Wednesday, September 28, 2016

वैश्विक कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा

 वैश्विक कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ~ 
 
श्री तेजेन्द्र शर्मा आधुनिक हिंदी साहित्य के सक्षम हस्ताक्षर हैं। वे लेखक तो हैं  ही किन्तु लन्दन निवासी होने के बावजूद, यूरोप  की भौगोलिक सीमा में बंधे हुए न रह कर, एक वैश्विक हिंदी कथाकार की हैसियत से पहचाने जाते हैं। 
     इंसान कहीं भी रहे, भावनाएं तो विश्व के हरेक देश में, मानव मन में, एक सी ही उभरतीं हैं। ऐसी मानवीय संवेदनाओं को अपने लेखन से उजागर करते हुए, तेजेन्द्र शर्मा जी ने  हिंदी साहित्य में, अपनी कथाओं द्वारा अपार ख्याति प्राप्त की है। आधुनिक हिंदी साहित्य के तेजेन्द्र जी, सशक्त शब्द शिल्पी हैं और इसी कारण उन की कहानियाँ जब जब लिखी गईं तब तब एक विशाल पाठक वर्ग ने उसे पढ़ा, सराहा और एक नए  सिरे से, बदलते हुए सामाजिक परिवेश को समझा। उर्दू, पंजाबी और नेपाली भाषी लेखकों ने, अपनी अपनी भाषाओं में तेजेन्द्र जी की कहानियों को अनुदित किया । 
      भारत के जगरांव ग्राम में सन १९५२, अक्टूबर की १२ तारीख  को तेजेन्द्र जी का जन्म, पंजाब प्रांत में हुआ था। शैशव के कुछ वर्ष बीते और परिवार शहर में रहने आ गया । 
     तेजेन्द्र जी ने  देहली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी विषय में एम. ए. किया और  कम्प्युटर विधा में डिप्लोमा भी लिया। अंग्रेज़ी, हिंदी पंजाबी, उर्दू और गुजराती भाषाओं के वे जानकार हैं। 
   भारत  से लन्दन तक की तेजेन्द्र भाई साहब की जीवन - यात्रा, किसी घुमावदार, अति मानवीय संघर्षों से भरी कहानी से कम नहीं। 
स्वयं उनहोंने कहा है , 
"  जगरांव से लुधियाना जाना,
    ग्रामद्रोह कहलायेगा
     लुधियाने से मुंबई में बसना
       नगरद्रोह बन जायेगा
    मुंबई से लंदन आने में
   सब का ढंग बदल जाता है
     पासपोर्ट का रंग बदल जाता है !" 
एक रचनाकार बनने से पहले तेजेन्द्र जी की बाल्यवस्था में परिवार का अनेकों बार तबादला हुआ था। नीड का निर्माण फिर फिर की सी प्रतीति  और पिता का क्रोधी किन्तु निडर और साहसी स्वभाव, माता का असीम स्नेह, भारतीय रिश्ते नातों की डोर से बंधा शैशव, परिवार से जुड़े  रिश्तों से मिला अपार स्नेह संबल, यह सभी एक बच्चे के मन को मानवीय संवेदनाओं के विविध स्पन्दनों से भरते रहे। 
                   जीवन के किसी मोड़ पर  मिला हरजीत दीदी का निर्मल स्नेह भी भविष्य के लेखक के जहन  में ऐसा बसा कि  कहीं न कहीं, किसी न किसी मोड़ पर, तेजेन्द्र शर्मा के लेखन द्वारा, विश्व में फैले हुए असंख्य पाठकों के मन को छु गया ! 
   अपनी युवावस्था में तेजेन्द्र  जी ने  भारतीय विमान सेवा में २२  वर्ष  गुजारे। उस वक्त  तेजेन्द्र जी को दुनियाभर के लोगों को नज़दीक से देखने समझने का मौका मिला। यह अनुभव, सुफेद बादलों पे उड़ते एरोप्लेन में भी तेजेन्द्र शर्मा के लेखक मन के मौन भावों को, कहानियों का आकार देने से ना चुके। अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में तेजेन्द्र जी कहते हैं , ' मेंरा मुख्य उद्देश्य है पाठक के साथ एक संवाद पैदा करना। जो मैं सोच रहा हूँ, वह पाठक तक पहुँचे, यह मेरा मुख्य उद्देश्य रहता है। ' 
                दिन गुजरते रहे परंतु नियति ने अब बड़ी कठिन परीक्षा ली ! उनके हँसते खेलते परिवार को यकायक सहमा दिया। तेजेन्द्र जी ,धर्मपत्नी इंदु जी, बिटिया दीप्ती और पुत्र मयंक सभी के जीवन में  दारुण, अत्यंत दुखद मोड़ आया! इंदु जी जानलेवा कैंसर से जूझ रहीं थीं। कैंसर सा असाध्य रोग और अपनी पत्नी का वह अंतिम समय, तेजेन्द्र जी न जाने कैसे झेल गए ! 
        इंदु जी के जाने के बाद, कथाकार के जीवन को सर्द  हवाओं ने आ घेरा और फिर ज़िन्दगी में तब्दीलीयां आईं। कहते हैं कि,
' तब्दीलीयां जब भी आती हैं ,मौसम  मे...
   किसी का यूं अचानक  चले जाना, 
    बरसों तलक , बहुत याद आता है ! ' 
उनकी धर्मपत्नी, सहचरी, रचनाकार की प्रेरणा शक्ति, जिसे अंग्रेज़ी में ' muse ' कहते हैं,  उनका चले जाना, असहय दुःख भी अब इस रचनाकार को सहना था। 
     तेजेन्द्र जी की आत्म स्वीकृति है कि हिंदी भाषा के प्रति एक लेखक की हैसियत से उन्हें रुझान बख्शनेवालीं, व्यक्ति , श्रीमती इंदु तेजेन्द्र शर्मा जी हीं थीं। कहानी लेखन की विधा के लिए तेजेन्द्र जी कहते हैं ' कहानी स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा है। ' इंसान की ज़िंदगानी भी तो वैसी ही होती है। 
          सौ. इंदु जी का इस तरह, असमय जीवन पथ पर छोड़ जाना और कैंसर दैत्य से विकट संघर्ष और  इंदु जी से बिछोह का दारुण दंश, कथाकार के मन के इंद्रधनुष को, विषाद के गहरे रंगों से बेध गया। कथाकार की कला, करुण रस  से बिंध कर और निखरती चली गई।
    तेजेन्द्र जी ने यही कहा ' एक कहानीकार के तौर पर मैं अपने आप को मूलतः हारे हुए व्यक्ति के साथ खड़ा पाता हूँ, जीतने वाले के साथ जश्न नहीं मना पाता।' 
        इस दौरान इंदु जी के संग २१ वर्ष का बंबई शहर सहवास और विश्व भ्रमण, जीवन के अनुभवों को परिपक्व करते रहे थे। ये सारे अनुभव  कथाकार  तेजेन्द्र शर्मा के रचनाकार मन को, नीजी संवेदनाओं को, विविध रंगों से तराशते रहे थे । 
       तेजेन्द्र जी की रचनाशीलता हिंदी सिनेमा, रेडियो, स्टेज जैसे संचार माध्यम द्वारा भी अभिव्यक्त हुई और  निरंतर प्रगति करती रही।इसी काण उनकी कहानियों के पात्र सजीव लगते हैं। उनके हाव भाव तक पाठक दृश्यों को पढ़ते वक्त, देख पाते हैं। अपनी कथा पढ़ने की सूझ बुझ तेजेन्द्र जी को विविध कला क्षेत्रों में दक्षता पूर्वक कार्य करने से ही बखूबी आती है।'  शांति '  नामक टीवी सीरियल में भी तेजेन्द्र जी के कार्य को खूब सराहा गया। 
       इंदु जी के जाने के बाद,  इंदु जी की स्मृति में, तेजेन्द्र जी ने ' इंदु कथा सम्मान ' की नींव बंबई में ही रखी। कालान्तर में जब तेजेन्द्र शर्मा जी लन्दन आकर बस गए तब ' इंदु कथा अंतरराष्ट्रीय सम्मान ' स्थानांतरित होकर अन्तरराष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार बना।   
तेजेन्द्र जी ने उस दौर के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा है, ' ११ दिसम्बर १९९८ को मैं लन्दन में बसने के लिए आया। उस समय मेरी आयु ४६ वर्ष थी। मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी। और न ही कोई बहुत बड़ा बैंक बैलेन्स था। मैं एअर इण्डिया की शाही नौकरी छोड़ कर आया था जहाँ अमरीकी डॉलर में पगार मिलती थी और भारतीय रुपये में खर्चा करता था। मुझे  अपने परिवार को पालना था। लन्दन शहर ने मुझे पहले बीबीसी में समाचार वाचक की नौकरी दी और फिर ब्रिटिश रेल में ड्राइवर की। यानि कि उस उम्र में मुझे नौकरी नहीं, नौकरियाँ मिलीं – और वो भी एकदम भिन्न क्षेत्रों में। ' 
            लन्दन रेलवे विभाग में कार्यरत तेजेन्द्र जी की कथाओं ने अब देस और परदेस को एक साथ समेट  लिया है। कहानीकार के  कथा शिल्प को अब व्यापक विस्तार मिला। 
          तेजेन्द्र जी की इस दौर की  कहानियाँ  मानव मन और सामाजिक उतार चढावों के तानों बानों से कसी हुईं, बुनी हुईं, सर्वकालिक हो गईं और इसी कारण से  तेजेन्द्र शर्मा जी की कहानियाँ, सार्वभौम विषय वस्तु के कारण, लन्दन तक सीमित न रह कर, भारत में बसे पाठकों को नवीन कथा विषय की इन कहानियों को पढ़ने के लिए उत्सुकता से बाध्य करतीं रहीं। आज तेजेन्द्र जी की कथाएं भारत में पाठ्यक्रम का हिस्सा बन चुकी हैं । 
       एक साक्षात्कार में बेबाकी से उत्तर देते हुए तेजेन्द्र जी कहते हैं कि  ' हम प्रगतिशील लोग धर्म के मामले में बहुत मॉडर्न हैं और परम्पराओं के विरुद्ध हैं। किन्तु जहाँ तक लेखन का सवाल है वही दकियानूसी रवैया रखते हैं। ' 
      ' काला सागर, ढिबरी टाइट, देह की क़ीमत, क़ब्र का मुनाफ़ा, तरकीब, पाप की सज़ा, मुझे मार डाल बेटा, एक बार फिर होली, पासपोर्ट का रंग, बेघर आँखें, कोख का किराया, टेलिफ़ोन लाइन/ जैसी कहानियाँ  लिखनेवाले तेजेन्द्र जी कहते हैं 
'  मैं शायद उन गिने चुने लेखकों में शामिल हूँ जिनके लेखन में आज का समाज जगह पाता है।'
             आधुनिक काल को अपने लेखन से विश्व के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करनेवाले रचनाकार को आधुनिक हिंदी साहित्य के सक्षम कथाकार तेजेन्द्र भाई को  मैं इसीलिए ' रैनेसान्स मेन ' या '' Renaissance Man ' या ' नवजागरण का कथाकार ' मानती हूँ। 
     आधुनिक इतिहास और मध्य युग को  जिस तरह यूरोप में रेनेसांस युग कहते हैं वह समय काल  १४ वीं से १७ वीं शताब्दी के दौरान  फैला हुआ है। यह कालखंड यूरोप में कई बदलाव लाया। इसी प्रकार भारतीय चेतना को वैश्विक फलक तक लाने का साहस तेजेन्द्र शर्मा जैसे रचनाकार, अपने लेखन द्वारा  आज के मध्य युगीन भारतेंदु युग के पश्चात के साहित्य को आधुनिक २१ वीं सदी के हिंदी साहित्य को जोड़ने का काम करते हुए मानों एक सेतु रच कर पूरा कर रहे हैं। 
        तेजेन्द्र जी के अभिप्राय,  ' कहानी ' और ' लेखक '  के लिए गौर तलब है।  वे कहते हैं कि, " कोई कहानी सच नहीं होती और कहानी से बड़ा सच कोई नहीं होता। एक कवि और कहानीकार के सच में भी अन्तर होता है। कवि का एक अपना सच होता है जो कि आवश्यक नहीं की शाश्वत सत्य ही हो। कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने भीतर का सत्य़ खोज सकता है।
' प्रतिबिम्ब ' तेजेन्द्र जी की लिखी हुई पहली कथा है। ' रेत का घरौंदा ' ईंटों का जंगल ' कड़ियाँ ' काला सागर, ' ढिबरी टाइट ' ,पासपोर्ट का रंग ' जिस पर कविता भी लिखे गई उसी से चाँद पंक्तियाँ 
 ' भावनाओं का समुद्र उछाल भरता है
   आइकैरेस सूरज के निकट हुआ जाता है
  पंख गलने में कितना समय लगेगा?
    धडाम! धरती की खुरदरी सतह
     लहु लुहान आकाश हो गया!
    रंग आकाश का कैसे जल जाता है?
     पासपोर्ट का रंग कैसे बदल जाता है? ' 
बेघर आँखें ' सीधी रेखा की परतें ', ' ये क्या हो गया ', '  कब्र का मुनाफ़ा ' ,' देह की कीमत ' , ' दीवार में रास्ता ' इत्यादी  अनेक कथाएं, आधुनिक युगबोध की कहानियां हैं। 
     इसी कारण तेजेन्द्र जी के भीतर का इंसान लेखक बना तो उन के जमीर ने यही कहा ' हारा हुआ आदमी भारत में है तो ब्रिटेन में भी है और अमरीका में भी है। जिस आदमी को सद्दाम ने दबा रखा था वो भी हारा हुआ आदमी था। जिस किसी की साथ अन्याय होता है – मेरा हारा हुआ आदमी वह है। और मैं बेझिझक उसके साथ सदा खड़ा रहूँगा। ' 
' ये घर तुम्हारा है ' तेजेन्द्र जी का  कविता ग़ज़ल संग्रह हैं जिसकी  शीर्ष कविता में तेजेन्द्र जी कहते हैं 
नदी की धार बहे आगे,मुड क़े न देखे
न समझो इसको भंवर अब यही किनारा है " 
       तेजेन्द्र जी को उनके लेखन एवं सम्पादन के लिए एवं हिंदी सेवा के लिए असंख्य पुरस्कारो से नवाजा गया है। सुपथगा सम्मान-१९८७ में मिला। ढिबरी टाइट के लिये महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार-१९९५ प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों प्रदान किया गया। सहयोग फ़ाउंडेशन का युवा साहित्यकार पुरस्कार-१९९८ में दिया गया। यू.पी. हिन्दी संस्थान का प्रवासी भारतीय साहित्य भूषण सम्मान-२००३, प्रथम संकल्प साहित्य सम्मान- दिल्ली २००७ में प्राप्त हुआ। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा का डॉ॰ मोटूरि सत्यनारायण सम्मान-२०११ में और अंतरराष्ट्रीय स्पंदन कथा सम्मान २०१४ में मिला। 
    लन्दन में रहकर हिंदी रचनाकारों को अंतरराष्ट्र्रीय स्तर पर सम्मानित करती हुई  संस्था को हाऊस ऑफ लॉर्ड्ज़ ' में स्थापित करने का श्रेय श्री तेजेन्द्र जी का है। विश्व के विभिन्न देशों में बसे अन्य रचनाकारों को संस्था द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। हिंदी भाषा के प्रति यही सच्चा समर्पण है। 

कवि और लेखकों को लोगबाग कभी कभार याद कर लेते हैं बाकि अक्सर यही देखने में आता है कि रचनाकारों को साहित्य + लेखन के साथ जीवन में कड़ा संघर्ष ही अधिकतर झेलना पड़ता है। 
    एक पाठक, सौ मित्रों के समान होता है और जो लेखक की पुस्तक पढ़ने के बाद, उस पर कुछ कहे, वह तो लाखों में कोइ एक होता है। लेखक का हौसला बढ़ानेवाले की बात को मन में रखे हुए, लिखते रहना ही एक रचनाकार की वास्तविक नियति है।
      इस निष्कर्ष पर पहुंचकर अद्भुत कथाकार तेजेन्द्र जी से यही अपेक्षा रहेगी कि वे निरंतर सक्रीय रहें , लिखते रहें। अछूते विषयों पर, कलम चलातें  रहें और मानव संवेदनाओं से सभर कहानियां बुनते रहें जिस से भारत के लेखक और प्रवासी भारतीय लेखक के बीच का कृत्रिम  भेद मिट जाए और विश्व में कटुता और विभाजन की त्रासदी हारे ! जीत हो मानवता की और सच्चे मानवीय मूल्यों की और खेमों या विघटन कारी भावना की करारी हार हो ! अभी तेजेन्द्र शर्मा जी को बहुत कुछ लिखना शेष है और हमें, उनका लिखा हुआ पढ़ना ! मेरी सद्भावनाएँ रचनाकार तेजेन्द्र शर्मा जी के उज्जवल भविष्य के लिए प्रेषित करते हुए अतीव हर्ष हो रहा है। 
शुभमस्तु ! 
- श्रीमती लावण्या दीपक शाह 
 ओहायो प्रांत सीनसीनाटी शहर से 



5 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (30-09-2016) के चर्चा मंच "उत्तराखण्ड की महिमा" (चर्चा अंक-2481) पर भी होगी!
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kavita Rawat said...

बहुत ख़ुशी होती हैं जब कोई विदेश में बसकर भी हिंदी के लिए अपना अमूल्य योगदान देकर विश्व में उसका प्रचार-प्रसार करता है और दुःख इस बात का होता है जो भारत में रहकर भी हिंदी को सही पढ़-लिख और बोल नहीं पाते हैं ..
बहुत अच्छी प्रेरक प्रस्तुति के लिए आभार!

Suresh Vithalani said...

बहुत सुंदर लेख । अभिनंदन ।

Seikh Razia said...

लावण्या जी ऐसा बहुत कम होता है कि आप किसी का लिखा हुआ एक साथ पढ़ जाये जब तक लिखावट में कुछ खास न हो आपके लेखन को साधुवाद और साथ ही तेजेन्द्र जी की कहानियों को पढ़ने का मन बन गया है।

Seikh Razia said...

लावण्या जी ऐसा बहुत कम होता है कि आप किसी का लिखा हुआ एक साथ पढ़ जाये जब तक लिखावट में कुछ खास न हो आपके लेखन को साधुवाद और साथ ही तेजेन्द्र जी की कहानियों को पढ़ने का मन बन गया है।