Friday, May 17, 2019

फिल्म निर्माण संस्था #बॉम्बे #टाकीज़ में गीतकार #नरेंद्र #शर्मा,

ॐ 
गीतों की रिम झिम, यादों की गलियों में जब् जब् अपनीसुमधुर कर्णप्रिय किंकिणी ध्वनि लिए बजतीं हैं तब अतीत के चलचित्र सजीव होकर उभर आते हैं। आज एक विहंगम दृष्टिपात करेंगें मेरे परम आदरणीय पिता,सुप्रसिद्ध रचनाकार पंडित नरेंद्र शर्मा की साहित्यिक कृतियों के बारे में ! गीतकार एवं  साहित्यकार नरेंद्र शर्मा के सृजन की !
       पंडित नरेंद्र शर्मा जी की १९ काव्य पुस्तकें, अब पंडित नरेंद्र शर्मा सम्पूर्ण रचनावली ' में संगृहीत हो चुकीं हैं। यह स्तुत्य कार्य उनके पुत्र श्री परितोष नरेंद्र शर्मा की १६ वर्षों से अधिक समय तक किये गए अथक परिश्रम, समर्पण एवं निस्वार्थ पितृभक्ति से ही संभव हो पाया है। धन भी परितोष ने स्वयं ही एकत्रित कर इस महत्वपूर्ण कार्य में लगाया है।
१/ प्रथम काव्य संग्रह : शूल - फूल सं. १९३४
२/ द्वितीय काव्य संग्रह : कर्ण फूल। सं.१९३६ की सुकोमल युवा कवि ह्रदय की कोमल अभिव्यक्ति से आरम्भ होती हुई भावनाएँ 
३/ तृतीय काव्य संग्रह : प्रभात - फेरी सं. १९३८ स्वाधीनता संग्राम के देशप्रेम से साभार गीतों को संगृहीत किये पुस्तकजिनकी कवितायेँ भारत के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी को अत्यंत प्रिय थीं। स्व. श्री अटल जी ने ख़ास तौर से उल्लेख किया है इन पंक्तियों का ' आओ हथकड़ियां तड़का दूँ , जागो रे नतशिर बंदी ! '
४/ चतुर्थ काव्य संग्रह : " प्रवासी के गीत " सं. १९३९ जिसे साहित्य प्रेमी सुधी पाठकवर्ग ने अत्याधिक सराहा व यह काव्य संग्रह कवि नरेंद्र शर्मा की सभी काव्य पुस्तकों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय सिद्ध हुई है। इसी पुस्तक की एक कविता," आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगें " जैसे विरह कातर ह्रदय को उर्मि तरंगों से उद्वेलित करता हुआ एक सर्वोत्तम विरह गीत आज भी श्रगय पाठकों के मन को बाँध लेने में सक्षम है। कालजयी सिद्ध हुआ है। इस संग्रह में हिन्दी काव्य जगत के शीर्ष प्रेम गीत मौजूद हैं।  तथा अन्य असंख्य लय व छन्द में बंधे सुमधुर गीत हैं। 
५/ पञ्चम काव्य संग्रह
पलाश वन :

६/ षष्ठम काव्य संग्रह :
मिटटी और फूल :
 
७/ सप्तम काव्य संग्रह : लाल निशाँन :
८/ अष्टम काव्य संग्रह : " पलाश वन " सं. १९४३ "
९ / नवम काव्य संग्रह : कामिनी  खण्ड काव्य : स्वतंत्रता सेनानी पंडित नरेंद्र  शर्मा द्वारा ब्रिटिश जेल से लिखी हुई पुस्तक : देवली दीटेंशन जेल राजस्थान व आगरा की ब्रिटीश जेल की सलाखों के पीछे मर्म मधुर " कामिनी " काव्य संग्रह, जेल में दिए गए, पन्नों पर, एक छोटी सी खुली खिड़की से यदा कदा झांकते चंद्रमा के नीचे खिली मधुर गंध लिए पुष्पित कामिनी की तरह, आज भी सजीव है कवि नरेंद्र की कविता के रूप में आज भी महकती हुई !
१०/  दशम काव्य संग्रह : हँसमाला :सं १९४६ 
११ / एकादश  काव्य ग्रन्थ : " रक्त चन्दन " सं.१९४९ महात्मा गाँधी बापू के निर्मम हत्याकाण्ड से व्यथित हो उनके निधन पर लिखी श्रद्धांजलि स्वरूप काव्यांजलि रूपी पुस्तक।  
१२/ द्वादश काव्य संग्रह : अग्निशस्य :सं. १९५० 
इस वर्ष मेरा, लावण्या का भी जन्म हुआ।
१३/ त्रयोदश काव्य संग्रह: कदलीवन :  सं १९५३

(कवि नरेंद्र के विवाहीत जीवन की खुशियाँ समेटे कविता संग्रह )
१४ / चतुर्दश काव्य संग्रह  : द्रौपदी खण्ड काव्य : सं. १९६०
१५/ पञ्चादश  काव्य संग्रह
: प्यासा निर्झर सं. १९६४
१६ / शष्टादश काव्य संग्रह : उत्तर जय : खंड काव्य :'
उत्तर - जय '
जय गाथा ' महाभारत'  की विशाल कथा के अंत में आनेवाला प्रसंग दुर्योधन की मृत्य के पश्चात की कथा है।
१७/ सप्तदश काव्य संग्रह : बहुत रात गये :सं. १९६७
उसी वर्ष
मोहन दास करमचंद गांधी ( जीवनी १९६७ ) 
कथा में महात्मा गाँधी बापू की जीवनी अत्यंत सरल एवं रोचक ढंग से लिखी गई।
१८ / अष्टादश काव्य संग्रह : सुवर्णा : सं. १९७१ : 
सुवर्णा नामक मिथकीय बृहत काव्य है! सुवर्णा एक ऐसा विस्तृत मिथकीय काव्य है कि जिसकी नायिका ' सुवर्णा ' महाभारत के मुख्य पात्र महारथी कर्ण द्वारा, शिविर में बंदी बनाई गयी एक राज कन्या है।  राज कुमारी के पिता महाराज को तथा सुवर्णा के राज्य को पराजित करने के पश्चात ' कर्ण ' इस राजकन्या पर आसक्त हुआ। मगर सुवर्णा ने, पिता के हत्यारे को रोष सहित, तिरस्कृत किया। महाभारत कथा के ग्रन्थ में कुरुक्षेत्र के रण में कौरव शिविर में कर्ण  के शिविर में बंदी बनाकर राखी गई राजकन्या सुवर्णा अन्तत: कर्ण से समय बीत्ततेप्रेम करने लगती है तथा कर्ण के वध के पश्चात्, यही सुवर्णा, विलाप करती हुई कर्ण की चिता में सती हो जाती है ऐसी लोक कथा है ।
' सुवर्णा कथा का बीज या उपज एक  लोक कथा के मूल में है। दक्षिण भारत के एक ग्रन्थ में यह जनश्रुति का रूप लिए लघु बीज रूप में, लोक कथा आती है जिसे पंडित नरेंद्र शर्मा ने अपने दक्षिण भारत के प्रवास में सुनी थी। सुवर्णा की कथा तथा प्रेम में  विरोधाभास लिए यह अलौकिक कथा कवी पंडित नरेंद्र शर्मा के मन मस्तिष्क में कहीं गहरा प्रतिसाद छोड़ कर सुरक्षित रही। धरती में गड़े बीज की भाँति कथा - बीज, प्रस्फुटन की कामना लिए रह तो गया था किन्तु रह रह कर ' सुवर्णा ' का पात्र मुखर होना चाहता था । अतः कुछ समय के अंतराल के पश्चात ' सुवर्णा ' का पात्र एक बृहत काव्य रूप ले कर अवतरित हुआ। सुवर्णा पुस्तकाकार  में सुवर्णा को उभरना था। अतः पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा के कवि मन ने इसे एक  काव्य पुस्तक का रूप दे ही दिया। 
१९ / उन्नीसदाश काव्य पुस्तक : सुवीरा सं. १९७३ कथा काव्य राजमाता सुवीरा के मुख्य पात्र पर केंद्रित है। वे अपने भीरु व कायर राज पुत्र को वीरता का पाठ सीख्लातीं हैं। 

      पंडित नरेंद्र शर्मा जी कवि  रूप से अधिक प्रसिद्ध हैं किन्तु कवि ने कुछ सरस कथाएँ भी रचीं हैं जिन्हें पुस्तक १)  " कड़वी मीठी बातें " व २) ज्वाला परचूनी पुस्तक में  संगृहीत किया गया। उस वक्त इलाहाबाद कहलानेवाला तीन नदियों के पवित्र संगम स्थल पर  शताब्दियों से बसे आज ' प्रयाग राज ' के अपने पुरातन नाम से पुनः पहचाने जानेवाले सांस्कृतिक शहर से उदयीमान कवि नरेंद्र शर्मा ने काव्य रचनाओं का सृजन आरम्भ किया था।
पंडित नरेंद्र शर्मा जी की आरंभिक काल की कविताएँ सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्य के मानदंड सामान " सरस्वती " पत्रिका में तथा पत्रिका  " चाँद " में छपीं थीं। 
सं. १९३४ में वे अभ्युदय पत्रिका के लिए प्रयाग में उपसंपादक पद पर कार्यरत रहे। 
सं. १९३८ से सं १९४० पर्यन्त वे, "अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी"  में, हिन्दी अधिकारी केपर कार्यरत पद रहे। 
सं १९४० से सं. १९४२ इन दो वर्ष की अवधि में नरेंद्र शर्मा ब्रिटीश जेल में स्वतंत्रता सेनानी रहे तथा ब्रिटिश बंदी गृह में कैद रहे यह कवि मानस की अग्नि परिक्षा का काल रहा। देवली डिटेंशन जेल राजस्थान प्रांत तथा आगरा जेल में, कवि नरेंद्र शर्मा जी ने कारावास भोगा।  जहां १४ दिन के अनशन किया जिस में, प्राण गंवाने की घड़ी आते ही, जेल के गोरे अधिकारीयों ने, उन्हें जबरन सूप पिलाकर, हाथ पैर, निर्ममता से बाँध कर नलियों द्वारा मुंह से द्रव्य पिलाकर, देशभक्त नरेंद्र को, जेलरों ने  " एक और शहीद न हो जाए " यह  सोचकर, उन्हें, जीवीत रखा। देवली जेल से लिखी कामिनी पुस्तक से काव्य " बंदी की बैरक " से यह पंक्तियाँ बंदी जीवन अनुभव समेटे हुए है ~
" यहां कँटीले तार और फिऱ खींची चार दीवार
  मरकत  के गुम्बद से लगते हरे पेड़ उस पार " और
" एक और दिन आया प्यारे, यह जीवन दिनमान जैसे 

  हुई सुबह पीलो उड़ आई मेरे पुलकित प्राण जैसे !
  खींचे कँटीले तार सामने, चुभते से से शूल जैसे ! "
          गाँव जहांगीरपुर में नरेंद्र की माता जी गंगादेवी को १ सप्ताह पश्चात पता चला के उनके लाडले इकलौते पुत्र ने अन्न त्याग किया है और आहार छोड़ दिया है! अब देशभक्त बेटा भूखा हो तब माँ कैसी खातीं ? सो, अम्मा जी ने भी १ सप्ताह के लिए अन्न त्याग कर दिया। जेल से बीमार और कमजोरी की हालत में नरेंद्र को मुक्त किया तो वे सीधे गाँव,अपनी स्नेहमयी अम्माँ जी के दर्शन करने, खुर्जा से जहांगीरपुर आ पहुंचे। देशभक्त नरेंद्र शर्मा का, गाँव के लोगों ने मिलकर बन्दनवारों को सजा कर भव्य स्वागत किया।
अम्माँ जी अपने साहसी, देशभक्त पुत्र  नरेन को गले लगा कर रोईं तो गँगा जल समान पवित्र अश्रुकणों ने यातनाभरे ब्रिटिश जेल का सारा अवसाद धो कर स्वच्छ कर दिया। अचानक हिंदी साहित्य जगत के बँधु,श्री भगवती चरण वर्मा जी, उपन्यास “चित्रलेखा” के सुप्रसिद्ध लेखक -  गीतकार नरेंद्र शर्मा की   तलाश में वहाँ आ पहुंचे। भगवती बाबू ने बतलाया कि बॉम्बे टॉकीज़ फिल्म निर्माण संस्था की मालकिन अभिनेत्री, निर्देशिका, निर्मात्री देविका रानी ने आग्रह किया है कि, ” भगवती बाबू अपने संग गीतकार नरेंद्र शर्मा को बंबई ले आएं।"भगवती बाबू का प्रस्ताव सुन, नरेंद्र शर्मा को बड़ा आश्चर्य हुआ।
बंबई जाने का निमंत्रण बॉम्बे ताक़ीज़ संस्था से सामने से आया था। गीतकार नरेंद्र शर्मा के लिए अपनी प्रतिभा दिखलाने का अवसर आया था। हिंदी फिल्म चित्रपटों के लिए गीत लेखन का बुलावा आया था, परन्तु नरेंद्र शर्मा के मन में कुछ संकोच था।  चित्र : श्री भगवती चरण वर्माजी गीतकार नरेंद्र शर्मा के साथ ~

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भगवती बाबू के आग्रह पर, कवि नरेंद्र शर्मा अपने युवा जीवन में अब कुछ नया अनुभव लेने कुछ नया सीखने के इरादे से मायानगरी बंबई के लिए ट्रेन में बैठकर, चल दिए .....
रेलगाडी की छुक छुक की ताल से, ऊंगलियों का ठेका लगाते हुए,
उर्दु भाषा के शब्द लिए एक गीत का मुखडा भी वहीं यात्रा में लिखा ...." अय बादे सबा ....
इठलाती न आ ...मेरा गुंचाए दिल तो टूट गया "
सं १९४३ से सं. १९४६ की अवधि तक " बोम्बे टाकिज फिल्म निर्माण संस्था जिसकी मालकिन निर्मात्री व सिने तारिका तारिका " देविका रानी " थीं। उन की फिल्म निर्माण संस्था ने कवि नरेंद्र शर्मा को गीत व पटकथा लेखन के लिए अनुबंधित कर लिया। :समय था सं १९३४ बॉम्बे टॉकीज़ उस वक्त बंबई कहलानेवाले महानगर के उपनगर मलाडमें स्थित था। इस प्रकार नरेंद्र शर्मा के कवि कर्म में सिनेमा जगत के लिए गीत लेखन का नया अध्याय आरम्भ हुआ।
बॉम्बे टॉकीज़ फिल्म निर्माण संस्था : भारतीय सिने जगत की यशस्वी आधारशिला स्वरूप संस्था थी। इसी संस्था से अनेकानेक मशहूर व गुणी कलाकारों ने अपने कार्य का आरम्भ किया था।

मुख्य फ़िल्में 'अछूत कन्या' (१९३६), 'इज्जत' (१९३७ ), 'सावित्री' (१९३८ ), 'निर्मला' (१९३८ ) आदि।
विशेष योगदान उनके पति हिमांशु राय और देविका रानी ने मिलकर बांबे टॉकीज बैनर की स्थापना की।
सुरैया, राज कपूर , अशोक कुमार, लीला चिटनिस, दिलीप कुमार, मधुबाला, मुमताज़ आदि कलाकार फ़िल्म जगत् को बांबे टाकीज की ही देन हैं। अनिल बिस्वास, संगीतज्ञ, उनकी बहन गायिका पारुल घोष, गीतकार नरेंद्र शर्मा, बांसुरी बादक पन्ना लाल घोष
 देविका रानी चौधरी रोरिच  को सर्व प्रथम भारत रत्न उपाधि से अलंकृत भारतीय होने का गौरव प्राप्त है। 
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देविका रानी चौधरी रोरिच  
~
( क्लीक करें नाम पर )

(जन्म- ३०  मार्च,  सं. १९०८  विशाखापत्तनम -

मृत्यु- ९  मार्च, सं. १९९४  बैंगलोर में )
देविका रानी के पिता कर्नल मन्मथ नाथ (एम.एन.) चौधरी,

ब्रिटिश राज्य काल के प्रथम भारतीय नस्ल के सर्जन जनरल थे

और रवींद्र नाथ टैगौर की बहन, सुकुमारी देवी के पुत्र थे।

  देविका रानी की माँ  श्रीमती लीला चौधरी इंदुमती चौधरी,

सौदामिनी गंगोपाध्याय जी भी रवीन्द्रनाथ टैगौर की बहन थीं।

इस नाते, रवींद्र नाथ टैगौर दोनों संबंधों से
देविका रानी  के प

दादा थे।
देविका रानी का जन्म-सं १९०८,  ३०  मार्च,   विशाखापत्तनम के वॉल्टेर नामक शहर में हुआ। मृत्यु- ९  मार्च, सं १९९४  बैंगलोर में। देविका रानी, भारतीय रजतपट की पहली स्थापित नायिका हैं। वे  अपने युग से कहीं आगे की सोच रखने वाली अभिनेत्री थीं।  उन्होंने अपनी फ़िल्मों के माध्यम से, जर्जर सामाजिक रूढ़ियों और मान्यताओं को चुनौती देते हुए,
नए मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को स्थापित करने का काम किया था।
देविका रानी कवि शिरोमणि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के परिवार से थीं।  टैगौर देविका रानी के परदादा थे।
९ वर्ष की देविका को इंग्लैंड उच्च शिक्षा के लिए भेज दिया गया। युवा होते ही देविका ने सं. १९२० में, रॉयल एकेडमी ऑफ़ ड्रामेटिक आर्ट्स संस्था से कला,
स्थापत्य शास्त्र, कपड़ा निर्माण, साज सज्जा जैसे विषय ले देविका स्नातक हुईं।
एलिज़ाबेथ आर्डन सुप्रसिद्ध सौंदर्य प्रसाधन निर्माण की वैश्विक संस्था में जी शिक्षा ली। सं. १९२७ तक देविका इन विविध विषयों की शिक्षा लेतीं रहीं।
सं. १९२८ में हिमांशु राय जो बैरिस्टर जो फिल्म " थ्रो ऑफ़ डाइस " के निर्माता थे उन से मुलाक़ात हुई। देविका रानी ने फिल्म निर्माण में हिमांशु राय का साथ दिया। दोनों जर्मनी गए। बर्लिन शहर में जी. डब्ल्यू पैबस्ट तथा फ़्रिट्ज़ लेंग नामक प्रसिद्ध निर्माताओं से मिलने पर उन्हें फिल्म निर्माण की तकनीकी जानकारी व ज्ञान में इजाफा हुआ। हिमांशु राय देविका रानी एक नाटक में साथ काम किया जिसे स्वीटज़रलैंड तथा स्केंडिनेविया जैसे मुल्कों में भी अपार ख्याति मिली। अब देविका रानी व हिमांशु राय ने विवाह कर लिया। सं १९३३ में फिल्म ' कर्मा ' प्रथम इंग्लैण्ड में निर्मित भारतीय निर्माता की फिल्म थी जिसे भारतीय, जर्मन व इंग्लैण्ड के साझा सहकार से निर्मित किया गया था।
फिल्म कर्मा से देविका रानी ने नायिका तथा अंग्रेज़ी व् हिंदी गीत की गायिका के रूप में अपनी कारकिर्दी शुरू की थी। फिल्म ' कर्मा ' को हिंदी भाषा में इस नाम से '  नागिन की रागिनी '  परदे पर उतारा गया। किन्तु फिल्म विदेश में सफल रहते हुए भी भारत में असफल रही।
बी. बी. सी. ब्रिटिश प्रसारण सेवा ने देविका रानी को विशिष्ट प्रसारण कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया।  यह लिंक है  देविका रानी का अनजान फिल्म का गीत गाते हुए ~~ https://www.youtube.com/watch?v=fPzGFWNYZs4

सं १९३४ में हिमांशु राय ने " बॉम्बे टाकीज़ फिल्म निर्माण संस्था को  बंबई में
स्थापित किया। संस्था के फिल्म निर्माण स्टूडियो उस वक्त समस्त भारत में तकनीकी उपकरणों से लैस ऐस  सर्वश्रेष्ठ  संस्था थी । बंगाली निरंजन पाल पटकथा लेखक  व फ्रांज़ ऑस्टीन छायांकन विशेषज्ञ भीअनुबंधित किये गए। 
Bombay Talkies" बॉम्बे टाकीज़"- संस्था की प्रथम फिल्म ' जवानी की हवा ' का छायांकन ट्रेन में हुआ था फिल्म में देविका रानी के साथ नज़्म उल हक्क नायक थे।संस्था की दुसरी फिल्म ' जीवन नैया ' दोनों को लेकर बनी।
शीषक के अनुरूप असल जीवन में यह फिल्म जीवन नैया हिमांशु राय व देविका रानी के जीवन मंझधार में हिचकोले लेती हुई आयी थी। क्योंकि फिल्मआधी बनी थी तब देविका रानी  अपने फिल्म के नायक नज़्म उल हक्क के संग कलकत्ता भाग गयीं। 
बॉम्बे टाकीज़ में कार्यरत शशधर मुखर्जी ( नायिका काजोल के दादा जी ) स्वर संधान के सहकारी कर्मचारी के पद पर कार्यरत थे। देविका व शशधर दोनों बंगाली भाषी होने से, शशधर के समझाने बुझाने  पर देविका रानी किसी तरह पुनः बंबई हिमांशु राय के घर लौटीं परन्तु दोनों के सम्बन्ध अब ,मात्र औपचारिक रह गए थे। देविका रानी की अन उपस्थिति से बॉम्बे टाकीज़ संस्था की फ़िल्में रुक गईं थीं और  लेनदारों से पैसे उधार लेने के कारण,  संस्था को भारी नुक्सान भी हुआ था। आखिरकार अशोक कुमार को नायक बनाकर फिल्म जीवन नैया को जैसे तैसे पूरा कर, प्रदर्शित किया गया। उसके बाद सं १९३६ में बनी फिल्म " अछूत कन्या" नायक  अशोक कुमार के साथ बनी। सं १९३७ में फिल्म जीवन प्रभात में फिर दोनों की जोड़ी परदे पर लाई गयी।  आगे अशोक कुमार के साथ देविका रानी ने कुल १० फिल्मों में काम किया। सं १९३७ में फिल्म ' इज़्ज़त'  आई। सं १९३८ में २ फ़िल्में  ' निर्मला ' व ' वचन आयी। सं १९३९  में फिल्म ' दुर्गा ' बनी। सं. १९४०म  में हिमांशु राय का निधन हुआ।
सं १९४१ में शशधर मुखर्जी का सहकार लेकर फिल्म ' अनजान '  नायक अशोक कुमार के साथ बनी। सं १९३४ में निर्मित फिल्मों ' बसंत ' व 'किस्मत '
को सफलता हासिल हुई। देविका रानी की नायिका रूप में अंतिम फिल्म थी
सं. १९४३ में निर्मित फिल्म " हमारी बात " ! " हमारी बात" युवा कवि नरेंद्र शर्मा के गीतों से सजी उनकी कारकिर्दी के आरम्भ की प्रथम फिल्म थी। राज कपूर साहब ने फिल्म हमारी बात के लिए एक लघु पात्र में अभिनय किया था।
( श्री राज कपूर ने १९३० में इसी बोम्बे टोकीज़ में क्लप्पेर बॉय तथा सहायक के काम से फिल्मी कारकीर्दी की शुरुआत की थी और सुरैया ने भी बाल कलाकार के रूप में, यहीं काम किया था )

सं. १९४४ में एक नवोदित कलाकार दिलीप कुमार को लेकर फिल्म " ज्वार - भाटा" का निर्माण हुआ जिस के सभी गीत नरेंद्र शर्मा जी ने लिखे थे। युसूफ खान को यह नाम दिलीप कुमार नरेंद्र शर्मा ने ही सुझाया था।  ३ मनाम चुने गए थे १) जहांगीर २) वासुदेव ३) दिलीप कुमार  ! ज्योतिष शसस्त्र के अच्छी जानकार नरेंद्र शर्मा ने आग्रह किया कि दिलीप कुमार नाम से कारकिर्दी शुरू कीजिए तब अपार सफलता हासिल होगी ! तुम्हारे नाम का डंका बजेगा ! समय साक्षी है इस भविष्यवाणी का और यह नरेंद्र शर्मा जी की कल कही बात, आज सौ /  १०० प्रतिशत सच निकली है यह हम सब जानते और मानते हैं।
Bombay Talkies :

 देविका ने दस वर्ष के अपने फ़िल्मी कैरियर में कुल १५  फ़िल्मों में ही काम किया।  लेकिन उनकी हर फ़िल्म को क्लासिक का दर्जा हासिल है। विषय की गहराई और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी उनकी फ़िल्मों ने अंतरराष्ट्रीय और भारतीय फ़िल्म जगत् में नए मूल्य और मानदंड स्थापित किए। देविका रानी को ' सत्यम शिवम् सुंदरम को चरितार्थ करनेवालीं दूरद्रष्टा सफल नारी के दृष्टांत से भारत ही नहीं विश्व भर में मान्यता प्राप्त हुई।  देविका रानी हिंदी फ़िल्मों की पहली ' स्वप्न सुंदरी' कहलाईं और ' पटरानी ' का विशेषण भी मिला। ' ड्रैगन लेडी '  जैसे विशेषणों से भी अलंकृत हुईं। देविका को उनकी ख़ूबसूरती, शालीनता तथा  धाराप्रवाह अंग्रेज़ी सम्भाषण के लिए आज भी याद किया जाता है।  अभिनय कौशल के लिए देविका रानी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितनी लोकप्रियता और सराहना मिली उतनी कम ही अभिनेत्रियों को नसीब हो पाती है।
आगे चलकर देविका रानी ने रशियन चित्रकार रोरिच से विवाह किया।








 

दक्षिण भारत के कर्नाटक प्रांत में ४५० एकड़ फैले विशाल

टाटागुनी एस्टेट
में देविका रानी व रोरिच मृत्यु पर्यन्त रहे। 

अब आप समझे ये कनेक्शन ? कई वर्षों पश्चात हिंदी सिनेमा

जगत के " ग्रेटेस्ट शो मेन " कहलानेवाले सुप्रसिद्ध निर्माता,

निर्देशक, नायक, श्री राज कापूरजी ने " सत्यम शिवम् सुंदरम "

शीषक से फिल्म बनाई। उन की फिल्म उक्त फिल्म का शीर्षक

गीत भी तब राज साब ने पं. नरेंद्र शर्मा से ही लिखवाया। 

भी इसी शीर्षक से बनी थी ? 
उस के लिए गीत लेखन किया था।
सं १९४० में, देविका रानी जी के पति श्री हीमान्शु रोय का देहांत हो गया और देविका रानी को, सहायता थी अच्छे कार्यकर्ताओं की! ताकि, वे, कम्पनी का कार्य, फिल्म निर्माण जारी रख सकें। इसी हेतु से,लेख़क और कवि श्री भगवती चरण वर्मा ने कवि नरेंद्र को भी आमंत्रित किया के ' बंधू, आप भी मेरे संग, बंबई चलिए 'इस प्रकार नरेंद्र शर्मा का उत्तर प्रदेश से बंबई की मायानगरी में आना हुआ था। 
     गीतकार  नरेंद्र शर्मा ने, देवानंद , चेतनानन्द की नई फिल्म कम्पनी " नव केतन " द्वारा निर्मित फिल्म आँधियाँ के   गीत लिखे जिसे संगीतज्ञ अली अकबर खां ने संगीतबद्ध किये थे। 
भारतीय सुर - संगीत के महागुरु,  बाबा अल्लाउद्दीन खां के अली अकबर खां सुपुत्र हैं। सगीत विशारद संतूर विशेषज्ञ अन्नपूर्णा जी, अली अकबर खां की बहन हैं और सुप्रसिद्ध सितार वादक श्री रविशंकर जी बाबा अल्लाउद्दीनन के शिष्य रहे।  
स्व. सुधीर फडके और पापा -- दूरदर्शन पर एक साथ देखिये --

फ्रॉम भाभी की चूडियाँ -- मेरा सबसे प्रिय गीत भी सुन लीजिये

सं. १९५१ में बनी फिल्म ' मालती माधव' चित्रपट की पटकथा नरेंद्र शर्मा ने लिखी। उसी फिल्म का यह कर्णप्रिय गीत  
" बाँध प्रीति फूल डोर, मन लेके चित्त चोर, दूर जाना ना,"
का यह गीत संगीतकार श्री सुधीर फडकेजी  और स्वर साम्रागी पूज्य लता मंगेशकर जी ने अत्यंत मनमोहक स्वरों से सजाया है~
असंख्य फिल्मी गीत लिखे जिन्हें स्वर कोकीला सुश्री सुब्बलक्ष्मी जी,स्वर साम्राग्नी लता मंगेशकर जी, बंगाल की सुमधुर बुलबुल सुश्री पारुल घोष, सुप्रसिध्ध बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष की पत्नी तथा फिल्म संगीत के भीष पितामह अनिल बिस्वास जी की बहन थीं। संगीतज्ञ श्री अनिल बिस्वास जी ने गायक तलत महमूद तथा मुकेश जी को पहली बार अपने स्वर संयोजन में गीत गवाकर सिने संसार में प्रसिध्धि दिलवाई थी। और आदरणीया लता जी तो यह भी कहतीं हैं के उन्हें सांस पर कंट्रोल करना अनिल दा ने ही सिखलाया था !
संगीतकार श्री अनिल दा और नरेंद्र शर्मा के गीत संगीत से सजी फिल्म " ज्यार - भाटा " में एक नया चेहरा बतौर नायक पेश किया गया जिनका नामकरण भी नरेंद्र शर्मा ने किया था और वह थे युसूफ खान !! जिन्हें हम आज दिलीप कुमार के मशहूर नाम से पहचानते हैं !
 अन्य सभी श्रेष्ठ गायिकाएँ व गायकों ने नरेंद्र शर्मा के लिखे गीतों का अपना स्वर दिया है। हमारी लाडली, श्री आशा ताई भोंसले जी, श्री मन्ना डे बाबू, श्री हेमंत कुमार, श्री मुकेश चन्द्र माथुर से लेकर सुरेश वाडकर तक के गायकों ने पण्डित नरेद्र शर्मा रचित गीतों को गाया है। सुरीली गायिका सुरैया जी का गाया तथा गीतकार नरेंद्र शर्मा का लिखा यह गीत सुनिए
http://www.downmelodylane.com/suraiyya.html

" नैना दीवाने एक नहीं माने, करे मन मानी, माने ना ! "
इसके अलावा आकाशवाणी के सुगम संगीत के लिए कई ख्यात नाम गायकों ने भी आगे गीतकार नरेंद्र शर्मा रचित गीत गाये।
 जैसे अनिल दा की पत्नी मीना कपूर जी ने यह गीत गाया था
" चौमुख दीवला बाट धरूंगी, चौबारे पे आज,
   जाने कौन दिसा से आयें, मेरे राज कुमार "
( ये गीत आकाशवाणी रेडियो सेवा से अकसर बजता था )
छाया गांगुली ने गाया " मेरी माटी की कुटिया में राम राज करे "
मीना कपूर जी की आवाज़ सुनिए - फिल्म है परदेसी --
संगीत अनिल दा का और नायिका नर्गिस दत्त
सं १९४९ में युवावस्था में नरेंद्र शर्मा एक बार काशी गए थे। 
वहां वैराग्य की प्रबल भावना जगी जिसे एक संत के यह कहने पर कि " अभी तुम्हे कई महत्त्वपूर्ण कार्य करने हैं। अत: संसार त्याग की बात मन से निकाल दो " युवक  नरेंद्र शर्मा  ने इसे ईश्वरीय संकेत व आदेश समझ कर संत की कही बात मान ली।

सं. १९४६ से सं. १९५३ तक कवि नरेंद्र शर्मा ने स्वतन्त्र लेखन किया। सं. १९५३ से सं. १९७१ तक  नरेंद्र शर्मा आकाशवाणी के मुख्य प्रबंधक, निर्देशक के पद पर रहते हुए, कार्य करते रहे।           मेरे अनुज परितोष ने स्वयं, देहली के प्रकाशकों से, आकाशवाणी स्टाफ से, दूर दर्शन से, इप्टा तथा रवि शंकर जी तथा उदय शंकर जी के सबसे छोटे भाई सचिन शंकर जी से, जिनकी नृत्य नाटिका के लिए पंडित नरेंद्र शर्मा जी ने कई पटकथाएं लिखीं थीं। 
१ -
मछेरा और जलपरी
:  जिसका संगीत सलिल चौधरी जी ने दिया है।  गीत पंडित नरेंद्र शर्मा जी जी के थे और अन्य २ और नाटिकाएँ भी थीं इनके नाम भूल रही हूँ!

-विविधभारती प्रसारण सेवा के लिए असंख्य रूपक भी पंडित नरेंद्र शर्मा जी ने लिखे थे।
विविधभारती प्रसारण सेवा से जुड़े जनाब 
रि‍फत सरोश जी के शब्दोँ मेँ आगे की कथा सुनिये .." नरेन्द्र जी हमारे हिन्दी विभाग के कार्यक्रमोँ मेँ स्वेच्छा से आने लगे - एक बार नरेन्द्र जी ने एक रुपक लिखा " चाँद मेरा साथी " उन्होँने चाँद के बारे मेँ अपनी कई कवितायेँ जो विभिन्न मूड की थीँ, एक रुपक लडी मेँ इस प्रकार पिरोई थी कि मनुष्य की मनोस्थिति सामने आ जाती थी।  वह सूत्र रुपक की जान था ! मुझे रुपक रचने का यह विचित्र ढँग बहुत पसँद आया और आगे इस का प्रयोग भी किया।
       मैँ बम्बई रेडियो पर हिन्दी विभाग मेँ स्टाफ आर्टिस्ट था और अब्दुल गनी फारुकी प्रोग्राम असिस्टेँट ! फारुकी साहब नरेन्द्र जी से किसी प्रोग्राम के लिये कहते,
वे फौरन आमादा हो जाते !
आते, और अपनी मुलायम मुस्कुराहट और शान्त भाव से हम सब का मन मोह लेते ! आकाशवाणी की रंगारंग सेवा विविध भारती का शुभारम्भ हुआ। सर्व  प्रथम प्रसार - गीत, जो रेडियो से बजा
" नाच रे मयूरा
खोल कर
सहस्त्र नयन,
देख सघन गगन मगन
देख सरस स्वप्न
जो के आज हुआ पूरा,
नाच रे मयूरा "
श्री मन्ना डे के स्वर में गूंजा इसी गीत से AIR / ए. आई. आर. रेडियो प्रसारण सेवा विविध भारती का श्री गणेश हुआ !

इस समस्त लेखन के अलावा  पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा जी के निजी कागजातों से छांट कर,४० पुस्तक तैयार हों उतनी सामग्री, एकत्रित हुई है। प्रचुर साहित्यिक सामग्री को सुव्यवस्थित ढंग से संपादित करने के बाद, १६ खण्डों में पण्डित नरेंद्र शर्मा : सम्पूर्ण रचनावली : उनके पुत्र श्री परितोष नरेंद्र शर्मा के १८  वर्षों के अथक परिश्रम से साहित्यकार की साधना स्वरूप नरेंद्र शर्मा समग्र रचनावली तैयार हुई  है प्रकाशित हो चुकी है तथा भारत की विभिन्न संस्थाओं विश्व विद्यालयों के पुस्तकालयों में पहुँच चुकी हैं। 
मेरे अनुज परितोष ने आभार तथा प्राक्कथन  लिखा है।
परितोष को अम्मा और पापा जी के पत्र भी मिलें हैं।
उसका काहना है के वे अद्`भुत हैं !!
अम्मा, पापा जी, पिछले जन्म के कर्म पूरे करने इस जन्म में आकर मिले थे। दोनों की पवित्र आत्माएं, घुलमिल गयीं थीं।
ऐसे पवित्र माता और पिता की संतान हिवा मेरे इस छोटे से जीवन का परम सौभाग्य है मैं ऐसा मानती हूँ। बड़े होते हुए
मैंने उन्हें कभी ऊंची आवाज़ में घर में बोलते सुना नहीं !
पापा जी बेहद संवेदनशील, दुसरे की भावनाओं की क़द्र करनेवाले और उन्हें आदर देनेवाले,परम दयालु, परोपकारी, सांसारिक बंधनों से निर्लिप्त, कँवल की तरह, निर्लिप्त
विश्व की हर गंदगी से बहुत ऊपर खिले रहकर एकमात्र  ईश्वर में अपनी चेतना को पिरोये, सादा तथा सात्विक जीवन जीनेवाले महापुर्ष, परम योगी एवं एक संत कवि थे। और मेरी अम्मा उन्हीं की प्रतिछाया सी थीं! मानों वे दोनों अमर युगल वसिष्ठ अरुंधती थे ! - आजके आधुनिक युग के ! मेरी अम्माँ कहानियाँ भी बहुत सुन्दर लिखतीं थीं और प्रसिद्ध पत्रिकाएं नवनीत तथा धर्मयुग में छपीं भी उनकी कहानियां ! पर चित्रकला में अम्मा की रूचि ज्यादा रही और घर की देखभाल, हम बच्चों की स्नेह मिश्रित अनुशाशन से परवरीश, पाक कला में साक्षात अन्नपूर्णा सी --
जिस की कुटिया में पधारे हर अतिथि के लिए दिन के समय अनुसार भोजन, चाय, नारियल का ताज़ा शीतल जल, नीम्बू शरबत, नाश्ता, शाकाहारी~  सुस्वादु भोजन हमेशा सुलभ रहता था। - ये करना कितना कठिन होगा. ! ... जब् यूं समझिये ,
ये घर भी हमारे सुदामा के घर जैसा घर था। घर भी कैसा ? तो कहूं के , ' आश्रम जैसा ' - शांति और सात्विक पवित्रता से भरा - भरा ! मंद अगरबतीयों की महक और अम्मा की बगिया के सुगंधी पुष्पों से सजा हुआ ! इतनी शांति रहती थी की हर आगंतुक कुछ पल के लिए, यहां प्रवेश करते ही, मानसिक व शारीरिक विश्राम पा लेता था। 
हमारे अम्माँ पापा जी के घर का नंबर था -- ५९४ !
१९ वे रास्ते खार उपनगर में बसा यह  घर जिस का वातावरण ऐसा सात्विक था उस का कारण मेरी अम्मा का अथक परिश्रम तथा एक कुशल गृहिणी का न्याययुक्त उदार मना शासन था।
पापा जी तो हमारे, भोले भंडारी थे! उनकी पुस्तकें, उनके मित्र, साहित्य, कला जगत, सुबह में चाय और अखबार, सादा भोजन -
यही, सब उन्हें प्रिय था!
मेरे कोटि शत  कोटि प्रणाम करते हुए अब आज्ञा ~~
~~ लावण्या

Thursday, May 2, 2019

बचपन के दिन भी क्या दिन थेः लावण्या शाह






बचपन के दिन भी क्या दिन थेः लावण्या शाह

बचपन के दिन भी क्या दिन थे ! जी हाँ, बचपन ! इंसान के जीवन का सबसे सुकोमल हिस्सा ! आहा शैशव का वह निर्दोष आनंद भूलाये नहीं भूलता !
मेरी जीवन यात्रा के ऐसे पड़ाव हैं कि जिन्हेँ, मैं, दशकों में बँटा देखती हूँ।
आज उन स्मृतियों का स्मरण करते हुए ऐसा महसूस हो रहा है कि मेरे बचपन की स्मृतियाँ अत्यंत पवित्र और सुकोमल हैं। मानो, मंद्र मंद्र जलता, मंदिर का दीपक हो ! आज यह मेरा चित्र (तीन वर्ष की आयु में लिया हुआ) साझा करते हुए आश्चर्य मिश्रित हर्ष मन में उमड़ घुमड़ रहा है। चित्र अवश्य ही मेरी अम्माँ सुशीला जी ने बड़े प्यार से खिंचवाया होगा। सिल्क टॉफेटा के कपड़े की सिली फ्रॉक पे अम्माँ की सुँदर कसीदाकारी है। मेरे गले में असली मूँगे के मोतियों की माला सजी हुई है। मेरे केश सेटीन की रीबन से बंधे हुए हैं। हाथ में जो घड़ी उठाये हुए हूँ उस की सुईयां ३ के अंक पर स्थित हैं और मेरी तीन नन्ही उँगलियाँ भी उठी हुई हैं। यह मेरी कलाकार अम्माँ के निर्देशन में, सदा के लिए इस सीपिया रँग की आभा लिए चित्र में कैद हो गया है। चित्र  मेरे मधुर बचपन को उजागर कर रहा है।
        मेरा जन्म हुआ था भारत के पश्चिम छोर पर अरब समुद्र की उत्ताल तरंगों से सदा वेष्टित रहते महानगर बम्बई शहर में ! पहले बंबई के नाम से मशहूर इस शहर को उपनगरों में विभाजित किया गया है। शिवाजी पार्क, ‘ माटुँगा उपनगर’ में स्थित सार्वजनिक उद्यान ‘ शिवाजी पार्क ‘ इलाके से बस ७ मिनट के फासले पर एक पहले मंजिल पे आये फ़्लैट में, मेरे पापाजी, पण्डित नरेंद्र शर्मा , सुविख्यात कवि, गीतकार, अपनी धर्मपत्नी सुशीला जी के संग रहते थे। शर्मा दम्पति का विवाह सं. १९४७ में हुआ था। विवाहोपरांत उन के संग, हिंदी साहित्य के जगमगाते नक्षत्र, श्रद्धेय सुमित्रानंदन पंत जी भी कई वर्ष इलाहाबाद से बंबई आकर उसी फ़्लैट में रहे थे।
बंबई के उपनगर माटुंगा के तैकलवाड़ी इलाके से आगे चलो तो अगला उपनगर आता है ‘ दादर ‘ ! इस दादर के दिवाकर अस्पताल मेँ मेरा जन्म सं. १९५० में हुआ।
मुझसे बड़ी वासवी का जन्म सं. १९४८ में तब तक हो चुका था । हम दोनों बहनों को पास ही के एक ‘ शिशुविहार ‘ किण्डरगार्डन स्कूल में भेजा गया।
मेरी उम्र ४, ५ वर्ष की हुई होगी तब तक मुझसे छोटी बाँधवी का जन्म
सं. १९५३ में हुआ। सं. १९५५ में हमारा भाई परितोष भी आ गया तो परिवार मानों संतोष से भर गया। तब तक पापाजी अम्माँ ने अपने निजी आवास में बसने के इरादे से मुम्बई के एक ' खार' नामक  उपनगर में हमारे अपने बंगलो में स्थानांतरण किया ।
मेरे पूज्य पिता जी हिन्दी के प्रसिद्ध गीतकार आकाशवाणी के प्रोड्यूसर-डायरेक्टर पण्डित नरेन्द्र शर्मा थे  और अम्माँ गुजरात प्रांत की सुशील कन्या सुशीला ! वे चित्रकार थीं। उनकी शीतल, सुखद छाया मेँ बचपन मानों तितलियों से बातें करते हुए, फूलों के सँग सँग खेलते हुए, सुमधुर स्वप्न सा बीता। आज पुराने दिनों को याद करते हुए, सुदर्शन फ़ाकिर की ग़ज़ल
"वो काग़ज़ की क़श्ती, वो बारिश का पानी " को बहुत याद कर रही हूं।
        
हमारे परिवार के “ज्योति -कलश” हैं मेरे पापा और फिल्म “भाभी की चूडीयाँ” फिल्म के गीत मेँ, “ज्योति कलश छलके” शब्द भी उन्हीँ के लिखे हुए हैँ।  स्वर साम्राज्ञी लता दीदी ने भूपाली राग मेँ इस  अमर गीत को अपना सुमधुर स्वर दे कर फिल्म ~ सँगीत मेँ, शुध्ध हिंदी शब्दों का सौंदर्य समाहित किये हुए, इस गीत को गा कर स्वर्णिम साहित्य का चमकीला पृष्ठ ही मानों हिंदी सिनेमा जगत के इतिहास में जोड दिया है !
हमारे परिवार के सूर्य हैं मेरे पापाजी ! पूज्य पापाजी के उज्जवल व्यक्तित्व से हमेँ,  ज्ञान, भारतीय वाँग्मय, साहित्य, कला, सँगीत, कविता तथा शिष्टाचार के साथ, इन्सानियत का बोध पाठ भी सहजता से मिलता गया । यह उन के व्यक्तित्त्व का प्रचण्ड सूर्य ही है जिस के प्रभामँडल से विकीर्ण हुईं ओजस्वी किरणों से “ज्योति कलश” की भाँति, उर्जा स्त्रोत, हमेँ सदैव  सीँचता रहा है ।
मेरे पापा जी उत्तर भारत, खुर्जा, जिल्ला बुलँद शहर के जहाँगीरपुर गाँव के पटवारी घराने मेँ जन्मे थे। उनकी प्राँरभिक शिक्षा खुर्जा मेँ हुई। ईल्हाबाद विश्वविध्यालय से अँग्रेजी साहित्य मेँ एम. ए. कर, वे विविध प्रकार की साहित्यिक गतिविधियोँ से जुडे रहे। आनंद भवन इलाहाबाद में कोँग्रेस के हिंदी अधिकारी के पद पर कार्य किया। साथ साथ कांग्रेस अध्यक्ष, पँडित जवाहरलाल नेहरु के कार्यालय में, उनके निजी सचिव के पद पर भी कार्य करते रहे।
जैसा यहाँ सुप्रसिध्ध लेखक मेरे चाचा जी श्री अमृत लाल नागर जी लिखते हैँ,"अपने छात्र जीवन मेँ ही कुछ पैसे कमाने के लिये नरेन्द्र जी कुछ दिनोँ तक "भारत" के सँपादीय विभाग मेँ काम करते थे। शायद "अभ्युदय" के सँपादीकय विभाग मेँ भी उन्होने काम किया था। M.A पास कर चुकने के बाद
वह अकेले भारतीय काँग्रेस कमिटी के दफ्तर मेँ भी हिन्दी अधिकारी के रुप मेँ काम करने लगे। उस समय जनता राज मेँ राज्यपाल रह चुकनेवाले श्री सादिक अली जी का संस्मरण : लिंक : http://antarman-antarman.blogspot.com/2006/12/some-flash-back.html

भारत के दूसरे या तीसरे सूचना मँत्री के रुप मेँ काम कर चुकनेवाले 

स्व. बालकृष्ण केसकर भी उनके साथ काम करते थे। एक बार मैँने उन दिनोँ का एक फोटोग्राफ भी बँधु के यहाँ देखा था।

वहीँ से २ साल के लिये, वाइसरॉय के डिरेक्ट ऑर्डिनेंस के तहत, बिना मुकदमे या किसी प्रकार की अपील को निषेध करते हुए, युवक  नरेंद्र शर्मा को, स्वतंत्रता सेनानी होने की सज़ा देते हुए ब्रिटिश हुकूमत द्वारा कारावास में कैद कर लिया गया।
राजस्थान एवं देवली डिटेंशन कैंप की  ब्रिटिश जेलों  मेँ नरेंद्र शर्मा कैद रहे। वहाँ इसी बीच स्वतंत्रता सेनानी नरेंद्र शर्मा ने भूख हडताल करने का निश्चय किया । १४ दिनो तक नरेंद्र शर्मा ने आमरण अनशन किया था।
उनके अँगरेज़ अफसरों ने सोचा कि, ” एक और देशप्रेमी कहीं उनकी जेल में शहीद न हो जाए ” अतः उन्हें पकड़ कर, जबरदस्ती सूप पिलाकर,  १४ दिन पश्चात ज़िंदा रखा गया। फिऱ एक  माह पहले उन्हें नजरबँद करते हुए, रिहा कर दिया गया।
छूट कर जब बाहर आये तो अत्याधिक कमज़ोरी की वजह से वे बीमार हो गए। रिहा किए गए थे अतः अपने घर, गाँव जहाँगीरपुर, मेरी दादीजी पूज्य गँगादेवी जी  से मिलने चले गए। बँदनवारोँ को सजा कर,गाँव भर के लोगों ने देशभक्त कवि नरेन्द्र का हर्षोल्ल्लास सहित स्वागत किया। गाँव जहांगीरपुर पहुँचने पर उन्हें यह बतलाया गया कि, ' आपके अनशन की चिठ्ठी एक  सप्ताह के बाद अम्माँजी को पहुँची थी तब से आपकी अम्माँ जी गँगादेवी जी ने भी एक  सप्ताह पर्यन्त अन्न त्याग किया था।'
      
अम्माँ जी अपने साहसी, देशभक्त पुत्र  नरेन को गले लगा कर रोईं तो गँगा जल समान पवित्र अश्रुकणों ने यातनाभरे ब्रिटिश जेल का सारा अवसाद धो कर स्वच्छ कर दिया। अचानक हिंदी साहित्य जगत के एक बँधु,
श्री भगवती चरण वर्मा जी, उपन्यास “चित्रलेखा” के सुप्रसिद्ध लेखक -  गीतकार नरेंद्र शर्मा को  तलाशते हुए वहाँ आ पहुंचे।
भगवती बाबू ने बतलाया कि बॉम्बे टॉकीज़ फिल्म निर्माण संस्था की मालकिन अभिनेत्री, निर्देशिका, निर्मात्री देविका रानी ने आग्रह किया है कि, ” भगवती बाबू अपने संग गीतकार नरेंद्र शर्मा को बंबई ले आएं।”
चित्र : भारत सरकार द्वारा अभिनेत्री सुश्री देविका रानी जी की छवि लिए डाक टिकट~
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भगवती बाबू का प्रस्ताव सुनकर,  नरेंद्र शर्मा को बड़ा आश्चर्य हुआ।
बंबई जाने का निमंत्रण सामने से आया था हिंदी फिल्म चित्रपट के लिए गीत लेखन का बुलावा आया था परन्तु मन में संकोच था। 
चित्र : श्री भगवती चरण वर्माजी गीतकार नरेंद्र शर्मा के साथ ~
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तब नरेंद्र शर्मा ने भगवती बाबू से कहा, ’ भगवती बाबू आप मुझे लिवाने आये हैं आपका स्वागत है किन्तु मुझे फिल्मों के लिए गीत लेखन का अभ्यास नहीं ! मैं भला यह  काम कैसे कर पाऊंगा ? ‘
मित्र ने आश्वासन देते हुए कहा,’ बँधुवर मुझे पूरा विशवास है तुम यह काम आसानी से कर लोगे अब तुम हमारे संग बंबई चलो ! ”
तब नरेंद्र शर्मा के जीवन में एक नया मोड़ आया। गँगा – यमुना के दोहरे जल से सेवित, उत्तर प्रदेश से युवा कवि, अब खारे जल से सिंचित अरब सागर के किनारे बसी महानगरी बंबई के लिए रवाना हुआ। उत्तर भारत से रेलगाड़ी पश्चिम दिशा में चलने लगी।  उस छुक छुक चलती रेलवे के संग कवि मन में एक गीत उभरा ~
‘ अय बादे सबा इठलाती न आ मेरा गुंचा ए दिल तो सूख गया ‘
मेरे प्यासे लबों को छूए बिना पैमाना खुशी का टूट गया ” ~~
सं १९४३ में फिल्म 'हमारी बात' में, अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में उनकी बहन पारुल घोष ने, नरेंद्र शर्मा रचित इस गीत को तैयार किया।
लिंक : https://www.youtube.com/watch?v=qg6SyIIIDbI
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नरेंद्र शर्मा के बंबई आगमन पर ” बॉम्बे टाकीज़ फिल्म निर्माण संस्था ” ने गीतकार के रूप में उन्हें अनुबंधित किया। उसके बाद कई फिल्मों में वे,  लगातार गीतलेखन करते रहे और एक सफल गीतकार के रुप मेँ, नरेंद्र शर्मा को अच्छी ख्याति मिली। उससे भी अधिक ज्योतीषी के रुप मेँ भी उन्होँने वहाँ बंबई में खूब प्रतिष्ठा पायी।
चित्र : बॉम्बे टॉकीज़ संस्था में नरेंद्र शर्मा:
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उस वक्त की बंबई कहलानेवाली महानगरी में भारतीय सेन्ट्रल रेलवे विभाग में, चीफ़ वैगन एन्ड कैरेज इन्स्पेक्टर के ओहदे पर, ब्रिटिश राज के समय से कार्यरत, उच्च अधिकारी,  मेरे नानाजी श्री गुलाबदास गोदीवाला जी थे। उनका भरापूरा  परिवार था जो  भारत के विभिन्न नगरों में रहने के बाद अब बंबई में स्थायी रूप से रहने लगा था।
      
गोदीवाला परिवार में ३ पुत्र व ३ पुत्रियां थीं। नानी जी ' कपिला बा ' थीं। गोदीवाला दंपत्ति, अंग्रेज़ों के संग कार्य करते रहे थे और गुलाबदास जी अंग्रेज़ी वेशभूषा पहनते थे किन्तु नानीजी कपिला जी, लड्द्दू गोपाल और महात्मा गाँधी बापू की परम भक्त थीं अतः उन्होंने अपने पतिदेव को भी अपने समान खादीधारी एवं शुद्ध स्वदेशी बनने पर मज़बूर कर दिया था।
श्रीमती कपिला गुलाबदास गोदीवाला महिला कोंगेस कमिटी सभा में मेरी नानी जी पूज्य ‘ बा ‘
वह नानी का घर ~
जहां सुख की छैंया थी
दुबले पतले पेड़ खड़े
जिनसे चुन कर कुछ फूल
नानी पूजा करतीं थीं !
कुमारी सुशीला जी का नरेंद्र शर्मा के जीवन में आगमन ~
Sushila
 सुशीला गुलाबदास गोदीवाला

सं. १९४७ की मई की १२ तारीख को गुजराती गोदीवाला परिवार की पाँचवी संतान, कुमारी सुशीला गोदीवाला के संग, आदरणीय पँतजी के अतीव आग्रह से व आशीर्वाद से, कवि नरेंद्र शर्मा जी का पाणि ग्रहण सँस्कार सम्पन्न हुआ।

एक दिन, किसी कवि सम्मलेन सुनने पधारे, श्री गुलाबदास जी से अचानक उदयमान गीतकार नरेंद्र शर्माजी की मुलाकात हो गयी। गुलाबदास जी के आग्रह पर, नरेंद्र शर्मा उनके घर आये।
सुप्रसिद्ध कथाशिल्पी श्री अमृतलाल नागरजी चाचाजी के शब्दों में अब आगे का वृन्तान्त सुनिए ~
” मैं, भारत कोकिला श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी जी की एक फिल्म “मीरा” हिन्दी मेँ डब कर रहा था और इस निमित्त से वह और उनके पति श्रीमान्` सदाशिवम्`जी बँबई ही रह रहे थे। बँधुवर नरेन्द्रजी ने उक्त फिल्म के कुछ तमिल गीतोँ को हिन्दी में  इस तरह रुपान्तरित कर दिया कि वे मेरी डबिँग मेँ जुड सकेँ। सदाशिवंम जी और उनकी स्वनामधन्य पत्नी कोकिलकंठी श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी जी  तथा बेटी राधा, हम लोगोँ के साथ व्यावसायिक नहीँ किन्तु पारिवारिक प्रेम व्यवहार करने लगे थे। उन्होने एक नई शेवरलेट गाड़ी खरीद ली थी।वह जोश मेँ आकर बोले,”इस गाडी मेँ पहले हमारा यह वर ही यात्रा करेगा!” गाडी फूलोँ से खूब सजाई गई। उसमेँ वर के साथ माननीय सुब्बुलक्ष्मी जी व प्रतिभा बैठीँ। समधी का कार्य आदरणीय श्री सुमित्रनँदन पँत जी ने किया।
weddingश्री सुमित्रनँदन पँत जी के साथ दूल्हे श्री नरेंद्र  शर्मा
 बडी शानदार बारात थी! बँबई के सभी नामचीन्ह फिल्मस्टार और नृत्य -सम्राट उदयशँकर जी उस वर यात्रा मेँ सम्मिलित हुए थे। बडी धूमधाम से विवाह हुआ। मेरी माता बंधु से बहुत प्रसन्न् थी और पँत जी को, जो उन दिनोँ बँबई मेँ ही नरेन्द्र जी के साथ रहा करते थे, वह देवता के समान पूज्य मानती थी ।

मुझसे बोली, “नरेन्द्र और बहु का स्वागत हमारे घर पर होगा !”
दक्षिण भारत कोकिला : सुब्बुलक्षमीजी, सुरैयाजी, दीलिप कुमार, अशोक कुमार, अमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजी, भगवती बाब्, सपत्नीक, अनिल बिश्वासजी, गुरुदत्तजी, चेतनानँदजी, देवानँदजी इत्यादी सभी इस विलक्षण विवाह मेँ सम्मिलित हुए थे और नई दुल्हन को कुमकुम के थाल पर पग धरवा कर गृह प्रवेश करवाया गया उस समय सुरैया जी तथा सुब्बुलक्ष्मी जी मे मँगल गीत गाये थे और जैसी बारात थी उसी प्रकार बम्बई के उपनगर खार मेँ, १९ वे रास्तेपर स्थित उनका आवास भी बस गया।
नई दुल्हन सुशीलजी को कुमकुम के थाल पर, पग धरवा कर, गृह ~ प्रवेश करवाया गया। एक एक पग धरतीं हुईं महालक्ष्मी देवी की भाँति नवपरिणीता सुशीला नरेंद्र शर्मा ने अपने नए घर में गृह प्रवेश किया । उस समय सुरैया जी तथा सुब्बुलक्ष्मी जी ने विवाह के मँगल गीत गाये थे !
        
जैसी नरेंद्र शर्माजी की शानदार विवाह की बारात थी उसी प्रकार बम्बई के उपनगर खार मेँ, १९ वे रास्ते पर स्थित उनका आवास भी, विवाह के चार,पाँच  वर्षों में बस गया। न्यू योर्क स्थित  भारतीय भवन के सँचालक श्रीमान डॉ. जयरामनजी के शब्दोँ मेँ कहूँ तो “हिँदी साहित्य का तीर्थ -स्थान” बम्बई जैसे गहमागहमी से भरे महानगर मेँ, एक शीतल सुखद धाम मेँ परिवर्तित हो गया ! 
हमारा घर :
हमारे घर पर, पापा जी से हिन्दी भाषा में और हमारी प्यारी अम्माँ से हम बच्चे, गुजराती भाषा में बोला करते थे। हमने स्थानीय भाषा ‘मराठी’
( मुम्बई महानगर की मुख्य भाषा है  ) भी सीख ली थी यह स्वाभाविक सी बात थी।
मेरी स्मृतियों में उपस्थित हो रहा है पूज्य अम्माँ व पापाजी का वह सुन्दर एकमंजिला घर, जो सदा पवित्र और सुगंधित फूलों से मानों घिरा हुआ रहता  था। घर को घेरे हुए, बाग़ की बागबानी, मेरी अम्मा सुशीला ही रोज सवेरे उठकर, बडे जतन से किया करतीं थीं।
मेरी कवितांजलि : यादें
घर से जितनी दूरी तन की,
उतना समीप रहा मेरा मन,
धूप-छाँव का खेल जिँदगी
क्या वसँत, क्या सावन!
नेत्र मूँद कर कभी दिख जाते,
वही मिट्टी के घर आँगन,
वही पिता की पुण्य-छवि,
सजल नयन पढ्ते रामायण!
अम्मा के लिपटे हाथ आटे से,
फिर सोँधी रोटी की खुशबु,
बहनोँ का वह निश्छल हँसना
साथ साथ, रातोँ को जगना!
वे शैशव के दिन थे न्यारे,
आसमान पर कितने तारे!
कितनी परियाँ रोज उतरतीं,
मेरे सपनोँ मेँ आ आ कर मिलतीं.
“क्या भूलूँ, क्या याद करूँ?”
मेरे घर को या अपने बचपन को?
कितनी दूर घर का अब रस्ता,
कौन वहाँ, मेरा अब रस्ता तकता?
अपने अनुभव की इस पुड़िया को,
रक्खा है सहेज, सुन ओ मेरी, गुड़िया!

हम तीन बहनें थीं, सबसे बड़ी वासवी, फिर मैं, लावण्या और मेरे बाद बाँधवी अंत में हम सबसे छोटा परितोष !  हाँ, हमारे ताऊजी की बिटिया, गायत्री दीदी भी सबसे बड़ी दीदी थीं जो हमारे साथ-साथ अम्मा और पापाजी की छत्रछाया में पलकर बड़ी हुईं।
क्या इंसान अपने पुराने समय को कभी भूल पाया है? यादें हमेशा साथ चलती हैं, ज़िंदा रहती हैं, चाहे हम कितने भी दूर क्यों न चले जाएँ !
कौन रहा अछूता जग में,
सुख दुःख की छैंया से ?
धूप छाँह का खेल जिन्दगी,
ये सच है जाना पहचाना !
सभी हमारे हैं, सब, अपने,
कौन इस  जग में पराया ?
जीवन धारा एक सत्य है
हर साँस ने जिसे संवारा ~
इस छोर खड़े जो,
उस छोर चलेंगे ~
रह जायेंगे, कुछ सपने!
है मौजों के पार किनारा
कहती, बहती है धारा !
अगम अगोचार, सत्य,
ना जाना, पर, जाना है पार ~
नैन जोत के ये उजियारे
मिल जायेंगे उस में,
जो है बृहत प्रकाश !
* काव्यमय बानी *
मैँ जब छोटी बच्ची थी, तब अम्मा व पापा जी का कहना है कि, अक्सर काव्यमय वाणी मेँ ही अपने विचार प्रकट किया करती थी!
अम्माँ कभी कभी कहती कि,”सुना था कि मयुर पक्षी के अँडे, रँगोँ के मोहताज नहीँ होते! उसी तरह मेरे बच्चे पिता की काव्य सम्पत्ति, विरासत मेँ साथ लेकर आये हैँ!” यह एक माँ का गर्व था जो छिपा न रह पाया होगा या, उनकी ममता का अधिकार उन्हेँ मुखर कर गया था शायद ! कौन जाने ?
परँतु आज जो मेरी अम्मा ने मुझे बतलाया था वही साझा कर रही हूँ ~
एक बार मैँ, मेरी बचपन की सहेली लता, बडी दीदी वासवी, हम तीनोँ खेल रहे थे। वसँत ऋतु का आगमन हो चुका था और होली के उत्सव की तैयारी बँबई शहर के गली मोहोल्लोँ मेँ, जोर शोरोँ से चल रही थीँ। खेल खेल मेँ लता ने, मुझ पर एक गिलास पानी फेँक कर मुझे भीगो दीया! मैँ भागे भागे अम्मा पापाजी के पास दौड कर पहुँची और अपनी गीली फ्रोक को शरीर से दूर खेँचते हुए बोली, “पापाजी, अम्मा! देखिये ना! मुझे लताने ऐसे गिला कर दीया है जैसे मछली पानी मेँ होती है !” इतना सुनते ही, अम्मा ने मुझे वैसे, गिले कपडोँ समेत खीँचकर प्यार से गले लगा लिया!
बच्चोँ की तुतली भाषा, सदैव बडोँ का मन मोह लेती है। माता, पिता को अपने शिशुओँ के प्रति ऐसी उत्कट ममता रहती है कि, उन्हेँ हर छोटी सी बात, विद्वत्तापूर्ण और अचरजभरी लगती है। मानोँ सिर्फ उन्ही के सँतान इस तरह बोलते हैँ , चलते हैँ, दौडते हैँ !
पापा जी भी प्रेमवश, मुस्कुरा कर पूछने लगे, “अच्छा तो बेटा, मछली ऐसे ही गिली रहती है पानी मेँ? तुम्हेँ ये पता है? ”
“हाँ पापा, एक्वेरीयम (मछलीघर ) मेँ देखा था ना हमने!” मेरा जवाब था !

हम बच्चे, सब से बडी वासवी, मैँ मँझली लावण्या, छोटी बाँधवी व भाई परितोष, अम्माँ पापा जी की सुखी, गृहस्थी के छोटे, छोटे स्तँभ थे! उनकी प्रेम से सीँची फुलवारी के हम, महकते हुए फूल थे!
एक दिन पापाजी और अम्मा बाज़ार से सौदा लिये
किराये की घोडागाडी से घर लौट रहे थे -
अम्मा ने बडे चाव से एक बहुत महँगा छाता भी खरीदा था -
जो नन्ही वासवी (मेरी बडी बहन) और साग सब्जी उतारने मेँ
अम्मा वहीँ भूल गईँ - जैसे ही घोडागाडी ओझल हुई कि वह छाता याद आ गया! पापा जी बोले, "सुशीला, तुम वासवी को लेकर घर जाओ,
वह दूर नहीँ गया होगा मैँ अभी तुम्हारा छाता लेकर आता हूँ !"

अम्मा ने बात मान ली और कुछ समय बाद पापा जी छाता लिये आ पहुँचे!
कई बरसोँ बाद अम्मा को यह रहस्य जानने को मिला कि पापा जी दादर के उसी छातेवाले की दुकान से हुबहु वैसा ही एक और नया छाता खरीद कर ले आये थे ताकि अम्मा को दुख ना हो!
 इतने सँवेदनाशील और दूसरोँ की भावनाओँ का आदर करनेवाले, उन्हेँ समझनेवाले भावुक कवि ह्र्दय के इन्सान थे मेरे पापा जी! पूज्य पापाजी की कविता ~ " रख दिया नभ शून्य में किसने तुम्हें मेरे ह्रदय ?
                  इन्दु कहलाते, सुधा से विश्व नहलाते
                  फिर भी न जग ने न जाना
तुम्हें मेरे ह्रदय ! "

आज जब ये याद कर रही हूँ तब प्रिय वासवी और मुझ से छोटी बाँधवी, दोनोँ , हमारे साथ स -शरीर नहीँ हैँ ! मुझे अपने परिवार के बिछुड़े सदस्य बहुत याद आते हैं। उनकी अनमोल स्मृतियोँ की महक, फिर भी  मेरे जीवन बगिया को महकाये हुए है।
हमारे घर पर रसोई में रखी, वो दिल्ली की सुराही !  वो मिट्टी के घड़े का पानी याद आ रहा है। ~
हमारे घर हमेशा मिट्टी के घड़े पानी के लिए रखे जाते थे तो सुराही जो पापा जी देहली से लाये थे, उस का जल भी कमाल का शीतल हुआ करता था। वो आज तक मुझे याद है। बम्बई शहर में  पुराने बस गए लोगों को बंबई के पास आये सरोवरों से, बरखा का सिंचित जल का पानी, नगर निगम पालिका के वितरण द्वारा प्राप्त होता है। बंबई महानगरी में आजकल बडी-बडी सोसायटी बनीं हैं और वहाँ पम्प लगाकर पानी ऊपर चढाया जाता है।

जब मेरा शैशव बीत रहा था उस वक्त और आज की बम्बई में विस्मयकारी परिवर्तन आ ग़ये हैं ! जैसा कि हर चीज़ में होता है कुछ भी तो स्थायी नही रहता – जीवन का प्रमुख गुण उसका अस्थायी होना होना ही है।

हमारे पड़ौसी थे सिने कलाकार  श्री जयराज जी !  जो  तेलगु भाषी थे तथा दक्षिण भारत के आन्ध्र प्रदेश प्रांत से वे फ़िल्म में नायक का काम किया करते थे वे भी बंबई आ बसे थे। उनकी पत्नी सावित्री आंटी, पंजाबी थीं। उनके घर फ्रीज था सो जब भी कोई मेहमान आता, हम बरफ मांग लाते ! शरबत बनाने से पहले ये काम आवश्यक था। हम ये काम खुशी-खुशी किया करते थे। पर जयराज जी की एक बिटिया को हमारा इस तरह बर्फ मांगने आना पसंद नही था। एकाध बार उसने ऐसा भी कहा था ~~ “आ गए भिखारी बर्फ मांगने!” जिसे हमने, अनसुना कर दिया।आख़िर हमारे मेहमान का हमें उस वक्त ज्यादा ख़याल था …ना कि ऐसी बातों का !!
बंबई की गर्म, तपती हुई जमीन पे नंगे पैर, इस तरह दौड़ कर बर्फ लाते देख लिया था हमें आदरणीया लता मंगेशकर दीदी जी ने !  …..और उनका मन पसीज गया ! जिसका नतीजा ये हुआ के एक दिन मैं कॉलिज से लौट रही थी, बस से उतर कर, चल कर घर आ रही थी तो देखती क्या हूँ कि, हमारे घर के बाहर एक टेंपो खड़ा है जिस पे एक छोटा सा फ्रिज रखा हुआ है ! रस्सियों से बंधा हुआ ! तेज क़दमों से घर पहुँची, वहाँ पापाजी,  नाराज, पीठ पर हाथ बांधे खड़े थे। हमारी अम्मा, फिर जयराज जी के घर-दीदी का फोन आया था-वहाँ बात करने आ-जा रहीं थीं ! वैसे  फोन हमारे घर पर भी था, पर वो सरकारी था जिसका इस्तेमाल पापा जी सिर्फ़ सरकारी काम के लिए ही किया करते थे और कई दफ़े फोन हमें, जयराज जी के घर रिसीव करने दौड़ कर जाना पड़ता था। पूज्य लता दीदीजी, अम्मा से मिन्नतें कर रहीं थीं, कह रहीं थीं “पापा से कहो ना भाभी, फ्रीज का बुरा ना मानें। मेरे भाई-बहन आस-पड़ौस से बर्फ मांगते हैं ये मुझे अच्छा नहीं लगता- छोटा सा ही है ये फ्रीज ..जैसा केमिस्ट दवाई रखने के लिए रखते हैं …रख लीजिये ”
अम्मा पापा जी को समझा रही थीं। पापा जी को बुरा लगा था। वे मिट्टी के घडों से ही पानी पीने के आदी थे।
ऐसा माहौल था मानो गांधी बापू के आश्रम में फ्रीज पहुँच गया हो!!
पापा भी ऐसे ही थे। उन्हें क्या जरुरत होने लगी भला ऐसे आधुनिक उपकरणों की? वे एक आदर्श गांधीवादी थे। सादा जीवन ऊंचे विचार रख अपना जीवन जीनेवाले ! आडम्बर से सर्वदा दूर रहनेवाले, सीधे सादे, सरल मन के इंसान! खैर! कई अनुनय के बाद अम्मा ने, किसी तरह दीदी की बात रखते हुए फ्रीज को घर में आने दिया और आज भी वह, वहीं पे है ..शायद मरम्मत की ज़रूरत हो ..पर चल रहा है !
हमारी स्कूल : खार उपनगर में स्थित एक हाई स्कूल थी इसी में मशहूर नायिका तथा अब ' टीना अंबानी ' के नाम से प्रसिद्ध कन्या भी सहपाठिका थीं पर वह हमारी जूनियर थी। … हमारी स्कूल जाने की उम्र हुई तो एक गुजराती माध्यम की स्कूल ” प्युपिल्स ओन हाई स्कूल ” मेँ दाखिला दिलाया गया।
श्रीमती  इन्दिंरा गाँधी भी यहाँ पढीं थीं ऐसा सुना है। हमारी पाठशाला का घंटा,  कवींद्र श्री रवीन्द्र नाथ का  उपहार था। एक मोटे लकडी के टुकड़े पर वह घण्ट टाँग दिया गया था। मुझे याद पड़ता है कि हमारी फीस ६ ठी क्लास में ६ रुपए थे और नौ वी में ९ रुपया थी !
पाठशाला में मेरा जो जन्मजात रुझान था, वह पल्लवित हुआ । अनेक विषयों के संग सँस्कृत, गुजराती, हिन्दी, के साथ साथ अँग्रेज़ी ७ वीं कक्षा में आकर सीखना आरम्भ किया था, ऐसा मुझे याद है। 
       समय चक्र चलता रहा हम अब युवा हुए । पापा आकाशवाणी से सम्बंधित कार्यों के सिलसिले में कुछ वर्ष देहली भी रहे। फिर दुबारा बंबई के अपने घर पर लौट आए जहाँ हम अम्मा के साथ रहते थे, पढाई करते थे।
प्रायमरी स्कूल का सहपाठी ही बना जीवन साथी ~
हमारी स्कूल का माध्यम गुजराती था। हमारी स्कूल के सारे शिक्षक बडे ही समर्पित थे और उन्हीं की शिक्षा के फलस्वरुप मेरा साहित्य के प्रति जो अनुराग है, वह पापाजी पण्डित नरेंद्र शर्मा जी जैसे, उच्च कोटि के कवि, साहित्यकार, गीतकार के घर पर जन्म लेने से ही कुछ सुप्त बीज तो अंतर्मन में मौजूद थे ही वे सही वातावरण पाकर पनपने लगे, फूलने फलने लगे।
उस स्कूल में मेरे भावि पति दीपक जी और मैं कक्षा – १ से ११ वीं तक अलग कक्षाओं में, किँतु साथ-साथ ही पढते हुए युवा हुए । हम दोनों सहपाठी रहे हैं। मगर जब हम छोटी कक्षा में पढ़ा करते थे तब हम में मेल जोल कुछ खास नहीं था। ज्यादा बात-चीत और पहचान, मेरी होनेवाली ननद जी, देवयानी बेन ने करवाई थी। तब मैं ११ वीँ कक्षा में मेट्रिक की परीक्षाएँ दे रही थी ।
उनके शांत और मधुर स्वभाव ने मुझे बहुत प्रभावित किया । दीपक जी कम बोलते हैं तो मैं कुछ ज्यादा ही बोलती हूँ ! सो हमारी मित्रता जल्दी ही अंतरंग और प्रगाढ़ होती  गयी। हाँ, हमारा विवाह तो दोनों के आगे, अलग अलग कोलेज से,उच्च  शिक्षा में  ग्रेज्युएट होने के बाद ही हुई।
बी. ए. पाठ्यक्रम में मेरे विषय थे – मनोविज्ञान व समाजशास्त्र ! इन विषयों से मैंने बी.ए. ऑनर्स के हमारे कॉलेज के विभाग में टॉप किया था और बस्स उम्र के २३ साल पूरे हुए न थे कि हमारा विवाह हो गया !
और छूटी मुंबई, अमरीका प्रस्थान…
शादी के १ माह बाद, विवाहोपरांत हम उत्तर अमरीका के पश्चिम में प्रशांत महासागर किनारे बसे महानगर लॉस ~ एंजिलिस, जो केलिफोर्निया प्रांत में है वहाँ आये। दीपक जी एम.बी.ए. की शिक्षा पूर्ण कर रहे थे।
दीपक जी की पढाई खत्म होने पर हम पुनः बम्बई लौट आये। ३ वर्ष अमरीका रहने के बाद हम, श्वसुर जी श्री कांतिलाल शाह व्यापारी थे उन के आग्रह पर हम दोनों पुनः मुम्बई आए थे । भारत आकर बंबई में विशुद्ध भारतीय संयुक्त कुटुंब में हम रहने लगे।
हमारी पुत्री, प्रथम संतान ' सिंदूर ' का वहीं जन्म हुआ और फ़िर पुत्र सोपान भी आ गया। पापाजी, अम्माँ, सास जी सौ. तारा बेन, दो ननंदे, चारुमतीजी, देवयानीजी, मेरे जेठ जी भरत, मेरी दो बहनें, वासवी व बाँधवी के संयुक्त परिवार, उनके बच्चों के साथ मौज ~ मस्ती तथा हमारे परिवारों के असंख्य सगे – सम्बन्धी व मित्रगण, इन सभी के सानिंध्य में, जीवन भरापूरा रहता। दिन भरपूर खुशियाँ देते थे। अविस्मरणीय हैं उन दिनों की स्मृतियाँ! आज भी ताज़ा हवा के झोंकों सी सुखद!
पापा की ६०वीं साल गिरह ~ आयी। आदरणीया लता मंगेशकर दीदी जी मेरे शैशव से इतनी उम्र पार कर लेने पर भी अक्सर हमारे घर आया करतीं थीं। दीदी को बहुत उत्साह था कहने लगीं, “मैं,एक प्रोग्राम दूंगीं,जो भी पैसा इकट्ठा होगा, पापा को भेंट करूंगी।”
         जब पापा को इस बात का पता लगा वे नाराज हो गए, कहा, “मेरी बेटी हो, अगर मेरा जन्मदिन मनाना है, घर पर आओ, साथ भोजन करेंगें, अगर मुझे इस तरह पैसे दिए, मैं तुम सब को छोड़ कर काशी चला जाऊंगा, मत बांधो मुझे माया के फेर में।” उसके बाद,  दीदी जी का प्रोग्राम नहीं हुआ परन्तु हम सब ने साथ मिलकर, हमारी प्यारी अम्माँ के हाथ से बना उत्तम भोजन खाया था और उस दिन पापा जी अति प्रसन्न हुए थे यह अब स्मृति पलट पर सदा के लिए अंकित हो गया है। 
       
आज यादों का काफिला चल पड़ा है और आँखें नम हैं ! …पूज्य पापाजी और स्वर साम्राज्ञी आदरणीया लता मंगेशकर दीदीजी जैसे विरल  व्यक्तित्व उन लोगों जैसे विलक्षण व्यक्तियों से, जीवन को सहजता से जीने का, उसे सहेज कर, अपने कर्तव्य पालन करते रहने के साथ, इंसानियत न खोने का, दुर्गम व कठिन पाठ सीखा है। उनसे पाई सीख को अपना कर, सहेज कर, मैं, अपने जीवन में कहाँ तक इन उच्च आदर्शों को जी पाई हूँ, इस का मुझे अंदेशा नहीं है। हाँ ये कह सकती हूँ कि,  प्रयास जारी है ..
इस लिंक पर आप सुनिए पण्डित नरेंद्र शर्मा जी स्वर साम्राज्ञी आदरणीया सुश्री लता मंगेशकर जी पर क्या कह रहे हैं ~~
https://www.youtube.com/watch?v=BY5v9SIrvQM


पुनः अमरीका आगमन और मन ही मन इंडिया की तलाश

राही मासूम रज़ा और पंडित नरेंद्र शर्मा बी.आर.चोपड़ा के धारावाहिक ‘महाभारत’ से जुड़े थे। एक ही कमरे में बैठते, चिंतन-मनन-बहस-मुबाहिसे सब होते। एक दिन पंडित जी ने दुनिया को अलविदा कह दिया। पूज्य पापाजी के असमय आकस्मिक निधन पर राही साहब ने अपने इस साथी पर एक मार्मिक कविता रची।
“वह पान भरी मुस्कान”
वह पान भरी मुस्कान न जाने कहां गई?
जो दफ्तर में, इक लाल गदेली कुर्सी पर,
धोती बांधे, इक सभ्य सिल्क के कुर्ते पर,
मर्यादा की बंडी पहने, आराम से बैठा करती थी,
वह पान भरी मुस्कान तो उठकर चली गई!
पर दफ्तर में, वो लाल गदेली कुर्सी अब तक रक्खी है,
जिस पर हर दिन,अब कोई न कोई, आकर बैठ जाता है
खुद मैं भी अक्सर बैठा हूं
कुछ मुझ से बडे भी बैठे हैं,
मुझसे छोटे भी बैठे हैं,
पर मुझको ऐसा लगता है
वह कुरसी लगभग एक बरस से खाली है !
~ शायर रही मासूम रज़ा
सं. १९८९ मेरे पापाजी के असमय निधन के बाद, जिँदगी ने फिर एक करवट बदली और हम फिर अमरीका आ गये। इस बार यहीँ बसने का इरादा करके ! खैर ! सिलसिला शुरु हुआ सँघर्ष का! वही परदेस का अपनेपन से रिक्त, वातावरण!
अब मुझे भारतीय सँस्कृति, परम्पराओं को व एक स्त्री की गरिमा को, हमारी अस्मिता को,  न सिर्फ सहेजना था, उसे आगे बढ़ाना भी शेष था। बच्चोँ का उत्तरदायित्व भी था जिसे संयत ढंग से निभाना था। जो हो सका वह सब किया।
मेरी प्रिय कविता व साहित्य को मैं सुदूर परदेश में आकर भी तलाशती रही। जहाँ कही भी भारत या इंडिया का नाम सुनती, मन करता भारत पहुँच जाऊं फिर वही, अपनों के बीच भाग जाने को मन बैचेन हो जाता।
एक स्त्री का जीवन शाँत नदिया की धारा सा बहता रहता है। गृहस्थी, परिवार, सगे ~ सम्बन्धी, परिवार की ज़िम्मेदारियाँ तथा रिश्तों का निभाना और भी बहुत कुछ ! क्या कुछ नहीं करती हरेक स्त्री !
मेरा मानना है कि तुलसी के बिरवे के पास रखा हुआ ‘दिया ‘ ही रूपक है
स्त्री जीवन का !
तुलसी के बिरवे के पास, रखा एक जलता दिया
जल रहा जो अकम्पित, मंद मंद, नित नया
बिरवा जतन से उगा जो तुलसी क्यारे मध्य सजीला
नैवैध्य जल से अभिसिक्त प्रतिदिन, वह मैं हूँ ~
साँध्य छाया में सुरभित, थमी थमी सी बाट
और घर तक आता वह परिचित सा लघु पथ ~
जहां विश्राम लेते सभी परींदे, प्राणी, स्वजन !
गृह में आराम पाते, वह भी तो मैं ही हूँ न !
पदचाप, शांत संयत, निश्वास, गहरा, बिखरा हुआ
कैद रह गया आँगन में जो, सब के चले जाने के बाद
हल्दी, नमक, धान के कण जो सहजता मौन हो कर
जो उलट्त्ता, आंच पर पकाता, रोटियों को, धान को
थपकी दिलाकर जो सुलाता भोले अबोध शिशु को
प्यार से चूमता माथ, हथेली, बारम्बार~  वो मैं हूँ !
रसोई घर दुवारी पास पडौस, नाते रिश्तों का पुलिन्दा
जो बांधती, पोसती, प्रतिदिन वह, बस मैं एक माँ हूँ !

( पति दीपक शाह व बच्चे सिंदूर व सोपान के साथ)
– लावण्या शाह
यु. एस. ए. से
ई मेल : Lavnis@gmail.com