Tuesday, April 28, 2020

५ - अनुवादित कविताएँ ~ लावण्या शाह

 सर्वप्रथम : प्रस्तुत है कवि पाबलो नेरुदा की दो कविताओं का हिंदी अनुवाद
प्रश्न : पाब्लो नेरुदा कौन थे ?

उत्तर : नेफताली रीकर्डो रेइस या पाबलो नेरुदा
 दक़्शिण अमरीका भूखँड के सबसे सुप्रसिध्ध कवि हैं।उन का जन्म पाराल, चीले, आर्जेन्टीना मेँ सं.१९०४ के समय मेँ हुआ।  पाबलो नेरुदा ने, अपने जीवन मेँ कई यात्राएँ कीँ थीं।
रुस, चीन, पूर्वी युरोप की यात्रा कीं।  सन्` १९७३ मेँ निधन हुआ।
भारत के श्री रवींद्रनाथ ठाकुर की भाँति भाषा व साहित्य सर्जन  लिए,
विश्वविख्यात  नोबल इनाम सन्` १९७१ मेँ पाब्लो नेरुदा को मिला ।
कविता के लिये वे कहते हैं कि, " एक कवि को भाइचारे व  एकाकीपन के बीच एवम्` भावुकता व धुर्र कर्मठता के बीच, तथा अपने आप से लगाव के साथ
समूचे विश्व से सौहार्द व कुदरत के उद्घघाटनोँ के मध्य सँतुलित रहते हुए
रचना कर्म करना जरूरी होता है।
वही कविता होती है  "
         (१)
कविता : " दोपहर के अलसाये पल "
" दोपहर के अलसाये पल "
तुम्हारी समँदर -सी गहरी आँखोँ मेँ,

फेँकता पतवार मैँ,
उनीँदी दोपहरी मेँ -
उन जलते क्षणोँ मेँ,
मेरा ऐकाकीपन , घना होकर,
जल उठता है -
डूबते माँझी की तरहा -
लाल दहकती निशानीयाँ,
तुम्हारी खोई आँखोँ मेँ,
जैसे "दीप ~ स्तँभ" के समीप,
मँडराता जल !
मेरे दूर के सजन,
तुम ने अँधेरा ही रखा
तुम्हारे हाव भावोँ मेँ उभरा यातनोँ का किनारा
--- अलसाई दोपहरी मेँ,
मैँ, फिर उदास जाल फेँकता हूँ --
उस दरिया मेँ , जो
तुम्हारे नैया से नयनोँ मेँ कैद है !

रात के पँछी, पहले उगे तारोँ को,
चोँच मारते हैँ -ढर वे,
मेरी आत्मा की ही तरहा,
ढर दहक उठते हैँ !
रात, अपनी परछाईँ की ग़्होडी पर
सवार दौडती है ,
अपनी नीली फुनगी के
रेशम - सी लकीरोँ को छोडती हुई !
२) व्यथा - गीत :
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तुम्हारी याद आसपास फैली रात्रि से उभरती हुई
--नदिया का आक्रँद, जिद्दी बहाव लिये, सागर मेँ समाता हुआ
बँदरगाह पर सूने पडे गोदाम ज्यूँ प्रभात के धुँधलके मेँ
-और यह प्रस्थान - बेला सम्मुख, ओ छोड कर जाने वाले !

भीगे फूलोँके मुखसे बरसता जल, मेरी हृदय कारा पर,
टूटे हुए सामान का तल, भयानक गुफा, टूटी कश्ती की
-तुम्हीँ मेँ तो सारी उडाने, सारी लडाइयाँ, इक्ट्ठा थीँ
-तुम्हीँ से उभरे थे सारे गीत, मधुर गीत गाते पँछीयो के पर
-एक दूरी की तरहा, सब कुछ निगलता यथार्थ --
दरिया की तरह ! समुद्र की तरह ! डूबता सबकुछ, तुम मेँ
वह खुशी का पल, आवेग और चुम्बन का !
दीप - स्तँभ की भाँति प्रकाशित वह जादु - टोना !

उस वायुयान चालक की सी भीति, वाहन चालक का अँधापन,
भँवर का आँदोलित नशा, प्यार भरा, तुम्हीँ मेँ डूबता, सभी कुछ!-

शैशव के धूँधलके मेँ छिपी आत्मा, टूते पँखोँ - सी ,
ओ छूट जानेवाले, खोजनेवाला , है- खोया सा सब कुछ!
दुख की परिधि तुम -- जिजिविषा तुम
-- दुख से स्तँभित - तुम्हीँ मेँ डूब गया , सब कुछ !

परछाइयोँकी दीवारोँ को मैँने पीछे ठेला
--मेरी चाहतोँके आगे, करनी के आगे, और मैँ , चल पडा !
ओ जिस्म ! मेरा ही जिस्म ! सनम! तुझे चाहा और, खो दिया
-- मेरा हुक्म है तुम्हे , भीने लम्होँ मेँ आ जाओ ,
मेरे गीत नवाजते हैँ -बँद मर्तबानोँ मेँ सहेजा हुआ प्यार
- तुम मेँ सँजोया था --
और उस अकथ तबाही ने, तुम्ही को चकनाचूर किया !
वह स्याह घनघोर भयानकता, ऐकाकीपन, द्वीप की तरह
-और वहीँ तुम्हारी बाँहोँने सनम, मुझे, आ घेरा
--वहाँ भूख और प्यास थी और तुम, तृप्ति थीँ !
दुख था और थे पीडा के भग्न अवशेष , पर करिश्मा ,
तुम थीँ !ओ सजन! कैसे झेला था तुमने मुझे, कह दो
-- तुम्हारी आत्मा के मरुस्थल मेँ, तुम्हारी बाँहोँ के घेरे मेँ
-मेरी चाहत का नशा, कितना कम और घना था
कितना दारुण, कितना नशीला, तीव्र और अनिमेष!
वो मेरे बोसोँ के शम्शान, आग - अब भी बाकी है,
कब्र मेँ --फूलोँ से लगदे बाग, अब भी जल रहे हैँ,
परवाज उन्हेँ नोँच रहे हैँ !वह मिलन था
-- तीव्रता का,
अरमानोँ का -जहाँ हम मिलते रहे ,
गमख्वार होते रहे
-और वह पानी और आटे सी महीन चाहत ,
वो होँठोँ पर, लफ्ज्` कुछ, फुसफुसाते गुए
-यही था, अहलो करम्, यही मेरी चाहतोँ का सफर
-तुम्हीँ पे वीरान होती चाहत, तुम्हीँ पे उजडी मुहब्बत !
टूटे हुए, असबाब का सीना, तुम्हीँ मेँ सब कुछ दफन !
किस दर्द से तुनम नागँवारा, किस दर्द से, नावाकिफ ?
किस दर्द के दरिया मेँ तुम, डूबीँ न थीँ ?
इस मौज से, उस माँझी तक, तुम ने पुकारा ,
गीतोँ को सँवारा, कश्ती के सीने पे सवार,
नाखुदा की तरह
-- गुलोँ मेँ वह मुस्कुराना, झरनोँ मेँ बिखर जाना,
तुम्हारा,उस टूटे हुए, सामान के ढेर के नीचे,
खुले दारुण कुँएँ मेँ !
रँगहीन, अँधे, गोताखोर,, कमनसीब, निशानेबाज
भूले भटके, पथ - प्रदर्शक, तुम्हीँ मेँ था सब कुछ, फना !

यात्रा की प्रस्थान बेला मेँ, उस कठिन सर्द क्षण मेँ,
जिसे रात अपनी पाबँदीयोँ मेँ बाँध रखती है
समँदर का खुला पट - किनारोँ को हर ओर से घेरे हुए
और रह जाती हैँ, परछाइयाँ मेरी हथिलियोँ मेँ,
कसमासाती हुईँ --सब से दूर --- सभी से दूर
---इस बिदाई के पल मेँ !
आह ! मेरे, परित्यक्यत्त जीवन !!!
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दो ~ गुजराती गीतों का हिंदी काव्यानुवाद :
(१) कवि  કૃષ્ણ-રાધા / પ્રિયકાન્ત પ્રેમચંદ મણિયાર
(जन्म : २८-१-१९२९मृत्यु : २५-६-१९७६ ) 
कवि प्रियकांत मणियार का जन्म, अमरेली प्राँत के वीरमगाम स्थान मेँ हुआ  !  सुप्रसिध्ध आरती मेँ श्री कृष्ण व राधा के प्रति कवि की भक़्ति अपूर्व लालित्य लिये नये नये उपमा एवं प्रतीकोँ से सुसज्ज पदावली द्वारा अनोखा माधुर्य प्रदान कर रहीं  हैं।  प्रमुख काव्य सँग्रह - प्रतीक, अशब्द -रात्रि, प्रबल -गति, व्योमलिपि इत्यादि
प्रियकाँत  मणियार ~ परिचय : गुजरती भाषा में ~

પ્રિયકાંત મણિયાર (૨૪-૧-૧૯૨૭ થી ૨૫-૬-૧૯૭૬) ની આ અતિપ્રસિદ્ધ આરતી છે.  દરેક કવિસંમેલનના અંતે પ્રિયકાંત આ આરતી સ્વકંઠે અવશ્ય ગાતાં. પ્રિયકાંત જ્યારે ગીત લખે છે ત્યારે ખીલે છે. વિરમગામમાં જન્મ, અમરેલીના વતની અને અમદાવાદમાં વર્ષો સુધી  મણિયારનો વ્યવસાય એમણે કર્યો. સજીવ સૌન્દર્યચિત્રો દોરીને સજાવાયેલા ઘાટીલાં કાવ્યો નવીન પ્રતીકો અને લલિત પદાવલીથી વધુ ધ્યાનાકર્ષક બને છે.
કૃષ્ણ અને રાધા માટેનો એમનો મીરાં જેવો અદકેરો પ્રેમ અમનાં અસંખ્ય ગીતોમાં રજૂ થયો છે.  ‘નભ’થી ઉઘાડ પામીને આ કાવ્ય ‘લોચન’માં વિરમે એ દરમ્યાનમાં પ્રકૃતિથી  માનવ-મન સુધી પ્રેમભાવ અદભૂત રીતે વિસ્તરે છે.
કાવ્યસંગ્રહો : ‘પ્રતીક’, ‘અશબ્દ રાત્રિ’, ‘પ્રબલગતિ’, ‘વ્યોમલિપિ’ વિ.

कवि प्रियकांत मणियार की गुजराती कविता

આ નભ ઝૂક્યું તે કા’નજી ને ચાંદની તે રાધા રે.
આ સરવર જલ તે કા’નજી ને પોયણી તે રાધા રે.
આ બાગ ખીલ્યો તે કા’નજી ને લ્હેરી જતી તે રાધા રે.
આ પરવત શિખર કા’નજી ને કેડી ચડે તે રાધા રે.
આ ચાલ્યાં ચરણ તે કા’નજી ને પગલી પડે તે રાધા રે.
આ કેશ ગૂંથ્યા તે કા’નજી ને સેંથી પૂરી તે રાધા રે.
આ દીપ જલે તે કા’નજી ને આરતી તે રાધા રે.
આ લોચન મારાં કા’નજી ને નજરું જુએ તે રાધા રે.

प्रियकांत मणियार की गुजराती कविता का हिंदी अनुवाद :

"यह झुका हुआ नभ कान्हजी और चाँदनी हैँ राधा रे!
यह सरवर जल हैँ कान्हजी और पद्मपुष्प हैँ राधा रे!
यह खिला बाग है कान्हजी और लहरी बहे वो राधा रे!
यह चले चरण वो कान्हजी और पगछाप दीखे वो राधा रे!
" ये गूँथे केश हैँ कान्हजी और भरी माँग हैँ राधा रे! "
यह जलता दीप हैँ कान्हजी और आरती हैँ राधा रे ~
        ( २ )
गुजरात का सुप्रसिद्ध लोक गीत " मेंहदी रँग लाग्यो रे " ~
 
   हिन्दी अनुवाद ~
" ओ भाभी मोरी महावर रचाई ल्यो"
  मेहन्दी बोई थी मालव मेँ
  उसका रँग गया गुजरात रे,
  भाभी मेरी महावर रचाई लो !
   कुट पीस के भरी कटोरीयाँ,
  ओ भाभी रचालो ना तुम्हारे हाथ रे
    भाभी,  मेहँदी लगा लो !"
      पूरा  लोकगीत ~
तन है रूप की लोरी आंखों में मद अपार
घूंघट में यौवन की ज्वाला, पायल की  झंकार
लंबा आँचल चुनरी का, गजरों की बहार
लटक मटक चाल चलती, देखो गुर्जरी नार !
मेहंदी बोयी मालवे में, इस का रंग निखरा गुजरात
लाडला देवर लाया मेहंदी का बिरवा रे
आहा मेहंदी तेरा रंग लगा रे !
कूट पीस कर भरी कटोरी, भाभी अब रंग लो हाथ
आहा मेहंदी तेरा रंग लगा रे!
लंबा कोट , मूंछें बांकी,सिर पे पगड़ी लाल
एक एक बोल, तौल कर बोले, छैलछबीला गुजराती
तन छोटा पर मन बडा खमीरवन्त है जाति
भले ही लागूँ मै भोला भाला, मैँ हूँ छैलछबीला, गुजराती !
भाभी : इन हाथोँ को रँग के वीराँ क्या करूँ ?
इन्हेँ देखनेवाला गया है रे परदेस रे
हाय  ~ मेहंदी तेरा रंग लगा रे!
गुजराती शब्द ~

તન છે રૂપનું હાલરડું ને આંખે મદનો ભાર
ઘૂંઘટમાં જોબનની જ્વાળા ઝાંઝરનો ઝમકાર
લાંબો છેડો છાયલનો, ને ગજરો ભારો ભાર
લટકમટકની ચાલ ચાલતી જુઓ ગુર્જરી નાર
મેંદી તે વાવી માળવે ને એનો રંગ ગયો ગુજરાત રે
મેંદી રંગ લાગ્યો રે
નાનો દિયરડો લાડકો જે, કંઇ લાવ્યો મેંદીનો છોડ રે
… મેંદી …
વાટી ઘૂંટીને ભર્યો વાટકો ને ભાભી રંગો તમારા હાથ રે …
મેંદી
હે… લાંબો ડગલો, મૂછો વાંકડી, શિરે પાઘડી રાતી
બોલ બોલતો તોળી તોળી છેલછબીલો ગુજરાતી
હે॥ .......
તન છોટુ પણ મન મોટું, છે ખમીરવંતી જાતી
ભલે લાગતો ભોળો, હું છેલછબીલો ગુજરાતી
હાથ રંગીને વીરા શું રે કરું?
રે મેંદી રંગ લાગ્યો રે. more information : 
   ****  श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर***********************
 
श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर (१८६१ -१९४१ )
श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर की मूल बांग्ला कविता जन्मकथा : का अनुवाद ~
श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर (१८६१ -१९४१ ) काव्य पुस्तक "गीतांजलि "बांग्ला कवि  गुरूदेव #रवीन्द्रनाथ #टैगोर की सर्वाधिक प्रशंसित और पठित पुस्तक है। सं. १९१० में, विश्व प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार संस्था द्वारा विश्व के सर्वोत्तम साहित्य सृजन के लिए श्री  रवीन्द्रनाथ टैगौर को पुरस्कृत किया गया । तद्पश्चात  अपने समग्र  जीवन काल में वे भारतीय साहित्याकाश पर धूमकेतु सदृश्य छाए रहे। साहित्य की विभिन्न विधाओं, संगीत और चित्र कला में सतत् सृजनरत रहते हुए उन्होंने अन्तिम साँस तक सरस्वती की साधना की तथा भारतवासियों ने उन्हें ' गुरू देव'  के सम्बोधन से सम्मानित किया तो भारतवासियों के अगाध स्नेह स्वरूप वे सदा के लिए प्रतिष्ठित हो गए ।
प्रकृति, प्रेम, ईश्वर के प्रति निष्ठा, एवं  मानवतावादी मूल्यों के प्रति समर्पण भाव से सम्पन्न काव्य पुस्तक "गीतांजलि"  के सभी गीत,  पिछली एक सदी से बांग्लाभाषी जनों की आत्मा में रचे ~ बसे हुए हैं। रवींद्र संगीत इसी से उत्पन्न होकर आज एक सशक्त संगीत विधा कहलाता है। विभिन्न भाषाओं में हुए गीतांजलि के गीतों के
काव्य अनुवादों के माध्यम से, समस्त  विश्व के सह्रदय पाठक  अब गुरुदेव श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर जी की के भाव सभार गीतों व कविताओं का रसास्वादन कर संपन्न हो चुके हैं।प्रस्तुत अनुवाद हिंदी में भिन्न है कि इसमें मूल बांग्ला रचनाओं के गीतात्मकता को बरकरार रखा गया है, जो इन गीतों का अभिन्न हिस्सा है, इस गेयता के कारण आप इन गीतों को भलीभाँति याद रख सकते हैं। 

श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर की मूल बांग्ला कविता बँगाल के कवि रत्न, साहित्य के लिये, नोबल इनाम से सुशोभित, ख्याति प्राप्त, श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखी कविता ~ जन्मकथा : का काव्यानुवाद ~
           जन्मकथा :
" बच्चे ने पूछा माँ से , मैं कहाँ से आया माँ ? "
माँ ने कहा, " तुम मेरे जीवन के हर पल के संगी साथी हो !"
जब मैं स्वयं शिशु थी, खेलती थी गुडिया के संग, तब भी,
और जब शिवजी की पूजा किया करती थी तब भी,
आँसू  और मुस्कान के बीच बालक को,
कसकर, छाती से लिपटाए हुए, माँ ने कहा,

" जब मैंने देवता पूजे, उस वेदिका पर तुम्हीं  आसीन थे !
मेरे प्रेम, इच्छा और आशाओं में भी तुम्हीं तो थे !
और नानी माँ और अम्मा की भावनाओं में भी, तुम्हीं  थे !
ना जाने कितने समय से तुम छिपे रहे !
हमारी कुलदेवी की पवित्र मूर्ति में ,
हमारे पुरखों  की पुरानी हवेली मेँ तुम छिपे रहे !
जब मेरा यौवन पूर्ण पुष्प सा खिल उठा था,
तुम उसकी मदहोश करनेवाली मधु गँध थे !
मेरे हर अंग प्रत्यंग में तुम बसे हुए थे
 तुम्हीं में हरेक देवता बिराजे हुए थे
तुम, सर्वथा नवीन व प्राचीन हो !
उगते रवि की उम्र है तुम्हारी भी,
आनंद के महासिंधु की लहर पे सवार,
ब्रह्माण्ड के चिरंतन स्वप्न से ,
तुम अवतरित होकर आए थे।
अनिमेष द्रष्टि से देखकर भी
एक अद्भुत रहस्य रहे तुम !
जो मेरे होकर भी समस्त के हो,
एक आलिंगन में बध्ध, सम्बन्ध,
मेरे अपने शिशु , आए इस जग में,
इसी कारण मैं, व्यग्र हो, रो पड़ती हूँ,
जब, तुम मुझ से, दूर हो जाते हो...
कि कहीँ, जो समष्टि का है
उसे खो ना दूँ कहीँ !
कैसे सहेज बाँध रखूँ उसे ?
किस तिलिस्मी धागे से ?
अनुवाद :- लावण्या
Poem  : Birth Story : Original in Bengali
'Janmkatha ' by Rabindranath Tagore ~
Transcreation by : Kumud Biswas :
kid asks his mum,‘From where did I come,
Me where did you find?’
Holding him tight in an embrace
In tears and laughter
The mum replies,‘You were in my mind
As my deepest wish।
You were with me When I was a childA
nd played with my dolls।
When worshiping Shiva in the morning
I made and unmade you every moment।
You were with my deity on the altar
And with him I worshiped you too।
You were in my hopes and desires,
You were in my love,
And in the hearts of my mum and grand mum।
I don’t know how long You kept yourself hiding
In our age old home
In the lap of the goddess of our family
When I bloomed like a flower in my youth
You were in me like its sweet smell
With your softness and sweetness
You were in my every limb।
You are the darling of all gods
You are eternal yet new
You are of the same age as the morning Sun
From a universal dream
To me you came floating On the floods of joy
That eternally flows in this world।
Staring at you in wonder
I fail to unfold your mystery
How could one come only to me Who belongs to all?
Embracing your body with my body You have come
to this world as my kid
So I clasp you tightly in my breast
And cry when you are away for a moment
I always remain in fear I may loose
One who is the darling of the world।
I don’t know how shall I keep you
Binding in what magic bond।’

2 comments:

Sp Sudhesh said...

पाब्लो नरूदा , प्रियकान्त और रवीन्द्र् नाथ टैगोर की कविताओं का सफल अनुवाद कर आप ने सिद्ध किया कि आप एक सफल अनुवादिका भी हैं । मेरी बधाई ।

PBCHATURVEDI प्रसन्नवदन चतुर्वेदी said...

अनुवाद की बेहतरीन प्रस्तुति.....