Friday, May 17, 2019

फिल्म निर्माण संस्था #बॉम्बे #टाकीज़ में गीतकार #नरेंद्र #शर्मा,

ॐ 
गीतों की रिम झिम, यादों की गलियों में जब् जब् अपनी सुमधुर कर्णप्रिय किंकिणी ध्वनि लिए बजतीं हैं तब अतीत के चलचित्र सजीव होकर उभर आते हैं। आज एक विहंगम दृष्टिपात करेंगें मेरे परम आदरणीय पिता, सुप्रसिद्ध रचनाकार पंडित नरेंद्र शर्मा की साहित्यिक कृतियों के बारे में ! गीतकार एवं  साहित्यकार नरेंद्र शर्मा के सृजन की !
 पंडित नरेंद्र शर्मा जी की १९ काव्य पुस्तकें, अब पंडित नरेंद्र शर्मा सम्पूर्ण रचनावली ' में संगृहीत हो चुकीं हैं। यह स्तुत्य कार्य उनके पुत्र श्री परितोष नरेंद्र शर्मा की १६ वर्षों से अधिक समय तक किये गए अथक परिश्रम, समर्पण एवं निस्वार्थ पितृभक्ति से ही संभव हो पाया है। धन भी परितोष ने स्वयं ही एकत्रित कर इस महत्वपूर्ण कार्य में लगाया है।
१/ प्रथम काव्य संग्रह : शूल - फूल सं. १९३४
२/ द्वितीय काव्य संग्रह : कर्ण फूल। सं.१९३६ की सुकोमल युवा कवि ह्रदय की कोमल अभिव्यक्ति से आरम्भ होती हुई भावनाएँ 
३/ तृतीय काव्य संग्रह : प्रभात - फेरी - सं. १९३८ स्वाधीनता संग्राम के देशप्रेम से सभर गीतों को संगृहीत किये पुस्तक है इस की कवितायेँ भारत के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी को अत्यंत प्रिय थीं। स्व. श्री अटल जी ने ख़ास तौर से उल्लेख किया है इन पंक्तियों का ' आओ हथकड़ियां तड़का दूँ , जागो रे नतशिर बंदी ! '
४/ चतुर्थ काव्य संग्रह : " प्रवासी के गीत "-  सं. १९३९ जिसे साहित्य प्रेमी सुधी पाठकवर्ग ने अत्याधिक सराहा व यह काव्य संग्रह कवि नरेंद्र शर्मा की सभी काव्य पुस्तकों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय सिद्ध हुई है। इसी पुस्तक की एक कविता," आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगें " जैसे विरह कातर ह्रदय को उर्मि तरंगों से उद्वेलित करता हुआ एक सर्वोत्तम विरह गीत आज भी श्रगय पाठकों के मन को बाँध लेने में सक्षम है। कालजयी सिद्ध हुआ है। इस संग्रह में हिन्दी काव्य जगत के शीर्ष प्रेम गीत मौजूद हैं।  तथा अन्य असंख्य लय व छन्द में बंधे सुमधुर गीत हैं। 
५/ पञ्चम काव्य संग्रह :
पलाश वन :

६/ षष्ठम काव्य संग्रह :
मिटटी और फूल :
 
७/ सप्तम काव्य संग्रह : लाल निशाँन : ( जन-गीतों का संग्रह)   
८/ अष्टम काव्य संग्रह :  'कामिनी' ('मनोकामिनी') (खंडकाव्य)
 
कामिनी  खण्ड काव्य : स्वतंत्रता सेनानी पंडित नरेंद्र  शर्मा द्वारा ब्रिटिश जेल से लिखी हुई  पुस्तक है। देवली दीटेंशन जेल राजस्थान व आगरा की ब्रिटीश जेल की सलाखों के पीछे मर्म मधुर " कामिनी " काव्य संग्रह, जेल में दिए गए, पन्नों पर, एक छोटी सी खुली खिड़की से यदा कदा झांकते चंद्रमा के नीचे खिली मधुर गंध लिए पुष्पित कामिनी की तरह,
कवि नरेंद्र की कविता के रूप में आज भी महकती हुई आज भी सजीव है।

९ / नवम काव्य संग्रह : सं १९४६ 'हंसमाला' (कविता-संग्रह)
१०/  दशम काव्य संग्रह : 'रक्त-चंदन' (कविता-संग्रह)   " रक्त चन्दन " सं.१९४९ महात्मा गाँधी बापू के निर्मम हत्याकाण्ड से व्यथित हो उनके निधन पर लिखी श्रद्धांजलि स्वरूप काव्यांजलि रूपी पुस्तक। 

११ / एकादश  काव्य ग्रन्थ : सं. १९५० 'अग्निशस्य' (कविता-संग्रह)
इस वर्ष द्वितीय पुत्री, लावण्या का ( मेरा )  जन्म हुआ।
   

१२/ द्वादश काव्य संग्रह
:
सं १९५३ 'कदली-वन' (कविता-संग्रह)   
( कवि नरेंद्र के विवाहीत जीवन की खुशियाँ समेटे कविता संग्रह )
१३/ त्रयोदश काव्य संग्रहद्रौपदी खण्ड काव्य : सं. १९६०

१४ / चतुर्दश काव्य संग्रह  : प्यासा निर्झर सं. १९६४ १५/ पञ्चादश  काव्य संग्रहउत्तर जय : खंड काव्य
उत्तर - जय ' जय गाथा ' महाभारत'  की विशाल कथा के अंत में आनेवाला प्रसंग दुर्योधन की मृत्य के पश्चात की कथा है।
१६ / शष्टादश काव्य संग्रह : बहुत रात गये :सं. १९६७  
१७/ सप्तदश काव्य संग्रह सुवर्णा : सं. १९७१ :
सुवर्णा नामक मिथकीय बृहत काव्य ! सुवर्णा एक ऐसा विस्तृत मिथकीय काव्य है कि जिसकी नायिका ' सुवर्णा ' महाभारत के मुख्य पात्र महारथी कर्ण द्वारा, शिविर में बंदी बनाई गयी एक राज कन्या है।  राज कुमारी के पिता महाराज को तथा सुवर्णा के राज्य को पराजित करने के पश्चात ' कर्ण ' इस राजकन्या पर आसक्त हुआ। मगर सुवर्णा ने, पिता के हत्यारे को रोष सहित, तिरस्कृत किया। महाभारत कथा के ग्रन्थ में कुरुक्षेत्र के रण में कौरव शिविर में कर्ण  के शिविर में बंदी बनाकर राखी गई राजकन्या सुवर्णा अन्तत: कर्ण से समय बीत्ततेप्रेम करने लगती है तथा कर्ण के वध के पश्चात्, यही सुवर्णा, विलाप करती हुई कर्ण की चिता में सती हो जाती है ऐसी लोक कथा है ।
' सुवर्णा कथा का बीज या उपज एक  लोक कथा के मूल में है। दक्षिण भारत के एक ग्रन्थ में यह जनश्रुति का रूप लिए लघु बीज रूप में, लोक कथा आती है जिसे पंडित नरेंद्र शर्मा ने अपने दक्षिण भारत के प्रवास में सुनी थी। सुवर्णा की कथा तथा प्रेम में  विरोधाभास लिए यह अलौकिक कथा कवी पंडित नरेंद्र शर्मा के मन मस्तिष्क में कहीं गहरा प्रतिसाद छोड़ कर सुरक्षित रही। धरती में गड़े बीज की भाँति कथा - बीज, प्रस्फुटन की कामना लिए रह तो गया था किन्तु रह रह कर ' सुवर्णा ' का पात्र मुखर होना चाहता था । अतः कुछ समय के अंतराल के पश्चात ' सुवर्णा ' का पात्र एक बृहत काव्य रूप ले कर अवतरित हुआ। सुवर्णा पुस्तकाकार  में सुवर्णा को उभरना था। अतः पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा के कवि मन ने इसे एक  काव्य पुस्तक का रूप दे ही दिया।
उसी वर्ष
मोहन दास करमचंद गांधी ( जीवनी १९६७ ) कथा में महात्मा गाँधी बापू की जीवनी अत्यंत सरल एवं रोचक ढंग से लिखी गई।
१८ / अष्टादश काव्य संग्रह : 
सुवीरा सं. १९७३ कथा काव्य राजमाता सुवीरा के मुख्य पात्र पर केंद्रित है। वे अपने भीरु व कायर राज पुत्र को वीरता का पाठ सीख्लातीं हैं। 
 
१९ / उन्नीसदाश काव्य पुस्तक : 'मुट्ठी बन्द रहस्य' (कविता-संग्रह)

२० / बीसवीं मरणोपरांत काव्य पुस्तक :
' देश द्वादशी' :


पंडित नरेंद्र शर्मा जी कवि  रूप से अधिक प्रसिद्ध हैं किन्तु
कवि ने  सरस कथाएँ भी रचीं हैं जिन्हें 
संगृहीत किया गया१)  " कड़वी मीठी बातें " व
२) ज्वाला परचूनी पुस्तक
में 

उस वक्त
इलाहाबाद कहलानेवाला तीन नदियों के पवित्र संगम स्थल पर  शताब्दियों से बसे आज ' प्रयाग राज ' के अपने पुरातन नाम से पुनः पहचाने जानेवाले सांस्कृतिक शहर से, उदयीमान कवि नरेंद्र शर्मा ने काव्य रचनाओं का सृजन आरम्भ किया था।
पंडित नरेंद्र शर्मा जी की आरंभिक काल की कविताएँ सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्य के मानदंड सामान " सरस्वती " पत्रिका में तथा पत्रिका  " चाँद " में छपीं थीं। 
सं. १९३४ में वे अभ्युदय पत्रिका के लिए प्रयाग में उपसंपादक पद पर कार्यरत रहे। सं. १९३८ से सं १९४० पर्यन्त वे, "अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी"  में, हिन्दी अधिकारी के पद पर आनंद भवन इलाहाबाद उ. प्र. में कार्य करते थे।    
सं. १९४० से सं. १९४२ इन दो वर्ष की अवधि में नरेंद्र शर्मा ब्रिटीश जेल में स्वतंत्रता सेनानी रहे तथा ब्रिटिश बंदी गृह में कैद रहे यह कवि मानस की अग्नि परिक्षा का काल रहा। देवली डिटेंशन जेल राजस्थान प्रांत तथा आगरा जेल में, कवि नरेंद्र शर्मा जी ने कारावास भोगा।  जहां १४ दिन के अनशन किया जिस में, प्राण गंवाने की घड़ी आते ही, जेल के गोरे अधिकारीयों ने, उन्हें जबरन सूप पिलाकर, हाथ पैर, निर्ममता से बाँध कर नलियों द्वारा मुंह से द्रव्य पिलाकर, देशभक्त नरेंद्र को, जेलरों ने  " एक और शहीद न हो जाए " यह  सोचकर, उन्हें, जीवीत रखा। देवली जेल से लिखी कामिनी पुस्तक से काव्य " बंदी की बैरक " से यह पंक्तियाँ बंदी जीवन अनुभव समेटे हुए है ~
" यहां कँटीले तार और फिऱ खींची चार दीवार
  मरकत  के गुम्बद से लगते हरे पेड़ उस पार " और

" एक और दिन आया प्यारे, यह जीवन दिनमान जैसे 

  हुई सुबह पीलो उड़ आई मेरे पुलकित प्राण जैसे !
  खींचे कँटीले तार सामने, चुभते से से शूल जैसे ! "
         
गाँव जहांगीरपुर में नरेंद्र की माता जी गंगादेवी को एक  सप्ताह पश्चात पता चला के उनके लाडले इकलौते पुत्र ने अन्न त्याग किया है और आहार छोड़ दिया है! अब देशभक्त बेटा भूखा हो तब माँ कैसी खातीं ? सो, अम्मा जी ने भी १ सप्ताह के लिए अन्न त्याग कर दिया।
जेल से बीमार और कमजोरी की हालत में नरेंद्र को मुक्त किया तो वे सीधे गाँव,अपनी स्नेहमयी अम्माँ जी के दर्शन करने, खुर्जा से जहांगीरपुर आ पहुंचे। देशभक्त नरेंद्र शर्मा का, गाँव के लोगों ने मिलकर बन्दनवारों को सजा कर भव्य स्वागत किया।
अम्माँ जी अपने साहसी, देशभक्त पुत्र  नरेन को गले लगा कर रोईं तो गँगा जल समान पवित्र अश्रुकणों ने यातनाभरे ब्रिटिश जेल का सारा अवसाद धो कर स्वच्छ कर दिया। अचानक हिंदी साहित्य जगत के बँधु,श्री भगवती चरण वर्मा जी, उपन्यास “चित्रलेखा” के सुप्रसिद्ध लेखक -  गीतकार नरेंद्र शर्मा की   तलाश में वहाँ आ पहुंचे। भगवती बाबू ने बतलाया कि बॉम्बे टॉकीज़ फिल्म निर्माण संस्था की मालकिन अभिनेत्री, निर्देशिका, निर्मात्री देविका रानी ने आग्रह किया है कि, ” भगवती बाबू अपने संग गीतकार नरेंद्र शर्मा को बंबई ले आएं।"भगवती बाबू का प्रस्ताव सुन, नरेंद्र शर्मा को बड़ा आश्चर्य हुआ।
बंबई जाने का निमंत्रण बॉम्बे टाक़ीज़ संस्था से सामने से आया था। गीतकार नरेंद्र शर्मा के लिए अपनी प्रतिभा दिखलाने का अवसर आया था। हिंदी फिल्म चित्रपटों के लिए गीत लेखन का बुलावा आया था, परन्तु नरेंद्र शर्मा के मन में कुछ संकोच था।  चित्र : श्री भगवती चरण वर्माजी गीतकार नरेंद्र शर्मा के साथ ~

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सं १९४० में, देविका रानी जी के पति श्री हीमान्शु रोय का देहांत हो गया और देविका रानी को, सहायता थी अच्छे कार्यकर्ताओं की! ताकि, वे, कम्पनी का कार्य, फिल्म निर्माण जारी रख सकें। इसी हेतु से,लेख़क और कवि श्री भगवती चरण वर्मा ने कवि नरेंद्र को भी आमंत्रित किया के ' बंधू, आप भी मेरे संग, बंबई चलिए 'इस प्रकार नरेंद्र शर्मा का उत्तर प्रदेश से बंबई की मायानगरी में आना हुआ था। भगवती बाबू के आग्रह पर, कवि नरेंद्र शर्मा अपने युवा जीवन में अब कुछ नया अनुभव लेने कुछ नया सीखने के इरादे से मायानगरी बंबई के लिए ट्रेन में बैठकर, चल दिए .....
रेलगाडी की छुक छुक की ताल से, ऊंगलियों का ठेका लगाते हुए,
उर्दु भाषा के शब्द लिए एक गीत का मुखडा भी वहीं यात्रा में लिखा ....
" अय बादे सबा ....इठलाती न आ ...मेरा गुंचाए दिल तो सूख  गया "
सं १९४३ से सं. १९४६ की अवधि तक " बोम्बे टाकिज फिल्म निर्माण संस्थाने  मालकिन निर्मात्री व सिने तारिका तारिका " देविका रानी "द्वारा  कवि नरेंद्र शर्मा को गीत व पटकथा लेखन के लिए अनुबंधित किया ।
सं. १९३४ बॉम्बे टॉकीज़, उस वक्त बंबई कहलानेवाले महानगर के उपनगर मलाड में था। इस प्रकार नरेंद्र शर्मा के कवि कर्म में सिनेमा जगत के लिए गीत लेखन का नया अध्याय आरम्भ हुआ।
    
बंबई आगमन के पश्चात कवि नरेंद्र शर्मा जी ने असंख्य फिल्मी गीत लिखे जिन्हें स्वर कोकीला सुश्री सुब्बलक्ष्मी जी,स्वर साम्राग्नी लता मंगेशकर जी, बंगाल की सुमधुर बुलबुल, सुश्री पारुल घोषजी जो सुप्रसिध्ध बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष की पत्नी थीं तथा फिल्म संगीत के जो भीष पितामह रहे हैं ऐसे संगीत संयोजक श्री अनिल बिस्वास जी की वे बहन थीं।
संगीतज्ञ श्री अनिल बिस्वास जी ने ही गायक तलत महमूद तथा मुकेश जी को पहली बार अपने स्वर संयोजन में गीत गवाकर सिने संसार में प्रसिध्धि दिलवाई थी  और स्वर कोकिला आदरणीया लता जी तो यह भी कहतीं हैं के उन्हें सांस पर कंट्रोल करना अनिलदा ने ही सिखलाया था !
बॉम्बे टॉकीज़ फिल्म निर्माण संस्था : भारतीय सिने जगत की यशस्वी आधारशिला स्वरूप संस्था थी।
निर्माता  हिमांशु राय और देविका रानी ने मिलकर बांबे टॉकीज बैनर की स्थापना की। इसी संस्था से अनेकानेक मशहूर व गुणी कलाकारों ने अपने कार्य का आरम्भ किया था। मशहूर गायिका
सुरैया, राज कपूर , अशोक कुमार, लीला चिटनिस, दिलीप कुमार, मधुबाला, मुमताज़ आदि कलाकार फ़िल्म जगत् को बांबे टाकीज की ही देन हैं। अनिल बिस्वास, संगीतज्ञ, उनकी बहन गायिका पारुल घोष, गीतकार नरेंद्र शर्मा, बांसुरी बादक पन्ना लाल घोष जैसे नाम उभरते हैं।
मुख्य फ़िल्में :
अछूत कन्या' १९३६, 'इज्जत' (१९३७ ), 'सावित्री' १९३८ , 'निर्मला' १९३८  आदि। देविका रानी चौधरी रोरिच   ~ नायिका, निर्मात्री, गायिका एवं अद्भुत कलाकार देविका रानी चौधरी रोरिच  को सर्व प्रथम भारत रत्न उपाधि से अलंकृत भारतीय होने का गौरव प्राप्त है। 

 





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देविका रानी चौधरी रोरिच  
~
जन्म- ३०  मार्च,  सं. १९०८  विशाखापत्तनम - मृत्यु- ९  मार्च, सं. १९९४  बैंगलोर में~  देविका रानी के पिता कर्नल मन्मथ नाथ (एम.एन.) चौधरी,
ब्रिटिश राज्य काल के प्रथम भारतीय नस्ल के सर्जन जनरल थे।
तथा
देविका रानी कवि शिरोमणि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के परिवार से थीं। रवींद्र नाथ टैगौर की बहन, सुकुमारी देवी के पुत्र थे।
देविका रानी की माँ  श्रीमती लीला चौधरी व  इंदुमती चौधरी एवं 

सौदामिनी गंगोपाध्याय जी यह तीनों भी रवीन्द्रनाथ टैगौर की बहन थीं।

इस नाते, रवींद्र नाथ टैगौर दोनों संबंधों से
देविका रानी  के पड़ दादा थे।
देविका रानी, भारतीय रजतपट की पहली स्थापित नायिका हैं।
वे  अपने युग से कहीं आगे की सोच रखने वाली अभिनेत्री थीं। 
उन्होंने अपनी फ़िल्मों के माध्यम से, जर्जर सामाजिक रूढ़ियों और मान्यताओं को चुनौती देते हुए,
नए मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को स्थापित करने का बीड़ा उठाया था।

कन्या देविका के शैशव काल में, नव (९) वर्ष की बालिका  को, परिवार ने उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया । जब युवा हुई  तब  देविका ने सं. १९२० में, रॉयल एकेडमी ऑफ़ ड्रामेटिक आर्ट्स संस्था से कला, स्थापत्य शास्त्र, कपड़ा निर्माण, साज सज्जा जैसे विषय ले कर स्नातक बन उत्तीर्ण हुईं।
" एलिज़ाबेथ आर्डन " नामक सुप्रसिद्ध सौंदर्य प्रसाधन निर्माण की वैश्विक संस्था में भी देविका ने शिक्षा ली।
सं. १९२७ तक देविका कई  विविध विषयों की शिक्षा लेतीं रहीं।
सं. १९२८ में हिमांशु राय जो बैरिस्टर  भी थे व फिल्म निर्माता भी थे वे
" थ्रो ऑफ़ डाइस " फिल्म के निर्माण में संलग्न  थे। हिमांशु राय से देविका की मुलाक़ात यूरोप में हुई। देविका रानी ने फिल्म निर्माण प्रक्रिया में हिमांशु राय का साथ दिया। मुलाकात के बाद वे दोनों जर्मनी गए। जर्मनी की राजधानी बर्लिन शहर में जी. डब्ल्यू पैबस्ट तथा फ़्रिट्ज़ लेंग नामक प्रसिद्ध निर्माताओं से मुलाकातें होने पर उन्हें फिल्म निर्माण की तकनीकी जानकारी व ज्ञान में काफी इजाफा हुआ।
हिमांशु राय देविका रानी ने एक नाटक में साथ ~ साथ काम किया जिसे
# स्वीट्ज़रलैंड
व  स्केंडिनेविया जैसे मुल्कों में अपार ख्याति मिली।
अब देविका रानी व हिमांशु राय ने विवाह कर लिया।
सं. १९३३ में फिल्म ' कर्मा ' प्रथम इंग्लैण्ड में निर्मित किसी भारतीय निर्माता की बनीहो ऐसी पहली फिल्म थी।  फिल्म ' कर्मा ' भारतीय, जर्मन व इंग्लैण्ड इन तीन देशों के साझा सहकार से निर्मित किया गया था। फिल्म "कर्मा"  से देविका रानी ने नायिका तथा अंग्रेज़ी व हिंदी गीत की गायिका के रूप में अपनी कारकिर्दी शुरू की थी। फिल्म ' कर्मा ' को हिंदी भाषा में,'  नागिन की रागिनी '  नाम से रुपहले परदे पर उतारा गया। किन्तु यह फिल्म, विदेश में सफल रहते हुए भी भारत में असफल रही। इंग्लैण्ड स्थित ब्रिटिश रेडियो प्रसारण सेवा
बी. बी. सी.  ने देविका रानी को  अपने एक विशिष्ट प्रसारण कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया। 
यह लिंक है  देविका रानी : अनजान फिल्म का गीत गाते हुए ~~ https://www.youtube.com/watch?v=fPzGFWNYZs4


सं. १९३४ में, हिमांशु राय ने " बॉम्बे टाकीज़ फिल्म निर्माण संस्था "
को बंबई शहर में स्थापित किया। संस्था के फिल्म निर्माण स्टूडियो,
उस वक्त समस्त भारत में तकनीकी उपकरणों से लैस थे ये सर्वश्रेष्ठ  संस्था थी । बॉम्बे टॉकीज़ द्वारा बंगाली निरंजन पाल को बतौर पटकथा लेखक  व फ्रांज़ ऑस्टीन को छायांकन विशेषज्ञ के रूप में अनुबंधित किया गया। 
Bombay Talkies" बॉम्बे टाकीज़"- संस्था की प्रथम फिल्म ' जवानी की हवा ' का छायांकन एक  ट्रेन में हुआ था। इसी फिल्म में देविका रानी के साथ नज़्म उल हक्क नामक एक नायक काम कर रहे थे। दोनों में परिचय बढा। 
बॉम्बे टॉकीज़ संस्था की दुसरी फिल्म ' जीवन नैया ' में फ़िर दोनों को नायक नायिका लेकर निर्माण शुरू हुआ। जीवन नैया शीर्षक के अनुरूप, असल जीवन में यह फिल्म जीवन नैया हिमांशु राय व देविका रानी के जीवन मंझधार में हिचकोले लेती हुई आयी । क्योंकि फिल्म आधी अधूरी ही  बन पायी  थी तब देविका रानी  अपने फिल्म के नायक नज़्म उल हक्क के संग बंबई से कलकत्ता भाग गयीं ! अब तो कलाकारों की फिल्म जीवन नैया, उनके असल जीवन और फ़िल्मी जीवन, दोनों में डावांडोल होने लगी !   
बॉम्बे टाकीज़ में उस समय बंगाली बाबू शशधर मुखर्जी ( नायिका काजोल के दादा जी हैं) स्वर संधान के सहकारी कर्मचारी पद पर कार्य कर रहे थे।
देविका रानी व शशधर मुखर्जी दोनों बंगाली भाषी होने से, शशधर के समझाने बुझाने पर, देविका रानी, किसी तरह पुनः बंबई, हिमांशु राय के घर लौटने को राज़ी हुईं परन्तु दोनों के सम्बन्ध अब, मात्र औपचारिक रह गए थे।
देविका रानी की ' गैरउपस्थिति से, बॉम्बे टाकीज़ संस्था की फ़िल्में रुक गईं थीं और लेनदारों से, पैसे उधार लेने के कारण,  संस्था को भारी नुक्सान भी हुआ था। आखिरकार, कलाकार  अशोक कुमार को नायक बनाकर, फिल्म
जीवन नैया को जैसे तैसे पूरा कर, प्रदर्शित किया गया।
उसके बाद सं. १९३६ में बनी फिल्म " अछूत कन्या" नायक  अशोक कुमार व देविका रानी को दुबारा साथ लेकर बनाई गई ।
सं. १९३७ में फिल्म जीवन प्रभात में फिर दोनों की जोड़ी तीसरी बार, परदे पर लाई गयी।  आगे के वक्त में, अशोक कुमार के साथ देविका रानी ने कुल १० अन्य फिल्मों में भी काम किया।
सं. १९३७ में फिल्म ' इज़्ज़त'  आई। सं. १९३८ में २ और फ़िल्में -  ' निर्मला ' व ' 'वचन' आयी। सं. १९३९  में फिल्म ' दुर्गा ' बनी। अचानक सं. १९४०  में हिमांशु राय का निधन हो गया।
सं. १९४१ में, बॉम्बे टॉकीज़ द्वारा शशधर मुखर्जी के  सहकार से  फिल्म
' अनजान ' 
नायक अशोक कुमार के साथ बनायी गयी ।
सं. १९३४ में निर्मित फिल्मों ' बसंत ' व 'किस्मत 'को अच्छी सफलता मिली । यह फ़िल्में देविका रानी की नायिका के किरदार में बनीं अंतिम फिल्म थी।

सं. १९४३ में निर्मित हुई फिल्म " हमारी बात " ! "हमारी बात" युवा कवि नरेंद्र शर्मा के गीतों से सजी, नरेंद्र शर्मा हिंदी सिनेमा जगत में पदार्पण
करवाती हुई,  कवि की यशस्वी कारकिर्दी को  आरम्भ करती  सर्व प्रथम फिल्म थी। सुप्रसिद्ध अभिनेता, निर्माता, निर्देशक श्री राज कपूर साहब ने इसी  फिल्म हमारी बात के लिए, एक छोटे से पात्र में पहले पहल अभिनय किया था।
श्री #राज #कपूर ने सं १९३० में इसी बोम्बे टोकीज़ में क्लप्पेर बॉय तथा सहायक कर्मचारी बन कर अपनी  फिल्मी कारकीर्दी की शुरुआत की थी।  मशहूर गायिका व तारिका सुरैया ने भी बाल कलाकार के रूप में, बॉम्बे टाकीज़ से काम करना शुरू किया था।
सं. १९४४ में एक नवोदित कलाकार #दिलीप #कुमार को लेकर फिल्म
" ज्वार - भाटा" का निर्माण हुआ जिस के सभी गीत #नरेंद्र #शर्मा जी ने लिखे - 
युसूफ खान को यह नाम दिलीप कुमार नरेंद्र शर्मा ने ही सुझाया था। 
३ नाम चुने गए थे १) जहांगीर २) वासुदेव ३) दिलीप कुमार !
ज्योतिष शसस्त्र के अच्छे जानकार नरेंद्र शर्मा ने आग्रह किया कि दिलीप कुमार नाम से कारकिर्दी शुरू कीजिए तब अपार सफलता हासिल होगी ! नरेंद्र शर्मा जी ने यह कहा था कि, " दिलीप कुमार नाम चुन लो ~ इसी नाम से, तुम्हारे नाम का डंका बजेगा ! "  और समय साक्षी है इस भविष्यवाणी का और यह नरेंद्र शर्मा जी की कल कही बात, आज सौ /  १०० प्रतिशत सच निकली है यह हम सब जानते और मानते हैं।
       संगीतकार श्री अनिल दा और नरेंद्र शर्मा के गीत संगीत से सजी फिल्म
" ज्वार  - भाटा " में, एक नया चेहरा बतौर नायक पेश किया गया जिनका नामकरण भी नरेंद्र शर्मा ने किया था और वह थे युसूफ खान यह भी हम पढ़ चुके हैं !! जिन्हें विश्व आज दिलीप कुमार के मशहूर नाम से पुकारता है!
फिल्म : " ज्वार  - भाटा " में, नया चेहरा बतौर नायक पेश किया गया उन सुप्रसिद्ध नायक दिलीप कुमार का नाम - इसके अलावा आकाशवाणी के सुगम संगीत कार्यक्रम विविधभारती का नामकरण नरेंद्र शर्मा जी ने किया है।
भारत अनेकों  सुविख्यात पार्श्व गायकों ने भी आगे के समय म ें गीतकार नरेंद्र शर्मा रचित अनेक गीत गाये। संगीतकार  अनिल दा की पत्नी, गायिका  मीना कपूर जी ने विविधभारती के सुगम संगीत कार्यक्रम के लिए यह गीत गाया~ 

" चौमुख दीवला बाट धरूंगी, चौबारे पे आज,
   जाने कौन दिसा से आयें, मेरे राज कुमार "
( ये गीत आकाशवाणी रेडियो सेवा से आज भी अकसर बजता रहता है  )
गायिका छाया गांगुली जी ने गाया
" मेरी माटी की कुटिया में, हे  राम राटी भर दीप जले  "
मीना कपूर जी की आवाज़ सुनिए - फिल्म  परदेसी का एक सुमधुर गीत~
संगीत अनिल दा का और नायिका थीं नर्गिस दत्त
भारत के अन्य सभी श्रेष्ठ गायिकाएँ व गायकों ने नरेंद्र शर्मा के लिखे गीतों का अपना स्वर दिया है। हमारी लाडली, श्री आशा ताई भोंसले जी, श्री मन्ना डे बाबू, श्री हेमंत कुमार, श्री मुकेश चन्द्र माथुर से लेकर सुरेश वाडकर तक के गायकों ने, पण्डित नरेद्र शर्मा रचित गीतों को गाया है। सुरीली गायिका सुरैया जी का गाया तथा गीतकार नरेंद्र शर्मा का लिखा यह गीत सुनिए~~ 
http://www.downmelodylane.com/suraiyya.html

" नैना दीवाने एक नहीं माने, करे मन मानी, माने ना ! "
Bombay Talkies :

देविका ने दस वर्ष के अपने फ़िल्मी कैरियर में, कुल जमा १५  फ़िल्मों में  काम किया। लेकिन उनकी हर फ़िल्म को क्लासिक का दर्जा हासिल है। विषय की गहराई और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी उनकी फ़िल्मों ने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और भारतीय फ़िल्म जगत् में नए मूल्य और मानदंड स्थापित किए।  देविका रानी को ' सत्यम शिवम् सुंदरम '  चरितार्थ करनेवालीं एक अनुभवी, दूरद्रष्टा व  सफल नारी के दृष्टांत से, भारत ही नहीं विश्व भर में प्रत्येक वर्ग से दृढ मान्यता प्राप्त हुई। 
          देविका रानी हिंदी फ़िल्मों की पहली ' स्वप्न सुंदरी' कहलाईं गईं।
उन्हें प्यार भरा एक और विशेषण ' पटरानी '  भी दिया गया ! देविका रानी
' ड्रैगन लेडी '  जैसे विशेषणों से भी अलंकृत हुईं। देविका को उनकी ख़ूबसूरती, शालीनता तथा  धाराप्रवाह अंग्रेज़ी सम्भाषण पर प्रभुत्त्व के लिए, आज भी याद किया जाता है।  अभिनय कौशल के लिए, देविका रानी को, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, जितनी लोकप्रियता और सराहना मिली है  उतनी कम ही अभिनेत्रियों को नसीब हो पाती है। अपनी निर्माण संस्था बॉम्बे टाकीज़ में फिल्मों में नायिका बनने से संन्यास लेने के कुछ समय पश्चात,  देविका रानी की मुलाकात एक संभ्रांत, कुलीन ने रशियन चित्रकार रोरिच से हुई तथा रोरिच के संग , देविका रानी ने विवाह कर लिया।






विवाहोपरांत  दक्षिण भारत के कर्नाटक प्रांत में, ४५० एकड़ फैले, अति  विशाल ऐसे " टाटागुनी एस्टेट नाम से पहचाने जाते एस्टेट में देविका रानी व रोरिच रहने लगे तथा मृत्यु पर्यन्त रहे। 

क्या अब आप " सत्यम शिवम् सुंदरम "  संस्कृत सुभाषित का यह सम्बन्ध या कहें तो कनेक्शन समझ रहें हैं ? देविका रानी ने फिल्म निर्माण से, रुपहले परदे पर बतौर नायिका के रूप से अपना कार्यकाल समाप्त किया उस के
कई वर्षों पश्चात, हिंदी सिनेमा जगत के " ग्रेटेस्ट शो मेन " कहलानेवाले सुप्रसिद्ध निर्माता, निर्देशक तथा नायक, श्री राज कापूरजी ने अपनी फिल्म
" सत्यम शिवम् सुंदरम " शीषक लेकर  फिल्म बनाई थी !
उन की फिल्म उक्त फिल्म का शीर्षक गीत भी तब राज सा'ब ने,
मेरे पापाजी पं. नरेंद्र शर्मा जी  से ही लिखवाया !
 फिल्म
" सत्यम शिवम् सुंदरम " शीर्षक से बनी। इस घटना से यही सिद्ध होता है कि श्री राजकपूर जी अपनी पहली फिल्म में काम किया था उस बॉम्बे टाकीज़ फिल्म निर्माण संस्था को भूले नहीं थे नाही भूले थे बॉम्बे टाकीज़ की मालकिन देविका रानी को जिन्हें हिंदी फिल्म सँसार ने इसी  " सत्यम शिवम् सुंदरम "  उपाधि से नवाज़ा था !  
गीतकार  नरेंद्र शर्मा ने, देवानंद , चेतनानन्द की नई फिल्म कम्पनी
" नवकेतन "
का नाम सुझाया था तथा नवकेतन द्वारा निर्मित प्रथम फिल्म: अफसर के गीत लिखे जिसे सुरैया ने गाये।
 Afsar (1950).jpg नवकेतन निर्माण संस्था की दुसरी फिल्म : आँधियाँ के लिए भी गीत लेखन किया था।   संगीतज्ञ अली अकबर खां ने नरेंद्र शर्मा जी के गीतों को संगीतबद्ध किया । भारतीय शास्त्रीयसंगीत के महान गुरु,  बाबा अल्लाउद्दीन खां के, अली अकबर खां सुपुत्र हैं। सगीत विशारद, संतूर विशेषज्ञ अन्नपूर्णा जी, अली अकबर खां की बहन हैं और सुप्रसिद्ध सितार वादक श्री रविशंकर जी, सुप्रसिद्ध  बाबा अल्लाउद्दीनन खां साहब के शिष्य रहे।   1951-315610-8957412d5b5321d70d1d2c9776c988c41928a9a9.html
सं. १९५१ में बनी फिल्म ' मालती माधव' चित्रपट की पटकथा नरेंद्र शर्मा ने लिखी। उसी फिल्म का यह कर्णप्रिय गीत 
" बाँध प्रीति फूल डोर, मन लेके चित्त चोर, दूर जाना ना,"
का यह गीत, संगीतकार श्री सुधीर फडकेजी  और स्वर साम्रागी पूज्य लता मंगेशकर जी ने अत्यंत मनमोहक स्वरों से सजाया है~
http://connect.in.com/andaz-apna-apna/play-video-koi-banaa-aaj-apna-lata-malti-madhav-
स्व. सुधीर फडके और पापा -- दूरदर्शन पर एक साथ देखिये --

फिल्म : भाभी की चूडियाँ का  मेरा सबसे प्रिय गीत भी सुन लीजिये~~ 
          
अपनी में युवावस्था में नरेंद्र शर्मा एक बार काशी गए थे। वहां युवा कवी के ह्रदय में वैराग्य की प्रबल भावना जाग उठी।  उनका आत्म कथन है कि गँगा मैया की धारा के मध्य द्वीप बना हुआ था जहां एक प्रखर सन्यासी बाबा जप तप किया करते थे। एक दिन नरेंद्र शर्मा उनकी शरण में सादर उपस्थित हुए। संत बाबा ने स्नेह सहित युवक का स्वागत किया तथा उस युवक नरेंद्र के के यह कहने पर कि, ' आप मुझे संन्यास दीक्षा दें ' तब सन्यासी बाबा ने हंस कर उत्तर दिया " ना तुम लौट जाओ ईश्वर की आज्ञा यही है कि अभी तुम्हें  कई महत्त्वपूर्ण कार्य पूर्ण करने हैं। अत: संसार त्याग की बात मन से निकाल दो " ~~ युवक  नरेंद्र शर्मा  ने इसे ईश्वरीय संकेत व सन्यासी बाबा का पवित्र आदेश समझ कर, संत की कही बात मान ली थी तथा इस घटना के पश्चात नरेंद्र शर्मा का आगमन बंबई में हुआ तथा फिल्म निर्माण संस्था बॉम्बे टाकीज़ से कार्य आरम्भ हुआ।
 नरेंद्र शर्मा जी का विवाह : बंबई के संभ्रांत गुजराती परिवार के मुखिया श्री गुलाबदास गोदीवाला जी जो सेन्ट्रल रेलवे में चीफ कैरीज और वेगं इन्स्पेक्टर के पद पर भारत के विविध नगरों में जैसे रतलाम, गंगानगर इत्यादि में रेलवे की सेवा से निवृत्त होकर बंबई नगरी में स्थायी हुए थे उनसे एक रोज़ अचानक गीतकार नरेंद्र शर्मा की मुलाक़ात कवी सम्मलेन में हुई।
श्री गोदीवाला के आग्रह निवेदन से नरेंद्र शर्मा, गोदीवाला परिवार के अतिथि बन कर पधारे।  श्रीमती कपिला गुलाबदास गोदीवाला का ननिहाल सूरत शहर में रहता था। घायल वकील भी उनके नज़दीकी रिश्तेदार थे -
कपिला बा अति धर्म परायण थीं व लड्डू गोपाल की अनन्य उपासिका थीं वे फिल्म निर्माण से सम्बंधित युवा कवि को बुलाने पर रुष्ट हुईं तथा पास के मंदिर में चलीं गईं। श्री गुलाबदास जी ने अपने युवा अतिथि गीतकार नरेंद्र शर्मा का स्नेह पूर्वक स्वागत किया तथा इसी परिवार की ५ वीं संतान कलाकार बिटिया, कुमारी सुशीला गोदीवाला से, युवा गीतकार नरेंद्र शर्माजी का अगले ७ वर्ष पश्चात विधिवत विवाह सं. १९४७ की १२ मई के शुभ दिवस संपन्न हुआ। 

      सं. १९४६ से सं. १९५३ तक कवि नरेंद्र शर्मा ने बॉम्बे टाकीज़ के अलावा अपना स्वतन्त्र लेखन करते हुए काव्य पुस्तकों का उपहार हिंदी साहित्य जगत को प्रदान किया ।
       सं. १९५३ से सं. १९७१ तक  नरेंद्र शर्मा आकाशवाणी के मुख्य प्रबंधक, व निर्देशक के पद पर रहते हुए, कार्य करते रहे।
         
          मेरे अनुज परितोष ने स्वयं, देहली के प्रकाशकों से, आकाशवाणी स्टाफ से, दूरदर्शन से, कई सारी दुर्लभ जानकारियां एकत्रित कर, उन्हें पंडित नरेंद्र शर्मा सम्पूर्ण रचनावली में समाहित किया है।
बंबई निवास के दौरान ~
भारतीय जन नाट्य संघ संस्था या इंडियन पीपल्स थियेटर असोसिएशन या " इप्टा "  संस्था से भी गीतकार कवि  नरेंद्र शर्मा जी सम्बंधित रहे थे। 
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औपनिवेशीकरण, साम्राज्यवाद व फासीवाद के विरोध में ‘इप्टा’ की स्थापना 25 मई 1943 को की गयी थी। ‘इप्टा’ का यह नामकरण सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने किया था।  
 सुप्रसिद्ध सितारवादक श्री रविशंकर जी द्वारा स्वर बध्ध किया एशियाड खेलों का स्वागत गीत ' स्वागतम शुभ स्वागतम आनंद मंगल मंगलम ' नरेंद्र शर्मा जी ने लिखा तथा नृत्य सम्राट श्री उदय शंकर जी ~ के  छोटे भाई
श्री सचिन शंकर जी
की नृत्य नाटिकाओं के लिए पं. नरेंद्र शर्मा जी ने गीत  लेखन कार्य किया।  नृत्य  विशारद सचिन  शंकर जी की नृत्य नाटिका के लिए पंडित नरेंद्र शर्मा जी ने कई पटकथाएं लिखीं।  ~ नाम है ~ १ - मछेरा और जलपरी :  जिसका संगीत सलिल चौधरी ने दिया है।  गीत पंडित नरेंद्र शर्मा के थे और अन्य २ और नाटिकाएँ भी थीं इनके नाम भूल रही हूँ!



आगे विविधभारती रेडियो प्रसारण सेवा के लिए असंख्य रूपक  पंडित नरेंद्र शर्मा जी ने लिखे। विविधभारती प्रसारण सेवा में कार्यकारी रहे
जनाब 
रि‍फत सरोश जी के शब्दोँ मेँ आगे की कथा सुनिये ~~
" नरेन्द्र जी हमारे हिन्दी विभाग के कार्यक्रमोँ मेँ स्वेच्छा से आने लगे - एक बार नरेन्द्र जी ने एक रुपक लिखा " चाँद मेरा साथी " उन्होँने चाँद के बारे मेँ अपनी कई कवितायेँ जो विभिन्न मूड की थीँ, एक रुपक लडी मेँ इस प्रकार पिरोई थी कि मनुष्य की मनोस्थिति सामने आ जाती थी।  वह सूत्र रुपक की जान था ! मुझे रुपक रचने का यह विचित्र ढँग बहुत पसँद आया और आगे इस का प्रयोग भी किया। मैँ बम्बई रेडियो पर हिन्दी विभाग मेँ स्टाफ आर्टिस्ट था और अब्दुल गनी फारुकी प्रोग्राम असिस्टेँट !
फारुकी साहब नरेन्द्र जी से किसी प्रोग्राम के लिये कहते,
वे फौरन आमादा हो जाते !आते, और अपनी मुलायम मुस्कुराहट और शान्त भाव से हम सब का मन मोह लेते ! आकाशवाणी की रंगारंग सेवा विविध भारती का शुभारम्भ हुआ। सर्व  प्रथम प्रसार - गीत, जो रेडियो से बजावह यह गीत था ~~ 
" नाच रे मयूरा
खोल कर
सहस्त्र नयन,
देख सघन गगन मगन
देख सरस स्वप्न
जो के आज हुआ पूरा,
नाच रे मयूरा "
श्री मन्ना डे के स्वर में गूंजा इसी गीत से AIR / ए. आई. आर. रेडियो प्रसारण सेवा विविध भारती का श्री गणेश हुआ ! 'विविध भारती' के साथ-साथ, इसके अन्य कार्यक्रमों जैसे 'हवामहल', 'मधुमालती', 'जयमाला', 'बेला के फूल', 'चौबारा', 'पत्रावली', 'वंदनवार', 'मंजूषा', 'स्वर संगम', 'रत्नाकार', 'छायागीत', 'चित्रशाला', 'अपना घर' आदि का नामकरण भी नरेन्द्र शर्मा ने ही किया और देखते-देखते देश भर में रेडियो सीलोन के श्रोता 'विविध भारती' सुनने लगे। 'आकाशवाणी' के इतिहास में 'विविध भारती' की यह सफलता स्वर्णिम अक्षरों में लिखी जायेगी, जिसका श्रेय नरेन्द्र जी के अतिरिक्त और किसी को नहीं मिल सकता।    
  पण्डित  नरेन्द्र शर्मा जी ज्योतिषी  के प्रकांड ज्ञाता भी थे। 'विविध भारती' प्रोग्राम २ अक्टूबर १९५७ को शुरू होने वाला था। फिर तारीख़ बदली। आख़िर 
उन्होंने अपनी ज्योतिष विद्या की रोशनी में तै किया कि यह प्रोग्राम ३ अक्टूबर १९५७ के शुभ दिन शुरू होगा और प्रोग्राम का शुभारंभ हुआ
फिल्म हो, रेडियो रूपक हो या रंगमंच पे प्रस्तुत नृत्य नाटिका हो या  पुस्तकें हों
इन विविध कला क्षेत्रों के लिए लिखे गए समस्त लेखन के अलावा,  पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा जी के निजी कागजातों से छांट कर,४० पुस्तक तैयार हों उतनी सामग्री, एकत्रित हुई है।
       प्रचुर साहित्यिक सामग्री को सुव्यवस्थित ढंग से संपादित करने के बाद, १६ खण्डों में पण्डित नरेंद्र शर्मा : सम्पूर्ण रचनावली : उनके पुत्र श्री परितोष नरेंद्र शर्मा के १८  वर्षों के अथक परिश्रम से साहित्यकार की साधना स्वरूप नरेंद्र शर्मा समग्र रचनावली तैयार हो कर प्रकाशित हो चुकी है तथा भारत की विभिन्न संस्थाओं व विश्व विद्यालयों के पुस्तकालयों में पहुँच चुकी हैं। 
मेरे अनुज परितोष ने आभार तथा प्राक्कथन  लिखा है। परितोष को, अम्मा और पापा जी के पत्र भी मिलें हैं। उसका कहना है के वे अद्`भुत हैं !!
अम्मा, पापा जी, पिछले जन्म के कर्म पूरे करने इस जन्म में आकर मिले थे। दोनों की पवित्र आत्माएं, घुलमिल गयीं थीं।
ऐसे पवित्र माता और पिता की संतान होना  मेरे इस छोटे से जीवन का परम सौभाग्य है, मैं तो यही  मानती हूँ। उनकी पवित्र छत्रछाया तले बड़े होते हुए मैंने उन्हें कभी ऊंची आवाज़ में हमारे घर में बोलते हुए सुना नहीं !
        पापा जी बेहद संवेदनशील, दुसरे की भावनाओं की क़द्र करनेवाले और उन्हें आदर देनेवाले,परम दयालु, परोपकारी, सांसारिक बंधनों से निर्लिप्त, कँवल की तरह, निर्लिप्त थे ~ विश्व की हर गंदगी से बहुत ऊपर खिले रहकर एकमात्र  ईश्वर में अपनी चेतना को पिरोये, सादा तथा सात्विक जीवन जीने वाले महापुरुष थे, परम योगी थे एवं एक संत कवि थे।
मेरी अम्मा उन्हीं की प्रतिछाया सी थीं!
मानों वे दोनों अमर युगल आधुनिक कालखण्ड के ऋषि वसिष्ठ व् उनकी धर्मपत्नी अरुंधती थे ! -
 मेरी अम्माँ कहानियाँ भी बहुत सुन्दर लिखतीं थीं और प्रसिद्ध पत्रिकाएं नवनीत तथा धर्मयुग में श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा की कहानियाँ छपीं थीं ! पर चित्रकला में अम्मा की रूचि सर्वादिक मुखर हुई। हमारे घर की सुरुचिपूर्ण देखभाल करना, हम ४ बच्चों की स्नेह मिश्रित अनुशाशन से हमारी परवरीश करना, पाक कला में तो मेरी अम्माँ साक्षात अन्नपूर्णा थीं उन्हें जो भी व्यक्ति मिला कदापि भूल नहीं पाया ! 
अम्माँ पापाजी की कुटिया के द्वार पर पधारे, हर अतिथि के लिए, दिनचर्या  व  समय के अनुसार भोजन, चाय, नारियल का ताज़ा शीतल जल, गर्मियों में नीम्बू का शरबत, स्वादिष्ट नाश्ता, सभी शुद्ध शाकाहारी~  ऐसा सुस्वादु भोजन हमेशा सुलभ रहता था। -आज सोचती हूँ कि सीमित संसाधनों के रहते गृहस्थी का यह सारा प्रबंध करना अम्माँ के लिए कितना कठिन रहा होगा! ... अब  यूं समझ लिजीये कि हमारा ये छोटा सा घर, श्री द्वारिकाधीश श्रीकृष्णजी के सखा सुदामा के घर जैसा ही तो घर था। घर भी कैसा था  ? यदि  कहूं के , ' आश्रम जैसा ' - शांति और सात्विक पवित्रता से भरा - भरा घर था ! घर के कमरों में अम्माँ द्वारा सजाये हुए अम्मा की बागबानी के हुनर से मुस्कुराते, सजीले, सुगन्धित पुष्प स्वस्तिक या ॐ आकार से सजे हुए रहते थे तथा उन मोगरे जूही, चमेली के फूलों के साथ मंद महकतीं हुईं मंद अगरबतीयों की महक भी घुलमिल जाती थी और अम्मा की बगिया के सुगंधी पुष्पों से सजा हुआ हर कमरा इतनी शांति बिखेरता था कि प्रत्येक आगंतुक का ह्रदय प्रसन्न हो उठता था। ऐसा घर था हमारी प्यारी अम्माँ के जतन से सुसज्जित वह घर के यहां पधारनेवाला हर आगंतुक कुछ पल के लिए, यहां प्रवेश करते ही, मानसिक व शारीरिक विश्राम पा लेता था। 
हमारे अम्माँ पापा जी के घर का नंबर था -- ५९४ ! १९ वे रास्ते खार उपनगर में बसा यह  घर, जिस का वातावरण ऐसा सात्विक था उस का कारण मेरी अम्मा का अथक परिश्रम तथा एक कुशल गृहिणी का न्याययुक्त उदार मना शासन था।
हमारे पापा जी तो, भोले भंडारी थे! उनकी पुस्तकें, उनके मित्र, साहित्य, कला जगत, सुबह में चाय और अखबार, सादा भोजन यही, बस, यही सब तो उन्हें प्रिय था! मेरे कोटि शत  कोटि प्रणाम करते हुए, अब आज्ञा ~~
~~ लावण्या