Friday, February 14, 2020

आकाशवाणी के "विविधभारती : का प्रथम प्रसार गीत ~ :नाच रे मयूरा : गीतकार : पँडित नरेन्द्र शर्मा

ऑल इंडिया रेडियो "आकाशवाणी " का सर्व प्रथम गीत भारत सरकार की रेडियो प्रसारण सेवा के लिए बजाया गया उसे  ' प्रसार गीत ' कहा गया !
डा. केसकर जी मँत्री थे सूचना व प्रसारण के ( Information and
Broadcasting Ministry ) डा. केसकर जी मँत्री थे सूचना व प्रसारण के !उन्हेँ उस समय के हिन्दी सिने सँगीत के गीतोँ से भारतवर्ष की समस्त प्रजा के लिए आरम्भ किये जा रहे रेडियो जैसे नये माध्यम द्वारा आम फ़िल्मी बजाएं जाएं यह मामला  कतई पसन्द न था! अब क्या हो ? ऐसा दुविधापूर्ण प्रश्न आयोजकों के समक्ष उपस्थित हो गया। आखिरकार आकाशवाणी रेडियो प्रसारण सेवा के जरिये किस तरह के और कैसे गीत बजाये जायेँ ? ये मुद्दा एक बडा पेचीदा, गँभीर और सँजीदा मसला बन गया ! इस प्रश्न का हल ये निकाला गया कि "शुध्ध ~ साहित्यिक " किस्म के गीतोँ का ही भारतीय सरकार द्वारा प्रेषित रेडियो प्रसारण सेवा के जरिये शुद्ध हिंदीमें साँस्कृतिक   पुट लिए हों ऐसे साहित्यिक  हिन्दी गीतोँ को ही बजाया जाएगा । तद्पश्चात 
ऐसे शुद्ध हिंदी भाषा के गीतकारों  का चयन किया गया।
देहली से श्री भगवती चरण वर्मा जी को आमंत्रित किया गया। उनका  उपन्यास "चित्रलेखा " हिन्दी साहित्य जगत मेँ धूम मचा कर अपना गौरवमय स्थान हासिल किये हुए था। मायानगरी  बँबई से, कवि पँडित नरेब्द्र शर्मा जी को चुना गया। गीतों के संगीत संयोजन के लिए, उन्हें  सँगीत बध्ध करने के लिए मशहूर बँगाली सँगीत निर्देशक श्री अनिल बिस्वास जी को चुना गया वे भारतीय सिनेमा सुगम संगीत पितामह कहलाते हैं !
अब पढ़िए रेडियो उद्घोषक यूनुस खान जी का व्यक्ततव्य ~
लावण्या जी आज लाईं हैं रिफत सरोश के संस्मरण ~
लेकिन उनकी पोस् को पेश करने से पहले मैं कुछ कहने की गुस्ताख़ी  कर रहा हूंजो लोग रिफत साहब को नहीं जानते ये बातें उनके लिए
रिफत
सरोश रेडियो की एक जानी मानी हस्ती रहे हैं
शायरी
और उर्दू ड्रामे में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा हैरिफत रेडियो के उन लोगों में से एक रहे हैं जिनमें कार्यक्रमों को लेकर रचनात्मकता और दूरदर्शिता थीउनकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैंविविध भारती के आरंभिक दिनों में रिफत सरोश ने भी अपना उल्लेखनीय योगदान दिया थापुराने लोगों से सुन सुनकर जितना जान पाया हूं उसके मुताबिक रिफत साहब उन दिनों आकाशवाणी मुंबई में थे जब विविध भारती को दिल्ली से मुंबई लाया गया थाअब ये नया प्रसंग गया ना, जी हां विविध भारती का आरंभ तीन अक्तूबर सं १९५७ को दिल्ली में हुआफिर थोड़े दिनों बाद विविध भारती को मुंबई लाया गया फिर दिल्ली और फिर अंतत: मुंबई ले आया गया
ख़ैर इस संस्मरण को पढ़कर आप अगले भागों का इंतज़ार ज़रूर करेंगे
रेडियो में काम कर रहे मेरे जैसे बहुत बहुत बाद के लोगों के लिए इसमें बसे हैं पुराने लोगों के किस्से जो आज भी स्टूडियो के गलियारों में गूंजते हैं । ----युनुस चलिये अब आगे सुनें ~ जनाब 'रिफअत सरोश " साहब का  सँस्मरण
इस आलेख मेँ उन्होंने  अनमोल यादेँ साझा कीं हैँ उन से मुखातिब हुआ जाये ...
         
       " इप्टा = माने इन्डियन पीपल्स थियेटर के पहले का स्वरुप क्या था ? जी हाँ इसका पूर्वरुप था " कल्चरल स्क्वाड " जो वह " बाँये बाजू " का कलचरल विँग था! यानी नृत्य,सँगीत, और नाटकोँ के जरीये साम्राज्यित पर चोट की जाती थी ! कुचली हुई जनता को सिर उठाने, अपना हक मनवाने और आज़ादी की जँग मेँ आगे बढने के लिये उसी से तैयार किया जाता था।

" एक ज़माने तक, नाच - गानोँ के प्रोग्रामोँ मेँ हिस्सा लेना तो दरकिनार , मेरे नज़दीक ऐसे प्रोग्राम देखना भी एक तरह से ऐब था। लेकिन १९४५ ई. मेँ, बम्बई पहुँच कर मेरी अखलाकियात ( नैतिकता ) की रस्सी कुछ ढीली हो गई थी और  मैँ  इस तरह के प्रोग्राम कि, जिसमे अश्लील्ता न हो उनसे जुड़ने लगा !
 उन दिनोँ की बात है, कि बँबई के कावसजी जहाँगीर होल मेँ "कलचरल स्क्वाड " का एक प्रोग्राम हुआ।  जिसकी सूचना मुझे, अपने एक दोस्त प्रेमधवन से मिली जो शायर तो हैँ ही, डाँसर भी हैँ।
       
हाल खचाखच भरा हुआ था। परदे के पीछे से एनाउन्सर की आवाज़ और वाक्योँ मेँ साहित्यिक पुट तथा बात से असर पैदा करने का सलीका था। सुननेवालोँ के दिलों पर पकड़ लिए हुए वह आवाज़ मानो प्रोग्राम की बागडोर उस आवाज़ से बँधी थी ! मालूम हुआ कि ऐसे प्रोग्राम का सँचालन कर रहे थे नरेन्द्र जी अपने विशेष रोचक अन्दाज मेँ !
 जब "कल्चरल स्क्वाड " पर उस समय की सरकार ने पाबँदी ला दी थी तो उसकी जगह इप्टा ने ले ली ! इप्टा और उसकी सरगर्मियोँ और कामयाबियोँ से थियेटर की दुनिया खूब वाकिफ थी।
           बँबई मेँ इस के पौधे को अपनी कला से सीँचनेवाले थे नरेन्द्र जी जिन के कई अन्य साथी थे ~ जिनमेँ प्रमुख हैँ ~ लराज साहनी, प्रेम धवन और उनके बाद शैलेन्द्र, हबीब तनवरी, मनी रबाडी, और शौकत व कैफी आज़मी,  ख्वाजा अहमद अब्बास ( जिन्होँने  सुपर स्टार अमिताभ को अपनी फिल्म ~ "सात हिन्दुस्तानी " मे पहली बार फिल्म मेँ काम करने का मौका दिया था )
( यह  टिप्पणी - लावण्या की है )
अवामी ज़िन्दगी से नरेन्द्र जी की कुर्बत देखकर मेरे दिल मेँ उनकी इज्जत पहले ही दिन से पैदा हो गयी थी।  फिर कुछ दिन बाद जब मैँ आल इन्डिया रेडियो मेँ मुलाजिम हुआ तो मालूम हुआ कि किसी मतभेद की वजह से हिन्दी के लेखक और कवि आल इन्डिया रेडियो के कार्यक्रमोँ मेँ भाग ही न लेते थे~ ले दे कर एक गोपाल सिँह नेपाली थे, जो कभी कभी कविता पाठ करने आ जाते थे कोई और प्रसिध्ध साहित्यकार इधर का रुख न करता था ! हाँ डा. मोतीचन्द्र जी वे,  प्रिन्स ओफ वेल्स म्युझियम के प्रमुख, कर्ता धर्ता थे  और रणछोड लाल ज्ञानी जरुर आते थे। और फिर देश स्वतँत्र हुआ।भाषा सम्बधी आकाशवाणी की नीति मेँ परिवर्तन आया।
अब हम रेडियोवाले, हिन्दी लेखकोँ और कवियोँ की खोज करने लगे।
नीलकँठ तिवारी, रतन लाल जोशी, सरस्वती कुमार दीपक, सत्यकाम विध्यालँकार, वीरेन्द्र कुमार जैन, किशोरी रमण  टँडन, डा. सशि शेखर नैथानी, सी. एल्. प्रभात, के. सी. शर्मा भिक्खु, भीष्म साहनी, 
हिन्दी के अच्छे खासे लोग रेडियो के प्रोग्रामोँ मे हिस्सा लेने लगे।
उन्हीँ दिनोँ हम लोगोँ ने पँ. नरेद्र शर्मा को भी आमादा किया कि वे हमारे प्रोग्रामोँ मेँ रुचि लेँ - वे फिल्मोँ के लिये लिखते थे।
एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया,  "कवि और कलाकार" - उसमेँ सँगीत निर्देशक अनिल बिस्वास, अस. डी. बर्मन, नौशाद और सैलेश मुखर्जी ने गीतोँ और गज़लोँ की धुनेँ बनाईँ ~ शकील, साहिर और शायर डाक्टर सफ्दर "आह" सीतापुरी के अलावा नरेन्द्र जी के एक अनूठे गीत की धुन अनिल बिस्वास ने बनाई थी, जिसे लता मँगेशकर ने गाया था ~
" युग की सँध्या कृषक वधु सी, किस का  पँथ निहार रही "
पहले यह गीत कवि ने स्वयम्` पढ़ा, फिर उसे गायिका ने गाया।
उन दिनोँ आम चलते हुए गीतोँ का रिवाज़ हो गया था और गज़ल के चमकते -दमकते लफ्ज़ोँ को गीतोँ मेँ पिरो कर अनगिनत फिल्मी गीत लिखे जा रहे थे।  ऐसे माहौल मेँ नरेन्द्र जी का ये गीत सभी को अच्छा लगा, जिसमेँ, साहित्य के रँग के साथ, भारत भूमि की सुगँध भी बसी हुई थी और फिर हमारे हिन्दी विभाग के कार्यक्रमोँ मेँ नरेन्द्र जी स्वेच्छा से, आने जाने लगे।
एक बार नरेन्द्र जी ने, एक रुपक लिखा - " चाँद मेरा साथी " ~~
चाँद के बारे मेँ अपनी कई कवितायेँ, जो वभिन्न मूड की थीँ, को रुपक की लडी मेँ इस प्रकार पिरोई थी कि मनिष्य की मनोस्थिति सामने आ जाती थी।  वह सूत्र रुपक की जान था ! मुझे रुपक रचने का यह विचित्र ढँग बहुत पसँद आया और आगे भी इस का प्रयोग किया गया।  मैँ, बम्बई रेडियो पर हिन्दी विभाग मेँ स्टाफ आर्टिस्ट था अब्दुल गनी फारुकी प्रोग्राम असिस्टेँट ! "

उन दिनों आकशवाणी के कुछ गिने चुने केंद्र ही थे और उन सभी में शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों की अधिकता थी जिसकी वजह से आम जनता के रेडियो की सूइयां, रेडियो सीलोन को ही ढूंडा करती थी। आकाशवाणी के कार्यकर्ताओं को एक विविध रंगी चैनल की ज़रुरत महसूस हुयी जिसके लिए,पं. नरेन्द्र शर्मा को राजधानी दिल्ली बुलाया गया।  कभी वेदव्यास को भी राजधानी बुलाया गया था जिसके बाद रचना हुयी " महाभारत महाकाव्य की ! पं. नरेन्द्र शर्मा ने भी मनोरंजन की ऐसी महाभारत रची की रेडियो जगत में,एक मिसाल बनकर रह गयी ! इस महाभारत का नाम है ~~ " विविध भारती " ~~
अक्टूबर १९५७ को सुबह १० बजे जन्म हुआ विविध भारती का और पं. नरेन्द्र शर्मा को बनाया गया इसके चीफ प्रोड्यूसर !!
इस तरह आकाशवाणी मेँ "विविधभारती " का एक स्वतँत्र इकाई के स्वरुप मेँ जनम हुआ आखिरकार भारतीय प्रजा के आशा भरे स्वप्नों को वाणी मिली प्रथम प्रसार गीत तैयार हुआ जिसके  गीतकार थे कवि पँडित नरेन्द्र शर्मा जी, सँगीत से स्वर बध्ध किया  श्री अनिल बिस्वास जी थे और स्वर दिया  गायक श्री मन्नाडे जी ने! गीत के बोल हैं ~
"नाच रे मयूरा!
खोल कर सहस्त्र नयन,
देख सघन गगन मगन
देख सरस स्वप्न, जो कि
आज हुआ पूरा !
नाच रे मयूरा !

गूँजे दिशि-दिशि मृदंग,
प्रतिपल नव राग-रंग,
रिमझिम के सरगम पर
छिड़े तानपूरा !
नाच रे मयूरा !

सम पर सम, सा पर सा,
उमड़-घुमड़ घन बरसा,
सागर का सजल गान
क्यों रहे अधूरा ?
नाच रे मयूरा "

 सँगीतकार श्री अनिल बिस्वास जी की जीवनी के लेखक श्री शरद दत्त जी ने इस गीत से जुडे कई रोचक तथ्य लिखे हैँ। 
जैसे इस गीत की पहली दो पँक्तियाँ फिल्म "सुजाता " मेँ मशहूर सिने कलाकार सुनील दत्त जी गुनगुनाते हैँ ~ फिल्म सुजाता सं.१९५९  नूतन और सुनील दत्त द्वारा अभिनीत, निर्माता, निर्देशक बिमल रोय की मर्मस्पर्शी पेशकश थी। इस घटना का ज़िक्र आप अनिल दा की वेब साइट पर भी पढ सकते हैँ।  The Innaugeral Song for Vividh -Bharti
http://anilbiswas.com/ RE : NAACH RE MAYURA

उस ऐतिहासिक प्रथम सँगीत प्रसारण के शुभ अवसर पर नरेन्द्र शर्मा जी ने
अनिल बिस्वास को यह चार गीत दीये और उन गीतों के लिये सुमधुर धुन बनाने का अनुरोध किया था।  सभी गीतोँ का स्वर सँयोजन अनिल दा ने किया जिसका प्रसारण देढ घँटे के प्रथम ऐतिहासिक कार्यक्र्म मेँ भारत सरकार ने भारत की जनता को नये माध्यम "रेडिय़ो " प्रसारण के श्री गणेश  स्वरुप मेँ, इस अनोखे गीतों के उपहार से किया।  संगीतमय   "प्रसार ~ गीत " कार्यक्रम से " आकाशवाणी " के विविधभारती कार्यक्रम प्रसारण का जन्म हुआ !!
निम्न  चार  गीत तैयार किये गए थे ~~
१)  "नाच रे मयूरा, खोल कर सहस्त्र नयन,
देख सघन, गगन मगन,
देख सरस स्वप्न जो कि आज हुआ पूरा,
नाच रे मयूरा ...."
( गायक : श्री मन्ना डे जी )
२ ) चौमुख दीवला बार धरुँगी, चौबारे पे आज,
जाने कौन दिसा से आयेँ, मेरे राजकुमार
( गायिका थीँ श्री मीना कपूर जी )
३  ) 'रख दिया नभ शून्य मेँ किसने तुम्हेँ मेरे ह्र्दय ?
इन्दु कहलाते, सुधा से विश्व नहलाते,
फिर भी न जग ने न जाना तुम्हेँ, मेरे ह्रदय "
( गायिका थीँ श्री मीना कपूर जी )
४ ) "युग की सँध्या कृषक वधु सी,
किसका पँथ निहार रही ?
उलझी हुई, सम्स्याओँ की,
बिखरी लटेँ, सँवार रही "
( गायिका थीँ सुश्री लता मँगेशकर जी )
चित्र : स्वर साम्राज्ञी सुश्री लता मंगेशकर दीदी जी पं. नरेंद्र शर्मा
षष्ठिपूर्ति पर माल्यार्पण व  कविवर को स्नेह ~ अभिनन्दन देते हुए ~ 
   
"युग की सँध्या " गीत के बारे में  एक दुखद घटना जुडी है ~
"युग की सँध्या " गीत, इस प्रथम प्रसारण के बाद, न जाने कैसे, मिट गया ! इसलिए, उस गीत की रेकोर्डीँग ~ अब कहीं  भी उपलब्ध नहीँ है !
भारत कोकिला, स्वर साम्राज्ञी श्री लता मँगेशकर यदि उसे अगर गा देँ ,
पूरा गीत नहीँ तो बस,  कुछ पँक्तियाँ ही गए दें तो सारे भारत के तथा सम्पूर्ण विश्व के साहित्य रसिक व संगीत प्रेमी  लोग, एक बार पुनः  इस गीत का
 आनँद ले पायेगेँ ! आज  उस गीत को सुमधुर सँगीत से सजानेवाले अनिल दा जीवित नहीँ हैँ और ना ही गीत के शब्द लिखने वाले कवि पँडितनरेन्द्र शर्मा ( मेरे पापा ) भी हमारे बीच उपस्थित नहीँ हैँ ! हाँ, मेरी आदरणीया लता दीदी हैँ और उनकी साल गिरह २८ सितम्बर के दिन मैँ प्रत्येक वर्ष उनके दीर्घायु होने की कामना करती हूँ !
" शतम्` जीवेन्` शरद: " की परम कृपालु ईश्वर से , विनम्र प्रार्थना करती
हूँ और ३ अक्तूबर को "विविध भारती " के जन्म दीवस पर अपार खुशी और सँतोष का अनुभव करते हुए, निरँतर यशस्वी, भविष्य के स स्नेह आशिष भेज रही हूँ ...आशा करती हूँ कि " रेडियो" से निकली आवाज़,  हर भारतीय श्रोता के मन की आवाज़ हो, सुनहरे और उज्वल भविष्य के सपने सच मेँ बदल देनेवाली ताकत हो जो रेडियो की स्वर ~ लहरी ही नहीँ किँतु, "विश्व व्यापी आनँद की लहर " बन कर मनुष्य को मनुष्य से जोडे रखे और भाएचारे और अमन का पैगाम फैला दे, जिस से हरेक रुह को सुकुन मिले।
    
पंडित नरेंद्र शर्मा ने विविध भारती के बचपन को ऐसा संवारा की दिन ब दिन उसकी निखार बढती चली गयी।  आज पृथ्वी पर विविध भारती , सबसे बड़ा रेडियो नेटवर्क है जिसके करीब ३५ करोड़ श्रोता हैं।  अवकाश प्राप्ति तक पं नरेन्द्र शर्मा, विविध भारती के संरक्षक बने रहे।
युग की सँध्या

-----------------------------------------------------------------------------------
युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ?
उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही ...
युग की सँध्या कृषक वधू सी ....

धूलि धूसरित, अस्त ~ व्यस्त वस्त्रोँ की,
शोभा मन मोहे, माथे पर रक्ताभ चँद्रमा की सुहाग बिँदिया सोहे,

उचक उचक, ऊँची कोटी का नया सिँगार उतार रही
उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही
युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ?

रँभा रहा है बछडा, बाहर के आँगन मेँ,
गूँज रही अनुगूँज, दुख की, युग की सँध्या के मन मेँ,
जँगल से आती, सुमँगला धेनू, सुर पुकार रही ..
उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही
युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ?

जाने कब आयेगा मालिक, मनोभूमि का हलवाहा ?
कब आयेगा युग प्रभात ? जिसको सँध्या ने चाहा ?
सूनी छाया, पथ पर सँध्या, लोचन तारक बाल रही ...
उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही
युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ?

मेरी विनम्र अँजलि स्वीकारेँ ........शुभँ भवति ...
सादर ~ स
-लावण्‍या शाह

Saturday, September 28, 2019

कोफी -- कहाँ से आयी ?

email : lavnis@gmail.com




कोफी -- कहाँ से आयी ?

कोफी विथ कुश के चिठ्ठे से " कुश की कलम " से पढ़िए ~~
http://kushkikalam.blogspot.com/2009/02/blog-post_25.html
आज कोफी का कप यहाँ ले आए हैं और आप को कोफी के पीछे छिपी,
कोफी की दास्ताँ को उजागर कर दें ...
तो शुरू करें ?
चलिए, एक कप कोफी के साथ ही शुरू करते हैं ...
अजी, चाय भी ले लीजिये या शरबत, या सादा जल ही सही ....
कॉफी की कहानी : एक कल्डी नामका चरवाह था।
वह भेड बकरियां चरा कर अपना पेट भरता था।
एक शाम, घर जाते समय, वह हैरान रह गया !
क्योंकि उसने एक अजीब नज़ारा उसने देखा !
उसने देखा कि उस के जानवरों के झुण्ड की एक बकरी नाच रही थी !! 
...वह बकरी पहाडी रास्तों पर अजीब हरकतें कर रही थी ...

और उसने कौतूहल से आगे बढ़कर देखा तो वह बकरी,
पहाड़ी ढलान पर उगे हुए एक  पौधे से तोड़ कर लाल रंग के बेर जैसे दानो को चबा चबा कर चरते हुए खाये जा रही थी।
तब, काल्डी ने भी कुछ दाँने उस पौधे से तोड़े और अपने मुंह में रख लिए !
चबा कर उन दानों को वह खाने लगा और आहा !
अचानक उसने महसूस किया उसे भी एकदम से ताजगी महसूस होने लगी !
अब तो वह खुश हो गया ! कुछ और दाँने  तोड़ कर चरवाहे काल्डी ने
अपनी झोली में बाँध लिए फ़िर सोचा ,
"आज इन दानों को अपनी बीवी को भी चखाऊंगा ! "
घर पहुँच कर बीवी को उसने वह बीज दे दिए।
काल्डी की बीवी ने उन्हें अपने चूल्हे परउबल रहे पानी में फेंक दिए !
कुछ देर बाद, उन बीजों समेत उबलते हुए गरम पानी को पी लिया।
तो वह भी बहुत खुश हुई क्योंकि उसे भी फ़ौरन ताज़गी महसूस हुई !
पलटकर अपने शौहर काल्डी से वह बोली,
' अरे सुन, कल कुछ और ये लाल बेरी के दाँने तोड़ लाना
    यह पेय मुझे पसंद है ! "
बीवी की तारीफ़ सुनकर काल्डी की बांछें खिल गईं !
वह मुस्कुराकर बोला, 'हाँ  लाडो ले आऊंगा ! इधर  आ, मुझे तो तू पसंद है ! "
यह कहानी उस काल्डी चरवाहे की कहानी है।
जिस ने खोज निकाले थे ताज़गी देनेवाले कोफी के दाने !!

कॉफी से जुडी एक और कहानी ~~
यह कहानी अफ्रीका के विशाल भूखंड पर बसे  इथीओपिया प्रांत की बात है!
कुछ सूफी संतों और धर्मगुरुओं ने (पादरियों ने) इस पेय को अपने अनुभव से
जहाज निकाला था और कॉफी को अपना लिया था। उस के पीछे उनकी धार्मिक प्रवृत्ति मूल कारण रही थी। उनहोंने अनुभव से कॉफी पेय के ताज़गी देनेवाले गन को पहचान लिया था।  अपनी धार्मिक क्रियाओं में बाधा डालनेवाली निद्रा का त्याग कर सकें  और ईश्वर भक्ति में अधिक समय दे सकें इसी कारण कॉफी अपनाई !


कॉफी की पहचान का समय : ९ वी शताब्दी तक आते हुए, कोफी की खोज कुछ अनुभवी जानकारों में, अपनी ताज़गी प्रदान करनेवाली शक्ति से परिचित करवा चुकी थी। कॉफी के पेय को अपने दैनिक जीवन में अपनाने की आदत और कॉफी का पेय  रूप प्रचलन में आ चुका था। ९ वीं शताब्दी में हुई कॉफी के पेय की इस इजाद को निर्धारित करने की तिथि  हमें यही बतलाती है कि
९ वीं शताब्दी तक आते आते,  कोफी के बीजो व दानों को,  कुछ चतुर अरब व्यापारी, अपने कारवाँ में, झोलों में भर कर अपने साथ साथ अपने सफर में साथ ले कर रेगिस्तानों और एक विशाल भूमार्ग पर आगे बढने लगे थे।
इस तरह के सफर को कारवाँ का सफर कहते हैं जिस की मार्फ़त अफ्रीका से अरब देशों तक अब आगे कॉफी आ पहुँची !
 
ऊँट की सवारी जिन पर बैठने के लिए हौदा भी रखा रहता था।  
चित्र : howdah, by Émile Rouergue, सं १८५५
यूरोप के भूभाग को पार करते हुए आगे कॉफी का सफर
मध्य एशिया पहुँचा। 
उसके बाद काफिलों के मार्फ़त, कॉफी भारत  आकर भारत में फ़ैलने लगी।  ब्रिटिश साम्राजयवाद का विस्तार व कॉफी :
यूरोप में ब्रिटिश राज्य सत्ता की महत्वपूर्ण संस्था ' ईस्ट इंडिया कम्पनी संस्था का सं. १६०० में संगठन  हुआ । उक्त संस्था द्वारा विश्व व्यापार को ब्रिटिश राज्य साम्राज्य ने अपने साम्राजयवाद के विस्तार का महत्वपूर्ण अंग बना लिया  था। ईस्ट इंडिया कम्पनी के सामरिक विस्तार के साथ, कोफी का साम्राज्य भी विश्व भर में,  सुनिश्चित तौर से फैलने लगा।
ब्रिटिश राज्य सता के सुनियोजित साम्राज्य विस्तार के साथ साथ कॉफी, चाय, ओपियम, सिल्क  इत्यादि का ब्रिटिश हुकूमत द्वारा व्यापार भी विश्वभर में फैलता चला  गया।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और डच ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा कॉफी १६ वी सदी में यूरोप के इंग्लैंड प्रांतों में में दाखिल हुई थी ।
Map of Eurasia with drawn lines for overland and maritime routes
Main routes of the Silk Road

उत्तर अमरीका में कॉफी :
अमरीकी इतहास में  " बोस्टन टी पार्टी " का उल्लेख प्राप्त होता है।
अँगरेज़ राज्य सता नए देश अमरिका  को चाय, कॉफी व अन्य जीवन उपयोगी संसाधनों का निर्यात किया करता था।
ब्रिटिश साम्राज्य के अधिकारी वर्ग अमरीकी जनता से इन
आम जीवन के दैनिक उपयोग की प्रत्येक चीज वस्तुओं पर
तगड़ा कर लगाया करते थे तथा अमरीकी भूखंड पर बसे
नए आगंतुकों से माने आम जनता से तगड़ा कर - वसूल किया करते थे।
इस का  विरोध अमरीकी जनता के मन ने विद्रोह की भावना बढ़ाने लगा।
महंगाई की मार झेलकर,ब्रिटिश हुकूमत को पैसा देते हुए
परेशान होकर जनता ने ब्रिटिश हुकूमत का विरोध करना शुरू किया।  
ब्रिटिश हुकूमत से आज़ाद होने की इच्छा भी अमरीका आकर बसे इन
योरोपीय जन के मन में ब्रिटिश सत्ता के विरोध में आग में घी समान बना ।
नतीजा यह हुआ कि उत्तर अमरीका के मैसेच्युसेटस प्रान्त के बोस्टन शहर में
एक ब्रिटिश साम्राज्य के विरोध में  विशाल विरोध प्रदर्शन का आयोजन निश्चित किया गया। 
विश्व के चाय एवं कॉफी उत्पादक देशों से ब्रिटिश हुकूमत द्वारा उत्तर अमरीका निर्यात की हुई महँगी चाय को बोस्टन शहर के पास सीधे जहाज से उठा उठाकर अमरीकी विरोधकारी प्रदर्शनकर्ताओं ने ४३२ बक्सों को डार्टमाउथ जहाज से एटलांटिक समुद्र में फेंक कर, अपना विरोध जताया ! ब्रिटिश राज्य सत्ता के साथ साथ महंगी निर्यात की हुई, तगड़े कर से लदी इस महंगी चाय का निषेध अमरीकी जनता ने गर्मजोशी के साथ प्रर्दशित किया। अमरीकी आज़ादी की क्रांति का बीजारोपण भी इसी निषेध द्वारा आरम्भ हुआ।
Boston Tea Party; the 'Boston Boys' throwing the taxed tea into the Charles River, 1773 (hand coloured print)

लिंक : Key Events Leading to the Boston Tea Party

सं. १६०७ में, डॉरोथी जोन्स को बोस्टन शहर में सर्वप्रथम कॉफी व्यापर का लाइसेंस मिला था।  आज उत्तर अमरीका के मूल भूखंड पर फैले हुए व आबाद हो रहे ५० प्रांतों में कहीं कहीं चाय घर दीख पड़ते  हैं परन्तु अमेरीकी प्रजा का अधिकाँश हिस्सा, कोफी पीना ही अधिक  पसंद करता है ! कॉफ़ी अमरीकी जनता का सर्वप्रिय पेय है। Coffee Shop Locations
The US economy is so large that the GDP of individual states is often comparable to entire other countries.


कोफी के निद्रा विरोधक गुण को पहले तो ईस्लामी और ख्रिस्ती धर्म का समझकर दोनोँ ही धर्म के अनुयायीओँ ने पहले तो कोफी का विरोध किया था
परन्तु कोफी के चाहक वर्ग ने, कोफी को अपना लिया और आगे बढ़कर कॉफी का खूब प्रचार प्रसार किया।

अफ्रीका के यामीन इलाके में भी प्राकृतिक रूप से कोफी की पैदाइश होती है ।
काफ़ी हाउस मूलत अरब और तुर्क्स ही चालाया करते थे ।
काफ़ी पीने का चलन,  मक्का व मदीना (सौदी अरेबिया ) से कैरो (ईजिप्ट ), दमस्कुस (सिरिया ), बगदाद (इराक ) इस्तांबुल (तुर्की ) से आगे बढ़ा।
मोक्का कोफी का नाम -  यामिनी कोफी से पहचान में आया !
देखिये लिंक : — क्लीक करें --

Yemeni - coffee Mocha
कारवाँ से ऊंटों के काफिलों में थैलियों में बंध कर आई, कॉफी,
धीरे धीरे यूरोपीय प्रजा को पसंद आने लगी।
लोगों को महसूस हुआ कि कॉफी के पेय से अच्छी खासी ताज़गी होने लगी।
पहले पहल योरोप के इटली में, कोफी पीने के रेस्तरां खुले। 

आज ऐसे कोफी रेस्तरां या कोफी हाउस, दुनिया भर में, मिल जायेंगे
" केफ्फे " इटालियन शब्द है जो, काहवा का बिगडा रूप है -
मूल टर्की भाषा के शब्द को बदल कर " खावे " बना लिया गया
जो " काहवा - अल बुन " शब्द -मूल  अरब शब्द है उसके करीब है। 
जिसका अर्थ  है " कोफी बीन का रस - या
" काहवा - अल बुन " 
यमन के मक्खा बंदरगाह से चली कोफी ,
आज मोका कोफी के नाम से मशहूर है !!
किव हाँ ने इस्तांबुल में सं.१४७१ में सबसे पहला " कोफी हाउस " खोला था।
बाद में यूरोप के इटली में कई काफी हाउस खुल गए।
वहाँ से फ्रांस में भी इसका प्रचलन हुआ।
जहाँ कलाकार सार्त्र और कलाकार सिमोन दे बेऔवोइर पिकासो जैसे असंख्य चित्रकार, कवि, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक वर्ग के लोगों में सं. १६५४ के बाद  कॉफी हाउस में अक्सर मुलाकातें होने लगीं। बुद्धिजीवी, कला क्षेत्रों से जुड़े वर्ग के विचारशील लोग कॉफी की चुस्कियों के साथ गंभीर विचार विमर्श करने लगे - अक्सर कॉफी हाउस में वे मिलने लगे और दुनियाभर  को अपने विचार विमर्श करते हुए, उनसे उपजे नए नए विचार भी देने लगे।  इस प्रकार हम कह सकते हैं कि, एक तरह से," विश्व पटल पर ' वैचारिक क्रान्ति का सूत्रपात  'भी कोफी हाउस से जुडी व कॉफी के रोचक सफर से उपजी हुई देन रही है। 
चित्र : कॉफी रेस्त्रां : ~~
कुछ समय बीतने पर विश्व के अनेकानेक देशों में व प्रांतों में कॉफी प्रचलित हो गयी। विश्व के विभिन्न प्रांतों की कॉफी उत्पाद के लिंक्स  प्रस्तुत हैं 
~ विस्तृत जानकारी के लिए  प्लीज़ प्रत्येक लिंक पर क्लिक करें ~~
१ - कोलंबियन : Colombian
२ - कोस्टा रीकन :
Costa Rican
३ - हवाईयन कोना : Hawaiian Kona
४ - इथीयोपियन सिड़ामो : Ethiopian Sidamo
५ - ग्वातमाला : Guatemala : (ब्रांड : हेहेतेनांगो)
६ -- जमैकन नीली पहाड़ी ब्रांड - Jamaican Blue Mountain
७ -- जावा -- Java
८ -- केन्यन -- Kenyan
९ -- पानामा -- Panama
१० -- सुमात्रा -- Sumatra
११ -- इंडोनेशिया -- Indonesia
१२ --- सुलेवासी -- Sulawesi ( ब्रांड : तोराजा कलोस्सी ) 
१३ -- तान्ज़ानिया -- Tanzania ( ब्रांड : पाबेर्री)
१४ -- उगांडा -- Uganda- (ब्रांड : रोबुस्ता काफ़ी )
१५ : यमन कोफी को " अरेबिया फीलिक्स " कहते हैं ।
लिंक : https://www.coffeesheikh.com/?gclid=CjwKCAjwibzsBRAMEiwA1pHZrrwD88AyOSSpQU5uxw-3Ubc-5Qly83BYdoGDuWbLbzlUdWeXQNmhshoCVCsQAvD_BwE

यह भौगोलिक स्थान विश्व के कोफी उत्पादन से जुड़े हुए स्थल हैं ।
विश्व के नक्शे में, जहाँ जहां कोफी उगाई जाती है उन का

हरे रंग से उल्लेख किया गया है। 
भारत में कॉफी : कर्णाटक के पहाडी इलाकों में, ख़ास कर, चिकमंगलूर इलाके में कोफी की अधिक  पैदाइश होती है, मैसूर प्रांत में कोफी बड़े चाव से पी जाती है .
आधुनिक समय मे कोफी कल्चर :
कॉफी पीना यह आज के समय में ' ग्लोबल कल्चर ' बन गया है। विश्व को कोफी के पहचान देने वाले अरब देशों और आफ्रीकी देशों में भी अब विश्व के सर्व शक्तिमान देश अमरीकी व्यापारी कल्चर ने सेंध लगा रखी  है।

 अमरीकी व्यापारिक दिग्गज कॉर्पोरेशंस अब सर्वत्र घुसपैठ कर गया  है और अपना वर्चस्व बढ़ाने में यह सामर्थ्यवान कॉर्पोरेट्स प्रतिदिन व्यस्त हैं !
आज अमरीकी कॉर्पोरेट कल्चर व व्यापार वाणिज्य  की देन के मिलियनों डालर कमानेवाले व्यवसाय के प्रतीक समान हैं ~  स्टारबक्स, सीयाटल कॉफी, बीग्बी कोफी, हडसन, एस्प्रेसो हाउस वगैरह ~
काफी हाउस  या "पब" एक  तरह से आम लोगोँ के मिलने की
ख़ास  जगह हो गई है। 

मोका कोफी की जानकारी ~ मौका कॉफी शब्द, " अल मखा " शब्द से आया है ( ' शब्दोँ का सफर ' : शब्दों के शोधकार्य से जुड़े अजित भाई का लिंक )
http://shabdavali.blogspot.com/2009/03/blog-post_04.html 
भारत में कोफी का आगमन किस तरह हुआ ? इसकी अति रोचक कथा है। 
यामिनी सूफी संत बाबा बुदान , ‘बाबा ’
(हज़रात शैक जमेर अल्लाह मज़राबी ) यमन के  अल -मखा इलाके से,
पश्चिम घाट के परबत चिकमंगलूर, कर्णाटक प्रांत, भारत तक सफर करते हुए आ पहुंचे थे।  वे,  कोफी के कुछ दाने, अपने साथ,लेकर आए थे और उन्हें बीजों को भारत की सरज़मीं पर उन्होंने रोप  दिए।
यह संवत १६७० की बात है और आज मैसूर कोफी भारत में ही नही
भारत के बाहर भी सुप्रसिध्ध है। उन्ही के नाम से " बाबा बदनगिरी हिल्ज़ "

और 'बाबा बदनगिरी कोफी ' अत्याधिक  प्रसिद्ध हुई।       

अब आप बतलाएं, आप को चाय पसंद है या कोफी ?
या और कोई पेय आपको ज्यादा प्रिय है ?

आशा है कोफी का रोमांचक सफर आपको पसंद आया होगा .......

- लावण्या

Wednesday, August 14, 2019

अधूरे अफ़साने कथा संग्रह मेरी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है।


नमस्ते
अधूरे अफ़साने कथा संग्रह मेरी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है।

आप तक, अगर  ' अधूरे अफ़साने ' किताब पहुंची है और आप मेरी बात सुन रहें हैं, तब आप से नमस्ते, दुआ सलाम, राम ~ राम,  सत श्री अकाल कहते, मैं, मन की बात कहना चाहती हूँ !
मैं, इस समय मेरे परम आदरणीय पापाजी, हिन्दी साहित्य के नक्षत्र स्वरूप सुप्रसिद्ध साहित्यकार, गीतकार, कविश्रेष्ठ पं. नरेंद्र शर्मा एवं मेरी ममतामयी अम्मा श्रीमती सुशीला शर्मा जी को याद कर, उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करती हूँ और पुण्यात्माओं को आदर, श्रद्धा और दुलार सहित प्रणाम करती हूँ। 
मेरी पुस्तकें, १) कविता संग्रह ' फिर गा उठा प्रवासी ' और २) उपन्यास ' सपनों के साहिल ' प्रकाशित हो चुके हैं। अधूरे अफ़साने कहानियों का संकलन मेरी तीसरी साहित्यिक कृति है। 
 कहानी संग्रह ' अधूरे अफ़साने ' का प्रकाशन मेरे छोटे भाई समान परम गुणी पंकज सुबीर जी [ जो भारतीय ज्ञानपीठ युवा लेखन के लिए, कथा यू. के. सम्मान प्राप्त, श्री प्रेमचंद सम्मान प्राप्त, प्रतिभाशाली लेखक के साथ साथ एक सफल संपादक भी हैं ]
उन के सौजन्य से आप तक पहुंच रहा है अतः  उन्हें मेरे हार्दिक धन्यवाद और स्नेहाशीष !
 ऐमेज़ॉन इंडिया वेब पोर्टल पे अधूरे अफ़साने कहानियों का संग्रह अब उपलब्धहै। लिंक ~
ADHOORE AFSAANE (Short Stories Lavnya Deepak Shah)
amazon.in/dp/9381520267/… via
 हिंदी साहित्य जगत के अनेक साथी साहित्यकारों ने इस पुस्तक के लिए  उदारता पूर्वक लिखे  शुभकामना ~ सन्देश भेजे हैं।   पुस्तक की गरिमा~  शोभा में, अभिवृद्धि हुई है उन्हें मैं अपना हार्दिक धन्यवाद कहती हूँ! 
डा. मृदुल कीर्ति जी परम विदुषी सन्नारी हैं और मेरी अंतरंग सहेली ! उन्हें हार्दिक आभार। 
भाई अमरेंद्र जी एक सफल और 
सशक्त कथाकार हैं और मेरे अनुज हैं! उन्हीं आभार !
भाई श्री अनुराग शर्मा जी के स्नेहानुराग से जो अपनत्त्व प्राप्त हुआ, वह 
अनमोल है ! अतः धन्यवाद !
कथा यू. के. स्व सु श्री इंदु जी की स्मृति में साहित्यकारों को सम्मानित करती हिन्दी 
संस्था, ग्रेट ब्रिटेन में स्थापित करनेवाले, कर्मठ, आधुनिक मानव के संघर्षों को वाणी देनेवाले ऐसे अद्भुत कथाकार भाई श्री तेजेन्द्र शर्मा जी को भी धन्यवाद ! 
 हिन्दी साहित्य को २१ वीं सदी में उच्च कोटि के सृजन से समृद्ध करनेवाले मेरे हमसफ़र साहित्यकार मित्रों को पुनः अनेकानेक धन्यवाद ! उनके उज्जवल भविष्य के लिए मेरी मंगलकामनाएं।
                अब कुछ इस नई किताब के बारे में ~ पुस्तक ' अधूरे अफ़साने ' आम इंसान की ज़िंदगानी की कहानियाँ हैं
प्रश्न :  शीर्षक ' अधूरे अफ़साने ' चुनने के पीछे क्या कारण है ?
उत्तर : यही कि हरेक 
इंसान की कहानी और ज़िंदगानी अक्सर अधूरी रह जातीं हैं! किसी व्यक्ति या किसी पात्र के बारे में अभी हम कुछ जानें या समझें, उस के पहले, जीवन के बहते दरिया में दुसरी लहर उभरती है। समय गुजर जाता है। लम्हा बीत जाता है। लहरें लौट जातीं हैं रह जातीं हैं रेत पर पड़ी सीपियाँ या सिर्फ कहानियाँ ! 
           हम बचपन में दादी या नानी से अक्सर पूछा करते थे 
' फिर क्या हुआ ? '  हर कहानी के खत्म होते, एक प्रश्न, अक्सर अनुत्तरित रह जाता है। एक नई कहानी, एक नई ज़िंदगानी , शेष ~ अशेष ~~ 
          ज़िंदगानी के चित्रों के कोलाज में, लालटेन की रोशनी से कुछ पलों के लिए धुंधलके और कोहरे से भरी रात में, रोशनी की लकीरें किसी चेहरे पर पड़ जाएं और आप अपरिचित को अपना समझनें लगें ऐसे रहस्यमय अनुभव, इन कहानियों द्वारा, इन पात्रों द्वारा आप के मन तक पहुंचें ! पात्रों के जीवन से कुछ क्षण आपके समक्ष उजागर हों तो उन्हें स्वीकारीयेगा।  आप, सफर के साथी हैं।
अब इन कहानियों को आप के हवाले कर रही हूँ। 
          ' ज़िंदगी ख़्वाब है ' कहानी  के रोहित ~  शालिनी हों या  कथा ' मन - मीत '  के मोहन ~  मालती हों,  या ' जनम जनम के फेरे ' कथा  की शोभना और उसका पति धर्मेश हों या फिर  नर्तकी ' कादंबरी' हो, या ' समदर देवा ' कथा के मंजरी और देवा, किशना और मधु हों, या की कथा ' स्वयंसिद्धा ' की नई दुल्हन 'सिद्धेश्वरी' हो या ' कौन सा फूल " कहानी  के दादाजी और नई नवेली दुल्हन बनी दादाजी की लाड़ली पोती हो, ये सभी, आप से, अपनापा साधेंगें ! आप को वे अपने लगें, यह कामना है। 
        किताबें, अक्सर बड़ों के हाथ पहुँचती हैं। तो यही सोच कर के परिवार के शिशुओं के लिए भी इस किताब में कुछ कहानियाँ  हों, ऐसा सोच कर , चार बाल कथाएँ लीं हैं। 
१)  ' सोने का अनार, २) नृत्य नाटिका ' खिलती कलियाँ ' ,
३) ' टूटा हुआ सिपाही'   ४) एकाँकी नाटक ' एक पल सर्वनाश से पहले ' [ अंतरिक्ष यात्रा विषय पर लिखी  हुई ] ये बाल - कथाएँ भी आप तक पहुंचा रही हूँ। 
 आपके परिवार के नन्हें मुन्नों को प्यार और आशीर्वाद। उन्हें यह बाल कहानियाँ अवश्य सुनाऐं और हाँ, १४ वर्षीय नाती चिरंजीवी नोआ मेकरेडमंड और ४ साल के पोते चिरंजीव ओरायन सोपान शाह  से भी उन्हें जरूर मिलवाऐं। दोनों शिशुओं के चित्र संलग्न हैं। 
अंत में विनम्र अनुरोध है कि अपने विचारों से भी अवश्य अवगत करवाऐं । 
मेरा ई मेल :  Lavnis@gmail.com 
खुदा हाफ़िज़ ! ईश्वर आपको सदा सुखी रखें ~ 
सद्भावना एवं स्नेह सहित ,
~ लावण्या 
   Mrs Lavanya Deepak Shah
       Ohio USA
   From : ओहायो , उत्तर आमेरिका

Tuesday, June 18, 2019

सिने-संगीत इंद्र का घोड़ा है : 'विविध भारती' के प्रधान नियोजक और कवि नरेंद्र शर्मा से इन प्रश्नों के उत्तर सुनिए


शीर्षक : 
सिने-संगीत इंद्र का घोड़ा है,
उसे रेस का घोड़ा बनाना क्या उचित है?
क्या सिने-संगीत प्रभावशाली नहीं, लोकप्रिय नहीं? क्या सिने-संगीत मनोरंजन नहीं करता? क्या सिने-संगीत स्तर का नहीं होता? क्या सेंसरबोर्ड की तीक्ष्ण दृष्टि के आगे से वह नहीं गुज़रता? फिर क्या कारण है कि सेंसर हुए सिने गीत भी कई बार रेडियो से प्रसारित नहीं होते ? 'विविध भारती' के प्रधान नियोजक और कवि नरेंद्र शर्मा से ही अपने इन प्रश्नों के उत्तर सुनिए, विशेष रूप से लिखे लेख में...
जत-पट हो या रेडियो पर मनोरंजन के साधनों में सिने-संगीत का स्थान बहुत महत्त्व का है। सिने-संगीत निस्संदेह लोकप्रिय है। सिने-संगीत में विविधता है। कार्यकौशल ऊँचे दर्जे का होता है और प्रतिभा तथा परिश्रम का मणि प्रबाल-संयोग भी दर्शनीय होता है। रजत-पट पर मधुर धुन को सुंदर अक्षर चार चाँद लगा देते हैं। गायक-गायिका, संगीतकार-गीतकार, वाद्य-यंत्रों के हुनरमंद कलावंत और यंत्रों से ध्वन्यांकन करने वाले अञ्जयस्त इंजीनियर और फिर भरपूर आर्थिक साधन सिने-संगीत सचमुच बहुमूल्य बना देते हैं।
       सिने-संगीत हर तरह की रुचि को संतोष देने की क्षमता रखता है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि उत्तर और दक्षिण भारत में एक-सी ही इसकी शैली है। इसकी रचना में सामूहिक प्रयास और प्रयोग होता है, यानि टीमवर्क। इस प्रकार सिने-संगीत मध्ययुगीन की अपेक्षा आधुनिक है। अपने देश में ही नहीं, भारतीय संगीत एशिया और अफ़्रीक़ा के अन्य देशों में भी लोकप्रिय है। रजत-पट की यह ध्वन्यात्मक उपलद्धि रेडियो पर भी समान रूप से लोकप्रिय है और रेडियो पर लाखों श्रोताओं के मनोरंजन का साधन है।
अपने ही घर पराये ~
औसत दर्जे का सिने-संगीत ख़ासा अच्छा होता है। अखरता सिर्फ़ वह है कि ऊँचे दर्जे की उपज इसमें अपेक्षाकृत कम और अनुकरण की प्रवृत्ति अंधाधुंध बहुत अधिक होती है। इसलिए शिखर को छू सकने वाली रचनाएँ इनी-गिनी और औसत से नीचे दर्जे की या घटिया रचनाएँ बहुत अधिक होती है। स्थिति और भी विषम इसलिए हो जाती है कि सिने-गीतों की पैदावार, फिल्मों की संख्या के अनुपात में, ज़रूरत से ज़्यादा होती है।
इतनी अधिक संख्या में सिने-गीतों की रचना करता हँसी-खेल नहीं है। परंपरागत सुगम शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, रंगमंच-संगीत, रवींद्र संगीत, इत्यादि नयी-पुरानी शैलियों का तो आधार लिया ही जाता है, अरबी और पाश्चात्य सुगम संगीत से भी प्रेरणा ग्रहण की जाती है। कभी-कभी तो ऐसा भी देखने में आता है कि एक ही आधार पर दो-चार संगीतकार कई एक संगीत-रचनाएँ तैयार कर डालते हैं। नयी रचनाओं के लिए कभी-कभी अपनी निजी सूझ से भी काम लिया जाता है, पर विदेशी धुनों का अनुकरण बढ़ता ही जाता है।
संगीत में स्वदेशी और विदेशी का विचार नैतिक और अनैतिक के आधार पर न भी करें, तो भी इतना तो सोचना ही होगा कि भारतीय श्रोता के रुचि-संस्कार के हिसाब से कैसा संगीत, कितना अनुकूल पड़ता है। अपने देश के दृश्यों और ध्वनि-वैभव से कतराकर क्या हम अपने ही घर में पराये नहीं बन रहे हैं? क्या हम अपने ही दर्शक-श्रोता समाज को अपने ही देश से अपरिचित नहीं बना रहे हैं? अपनी भूमि के दृश्यों से आँख चुराना और अपने देश की ध्वनियों को अनसुना करना क्या उचित है? क्या यह अतिपरिचय की प्रतिक्रिया है जो हम अब अवज्ञा और अपरिचय की दिशा में अविवेक के साथ आगे बढ़े चले जा रहे हैं।

गाँव-देहात को तो हम बिसरा ही चुके हैं, छोटे क़स्बे और प्रादेशिक नगरों पर भी अब हमारे आँख-कान नहीं लगते। बड़े शहर ही दिखाई देते हैं और वे भी ऐसे रूप कि पेरिस, न्यू यार्क और लंदन के उपनगर प्रतीत हों। सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा आज हमारे मन की बात नहीं कहता। आज हिंदुस्तान से बाक़ी जहान अच्छा है, या यों कहिये की वह साम्राज्यवादी संपन्न देश, जो एशिया और अफ़्रीक़ा को दास बनाये हुए थे, वही हमें आकर्षित करते हैं। पहले हम उनके राजनीतिक दास थे, अब हम उनके सांस्कृतिक दास हैं। विदेशी के प्रति मोह इसी तरह से बढ़ता रहा तो अजब नहीं कि हम अपनों के लिए अजनबी बन जाएँ।

संगीत की ध्वनियाँ नाभि से निकलती हैं और प्राणों में समा जाती है। संगीत का असर बहुत ही गहरा होता है। इसलिए आवश्यक है इस संगीत के विषय में खिलवाड़ की अपेक्षा विवेक और विचार से काम लिया जाये। क्यों न हम सिनेमा और रेडियो के प्रभाव-क्षेत्र, लक्ष्य, उद्देश्य और दर्शक और श्रोता की आवश्यकताओं पर विचार करें? सिनेमा देखने वालों और रेडियो सुनने वालों की परिस्थिति और मन:स्थिति में बहुत अंतर होता है। आँख और कान में चार अंगुल का अंतर तो होता ही है।

घर और बाज़ार ~
सिनेमा देखने वाले अपने पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार घर से बाहर निकलकर किसी सिनेमाघर में जाते हैं। मनोरंजन का यह साधन नि:शुल्क नहीं होता। सिनेमाघर में पहले पैसे रखवा लिये जाते हैं। सिनेमाघर के भीतर हम सपरिवार बैठे हुए भी, अपरिचितों की संगत में बैठते हैं। वहाँ आत्मीय और परिचित कम और अजनबी अधिक होते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वैयक्तिक और पारिवारिक रुचि-संस्कार गौण हो जाते हैं और लज्जा और लिहाज़ के बिना तमाशा देखने की प्रवृत्ति मुख्य हो जाती है। अपरिचितों के बीच, अँधेरे में तमाशा देखने से इस प्रवृत्ति को बल मिलता है। गाँव की अपेक्षा हम शहर में अधिक स्वच्छंद होते हैं, क्योंकि शहर में भी आत्मीय कम और अजनबी ज़्यादा होते हैं। यही बात मेले-ठेले के विषय में भी कही जा सकती है।
सिनेमाघर में हम स्वेच्छा से नज़रबंद रहते हैं। ऐसे दर्शक प्रेक्षक समाज को पाश्चात्य समाजशास्त्री 'कैप्टिव ऑडियेंस' कहते हैं। परायी जगह में पराधीन होकर बैठने वालों का व्यक्तिगत और पारिवारिक दायित्व भाव बहुत कम हो जाता है और सामूहिक निर्वैयक्तिक भाव जादू की तरह सिर पर चढ़कर बोलने लगता है। ऐसी परिस्थिति में बहुत कुछ चल जाता है। मन:स्थिति तमाशबीन की हो जाती है, विवेकी व्यक्ति या गृहस्थ की नहीं।

रेडियो सुनने वालों का समाज इस प्रकार एक साथ नहीं बैठता। वह पारिवारिक एकांशों में बँटा हुआ, अलग-अलग स्थानों में बंट-छंट कर, घरों के भीतर बैठता है। यह घरेलू श्रोता-समाज है। पूरा परिवार या परिवार के कुछेक सदस्य रेडियो-कार्यक्रम सुनते हैं। जो अन्य किसी काम में लगते है, वे भी अपने कानों में रुई नहीं डाल लेते। बड़े छोटों के प्रति उत्तरदायी हैं और छोटों को बड़ों का लिहाज़ है। बहन-भाई, बाप-बेटी, माँ-बेटों, सास-बहू न जाने कितने आत्मीय संबन्धों के तार श्रोता-समाज के हर एकांश के ताने-बाने में सदैव विद्यमान रहते हैं।
यह वह परिस्थिति नहीं है, जो अजनबी-दर्शकों के समूह में बैठे हुए व्यक्ति या छोटे से परिवार की होती है। इसलिए स्वाभाविक है कि रजत-पट के दर्शक से रेडियो के श्रोता की मन: स्थिति भिन्न हो। उत्तान-शृंगार, ज़रूरत से ज़्यादा बेतकल्लुफ़ी की बातें और ज़ूमानी पंक्तियाँ श्रोता-परिवार को अधिक असहनीय हो सकती है। बहुत कुछ है, जो बाहर चलता है, लेकिन घर में नहीं।
सिनेमाघर नगरों और बड़े-बड़े क़स्बों तक ही सीमित हैं, पर इसके विपरीत, दूर-दूर विस्तृत जनपदों के ग्रामों और गिरिवन-प्रांतरों और अन्य प्रादेशिक अंचलों में, रेडियो सुनने वाले यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। उन सुनने वालों की आवश्यकताएँ और रुचि-संस्कार शहर के शौक़ीन दर्शकों की तुलना में बहुत भिन्न हैं। भारत में घर और बाहर, ग्राम और नगर, आत्मीय और अजनबी और छोटे और बड़े की दुनिया में बहुत अंतर है। रेडियो सुनने वालों के लिए 'ए' और 'यू' की कोटि में बँटे हुए कार्यक्रम सुन सकने की सुविधा भी नहीं है। घर और बाजार के विचार-व्यवहार और नियम-क़ायदे अलग-अलग हैं।
सिने-संगीत में बोल का महत्त्व शास्त्रीय-संगीत की अपेक्षा बहुत अधिक होता है। बोलों के कहने का ढंग भी कम महत्त्व नहीं रखता। एक ही बात को कई एक तरह से कहा जा सकता है, सहज स्वाभाविक ढंग की शालीनता से भी और हेकड़ी और शोहदेपन से भी। कहानी के मोड़ और चरित्र-चित्रण के जोड़-तोड़ गीतों की शैली को प्रभावित करते हैं। गीतों का रंग रजत-पट की आवश्यकताओं के अनुसार बदलता रहता है। बोल, धुन और वाद्य-यंत्र तथा उनका प्रयोग कहानी में बदलती हुई परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है।

रेडियो पर सिने-संगीत सुनने वालों के लिए कहानी, चरित्र-चित्रण और परिस्थितिगत वातावरण की उपस्थिति नहीं है। उसके लिए तो गीत केवल एक गीत है। किसी चरित्रहीन पात्र का गीत कहानी में शायद इसलिए रखा गया है कि अंतत: उस पात्र को कुपात्र सिद्ध होना है। किंतु कहानी के सदंर्भ के बिना रेडियो सुनने-वाला उसे कैसे ग्रहण करेगा? पागल, शराबी, हत्यारा कहानी में अपने चरित्र-चित्रण के अनुसार गा सकता है, लेकिन उसके गाये हुए गीत का कहानी के संदर्भ के बिना क्या अर्थ है? किसी वर्ग विशेष का कोई व्यक्ति किसी घृणित पात्र की भूमिका में है और उसके विरोध में शिकायती गीत गाया जाता है, जिसकी लपेट में पूरा वर्ग आ जाता है। रेडियो सुनने वाले का उससे क्या प्रयोजन है? प्रादेशिक उच्चारण या गायन पद्धति का विद्रूपगत प्रयोग रेडियो पर वर्जित होना ही चाहिए, क्योंकि ऐसी चीज़ों से रेडियो सुनने वाले को ठेस भी पहुँच सकती है और उनके मन में पारस्परिक विद्रूप की भावना भी भड़क सकती है।
संगीत की ध्वनियाँ और लयकारियाँ मन को शांत भी कर सकती हैं और अशांत भी। अफ़्रीक़ा के वनवासियों के वासना-विह्वल और कामोद्दीपित उन्मत्त संगीत का प्रभाव पाश्चात्य संगीत पर पड़ा और उससे मन को भड़काकर, तन के चिथड़े-चिथड़े कर देने वाले संगीत की सृष्टि हुई। सुना है कि उसे सुनकर युवतियाँ बेहोश होने लगीं और युवक कपड़े फाडऩे लगे। उस संगीत की लहरें, पागल हाथी की सांढ़ों की तरह भारतीय सिने-संगीत से भी आ टकरायीं। ऐसे कामोन्मादक संगीत को किस हद तक प्रोत्साहित किया जाये, संगीतकार के लिए यह विचारणीय होना चाहिए।

युग-संधि और वय-संधि की बेला में एक विचित्र प्रकार का मानस-मंथन होता है। जैसे समुद्र-मंथन से अमृत, विष और सुरा की उत्पत्ति होती है, वैसे ही मानस-मंथन से भी कल्याणकारी और अकल्याणकारी भावों की निष्पत्ति होती है। आज कालकूट को पीने वाले शिव दिखायी नहीं देते; कालकूट को बेचने वाले और बाँटने वाले बहुत हैं।

इंद्र के घोड़े की नियति?
कैबरे और नाइट-क्लब देश में बहुत नहीं हैं, लेकिन सिनेमा में इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। इनके वातावरण में जो संगीत प्रस्तुत किया जाता है, उसे कहानी में तो शायद दूसरे प्रकार के संगीत के द्वारा संतुलित भी कर दिया जाता है, लेकिन रेडियो-कार्यक्रम में ऐसी संभावना नहीं होती, क्योंकि वहाँ कहानी का संदर्भ नहीं है। एक गीत सिर्फ़ एक गीत है।

रेडियो सुनने वाला अपने घर में बैठा हुआ सुनता है। वह शायद ही पसंद करे कि उसका घर सिनेमाघर, अजायबघर, कैबरे या नाइट-क्लब बन जाये।

भारतीय जीवन का ढर्रा इतना बदल गया है कि ढिक-त्योहार, विवाहोत्सव की धूम-धाम, तीर्थयात्रा, मेला-दसहरा, देव-मंदिर, देवलीलाएँ, शाम की सैर, बाग़बहार, लावणी-कजली, ख़याल के दंगल, महफ़िल, मुजरा इत्यादि जीवन के रंगारंग पहलू अब रजतपट पर ही शेष हैं। रजतपट से बहुत कुछ आशा की जाती है। भारतीय जीवन के इन और अन्यान्य पहलुओं की ओर से आँख चुराकर भारतीय सिनेमा घटिया पाश्चात्य सिनेमा का अंधानुकरण करे, तो परिणाम भला नहीं हो सकता। सिने-संगीत की सृष्टि में रचनाकारों को इस विषय में सोच-विचार अवश्य करना चाहिए।

सोच-विचार को बिसारकर सिने-संगीतकार प्रचार और पैसे के लिए और उनके बल पर व्यावसायिक होड़ में फँसते जा रहे हैं, पर धंधे की धांधली भारतीय सिने-संगीत को कहाँ ले जायेगी? उनके पास एक अत्यंत शक्तिशाली और लोकप्रिय माध्यम है। सिने-संगीत इंद्र का घोड़ा है, उसे रेस का घोड़ा बनाना क्या उचित है?

कहा जाता है कि यह धंधा है। यह पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता या होड़ाहोड़ी की व्यावसायिक दुनिया है। यह करोड़ों को प्रभावित करने वाला, लाखों का खेल है। हो सकता है कि यह ठीक हो, लेकिन रेडियो के माध्यम को धंधे-व्यवसाय की घुड़दौड़ में घसीटना कहाँ तक ठीक होगा, विचारशील व्यक्ति इस पर विचार करें।

सिने-संगीतकार-सम्मेलन के प्रधान श्री सी. रामचंद्र ने कल्याणजी-आनंदजी अभिनंदन-समारोह में ठीक ही कहा था कि सिने-संगीत के क्षेत्र में धंधेबाज़ी की धांधली अच्छे-बुरे संगीत के विषय में खोटे सिक्के उछलते हैं और टकसाली खरे सिक्के दब जाते हैं।

रजतपट व्यावसायिक है, किंतु भारत में रेडियो लोक-सेवा का नि:शुल्क माध्यम है। दोनों की रीति-नीति और मानदण्ड अलग-अलग हैं। सिने-गीतों के बल पर चल-चित्र चलते हैं और रेडियो-प्रसारण से सिने-गीत चलते हैं। लेकिन क्या किसी व्यक्ति या वर्ग के लाभ के लिए नि:शुल्क रेडियो-प्रसारण का उपयोग होना चाहिए? रेडियो इस व्यापारिक और व्यावसायिक होड़ में पड़ेगा, तो पैसे और प्रचार को प्रबल शक्तियाँ जीतेंगी और अच्छे सिने-संगीत की हार होगी। मेरे गीत चलाओ, इतना लो और मेरे प्रतिद्वंद्वी के गीत न चलाओ, इतना लो। इस ले-दे में रेडियो पड़ेगा, तो और किसी का हित हो न हो, श्रोता का हित तो नहीं ही होगा।

कहा जाता है कि भारतीय सेंसरबोर्ड ने रजतपट पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए जो कुछ निरापद माना है, उसे रेडियो-प्रसारण के लिए भी ठीक मानना चाहिए। कहने वाले यह भूल जाते हैं कि सार्वजनिक प्रदर्शन और सार्वजनिक प्रसारण दो अलग चीज़ें हैं। प्रदर्शन का लक्ष्य दर्शक है और प्रसारण का लक्ष्य श्रोता है। दोनों की परिस्थिति और मन:स्थिति का भेद स्पष्ट किया जा चुका है। इसके साथ ही यह भी न भूलना चाहिए कि प्रदर्शन व्यावसायिक धंधा है और वर्ग नि:शुल्क नहीं है। रेडियो का प्रसारण लोक-सेवा का अंग है और हमारे देश में यह नि:शुल्क सेवा है, जिसका प्रेरणा-वाक्य या 'मोटो' 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' है। थोड़े से लोगों के मुनाफ़े और हित-सुख के लिए रेडियो माध्यम का उपयोग अब तक तो उचित नहीं ही माना गया है।

भारतीय सेंसरबोर्ड पटकथा को संपूर्णता से, सम्यक दृष्टि से, देखता है। भले-बुरे तत्त्वों का नाटक में एक संतुलन रहता है। संदर्भ से हटा दीजिए, तो बुरा ही रहेगा। रेडियो-प्रसारण गीत को कहानी के संदर्भ के बिना एक गीत की तरह से ही प्रसारित कर सकता है। रेडियो को बिना पासंग की तोल से बचना ही पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति में यह प्रस्ताव किया जा सकता है कि जैसे रजतपट पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए अच्छे बुरे का विवेक करने वाला एक सेंसर बोर्ड है, वैसा ही एक सेंसरबोर्ड सार्वजनिक उपयोग की श्रवण सामग्री के लिए भी नियुक्त किया जाये। रजतपट और रेडियो दो अलग-अलग माध्यम हैं।

शृंगार और शृंगार का भेद ~
रेडियो से बहुत तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं। मोटे तौर पर कहें तो रेडियो का कार्यक्रम पंचसूत्री होता है। इसमें राष्ट्रीय महत्त्व के मौलिक और मूल्यगत कार्यक्रम होते हैं, जिनमें साहित्य, संगीत, चिंतन की आधारभूत उपलब्धियाँ प्रस्तुत की जाती हैं। सूचना और समाचार देने वाले कार्यक्रम होते हैं। क्षेत्रीय महत्त्व के व्यक्तित्व और कृतित्व को सामने रखने-वाले कार्यक्रम होते हैं, जिनमें क्षेत्र की भाषा, संस्कृति और भूमि को महत्त्व दिया जाता है। विशेष श्रोता-वर्गों के लिए कार्यक्रम होते हैं, जैसे स्त्रियों और बच्चों के लिए या मज़दूरों और श्रमिकों के लिए या स्कूल और कॉलेज के छात्रों के लिए। सार्वजनिक मनोरंजन के विविधतापूर्ण कार्यक्रम पाँचवाँ सूत्र प्रस्तुत करते हैं। मनोरंजन का यह कार्यक्रम सिने-संगीत को अधिक प्रस्तुत करता है और सामग्री के उपयोग के लिए मालिक या निर्माता को पूर्वनिश्चित शुल्क देता है, लेता कुछ नहीं है कि उससे धंधे के प्रचार-प्रसार की अपेक्षा की जाये।

रेडियो-प्रसारण के लिए गीतों का चुनाव और सेंसर का फ़ैसला दो अलग बातें हैं। रेडियो चुनाव या चयन करता है, सेंसर या बैन नहीं करता। रेडियो के कार्यक्रम पत्र-पत्रिकाओं के विभिन्न स्तंभों के समान होते हैं, जिनके लिए उपयुक्त और आवश्यक सामग्री का चयन-संकलन संपादक की सूझ-बूझ रुचि-अरुचि और पत्र या पत्रिका की रीति-नीति पर निर्भर रहता है। रेडियो के कार्यक्रम-नियोजक और पत्र-संपादक की स्थिति बहुत-कुछ मिलती-जुलती है। संपादक अपने संस्थान के उद्देश्य और पाठक के हित-सुख के प्रति जागरूक रहता है। इसी प्रकार की मर्यादाएँ और सीमाएँ रेडियो के कार्यक्रम-नियोजक के लिए मान्य होनी चाहिए। संपादक की दृष्टि में जो पाठक का स्थान है, नियोजक के लिए वही स्थान श्रोता का है। मुद्रित सामग्री के लिए संपादक पारिश्रमिक देता है। प्रसारित गीतों के लिए रेडियो रॉयल्टी देता है।

यह तर्क भी सामने आता है कि काव्य-साहित्य और लोक-साहित्य में भी शृंगार की कमी नहीं है। शृंगार जीवन का संजीव अंग है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। नारी-सौंदर्य के प्रति आकर्षण अस्वाभाविक नहीं है और न इसको वर्णित करना वर्जित है। किंतु शृंगार-शृंगार में भेद करना होगा। सौंदर्य-कलिकाओं को मसलने का भाव या उन्हें रौंद डालने की वासना शृंगार नहीं है। अजी, जाओ तुमसे बहुत देखे! यह है ऐसी मनोवृत्ति का परिचायक, जिससे उद्दण्ड छिछोरापन सामने आता है और शृंगार दब जाता है। जीवन-सौंदर्य और भाव गरिमा के प्रति अवज्ञा, नर-नारी के संबंधों में हलका पन और प्रेमाकर्षण को बायें हाथ का खिलवाड़ बना देना बहुत आसान है, लेकिन इसके बुरे-भले पक्ष पर विचार करना आज कठिन हो गया है। किंतु क्या हम अपने जीवन-मूल्यों की ओर से बहुत दिनों तक बेख़बर रह सकते हैं? सिनेमा और रेडियो का संबंध बहुजन-समाज से है। इनकी चपेट में पूरा समाज आता है, जिसमें छोटी-बड़ी आयु और परिपक्व-अपरिपक्व बुद्धि के बहुत लोग शामिल रहते हैं। साहित्य का संबंध समाज के एक छोटे से वर्ग से होता है। साहित्य का उपयोग वैयक्तिक होता है। साहित्य एकांत में पढ़ा जाता है। साहित्य के प्रसार की सीमाएँ हैं। बाज़ारूपन या भद्दी भड़क साहित्य में असहनीय है और इसके साथ ही यह भी स्मरणीय है कि साहित्य का भी सब कुछ प्रसारणीय नहीं होता। इस क्षेत्र में भी चयन और चुनाव प्रसारणार्थ होता है।

वर्ग का हित या समाज का हित ~
अलिखित लोककाव्य भौगोलिक दृष्टि से परिबद्ध और अपने प्रचार-प्रसार में सीमित होता है। भोले लोगों का सामयिक ग्राम्य विलास बनफूल की तरह खिलता और बुझता है। उसे व्यापार की वस्तु बनाकर, शहरी फूलदान में रखना कहाँ तक उचित है? परिश्रमी किसान जिसे कल सबेरे तक भूल जाएँगे, शहरी निठल्ले उसका महीनों मजा लेंगे। स्थायी भाव को क्षणिक और क्षणिक को स्थायी बनाने की व्यवसायी भावना अप्राकृतिक ही कही जायेगी। सहज स्वाभाविक रूप में यथार्थ चित्रण एक बात है और व्यावसायिक हित में 'शॉप विंडो' सजाना दूसरी बात है।

सिनेमा, रेडियो, टी.वी. सार्वजनिक महत्त्व के अत्यंत शक्तिशाली माध्यम हैं। टी.वी. में तो रेडियो और सिनेमा की संयुक्त शक्ति का समावेश है। इन माध्यमों के साथ समाज के हित और सुख का प्रश्न सदा जुड़ा रहेगा। किसी व्यक्ति और वर्ग का स्वार्थ, सार्वजनिक हित और सुख से बढ़कर नहीं समझा जा सकता। जो सिद्धांत शरीर को पुष्ट और स्वस्थ बनाने वाले भोजन के संबंध में मान्य हो, वही सिद्धांत मन की भूख बुझाने यानी भारत के सामान्य जन का मनोरंजन करने वाले संगीत के विषय में भी मान्य होना चाहिए। रजतपट पर प्रदर्शन होटल या रेस्तराँ के षड्रस छत्तीस व्यंजनों के समान शुल्क-साध्य और घर के बाहर प्राप्त होने वाला है। उसकी तुलना में रेडियो-प्रसारण घर की रसोई है, नि:शुल्क और सहज सुलभ। दोनों के हेतु और मानदण्ड अलग-अलग हैं।

कहा जाता है कि प्रसारणीय न समझे जाने वाले बहुत से मज़ेदार सिने-गीतों को छोटे बच्चे भी गाते हैं। इस तर्क के उत्तर में दो बातें कही जा सकती हैं। एक तो यह कि कहीं-कहीं छोटे बच्चे भी सिगरेट पीते दिखाई देते हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि सिगरेट पीना उनके लिए लाभदायक है। दूसरी बात यह है कि भोले-भोले छोटे शिशु तो सांप से भी खेल लेते हैं और सांप भी उन्हें नहीं काटता। भोले की रक्षा भगवान करते हैं।
भगवान कृष्ण ने रास और गोपी-विलास करने से पहले कालिया नाग को नाथा। क्या सिने गीतकार-संगीतकार नाथे हुए नाग को नाथ और पगहे से मुक्त करके अनाथ जनता पर छोड़ना चाहेंगे?
(माधुरी, 21 अप्रैल, 1967 में प्रकाशित)