक्षात सरस्वती स्वरूपा, आदरणीया पूज्य दीदी के 
खान ~ पान इत्यादी की सेवा,
हमारी प्यारी अम्माँ
 सुचारू रूप से कर रहीं थीं।उस रोज़  अतिथि की अभ्यर्थना में,
कोई कसर शेष
 न रही थी। बड़ों ने ढेर सारीं बातें कीं।समय तेजी से बीतने लगा। 

कुछ समय पश्चात दीदी ने चलना चाहा। सम्माननीय अतिथि को अब घर से भावभीनी विदा देने की घड़ी आ पहुँची थी। पूज्य दीदी जब 
 चलने लगीं, तो अपने बटुवे से (पर्स से)  कुछ रूपये निकाल कर, उन्होंने मेरी छोटी बहन बाँधवी की हथेली पे, वे पैसे रख दिए।
तब हमें अम्माँ की नसीहत याद आई!  जो सिखलाया गया था उस के अनुसार 
५, वर्ष की बाँधवी जिसे हम घर पर, प्यार से मोँघी बुलाते हैं, वह एकदम से 
' न न ' करने लगी। हाथ पे  धरे हुए वो पैसे वह पूज्य दीदी जी को लौटाने लगी। 
अब महादेवी जी बोलीं,' अरे ले ले बिटिया ' ~ तब तो बांधवी धर्म संकट में पड गयी।
अब क्या करे ? प्रतिक्रिया या आदेश के हेतु से उसने अम्माँ
 का मुख देखा।
तब भी वह समझ नहीं पाई कि अब क्या किया जाए !  अम्माँ मुस्कुरा रहीं  थीं ! 
तब ५ वर्ष की बाँधवी ने इस दुविधा से उभरने का स्वयं समाधान ढूंढ निकाला !
तपाक से बोली, ' इत्ते  सारे नहीं ..थोड़े से दे दीजिये अम्मा ने लेने को मना किया है ना ! ' 
चित्र : मैं लावण्या व मुझ से छोटी बाँधवी

बच्चे की भोली बात सुनकर सबसे पहले महादेवी जी खूब खुल कर ठठाकर हंसीं।
वे गिने चुने व्यक्ति जो आदरणीया महादेवी जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त कर चुके हैं
वे जानते हैं कि, उनकी आवाज बहुत भारी थी और वहां बारामदे में जितने लोग खड़े थे 
उनका आदरणीया दीदी के यूं खुलकर हंसने पे जो ठहाका लगा वह आज तक याद है ! 
- लावण्या
 क्रमश : ~~ " अब तो तुम्हें और भी मेरी याद न आती होगी "
कविवर श्रद्धेय सुमित्रानंदन पंतजी का पोस्ट कार्ड

अनुज सखा पंडित नरेंद्र शर्मा के नाम :