Thursday, October 19, 2017

टूटा सिपाही : बाल कहानी

               एक था लड़का,  ८ या कह सकते हैं कि लगभग ९ वर्ष का होने ही वाला था। उसकी साल गिरह आने में बस १ महीने का समय बाकी था। उसे घर में प्यार से सब 'मुन्ना' कह कर पुकारा करते थे। परन्तु, स्कूल में उसके सहपाठी दोस्त उसे मनोज ही कहते।Image result for a young indian boy
 मनोज के पास ढेरों खिलौने थे। उसके पापा वीरेन्द्र और मम्मी गिरिजा उसे तरह-तरह के मनपसंद खिलौने बाजार से खरीद कर ला देते थे। खिलौनों में मुन्ना के पास थे, रंग-बिरंगी कंचे, कई सारी छोटी कारें, एक फुटबाल, २ या ३ गेंद, इलेक्ट्रिक ट्रेन, कमाण्डो, गन, बोर्ड गेम - लूडो, कैरम, लेगो, बैड  मिन्टन के रेकेट और कई सारे शटल और भी न जाने क्या-क्या मुन्ना के लिए उन्होंने खरीद लिया था। जब भी मुन्ना को समय मिलता, वह अपनी पसंद का खिलौना उठाता और खूब खेलता। हाँ अक्सर वीडीयो गेम्स में भी उसका समय अधिक बीत जाता। कभी कराटे की क्लास में भी मम्मी उसे ले चलती। जब मुन्ना घर पर रहता तब वह कोमिक्स भी पढता। कभी जिमखाना जाकर मुन्ना स्वीमिंग भी सीखता और अब तैराकी में भी मुन्ना कुशल हो गया है। सन्डे को पापा, मम्मी अच्छी पिक्चर लगी हो, तो उसे सिनेमा दिखलाने भी ले चले जाते थे। वहां पॉपकोर्न, आईसक्रीम और चोकलेट भी उसे अवश्य मिलतीं। स्कूल की पढ़ाई, खेल और मनोरंजन के अनगिनत साधन मुन्ना के लिए उपलब्ध थे। मुन्ना की ज़िन्दगी भरीपूरी थी और बड़े मज़े में चल रही थी। 

       अपने ढेरों खिलौनों में, मुन्ना को एक खेल सबसे ज्यादा पसंद था। उसके पास दस टीन के (पतरे के) बने हुए रंगीन सिपाही थे। सिपाहियों ने ऊपर लाल कोट, नीचे, काली पतलून पहन रखी हो इस तरह उन्हें रंगा गया था। उन सिपाहियों के सर पर बड़ा-सा, काला टॉप लगा हुआ था जो अंडे के आकार का लंबा गोल टोपा था। सिपाही बड़े सुन्दर शक्ल और आकार के थे। 
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जब भी मुन्ने को समय मिलता तब वह मुड में आ जाता और अपने बिस्तर के एक तरफ राजा के पांच सिपाही और दुसरी ओर राणा के पांच सिपाही बिठलाता। ये खेल मुन्ने को बेहद अच्छा लगता था जो उसने अपने आप खोज निकाला था। खेल-खेल में, अक्सर,  राजा और राणा के सिपाहियों के बीच घनघोर लड़ाई छिड़ जाती। दोनों पक्ष बड़े बलवान और बहादुर थे। सो भई युद्ध भी भयानक होता ! पांच-पांच सिपाही अलग-अलग पैंतरे बदलते तब,  युद्ध और भी अधिक भीषण हो जाता। 
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मुन्ना कभी राजा के पक्ष से लड़ता तो कभी राणा के सिपाहियों को बचाव करने में मदद करता। कभी चिल्लाता 'ये मारा ..ले वो मारा ' ..'अरे बचो ..अरे बचाओ' अरे मरा रे ..अरे ये गिरा' ऐसी आवाजों को सुनकर मम्मी भी दरवाजे पर आ खडी होतीं और मुस्कुरातीं। यह खेल, खेलते हुए मुन्ना के दिमाग में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती मानों इस युद्ध की बागडोर थामे, वही लड़ाई का संचालन कर रहा हो ! मुन्ना की कल्पना-शक्ति, मानों उसे लड़ाई के मैदान में अपने पंखों पर बिठला कर ले चलती। आहा ! मुन्ना तो सचमुच रण मैदान में उतर पड़ा है ! 
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यकायक मुन्ना के मनोलोक में सारे सिपाही जीवित हो गये और मुन्ना उन के संग अपने आप को खड़ा हुआ देखने लगा। यह सिपाही तो अब पतरे के माने टीन के न होकर सजीव दीखलायी पड़ने लगे ! 

            मुन्ना आश्चर्य से उनके चेहरों को देखने लगा। एक के मुँह पर ये बड़ी-बड़ी मूँछें हैं ! दुसरे के हाथ में उठी हुई संगीन माने गन है। सामने राणा की फ़ौज से एक सिपाही राजा के सिपाहियों से भिड़ने को उतावला हुआ सामने भागा आ रहा है और चिल्ला रहा है ...'फायर फ़ायर ' आग आग ' ..चौथा घुटनों के बल बैठ निशाना साध रहा है, तभी बन्दूक से एक गोली निकल कर पाँचवें सिपाही की कनपटी के नज़दीक से सुं ...सूँ ..आवाज़ करती गुजर जाती है। ' धाँ य '..का ज़ोरदार स्वर सुनते ही मुन्ना उस पाँचवें सिपाही की और मुड़कर देखने लगा और यह क्या ! पांचवा सिपाही तो घायल हो गया ! उसके दाहिने पैर पे गोली लग गयी थी !  घाव से बेतहाशा खून बहे जा रहा था। सिपाही जमीन पर पड़ा हुआ अब कराहने लगा। 

 अब तो कल्पना-लोक से उतर कर मुन्ना उछल कर अपने सिपाहियों की ओर दौड़ा। उसे अपने मन के आईने में देखी कहानी सच लगने लगी। उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।

      अब वह सच की दुनिया में लौट आया था। मुना ने आहिस्ता से औन्धे मुँह,  पीछे की ओर गिरे हुए, उस पांचवे सिपाही को उठा लिया। परन्तु उसकी आँखें विस्मय से फ़ैल गईं ! दिल अब भी तेज धड़क रहा था। आश्चर्य ! इस सिपाही की टाँगें, घुटनों के पास से सचमुच टूट गयी थी। यह देख कर अब मुन्ना सचमुच परेशान हो गया। 

    मुन्ने ने अपना टूटा सिपाही, गोद में उठाकर रख लिया। मुन्ना की आँखों से टप टप आंसू बह चले। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह अब क्या करे ! किससे कहे ? उसे पता था कि मम्मी-पापा उस की किसी भी बात को समझेंगें नहीं। बड़ों की दुनिया बच्चों की दुनिया से अलग होती है। यह बात मुन्ना जानता था। परेशान मुन्ने को कमरे के दरवाजे से देख रही माँ गिरिजा जी उसी समय कमरे के भीतर आ गयीं। 

पहले तो उन्होंने कमरे में चारों तरफ फ़ैली चीजें बटोर कर उन्हें सही जगह पर रखना शुरू किया। टूटे सिपाही को थाम कर बैठे मुन्ना पर अब माँ की निगाह पड़ी। 

         टूटे सिपाही को देख कर गिरिजा माँ कुछ सोच में पड गयीं। माँ ने अपना सर हिलाया और समीप आयीं तो माँ की साड़ी का नर्म आँचल मुन्ना के सर पे लहरा गया। माँ ने पूछा- 'मुन्ना ! क्या हुआ बेटा ? ' 
   
 माँ के ममतामय स्वर से मुन्ना सम्हला उस ने सजल आँखों से माँ की ओर देख कर कहा, ' मम्मी देखो न मेरे बहादुर सिपाही को चोट लग गयी! 'माँ ने मुन्ने के हाथों से टूटा सिपाही उठा लिया और कहा, ' अरे मुन्ने तू चिंता न कर ..बहुत खेल हो गया। चलो खाना तैयार है ! पापा हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। तुम हाथ धोकर जल्दी से आ जाओ' इतना कहते हुए माँ ने उस टूटे सिपाही को खिड़की के पास उठाकर रखते हुए कहा 'अब ये बहादुर सिपाही कुछ देर आराम करेंगें।' 

भोजन समाप्त करने के बाद मुन्ना फ़ौरन अपने कमरे में आ पहुँचा और अपने घायल सिपाही के पास जा कर मुन्ना खड़ा हो गया। उसने देखा वह टूटा सिपाही बेबस निगाहों से उसी को ताक रहा था। मुन्ने ने कमरे में इधर-उधर देखा और टूटी हुई टांग का हिस्सा उसे दिखलायी दिया तो उसे भी उठाकर उसने खिड़की पर रख दिया। फिर अपने टूटे सिपाही के पास मुँह लाकर फुसफुसाकर वह बोला, 'अब तुम भी आराम करो अच्छा मेरे बहादुर सिपाही ! मैं अब सोने जा रहा हूँ ! कल स्कूल है न जल्दी उठना है'  इतना कह कर मुन्ना बिस्तर पर जा कर लेट गया। उदास मुन्ना को नींद आने में आज देर हो रही थी। पर आखिरकार वह बच्चा था, सो गया।   
          
मुन्ने की आँख लगते ही उसे यूँ लगा मानों वह तेज हवा के संग कहीं दूर उड़ा जा रहा है। फिर धमाके से वह नीचे गिर पडा। गिरा भी तो पानी में ..ये तो अच्छा था कि मुन्ना स्वीमिंग करना जानता था। पानी की तेज धारा मुन्ना को घसीट कर नीचे की ओर ले चली। मुन्ना ने साँस रोक ली। वह नीचे की ओर चला जा रहा था। वह और नीचे सरकने लगा। इसी तरह मुन्ना तैरता हुआ बहुत दूर चला गया। डर के मारे अब तो मुन्ना ने कस कर आँखें बंद कर लीं। फिर कुछ मिनटों के बाद आँखें आहिस्ता से खोलीं तो देखा वह किसी नई दुनिया में आ पहुँचा था।  

 'अरे ये मैं कहाँ आ गया ? 'मुन्ना सोचने लगा। उसने देखा तो चारों तरफ नीले पानी के अन्दर उसे सब कुछ शंखों और सीपियों से बना दिखलाई दिया। मुन्ना के ऊपर, नीचे, लाल, सुनहरी, हरी, नीली, पीली, नारंगी, काली रूपहली, अरे हर रंग की मछलियाँ तैर रहीं थीं। सामने बड़ी सीपी का मुँह आधा खुला हुआ था जिस पर आधी लडकी जिसके नीचे के हिस्से में मछली जैसी पूँछ थी, वैसी जलपरी या अंग्रेज़ी में जिसे 'मरमेड' कहते हैं वह  आराम से वहाँ बैठी थी।  

 मुन्ना को देखते ही वह जलपरी/ मरमेड मुस्कुराई। उसके सुनहरे बाल पानी पर लहरा रहे थे और उसकी भूरी भूरी आँखें मुन्ना को देखे जा रहीं थीं। उसी वक्त तैरती हुईं और भी बहुत सारी सुन्दर जलपरियाँ भी वहाँ आयीं। सभी बड़ी सुन्दर थीं। वे तैरती हुई, मुस्कुराती हुई आयीं और मुन्ना का हाथ थामे अपने राजा के पास ले चलीं। 

जलपरी : मरमेड 
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 एक जलपरी मुन्ना से बोली, ' मुन्ना , ये हमारे राजा जी वरूण देव हैं। 'लोग इन्हें' नेपच्यून भगवान भी बुलाते हैं ! वे जल सागर, दरिया, समंदर सभी के स्वामी हैं। जल में जितने भी जीव जंतु और प्राणी रहते हैं वे वरूण देवता को अपना पिता मानते हैं।  
वरूण देव : नेपच्यून भगवान
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          इतना सुनते ही, मुन्ना ने झट से वरूण देवता को नमस्ते किया। उसने देखा के वरुण देवता एक बहुत बड़ी सोने के रंग की चमचमाती सीप से बने राज सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके ठीक सामने टेबल की जगह बहुत बड़ा विशाल मोती चमक रहा है। मोती में से कभी गुलाबी, कभी सुनहरी और कभी नीली और पीली रोशनी निकल रही है और चारों तरफ प्रकाश फैल रहा है। चाँदनी जैसी आभा आस-पास झिलमिला रही है। मुन्ना ऐसा सुन्दर दृश्य देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने झुककर जैसे माँ ने उसे भगवान् जी की पूजा करते वक्त सिखलाया था उसी तरह अदब के साथ वरुण देवता को प्रणाम किया। मुन्ना बोला ' नमस्ते वरुण देवता।'
वरुण देव ने मुस्काराते हुए कहा ' क्यों मनोज, कैसे हो बेटा ? '

मुन्ना बोला 'अरे वाह ! आप को मेरा नाम भी मालूम है ! क्या आप मुझे पहचानते हो अंकल ? 

वरूण देव ने कहा, ' मुन्ना हम तुम्हें अच्छी तरह पहचानते हैं और हमे ये भी पता है कि तुम बड़े स्मार्ट हो ! अच्छे लडके हो। हम और भी कई सारी बातें जानते हैं। पर तुम बताओ, आज हमारी नगरी में कैसे आना हुआ?'

मुन्ना बोला ' वरुण देवता जी ! मैं नहीं जानता, मैं यहाँ कैसे आ गया ! मैं तो सो रहा था, सच्ची ..और आँखें झपकते ही न, पता नहीं कैसे, मैं यहाँ आ गया ! ये पानी का दरिया बहाकर मुझे आप के पास ले आया ...'

वरुण देव बोले ' बेटा, आज तुम बहुत उदास थे ना, सो हम ने तुम्हें यहाँ बुलाया है। जब भी तुम्हारे जैसे प्यारे प्यारे छोटे, बच्चे, उदास होते हैं, तब हमारे महल में बंधी एक घंटी टन टन कर बजने लगती है। हमें पता लग जाता है कि आज कौन बच्चा उदास है ! घंटी के पास एक शीशे में तुम भी दिखलाई दिए थे सो हमने बुला लिया '

मुन्ना बोला ' वरुण देव, आप को तो सब पता है। आज मेरे बहादुर सिपाही की टाँग टूट गयी न, उस की टूटी हुई टांग देख, मैं सेड हो गया। आज न मैं इसीलिए उदास हूँ ! '

वरुण देव बोले ' मुन्ना हम जानते हैं आप बड़े अच्छे हो। गुड बॉय हो ! अरे सुनहरी जलपरी। मेरी जादुई छड़ी लाना तो .. मुन्ना तुम चिंता मत करो ! मैं तुम्हारे सिपाही की टाँग पहले जैसी जोड़ कर उसे बिलकुल ठीक कर दूँगा ! '
मुन्ना खुश हो गया ताली बजा कर बोला ' सच ? '
तभी सुनहरी जलपरी सोने की छड़ी जिस पर एक चमकता हुआ लाल सितारा भी लगा हुआ था उसे वरुण देवता के सामने ले आयी और वरुण देवता को जादू की छड़ी थमा दी। 
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तब वरुण देवता ने छड़ी को अपने एक हाथ में उठाकर उसे गोल-गोल घुमाया और बोले .. 
' छम छम छाम छूं ..कर दे सही सिपाही की टाँगे तू' .
फिर मुन्ना से कहा 'लो भई मुन्ना अब ये बहादुर सिपाही ठीक हो जाएगा ' 

मुन्ना के आश्चर्य का ठिकाना न रहा वह बोला ' सच ! आपने मेरे सिपाही को ठीक कर दिया ! अब मैं बहुत खुश हूँ ..' थैंक यू '   और इतना कहते ही मुन्ना पानी के भीतर से ऊपर उठने लगा और ऊपर… और ऊपर उठता गया ...  .. अब मुन्ना खुश हो कर तालियाँ बजाने लगा। 
 
' हे ... हे .... वाह वह ..'.... बोल रहा मुन्ना नींद में भी हँसने लगा और उछलने लगा और ऐसा करते हुए मुन्ना अपने बिस्तर से धड़ाम से नीचे गिर पडा ! 

उस के पलंग के साथ लगी नरम कालीन पर गिरने से उसे चोट नहीं आयी। होश संभाल कर मुन्ना जमीन से उठा और सबसे पहले उसकी नज़र खिड़की पर रखे टूटे सिपाही पर गयी। 

मुन्ना ने देखा तो 'अरे ! टूटा सिपाही तो वहाँ नहीं था ! कहाँ चला गया ? अब तो मुन्ना ' माँ माँ ' चिल्लाता हुआ अपने कमरे से बाहर भागा। जोरों से पुकारते हुए पूछने लगा ' मोम  ..मोम   ..तुम कहाँ  हो मम्मा  ?   

गिरजा माँ ने उत्तर दिया ' मुन्ना ..मैं यहाँ रसोई  में हूँ, नाश्ता लगा रही हूँ, क्या बात है बेटा ? ' 

मुन्ना पास जाकर बोला ' मम्मा आपने मेरा टूटा सिपाही देखा है? कल रात खिड़की पर रखा था पर वो वहाँ नहीं है '
माँ ने हँसते हुए कहा ' जा कर, ठीक से देख !  खिड़की पर नहीं तो शायद फर्श पर गिर पड़ा होगा ! '
मुन्ना बोला ' अच्छा मैं देखता हूँ वहां तो देखा ही नहीं ! ' और मुन्ना फिर कमरे की ओर भागने ही वाला था तो माँ ने याद दिलाते हुए कहा ' अरे ब्रश भी कर लीजो और नहाना भी तो है ' ..

उसी समय मुन्ने के घर के दरवाजे की घंटी दनदना कर बजने लगी। आहो डाक्टर चाचा आये होंगें सोच कर मुन्ना ने जा कर फ़ौरन दरवाजा खोल दिया। 

डाक्टर आशुतोष बेनर्जी सुबह शाम मुन्ना के दादा जी शिवनारायण जी की तबियत की जांच करने आया करते थे। वही दरवाजे के पास चौखट पर खड़े थे और वे हाथों में उनका बड़ा सा काला बैग भी थामे हुए थे।

कल रात भी  वे मुन्ना के सो जाने बाद आये थे और आज सुबह सुबह फिर आये थे। उनका यही नियम था। 
डाक्टर चाचा ने कहा ' गुड मोर्निंग मनोज बेटे ! कैसे हो ? '
 मुन्ना ने नमस्ते करते हुए कहा ' मैं ठीक हूँ डाक्टर अंकल। '
डाक्टर चाचा बोले ' अरे भई मुन्ना देखिये, क्या ये सिपाही आपका है ? आज सुबह हमारी क्लीनिक की मेज पर जनाब खड़े थे। शायद अपनी जांच पड़ताल करवाने आयें हों ! मैं यहीं आ रहा था तो इन्हें भी साथ ले आया। संभालो अपने सिपाही को ! ' ये कहते हुए डाक्टर चाचा ने सिपाही, मुन्ना के हाथों में थमा दिया ! मुन्ना आश्चर्य से दो टांगों पर खड़े अपने सिपाही को देखता ही रह गया ! और खुशी के साथ उछल कर बोला ,
' मम्मा ..देखो तो मेरा सिपाही ठीक हो गया ! उसकी टांगें टूटी नहीं ..वाह वाह वाह ! ' 
मुन्ना को प्रसन्न देख कर गिरिजा माँ और डाक्टर बेनर्जी हल्के से एक दुसरे की और देख कर मुस्कुराने लगे।

     मुन्ने को नहीं पता था की, डाक्टर चाचा, डाक्टरी करने के साथ  पुरानी,  टूटी फूटी चीजों को रिपेयर करना भी बखूबी जानते थे। ये उनकी होबी थी। उनका शौक था। टूटी-फूटी चीजों को जोड़ कर उन्हें दुबारा सही करने का अच्छा तजुर्बा डाक्टर चाचा को था। मुन्ना की माँ यह बात जानतीं थीं। कल रात जब डाक्टर बेनर्जी दादा जी की जांच करने आये थे तब माँ ने इस टूटे सिपाही को उठा कर डाक्टर बेनर्जी क हाथ में रखते हुए पूछा था, 
 'डाक्टर साहब, देखिये तो, इस टूटे सिपाही की टांगें आप से, ठीक हो पाएंगीं? '

डाक्टर बेनर्जी ने हँसते हुए कहा था ' लो जी ! अब तो हम खिलौनों के डाक्टर भी बन गये ! भाभी जी आप फ़िक्र ना करें। इस सिपाही की टूटी हुई टांगें बड़ी आसानी से जुड़ जायेंगीं ! आप मुन्ने से कुछ न कहना। सुबह हम मुन्ने को एक सुखद भेंट देंगें और मुन्ने को खुश हुआ देखेंगें। ' 
     
दादा जी ने मुस्काराते हुए अपनी बात कही
 ' डाक्टर साहब, हम सभी ईश्वर के खिलौने हैं। आप हमारे परिवार के सदस्य हैं। 
आप के उपकार हम सदैव याद रखेंगें।आप जैसे डाक्टर बेटे, ईश्वर हर परिवार को दें मैं यह प्रार्थना करता हूँ। '
अब डाक्टर बेनर्जी कुछ धीमी आवाज़ में बोले 'दादा जी आप मुस्कुराते रहिये और हम सब आपको मुस्कुराता देख प्रसन्न होते रहें। मैं, ईश्वर से यही माँगता हूँ।' और अपना डॉकक्टरों वाला बेग उठाकर घर से बाहर जाने के लिए वे निकल पड़े थे ।
आज दिन भर मुन्ना को स्कूल में दोस्तों के साथ खेलते हुए भी न जाने क्यों उसके डाक्टर बेनर्जी चाचा की याद आती रही ! मुन्ना सोचता रहा ' अरे डाक्टर चाचा की शक्ल वरुण देवता से कितनी मिलती है ! कितने सेम दिखते हैं दोनों ...!'
 - लावण्या

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (21-10-2017) को
"भाईदूज के अवसर पर" (चर्चा अंक 2764)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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दीपावली से जुड़े पंच पर्वों की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन गोवर्धन पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Doanh Doanh said...




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