Tuesday, December 13, 2011

क्रिसमस की अग्रिम शुभकामनाएँ

क्रिसमस की अग्रिम शुभकामनाएँ – लावण्या शाह

मरीकी जीवन शैली की ये एक ख़ास बात है यहाँ हर तरह के बदलाव के साथ, जन जीवन यूँ ही, अबाध गति से, व्यस्तता से, जारी रहता है। काम चलता ही रहता है। विषम या अनुकूल, जैसी भी परिस्थितियाँ हों, उनसे जूझने के उपाय फ़ौरन लागू किए जाते हैं और जन – जीवन को सामान्य बनाने के उपाय, शीघ्र लागू करना हरेक प्रांत की नगर निगम सेवा का जिम्मा है। यातायात हर हालत में, जारी रहता है क्यूंकि, सभी को काम पे जो जाना होता है ! जहाँ बिल भरने हों वहां विपरीत परिस्थिति हो, फ़िर रोना कैसा ? रुकना कैसा ? सरकार द्वारा , जनता से लिया गया ” कर ” माने ” टैक्स” , जनता की सुविधा के लिए इस्तेमाल होता हुआ, आप अमरीका में हर जगह पर देख सकते हैं और यही बात शीत ऋतु में भी दिख पडती है । जब बर्फ गिरती है तब लोग अपने घरों के बाहर एकत्रित हुई स्नो को स्नो शवल से दूर करते हैं । ‘ बर्फ हटाना ‘ यह काम बहुत कड़े परिश्रम से ही संभव हो पाता है । चूंकि बर्फ का वजन अधिक होता है और जिन्हें कमजोर दिल की आरोग्य की समस्या हो उनके लिए ये काम खतरनाक भी साबित होता है । इस बात की सूचना टेलीविजन द्वारा प्रसारित की जाती है।
अमेरीकी नगर निगम, ट्रैक्टर नुमा मशीन का इस्तेमाल करती है जो रास्तों पर से स्नो को हटाती हैं और रास्तों पर नमक भी छिड़का जाता है जिससे बर्फ शीघ्र पिघल जाती है। रास्ते साफ़ किए जाते हैं और हवाई जहाजों को भी स्नो रहित किया जाता है। मशीन से केमिकल स्प्रे किया जाता है जिससे बर्फ पिघल जाती है और इस प्रक्रिया को, ” di -icing ” कहते हैं। जब कंट्रोल रूम से,पायलट को उड़ान भरने की स्वीकृति मिल जाती है उसके बाद ही उड़ान के लिए यात्री विमान में सवारी के लिए आमंत्रित किए जाते हैं अन्यथा यात्रीगण प्रतीक्षा कक्ष में इंतज़ार करते हैं।
अमेरीका में आर्थिक मंदी के रहते हुए भी क्रिसमस के सबसे बड़े त्यौहार के आने से असंख्य नागरिक एक हिस्से से दुसरे तक यात्रा करेंगे और अपने-अपने परिवार के लोगों के साथ मिलकर छुट्टी बिताना पसंद करेंगे। स्नो गिरे या बरखा,गरमी हो या लू चले, काम काज चलता ही रहता है ना ! शायद यही आज के अत्यन्त व्यस्त जीवन शैली की देन है समाज को।
अब क्या भारत या क्या विदेश? सभी व्यस्त हैं! अपने अपने कार्यों में! दिसम्बर माह सन २०११ का आख़िरी महीना आने के साथ काल की तुलना नदी और समुद्र से समुद्र बाहरी काल, नदी भीतरी काल नदी हमारे भीतर है समुद्र हमारे चारों ओर रहस्यवादी अनुभूति जिस लोक को छूती है उसमें काल नहीं है वह कालातीत है इलियट ने कहा था, ” काल से ही काल पर विजय होती है ” और बाबा श्री तुलसीदास का दोहा, कहता है,
” पल निमेष परमानु जुग बरस कलप सर चँड,
भजसि न मन तेहि राम कहं काल जासु कोदँड।
दिसम्बर के मध्य में आते ही क्रिसमस से जुडी शख्शियत ‘‘संता क्लोज़’’ का भी इंतज़ार हर बच्चे को रहता है ।
ये हमारे ‘‘सान्ता क्लोज़’’ हैं। संता केवल एक धर्म विशेष के नहीं बल्कि पूरी मानवता के जीवन्त प्रतीक हैं। संता की सफ़ेद बर्फ के बीच में सफ़ेद दाढी की शोभा ही अलग है। आप उन्हें किसी भी नाम से पुकार लीजिये ‘‘संत निकोलस’’, क्रिस क्रींगल, क्रिसमस पिता ऐसे कई नाम से ये पहचाने जाते हैं और दुनिया भर के बच्चे इनका बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। बच्चों को बड़ी उम्म्मीदें लगीं होतीं हैं सान्ता क्लोज़ जी से। चूंकि, वे तोहफे लेकर आते हैं। सान्ता की मदद करने के लिए एक पूरी टीम एल्फ की भी तैयार रहती है। मिसिज क्लोज़ बच्चों को देने के लिए कुकी, केक, पाई, बिस्कुट, केंडी भी तैयार करतीं हैं। साल भर सान्ता क्लोज़ और मिसिज क्लोज़ बच्चों के लिए, खिलौने तैयार करवाते हैं और जादूई थैले में उन सारे गिफ्ट को भर कर ‘‘नॉर्थ पोल’’की बर्फ से घिरी गलियों से सान्ता क्लोज़ आवाज़ लगाते हैं अपने प्यारे और वफादार ‘स्ले’ खींचनेवाले पालतू रेंडीयरों को जिन के नाम हैं, ‘‘रुडोल्फ़, डेशर, डांसर, प्रेन्सर, विक्सन, डेंडर, ब्लिटज़न, क्युपिड और कोमेट’’। सान्ता क्लोज़ ख़ास तौर से क्रिसमस के त्यौहार में बच्चों को खिलौने और तोहफे बांटने ही तो उत्तरी ध्रुव पर आते हैं बाकि का समय वे लेप लैन्ड, फीनलैन्ड में रहते हैं। बहुत बरसों पहले की बात है जब साँता क्लोज और उनके साथी और मददगार एल्फों की टोली ने जादू की झिलमिलाती धूल, रेंडीयरों पर डाली थी उसी के कारण रेंडीयरों को उडना आ गया !! सिर्फ क्रिसमस की रात के लिये ही इस मैजिक डस्ट का उपयोग होता है और सान्ता क्लोज़ अपना सफर शुरू करे उसके बस कुछ लम्होँ पहले मैजिक डस्ट छिड़क कर, शाम को यात्रा का आरम्भ किया जाता है। और बस फुर्र से रेंडीयरों को उडना आ जाता है और वे क्रिसमस लाईट की स्पीड से उड़ते हैं। बहुत तेज।
संत निक के बच्चे उनका इन्तजार जो कर रहे होते हैं। हर बच्चा, दूध का गिलास और ३-४ बिस्कुट सान्ता के लिए घर के एक कमरे में रख देता है । जब बच्चे गहरी नींद में सो जाते हैं और परियां उन्हें परियों के देश में ले चलती हैं, उसी समय सान्ता जी की रेंडीयर से उडनेवाली स्ले हर बच्चे के घर पहुँच कर तोहफा रख फिर अगले बच्चे के घर निकल लेती है । आप सान्ता का सफर यहाँ देख सकते हैं ताकि आपके घर पर वे कब तक पधारेंगें उसका सही सही अंदाज़ , आप लगा सकें।
क्लिक करें – http://www.noradsanta.org/en/home.html
- क्रेब एप्पल के पेड़ पर , ” फिंच ” नामक पक्षी -
- लावण्या दीपक शाह
[ देखें ' प्रवासी दुनिया ' पे भी ]
http://www.pravasiduniya.com/christmas-ki-advance-best-wishes-lavanya-shah

Friday, December 2, 2011

टैगोर की 150 वीं जयंती : गीतांजली के अमर गायक को स्नेहपूर्ण स्मरणांजलि

टैगोर की 150 वीं जयंती : गीतांजली के अमर गायक को स्नेहपूर्ण स्मरणांजलि



‘एकला चलो रे … तोमार हाक सुने कोयी ना आबे तो तुमी एकला चालो रे – ‘ एकाकी स्वर की करुण पुकार और दृढ निश्चय भरा यह दिव्य स्वर कविवर रविन्द्र नाथ टैगौर की काव्य रचना की इस पंक्ति से उभरा और दिग्दिगंत तक व्याप्त हो गया और कविवर की कीर्ति पताका उनके जन्म स्थान बंगाल तक सीमित न रहकर, विश्व के कोने कोने तक फ़ैल गयी । बंगाल की शस्य श्यामला भूमि पर साहित्य के लिए आगे चलकर सन १९१३ में नोबल पुरस्कार विजेता होने का गौरव प्राप्त करनेवाले भारतीय साहित्यकार, उच्च कोटि के कवि, दार्शनिक, रंगमंच के लिए संगीतबद्ध नाटिकाएं, नृत्य कथाएँ रचनेवाले विलक्षण प्रतिभा के धनी रवीन्द्रनाथ टैगौर के लेखन से उभरे २ गीत , २ देशों के राष्ट्र गान बन कर देश प्रेम की उद्दात भावना उभारते जन मन में अतीव लोकप्रियता प्राप्त करने में सफल हुए हैं । आज हम ऐसे अलौकिक रचनाकार को विनम्र , स्नेहपूर्ण स्मरणांजलि दे रहे हैं और उनके विलक्षण प्रतिभावान जीवन का विहंगावलोकन करते श्रद्धा सुमन निछावर करते हैं।

रवि बाबू का श्वेत श्याम छाया चित्र - यहां वे अपनी डेस्क पर लिखते हुए दिखायी दे रहे हैं

भारतीय राष्ट्र गान, ” जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता ‘ और बांग्ला देश का राष्ट्र गान ” आमार सोनार बांग्ला देश ” रवीन्द्रनाथ की देन है । गांधीजी के लिए ‘ महात्मा ‘ का विशेषण भी गुरुदेव ने ही सबसे पहले उपयोग में लिया था जो आगे चलकर गांधी बापू का पर्याय बना ।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म देवेन्द्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के सन्तान के रूप में ७ मई, १८६१ को कोलकाता के जोरासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। वे ब्राह्मो समाज के अग्रणी परिवार में पल कर बड़े हुए । छोटी उम्र में उन्होंने ‘ अभिलाषा ‘ नामक काव्य लिखा । १३ वर्ष की उम्र होते उनकी माता जी चल बसीं और बड़े भाई ज्योतिन्द्र्नाथ व भाभी कादम्बरी का साथ और प्रोत्साहन मिलता रहा और ‘ कबी कहनी ‘ १८७८ तक छप गयी ।

उनकी स्कूल की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने बैरिस्टर बनने की चाहत में १८७८ में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन १८८० में बिना डिग्री हासिल किए ही स्वदेश वापस आ गए। सन् १८८३ में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ। वाल्मीकि प्रतिभा और काल मृगया , सांध्य संगीत ,निर्झ्रेर स्वप्नभंगे, कोरी ओ कमाल , राजा ओ रानी , मायार खेला, विसर्जन , चित्रांगदा , सोनार तरी , इत्यादी उसी काल की कृतियाँ हैं ।

रवि बाबू का हस्ताक्षर

कविवर की पुत्रियाँ माधुरी लता, रेणुका व मीरा के जन्म के संग संग पारिवारिक जीवन भी गतिशील था और उनकी अनेक साहित्यिक रचनाएं भी उभरतीं रहीं । पुत्र समीन्द्र का जन्म सन १८९४ में हुआ । सन १९०१ में ‘ बंग दर्शन ‘ पत्रिका का कार्य आरम्भ किया और शांति निकेतन में बोलपुर ब्रह्मचर्याश्रम की स्थापना की । सन १९०२ में पत्नी मृणालिनी का देहांत हो गया और ‘ स्मरण ‘ नामक कृति रविन्द्रनाथ जी ने पत्नी मृणालिनी की स्मृति में लिखी और आगे के वर्षों में , पुत्री रेणुका का और १९०५ तक पिता देबेन्द्रनाथ टैगौर का भी निधन हो गया । कोमल कवि ह्रदय पर आघात लगे और गहराए जब पुत्र समीन्द्र के अचानक निधन ने कवि के कोमल ह्रदय को विक्षप्त कर दिया ।

सन १९०९ से अमर काव्य कृति ‘ गीतांजली ‘ की रचना आरम्भ हो गयी थी जिसे उनके यूरोपीयन मित्र विलियम रोथेन्स्ताईन ने रविन्द्रनाथ टैगौर द्वारा अनुदित रचनाएं , ब्रिटेन के कवि येअट्स को सुनवाईं और येअट्स ने टैगौर की अंग्रेज़ी अनुवादित कवितायेँ एजरा पौंड , मय सिंक्लैर , एर्नेस्त रहय को पढ़ सुनाईं तब तक टैगौर अमरीका यात्रा करते हुए आ पहुंचे थे । १०३ कविताओं का संग्रह ‘ गीतांजली ‘ इंडिया सोसायटी ऑफ़ लंदन ने छापीं और यूरोप में इन कविताओं ने धूम मचा दी ! सन १९१३ की १३ नवम्बर को भारत में समाचार बिजली की तरह फ़ैल गये कि रवीन्द्रनाथ टैगौर को साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ है । तब कोलकता विद्यालय ने डी. लिट. की उपाधि से उन्हें नवाजा और ब्रिटिश राज्य सता ने नाईटहूड प्रदान किया जिसे सन १९२० में जलियांवाला हत्याकांड से दुखी होकर कविवर ने लौटा दिया ।

अमरीका के असंख्य शहरों में जैसे सान फ्रांसिस्को, शिकागो, आईयोवा , बोस्टन , फीलाडेल्फीया इत्यादी तथा दक्षिण भारत के शहर जैसे कोईम्ब्तूर, तान्जोर, मद्रास, त्रिची , पालघाट, मैसूर इत्यादी तथा पंजाब , गुजरात में , गांधी जी के आश्रम साबरमती , अहमदाबाद , सुरत पूर्व एशिया के देशों में जैसे रंगून, सिंगापुर , होन्ग कोंग,में टैगौर को लोग सुनने के लिए भारी संख्याओं में उमड़ कर आये और उनके सुलझे और उदात विचारों को सुनकर धन्य हुए । सन १९२० में दुबारा यूरोप के अलग देशों में जैसे ब्रसेल्स , इंग्लैंड , पेरिस , जीनीवा , झुरीख , कोपंन हेगन, वियेना, बर्लिन , स्टोक होम, प्राग इत्यादी में साहित्यिक गतिविधियों में व्यस्त रहे ।

चित्र : फूलों भरी बगिया में कविवर रवीन्द्र नाथ टैगौर

कविवर ने भारलौट कर विश्व भारती की स्थापना की और चीन के आमन्त्रण पर पेकिंग गये और आगे सूदूर जापान भी पहुंचे तद्पश्चात वे दक्षिण अमरीका की यात्रा पे निकले जहां आर्जेन्टीना में उनकी मुलाक़ात , कवियत्री विक्टोरिया ओकाम्पो से, ब्युनोईस एरीस शहर में हुई उन्होंने ‘ विजया के नवीन नामकरण से कवियत्री को पुकारा और ‘ पुरबी ‘ रचना लिखी ।

तद्पश्चात , इटली पहुंचकर , मिलान, वेनिस , फ्लोरेंस शहरों की यात्राएं कीं और यूरोप की अगली यात्रा के दौरान ग्रीस, इजिप्त, रोमानिया , हंगरी , बल्गेरिया, चेकोस्वालोवाकिया, नोर्वे, स्वीडन, डेनमार्क भी गये । मलेशिया, जावा, थाई लैंड, केनेडा, रशिया , ईरान, ईराक, श्री लंका की यात्राएं भी संपन्न कीं । उनकी वर्षगाँठ पर गांधी जी शान्तिनिकेतन पधारे और सन १९४० में विश्व प्रिसिध्ध ऑक्स्फ़र्ड विद्यालय ने उन्हें साहित्य विशारद से विभूषित किया । सन १९४१ की ७ अगस्त के दिन भारत के विश्व प्रसिद्ध साहित्य मनीषी ने नेत्र मूँद लिए परंतु उनकी रचनाएं आज भी जन मन के मानस में अपना अक्षुण स्थान बनाकर , उतनी ही प्रसिद्ध हैं जितनी पिछली शताब्दी में थीं । प्रस्तुत है कविवर रविन्द्रनाथ टैगौर की एक कविता ” जन्म कथा ” का हिन्दी अनुवाद :

मेरा मानना है कि ये कविता , मूल बाँग्ला में शायद इतनी मधुर व सारगर्भित होगी कि इसे हिन्दी अनुवाद में ढालना एक प्रकार की धृष्टता ही कहलायेगी । पर, वही काम आज मैंने किया है ! इस कविता को कई बार पढा है और हमेशा भारतीय मनोविज्ञान तथा दर्शन का पुट लिये, एक अलौकिक दिव्यता लिए , इस कविता की शुचिता तथा माँ के शिशु के प्रति अगाढ ममत्त्व के दर्शन से हमें जोड़ने की क्षमता रखती ये कविता मुझे अभिभूत करती रही है।

जन्मकथा :

” बच्चे ने पूछा माँ से , मैं कहाँ से आया माँ ? “

माँ ने कहा, ” तुम मेरे जीवन के हर पल के संगी साथी हो !”

जब मैं स्वयं शिशु थी, खेलती थी गुडिया के संग , तब भी,

और जब शिवजी की पूजा किया करती थी तब भी,

आंसू और मुस्कान के बीच बालक को ,

कसकर, छाती से लिपटाए हुए , माँ ने कहा ,

” जब मैंने देवता पूजे, उस वेदिका पर तुम्ही आसीन थे ,

मेरे प्रेम , इच्छा और आशाओं में भी तुम्ही तो थे !

और नानी माँ और अम्मा की भावनाओं में भी, तुम्ही थे !

ना जाने कितने समय से तुम छिपे रहे !

हमारी कुलदेवी की पवित्र मूर्ति में ,

हमारे पुरखो की पुरानी हवेली मेँ तुम छिपे रहे !

जब मेरा यौवन पूर्ण पुष्प सा खिल उठा था,

तुम उसकी मदहोश करनेवाली मधु गँध थे !

मेरे हर अंग प्रत्यंग में तुम बसे हुए थे

तुम्ही में हरेक देवता बिराजे हुए थे

तुम, सर्वथा नवीन व प्राचीन हो !

उगते रवि की उम्र है तुम्हारी भी,

आनंद के महासिंधु की लहर पे सवार,

ब्रह्माण्ड के चिरंतन स्वप्न से ,

तुम अवतरित होकर आए थे।

अनिमेष द्रष्टि से देखकर भी

एक अद्भुत रहस्य रहे तुम !

जो मेरे होकर भी समस्त के हो,

एक आलिंगन में बध्ध , सम्बन्ध ,

मेरे अपने शिशु , आए इस जग में,

इसी कारण मैं , व्यग्र हो, रो पड़ती हूँ,

जब, तुम मुझ से, दूर हो जाते हो…

कि कहीँ, जो समष्टि का है

उसे खो ना दूँ कहीँ !

कैसे सहेज बाँध रखूँ उसे ?

किस तिलिस्मी धागे से ?

हिन्दी अनुवाद : – लावण्या दीपक शाह

Tuesday, September 27, 2011

ॐ भारत रत्न , विश्व रत्ना स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी को जन्म दिन की अनेकों बधाईयाँ ! My DIDI :

My DIDI :
A miracle occurred on the auspicious day of September 28 in the year 1929 when a lovely baby girl was born in the city now known as Indore in ' Sikh mohalla ' when the heavens blessed and all the stars were aligned . The proud parents, music stalwart Master Dinanath Mangeshker ji and mother Shudhdhmati were overjoyed as they named her Hema which was changed to Latika or Lata . Latika was a name in successful play Bhaav - Bandhan. This New name " Lata " remained with this baby girl who in the coming years who rose to dizzying heights of unsurpassed fame.
Lata , as a young child artist began her work very early in her life . She was merely 13 years old when she began performing and her singing career began in 1942 . The evergreen song from film Mahal ,
" Aayega aanewala " established her supremacy once & for all.
Now in 2011 after almost 7 decades of her illustrious singing career , the fame and glory of her singing sensation has not diminished even an iota. The most unique VOICE of this world , is certainly hers but it is also a gift for all of us who are the generations born in an independent India .

.
I call her " Didi " ! I have had the privilege to know her because of my Lata father Pandit Narendra Sharma a famous geetkar and poet .
Hers is a voice that is interwoven with the very fabric of my life ..
Like the billion and more Indians who are my brothers and sisters I , too have enjoyed didi's voice which to me is ' Divine " for Me, Didi is the undisputed " Swar Samragnee " the Empress of Music "
she is , Sushri Lata Mangshker ji whom we all address as " DIDI "or our elder sister.
Once again Sept. 28 th is here as we celebrate Didi's birthday & rejoice with her melodious songs.
We listen to the treasure trove of great songs that we have with us and marvel again and again at the simplicity and the inherent sweetness and marvel at the beauty of her amazing voice !
The younger generations will wonder when they will hear her songs and they too will be soothed by the sweet lullaby and by the innumerable song our Didi has sung and which are now part of our everyday life soon they shall belong to the future generations which are still to come.I say she is , " अद्वीतियस्वरी " ! There is no one like her . I call her " Didi " ! Didi's voice is nectar like . Amrutmay = अमृतमय in Sanskrit .
Didi'a youngest sibling Pandit Hriday Nath Mangeshker ji who himself is a superb musician and composer and music connoisseur and he has given us some of Didi's best songs the albums are a testament to them and i name just a few here , Bhagwadgeeta, Gyaneshwari , MEERA , Ghalib, films like Lekin, Maya Memsaab and many masterfully composed by him along with numerous private songs has said once that
" we did not hear Sangeet Samrat Tansen but we are very fortunate to be born in the same century as Didi and to have heard her songs " .
Late Master Dinanath Mangeshkerji was himself a classical Master and his children have followed in their esteemed father's footsteps taking the family name ever higher to glory and to a non - perishable , eternal shining fame. As I look at the musically gifted " Mangeshker Family " I often remember Sant Gyaneshwar's family . There is a divine similarity .
The Mangeshker siblings has the sweet songstress , the versatile Ashatai, the singer with a rustic appeal Ushaji and the reserved and shy Meenaji all who are expert musicians and artists of great caliber .
Among these shining gems , Didi is , India's Kohinoor !
Our neighbor Pakistan envies us for having a singer like Lata Mangeshker.
On every continent didi's songs are heard by appreciative audience.
I have had the great fortune of knowing Didi from a very early age . To us children she was that smiling sweet Lady who walked in with golden payals making melodious tinkling sound as she came into our home and did Namaste to us in reply.
Much later, as it was our privilege to be present in her august presence and to listen to her talk with my papaji late pandit Narendra Sharma and my amma smt. Susheela N. Sharma. Those were idyllic days.
I often thought that those days would never end. but alas they did ! Now Papaji & amma are gone but the memory of those days remains , fragrant as ever in my heart and the images still vibrant and alive and as colorful as ever . Didi is that bridge which takes me back to my childhood home.
Didi's generosity is boundless and her affections are true.
I recall once when she saw us kids running to borrow Ice cubes from our neighbor's home . Didi did not like that & sent a fridge the next day & after much imploring , it was accepted because Papa did not want to accept it . He lived a spartan life .
Didi said on papa's 60 th birthday that she would arrange a musical concert for papa's birthday but papaji said' if you are my daughter , come for a good simple meal and please do not bind me with maya or i will leave you all and head off to Kashi . " The proposed programme never took place but we all did eat together a home made meal prepared by my amma !
There are so many such memories which are present forever in my heart. I can vividly see , Didi arriving for our weddings with silk sarees and asking amma to keep it for us as we looked at her with tear filled eyes looking at our didi who never got married but was gracious and kind when we , her younger sisters were getting married !
How can i ever forget such warm and loving and selfless gestures ?

Didi has shouldered her responsibilities with great aplomb and courage. After Master Dinanathji's untimely demise , his five children were blessed with passion for music and nothing much else. Latadidi took charge of the family and they faced hard times which were soon to become a thing of the past as didi excelled in hindi film music field with one super hit one after other and became an icon by '50's !
Latadidi's AALAAP & then soft sign off lends the song a signature
a " chaap " which is HERS & hers alone !!

She is what she comes across in her singing . Didi is a BEAUTIFUL FEMALE, inside & out.
An honest & sincere kalakaar , a komal hridaya female & above all this ,
a great human being !
MAA SARASWATI has chosen her to be her vehicle . Didi's voice is

the sound of the eternal , manifest .
The anhad naad which can be heard in sweet tones is didi's voice that we hear and it is prasad of Mata Saraswati .
On a human level, Didi loves perfumes and PARIS by Yves Laurent the French perfumers creation is her most favorite scent. There is a scent created by her on her name " Lata " also .
She has created some exquisite gem studded jewelery which has raised thousands of pounds for charity. She loves cricket and supports Indian cricket Team. Didi has sung for charity and raised millions for worthy causes . She is a staunch supporter of India and her troops and her song " Ai mere watan ke logon " has brought tears to the eyes of prime minster Jawahar Lal Nehru . She has sung bhajans written by Smt Lalita Shastriji widow of Shri Lal Bahadur Shastrriji and poems of Shri Atal Bihari Bajpayee ji.
Didi has sung with Pt. Bhimsen Joshi the songs were written by Papaji for this album titled - " Ram Shyam Gun gaan "
on a lighter note, i recall this incident regarding " alaap " in Didi's songs while she was recording songs of " Satyam Shivam Sunderam " and Raj Kapoor saa'b was strictly instructed by Lataji
[ via some one ] not to ENTER her recording space . The song being recorded was " Sunee jo unke aane ki aahat, garibkhana sajaya humne " written by Papa ji Pt. Narendra Sharma and we were at the studio that day
Raj saab who has always been a very mischievous fellow , put just half of his leg inside as he came , near to request DIDI saying in his inimitable style,
' please kuch aalaap jod dijiye na , Lataji ees Gana mei " ......
Didi fumed & said under her breath ,
" alaap hee alaap se poori record bhur doongi --
fir aise hee gana ko release ker dijiyega "
& we all burst out laughing ....
Today as I share this page from my memories I can not help but smile and re live
those wonderful moments and i wish to lord almighty to keep my Didi , safe and happy and smiling and I wish Didi a very Happy Birthday & ask her blessings .
Didi is DIDI! There is No One like her. I'm her bhakt perhaps like All of you here.
I was bowed over by the sheer surge of pride & joy & a zooming kind of tranquility descendded upon my heart recently as i heard her song
' kaise piya se main kahoon mujhe kitna pyar hai,
aankhon ko intezaar hai, dil bekaraar hai '
the effect of this song was mesmerizing .
I felt, what I'd felt many a times before .
Latadidiji was singing this song just for me !
A VOICE which belonged to an ANGEL
from the highest HEAVENS who had descended to Earth to soothe us mortals for few hours with her manna was singing this song just for me. yes i affirmed and reaffirmed
saying repeatedly,
' She is surely a " CELESTIAL BEING " come down to pass this Life among all of US & we r the privileged Ones to hear her singing so many songs with so many different hues which evoke so many different emotions in our hearts to echo silently & surely on this spot in the vastness of Time & space to make US ONE with the infinite !! That is the magic of her voice.
Then I called her and told her how much I loved this song. that was yet another privilege to hear her tinkling laughter which I ALWAYS compare to tiny BELLS made of PURE GOLD !
Not even SILVER bells can have that sound the golden ghoonghroos make that is Didi's laughter !
It is like the sheerest of ( maheen ) clean muslin cloth which can pass through a Ring !! Gossamer being of music Divine we are mesmerized by Thee .
How do I compare Thee O Didi ?
To what shall I compare Thee ?
with immeasurable love & respect
for the One & Only = MY DIDI = Lata Didi !!!
MAY SHE LIVE TO BE MORE THEN 100 + SHATAM JEEVEN SHARAD :
with humble gratitude ............
Sincerely,
- lavanya
भारत रत्न , विश्व रत्ना स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी को जन्म दिन की अनेकों बधाईयाँ !
सादर प्रणाम दीदी , सादर चरण स्पर्श , जन्म दिवस के शुभ अवसर पर आपको ये छोटी बहेन दुलार और ढेर सारा प्यार भेज रही है और दुआ करती है - ईश्वर आपको शतायु करें - शतं जीवेन शरद:
शुभमस्तु
BY : लावण्या दीपक शाह



The last Photograph is of Lavanya Shah clicked in 1974 by Lata Mangeshker ji
me n didi .jpg

7323_186959426619_649611619_4394237_1420697_n.jpg

283229_10150320215671620_649611619_9908125_242027_n.jpg
73296_488533471619_649611619_7491306_7683626_n.jpg
me face.jpeg

Wednesday, September 14, 2011

यू एन ओ मे हिन्दी :

यू एन ओ मे हिन्दी : UNO

यू एन ओ संस्था या संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना सन १९४५ की २४ अक्टूबर के रोज हुई थी. द्वीतीय विश्व युध्ध के पश्चात ५१ राष्ट्रों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र संघ का शांति और सद्भाव बढाने के हेतु से , संगठन किया था

आप अपने कंप्यूटर के जरिए विश्व के किसी भी भाग से यू एन ओ की सैर कर सकते हैं - लिंक देखें और चलिए -

१ ) http://www.un.org/Pubs/ CyberSchoolBus/
२) http://cyberschoolbus.un. org/infonation/index.asp

आज संयुक्त राष्ट्र संघ मे १९५ देश शामिल हैं .यू एन ओ के १००, ००० कार्यकर्ता, शांति स्थापना के कार्य मे , विश्व के कयी मुल्कों मे यू एन ओ के निर्देश पर कार्यरत हैं . अरबी , चीनी , फ्रांसीसी , रशियन और स्पेनिश यू एन ओ की मुख्य भाषाएँ हैं अब हिन्दी भाषा को भी यू एन ओ ने विश्व की एक प्रमुख भाषा मानकर चुन लिया है . Arabic, Chinese, English, French, Russian and Spanish are the UN
संयुक्त साष्ट्र संघ संस्था उत्तर अमरीका गणराज्य के न्यू योर्क शहर मे स्थित है
यू एन ओ के प्रमुख सेक्रेटरी जनरल का चुनाव किया जाता है. सेक्रेटरी जनरल राजनैतिक नेता भी हैं, साथ साथ विश्व के हर व्यक्ति के हितैषी भी हैं ख़ास कर गरीब और नीचले तबक्के मे जी रहे लोगों के हक्क को ध्यान मे रखनेवाले सर्व हितैषी प्रमुख हैं . विश्व मे मुल्कों के बीच तनाव और लड़ाई के समय , हस्तक्षेप कर शांति स्थापना भी यूं एन ओ के सेक्रेटरी जनरल का कार्य है . वे सी ई ओ की भांति इस संस्था का संचालन करते हैं . अब तक सात सेक्रेटरी जनरल संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख पद पर कार्य कर चुके हैं .उनके नाम इस प्रकार हैं --

कोफ़ी अ . अन्नान जी का जन्म घाना


- कार्वावधि : १९९७ से -२००६
- कुमासी , घाना मे जन्मे अन्नान अंग्रेज़ी , फ्रेंच और कयी सारी आफ्रीकी भाषाएँ जानते हैं उन्हें नोबल इनाम भी दिया गया है .




बौत्रोस बौत्रोस -घाली - ईजिप्त

- कार्यावधि १९९२ -१९९६
- श्रीमान घाली का जन्म कैरो , ईजिप्त मे हुआ पेरिस , फ्रांस से उन्हें अंतर राष्ट्रीय कानून मे पी एच डी की डिग्री ली और वे बहुभाषीय , विद्वान रहे हैं जिनकी अनेक पुस्तकें छपी हैं -





जविएर पेरेज़ दे केल्लर पेरु


- कार्यावधि : १९८२ -१९९१
- पेशे से वकील पर बाद मे अंतर राष्ट्रीय कानून मे पेरू विश्विद्यालय मे अध्यापन कार्य किया . ब्राजील, यूनाईटेड कींग्दम, पोलैंड, वेनेजूएला, सोवियत संघ , बोलीविया , इत्यादी देशों मे राजदूत बने



कर्ट वाल्धेइम ऑस्ट्रिया

कर्ट वाल्धेइम ऑस्ट्रिया


संक्त अनदर -वोर्देर्ण , विएन्ना , ऑस्ट्रिया मे जन्म
-कार्यावधि : १९७२ -१९८१
- फ्रांस पेरिस, केनेडा , तथा आफ्रीका के नामीबिया प्रांत मे शांति प्रयास के लिए यात्राएं आस्ट्रिया की सरकार के तहत कीं व लेबनोन, इजराईल, ईजिप्त , जोर्डन , साइप्रस , भी गये - भारत, पाकिस्तान तथा नव निर्मित देश बांग्ला देश के आपसी संबंधों के सुधार के लिए प्रयत्न कीये - आफ्रीका, कारकास , सान्तीआगो, स्टॉक होम , दक्षिण अमरीका , खाडी मुल्क , यूरोप की यात्राएं भी इनके कार्यक्षेत्र का हिस्सा रहे -

यु थांत म्यांमार


कार्यावधि : १९६१ -१९७१
- पन्त्त्नो बर्मा मे जन्मे यु थांत हेड मास्टर थे . दूर संचार, शैक्षणिक क्षेत्र राजदूत तथा बर्मा के राजकारण तंत्र से जुड़े और यु एन ओ के सेक्रेटरी जनरल पड़ पर आसीन हुए जब् उनसे पहले पदासीन श्रीमान दाग हम्मरसकजोलद जी का विमान दुर्घटना मे कोंगों मे निधन हुआ था -



दाग हम्मरसकजोलद स्वीडन

दाग हम्मरसकजोलद स्वीडन

कार्यावधि : 1953-1961
- स्वीडन के राष्ट्र प्रमुख के पुत्र उप्प्पासला नामक विश्वा विद्यालय वाले शहर मे पले
"Konjunkturspridningen" (The Spread of the Business Cycle)
पी एच डी विषय पर हासिल की
-बेंकिंग के अध्यक्ष पद पर रहे सुएज़ नहर के हरेक देश के लोगों का यातायात इनके कार्यावधि के दौरान हुआ था . कोंगों यात्रा के दौरान विमान दुर्घटना मे आकस्मिक निधन हुआ

त्र्यग्वे लिए नोर्वे


कार्यावधि : १९४६ -१९५२
- ओस्लो , नोर्वे मे जन्मे श्रीमान त्र्यग्वे लिए सन १९४० मे विदेश मंत्री पद पर थे . सन १९४५ मे नोर्वे राष्ट्र मंडल के साथ वे अंतर राष्ट्रीय संयुक्त राष्ट्र संघ की विशाल बैठक मे हिस्सा लेने आये उसी वक्त संयुक्त राष्ट्र संघ की रूपरेखा , कानून दस्तावेज तैयार किये गये
इटली , इथोपिया और सोमालिया की राष्ट्र सीमा के पेचीदा मुद्दों का इनके अध्यक्षता मे निपटारा किया गया था और हाल मे श्रीमान बान की मून , कोरिया के नागरिक संयुक्त राष्ट्र संघ के सेक्रेटरी जनरल हैं .
श्रीमान बान की मून , कोरिया के नागरिक हैं और फ्रेंच, कोरीयन और अंग्रेज़ी भाषाओं के जानकार हैं राष्ट्र संघ के , आंठ्वे सेक्रेटरी जनरल हैं उन्होंने १ जनवरी २००७ मे ये पद ग्रहण किया

Official portrait of Secretary-General Ban Ki-moon. Click photo to enlarge.
















अंतर राष्ट्रीय स्तर पर , विश्व हिन्दी सम्मलेन , उत्तर अमरीका के न्यू योर्क शहर मेँ स्थित अन्तर्राष्ट्रीय सँस्था U.N.O. यु.एन्.ओ. के तत्त्वाधान मे संपन्न हुआ था .

उद्घाटन समारोह मे संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव, बान की मून ने उद्घाटन समारोह मे एक दो वाक्य हिंदी में बोल सभी उपस्थित जन के मन को जीत लिया और उनके खुलासे ने कि ,
' उनके दामाद की मातृभाषा हिंदी है ' लोगों को प्रसन्न कर दिया था

जुलाई मेँ, अँतराष्ट्रीय हिन्दी दिवस सम्मेलन न्यु -योर्क शहर मेँ सम्पन्न हुआ य़े हिन्दी का " परदेस " की भूमि पर हो रहा "महायज्ञ "ही था .
पिछले इसी तरह के सम्मेलनोँ मेँ हिन्दी की महान कवियत्री आदरणीया श्री महादेवी वर्मा जी ने भी समापन भाषण दिया था. भाषा - भारती "हिन्दी" को युनाइटेड नेशन्स मेँ स्थान मिले ये कई सारे भारतीय मूल के भारतीयोँ की एक महती इच्छा है. ये स्वप्न सत्य हो ये आशा आज बलवती हुई है.

इस दिशा मेँ बहुयामी प्रयास यथासँभव जारी हैँ.
न्यु योर्क शहर का जो मुख्य इलाका है उसे "मेनहेट्टन " कहा जाता है

देखिये ये लिन्क -- http://en.wikipedia. org/wiki/मन्हात्तन
http://en.wikipedia.org/wiki/ New_york_city

इस बृहद प्रदेश " न्यु -योर्क " का चहेता नाम है, 'बीग ऐपल" या फिर "गोथम सीटी और ये भौगोलिक स्तर पर पाँच खँडो मेँ बँटा हुआ है - जिन्हें , "बरोज़" कह्ते हैँ जिनके नाम हैँ -ब्रोन्क्स, ब्रूकलीन,मनहट्टन, क्वीन्स और स्टेटन आइलेन्ड...मेन्हेत्टन को डच मूल के लोगोँ ने १६२५ मेँ बसाया था और इसका क्षेत्रफल ३२२ या ८३० किलोमीटर था. यह विश्व का बृहदतम शहरी इलाका है जिसकी आबादी १८.८ कोटि जन से अधिक है.
यहाँ विश्व के हर देश से आकर बसे लोग आपको दीख जायेँगे.

सँयुक्त राष्ट्र सँघ के अति विशाल तथा हरेक आधुनिक सुरक्षा , साज सज्जा तथा उपकरणों से लैस , विशाल प्रसाद के बाहर एक पाषाण - शिल्पाकृति बनी हुई है जिसकी तस्वीर संलग्न है . जिसमे बन्दूक की नलिका का मूंह , मोड़ कर बन्ध कर बन्ध कर दिया गया है तो उसे देखकर विचार मन मे आया कि,
" भविष्य मे , समग्र विश्व मेँ , अहिँसा का प्रचार व प्रसार हो !
तथा शाँति का सँदेश फैल कर २१ वीँ सदी के समग्र मानव जाति के लिये, एक "शाश्वत सर्वोदय " का सँदेश फैलाए और वह 'अमर सँदेश '
हमारी "हिंदी भाषा " मेँ ही हो !
gun with closed mouth .JPG

प्रवासी आगमन के इतिहास की कुछ महत्त्वपूर्ण खोज इस प्रकार है .

ब्रिटेन मे रश्मि देसाई की शोध पुस्तक ,के अनुसार 'Indian Immigrants in Britain,' (London: Oxford University Press, 1963) द्वीतीय विश्व युध्ध के पहले ,भारतीय प्रवासी व्यक्तियों का ब्रिटेन मे नहीवत आगमन हुआ था जो ब्रिटेन पहुंचे वे छात्र पेशेवर व्यक्ति और नाविक थे
सन १९३९ मे बिर्मिन्ग्हम शहर मे लगभग १०० के करीब भारतीय थे भारतीय और पाकिस्तानी की कुल संख्या ब्रिटेन मे सन १९५५ मे १० ,७०० थी . सन १९९१ की जन गणना सेन्सस के हिसाब से ये संख्या बढ़कर ८४० ,२५५ और पाकिस्तानी मूल के ४७६ ,५५५ तक बढ़ चुकी थी और १६२ ,८३५ बंगलादेशी भी थे .

उत्तर अमरीकी भूखंड पर
Luce–Celler Act के सन १९४६ मे पारित होने के बाद से भारतीय प्रवासीयों को अमरीकी नागरिकता और उत्तर अमरीका मे रहने के हक्क मिले थे . ज्यादातर , मलेसिया , सिंगापोरे , दक्षि ण अफ्रीका , सूरीनाम , गुयाना , फिजी ,केन्या , तंज़ानिया , उगांडा , त्रिनिदाद और टोबागो , जमैका और मोरिश्यस से पहले प्रवासी आकर स्थायी हुए . इस प्रजा मे हिन्दू, जैन , बौध्ध , ईसाई , मुसलमान, पारसी और सिख धर्मावलम्बी लोग थे .
सन १७९० मेँ प्रथम काला सागर पार कर के मद्रास के एक अनाम व्यक्ति मेसेच्य्सेट्स के सेलम की गलियोँ मेँ पहली बार पहुँचे थे
१८२० से १८९८ तक ५२३ और लोग आ पाये. १९१३ तक ७००० और आये. १९७१ मेँ, कोन्ग्रेस ने इस पर रोक लगा दी. १९४३ मेँ जब चीन के अप्रवासीयोँ पर से रोक उठाई गई तब प्रेसीडेन्ट रुज़वेल्ट के बाद आये ट्रूमेन के शासन काल मेँ ३ जुलाई १९४६ मेँ " एशियन अमेरीकन सिटीज़नशीप एक्ट " पारित किया था.
भारतीय प्रजा के प्रवासी दस्ते के आगमन के संग ' हिन्दी ' भाषा भी विदेश मे दाखिल हुयी.
"हिन्दी असोशीयेन ओफ पसेफिक कोस्ट " ने १ नवम्बर १९१३ मेँ "गदर" पत्रिका मेँ घोषणा की
" हम आज विदेशी भूमि पर अपनी भाषा मेँ
ब्रिटीश सरकार के विरुध्ध युध्ध की घोषणा करते हैँ " !
" ग़दर " पत्रिका से सँबध्धतित थे लाला हरदयाल, दलित श्रमिक मँगूराम और १७ वर्षीय इँजीनीयर करतार सिँह सरापा जैसे हिम्मती कार्यकर्ता.

१६ नवम्बर १९१५ के अपयशी दिवस १९ वर्षीय सरापा को भारत मेँ फाँसी पर चढाया गया था. शहीद भगत सिँह ने सरापा को अपना गुरु माना था. सरापा का अँतिम गीत था,
" यही पाओगे, मशहर मेँ जबाँ मेरी बयाँ मेरा,
मैँ बँदा हिन्दीवालोँ का हूँ खून हिन्दी,
जात हिन्दी,यही मज़हब,
यही फिरका, यही है, खानदाँ मेरा !
मैँ इस उजडे हुए भारत के खँडहर का ही ज़र्रा हूँ
यही बस पता मेरा, यही बस नामोनिशाँ मेरा !"

ना जाने सरापा की अस्थियाँ गँगा मेँ मिलीँ या नहीँ ?? :-((
पर, हिन्दी भाषा भारती , तो ,सँस्कृत की ज्येष्ठ पुत्री है !
ऐसा सँत विनोबा भावे जी का कहना है और आज यह हिन्दी की भागीरथी विश्व के हर भूखँड मेँ बहती है जहाँ कहीँ एक भारतीय बसता है
मेरी कविता मेँ मैँने कहा है,
" हम भारतीय जन मन मेँ कहीँ गँगा छिपी हुई है "
" गँगा आये कहाँ से रे गँगा जाये कहाँ रे,लहराये पानी मेँ जैसे धूप ~ छाँव रे " यह सौम्य स्वर लहरी हेमँत दा की सुनतीँ हूँ तब हिन्दी भाषा का मनोमुग्धकारी विन्यास मन को ठीठका कर स्तँभित कर देता है ..
हिन्दी भाषा की गरिमा फिर एक बार, भारतेन्दु हरिस्चन्द्र जी के शब्दोँ को चरितार्थ करे.
" निज भाषा उन्नति ही उन्नति का मूल है "
आओ, प्रण करेँ हिन्दी सेवा का, हिन्दी प्रेम का !
" जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरीयसी".
" सत्यमेव जयते " जय हिंद !

- लावण्या दीपक शाह DSC01672.JPG

Friday, July 29, 2011

एक पल : सर्वनाश से पहले


फुलवारी : ये कहानी मेरे नाती नोआ के लिए और हर उमर के बच्चों के लिए समर्पित है
- लावण्या


एक पल : सर्वनाश से पहले
(अंतरिक्ष नाटक) - लावण्या शाह

पात्र:
सूत्रधार

तीन साहसी बच्चे-
तूफानटक्कर Aeromax Junior Astronaut Costume Boys Toddler Size (18 Months 2T)Astronaut
लाल लगाम (लाली)
तूफान टक्क
विल स्कारलेट
छोटा राजा खलनायक-
पाताल पापी

तीन वैज्ञानिक-
डा शिव
डा गिरधर
डा बूमक
एक सिपाही
(धरती की भीतरी सतह का दृश्य)

(सूत्रधार) - तूफान टक्कर, विल स्कारलेट और छोटा राजा धरती के भीतरी कोर में कैद हैं और एक बम, इस उपग्रह को विनाश के रास्ते ढकेलने के लिये आगे बढ रहा हैं।

पाताल पापी : "होशियार! यह छोटा विमान।

लाल लगाम : एक बात पक्की है, जिस किसीने भी हमें यहाँ पर बुलवाया है, वो हमसे मिलने नहीं आया। अरे! यहाँ पर तो सारा वीराना ही वीराना है।

तूफान टक्कर : (चौंक कर) "मैं सोच रहा हूँ कि कैसे..." (फिर चौंकता है) "अरे! संभलो।"
पाताल पापी : इस भूगर्भ में, आपका स्वागत है! (बात जारी रखते हुये) आशा है कि आपकी यात्रा सफल रही!"

तूफान टक्कर : आप कौन हैं?"

पाताल पापी: मैं, इस भूगर्भ का मालिक कहलाता हूँ!"

तूफान टक्कर: (स्वत: सोच में) भूगर्भ का मालिक?? यह नाम तो कुछ जाना-पहचाना सा लगता है!

पाताल पापी: "आप खामखाँ मेरी तारीफ कर रहे हैं!"

तूफान टक्कर: "याद आया! तुम्ही तो वे छाँटे हुए पागल इन्सान हो, जिसने, इस पृथ्वी को हथियाना चाहा था! पर जब तुम्हारी क्रान्ति निष्फल हो गयी तब तुम नदारद हो गये! अच्छा, अब यहाँ डेरा जमाये हो!"

पाताल पापी: (गुस्से से आवाज ऊँची हो जाती है) पागल, और मैं? सब मेरी जान के पीछे पड़ गये थे और मुझे इस भूगर्भ में आना पडा। पर मैं बदला लेकर ही रहूँगा।"

तूफान टक्कर : "अच्छा, यह बात है। बदला किस तरह से लोगे भला?"

पाताल पापी : (दुष्ट सी मुस्कान लिये) "आओ! बतलाता हूँ तुमने मॅग्नियम धातु का नाम तो सुना होगा? चम्मच भर मग्नियम एक पूरे शहर का विनाश कर सकता है। इस ग्रह से, एक छोर पर, मैंने, इस धातु का एक विशाल जत्था मौजूद पाया है हाँ इतना सारा है कि यह पूरा सौर मंडल धूल में मिल जाएगा। मुझे इस खनिज मग्नियम से धमाका लगाने भर की देर थी "

तूफान टक्कर : "और वे गुमशुदा वैज्ञानिक! एक एक अणु शक्ति विस्फोट के क्षेत्र में, कमाल हासिल किये हुये "

पाताल पापी: "बिलकुल सही याद किया। वे मेरी बात मानने पर राजी ही नहीं थे। इसीलिए, उनका सारा ज्ञान, इस कम्प्यूटर में, कैद कर लिया है। बस अब मुझे इसे तोड देने की शृंखला को, बटन दबाकर कर, शुरू करना पडेगा ! और सब खत्म और जब यह सुइयाँ, १२ के आँकडे पर पहुँचेंगी, तब इस धरती का विनाश हो जायेगा...हा...हा...हा...हा..."

तूफान टक्कर : "और साथ-साथ, तुम्हारा भी।"

पाताल पापी: "क्यों क्या मुझे सौ प्रतिशत पागल समझ रखा है? यह छोटी रेल देख रहे हो ना, वह मुझे धरती की ऊपरी सतह तक और वहाँ से ऊपर अंतरिक्ष की ओर ले चलेगी।"

तूफान टक्कर : ( अपने साथियों से) "हमें किसी भी तरह बच निकलना है!"

लाल लगाम : तुम्हारे दिमाग में कोई तरकीब सूझ रही है क्या?"

तूफान टक्कर : "जब छत गिरने लगे, तब भाग निकलो..."

लाल लगाम : (न समझते हुये) "क्या कहा?"

पाताल पापी: "मैंने सब सोच रखा है! बस घंटे भर में, यह दुनिया जिसने मेरा तिरस्कार किया था, वह मेरे बदले की आग में जल उठेगी। और मैं? मैं सही सलामत अंतरिक्ष की ओर उड चलूँगा। अरे क्या कर रहे हो...कौन?"

छोटा राजा : "माफ करना मैं सह-यात्रियों को अपने संग नहीं ले चलता।"

सूत्रधार : तूफान टक्कर, लाल लगाम और छोटा राज एक रहस्यमय घटना में घिरे हैं - - तीन, तीन महान विज्ञानिकों के लापता होने की रोमांचक घटना की छान-बीन कर रहे थे कि अचानक वे एक भूकम्प के चंगुल में फँस गये और धरती के भीतर धँस गये -- अब आगे सुनिये,"

लाल लगाम : "कोई फायदा नहीं! हम इस खड्ड के ऊपर नहीं जा पाएँगे।"

तूफान टक्कर : "लगता है कि किसी प्रकार के चुंबकीय क्षेत्र में हम लोग फँस गये हैं। होशियार! अपने आप को सँभाले रहो। हम पानी में छलाँग लगाने वाले ही हैं अब!

(लाल लगाम की आवाज पानी की सतह से ऊपर चीखती हुयी पुकार सी सुनायी देती है) - "अरे यार, यह तो कोई भूगर्भ नदी है, और हम तेज धारा में बहे जा रहे हैं।"

तूफान टक्कर : तैरने के लिये तैयार हो जाओ। हमारा यान और थपेड़े सह न पायेगा। यह यान बस अब टूटने वाला है।

लाल लगाम : जब छोटा था तब सोचा करता था कि तैरने में बडा मजा है!"

तूफान टक्कर : वे भूकम्प के झटके, धक्के, किसी दुर्घटना की वजह से पैदा नहीं हुए थे। जिस किसी ने भी उन तीन वैज्ञानिकों का अपहरण किया था, उसी ने अब हम लोगों के लिये भी, बुलावा भेजा है।"

छोटा राजा : "एक बार पता कर लूँ कि वो कौन पाजी है, फिर तो उसकी गर्दन होगी और मेरे हाथ।"

तूफान टक्कर : "मेरा अंदेशा यह है कि वही हमें ढूँढ लेगा।"

लाल लगाम : "मैं पहले कभी, किसी उपग्रह की भीतरी सतह तक गया नहीं।"

तूफान टक्कर : "तो बस यही आरजू रखो कि हम उपग्रह के भीतर नहीं, बाहर ही रहें।"

छोटा राजा : "यह जगह देख कर, मुझे तो कँपकँपी आ रही है। तूफान, सम्भलो!"

पाताल पापी: "कोई बात नहीं। यह लोग और कहीं नहीं जायेंगे।"

तूफान टक्कर : "अहा! रास्ता खत्म!"

लाल लगाम : "मैं जानता हूँ छोटे राजा कि तुम्हारा इरादा नेक था पर तुमने यह गलत सुरंग चुनी।"

पाताल पापी: "मेरे दोस्तों! तुम्हारी कामयाबी बस इसी बात में है कि तुमने तमाम दुनिया के सर्वनाश को तेजी दे दी। अल्विदा!"

(पागलों की तरह हँसता है)

छोटा राजा : "अब क्या करें तूफान?"

तूफान टक्कर : "काश मैं इस सवाल का जवाब दे पाता।"

सूत्रधार : "सच है, अब क्या हो? क्या तूफान, लाल लगाम और छोटा राजा इस भूगर्भ - कैद खाने से निकल पाएँगे? क्या वे इस पृथ्वी को सर्वनाश से बचा पाएँगे?"

तूफान टक्कर : ऊपर लाल लगाम! ऊपर खींचो!

लाल लगाम : "नहीं खींच पा रहा। मैं पूरी ताकत आजमा रहा हूँ पर यह हिल भी नहीं रहा।"

सूत्रधार : "क्या लाल लगाम, छोटा राजा और तूफान टक्कर इस भूकम्प के बाद भी बच निकलेंगे? और अगर बच भी गये तब क्या वे भूगर्भ के मालिक के हाथों पकड़े जायेंगे?"

तूफान टक्कर : "जी हाँ जनरल साहब! मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ और इस मामले में अवश्य कुछ करना चाहूँगा। छोटे राजा, एक अंतरिक्ष यान तैयार करो। पृथ्वी हमारा लक्ष्य रहेगी, चलने की तैयारी करो।"

छोटा राजा : (खुशी में मुस्कुराते हुए) मैं जानता था कि तुम यही कहनेवाले हो।

लाल लगाम : एक सवाल है - हम पृथ्वी पर जासूसी करने चलेंगे तो क्या हम गिरफ्तार नहीं हो जाएँगे?

तूफान टक्कर : "याद करो, जब छोटे राजा को जबरदस्त चोट लगी थी - - (अपना अँगूठा और उँगली दिखाते हुए) मौत से बस इतनी सी दूरी थी। और तब, तो डॉ. बूमक ने कोई सवाल नहीं किया था। (वही वैज्ञानिक, जो आज लापता है) उन्होंने एक गैर-कानूनी मुजरिम की जान बचाने के लिये अपने जान की बाजी लगा दी थी। और उसी वक्त हमने यह कसम खायी थी कि उनकी अच्छाइयों का बदला हम अवश्य देंगे।"

लाल लगाम : मैं तुम्हारी बात समझता हूँ, तब चलो, चलें

पाताल पापी: "अब बोलो मुझसे बात करो " (तभी कम्प्यूटर की आवाज बीच में सुनाई देती है )

कम्प्यूटर का स्वर : "यह कार्य पूरा हुआ। सुझाव है, दुबारा सारी प्रणाली की जाँच करें।"

पाताल पापी: बहुत बढिया मेरी जान! धन्यवाद! और सज्जनों आपका भी शुक्रिया। आपने अपने, वैज्ञानिक दिमाग का इस्तेमाल किया, उसका भी शुक्रिया।

(भयानक, भद्दी हँसी हँसते हुए उसकी आवाज विलीन हो जाती है)

लाल लगाम : "हम पृथ्वी के वातावरण में, प्रवेश कर रहे हैं।"

तूफान टक्कर : "इस नक्शे के हिसाब से, बम-विस्फोट-प्रयोग का स्थान है - - शून्य तीन शून्य! सौ फिसदी सच है लाली। जितनी ताकत हो लगा दो।"

एक पुरूष स्वर : "मेरे मालिक, एक अनजाना अंतरिक्ष-यान, आधुनिक-बम-विस्फोट के स्थान के करीब पहुँच गया है।"

पाताल पापी: "अच्छा! एक्स-रे, स्कैनर और रडार से सम्पर्क करो।"

छोटा राजा : "काश डॉ.बूमक और दूसरे दोनों इन्सान अब भी जीवित हों!"

तूफान टक्कर : "अगर जिंदा हुए तो मैं अवश्य उन्हें खोज निकालूँगा।"

पाताल पापी: (दुष्टता से मुस्कराते हुए) "हाँ, हाँ, अवश्य खोज निकालोगे तुम, उन्हें मेरे यार! मैं वही तो कोशिश करूँगा! मुझे भी बखूबी आता है उनसे किस तरह पेश आना चाहिए जो दूसरों के कामों में टाँग अड़ाता है।"

पाताल पापी: (अपने आदमी को आज्ञा देते हुए) "अंतरिक्ष यान का पीछा करो और भूकम्प के झटके देनेवाली मशीन को तैयार करो! साथ-साथ, चुम्बकीय खिंचाव के प्रवाह को भी शुरू करो। (मुस्कुराते हुए) हमारे घर, मेहमान आने ही वाले हैं!"

तूफान टक्कर : "लाली, देखो तो, वहाँ सामने क्या दिखलायी दे रहा है अरे जरा नजदीक ले चलो, पास से देखना चाहता हूँ।"

लाल लगाम : "ठीक है!

तूफान टक्कर : "मुझे तो यहाँ, भूकम्प का कोई निशान दिखाई नहीं दे रहा।"

लाल लगाम : "ना ही मुझे दिखलायी दे रहा।यहाँ पर तो कुछ ऐसा लग रहा है मानो।"

तूफान टक्कर : "एक पल रूको तो! यह कैसी आवाज है? लाली, ऊपर उठा लो यान को यह तो दूसरे झटके जैसा रे... अरे..."

पाताल पापी: "होशियार! यह छोटा विमान! यह बम, कुछ ही पलों में तितर-बितर हो जाएगा।"

तूफान टक्कर : "वो उड़ा हमें यहाँ से भाग निकलना होगा।"

छोटा राजा : "पर कैसे?"

तूफान टक्कर : "ओ छोटे राजा, अपनी माप की छड़ी दो तो जल्दी से!"

छोटा राजा : "तुम इस मापदंड से क्या करोगे?

तूफान टक्कर : "थोडा सा इंर्धन इस्तेमाल करूँगा।

तूफान टक्कर : "पीछे हटो बस यही आशा करूँगा कि रेल-इकाई पाताल पापी से, तुरन्त आ मिले किसी भी सूरत में तुम्हें इसे रोकना है-

लाल लगाम : 'बहुत ठीक!

तूफान टक्कर : "हम यहाँ, प्रज्वलन चाबी (डिटेक्टर फ्यूज) को जाँचते रहेंगे, चलो छोटे राजा।

छोटा राजा : "वाह क्या खूब निशाना मारा है! और वह भी सही वक्त पर!"

सूत्रधार : इस धरती पर कुछ विचित्र और भयानक दुर्घटनाएँ बस अब घटने ही वाली है।

डॉ. शिव : "डॉ. गिरधर, देखिये, बडा रोचक व सनसनीखेज यंत्र क्रियाशील है। यह क्या किस्सा खुल रहा है?"

दोनो डॉ. : "आहा! समझ लो भूकम्प..."

डॉ. शिव : "अरे मैं पकड़ नहीं पाऊँगा।"

एक सिपाही : "हम यहाँ से प्रस्थान करने को बिलकुल तैयार हैं डाक्टर।"

डॉ. बूमक : "अच्छी बात है क्रमिक गिनती आरम्भ हो जाये!"

सिपाही : "जी बहुत अच्छा।"

डॉ. बूमबाक : "अरे! अरे! भूचाल गिनती रोक दो... अरे... अरे... बचाओ "

(टी वी पर समाचार वाचक की तस्वीर और स्वर : "और इस भांति डॉ. बूमक के लापता होने की दु:खद घटना, जो, "आधुनिक विस्फोटक प्रयोग संस्थान" के इलाके के पास घटित हुयी, उससे सभी उद्विग्न हैं। इस दुर्घटना से कुल तीसरे महीने वैज्ञानिक के गायब होने का कुदरती हादसा घट गया है जिससे सभी परेशान हैं।")

सेनापति : "(नाराजगी भरा स्वर) कुदरती घटना खाक घटी है! पहले डॉ. गिरधर और फिर डॉ. शिव गायब हुये। और अब डॉ.बूमाक भी गए। सबसे शक्तिशाली, तेज दिमाग विज्ञान के क्षेत्र के, इस पृथ्वी के काबिल इन्सान गुम हो गये और एक के बाद एक, यह भूचाल के झटके और हम उनके शिकार! यह तो बड़ा विचित्र सा संयोग है! मैं नहीं मानता जरूर इस के पीछे कोई बडा भारी रहस्य है!"

डॉ. बूम्बाक : "मैं, अंतरिक्ष ग्रह कक्ष की पुलिस से सम्पर्क करने में, सफल हुआ! वे लोग जब हमें लेने आयेंगे तभी पाताल पापी और उसके साथियों को भी पकड लेंगे।"

तूफान टक्कर : "माफी चाहता हूँ डॉक्टर साहब! आपको फिलहाल, यही छोड़े जा रहा हूँ, पर हमें यहाँ से अब रफूचक्कर हो जाना चाहिये। इस के पहले कि वो लोग यहाँ आ पहुँचें।"

डॉ.बूमाक : "सही फर्मा रहे हो बरखुरदार, पर मैं आपका कर्ज किस तरह अदा कर पाऊँगा? कुछ तो ऐसा जरूर होगा जो मैं कर पाऊँगा।"

छोटा राजा : "ऐसी बात है! तब तो में गर्दन बाहर को किए देता हूँ, फिर गोलियों से घायल हो जाता हूँ और बाद में, आप फिर मेरी जान बचा लीजिएगा डॉक्टर।"

डॉ बूमाक और सभी हँसने लगते हैं छोटे राजा की बात पर।

१ मई २००३