Wednesday, September 2, 2009

कई दुर्लभ चित्र :+ यादें : " शेष -अशेष " ( सम्पादकीय )

आज आपके लिए कई दुर्लभ चित्र लेकर पुन: उपस्थित हूँ --
समय का दरिया अपनी रवानी से बहता हुआ ,
हमारे अपनों को भी ले डूबता है और तब रह जातीं हैं ,
सिर्फ यादें ............यही " शेष -अशेष " है !
***********************************************************************************************
मेरे परिवार के सदस्यों से आप सभी की , पहचान करवाऊंगी - -
मेरे पापा जी पण्डित नरेंद्र शर्मा व श्रीमती सुशीला शर्मा की संतान होना ,
मुझे , एक परम सौभाग्य शाली व्यक्ति होने का सुख देता रहा है -
मुझसे बड़ी बहन वासवी आज नहीं रही उसके पति बकुल जीजाजी
तथा दो पुत्र , बड़ा मौलिक व छोटा शौनक बंबई रहते हैं --
मुझसे छोटी बहन सौ. बांधवी तथा दिलीप जीजा की
बड़ी बिटिया सौ. कुंजम, पति शैलेश तथा पुत्र ची. माहीर व पुत्री विया भी बंबई में हैं
हम में सब से छोटा भाई ची. परितोष अभी अविवाहीत है -
वह, पण्डित नरेंद्र शर्मा " सम्पूर्ण रचनावली " के प्रकाशन का
भागीरथ कार्य, सम्पूर्ण करने में लगा हुआ है --
मैं, दीपक, पुत्री सिंदूर दामाद ब्रायन व नोआ , मेरा पुत्र सोपान तथा पुत्रवधू सौ. मोनिका अमरीका में हैं -
- कई बातें हैं , यादें हैं ,
अम्म्मा का लिखा संस्मरण भी आगे पढ़वाऊंगी.......
चित्र में मुझसे छोटी बहन बांधवी की बड़ी पुत्री
सौभाग्यवती कुंजम, पति शैलेश व पुत्र माहीर के साथ पूजा करते हुए

सन १९७४ दीपक ,
अमरीका एमबी ए की पढाई के लिए जाते हुए
पूज्य अम्मा व पापा जी के चरण स्पर्श करते हुए ,
साथ खडा है हमारा सबसे छोटा भाई परितोष
और श्वेत साडी में ,
दुखी - मैं !!
( तब हमारा विवाह नहीं हुआ था :)
अब ये पुराना श्वेत श्याम चित्र : जिस में मेरी अम्मा भाई परितोष के संग मुस्कुरातीं हुईं

पूज्य पापा जी ,सुश्री लता दीदी तथा भाई परितोष -
शायद दीदी की साल गिरह थी उस शाम -
रात्रि भोज के सुअवसर पर
दीदी और पापा
दीदी सुबह से भूखी थीं - मीरा की सफल रिकॉर्डिंग के बाद , संतुष्ट होकर खाते हुए -
- पापा जी बहुत प्रसन्न हुए थे और अंतिम गीत की रिकॉर्डिंग के सुनते ही रोने लगे थे --
वो मीरा भजन था " : चला वाही देस "
सिर्फ यादें ............
यही " शेष -अशेष " है !

" आज तक तुम फूल , तितली , गीति थी -
वह छोडता हूँ
प्रीती कविकृत प्रेयसी की प्रीती --
वह छोड़ता हूँ "
" बाँध रेशमी डोरीयों में तुम्हें सब दिन
रखूँगी पास,
निशदिन पास, अपने पास "
****************************************************************************
श्री इन्द्रबहादुर सिंह
प्राचार्य
बी. एल. रुइया ( बहु उद्देशीय ) हाई स्कूल
महंत रोड, विले पार्ले ( पूर्व )
बंबई - ४०००५७
गुरुवार्, १३ अप्रेल , १९९५
सम्पादकीय : ~~
सन` १९७४ में , " भारत - भारती परिषद्` " ने पण्डित नरेंद्र शर्मा की षष्ठी पूर्ति के अवसर पर,
" ज्योति - कलश " नामक अभिन्दन - ग्रन्थ प्रकाशित किया था -
स्व. पं. श्रीनाथ द्विवेदी इस ग्रन्थ के प्रणेता थे और सम्पादन आदि का कार्य - भार
उन्होंने स्नेहवश मुझे सौंपा था , जिसका सफल निर्वाह मैं,
अपने वरीष्ठो के मार्ग दर्शन तथा आर्शीवाद के फलस्वरूप ही कर पाया था ..
तब बड़ा उल्लास था मन में !
एक ऋषि - कल्प सरस्वती के वरद पुत्र का षष्ठी पूर्ति समारोह हमारे लिए किसी य़ग्न्य - अनुष्ठान
या महोत्सव से कम नहीं था
वह एक कवि एक मनीषी , एक चिन्तक, एक ऋषि की महायात्रा के कुम्भ का महापर्व था,
जो किसी तीर्थ की तरह पावन एवं गांगेय था
पण्डित नरेंद्र शर्मा, वस्तुत: " ज्योति - कलश " ही तो थे ,
अत: कोटि कोटि ज्योतिर्विन्दुओं में प्रस्फुटीत - विकीर्ण रवि रश्मियाँ एक देवी आभा मंडल का बोध दे गयी थी - बड़ा प्रीतिकर अनुभव था --
पंद्रह वर्ष बाद, ११ फरवरी १९८९ को ज्योति कलश -- " शेष -अशेष " का रूप धारण कर लेगा -
तब कौन जानता था ?
वैकुण्ठ इस ज्योति कलश को इतने शीग्र इस धरा से उठा लेगा
और " शेष -अशेष " की नियति हम पर थोप देगा --
इसकी कल्पना न थी !
ज्योति अशेष हो गयी - ज्योति की यह् प्रकृति है -
" शेष -अशेष " सी " " ज्योति - कलश " का उत्तर विकास है -
वह अमर ज्योति जो रह गयी है " शेष " है और वही ज्योति जो पूर्णता को प्राप्त हो गयी है,
" अशेष " है --
" शेष -अशेष " इसी भाव - भूमि पर भास्वर है -
पण्डित नरेंद्र शर्मा - " ज्योति - कलश "
पण्डित नरेंद्र शर्मा - " " शेष -अशेष "
इस ग्रन्थ को पूर्त्रूप देने का श्रेय प्रिय वासवी को है -
- यह् उसका विशवास और स्नेह है, जो उसने निरापद भाव से
सम्पादन - प्रकाशन का पूरा दायित्त्व मुझे सौंप दिया

- पूर्व जन्म में, मैं, नरेंद्र के परिवार का रहा होऊँ या नहीं,
इस जन्म में तो मैं, उनमें से एक होने जैसा ही अनुभव करता हूँ
शायद इसीलिये पंतजी मुझे पण्डित जी का " केएर ऑफ़ " करके पत्र लिखा करते थे -
कवि त्रिकालदर्शी होता है -
जो भी हो, मैं वासवी और घर के अन्य सदस्यों का ह्रदय से आभारी हूँ ,
जिन्होंने मुझे इतने गहरे स्नेह और अपनत्व से कृतार्थ किया है --
पुस्तक के प्रकाशन में अपरिहार्य कारणों से अप्रत्याशिश विलंब हुआ है -
भरपूर प्रयास एवं श्रम के बावजूद ग्रन्थ को प्रकाश में आने में लगभग दो वर्ष का समय लग गया है
- इस अवधि में कई अपूरणीय क्षतियाँ हुईं हैं --
श्रीमती सुशीला शर्मा, प्रिय वासवी, श्री अमृतलाल नागर जी , श्री शमशेर बहादुर सिंह ,
पण्डित श्रीनाथ द्विवेदी , डाक्टर राही मासूम रज़ा , जैसे कई ,
पण्डित जी के आत्मीय और परिवार के सदस्य इस पुस्तक को नहीं देख पायेंगें -
- इसकी टीस हमारे ह्रदय में सदा बनी रहेगी
इस पुस्तक में इनके स्मृति - लेख , हमें बरबस रुलायेंगें -
- दोनों छोर से , पण्डित शर्मा के सम्बन्ध में अपनी बात कहकर और अब स्वयं मौन होकर --
विधाता का यह् विधान भी " शेष -अशेष " की एक अभिन्न कड़ी ही होगी --

क्रमश :
- लावण्या

44 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

परिवार का परिचय पा कर बहुत अच्छा लगा। लोगों का जाना नियति है जिसे स्वीकार करना ही होता है। बस उन की स्मृतियाँ रह जाती हैं। और... और संतानें अपने माता पिता का पुनर्जन्म ही तो होती हैं।

संगीता पुरी said...

आज आपके लिए कई दुर्लभ चित्र लेकर पुन: उपस्थित हूँ --
समय का दरिया अपनी रवानी से बहता हुआ ,
हमारे अपनों को भी ले डूबता है और तब रह जातीं हैं ,
सिर्फ यादें ............यही " शेष -अशेष " है !
अपने परिवार के सदस्‍यों के साथ ही साथ पुस्‍तक का परिचय देने के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद !!

Ashok Pandey said...

बहुत ही सुंदर आलेख। आपके परिवार से जुड़ी यादों से रूबरू होना अच्‍छा लगा। आभार।

नीरज गोस्वामी said...

अद्भुत पोस्ट...पुराने चित्र और वृतांत पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...भावुक कर देने वाला वर्णन...आदरणीय स्व.पंडित नरेन्द्र शर्मा जी को मेरा सादार नमन...

नीरज

Nirmla Kapila said...

आपका और आपके परिवार का परिचय बहुत अच्छा लगा। जाने वालों को कोई रोक तो नहीं सका मगर कुछ लोग चले जाने के बाद भी हमारे बीच मे ही रहते हैं हमारी पल पल की यादों मे। पुस्तक परिचय के लिये धन्यवाद और जाने वालों को विनम्र श्रधाँजली आभार और शुभकामनायें

Nirmla Kapila said...

आपका और आपके परिवार का परिचय बहुत अच्छा लगा। जाने वालों को कोई रोक तो नहीं सका मगर कुछ लोग चले जाने के बाद भी हमारे बीच मे ही रहते हैं हमारी पल पल की यादों मे। पुस्तक परिचय के लिये धन्यवाद और जाने वालों को विनम्र श्रधाँजली आभार और शुभकामनायें

रश्मि प्रभा... said...

यादों के पन्नों पर जो स्मृतियाँ आपने चित्रित की हैं उनसे गुजरते हुए कभी रोमांच हुआ,कहीं आँखों से श्रधा सुमन बिखरे,कहीं आँखें डबडबा गयीं .....आगे के क्रम की प्रतीक्षा में हूँ.......मेरा सौभाग्य कि मैं आपके करीब आई......

G Vishwanath said...

Lovely pictures.
Rare pictures.
It was great to know more about you.

Thanks for sharing.
Shubhakaamnaae~n
G Vishwanath

पंकज शुक्ल said...

क्या ही संयोग है, कल रात ही मैं अपने मित्र श्रीनिवासन रामचंद्रन के साथ लता दीदी से "क़ासिद" में एक भजन गवाने के प्रयासों पर चर्चा कर रहा था तो पंडित जी खूब याद आए। और, सुबह सुबह दोनों के दुर्लभ चित्रों के दर्शन!
सादर,
पंकज शुक्ल

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही खूबसूरत चित्र और उस पर से यह आपका भावुक करता आलेख. आखें पता नही क्यों नम हो आई.

दिवंगत जनों को हार्दिक नमन.

रामराम.

P.N. Subramanian said...

पूरे परिवार से परिचय करवाने के लिए आभार. हमारी ओर से भी श्रद्धा सुमन अर्पित हैं, उन दिवंगत आत्माओं के
लिए जिनके हम ऋणी हैं,

अभिषेक ओझा said...

ये अच्छी श्रृंखला शुरू की आपने. दुर्लभ चित्र और जानकारी... सहज ही भावुक कर देने वाली श्रृंखला है.

डॉ .अनुराग said...

कैमरे की एक क्लिक कितने यादो के टुकड़े बरसो संजो के रखती है
.....आदरणीय स्व.पंडित नरेन्द्र शर्मा जी को मेरा सादर नमन...

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

बस, इसी तरह लिखती रहें यादों के पिटारे खोल कर। एक एक कतरा हम पूरी श्रद्धा, पूरी तन्मयता से ग्रहण कर रहे हैं।
बहुत धन्यवाद!

अजित वडनेरकर said...

इन पारिवारिक दुर्लभ चित्रों के जरिये अतीत में जाने का मौका मिला साथ ही आपके परिवार को और भी विस्तार से समझा। अगली कड़ी की प्रतीक्षा है।
आभार

Shiv Kumar Mishra said...
This comment has been removed by the author.
Shiv Kumar Mishra said...

बहुत सुन्दर पोस्ट. भावुक कर देने वाली. चित्र और उसके सन्दर्भ कितनी अच्छी छाप छोड़ गए ह्रदय पर. अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा.

पारूल said...

beet gaye din per din beet gaye...

राज भाटिय़ा said...

आप के परिवार के बारे मै जान कर बहुत अच्छा लगा, चित्र भी सुंदर लगे, परिचितो का जाना तो एक नियति है, जिसे हमे भारी मन से स्वीकार ही करना पडता है, लेकिन फ़िर भी वो यादो के रुप मै हमारे बीच ही तो रहते है....हमारे दिलो मै.
धन्यवाद

Udan Tashtari said...

सुन्दर और विशिष्ट चित्र.

श्री इन्द्रबहादुर सिंह जी का संपादकीय लेखन मन को छू गया.

आपके परिवार को आपके माध्यम से जानना बहुत अच्छा लग रहा है, जारी रहिये.

सिर्फ यादें ............यही " शेष -अशेष " है !

लिखना कितना कठिन होगा, जाने कितनी यादें आ घेरती होंगी, समझ सकता हूँ. साधुवाद.

Arvind Mishra said...

इस सचित्र परिचयनामें के लिए शुक्रिया !

पंकज सुबीर said...

कई सारे लोगों को जाना और कई सारी बातों का पता चला । पूज्‍य पंडित जी तो कविताओं में हजारों साल तक जीवित रहेंगें । तुलसीदास की मृत्‍यु कब हुई, गालिब कब गये । ये सब तो रचनाओं के रूप में रहेंगें । बहुत कुछ जानने को मिला । और लता दीदी तथा पंडित जी का फोटो तो आह आनंद आ गया ।

रंजना said...

वाह !! बड़ा ही सुखद लगा आपकी स्मृतिका वीथिका पर आपके संग चलना , भाव सरिता में बहना और दुर्लभ चित्रों को देखना...
Aabhar !!

रंजना said...

पुस्तक हेतु बहुत बहुत बधाई...

pran said...

MAHAKAVI SHRI NARENDRA SHARMA JEE
KE DURLABH CHITRON KO DEKH KAR
NATMASTAK HO GAYAA HOON.PRASANNTA
KEE BAAT HAI KI AAPKA ANUJ Pt.JEE
KE SAMAGR SAHITYA KO EKATR KAR USE
CHHAPWANE MEIN JUTAA HUA HAI.AESE
SUPUTR KO LAKHON HEE ASHIRWAD.

एकलव्य said...

दुर्लभ फोटो और बढ़िया स्मरणीय संस्मरण प्रस्तुति के लिए आभार.

"अर्श" said...

दीदी साहब को प्रणाम,
आज की पोस्ट वाकई नायाब है सहेजने लायक है पूज्य पंडित जी लता दीदी और परिवार की सारी तस्वीरें संजोने लायक है ... आभार आपका...


अर्श

सुशील कुमार said...

आपने दूर्लभ चित्रों के माध्यम से हमारा मन अपने कुटुम्ब-परिवार के प्रति अप्रतिम श्रद्धा-भाव से भर दिया है। ये स्मृति-चित्र ही ज़िन्दगी के वे धरोहर हैं जहाँ जीवन की मूल्यवत्ता और प्रवाह संजीदगी से विद्यमान रहते हैं जो हमारे मानस-पटल पर अंकित होकर हमें शेष जीवन के लिये और उर्जावान और जीने योग्य बनाते हैं।

Aflatoon said...

क्या ख़ूबसूरत तार्रुफ़ कराया । हार्दिक आभार ।

vikram7 said...

परिवार के सदस्‍यों के साथ पुस्‍तक का परिचय,स्व.पंडित नरेन्द्र शर्मा जी व लता जी के, दुर्लभ चित्र के लिये धन्यवाद

महावीर said...

यादों के संग्राहलय में यह अनूठे और दुर्लभ चित्रों को देख कर बड़ा सुखद लगा और साथ ही आँखे नम हो गयीं. श्री इन्द्रबहादुर सिंह जी का सम्पादकीय लेखन तो अंतर को छू गया. बहुत ही सारगर्भित लेख है.
आदरणीय स्व: श्री नरेंद्र शर्मा जी को सादर नमन!
महावीर शर्मा

Next Generation said...

behad khubsurat samgri de hai aapne. sargarbhit aur man ko chune vali. aapko dero badhai.
www.aakhar.org

yunus said...

शानदार । पंडित जी और उनके परिवार को देखकर यूं लगा जैसे हम भी उस ज़माने में पहुंच गए हों ।

अनिल कान्त : said...

पुराने चित्र और वृतांत पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...भावुक कर देने वाला वर्णन

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

मार्मिक!

Madhurima said...

Lavanyaji, wonderful post:).
Aap ke parivaar ke sabhi sadasya bahot hi prabhavi vyaktimatv ke aur tejasvi lagte hai. Aur kyon na honge? Gyaan ka tej hi kuch alag hota hai. Aapke parivaar ke divangat vyaktiyon ko meri namra shradhanjali. Aur baki sabko pranaam. Chote bachchon ko dher saara pyaar.
Take care...

अल्पना वर्मा said...

मन को एक अद्भुत सी तृप्ति होती है पुराने चित्रों से पुराने बीते पलों को याद करने मात्र से..ये सब खजाने ही तो हैं.
मन भावों से भर उठा.आप को आप के परिवार को जानने का मौका मिला.

आप की Didi वासवी जी को मेरी श्रधांजलि. गुजरता वक़्त भी कितना कुछ साथ ले जाता है..

*****''शेष -अशेष " ग्रन्थ भी जल्दी पूर्ण हो ऐसी शुभकामनायें.

विनय ‘नज़र’ said...

पलों को सहेजना अच्छा अनुभव था!

शरद कोकास said...

पंडित नरेन्द्र शर्मा जी से हुई मुलाकात मुझे याद है । मेरा सादर नमन । -शरद कोकास ,कवि/कथाकार, दुर्ग,छ.ग.

शरद कोकास said...

पंडित नरेन्द्र शर्मा जी से दुर्ग में मुलाकात हुई थी , उन्हे मेरा सादर नमन । शरद कोकास कवि/कथाकार ,दुर्ग ,छ.ग.

शरद कोकास said...

पंडित नरेन्द्र शर्मा जी से दुर्ग में मुलाकात हुई थी , उन्हे मेरा सादर नमन । शरद कोकास कवि/कथाकार ,दुर्ग ,छ.ग.

मीनाक्षी said...

देरी से आने के लिए क्षमा.. आपके पापा को सादर नमन..बचपन से जिनकी लेखनी की कायल थी ...आज आपके द्वारा उनके बारे मे जानना सुखद अनुभव है... महान आत्मा और शेष परिवार जन की यादों को बाँटने के लिए शुक्रिया...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पंडित जी को नमन और आपको इतने सुन्दर आलेख के लिए धन्यवाद. सबके बारे में जानकार अच्छा लगा. आशा है शेष-अशेष के बारे में आप आगे भी बताती रहेंगी. क्या १९७४ में सबने समझा था कि चित्र में आप ऐसी हतप्रभ क्यों लग रही हैं?

कविता said...

Shaayad inhe hi kahte hain swarnim yaaden.
Think Scientific Act Scientific