Thursday, May 30, 2013

वीकेंड डीनर पार्टी / सप्ताहांत में शाम की दावत


ॐ 
' अरी सुनती हो ? वीकेन्ड ( सप्ताहांत )  मेमोरियल दिवस आ रहा है। ४ दिन की छुट्टी है। ' 
 ६०  वर्षीया सरिता जी ने अपनी बेटी अंजू से कुछ उत्साह भरे स्वर में सूचित करते हुए कहा तो अंजू अपने बालों पे ब्रश फेरते हुए मुडी ! ड्रेसिंग टेबल के बड़े अंडे के आकार के विशाल शीशे के सामने  जो उसका ड्रेसिंग टेबल था वहां उस शीशे के सामने रखे छोटे से वेलवेट से बने गद्दीदार  छोटे मुड्ढेनुमा सीट पर बैठे हुए वह पीछे की ओर घूम गयी और मुस्कुराई ! 
' अरे वाह माँ ! आपको तो अब सब याद  रहता है !  ' 
 फिर अंजू आगे बोली ,
 ' हाँ माँ ..सभी की छुट्टी है और हमारे यहाँ पार्टी भी तो है ! करीब ६० लोगों का खाना और दावत ! 
आप की सहेली  दिव्या जी पटेल भी आ रहीं हैं। आपका मन लगेगा। ' अंजू ने कहा। 
' हाँ , दिव्या बेन से मिल कर पूरे गुजराती समाज की बातें सुनतीं रहती हूँ। कितनी तरक्की कर गये हैं ये लोग सच! 
बड़े मेहनती होते  हैं पटेल कौम के लोग  ! दिव्या बेन और धनजी भाई जब यहाँ आये थे तब उन्होंने कड़ी मेहनत  की थी। मोटेल का सारा काम किया करते थे वे लोग ! सारे  कमरे तैयार करना , बाथरूम साफ़ करना , सारी चद्दरों की तौलियों और तकीये के गिलाफों को धोना फिर हर आनेवाले किरायेदार के लिए नये सिरे से कमरा तैयार करना कोइ मजाक नहीं ! बाबा रे ! कड़ी मेहनत है !  धनजी भाई दिन रात मोटेल की ऑफिस  डेस्क पर बैठे हुए  मिलते। वहीं  पे सारा हिसाब देखते थे। ये सारा काम उन दोनों ने मिलकर किया और साथ, साथ बच्चे भी बड़े किये। बेटा सुधीर का ब्याह गुजरात जाकर किया और बेटी कुमुद को इसी शहर के भाईलाल भाई पटेल के घर ब्याह कर  बिदा किया ! सच पटेलों की कौम में सब एक दुसरे की बहुत मदद करते हैं। हाँ , औरों की मदद भी करते ही हैं।'   सरिता जी ने आगे जोड़ते हुए कहा,  ' पता है ,  दिव्या जी एक बार बतला रहीं थीं कि ,  उनके पुरखे गुजरात के खेडा जिला के नडीयाद शहर से हैं।  दिव्या बेन '  कितना मीठा ' जय श्री कृष्ण ' कहतीं हैं, हैं  ना !  
' सरिता जी उत्साह से  भर कर आगे कहने लगीं , 
'  वे , जब भारत में थीं तब रोज ही डाकोर के कृष्ण मंदिर में दर्शन करने  जाया करतीं थीं ! बड़ी कृष्ण -  भक्त  हैं दिव्या बेन। पता है अंजू  , डाकोर के कृष्ण मंदिर  में  किशन महाराज  के ' रणछोड राय स्वरूप ' की पूजा होती है। बड़ा पुराना मंदिर है वहां डाकोर में! ' 
इतना कहकर  सरिता जी, अपनी हम उम्र सहेली  दिव्या जी की बतलाई  बातों में खो गईं। 
फिर उठ कर खिड़की के पास जा खडी हो गईं। फिर अचानक बोलीं , 
' अरी अंजू , आज तुम्हारा घास काटनेवाला आया ही नहीं ! तुमने कहा था न , कि वह दोपहर को आयेगा। मैं राह देखती रही ... पर आज तो कोइ आया ही नही। ' 
                 अमरीकी घरों के आसपास की हरियाली बसंत आगमन के साथ ही चारों दिशाओं में हरीतिमा बिखेरती फ़ैल रही थी। हरेक सुन्दर सजीले घर के आसपास की जमीन में विशाल घास के लोन बिछे हुए थे। एक आधुनिक फैले हुए , २000  एकड़ के रेसीडनशियल सब -डिवीजन में,  अंजू और सत्येन्द्र श्रीवास्तव का घर भी था। 
सरिता जी के  दामाद , सत्येन पेशे से इंजीनीयर थे और वे दामाद से अधिक पुत्र की तरह व्यवहार किया करते थे। अंजू सोफ्टवेर डीज़ाईनार थी। दोनों मिलकर अच्छी कमाई कर लेते थे। खर्च करने में भी दोनों साथ मिलकर निर्णय लिया करते थे। उन्होंने घर के आस पास उगी हुई घास काटने का कोंट्रेक, बाहर एक कर्मचारी को दे रखा था।
यूं भी भारतीय परिवार , अमरीकी समाज के अन्य नागरिकों  मुकाबले में , कम ही शारीरिक परिश्रम वाले कार्य किया करते हैं। ये बात भी हरेक भारतीय को, अमरीकी समाज में लम्बे समय से रहने के बाद पता लग ही जाया करती है।
      घर साफ़ करने के लिए भी हर १५ दिन में,  ठीक सोमवार को मुस्कुराती हुई कन्या  ' एरिका '  और  उसका दोस्त ' यूरी '  ,  एकाध नई लडकी को काम में मदद के लिए , लेकर ,  मुस्कुराते हुए  श्रीवास्तव परिवार के सुन्दर और विशाल घर पर आ पहुँचते थे। वे दोनों ईस्ट यूरोप से यहाँ अमरीका आये थे और अमरीका में सफाई का काम किया करते थे। वे लोग कुछ साल पुरानी गाडी में ही यहाँ तक आया करते। दोनों ने पढाई,  शायद स्कुल की ११ वीं कक्षा तक ही पूरी की थी। यूरी और एरिका का काम था बाथरूम की सफाई करना। पूरे घर के कालीनों पर वेक्यूम क्लीनर से नही के बराबर का - कचरा उठाना और हल्की सी धुल झटकना - डस्टिंग करना - यह भी इनके जिम्मे था। घर इतना बड़ा था कि सफाई करते ४ घंटे का समय तो अवश्य लग ही जाता था। जिसके उन्हें हर घंटे के हिसाब से डालर २५ मिलते थे। और हाँ, उस पे टेक्स भी तो नहीं देना पड़ता था। अन्यथा हर अमरीकी नागरिक खुशी से अपने हिस्से आया टेक्स भर ही देता था। चूँकि टेक्स का पैसा सरकार भी रास्तों को सुन्दर और स्वच्छ रखने से लेकर, स्कुल ,  आप जहां रहते हों उसी इलाके के स्कुल के लिए और अच्छे अस्पताल जैसी कई सुविधा  और अपने नागरिकों की सेवा के लिए खूब इस्तेमाल किया करती थी। हर शहर के साफ़ , सुन्दर और सरल रास्तों के पास, बाग़ और खेल के मैदानों के पास लिखा रहता था ' आपका टेक्स आपके लिए कार्यरत है '  
              यहाँ अमरीका में अक्सर सारे घर बंद रहते। गर्मियों में भी और सर्दीयों भी !  बड़े घरों में सेन्ट्रल एयर कंडीश्नींग माने पूरा घर वातानुकूलित होने से ,  हर घर की खिडकियों को अक्सर बंद ही रखा जाता। घर में रहनेवाले , गराज में खडीं लम्बी आरामदेह , वातानुकूलित गाडीयों पे सवार हो,  काम के लिए सुबह सवेरे निकल लेते और शाम ६ बजे तक लौट आते। गेरेज में अक्सर हर सुखी भारतीय परिवार के घर पर दुसरा फ्रीज भी रखा मिल जाता। ग्रोसरी , खाने पीने की चीजें यहीं लाकर रख दीं जातीं। हाथ पोंछने के कागज़ के रूमालों का पुलिंदा , बाथ रूम टिश्यु के बड़े पैकेज, लौंड्री डिटर्जन्ट के लिए प्रयुक्त  साबुन से भरे प्लास्टिक के बड़े बड़े थैले और दूध भी सुफेद प्लास्टिक की बड़ी २ गेलन की शीशी नुमा बरनी दूध की अतिरिक्त प्लास्टिक की सुफेद शीशी  सी  बाहर के इस दुसरे फ्रीज में जमा रहतीं।   
           अक्सर दिन के समय में , अंजू के घर पर सरिता जी और उनके ४३ साल से  विवाहीत श्रीमान देवेश्वर दयाल जी ही रह जाते। छोटा समीर ३ साल का होने आ रहा था। वो भी इनके पास ही दिनभर रहता। वे बिटिया और दामाद के पास, हर साल भारत से आया करते और कुछ माह बिताते। अंजू, सरिता जी और अपने पापा के आगमन से निश्चिंत हो , समीर को २ महीने तक बड़ा करने के बाद फिर अपनी जॉब पर जाने लगी थी। उसी दो महीने तक सत्येन्द्र के पिता जी और माता जी भी भारत से अपने धेवते को लाड दुलार करने आ पहुंचे थे। 
उस समय घर भरा पूरा लगता ! दोनों समधी जोड़ों ने समीर के आगमन के समय,  सराहा दिया था  और उनमें आपस में शिष्टाचार पूर्ण  सौहार्द्र और अनौपचारिकता,  अमरीका में एक साथ , इस तरह रहने से ही पनपी थी। 
अमरीका में क्या बेटी और क्या दामाद का घर ! ये तो परदेस ठहरा !
 यहाँ हर भारतीय परिवार अपने परिवेश और अपने आपसी संबंधों के सहारे ही नव निर्माण की कठिन परीक्षा पास कर पाता है। आपस में भारतीय मित्र , पूछते की बच्चे के जन्म के समय कौन आ रहा है भारत से ?
 अगर उत्तर मिलता कि , किसी की माँ या सास ! तो खुशी होती अन्यथा हम उमर सहेलियाँ भारतीय और अमरीकन और पडौस के  लोग भी अगर मित्रता  होती तो सहायता करते।
 अंजू और सत्येन उनके अमरीकी और भारतीय तथा अन्य सभी मित्रों के लिए , एक उदाहरण से थे। दोनों तरफ के माँ बाबूजी और अम्मा पिताजी यहाँ तक आ कर उन्हें सहायता क रहे थे ये सभी के लिए आनंद का विषय था। 

  अंजू और सत्येन  की ७ साल की बड़ी बिटिया '  मिली '  और  ३ साल के ' समीर ' को सरिता जी ने ही तो बड़े जतन से , लाड प्यार से पाला पोसा था। दादी जी भी खूब लाड करतीं रहीं परन्तु ३ माह पूरे होने से पहले वे बड़े दादा जी के संग भारत चली गईं थीं। नाना जी और नानी जी को आग्रह पूर्वक रोक लिया गया था।  आज इतने बड़े हुए अपने नातिनों को देख दोनों फूले नहीं समाते थे। 
 मिली बिटिया को स्कुल ले जाने के लिए ,  पीले रंग की  लम्बी सी स्कूल बस सुबह सुबह आ जाया करती थी उसे बस पर सरिता जी ही चढ़ा कर लौटतीं तब तक देवेश्वर जी सुबह की चाय पीकर , लम्बे बारामदे में घूम रहे होते  और अब तो छोटा समीर भी बस अब प्री - स्कुल में दाखिला लेने ही वाला था। 
     घास काटने वाले के ना आने की बात माँ से सुनकर  , अंजू  मुस्कुराई  और कहा 
' माँ , तुम हो यहाँ तो हमे कितनी सुविधा है। घर की हर बात पे तुम्हारी नजर रहती है! चिंता न करो ! वो आ जाएगा ..आज नहीं तो कल ..हाँ मैं, सत्येन से कहूँगी वे टेक्स मेसेज कर लेंगें और पूछ लेंगें। ' 
         घास काटने के लिए अक्सर मेक्सिकन आदमी आया करता था जो अपने टेम्पो के पीछे मशीन लाद  कर आता। काम करना और हरेक काम करने वालों का उचित आदर करना भी  समाज के शिष्टाचार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ हरेक व्यक्ति अपना निजी काम स्वयं करता है। अगर आप सक्षम हैं तब किसी और से भी अगर काम करवाते हैं तब उसे भी बड़े  सम्मान से ही देखा जाता है। 
 अब अंजू ने माँ से पूछा  ' चलें माँ ? ' 
और ओफीस के कपड़े उतार  के गुलाबी  टी शर्ट बदल कर, नीचे जाने के लिए वह  उठ खडी हुई। फिर सीढीयों के पास रूक कर पूछा 
' चाय बनाऊँ माँ  ? अदरख और इलायची वाली ? पापा से भी पूछ लेती हूँ। ' 
 ' हाँ ' ,  सरिता जी ने खिड़की के सामने खड़े हुए  ही संक्षिप्त सा जवाब दिया। 
 कुछ देर पश्चात , गर्म चाय के मग लेकर तीनों ड्राईंग रूम के आरामदेह सोफों पे बैठ गये। 
सरिता जी ने पूछ लिया 'अंजू  बेटा , कुछ तैयारी करनी है क्या ? बता दे ...' 
' ऊँह  नही माँ ...खाना तो आ ही रहा है ..इंडिया स्टार रेस्तोरां  से ..
वही लोग आकर सजा देंगें। समोसा चाट भी बनायेंगें मानविंदर जी ..
वही हैं आज शाम की दावत के केटरर ..वे भी  रुकेंगें ..गरम खाना खिलायेंगे हम सब को ! 
कुल्फी और उनका फेमस , गज्जरेला ! गाजर हलवा भी फ्रेश बना रहे हैं। 
मैने खास रिक्वेस्ट की है तो  मेंगो कुल्फी भी बनायेंगें आज शाम की दावत के लिए ! '
         अंजू अब  धडा धड शाम की दावत के विभिन्न आईटम का मेन्यू बतलाने लगी। आगे बोली , 
' हाँ एपीटाइजर के लिए , टमाटर साल्सा, कोर्न  चिप्स और गर्म चीज़ की मशीन मैं शाम को ऑन कर दूंगी। 
सुपर मार्केट से कटे फलों की फ़्रूट - ट्रे भी सत्येन ला रहे हैं। '
            फिर मुस्कुराकर जोड़ा ' एक सरप्राईज़ भी है ! मेरी सहेली आशी और सुचेत चड्ढा की २५ वीं सिल्वर जुबली है।  उनकी मैरेज एनीवर्सरी भी है ना इसी सन्डे को ! तो उनके लिए डबल चोकलेट  केक भी लायेंगे सत्येन ! ' अंजू ने अपने माता पिता को आगाह करते हुए बतला दिया। 
  ' तब तो समझो सारा काम हो ही गया '  सरिता जी ने आश्वस्त हो, मुस्कुराते हुए कहा। 
 ' माँ आज की शाम के लिए एक्स्ट्रा बेबी सीटर भी आ रहीं हैं। जूली है ना हमारे पडौसवाली लडकी वो तो आ ही गयी है। खेल रहे हैं तीनों ' मिली '  के कमरे में ' अंजू ने बतलाया। 
          मिली का अपना अलग कमरा था। जिसे ' टिंकर बेल ' नामक परी की साज सज्जा से संवारा गया था और वह कमरा हल्के गुलाबी रंग का था। नन्हे समीर के कमरे में  ' वीनी ध पू ' की सजावट थी। हालांकि बच्चे सोते तो अपने कमरों में थे पर कई बार सुबह उठ कर,  या तो सरिता जी या अंजू के कमरे में आ जाया करते थे। सुबह घर के सारे सदस्य काम के लिए निकलने की तैयारी करने में बड़े और मिली को, स्कुल के लिए तैयार किया जाता। 
अंजू सुबह ५ बजे उठ जाया करती थी और दिन भर खूब काम किया करती थी। 
            अंजू और सत्येन्द्र का घर काफी बड़ा था। नीचे लीवींग रूम या परिवार के लिए एक साथ बैठ कर टीवी देखने का कमरा अलग, फॉर्मल ड्राईंग रूम अलग, बड़ा सा कीचन घर के मध्य भाग में और उसी के बाहर दो सीढियां थी जो  ऊपर ४ बड़े शयन कक्ष थे वहां पहुंचतीं थीं । घुमावदार सीढियां ऊपर तक आतीं और एक के बाद एक कमरे जहां एकदम आखिर वाला कमरा सरिता जी और देवेश्वर जी के लिए सुरक्षित था। 
जब वे भारत लौट जाते तब भी उनकी सुविधा लिए सजाई हरेक चीज़ वैसी ही रखी रहतीं।  
कोइ किसी भी चीज को छेड़ता न था। उनके लिए एक छोटा टीवी भी था कमरे में ।  
२ दराज वाली  मेज  बिस्तर के दोनों तरफ  सटी  हुईं थीं।  जिस पे लेम्प और टेलीफोन रखे हुए थे।  
घड़ी , फूलदानी और शीशे से सजी कपड़ों के रखने की ड्रेसर पलंग के सामने थी  और कमरे से बाहर निकलते ही गुसलखाना भी था !  
        अंजू और सत्येन्द्र का सोने का कमरा सबसे बड़ा था और वहां बाथरूम कमरे के भीतर ही था और वोक इन क्लोजेट  माने कपड़ों के लिए  जगह थी जो बहोत  विशाल थी। नीचे तहखाना भी पूरा कार्पेट  से सजा , वहां भी सोने के कमरे, बाथरूम , पार्टी के लिए लंबा  कमरा और बच्चों की फ़ौज बाहर शीत ऋतु  के प्रकोप से बचे हुए भीतर खेल सके इतनी बड़ी जगह थी। असंख्य  खिलौने और एक बड़ा टीवी यहाँ बेज्मेन्ट में भी था।       अत्यंत  आरामदेह और विशाल  घर था !  शायद ८ हजार स्क्वेर फुट में फैला हुआ था ऐसा इक बार अंजू ने ही बातों बातों में बतलाया था। सारे कमरे, आराम और सुख प्रधान साज सज्जा से लैस थे !   
     अंजू ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा ,
' माँ  जूली की और २ सहेलियाँ भी शाम ६ बजे आ जायेंगीं। जितने बच्चे आयेंगें ना मेहमानों के संग , उन के साथ ये लोग रहेंगें तो बड़े भी एन्जॉय कर पायेंगें।  ' अंजू ने आगे बतलाया। 
        अमरीका में बेबी सीटींग का काम अक्सर आसपास रहनेवाली बड़ी लडकियाँ ही किया करतीं हैं। उसी तरह  मिली और समीर की बेबी सीटर ,  १४  वर्षीया सुनहरे बालोंवाली , नीली  आसमानी आंखोंवाली ' जूली '  का घर भी उन के घर से,  तीसरे घर वाला, नजदीक ही था। जूली के पिता उच्च पद पर आसीन पुलिस अधिकारी थे और कई बार पुलिस को मिलनेवाली  ख़ास गाडी  जो काली और पीली धारियोंवाली होतीं हैं , उनके घर के ड्राईव - वे पर खडी हुई  देखने को मिल जाया करती थी। जूली के पिता के कमरबंद पर लटकी हुई बन्दूक भी सरिता जी ने  कई बार देखी थी। 
           सरिता जी के पतिदेव श्रीमान देवेश्वर जी ने चाय समाप्त करते हुए अपना मग उठा लिया और रसोई के सिंक में पानी छोड़ कर साफ़ करके , मग को ,  सीधे डीश वोशर में सम्हाल के रख दिया। उन्हें भी यहाँ की आदत हो चुकी थी। अमरीका में लोग अपने अपने बर्तन इस्तेमाल करते और इसी तरह डिश वोशीन्ग मशीन में लगा देते ! जब मशीन भर जाती तब मशीन में इस्तेमाल होनेवाली ख़ास साबुन की टिकिया या लिक्वीड प्रवाही साबुन को मशीन के बाहरी दरवाजे में बने खाने में भरने के बाद , मशीन  बंद किया जाता और मशीन की सेटिंग में नार्मल वोश साईकल लगाकर सारे बर्तन एक साथ धुल जाया करते। 
         यहाँ ऐसे छोटे बड़े घर के कार्य मशीन ही करतीं हैं। कपड़े धोने का साबुन अलग, बर्तनों का अलग ! नहाने के के लिए नाना प्रकार के द्रव्य !  प्रवाही, जेल, साबुन और टिकिया, स्नान के बाद ठण्ड में त्वचा मुलायम रखने का लोशन भीअलग। हरेक उत्पाद  में सुगंध! बाथरूम की शीशे की नन्ही बेसीन के पास लगी अलमारी में सरिता जी का नारियल का पेरेशूट ब्रांड का तेल भी रखा हुआ था और दन्त मंजन भी ! 
             घर के हर कमरे में सुगंध बिखेरने के लिए सुगंधी मोम के गट्टे के आकार की सेंटेड केंडल भी शाम को अंजू जला दिया करती थी। सत्येन को चन्दन की अगरबत्तियां जलाना पसंद था। 
        एक बड़े से ॐ के सामने , हर शाम चन्दनी सुगंध का धुंआ उठता और सत्येन को अपना बचपन याद आ जाता। अपने जीवन में कितना कठिन संघर्ष किया था सत्येन्द्र ने और उसके  बाबूजी ज्ञानेंद्र श्रीवास्तव और अम्मा सुजाता जी ने भी बड़े जतन से गृहस्थ जीवन बिताते हुए  अपने सारे उत्तर दायित्त्व सफलता पूर्वक निभाये थे।
        यमुना किनारे बसे , पश्चिम उत्तर प्रदेशी इलाके के इटावा में रूई की खेती बाडी बंद हुई तो क्या हुआ पर बाबूजी के घी का व्यापार उनकी सूझ बुझ से चल निकला था। सत्येन्द्र श्रीवास्तव पढाई में सदा अव्वल ही आये और अपना पूरा ध्यान पढाई पे रखते हुए आई . आई . टी .  कानपुर से इन्जीन्यरींग अच्छे नम्बरों से  पास करने के बाद अपना भाग्य आजमाने सत्येन्द्र,  बाबूजी और अम्मा के पैर छूकर , उत्तर अमरीका चले  आये थे। 
                    अमरीका के मध्य में आयोवा प्रांत में  आकर सत्येन्द्र स्थायी हो गये। आयोवा भी इटावा की तरह  खेती प्रधान प्रांत है। आयोवा की राजधानी  का उच्चारण अंग्रेज़ी में डी मोइन '- किया जाता है परन्तु उसे  ' Des - moins ' लिखा जाता है। वहीं विश्व शान्ति में नोबल पुरस्कार प्राप्त नार्मन बोर्लो द्वारा स्थापित विश्व खाध्य पारितोषिक संस्था भी है। नार्मन बार्लो हरित क्रान्ति के जनक कहलाते हैं। संस्था द्वारा ,  डालर एक हजार के खर्च से तैयार होनेवाली ट्रोफी , जिसे  शिल्पकार डेरीक उह्ल्मेन ने तैयार की थी वह हर वर्ष पारितोषिक स्वरूप दी जाती  थी।  विश्व का गोला ,  जिस पर एक पत्ते के रूप में खाद्यान्न बना हुआ था ,  जिससे विश्व भर के प्राणीयों को पोषण मिलता है यही इस इनाम स्वरूप दिए जानेवाली ट्रोफी का रूप था जिसे बड़े जतन से  गढा गया था। 
सत्येन्द्र श्रीवास्तव वर्ल्ड फ़ूड प्राईज़ संस्था में वरिष्ठ कर्मचारी थे। तगड़ा वेतन प्राप्त करनेवाले  इस संस्था के वे  सीनीयर कार्यकर्ता थे। श्रीमती अंजू सत्येन्द्र  श्रीवास्तव आयोवा प्रांतीय सरकारी कर वसूली कार्यालय के कम्प्युटर विभाग में कार्यरत थीं। भारतीय इसी तरह अमरीका के हर प्रांत में , विशिष्ट संस्थाओं में कार्यरत हैं और सफल हैं। 
आयोवा प्रांत : अमरीका के हरेक प्रांत का अपना ध्वज है। इस प्रदेश को ' होक आय स्टेट ' कहते हैं। आयोवा प्रांत का प्रिय फूल जंगली गुलाब है। गोल्ड फिंच या हिन्दी में कहें तो सोने का सिक्का नामक पंछी ,  इस आयोवा स्टेट का चहेता पंछी है। ' ओक ' का पेड़  यहाँ का चयनित हुआ प्रांत का प्रिय वृक्ष है। 
सत्येन्द्र और अंजू अब कई वर्षों से यहीं बस गये हैं  और उनकी संतान अब इसी प्रांत में जन्मीं,  यहीं का नागरिक अधिकार पा कर , पल बढ़ रही है। अब तो कई सारे भारतीय परिवार  आयोवा प्रांत में आ कर बस गये थे और आबाद थे। अब अन्य प्रान्तों की तरह ,  भारतीय मंदिर, गुरुद्वारा और  रेस्तोरां सभी  आयोवा में भी स्थापित हो चुके थे। सरिता जी मंदिर भी जातीं और किसी रविवार वे , गुरूद्वारे भी चली जातीं। 
      वहीं पर आगंतुक प्रवासी भारतीय युवा पीढी के  माता पिताओं से भी जो अपने अपने बाल बच्चों से मिलने आये हुए होते थे , वे , कहीं न कहीं, भारतीय दुकानों में खरीदी करते वक्त या त्यौहार के दिन या  विविध उत्सव पर मिल ही  जाया करतीं थीं।  अब यहाँ रहनेवाले भारतीयों के लिए , भारत से दूर अमरीकी धरा पर , एक छोटा भारत का कोना आबाद था। कार्य क्षेत्र में अमरीका का वातावरण तो होता ही था परन्तु  घर के  रहन सहन में , अब भी भारतीयता का पुट होते हुए , आधुनिक अमरीकी सुख सुविधा और रहन सहन से ओत प्रोत भारतीय परिवारों में भी बदलाव आ ही गया था।  
     अमरीकी समाज की तरह हर उत्सव, शादी ब्याह, नाम करण , मुंडन , वैवाहिक वर्ष गाँठ , जन्म दिन ,  इत्यादी सभी मनाने का रिवाज अब सप्ताहांत माने वीकेंड में यानि ,  शुक्र , शनि  रवि वाले दिनों में ही अक्सर हुआ करता। इसी उत्सव में जुड़ गये थे बच्चों के ११ वीं पास करने के ग्रेज्युएशन दिवस का समारोह या १६ वर्ष पूरे करने की स्वीट सीकस्टीन की पार्टी भी ! इन सारे दिनों में अपना ख़ास स्थान बनानेवालीं  केन्द्रीय छुट्टियाँ या  फेडरल होलीडे वाली ४ दिन की लम्बी छुट्टियां साल में बड़े पहले से ही विविध यात्रा और प्रवास या पारिवारिक समारोह का रूप ले लेतीं थीं। असल में  अमरीका में राष्ट्रीय छुट्टियां बहोत कम होतीं हैं। 
                सब से ख़ास होती है,  बड़े दिन की या नाताल  या क्रिसमस की दीसंबर २५ की छुट्टी ! जिसका हरेक अमरीकी नागरिक को बेसब्री से इंतज़ार रहता है। यह पारिवारिक, धार्मिक और सामाजिक तीनों का सम्मिश्रित त्यौहार है। परिवार के हर सदस्य के लिए तोहफे देने का और  लेने का इस दिन  रिवाज है। फिर  साथ मिलजुल कर भोजन करना।  खाना और  चर्च में पूजा और पादरी का भाषण (  जिसे मॉस कहते हैं ) सुनने जाना,  ये भी  इस नाताल के बड़े दिन अक्सर किया जाता है। उसके बाद के ४ दिन भी ऑफिस या दोस्तों के घरों पर दावतों में या प्रवास में बिताये जाते हैं तब तक तो दीसंबर का आख़िरी दिन पूरा होने को और नये साल के दिन का आगमन हो जाता है। 
      जनवरी १ नये साल की छुट्टी पूरे अमरीका के लिए साल भर की कड़ी मेहनत  के बाद आराम करने और मौज मस्ती से भरी छुट्टी बिताने का दिन होता है। टीवी पे खेल देखना, रोज़ डे परेड का सीधा प्रसारण और खूब वाईन , बीयर और व्हीस्की , वोडका , रम जैसे ड्रींक के साथ अमरीकी खाध्य पदार्थ हेमबर्गर, पीत्ज़ा , चिप्स वगैरह का खाना - ये सब दिन भर चलता  रहता है।  
         साल के मध्य में , मई २७,  मेमोरियल दिवस की छुट्टी आती है जो उत्तर अमरीका में ग्रीष्म ऋतु के आगमन का प्रतीक है। अमरीका में , तारीख लिखते वक्त पहले महीना - फिर दिन और अंत में साल लिखने का रिवाज़ है। 
जब कि , भारत में पहले दिन, बीच में महीना और अंत में साल  लिखते हैं। 
यहाँ  जुलाई ४ अमरीकी स्वतंत्रता दिवस कहलाता है।
 सितम्बर २,  लेबर डे , फोल माने पतझड़ ऋतु के आरम्भ की धोषणा करता है। 
 फिर वेटरन्स डे ९ सितम्बर को पुराने सैनिकों की सेवाओं के प्रति आभार प्रदर्शन का राष्ट्रीय त्यौहार है और द्वीतीय विश्व युध्ध , वियतनाम और ईराक की लड़ाईयों में जिन योध्धाओ ने सेवाएं प्रदान कीं हैं उनके लिए  समर्पित दिन का त्यौहार है।  
उसके बाद आता है नवम्बर २८ का थेंक्स गीवींग डे या  कृतज्ञता ज्ञापन दिवस ! बस यही मुख्य केन्द्रीय सरकार मान्य त्यौहार  हैं जिसे अमरीकी सरकार मनाती है। अब इस श्रृंखला में अश्वेत लोगों के मसीहा माननीय  मार्टिन ल्युथर किंग दिवस भी कहीं कहीं बेंक होलीडे की तरह मनाया जाने लगा है।         
            आज अंजू और सत्येन्द्र के यहाँ मेमोरियल डे के लम्बे सप्ताहांत वाले वीकेंड में शनिवार को शाम की दावत का आयोजन हुआ है। भारतीय परिवार के छोटे और कुछ  बड़े बच्चों समेत कुल  ६० लोग  शनिवार की संध्या की दावत के लिए अंजू के घर पर आ पहुंचे हैं । अमरीकी समाज में अपने अपने कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त कर उसी के अनुरूप नई , लम्बी चमचमाती गाड़ियां खरीद कर अंजू और सत्येन्द्र के मित्र वर्ग के लोग ,  अंजू के घर के सामने , गोलाकार रास्ते के सामने जिसे ' कल डी सेक '  कहते हैं वहां अपनी अपनी शानदार गाड़ियां पार्क करते हुए 
' नमस्ते ' ,'  पैरी पैणा जी ' , कहते हुए,  एक के बाद एक आ रहे हैं।  
 मालिक और मालकिन अब गाड़ियां  पार्क करने के बाद, घर के  भीतर जा चुके थे। सभी के हाथों में फूलों के पुष्प गुच्छ या रंगबिरंगी गिफ्ट बैग भी हैं जो वे अंजू और सत्येन्द्र के परिवार के लिए स्नेह के प्रतीक स्वरूप लाये हैं।  
          सरिता जी और देवेश्वर जी घर के पिछवाड़े में लोन पर रखी, कुर्सियों पे विराजित थे। कुछ उन्हीं की उम्र के भी वहां बैठे फलों का रस गिलास को पेपर नेपकिन से थामे चुस्की लेते पी रहे थे। युवा पीढी की युवतियां अंजू के साथ लगी हुईं थीं और खाने पीने की चीजों को, दुसरे अतिथियों तक पहुंचाने का काम कर रहीं थीं। बच्चा पार्टी बेसमेन्ट माने घर के तहखाने में, बिछे कालीन जो सुघड़ व सुन्दर है वहां  एक  हिस्से में  खेल रहे हैं। मिली और   और जूली और उसकी २ साथिन बेबी सीटर लड़कियाँ सब के साथ तरह तरह के खेल में मग्न थीं। 
 
      ' अंजू  नाईस पार्टी ! ' प्रिया सुन्दराजन जो दक्षिण भारतीय थी उसने मुंह में २ काजू के निवाले रखते हुए कहा। 
' थैंक्स प्रिया। हाऊ हैव यू बीन ? व्हाट आर यू बीज़ी विथ ? ' अंजू ने प्रश्न किया। 
( ' धन्यवाद ! कैसी हो ? किस कार्य में व्यस्त हो ? '  ) यही  कहा था अंजू ने प्रिया से ! 
 'ओह रिसर्च नेवर स्टॉप्स यू नो '  प्रिया ने उत्तर दिया। 
प्रिया का कार्यक्षेत्र संशोधन था उसने यही कहा  कि , ( यह काम कभी रूकता नहीं ! )
           खेती से जुड़े संशोधन संस्थान में कार्यरत प्रिया  वरदराजन ने यही उत्तर दिया।
 ' ट्र्यू '  -  (' सत्य है !' )  अंजू ने हामी भरी ! 
अब  आशी भी वहीं  गयी थी और पूछने लगी
 ' अगले सन्डे गुरूद्वारे आ रही हो ना अंजू ? '
 ' हाँ आ जाऊंगी ...मम्मा को लेकर ' अंजू ने कहा। 
' पक्का ? ' 
' हाँ हाँ पक्का ! ' अंजू ने मुस्कुराकर वादा किया और समोसे की चाट से सजी हुईं बड़ी ट्रे को उठाये जहां पुरुष मेहमान बातों में और वाईन बोटलों से सजे काउंटर के इर्द गिर्द खड़े थे वहां पहुँच कर उसने तश्तरियां उन्हें थमाने का काम शुरू किया। 
      ' पटेल सर ! क्या कहते हो , कैसी चल रही है आपकी ' कम्फर्ट इन ' ? 
आशी के पतिदेव सुचेत चड्ढा ने दादी जी दिव्या के पुत्र सुधीर पटेल से सवाल किया। 
' श्री कृष्ण की कृपा है दोस्त ! '  सुधीर ने जवाब दिया।
 फिर सुधीर पटेल ने सुचेत से पूछा ,
' आप सुनाओ क्या हालचाल है ? आपके गेस स्टेशन का धंधा तो रोकडे का धंदा है! 
पेट्रोल पम्प का बिजनेस अच्छा ही होगा। दाम तो खूब ऊंचा गया है। '  
' रब्ब राखा ! गुरूजी की मेहर ! ' सुचेत ने मूंछों पे हाथ फेरते कहा। 
 बंगाली बाबू शोमेन  चटर्जी भी मुस्कुराते हुए समोसा चाट की खट्टी  - मीठी चटनी के चटखारे लेते हुए बोले 
' सब भालो है ! आमी एकाऊँटिंग देखबे ना ..
टेक्स रिटर्न फाईल करोछे ते दिन सब भालो बिजनेस खुल जाबे ! ' 
मिसेज चेटर्जी लतिका अपने पति शोमेन  को कोहनी मारते हुए काजल लगी बड़ी बड़ी  आँखों से उसे घूरती हुईं बोलीं ' सोमेन की तुमी ! टेक्स इज़ नेवर फन ! ' ( टेक्स कभी आनन्द दायक नहीं होता ) 
तिका ने कांथा की कढाई से सजी सुन्दर हरी रेशमी साडी बंगाली ढंग से बांधी हुई थी और वह देवदास की पारो सी ही सुन्दर लग रही थी।  
' ओय भाबी , सच्च दस्या ' सुचेत ने मेज पे हाथ ठोंकते हुए जोर से कहा और पूछा 
 ' त्वाडी स्कुल कैसी है ? '  
 क्यूंकि लतिका चेटर्जी एक  लोकल स्कुल में मेथ्स की, कक्षा ४ और ५ के बच्चों की टीचर थीं । 
' हेडेक होबे सुचेत ..कभी कभी फन ! '  .
लतिका ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया। उसके दोनों बेटे प्रोबीर और सुबीर भी उसी स्कुल में पढ़ते थे और मिस्टर और मिसेज चेटर्जी भी दो गली पार के मकान में उसी सब डिवीज़न में  रहते थे। 
       ' अब ये बताओ चेटर्जी बाबू , कौन से स्टोक खरीदना ? ' सुचेत ने पूछा। 
तब  तो सभी का ध्यान वहीं केन्द्रीत हो गया। अमरीका में स्थायी हुए , भारतीय सफल कार्यकताओं का ये भी एक बहुत बड़ा और महत्त्वपूर्ण विषय है।
 कौन से स्टोक में कड़ी मेहनत  से कमाई गयी अपनी संपत्ति का हिस्सा लगाया जाए ये चिंता,
 सभी भारतीयों के मन में ख़ास  बसी रहती है। 
अब तो  वहां उपस्थित  हरेक ने अपने अपने विचारों के अनुसार स्टोक के नाम गिनवाना शुरू किया।
 कोइ बोला ' सिस्को सीस्टम '  प्योर गोल्ड '  ! 
किसी ने कहा जी. ई . माने ' जनरल  इलेक्ट्रिक  ! '
 तो दुसरा बोला ' ऐप्पल में डालो पैसा ' ..
तीसरे ने 'सुझाया ' माईक्रो सोफ्ट ' भी लेना यार बील गेट्स को भूलना नहीं !' 
अंजू धीरे से मुस्कुराती हुई वहां से खिसक ली। ये सत्येन्द्र का विषय था। वही देखभाल किया करते थे। 
         महिला मण्डल में  साड़ी , गहनों और बच्चों की बातें प्रधान थीं। '
  भारतीय अमरीका में रहें या ईंग्लैंड में या और कहीं ..भारतीय स्वभाव नहीं बदलता ! ' अंजू ने सोचा ! 
' अंजू , शैल्टर पे चलोगी ना ?'   शैल्टर माने वह संस्था जहां निराश्रित और  गरीब व भूखे लोगों को भोजन करवाने का जिम्मा भारतीय कौम के कुछ सदस्य हर माह के किसी भी एक इतवार को ले कर किया करते थे। 
उसी को लेकर आशी ने प्रश्न किया था। अंजू ने भी हामी भरते स्वीकार किया और कहा ,
 ' हाँ पक्का , बता देना कौन से दिन चलना है ..आ जाऊंगी। '
 भारतीय लोग अमरीकी नागरिक हैं और कई तरह के सेवा के कार्य भी किया करते हैं।
 शायद अमरीका में आकर बसे,  विश्व के हरेक देश के लोगों  के बीच में रहते हुए 
 भारतीय कौम के लोग,  अमरीका में  प्रादेशिक भेदभाव भूल कर,  
अपने को एकजुट करने में उतने ही सफल हुए हैं जितने अपनी नौकरी और काम धंधे में सफल हो पाए हैं।
 ये भी एक सोचनेवाली बात है। 
     अब  अंजू  बाहर लोन की ओर बढी तो देखा  सरिता जी से,  चेटर्जी दम्पति की माता जी  जो मिस्टर  चेटर्जी की  माता जी थीं और उनका नाम शर्मिष्ठा चेटर्जी था,  वे दिव्या पटेल और सरिता जी से बतिया रहीं थीं
 और बांग्ला मिश्रित अंग्रेज़ी , हिन्दी में दोनों को प्राणायाम की विधि, बड़े स्नेह से सने मीठे स्वर में समझा रहीं थीं। 
  अंजू ने सत्येन्द्र को आवाज़ दी और बुलाकर पूछा  ' अब , केक कटवाया जाये ?  '
 सत्येन्द्र ने अंजू से आँख मिलाते हुए मुस्कुराकर हामी भरी और कहा
 ' बच्चा पार्टी को बेजमेंट से ऊपर बुला लो अंजू  ! मैं केक लेकर  अभी आया ..' 
कुछ मिनटों में  शादी की २५ वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में , मिस्टर  और मिसेज चड्ढा के शुभ हस्त से
डबल  चोकलेट का  केक काटा गया तो  बच्चों ने खूब तालियाँ बजायीं ! 
सभी बड़ों ने आगे बढ़कर उन्हें  आशीर्वाद दीये। 
तब चड्ढा दंपत्ति ने अदब से कमर तक झुककर वहां उपस्थित हर एक  बजुर्गों के बारी बारी से पैर छूए ! 
 तो बच्चे ये क्रिया देखने लगे ! वे  देख रहे थे और युवा पीढी भी देख रही थी। 
वे सभी  शायद भारतीय परम्पराओं की जड़ों को अमरीका की नई धरा पर फिर उगता हुआ महसूस कर रहे थे। बड़ों की आँखों में उमड़ी ममता छलक आयी थी !  दूर छूटी भारत की मिट्टी की सोंधी खुशबु का झोंका आयोवा प्रान्त की धरती पे , सरसराता हुआ सभी के मन को सहलाता हुआ निकल गया था।  
        बुजुर्ग वर्ग सोच रहा था कि ,  उन्हें अपने जीवन  की संध्या में , खिलते  हुए नये पुष्प की अभिलाषा  स्वरूप धेवते और नाती नातिन का प्यार  ही शायद इतनी दूर, अपने  वतन से दूर, सात  समंदर पार , अमरीका की धरा तक खींच लाया था। 
      ' मूल से ब्याज धन अधिक प्यारा लगता है न दिव्या बेन  ' सरिता जी ने धीमे स्वर में कहा। 
जिसे सुनकर दिव्या पटेल भी आशय समझ गयीं और सरिता जी का हाथ थामे हुए, 
 घर के भीतर ले चलीं और कहा
 ' व्हाला  सरिता बेन , ( प्यारी सरिता बहन )  हम लोग नसीबदार हैं। 
हमारे बच्चे इतने अच्छे हैं। हमारे पैर छूते हैं! इज्जत देते हैं !  
वो भी देखो न , अमेरिका में सफल होकर भी परम्परा को,  रीत रिवाज़ को भूल्या नथी! 
रणछोड़ राय सुखी करे बधा ने ' ( श्रीकृष्ण सब को सुखी रखें ) ! 
 दिव्या बेन ने गुजराती में बात ख़त्म करते हुए कहा तो सरिता जी से मुस्कुराए बिना रहा न गया। 
 उन्होंने दिव्या बेन का हाथ अपनी हथेली में कस कर पकड़ते हुए कहा, 
' इस बार डाकोर मंदिर के दर्शन करने हम लोग भी आप जब नडीयाद जायेंगीं तब आ जायेंगें।
क्यों जी , आप क्या कहते हैं ? '  अपने पतिदेव को वार्तालाप में शामिल करते हुए सरिता जी ने प्रश्न किया । 
' हाँ तुम्हारी इच्छा है तो चले चलेंगें ..दिव्या बेन और धनजी भाई पटेल जब वहां होंगें तब अवश्य जायेंगें। ' 
देवेश्वर जी ने जब ये कहा तो दिव्या बेन और उनके पति धनजीभाई पटेल भी प्रसन्न हो गये।
 ' हा हा , देव भाई .. आवोने एक वार अमारे आँगणे ..तमने डाकोर ना गोटा, ने पेंडा नो भोग जमाड़शुं '  
 धनजी भाई ने डाकोर के सुप्रसिध्ध  पेडों और भजियों का जिक्र करते हुए भावभीना निमंत्रण सामने रख दिया। 
' कहाँ  की तैयारी है बा ? ' 
वहां आ पहुंचे सत्येन्द्र ने दिव्या बेन पटेल से प्रश्न किया तो  धनजी भाई पटेल ने कहा ,
' अब तो वानप्रस्थ आ गया ना ..तो वन में कुञ्ज बिहारी लाल की जय जय कार करने, 
जात्रा पे जाने का कार्यक्रम करते हैं बेटा ! '  
उनकी बात सुनकर चारों बुजुर्ग मुस्कुराने लगे ..
' पर बा , आप लोगों  के धेवते , नाती आपके बगैर सूने हो जायेंगें !  
अगर आप लोग गये तो यहाँ ऐसी रौनक थोड़े ना रहेगी! ' सत्येन्द्र ने कहा। 
अंजू और अन्य कई सारे मेहमान भी वहां आकर खड़े हो गये और बात सुनने लगे थे । 
'  बेटा ! रौनक तो बच्चों से होती है हम बुढ़ों से नहीं ! ' दिव्या बा ने उत्तर दिया। 
' तुम लोग इस परदेश में भी इतना काम करते हो और हमारी सम्भाळ राखते हो ये कृष्ण कनैया लाल की जै बोलनेवाली बात है बेटा ! आजकल तो घरड़ा - घर  ,  बुजुर्गों के लिए बनाये आश्रय घर में बुढापा बीताते हैं लोग ! हमने बहुत पुण्य किया है जो तुम्हारे जैसे  इतने अच्छे बच्चे हमे मिले। भगवान तुम्हें सदा सुखी  रखे ! '
 दिव्या बा ने आँसू पोंछते हुए अपनी सूती साडी का गुजराती शैली से पहना हुआ पल्ला आँखों से लगा लिया तो उनके बेटे सुधीर पटेल ने आकर पानी का गिलास दिव्या बा के हाथों में थमाया और बा को गले से लगा लिया। 
फिर सुधीर पटेल ने  कहा 
 ' मेरी  बा ने  एक बार  सुनाया था - सुनो , 
'  पीपळ पान खरंत ,
  हस्ती कुपळिया , 
  मुझ वीती ,
   तुझ वीतशे , 
  धीरी बापुड़ीया  ! ' 
 केम खरूं कहूँ छूं ने बा ? '  ( क्यों सच कह  रहा हूँ ना माँ ?  )
 फिर मुड़ कर  सुधीर ने अपनी माँ दिव्या बा की ओर देखा। 
फिर सभी को संबोधित करते हुए  दोहे का अर्थ समझाते हुए कहा 
 ' पीपल के  पके  हुए पान को  गिरते देख कर ,
  नई  उगी हुईं  कोंपल हंसने लगी ! 
 तो पुराने पत्तों ने कहा 
'  हमें मुरझाया हुआ देख तुम नादाँन कच्चे पान, हंसो नहीं ! 
  जो आज मुझ पे बीत रही है , वह कल तुम पे बीतेगी ! 
  आशय ये है कि ,  एक दिन  तुम सब भी बूढ़े हो जाओगे '
 ये बड़ी पुराणी  गुजराती कविता है जिसे बा ने  एक बार मुझे समझाया था। 
               सुचेत , आशी,  सत्येन्द्र , अंजू, लतिका , मिस्टर चेटर्जी , सुधीर और कई सारी आँखें आते हुए भविष्य की पदचाप इस अमरीकी संध्या के डूबते सूरज के मंद पड़ते प्रकाश के साथ देख रहीं थीं और सुन रहीं थीं इस शाश्वत सत्य को !
        इस क्षण, समय के दरिया  से उठती निशब्द लहर के स्वर , अपने आनेवाले भविष्य को,
 अपने गुज़रे हुए कल के साथ जोड़ रही थी। संध्या का समय संधि काल का क्षण है। उसी तरह जैसे युवा अवस्था , मनुष्य  जीवन के शैशव और वृध्धावस्था की वय संधि का पड़ाव है। यौवन का दंभ क्षण मात्र के लिए होता है। 
         वर्तमान में खड़े वे सब  देख रहे थे उस कल को जो सुनिश्चित था की वह अवश्य आयेगा। 
वे समझ रहे थे कि आज वर्तमान में खड़े उन सभी के साथ एक सुद्रढ़ सहारा भी था।  जो उस आनेवाले दिनों के प्रकाश को और अधिक उज्जवल करने में सक्षम था और वह था बड़ों का आशीर्वाद और सत्कर्म की  प्रेरणा !  भारतीय परम्पराओं का पाथेय आज उनके साथ था।  
सप्ताहांत की दावत यादगार रही ! 
इस सुहानी शाम की दावत में,  माँ के प्रेम से सींचा और पुत्र द्वारा  प्रेम से परोसा गया सबसे लजीज व्यंजन  शाश्वत सत्य, साक्षात्कार का पावन क्षण ही वास्तव में शाम की दावत का सर्वथा अप्रतिम और अनूठा उपहार था।  

 - लावण्या

7 comments:

Vinay Kumar Vaidya said...
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Jayram Kumar said...

Ati sundar, aapki agli kahani ka intezar hai.

kaushal mishra said...

घर बैठे अमेरिकी दर्शन ....

जय बाबा बनारस....

Udan Tashtari said...

आनन्द आ गया ...उत्तम!!

संतोष पाण्डेय said...

बहुत अच्छी कहानी। सुंदर चित्रण।

Ravi kant yadav justiceleague said...

read and follow me i will ...

arvind mishra said...

अमेरिकी परिवेश में भारतीय पात्रों के सामंजस्य की कथा