Saturday, November 17, 2007

कोई कोयल गाये रे ,जपा कुसुम का फूल ,वेणी के फूल



" प्रवासी के गीत"
कविता की पुस्तक के अमर गीतकार पँडित नरेन्द्र शर्मा को मेरी श्रध्धाँजली स्वरुप ,
काव्य पुस्तक " फिर गा उठा प्रवासी " छप चुकी है."
" प्रवासी के गीत"
की ये पँक्तियाँ बरबस ध्यान आकृष्ट करतीं हैं

" साँझ होते ही न जाने छा गई, कैसी उदासी ?
क्या फिर किसी की याद आयी
ओ विरह व्याकुल प्रवासी ? "
और ~~~

" क्या तुमको भी कभी, आता है हमारा ध्यान ?
नाम लेकर हमारा, खीँचता आँचल तुम्हारा,क्या कभी सुनसान ? "
और ये मेरी पँक्तियाँ या कहूँ कि "श्रध्धा ~ सुमन हैँ "
" तुम चले जाते हो, नीरव रह जातीँ हैं जीवन की राहें,
अलसाई डालीयोँ से,
तब, रात सरक आती है !"
१ ) ज्योति ~ पर्व http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/diye_jalao/sets/21_11_04.html
( २ ) जपा कुसुम का फूल http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/l/lavanyashah/japakusum.htm
( ३ ) कोकिला http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/vasanti_hava/kokila.htm
( ४ ) वेणी के फूल ( जिसे अनुभूति वेब पत्रिका ने " आषाढ की रात " शीर्षक दे कर छापा है http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/varshamangal/sets/22aug.htm
( ५ ) प्रेम - मूर्ति http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/premgeet/premurti.htm
( ६ ) कोई कोयल गाये रे ! http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/l/lavanyashah/pal.htm
(७ ) मेरा मेहमान http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/mausam/mausam3.htm#lavanya

4 comments:

Harshad Jangla said...

Lavanyaji

Nice poems.
Your picture is equally nice.
Rgds.

Lavanyam - Antarman said...

Thanx Harshad bhai --
For your kind comments
warm rgds
-- L

parul k said...

तुम चले जाते हो, नीरव रह जातीँ हैं जीवन की राहें,
अलसाई डालीयोँ से,
तब, रात सरक आती है !"

वाह कितनी सुंदर पंक्तियां……and u r really beautiful lavanyaa ji

Lavanyam - Antarman said...

Parul ji Thank you so much for your kind words ...
You r a sensitive soul & if You like my poem then I'm happy.
warm rgds,
L