Tuesday, February 17, 2009

जन्मकथा


रवि बाबू का श्वेत श्याम छाया चित्र यहाँ वे अपनी डेस्कपर लिखते हुए दीखाई दे रहे हैँये कविता, जिसका शीर्षक है ~~ "जन्मकथा ", बँगाल के कवि रत्न, साहित्य के लिये, नोबल इनाम से सुशोभित, ख्याति प्राप्त, श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखी है । मेरा मानना है कि ये कविता, मूल बाँग्ला मेँ शायद इतनी मधुर व सारगर्भित होगी कि, इसे, हिन्दी अनुवाद मेँ ढालना, एक प्रकार की धृष्टता ही कहलायेगी । पर, वही काम, आज मैंने किया है !
      परँतु, इस कविता को, कई बार पढा है और हमेशा भारतीय मनोविज्ञान तथा दर्शन का पुट लिये, एक अलौकिक दिव्यता लिए, इस कविता की शुचिता तथा माँ के शिशु के प्रति अगाढ ममत्त्व के दर्शन से हमेँ जोडने की क्षमता रखती ये कविता मुझे अभिभूत करती रही है !
इसीलिये आज इसका हिन्दी अनुवाद आप सभी के सामने प्रस्तुत कर रही हूँ ...
एक बात और अभी अभी मैं, एक सुखद यात्रा से घर लौट कर आ गयी हूँ
यात्रा तथा उसकी सारी बातें, आगे लिखूंगी ...आज आपके सामने कविता का अन्ग्रेजी अनुवाद भी यहाँ दे रही हूँ -जो बडी दक्षता से किया गया है। 
आप श्री कुमुद बिस्वास जी के नाम पर अवश्य क्लिक करेँ - जो गहरे नीले रँगोँ के अक्षर मेँ अँग्रेज़ी कविता के उपर देख पायेँगे -

जन्मकथा :
" बच्चे ने पूछा माँ से , मैं कहाँ से आया माँ ? "
माँ ने कहा, " तुम मेरे जीवन के हर पल के संगी साथी हो !"
जब मैं स्वयं शिशु थी, खेलती थी गुडिया के संग , तब भी,
और जब शिवजी की पूजा किया करती थी तब भी,
आँसू  और मुस्कान के बीच बालक को,
कसकर, छाती से लिपटाए हुए, माँ ने कहा,
" जब मैंने देवता पूजे, उस वेदिका पर तुम्ही आसीन थे ,
मेरे प्रेम , इच्छा और आशाओं में भी तुम्ही तो थे !
और नानी माँ और अम्मा की भावनाओं में भी, तुम्ही थे !
ना जाने कितने समय से तुम छिपे रहे !
हमारी कुलदेवी की पवित्र मूर्ति में ,
हमारे पुरखो की पुरानी हवेली मेँ तुम छिपे रहे !
जब मेरा यौवन पूर्ण पुष्प सा खिल उठा था,
तुम उसकी मदहोश करनेवाली मधु गँध थे !
मेरे हर अंग प्रत्यंग में तुम बसे हुए थे
तुम्ही में हरेक देवता बिराजे हुए थे
तुम, सर्वथा नवीन व प्राचीन हो !
उगते रवि की उम्र है तुम्हारी भी,
आनंद के महासिंधु की लहर पे सवार,
ब्रह्माण्ड के चिरंतन स्वप्न से ,
तुम अवतरित होकर आए थे।
अनिमेष द्रष्टि से देखकर भी
एक अद्भुत रहस्य रहे तुम !
जो मेरे होकर भी समस्त के हो,
एक आलिंगन में बध्ध, सम्बन्ध,
मेरे अपने शिशु , आए इस जग में,
इसी कारण मैं , व्यग्र हो, रो पड़ती हूँ,
जब, तुम मुझ से, दूर हो जाते हो...
कि कहीँ, जो समष्टि का है
उसे खो ना दूँ कहीँ !
कैसे सहेज बाँध रखूँ उसे ?
किस तिलिस्मी धागे से ?
अनुवाद :
- लावण्या
Birth Story Original in Bengali –

'Janmkatha ' by Rabindranath Tagore ~
Transcreation by : Kumud Biswas :
kid asks his mum,‘From where did I come,
Me where did you find?’
Holding him tight in an embrace
In tears and laughter
The mum replies,‘You were in my mind
As my deepest wish।
You were with me When I was a childA
nd played with my dolls।
When worshiping Shiva in the morning
I made and unmade you every moment।
You were with my deity on the altar
And with him I worshiped you too।
You were in my hopes and desires,
You were in my love,
And in the hearts of my mum and grand mum।
I don’t know how long You kept yourself hiding
In our age old home
In the lap of the goddess of our family
When I bloomed like a flower in my youth
You were in me like its sweet smell
With your softness and sweetness
You were in my every limb।
You are the darling of all gods
You are eternal yet new
You are of the same age as the morning Sun
From a universal dream
To me you came floating On the floods of joy
That eternally flows in this world।
Staring at you in wonder
I fail to unfold your mystery
How could one come only to me Who belongs to all?
Embracing your body with my body You have come
to this world as my kid
So I clasp you tightly in my breast
And cry when you are away for a moment
I always remain in fear I may loose
One who is the darling of the world।
I don’t know how shall I keep you
Binding in what magic bond।’
(नवम्बर , २७ , २००५)

25 comments:

राज भाटिय़ा said...

लावण्यम् जी बहुत ही सुंदर लगी आप दुवारा प्रकाशित "जन्मकथा" ओर हिन्दी अनुवाद मै तो ओर भी ज्यादा सुंदर.
धन्यवाद

Surya said...

लावण्या जी यह तो बहुत ही सुंदर अनुवाद है, अपनी मधुर आवाज में कभी सुनाने की भी कृपा करें तो परमानन्द आ जाएगा .

सूर्या शर्मा पिट्सबर्ग से

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

लावण्या जी,
आपका अनुवाद बहुत सुंदर लगा.
काश सभी माता-पिता (और अन्य परिजन भी) निम्न वाक्य को समझ पाते तो शायद दुनिया की आधी समस्यायें अपने आप ही समाप्त हो जातीं - "जो मेरे होकर भी समस्त के हो"

समयचक्र said...

बहुत ही सुंदर अनुवाद है.धन्यवाद,

Harshad Jangla said...

Lavanya Di
A great translation with a great skill.
Thanx.
Harshad Jangla
Atlanta, USA

ताऊ रामपुरिया said...

गुरुदेव का लेखन तो अपने आप मे जादू ही है. आपका अनुवाद भी बहुत सुंदर लगा.

आपने बांग्ला से अनुवाद किया है या अंग्रेजी से? मैं सिर्फ़ इसलिये पूछ रहा हूं कि मेरे अनुमान से आपने अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद किया होगा. और अगर ऐसा है तो यह लाजवाब है. क्योंकी इसमे आप तृतिय पक्ष हो गई और विषय के साथ आप न्याय कर पाई हैं.

प्रथम चित्र अति मनमोहक लगा.

रामराम.

mehek said...

bahut sundar rachana

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

ताऊजी,
आप का अँदाजा सही है, अँग्रेजी से ही अनुदित है यह रचना -
सूर्या जी , अनुराग भाई,
हर्षद भाई,
राज भाई साहब
तथा महेन्द्र जी
महेक जी आप सभी का आभार .
मेरा प्रयास न सिर्फ मेरे मन को आनँद दे रहा है परँतु ये कवीन्द्र रवीन्द्र जी का जादू है जो आनँद की लहर बहा रही है -
- लावण्या

P.N. Subramanian said...

दोनों ही सुंदर लगे. हिन्दी में अनुवाद करना आसान नहीं रहा होगा. अंग्रेजी में भी बहुत सुंदर लगी. आभार.

कुश said...

कविताओ क़ी भावनाओ के अनुरूप आपने हो चित्र लगाया है वो तो अनुपम है.. आपका ब्लॉग इसीलिए सबसे हटकर है..

डॉ .अनुराग said...

निसंदेह एक प्रशंसा योग्य ओर मेहनत से किया हुआ कार्य है .अनुवाद को मै सबसे कठिन काम मानता हूँ .शब्दों के जरा से हेर फेर से मूल लेख में भरी परिवर्तन आ जाता है...आप बधाई की पात्र है.

नीरज गोस्वामी said...

लावण्या जी पढ़ते समय लगा ही नहीं की अनुवाद पढ़ रहे हैं...आप ने बहुत कुशलता से गुरुदेव की कविता का अनुवाद किया है...और कविता...उसकी प्रशंशा के लिए शब्द ही नहीं हैं मेरे पास....अद्भुत....

नीरज

अल्पना वर्मा said...

hindi anuvaad mein bhi yah bahut hi bhaavpurn lagi..aap ne safal anuvaad kiya hai.
sach mein is kavita mein...
mano-vigyan aur darshan dono hi nazar aatey hain.
" जब मैंने देवता पूजे, उस वेदिका पर तुम्ही आसीन थे ,

bahut hi adbhut prastuti!
abhaar sahit-

[aap ki yatra ke vivran ka bhi intzaar rahega.]

अभिषेक ओझा said...

अति सुंदर !
अपनी यात्रा के बारे में कुछ तो बता दिया होता. कम से कम जगह का नाम ही !

Arvind Mishra said...

अच्छा अनुवाद किया है आपने -पठनीय !

varsha said...

अद्भुत.
सृष्टि के विस्तार से जुड़े भारतीय दर्शन की कविता के लिए आभार .

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

कृपा है आपकी, मैने पहली बार पढ़ी गुरुदेव की यह रचना।
बहुत धन्यवाद।

Parul said...

saadhaaran sa prashn.. aksar hum uttar de nahi paatey iska.. bahut sundar anuvaad Di

hem pandey said...

कविता तो सुंदर है ही, आख़िर एक महान साहित्यकार की रचना है. लेकिन विशेष बात यह है कि अनुवाद ही मौलिक कविता का आनन्द दे रहा है. मूल कविता कितनी सुंदर होगी कल्पना की जा सकती है.

अनुपम अग्रवाल said...

बेहतरीन और बेहद सराहनीय प्रयास

कंचन सिंह चौहान said...

is anuvaad ko prastut karne ka dhanyavad Didi...!

swati said...

aapka anuvaad bahut hi anutha aur adbhut laga ........

pallavi trivedi said...

बेहद पवित्र और खूबसूरत रचना और उतना ही सुन्दर अनुवाद......

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आप सभी की स्नेहपूर्ण टीप्पणियोँ के लिये बहुत बहुत आभार !
- लावण्या

Pankaj Dhingra said...

यदि यह अनुवाद नहीं हुआ होता तो हम इसके स्पर्श से वंचित ही रह जाते... अद्भुत... अद्वितीय ....