Friday, August 31, 2018

माँ धरती प्यारी

कितनी सुँदर अहा, कितनी प्यारी,
ओ सुकुमारी, मैँ जाऊँ बलिहारी
नभचर, थलचर,जलचर सारे,
जीव अनेक से शोभित है सारी,
करेँ क्रीडा कल्लोल, नित आँगन मेँ,
माँ धरती तू हरएक से न्यारी !
अगर सुनूँ मैँ ध्यान लगाकर,
भूल ही जाऊँ विपदा,हर भारी,
तू ही मात, पिता भी तू हे,
भ्राता बँधु, परम सखा हमारी !
 [Frangipani+Flowers.jpg]

दिवा -स्वप्न
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बचपन कोमल फूलोँ जैसा,
परीयोँ के सँग जैसे हो सैर,
नर्म धूप से बाग बगीचे खिलेँ
क्यारीयोँ मेँ लता पुष्पोँ की बेल
मधुमय हो सपनोँ से जगना,
नीड भरे पँछीयोँ के कलरव से
जल क्रीडा करते खगवृँद उडेँ
कँवल पुष्पोँ,पे मकरँद के ढेर!
जीवन हो मधुबन, कुँजन हो,
गुल्म लता, फल से बोझल होँ
आम्रमँजरी पे शुक पीक उडे,
घर बाहर सब, आनँद कानन हो!
कितना सुखमय लगता जीवन,
अगर स्वप्न सत्य मेँ परिणत हो!

तुहीन और तारे 
~~~~~ ~~~~~~ ~~~~ 
आसमाँ पे टिमटिमाते अनगिनत 
क्षितिज के एक छोर से दूजी ओर 
छोटे बड़े मंद या उद्दीप्त तारे !
जमीन पर हरी डूब पे बिछे हुए 
हर हरे पत्ते पर जो हैं सजीं हुईं 
भोर के धुंधलके में अवतरित धरा 
पर चुपचाप बिखरते तुहीन  कण !
देख उनको सोचती हूँ मैं मन ही मन 
क्यों इनका अस्त्तित्त्व, वसुंधरा पर ?
मनुज भी बिखरे हुए जहां चहुँ ओर 
माँ धरती के पट पर विपुल विविधत्ता 
दिखलाती प्रकृति अपना दिव्य रूप 
तृण पर, कण कण पर जलधि जल में !
हर लहर उठती, मिटती संग भाटा या 
ज्वार के संग कहती , श .... ना कर शोर !
-- लावण्या दीपक शाह 

Monday, August 27, 2018

सत चित्त आनंद = सच्चिदानंद

ॐ 
सत~ चित्त~ आनंद = सच्चिदानंद 


ईश्वर का स्वरूप क्या है ? क्या हो सकता है ? जब ऐसा प्रश्न अंतर्मन में रमण करे तब जानिये कि, आप पर परम कृपालु ईश्वर की महती कृपा है। 
ईश्वर क्या है ? इस प्रश्न  को हमारे भारत वर्ष के पुरातन युग से आधुनिक युग पर्यन्त, हर सदी में मनीषियों ने, धर्म पिपासु जन ने, धर्म पथ पर चले वाले हर जीव ने, हरेक मुमुक्षु व संत जनों ने, अपनी प्रखर साधना से, अपने ही अंत:करण में देखा ! यह विस्मयकारी सत्य को  माना कि, जीव भी परब्रह्म का अंश है  ! 
        
परंतु जो सर्वत्र व्याप्त है, जो सर्व शक्तिमान है, अनंत है  व कल्पनातीत है, हर व्याख्या से परे है जिसे परमात्मा कहते हैं उन्हें हम मनुष्य, साधारण इन्द्रियों द्वारा पूर्णतया जान नहीं पाते ! यह सत्य,  ज्ञानी व मुमुक्षु ही जान पाए !      कुछ विरले, परमहंस, स्वानुभूति से उस परम पिता ईश्वर  के
 ' सच्चिदान्द स्वरूप को पहचान पाए और उन्होंने कहा कि, 
यही ' ईश्वर ' हैं, परमात्मा हैं - आनंदघन ' हैं ! 
     ॐ नमो भगवते वासुदेवाय :
Picture
सच्चिदानंद रुपाय  विश्वोतपत्यादि हेतवे
तापत्रय विनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नमः
भावार्थ : वह जो संपूर्ण जगत की उत्पति, पालन एवं प्रलय के हेतु हैं, जो तीनो प्रकार के ताप (भौतिक, दैविक एवं आध्यात्मिक) को मिटाने वाले हैं उन सच्चिदानंद परमात्मा श्री कृष्ण को नमन है|
 

        अत: ईश्वर  का सामीप्य व सायुज्य प्राप्त  करने के लिए जीव के लिए आवश्यक हो जाता है क, सदैव सजग रहने के साथ साथ हम मनुष्य, तन धारी जीव, अपनी आत्मा के भले के लिए सदैव उस पूर्ण आनन्द स्वरूप  ' सच्चिदान्द ' परमात्मा को प्राप्त करने, प्रयास रत रहें। 


                
जीवात्मा को  ध्यान ये रखना है कि, सच्चा आनंद, विषय सुख या विषय प्राप्ति या  विषयों के उपभोग से नहीं किन्तु सद्गुणों के निरंतर विकास से ही संभव है। जितने भी सद्गुण हैं वे परम कृपालु ईश्वर कृपा से संभाव्य हैं। 
उन्हीं की कृपा से दीप्त हैं और उन्हीं के अंश से  उजागर हैं। अब ये भी जानना आवश्यक है कि, सद्गुण कौन, कौन से हैं ? तो वह हर जीव को सदैव ' प्रियकर ' लगते हैं वही सद्गुण कहलाते हैं। जो हमें स्वयम के लिए रुचिकर लगता है वही अन्य जीव को भी लगता है। जैसे हर जीवात्मा को मुक्त रहना सहज लगता है। बंधन कदापि सुखद नहीं लगता ! ठीक वैसे ही प्रत्येक जीवांश को मुक्त रहना पसंद है ! अन्य सद्गुण भी हैं  जैसे दया, करूणा, ममता, आत्मीयता, मानवता, स्वछता, वात्सल्य, अक्रोध, अशोच्य, सहिष्णुता इत्यादि। सर्व जीवों के प्रति आत्मीय भाव होना, बहुत बड़ा सद्गुण है। यह आत्मीयता का बोध, ईश्वर के अंश से ही दीप्तिमान है। जब उपरोक्त  सद्गुण से मनुष्य, या जीवात्मा, प्रत्येक जीव के प्रति आत्मीयता का भाव साध लेता है तब वह परब्रह्म को जानने के दुर्गम मार्ग पर अपने पग बढाने लगा है यह भी प्रकट हो जाता है। इस कारण, त्याज्य दुर्गुणों से सदा सजग रहें जो जीवात्मा के उत्त्थान में बाधक हैं। 
         जीवात्मा को यथासंभव, आत्मा का जहां निवास है उस शरीर का जतन करते हुए, अर्जुन की तरह लक्ष्य संधान कर, अपना सारा ध्यान परम कृपालु परमात्मा, सच्चिदानंद, परब्रह्म, ईश्वर की ओर सूरजमुखी के पुष्प की भाँति अनिमेष, अहर्निश, द्रष्टि को बांधे हुए, चित्त को एकाग्र भाव से अपने  दैनिक कर्म करते रहना चाहीये। तब आप विषयों के प्रति आसक्ति से मुक्त होकर, तटस्थता प्राप्त करने में सफल हो पायेंगें हर जीव के लिए अनेकानेक व्यवधान व बाधाएं उत्पन्न होकर, आत्मा के उत्सर्ग में बाधक बनतीं हैं।उन बाधाओं से आँखें मिलाकर, चुनौती स्वीकार कर, आत्म उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहना सच्ची  वीरता है। 
गुजरात भूमि के संत कवि नरसिंह मेहता  ने गाया है, 
' हरी नो मारग छे शूरा नो, ( आत्म उन्नति = प्रभु भक्ति, वीरों का मार्ग है )
  नहीं कायर नू काम जोने,( यह - कायरों के बस की बात नहीं ! )
  परथम पहलु मस्तक मुकी ( ओखली में मस्तक रख दो )
 वलती न लेवून नाम जोने " ( उसके पश्चात किसी बात की चिंता न करना )[ अर्थात : हरी का मारग दुर्गम है, जो  कायरों के लिए दुष्कर है। 
 प्रथम अपना मस्तक प्रभु चरणों में रखते हुए, पीछे मुड कर देखना नहीं ।  
     
दृढ प्रतिज्ञ, दृढ निश्चय, कृत संकल्प, जीव को हर पग, आगे बढ़ना है। 
       
अत: मेरी प्रार्थना ना सिर्फ मेरे आत्म हित के लिए है अपितु संसार के हर भूले भटके, जीव को ईश्वर और संत योगी व गुरू कृपा प्राप्त हो।सच्चे गुरुजन की सीख, प्रत्येक जीव को  सन्मार्ग पर चलते रहने के लिए प्रेरित करे। 
प्राणी आत्म उत्थान के पथ पे अग्रसर हों ये प्रार्थना है। 
आप सभी का आभार प्रकट करते हुए, इस महा - यात्रा में, आनंद प्राप्ति का सच्चिदानंद ईश्वर के प्रेम का सायुज्य प्राप्त हो यही शुभकामना शेष है। 
ओ मेरे साथी व सहयात्री ...इस सच्ची व मौन प्रार्थना स्वीकार करें !  
सविनय, 

- लावण्या के नमन       

Friday, May 11, 2018

[ मेरी अम्मा स्व. श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा व मेरे पापा जी प्रसिध्ध गीतकार नरेंद्र शर्मा जी के गृहस्थ जीवन के सँस्मरण ।]

ॐ 
[ मेरी अम्मा स्व. श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा व मेरे पापा जी प्रसिध्ध 
गीतकार नरेंद्र शर्मा जी के गृहस्थ जीवन के  सँस्मरण ।] 
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सन १९४७ में  भारत आज़ाद हुआ। उसी वर्ष की १२ मई को कुमारी  सुशीला से  कवि नरेंद्र शर्मा का विवाह हुआ था। दक्षिण भारत की गान  कोकिला सुश्री सुब्बुलक्षमीजी व उनके पति श्रीमान सदाशिवम जी के आग्रह से उन की नई गहरे नीले रंग की नई कार  शेवरोलेट में जिसे सुन्दर सुफेद फूलों से सजाया गया नव दम्पति को  बिदा किया गया और उसी कार  में बैठ कर दुल्हा - दुल्हन, सुशीला नरेंद्र   अपने घर पहुंचे । 
मशहूर गायिका एवं अदाकारा  सुरैयाजी ,दिलीप कुमारअशोक कुमारअमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजीभगवती चरण वर्मा व श्रीमती वर्मा , संगीत जगत की मशहूर हस्ती श्री अनिल बिश्वासजी, कलाकार गुरुदत्त जी, निर्माता , निर्देशक श्रे चेतनानँदजी, एक्टर देवानँदजी इत्यादी सभी इस विलक्षण विवाह मेँ शामिल हुए थे।
नई दुल्हन घर की दहलीज पर आ पहुँची तो सुशीला को कुमकुम से भरे हुए एक बड़े थाल पर खड़ा किया गया। लाल रंगों के पद चिह्न दहलीज से घर के भीतर तक पड़े और गृह - प्रवेश हुआ । उस समय सुरैया जी तथा सुब्बुलक्ष्मी जी ने नववधु के स्वागत में मँगल गीत गाये । ऐसी कथा कहानियों सी मेरी अम्मा सुशीला और पूज्य पापा जी के विवाह की बातें हमने अम्मा से सुनीं हैं। जिसे आज साझा कर रही हूँ। 
सन १९४८ के आते मुझसे बडी बहन वासवी का जन्म हो गया था। मुझे याद पड़ता है कि  वासवी और अम्मा को युसूफ खान याने मशहूर स्टार दिलीप कुमार जी उनकी कार में  अस्पताल  से पापा जी के घर, लाये थे। 
 उस वक्त  पापा जी और अम्मा सुशीला की गृहस्थी माटुँगा नामक उपनगर में  तैकलवाडी के २ कमरे के एक फ्लैट मेँ आबाद थी। छायावाद के प्रसिध्ध कवि पंतजी भी उनके संग वहीं पर २ वर्ष रहे।  
 इसी छोटे से घर में कई साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गोष्ठियां भी हुआ करतीं। जिनमे भारत के मूर्धन्य साहित्यकार और  कलाकार मित्र शामिल हुआ करते। भारतीय फिल्म संगीत के भीष्म पितामह श्री अनिल बिस्वास जी , चेतन आनंद जी , शायर जनाब सफदर आह सीतापुरी जी ,सुप्रसिध्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर जी,  कविवर श्री सुमित्रानंदन पन्त जी जैसे दिग्गज व्यक्ति इस मित्र मंडली में थे। 
फिर , पन्त जी इलाहाबाद चले गये और जीवन धारा आगे बढती रही।    
एक दिन की बात है, पापाजी और अम्मा बाज़ार से सौदा लिये किराये की घोडागाडी से घर लौट रहे थे। अम्मा ने बडे चाव से एक बहुत महँगा छाता खरीदा था। जो नन्ही वासवी और साग सब्जी उतारने मेँ अम्मा वहीँ घोडागाडी में भूल गईँ ! ज्यों ही घोडागाडी आँखों से ओझल हुई कि, छाता याद आ गया! अम्मा ने बड़े दुखी स्वर में  कहा  ' नरेन जी ,  मेरा छाता उसी में रह गया !  '
 पापा जी ने समझाते हुए कहा , ' सुशीलातुम वासवी को लेकर घर के भीतर चली जाओ। घोडागाडी दूर नहीं गयी होगी  मैँ अभी तुम्हारा छाता लेकर लौटता हूँ !' 
 अम्मा ने पापा जी की  बात मान ली।  कुछ समय के बाद पापा जी छाता लिये आ पहुँचे। जिसे देख अम्मा अपना सारा दुःख भूल गयी। 
ये बात भी वे भूल ही जातीं किन्तु कई बरसोँ बाद अम्मा पर यह रहस्य प्रकट हुआ कि पापा जी दादर के उसी छातेवाले की दुकान से हुबहु वैसा ही एक और नया छाता खरीद कर ले आये थे ! चूंकि जिस घोडागाडी में  अम्मा का छाता  छूट गया था वह  घोडागाडी तो बहुत दूर जा चुकी थी। 
 अपनी पत्नी का मन इस घटना से दुखी ना हो इसलिए पतिदेव नरेंद्र शर्मा नया छाता ले आये थे ! ऐसे थे पापा ! बेहद सँवेदनाशील, संकोची परन्तु दूसरोँ की भावनाओँ की कद्र  करनेवाले इंसान थे मेरे पापा ! अपनी पत्नी के मन को और भावनाओं को  समझनेवाले भावुक कवि ह्र्दय को अपनी पत्नी का दुखी होना भला  कैसे सुहाता ?   सच्चे और खरे इन्सान थे मेरे पापा जी! 
पापा जी से जुडी हुईं कई सारी ऐसी ही बातें हैं जो उनके प्रेम भरे ह्रदय की साक्षी हैं। आज वे बातें  भूलाये नहीं भूलतीं। 
मैँ जब छोटी बच्ची थी, तब अम्मा व पापा जी का कहना है कि, अक्सर काव्यमय वाणी मेँ माने कविता की भाषा में बोला करती! 
अम्मा कभी कभी कहती कि, ' सुना है , मयूर  पक्षी के अँडे, रँगोँ के मोहताज नहीँ होते! उसी तरह मेरे बच्चे भी पिता की काव्य सम्पत्ति विरासत मेँ लाये हैँ!"
यह एक माँ का गर्व था जो छिपा न रह पाया होगा। या, उनकी ममता का अधिकार, उन्हेँ मुखर कर गया हो कौन जाने ? जो मेरी अम्मा ने हम लोगों से साझा किया था आज उसे दोहरा रही हूँ। 
एक बार मैँ, मेरी बचपन की सहेली लता, बडी दीदी वासवी,  हम तीनोँ खेल रहे थे। वसँत ऋतु का आगमन हो चुका था। होली के उत्सव की तैयारी जोर शोरोँ से बँबई शहर के गली मोहल्लोँ मेँ, चल रही थीँ। खेल खेल मेँ लता ने मुझ पर एक गिलास पानी फेँक कर मुझे भिगो दिया! 
मैँ भागे भागे अम्मा पापाजी के पास पहुँची और अपनी गीली फ्रोक को शरीर से दूर खींच बोली,' पापाजी, अम्मा! देखिये ना! मुझे लता ने ऐसे गिला कर दिया है जैसे मछली पानी मेँ होती है !'
  सुनते ही, अम्मा ने मुझे वैसे ही  गिले कपडोँ समेत खीँचकर प्यार से गले लगा लिया। बच्चोँ की तुतली भाषा, सदैव बडोँ का मन मोह लेती है। माता, पिता के मन में  अपने बच्चों  के लिए गहरी ममता भरी रहती है। उन्हेँ अपने बच्चों की हर छोटी बात विद्वत्तापूर्ण और अचरज से भरी लगती है। मानोँ सिर्फ उन की  सँतान ही इस तरह बोलती हो  !
 पापा भी प्रेमवश, मुस्कुरा कर पूछने लगे, ' अच्छा तो बेटा, पानी मेँ मछली ऐसे ही गिली रहती है ? क्या तुम जानती हो ?' 
मेरा उत्तर था , ' हाँ पापाएक्वेरीयम (मछलीघर ) मेँ देखा था ना हमने!'
सन १९५५ आते बम्बई के खार उपनगर  के १९ वे रास्ते पर उनका नया घर बस गया। 
न्यू योर्क भारतीय भवन के सँचालक श्रीमान डा . जयरामनजी के शब्दोँ मेँ कहूँ तो 
हिँदी साहित्य का तीर्थ - स्थान " बम्बई  महानगर मेँ एक शीतल सुखद धाम के रूप मेँ परिवर्तित हो गया।   
कुछ सालों के बाद : 
 एक गर्मी की दुपहरी याद आ रही है। हम बच्चे  जब सारे बडे सो रहे थे, खेल रहे थे। हमारे पडौसी  माणिक दादा के घर के बाग़ में आम का पेड़ था। हमने  कुछ कच्चे पक्के आम वहां से तोड लिए ! 
हमारी इस बहादुरी पर हम खुशी से किलकारीयाँ भर रहे थे किअचानक पापाजी वहाँ आ पहुँचे। 
गरज कर कहा, 'अरे ! यह आम पूछे बिना क्योँ तोडे जाओजाकर माफी माँगो और फल लौटा दो ' उनका आदेश हुआ। हम भीगी बिल्ली बने आमों को लिए चले माफी मांगने ! एक तो चोरी करते पकडे गए और उपर से माफी माँगने जाना पड़ा ! 
उस घटना में पापा जी की एक जबरदस्त डांट के मारे हम दूसरों की संपति को अनाधिकार छीन लेना गलत बात है ये बखूबी  समझ गये। उन की डांट ने अपने और पराये के बीच का भेद साफ़ कर दिया। जिसे हम कभी भूल नही पाए ! 
किसी की कोइ चीज हो, उस पर हमारा अधिकार नहीं होता। उसे पूछे बिना लेना गलत बात है। यही उनकी शिक्षा थी। 
 दूसरों की प्रगति और उन्नति देख , खुश रहना भी उन्होंने  हमे सिखलाया। 
पापा जी ने आत्म संतोष और स्वाभिमान जैसे सद्गुण हमारे स्वभाव में कब घोल दिये उसका पता भी न चला। 
परिवार में उनकी छत्रछाया तले रहते  हुए यह सब हमने उन्हीं से सिखा।
स्वावलंबन और हर तरह का कार्य करने में संकोच न रखना और हर कौम के लोगों से स्नेह करना ये भी हमने उन्हीं से सिखा। 
दूसरों की  यथा संभव सहायता करना। आत्म निर्भर रहना।  स्वयं पर सामाजिक शिष्टाचार का आदर्श स्थायी रखते हुए संयम पूर्वक जीवन जीना। स्वयं को अनुशासित रखना और दूसरों के संग उसी तरह बरतना जैसा तुम उनसे अपेक्षा करते हो। यह भी उन्हीं से सीखा।  
 सही रास्ते चलते हुए , जीवन जीना ऐसे कठिन पाठ पापा जी ने हमे कब सिखला दिए उनके बारे में  आज सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है!  
उन्हीं से सीखा है कि किस तरह सदा प्रसन्न रहना चाहीये ! 
ऐसा नहीं है कि विपत्ति या मुश्किलें आयीं नहीं ! परन्तु मन को स्थिर करते हुए , सदैव आशावान बने रहना यही मनुष्य के जीवन में महत्त्वपूर्ण है यह बड़ा कठिन पाठ भी उन्हीं को देखते हुए अपने व्यवहार में लाने की कोशिश करती रही हूँ।  ऐसे कई  सारे दुर्लभ सदगुण  पापा जी के स्वभाव में सदा ही देखती रही। 
उनकी कविता है ~~ 
' फिर महान बन मनुष्य फिर महान बन 
  मन मिला अपार प्रेम से भरा तुझे इसलिए की प्यास जीव मात्र की बुझे 
  बन ना कृपण मनुज , फिर महान बन मनुष्य फिर महान बन  ! ' 
नरेंद्र शर्मा 
वे  एक  प्रकांड  विद्वान होते हुए भी अत्यंत विनम्र एवं मृदु स्वभाव के थे। मेरे पापा जी और मेरी यथा नाम तथा गुण वाली अम्मा  सुशीला ने हमे  उनके स्वयं के आचरण से ही जीवन के कठिनतम स्वाध्यायों को सरलता से सिखलाया । 
माता और पिता बच्चों को सही शिक्षा दें उस से पहले उन्हें स्वयं भी उसी सही रास्ते पर चलते हुए बच्चों के सामने सच्चा उदाहरण  रखना भी आवश्यक होता है। 
पापा जी और अम्मा ने यही मुश्किल काम किया था। 
पूज्य पापा जी की १९ कविता पुस्तकें , कहानी , निबन्ध इत्यादी उनके साहित्य सृजन के अभिनव सोपान नरेंद्र शर्मा ' सम्पूर्ण रचनावली ' में संगृहित हैं। जिन्हें उनके पुत्र परितोष ने मनोयोग एवं अथक परिश्रम से तैयार किया है। 
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Compiled, Edited by Paritosh Narendra Sharma & Published by Paritosh Prakashan / Paritosh Holdings Pvt Ltd
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             एक और याद है जब मेरी उम्र होगी कोई ८ या ९ साल की ! पापाजी ने कवि शिरोमणि कवि कालिदास की कृति ' मेघदूत 'पढने को कहा। सँस्कृत कठिन थी। पढ़ते समय जहाँ कहीँ मैँ लडखडातीवे मेरा उच्चारण शुध्ध कर देते। 
आजपूजा करते समय हर मन्त्र और श्लोक का पाठ करते हुए वे पल याद आते हैँ। पापा जी ने ही सिखलाया था , किस शब्द का सही और  शुध्ध उच्चारण क्या होता है।  किस शब्द को किस प्रकार कहना है ये उन्हीं ने सिखलाया। इस प्रकार स्कूल में  संस्कृत सीखने के साथ साथ घर पर भी उन्हीं के द्वारा  देवभाषा संस्कृत से मेरा परिचय हुआ।  
 साल गुजरते रहे। कोलेज की शिक्षा पूरी हुई। मेरा विवाह हुआ।
सन १९७७ में  मेरी बेटी सिँदूर के जन्म के समय मैं अम्मा के घर आराम करने के लिए रही। जब भी मैं रात को उठतीपापा, भी उठ जाते और पास आकर मुझे सहारा देते। मेरा सीझेरीयन ओपरेशन हुआ था और मैं बहोत ज्यादह कमजोर हो गयी थी। वे मुझसे कहते, ' बेटामैँ हूँयहाँ ' उन्हें मेरी कितनी फिकर और चिंता थी यह उनके रात को मेरे संग मेरे हर बार जागने पे , उन के भी जाग जाने से और मुझे मेरी कमजोर हालत में सहारा देने से मैं पापा जी का मेरे प्रति जो अपार प्रेम था उसे समझ रही थी। 
आज मेरी बिटिया सिंदुर भी माँ बन चुकी है और मैं नानी ! सौ.सिंदुर के बेटे नॉआ के जन्म के समय , जो प्रेम पापा जी से मुझे मिला बिलकुल वैसा ही प्रेम और वात्सल्य मैं ने भी महसूस किया। 
जब जब अपनी बिटिया को आराम देते हुए छूती , तब तब मुझे पापाजी की निश्छल प्रेम मय वाणी और उनके कोमल स्पर्श का अनुभव हो जाता । 
 हम बच्चे, सब से बडी वासवी, मैँ मँझली लावण्या, छोटी बाँधवी व भाई परितोष अम्मा पापा की सुखी, गृहस्थी के छोटे, छोटे स्तँभ थे! हम उनकी प्रेम से सीँची फुलवारी के महकते हुए फूल थे!
जीवन अतित के गर्भ से उदय हो , भविष्य को सँजोता आगे बढता रहा । 
मेरा परम सौभाग्य है कि मैं पापाजी जैसे महान पुरुष की संतान हूँ।  
मैँ, लावण्या सचमुच अत्यंत सौभाग्यशाली हूँ कि ऐसे पापा मुझे मिले। मुझे बारम्बार यही विचार आता है ! 
 कितना सुखद संयोग है जो उन जैसे पुण्यवान, सँत प्रकृति के मनस्वी कवि ह्रदय पापा जी की मैं संतान हूँ और उन के लहू से सिँचित उनके जीवन उपवन का मैं एक नन्हा सा  फूल हूँ। 
 उन्हीँ के द्वारा मिली शिक्षा व सौरभ सँस्कार मेरे मनोबलको को आज भी जीवन की कठिन परीक्षा में दृढता से अडीग रखे हुए हैं । हर अनुकूल या विपरित परिस्थिती में शायद इसी कारण अपनी जीवन यात्रा के हर पडाव में मैं , अपने को मजबूत रख पाई हूँ और ईश्वर में अडीग श्रद्धा और मन में अपार धैर्य सहेजे अपना जीवन जीये जा रही हूँ !
पूज्य पापा जी के आचरण से , उनके पवित्र व्यवहार से ही तो ईश्वर तत्व क्या है उसकी झाँकी हुई !  पापा जी के परम तेजस्वी व्यक्तित्त्व में मुझे  ईश्वरीय दिव्यता के दर्शन हुए हैं । मेरी कविता ने इस  ईश्वरीय चैतन्य रूपी आभा से दीप्त व्यक्तित्व के दर्शन किये। मैं धन्य हुई ! 
मेरे पापा जी की विलक्षण प्रतिभा और स्मृति को मैंने मेरी कविता द्वारा सादर नमन अर्पित किया है। 

Saturday, April 28, 2018

जी हां मैं हूं 'छ' !


 
मुझ नाचीज़ पे भी एक नजर डालिए हुज़ूर! जी हां मैं हूं 'छ' ! हरेक शब्द कुछ स्वरों और व्यंजनों का मिलाजुला स्वरूप होता है और शब्दों से ही वाक्य बनते हैं और भाषा प्रवाहीत होती है। 

मनुष्य ऐसा जीव है जिसे अपने मन की बात दूसरे के मन तक पहुंचाने के लिए भाषा का प्रयोग करना पड़ता है। हिन्दी भाषा भी स्वर एवं व्यंजनों से सजी वर्णमाला है। जो जगमगा रही है जिसके मध्य  में आपको 'छ' भी मिल जाएगा। 

'छ' अक्सर शब्दों के आरम्भ में या मध्य में अथवा अंत में प्रयुक्त होता है। ज़रा याद करें ' छ ' से महिमा मंडीत हुए कौन कौन से शब्द इस वक्त आपको याद आ रहे हैं? 

चलिए हम भी 'छ' के संग हो लें। 'कुछ' शब्द में अंत में 'छ' आता है तो छात्र, छत्र में आरम्भ में और लांछन में मध्य में 'छ' उपस्थित है। अजी बरखा की छमाछम में भी तो मेरा समावेश हुआ है! ओह, तब तो आप जरा अपना 'छाता' भी खोल लें! कहीं बरखा रानी के छटा से बरसते छींटे देखते हुए आप भीग ना जाएं ! तभी तो कहा जनाबम आप अपना छाता या छतरी खोल लें और आपकी छत्री की छत्रछाया में आप सुरक्षित भी रहेंगें और वर्षा का आनंद भी लेते रहेंगें! 

अजी याद है न, देवी मां का एक स्वरूप ' छीन्नमस्ता ' के पवित्र नाम से पूजित होता है।मुझे गर्व है कि देवी के मंगलमय स्वरूप के संग मेरा आराम्भाक्षर 'छ' भी जुडा हुआ है ! हां यह अलग किस्सा है कि कई देवियां आज के इस कलियुग में ' छमक छल्ल्लो' भी कहलाईं  हैं! जिस पर एक धमाकेदार गीत 'आईटम सांग' बन कर मशहूर हुआ और करीना और शाहरूख ने ठुमके भी लगाए! अब उसकी कथा फिर कभी। 

माताएं अपने लालन पालन के समय 'ये न छूना 'छी छी है ' कहकर 'छ' से हर शिशु को परिचित करवातीं रहीं हैं। 

बहुरूपियों को कोइ पहचान नहीं पाता। किन्तु वहां भी मैं माने 'छ' द्रष्टिगोचर हूँ और 'छद्म वेशी' भी ऐसे बहुरूपिये के लिए ही कहा जाता है। 

अजी, कई प्रचलित मुहावरों में भी मैं दीख जाता हूं। अगर कोई ऐसी बात हो जिसे कहा भी न जाए और चुप भी न रहा जाए, या कहने से अपने आप को रोका भी न जाए वैसी परिस्थिति हो तब उस को 'सांप-छछुन्दर सी गति हो जाना' कहते हैं। जब सांप छछुन्दर को ना तो निगल सके ना ही उगल सके वैसी स्थिति हो तब उसे देख कर ही ये मुहावरा चल निकला ! 

'छ' की महिमा का कहां तक बखान किया जाए जी? बात तो इतनी सूक्ष्म है कि, सूई के छिद्र, माने सूराख से भी पार हो जाए ! 

नृत्यांगना अपने पैरों पे घूंघरू बांधे नाचती है तब ' छम छम, छन छननन छुन्न, छन छन ' के छनकते स्वरों में भी मैं ही मुखरित हुआ हूं! 
    अरे, और तो और ' छुन्नु मिश्रा जी जो बड़े भारी गवैया ठहरे  उनकी गायकी जितनी लोकप्रिय हुई लोग उनका नाम भी बड़े स्नेह से लेते रहे और साथ साथ उनके नाम 'छुन्नु' से लगा 'छ' भी तो लोगों की जबान पे चढ़ कर बोला ! 

भारतीय परिवारों में अक्सर ,ऐसा होता है कि बच्चों को बचपन में 'छुटका, छुटकी, या ' छुटके ' कह कर लाड़ से पुकारा जाता रहा है। जी हां शौक से पुकारिए आपका प्यार दुलार पाकर मैं भी तो फूला नहीं समाता ! 
छोटी ना कोई बात होती है ना ही जात! - सब बराबर होते हैं ! सारे जीव, एक परमात्मा ईश्वर के बनाये हैं ! एक समान ! वैसे ही जैसे ग्राम प्रान्तर में हर कुटिया पे पड़ा छप्पर! जहां छप्पन भोग कभी परोसे नहीं जाते ! 

सन सतावन की याद आये उसके ठीक पहले याद कीजिये कि अंक 56' छप्पन ' मेरे दम से ही गिना गया था ! 

'छ' से आती है छठी ! छठी का त्योहार आते ही सूर्य नारायण पूजे जाते हैं। छाछठ, छतीस जैसी रकम मुझ से ही दीप्तिमान हैं। 

अब कुछ बुरी बातों पे भी नजर डालें जैसे कि, जेल से छूटते ही कैदी घर को भागते हैं और छूआछुत जैसा जहर समाज में फैलाने वाली प्रथा भी बुरी है। 

जाति प्रथा का यह रोग समाज के लिए बोझिल बना तब महात्मा जी ने इस प्रदूषण को साफ़ करने का भरसक प्रयास किया! दीन हीन जन को सम्मान मिले ऐसे प्रयास जारी हुए। जय हो गांधी बापू की ! छल कपट की एक ना चली! अब भारतीय प्रजा स्वतन्त्रता प्राप्त कर, जनता अब आगे चली ! 
अब आपको अगला पिछला क्या-क्या गिनाऊँ ? 'छ' की स्मृति मानस पटल से कोइ छीन न पाएगा ! 

चाहे आपस में छनती रहे, या कोई छोड़कर चलता बने, हमें क्या? हम तो सदा से रहे हैं बस छटांक भर के ! हमारा पात्र छुक-छुक करती रेल गाड़ी सा चलता जायेगा ! छितरन उतरे भी तो क्या ? मुझे विश्वास है इस बात पर कि दूर क्षितिज के छोर तक 'छ' का नजारा दीखता रहेगा ! अब छोडिए भी ! छोटे मुंह बड़ी बात क्या बोलूं? 

आपके छुटपन से बड़प्पन तक मैं आपके साथ रहा हूं जी और वादा करता हूं कि, सदा रहूंगा ! चलिए अब आज्ञा लेता हूं। …. 
अब कहीं आप को 'छ' दीख पड़े तब मुस्कुराइएगा और मैं प्रसन्न हो जाऊंगा ! एक बात और कह लूं ? अगर कछू जियादा ही कह गया होऊं तब 'छमा' करीयो जी ! 
~ अलविदा ' आपका - 'छ' 

[सीनसिनाटी, ओहायो (USA) से
~ लावण्या शाह ]

Thursday, March 15, 2018

सृजन-गाथा " के सफल सम्पादक श्री जयप्रकाश मानस

दर्पण के सामने
परिचय  : 
नाम :
जयप्रकाश मानस 
(मूल नाम जयप्रकाश रथ) 
जन्म : २  अक्टूबर, १९६५ 
शिक्षा :एम.ए. (भाषा विज्ञान), 
एम.एस.सी (आई.टी.)
 प्रकाशित कृतियाँकविता संग्रह : तभी होती है सुबह, 
होना ही चाहिए आँगन 
ललित निबन्ध: दोपहर मेँ गाँव (पुरस्कृत)
बाल गीत:
१)  चलो चलें अब झील पर
२)  सब बोले दिन निकला
३) एक बनेंगे नेक बनेंगे
४)  मिलकर दीप जलायें
 नव साक्षरोपयोगी:
 १ : यह बहुत पुरानी बात है
२ : छत्तीसगढ़ के सखा
३ : लोक साहित्य:
४ : लोक वीथी:
१ ) छत्तीसगढ़ की लोक कथायें (१०  भाग)
२) हमारे लोकगीत
भाषा एवं मूल्यांकन :
१ - छत्तीसगढ़ी: दो करोड़ लोगों की भाषा
२ - बगर गया वसंत (बाल कवि श्री वसंत पर एकाग्र)
छत्तीसगढ़ी:
कलादास के कलाकारी 
(छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रथम व्यंग्य संग्रह)
शीघ्र प्रकाश्य:
१) हिन्दी ललित निबन्ध
२) हिन्दी कविता में घर
संपादन:
१) विहंग (२० वीं  सदी की हिन्दी कविता में पक्षी)
२) महत्व: डॉ. बलदेव (समीक्षक)
३ ) महत्व: स्वराज प्रसाद त्रिवेदी (पत्रकार)
पत्रिका संपादन एवं सहयोग:
१ ) बाल पत्रिका, बाल बोध (मासिक) के १२  अंकों का संपादन
२) लघुपत्रिका प्रथम पंक्ति (मासिक) के २  अंकों का  संपादन
३) लघुपत्रिका पहचान: यात्रा (त्रैमासिक) में संपादन सहयोग
४) लघुपत्रिका छत्तीसगढ़: परिक्रमा (त्रैमासिक) में संपादन सहयोग 
५ ) अनुवाद पत्रिका सद्-भावना दर्पण (त्रैमासिक) में संपादन सहयोग
६) लघुपत्रिका सृजन:गाथा (वार्षिक एवं अब त्रैमासिक)  संपादन
अंतरजाल पत्रिका: १ ) सृजन:सम्मान का सम्पादन

कृषि आधारित पत्रिका काश्तकार को तकनीकी सहयोग

सृजनगाथा (मासिक) का प्रकाशन व सम्पादन
एलबम:आडियो एलबम : 
तोला बंदौं (छत्तीसगढ़ी) ,
 जय माँ चन्द्रसैनी (उड़िया)
वीडियो एलबम : घर:घर माँ हावय दुर्गा 
(छत्तीसगढ़ी) पुरस्कार एवं सम्मान:
कादम्बिनी पुरस्कार  (टाईम्स ऑफ़ इण्डिया), 
बिसाहू दास मंहत पुरस्कार, 
अस्मिता पुरस्कार, 
अंबेडकर फैलोशिप (दिल्ली), 
अंबिका प्रसाद दिव्य रजत अलंकरण एवं अन्य तीन 
सम्मान विशेष:
ललित निबन्ध संग्रह 'दोपहर में गाँव' पर रविशंकर 
वि.वि. रायपुर से लघु शोध
देश में ललित निबन्ध पर केन्द्रित प्रथम अ. भा. 
संगोष्ठी का आयोजन
आकाशवाणी रायपुर से शैक्षिक कार्यक्रम का २  
वर्ष तक साप्ताहिक प्रसार
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, नई दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय 
लेखन कार्यशाला में
प्रतिभागी राजीव गाँधी शिक्षा मिशन, मध्यप्रदेश में २  वर्ष तक राज्य स्त्रोत पर्सन का कार्य देश की प्रमुख सांस्कृतिक संगठन, 
सृजन - सम्मान का संस्थापक महासचिव: १९९५ से 
चयन मंडल में संयोजन:
एक लाख से अधिक राशि वाले ३०  प्रतिष्ठित एवं अखिल भारतीय साहित्यिक पुरस्कारों के चयन मंडल का संयोजक
शासकीय चाकरी: परियोजना निदेशक, संपूर्ण साक्षरता अभियान, जिला रायपुर
परियोजना निदेशक, राष्ट्रीय बाल श्रम उन्मूलन, जिला रायपुर
उप संचालक, शिक्षा, जिला रायगढ़
सचिव, छत्तीसगढ़ संस्कृत बोर्ड, छत्तीसगढ़ 
शासन, रायपुर सचिव, छ्त्तीसगढ़ी भाषा परिषद, छत्तीसगढ़  शासन, रायपुर
विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी छ.ग. हिन्दी ग्रंथ अकादमी, रायपुर,  अंजोर
(शिक्षा विभाग की त्रैमासिक पत्रिका)
हिन्दी चिट्ठाकारी के लिए भी जयप्रकाश मानस जी पुरस्कृत हो चुके हैं।
(श्री जय प्रकाश मानस)

सृजन-गाथा के चिट्ठाकार श्री जयप्रकाश मानस को उनकी हिन्दी चिट्ठाकारिता के लिए माता सुंदरी फ़ाउंडेशन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। विस्तृत समाचार यहाँ देखें।

श्री जयप्रकाश मानस जी को ढेरों बधाईयाँ व शुभकामनाएँ.

यह तथ्य स्पष्ट है कि श्री    जी, हिंदी साहित्य के  सफल व सशक्त हस्ताक्षर हैं और एक लोकप्रिय व सफल सम्पादक हैं। अंतरजालीय, साहित्यिक व सांस्कृतिक इत्यादि गतिविधियों पर बराबर उनकी आँख रहती है।अपनी पारखी नज़रों से, भाई जयप्रकाश जी, कई कार्यक्षेत्रों के बारे में, सुरुचिपूर्ण पत्रिका के माध्यम से, एक विशाल हिन्दी भाषीय क्षेत्र को साहित्य विषयक समाचार से, अवगत करवाते रहे हैं। 
 मुझे जयप्रकाश जी के निबंधों ने, उस में प्रयुक्त भाषा लालित्य ने तथा उनके लेखन में जो स्पष्टवादिता है साथ साथ जो एक सुलझी हुई परिपक्वता है उस लेखकीय ऊर्जा ने मेरा ध्यान उनके लेखन पर केंद्रित किया था।
      भारतीय माटी की सौंधी सुगंध उनकी रचनाओं का श्रृंगार है। भारतीय जीवन शैली से जो व्यक्ति जुड़ा रहता है वही अपनी रचनाओं में भारतीय समाज को प्रस्तुत कर पाता है। 
        दैनिक जीवन हो या कि  परिवेश जब उस पर लेखक की द्रष्टि रहती है तब वह रचनाओं को विशेष बना देती है। इसी प्रकार की प्रामाणिकता ने  सूक्ष्म सूझ - बुझ ने जयप्रकाश जी की प्रत्येक रचनात्मक विधा को, सरस एवं पठनीय बनाया है। 
        श्री जयप्रकाश मानस जी के लेखन में इन सारे लेखकीय गुणों का समावेश है। रचनाकार के लेखन के इन गुणों की सराहना लोक में और अन्य साहित्यकारों ने स्वागत करते हुए हिंदी साहित्य के उनके अवदान पर प्रशंशा की है।  
      " चिठ्ठियाँ गायब हुई " नाम से लिखे, कुछ ८ - १० कुछ मुक्तक पढ़े थे। मैंने यह रचनाकार श्री जयप्रकाश मानस जी का लिखा हुआ शायद  नेट पर पहली बार कुछ पढ़ा था और  हाँ शायद लेखक के पास आज भी वे सुरक्षित हों ! अब  इस बात को कई बरस बीत चुके हैं। 
          तदुपरांत उनके लिखे निबंध भी पढ़े। बेहद सधे  हुए, संतुलित विचारों का निरूपण करते और भारतीय वांग्मय व साहित्य के उद्धरणों सहित लिखे निबंध, विद्व्त्तापूर्ण थे पर बोझिल कहीं भी न थे। भाषाई गठन,  साहित्यक गुणवत्ता लिए, निबंध रसप्रद लगे और वे पाठकों को बांधे रखने की क्षमता लिए हुए भी थे। तो सोचा यह इस व्यक्ति विशेष की माने एक प्रबुद्ध रचनाकार की विशेषता ही है जो रचनाकर्म के प्रति लेखक का समर्पण और परिश्रम इंगित कर रहा है। हिंदी व भारत की अन्य भाषाओं में लिखते हुए,जयप्रकाश जी ने, हिंदी साहित्य समृद्धि में श्रीवर्धन किया है। 

निबंध : १  महिष को निहारते हुएhttp://www.srijangatha.com/LalitNibandh1_Aug2K8

        हिन्दी भाषा से सम्बंधित ब्लॉग, पत्रिका, वेब मेगेज़ीन पर जयप्रकाश जी का प्रचुर लेखन उपस्थित है। 
श्री जय प्रकाशजी का 
लिखा, यह 
" शब्द - चित्र "मन को छू गया ! ~
 "दादीमाँ भीड़ को चीरती हुई मेरे सम्मुख आ खड़ी हुई। उसके हाथ में थाल है।थाल में एक दीपक, कुछ दूर्वा, कुछ सुपाड़ी, कुछ हल्दी गाँठें, सिंदूर, चंदन, पाँच हरे-हरे पान के पत्र और एक बीड़ा पान।मुझे लगा, जैसे दादी के काँपते हाथों में समूची संस्कृति सँभली हुई है। "
          
तद्पश्चात जय प्रकाश जी ने ई  मेल से संपर्क किया। 
प्रस्तुत है उनका लिखा पत्र ~
"  आदरणीय लावण्या दीदी,
चरण स्पर्श
हम " सृजनगाथा´´ में एक नये स्तंभ – 'प्रवासी कलम ' की शुभ शुरूआत आपसे करना चाहते हैं । आपसे इसीलिए कि विदेश में बसे प्रवासियों में आप सबसे वरिष्ठ हैं । साथ ही भारत के प्रतीक पुरुष पं. नरेन्द्र शर्मा की पुत्री भी । भारतीयता का तकाजा है कि श्रीगणेश सदैव बुजुर्गों से ही हो । यह प्रवासी भारतीय साहित्यकारों से एक तरह की बातचीत के बहाने भारतीय समाज, साहित्य, संस्कृति का सम्यक मूल्यांकन भी होगा जो 
http://www.srijangatha.com/ के 1 जुलाई 2006 के अंक में प्रकाशित होगा । साथ ही हिन्दी के कुछ महत्वपूर्ण लघुपत्रिकाओं में। हम जानते हैं कि उम्र के इस मुकाम में आपको लिखने-पढ़ने में कठिनाई होती होगी। 
      पर यथासमय हमें किसी तरह आपके ई-मेल से उत्तर प्राप्त हो जाये तो यह एक ऐतिहासिक कदम होगा ।
      दीदी जी, इसके साथ यदि आपकी कोई तस्वीर अपने पिताजी के साथ वाला मिल जाये तो उसे भी स्केन कर अवश्य ई-मेल से भेज दें । आशा है आप हमारा हौसला बढा़येगीं । हम आपका सदैव आभारी रहेंगे। '
मैंने सहर्ष उत्तर लिख भेजे थे जिन में से कुछ प्रश्नोत्तर  प्रस्तुत हैं। 

प्रश्न- आप मूलतः गीतकार हैं । आपका प्रिय गीतकार (या रचनाकार) कौन ? क्यों ? वह दूसरे से भिन्न क्यों है ?
उत्तर - ४ ) अगर मैँ कहूँ की, मेरे प्रिय गीतकार मेरे अपने पापा, स्व. पॅँ नरेन्द्र शर्माजी के गीत मुझे सबसे ज्यादा प्रिय हैँ तो अतिशयोक्ति ना होगी ! हाँ, स्व. श्रेध्धेय पँतजी दादाजी, स्व. क्राँतिकारी कवि ऋषि तुल्य निरालाजी, रसपूर्ण कवि श्री बच्चनजी, अपरामेय श्री प्रसादजी, महान कवियत्री सुश्री महादेवी वर्मा जी, श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी विभूतियाँ हिँदी साहित्य गगनके जगमगाते नक्षत्र हैँ जिनकी काँति अजर अमर है।
 ( क्यों ?? ) इन सभी के गीतोँ मेँ माँ सरस्वती की वैखरी वाणी उदभासित है और सिर्फ मेरे लिये ही नहीँ, सभी के लिये उनकी कृतियाँ प्रणम्य हैँ। 
( वह दूसरे से भिन्न क्यों है ? )  भिन्न तो न कहूँगी  अभिव्यक्त्ति की गुणवत्ता, ह्रदयग्राही उद्वेलन, ह्रदयगँम भीँज देनेवाली, आडँबरहीन कल्याणकारी वाणी, सजीव भाव निरुपण, नयनाभिराम द्र्श्य दीखलाने की क्षमता, भावोत्तेजना, अहम्` को परम्` से मिलवानेकी वायवी शक्त्ति , शस्यानुभूति, रसानुभूति की चरम सीमा तक प्राणोँको, सुकुमार पँछी के, कोमल डैनोँ के सहारे ले जाने की ललक और, और भी कुछ अतिरिक्त जो वाणी विलास के परे है। वह सब इन कृतियोँ मेँ विध्यमान है। 
जैसा काव्य सँग्रह " प्यासा ~ निर्झर " की शीर्ष कविता मेँ कवि नरेँद्र कहते हैँ,
 "  मेरे सिवा और भी कुछ है , 
      जिस पर मैँ निर्भर  हूँ ~ 
     मेरी प्यास हो ना हो जग को,
      मैँ, प्यासा निर्झर हूँ " 
प्रश्न- लंबे समय तक हिन्दी-गीतों को नई कविता वालों के कारण काफी संघर्ष करना पड़ा था । आप इसे कैसे देखती हैं । गीत के भविष्य के बारे में क्या कहना चाहेंगी ? 
उत्तर -  नई कविता भी तो हिँदी की सँतान है  और हिँदी के आँचल मेँ उसके हर बालक के लिये स्थान है।  क्योँकि, मानव मात्र को, अपनी अपनी अनुभूति को पहले अनुभव मेँ रच बस कर, रमने का जन्मसिध्ध अधिकार है।  उतना ही कि जितना खुली हवा मेँ साँस लेने का !
ये कैसा प्रश्न है की किसी की भावानुभूति अन्य के सृजन मे आडे आये ?
नई कविता लिखनेवालोँ से ना ही चुनौती मिली गीत लिखनेवालोँको नाही कोई सँघर्ष रहा !
" किसी की बीन, किसी की ढफली,
    किसी के छँद कीसी के फँद ! "
~~ ये तो गतिशील जीवन प्रवाह है ,
 हमेँ उसमेँ सभी के लिये, एक सा ढाँचा नहीँ खोजना चाहीये। हर प्राणीको स्वतँत्रता है कि,
 वह, अपने जीवन और मनन को अपनाये। 
 यही सच्चा " व्यक्ति स्वातँत्रय " है।
बँधन तो निषक्रीयता का ध्योतक है और जब तक खानाबदोश व बँजारे गीत गाते हुए, वादियोँ मेँ घूमते रहेँगेँ, प्रेमी और प्रेमिका मिलते या बिछुडते रहेँगेँ, माँ बच्चोँ को लोरीयाँ गा कर सुलाया करेँगीँ
और बहने, सावन के झूलोँ पर अपने वीराँ के लिये सावनकी कजली गाती रहेँगीँ ...या, पूजारी मँदिरमेँ साँध्य आरती का थाल धरे, स्तुति भजन गायेँगेँ,
या गाँव मुहल्लेह भर की महिलाएं  .....बेटीयोँ की बिदाई पर " हीर " गायेँगीँ, "गीत " गूँजते रहेँगेँ ! 
ग़ीत प्रकृति से जुडे हैं और मानस के मोती की तरह मानव समुदाय के लिए पवित्रताम भेँट हैँ। उनसे कौन विलग हो पायेगा ?
 कृपया सम्पूर्ण कथोपकथन यहां पढ़ें ~ : http://antarman-antarman.blogspot.com/2007/03/blog-post_16.html

चित्र : पंडित नरेंद्र शर्मा पंडित 
एवं जवाहर लाल नेहरू जी 

एवं जवाहर लाल नेहरू जी   Image result for यह मेरा सौभाग्य है पंडित नरेंद्र शर्मा की बेटी हूँ
प्रस्तुत हैं श्री जयप्रकाश मानस जी के काव्य 
१ : वनदेवता

घर लौटते थके मांदे पैरों पर डंक मार रहे हैं बिच्छू
कुछ डस लिए गए साँपों से
पिछले दरवाज़े के पास चुपके से जा छुपा लकड़बग्घा
बाज़ों ने अपने डैने फड़फड़ाने शुरू कर दिए हैं
कोयल के सारे अंडे कौओं के कब्ज़े में
कबूतर की हत्या की साज़िश रच रही है बिल्ली
आप में से जिस किसी सज्जन को
मिल जाएँ वनदेवता तो
उनसे पूछना ज़रूर
कैसे रह लेते हैं इनके बीच ! 
२ : शहर 
यहाँ भी -
सूरज उगता है पर नगरनिगम के मलबे के ढेर से
चिड़िया गाती है पर मोबाईल के रिंगटोन्स में
घास की नोक पर थिरकता हुआ ओस भी दिखता है पर वीडियो क्लिप्स में
अल्पना से आँगन सजता है पर प्लास्टिक स्टीकरों वाली
थाली में परोसी जाती है चटनी, अचार पर आयातित बंद डिब्बों से
बड़े-बडे हाट भरते हैं पर कोई किसी को नहीं भेंटता
लोग-बाग मिलते हैं एक दूसरे से पर बात हाय-हैलो से आगे नहीं बढ़ती
चिट्ठियाँ खूब आती हैं पर ई-मेल में मन का रंग ढूँढे नही मिलता
खूब सजती हैं पंडालें पंडों की पर वहाँ राम नहीं होते
उठजाने की ख़बर सभी तक पहुँचाती हैं अखबारें पर काठी में कोई नहीं आता
इस पर भी शहर जाना चाहते हो जाओ
पर तुम्हें साफ-साफ पहचाना जा सके
जब भी लौट कर आओ। 

फेसबुक जैसे मनोविनोद के पोर्टल पर जयप्रकाश मानस जैसा सृजनशील  रचनाकार, अपनी अलग उपस्थिति लिए अपनी पोस्ट से अलग दिखता है। अतुल्य भारत शीर्षक से भारतीय जनजीवन के मार्मिक चित्र हों या आप फेसबुक पर क्यों हैं जैसे उनके प्रश्न जिनके उत्तर अनेक साहित्यकारों ने लिख भेजे ये नई तरह की पठनीय सामग्री एक निरंतर सृजनशील सम्पादक, लेखक ही परोस सकता है। श्री जयप्रकाश मानस जी ने 

रचनाकारों से ' मैं और मेरी पसंद ' - फेसबुक के लिए श्रृंखला का क्रम रचकर , फेसबुक ' जैसे माध्यम के द्वारा एक पठनीय पृष्ठ का श्रीगणेश किया है। फिर एक बार यह प्रश्न भी पूछा गया। 
प्रश्न : १ . २०१४ में आपने किन-किन रचनाकारों की, किस-किस विधा की कौन-सी किताब पढ़ी ?
उत्तर :
पंडित नरेंद्र शर्मा : सम्पूर्ण रचनावली - १६ खण्ड 
 इस वर्ष पढ़ी हुईं दुसरी पुस्तक अंग्रेज़ी भाषा से हैं। भारत का भौगोलिक मानचित्र दर्शनीय ही नहीं सनातन धर्म का जीता जागता साक्षी है। 
इस पर शिकागो की एक विदुषी प्रोफ़ेसर ने बृहत् पुस्तक लिखी है। वह भी साथ साथ पढ़ रही हूँ। 
एक और है प्रातः स्मरणीय रमण महर्षि जी की
 ' ऋभु गीता ' के छठे अंश का अंग्रेज़ी में रूपांतर और व्याख्या। 
लेखिका ज़ुम्पा लाहिड़ी की पुस्तक - Unaccustomed Earth - लघु कथाएँ 
 न्यू यॉर्क टाइम्स बुक रिव्यू ने इसे सर्वश्रेष्ठ कृति कहा है।  
आपकी फसबूक पोस्टों के जरिये भी अत्यंत रोचक, ज्ञानवर्धक जानकारियां, लघुकथाएँ वगैरह पढ़ने को मिलतीं रहतीं हैं। 
प्रश्न. इस किताब का कितना असर पाठक, समाज, भाषा और साहित्यिक दुनिया में हो सकता है ?

उत्तर : मैंने गत वर्ष बच्चन जी की रचनावली भी पढ़ी थी। साहित्य का असर तो तभी होगा न जब उसे पढ़ा जाए, समझा जाए और उस मे उद्धृत सही और क्रांतिकारी या सर्वकालिक समाज कल्याण के वरदान रूपी स्नेह सन्देश को जीवन में लाना संभव हो ! जो राजनैतिक उत्थान में सहायक हो। भाषा का विकास, समाज के नागरिक के विकास और भाषा को अपनाने से ही होता है। 
साहित्यिक विश्व में, जिन में विश्व भर में फैले हिन्दी भाषी भी सम्मिलित हैं उनका योगदान भी महत्त्वपूर्ण है। परन्तु मूल प्रश्न यही रह जाता है कि ' व्यक्तिवाद से ऊपर उठकर हम सम्पूर्ण समाज के हित के लिए क्या कर सकते हैं ? 
भारत वर्ष में सरकार के सदस्य चुनाव लड़ते हैं केंद्र में सत्ता  बदली  है और  हिन्दी भाषा के पुनरूत्थान के प्रति आज केन्द्रस्थ सरकार सजग एवं समर्पित है। इस बात से से मेरे मन में आशा बलवती हुई है कि अब भारत का सामाजिक उदय काल भी अवश्य होगा। सर्वोदय स्वप्न नहीं रहेगा। वास्विकता की धरा पर उसे हम फूलता फलता पल्ल्वित होता हुआ भी अवश्य देखेंगें। 
' आधा सोया आधा जागा देख रहा था सपना 
 विराट के भावि दर्पण पर देखा भारत अपना 
गाँधी जिसका ज्योति ~ बीज,
उस विश्व वृक्ष की छाया
सितादर्ष लोहित यथार्थ यह
नही सुरासुर माया !"
- पँ. नरेन्द्र शर्मा
 

 अंत में , भाई श्री जयप्रकाश जी के ब्लॉग से, एक पुरानी प्रविष्टी, प्रस्तुत करते, अपार हर्ष हो रहा है। 
आशा है आप सभी को, भाई श्री जयप्रकाश जी जैसे, प्रबुध्ध, साहित्यकर्मी से, उन्हीं के लिखे शब्दों से यहां परिचित होना अच्छा लगेगा।  अत: प्रस्तुत है उनके ब्लॉग से साभार ~~ 















" संसार गीतविहीन कभी था ही नहीं । गीत वेदों से भी सयाना है। निराला जी ने कभी कहा था- “गीत मानव की मुक्ति-गाथा का प्रथम प्रणव है”।
जो गाने-गुनगुनाने नहीं जानता या तो वह पाषाण है या फिर जीव होकर भी
जीवनहीन है ।
मेरी माँ बताती है- जब मैं जनमा तो मेरे रोने में उन्हें गाने की अनुभूति हुई ।
शायद हर माँ को शिशु का प्रथम रूदन एक शाश्वत गान ही लगता है। जो भी हो, मैं बचपन में मेले-ठेले जाता था तो सबसे अधिक रूचने वाली बात गीत ही होता था। वे लोकगीत होते थे। राउतनाचा के गीत, रथयात्रा के गीत, डंडागीत, सुवागीत और भी न जाने कितने तरह के गीत । उन दिनों लगता था कि मेरा जनपद लोकगीतों का जनपद है ।
घर में महाभारत, रामचरित मानस, लक्ष्मीपुराण या फिर सत्यनारायण की कथा होती थी तो पंडित जी या मंडली गीत ही तो गाते थे । माँ जब पवित्र तिथियों में मंगला (दुर्गा देवी) की व्रत रखती थी तो उडिया में जो मंत्रपाठ करती थी वह गीत ही तो था।
स्कूल में पढाई की शुरूवात गद्य से नहीं बल्कि पद्य यानी कि गीत से ही हुआ । शायद आप भी जानते हों इस गीत को ।
चलिए हम ही बताये देते हैं- ओणा मासी धम्म-धम्म, विद्या आये छम-छम ।  वह भी गीत ही था जो हमारे प्रायमरी स्कूल के गुरूजी हर नवप्रवेशी बच्चों को पहले दिन पढाते रहे यद्यपि यह गीत जैसा नहीं लगता किन्तु वे उसे ऐसे सिखाते थे कि मैं उसे गीत माने बिना नहीं रह सकता और यह गीत था- एक एक्कम एक, दो एक्कम दो , तीन एक्कम तीन, चार एक्कम चार.............. ।
शायद वे गद्य को पद्य बनाकर नहीं गाते तो शायद जाने कितने बच्चे आज भी अनपढ रह जाते ।स्कूल की ईबारत सीखते-सीखते जाने कब मैं जन-गण-मन से लेकर वंदे मातरम् और युवा होने से पहले-पहले दुलहिन गावहु मंगलाचार या फिर हेरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद न जाणे कोय आदि-आदि आत्मसात कर लिया पता ही नहीं चला । कुछ मन मचला तो किशोर दा के गीत भी मन को अतिशय भाने लगे और मैं भी गुनगुनाने लगा- जिंदगी के सफर में गूजर जाते हैं वे जो पल फिर नहीं आते । उन दिनों, जब प्रेम मन में अंगडाई लेने लगा और कभी तनहाई सताने लगी तो ये गीत भी खुब सुहाने लगे थेः आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज न दे ~~ 
  इस बीच कुछ-कुछ लिखने लगा।लघुकथायें लिखीं।कविता भी और आलेख भी।पर सच कहता हूँ मन तो गाना चाहता है । कविता, लघुकथा, आलेख, निबंध तो पढने की विधाएँ है । इन्हें थोडे न गाया जा सकता है । जीवन में पहली बार गीत लिखा। लगा मैं स्वर्गीय आनंद से भर उठा हूँ। गाकर सुनाया कवि मित्रों को तो मत पूछिए क्या हुआ । सबने गले से लगा लिया । कंठ तो ईश्वर से मिला ही है । लोग मंचों पर सुनाने का आग्रह करने लगा । तब से अब तक लगातार लिख रहा हूँ। क्या-क्या लिखा।कितना लिखा । कितना नाम कमाया और कितना दाम भी। उसकी चर्चा फिर कभी।आज तो बस मैं अपने उस प्रिय रचनाकार के गीत सुनाना चाहता हूँ जिनके बिना हिन्दी गीत-यात्रा अधूरी रह जाती । मेरे मन मानस मैं पैठे उस गीतकार का नाम है- पं.नरेन्द्र शर्मा। वे छायावाद काल के समापन के समय ही हिन्दी की दुनिया में प्रतिष्ठित हो चुके थे। इनके आरंभिक गीतों के केन्द्र में प्रेम हिलोरें मारता है। बाद के गीतों में लोक और परलोक के भी संदर्भ हैं।संयोग का उल्लास, मिलन की अभिलाषा, रूप की पिपासा, संयोग की विविध मनोदशायें तथा वियोग की पीडा नरेन्द्र शर्मा जी के गीतों का विषय है। वे केवल व्यक्तिवादी नहीं थे, उनमें सामाजिकता भी लबालब है । ऐसा कौन होगा जो हिन्दी का प्रख्यात टी.व्ही.सीरियल देखा हो और पंडित जी को न जानता हो । तो काहे की देरी। लीजिए ना उनके वे गीत जो मुझे बहुत पसन्द हैं। 
एक...
तुम रत्न-दीप की रूप-शिखा

तुम दुबली-पतली दीपक की लौ-सी सुन्दर
मैं अंधकार
मैं दुर्निवार
मैं तुम्हें समेटे हूँ सौ-सौ बाहों में, मेरी ज्योति प्रखर
आपुलक गात में मलय-वात
मैं चिर-मिलनातु जन्मजात
तुम लज्जाधीर शरीर-प्राण
थर्-थर् कम्पित ज्यों स्वर्ण-पात
कँपती छायावत्,रात,काँपते तम प्रकाश आलिंगन  भर
आँखे से ओझल ज्योति-पात्र
तुम गलित स्वर्ण की क्षीण धार
स्वर्गिक विभूति उतरीं भू पर
साकार हुई छवि निराकार
तुम स्वर्गंगा, मैं गंगाधर, उतरो, प्रियतर, सिर आँखों पर
नलकी में झलका अंगारक
बूँदों में गुरू-उसना तारक
शीतल शशि ज्वाला की लपटों से
वसन, दमकती द्युति चम्पक
तुम रत्न-दीप की रूप-शिखा, तन स्वर्ण प्रभा कुसुमित अम्बर
…………………

दो...
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे

आज से दो प्रेमयोगी अब वियोगी ही रहेगें
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

आयगा मधुमास फिर भी, आयगी श्यामल घटा घिर
आँख बर कर देख लो अब, मैं न आऊँगा कभी फिर
प्राण तन से बिछुड कर कैसे मिलेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

अब न रोना, व्यर्थ होगा हर घडी आँसू बहाना
आज से अपने वियोगी हृदय को हँसना सिखाना
अब आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे
न हँसने के लिए हम तुम मिलेंगे ।

आज से हम तुम गिनेंगे एक ही नभ के सितारे
दूर होंगे पर सदा को ज्यों नदी के दो किनारे
सिन्धु-तट पर भी न जो दो मिल सकेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

तट नही के, भग्न उर के दो विभागों के सदृश हैं
चीर जिनको विश्व की गति बह रही है, वे विवश हैं
एक अथ-इति पर न पथ में मिल सकेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

यदि मुझे उस पार के भी मिलन का विश्वास होता
सत्य कहता हूँ न में असहाय या निरूपाय होता
जानता हूँ अब न हम तुम मिल सकेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।
आज तक किसका हुआ सच स्वप्न, जिसने स्वप्न देखा
कल्पना के मृदृल कर से मिटी किसकी भाग्य रेखा
अब कहां संभव कि हम फिर मिल सकेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

आह, अंतिम रात वह, बैठी रही तुम पास मेरे
शीश कन्धे पर धरे, घन-कुन्तली से गाते घेरे
क्षीण स्वर में कहा था, अब कब मिलेंगे
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।

कब मिलेंगे ?
पूछता जब विस्व से मैं विरह-कातर
कब मिलेंग ?गूँजते प्रतिध्वनि-निनादित व्योम-सागर
कब मिलेंगे प्रश्न उत्तर कब मिलेंगे ?
आज के बिछुडे न जाने कब मिलेंगे ।
…………………
तीन...
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर

शुन्य है तेरे लिए मधुमास के नभ की डगर
हिम तले जो खो गयी थीं, शीत के डर सो गयी थी
फिर जगी होगी नये अनुराग को लेकर लहर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर

बहुत दिन लोहित रहा नभ, बहुत दिन थी अवनि हतप्रभ
शुभ्र-पंखों की छटा भी देख लें अब नारि-नर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर
पक्ष अँधियारा जगत का, जब मनुज अघ में निरत था
हो चुका निःशेष, फैला फिर गगन में शुक्ल पर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर
विविधता के सत विमर्षों में उत्पछता रहा वर्षों
पर थका यह विश्व नव निष्कर्ष में जाये निखर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर
इन्द्र-धनु नभ-बीच खिल कर,
 शुभ्र हो सत-रंग मिलकर
गगन में छा जाय विद्युज्ज्योति के उद्दाम शर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर
शान्ति की सितपंख भाषा,
 बन जगत की नयी आशा
उड निराशा के गगन में,
 हंसमाला, तू निडर
हंस माला चल, बुलाता है तुझे फिर मानसर
~ श्रीमती लावण्या दीपक शाह : ओहायो प्रांत, उत्तर अमरीका से