Sunday, December 9, 2007

विहँगम पर्बत द्र्श्यावली

१०,००० फीट की ऊँचाई पर बादलोँ से घिरा पर्बत शिखर / स्थान: हवाई
हिमालय मेखला की विहँगम पर्बत द्र्श्यावली कँचनजँघा
विश्वका सर्वोच्च पर्बत शिखर : सागरमठा या ऐवेरेस्ट / Everest
जापान का मशहूर पर्बत: माउँट फिजी
हिमालय पर्बत शृँखला की एक और दुर्गम चोटी अन्नपूर्णा परबत

yea in my mind those mountains rise,
their perils dyed with evening's Rose,
yet my Ghost, sits at my Eye ,
and hungers for their untoubled snow !

Lyrics written by : Walter De la Mer

मेरे अँतरपट पर इन गिरिशृँगोँ की पडती छाया
साँध्य गुलाबोँ से रँजित है जिनकी भीषण दुर्गमता
फिर भी, मेरे प्राण पलक पर बैठ अकुलाते,
शांत शुभ्र हिम के प्यासे, है कैसी यह पागल ममता !


काव्य पँक्तियाँ : कवि स्व. पँडित नरेन्द्र शर्मा

7 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

ओह, ये दृष्य और ये डि ला मेयर की कविता - बहुत आकर्षण है इनमें।

Harshad Jangla said...

Lavanyaji
Beautiful pictures.
Equally nice poem.

Thanx & rgds.

पर्यानाद said...

पर्वत हमें देते हैं सीना तान कर खड़े होने का संदेश और तूफानों का सामना करने की हिम्‍मत. सागरमाथा का विहंगत दृश्‍य देख कर यूं लगा कि बादलों के बीच पहुच गए हैं. धन्‍यवाद यह नयनाभिराम दृश्‍यावली देखने का अवसर उपलब्‍ध कराने के लिए. कविताएं भी सुंदर चुनीं आपने.

Srijan Shilpi said...

नयनाभिराम, सुन्दर दृश्य।

कंचन सिंह चौहान said...

सुंदर परिदृश्य

Divine India said...

आदरणीय मैं'म,
विशाल पर्वतों के पद के नीचे लिखे उतनी ही व्यापक कविता… मै'म बहुत अच्छा लगा पढ़कर
कुछ सीखने को ही मिलता है ऐसे लोगों की
रचनाओं को पढ़कर।

Lavanyam - Antarman said...

आप सभी की टिप्पणी का बहुत बहुत शुक्रिया -
स स्नेह,
लावण्या