Tuesday, February 24, 2009

आया है मुझे फ़िर याद वो जालिम, गुजरा ज़माना, बचपन का ..

प्लेन की छोटी सी खिडकी से दीखता आसमान सुफेद रूई के फाहोँ जैसे नर्म बादलोँ से अटा पडा ऐसा दीखता रहा ....
जब हम आँखोँ मेँ हमारी यात्रा को सँजोये, मन मेँ अनेक रीश्तेदारोँ और मित्रोँ से मिलने की स्मृतियाँ संजोए, अपने शहर की ओर लौट रहे थे और गुनगुना रहे थे ,
" आया है मुझे फ़िर याद वो जालिम, गुजरा ज़माना, बचपन का ... वो खेल वो साथी, वो झूले, वो दौड़ के कहना, आ छु ले ....हम आज तलक भी ना भूले, ....वो खेल पुराना बचपन का ...आया है मुझे फ़िर याद वो जालिम " ..........
चलेंगें क्या आप भी मेरे साथ ? उन पुरानी यादों की गलियों में ? ....
आपको फ्लैशबेक मेँ ले जाने से पहले, फिल्म आखिरी सीन से शुरु करुँ ? :)
क्या कहा ...हाँ ?
ये देखिये केलीफोर्नीया प्रांत, यु। एस। ऐ। के ...हवाई अड्डे पर खड़ी , उड़न तश्तरी जैसी ये इमारत , जो लोस -अन्जिलिस शहर का एक प्रतीक है ।
सबसे पहली बार इसे देखा था १९७४ , दीसंबर में !
मेरी प्रथम विमान यात्रा , बंबई से स्वीस एअर विमान से जीनीवा होते हुए , न्यू यार्क और फ़िर ' ऐल - ए ' !!
यही कहते हैँ लोस -एन्जिलिस को !
उस समय भी इसी ने स्वागत किया था और आज , उसे , बाय - बाय कह कर , घर की तरफ़ चल दीये थे ... मरम्मत हो रही थी ...इस की ...जैसा यहाँ दीख रहा है ...
और लोस - एंजिलिस में , शाम के सुरमई उजाले में , एक पेड़ उजालों को कैद करने की कोशिश में अपने में , सूर्य को समाने की असफल ,
चेष्टा करता हुआ दीख पडा था ।
जैसे हम अनेक मधुर यादों के सहारे, नन्हे से ह्रदय में , ना जाने कितने अपने और परायों को समाने की नाकामयाब - सी कोशिश करते हैं ...अन्तःतः रह जाता है, "स्वः " ...
शहर की घुमावदार पहाडी से नीचे जाते रास्ते, ऊपर और नीचे बसे घरों को जोड़ते हुए ... जहाँ यातायात , अनवरत बहता रहता है ..अमीर बस्तियां , अनजाने से लोग , पर सड़क सभी के लिए खुली , सदा आपके लिए , बिछी हुई , राह तकती ...जहाँ से, हम भी गुजरे थे कभी ....और आज भी वही मंजर है, वही रास्ते हैं और वही हम हैं !
फ्री - वे पर हमारी कार गुजरी ...देखा कार बेचनेवाले ग्राहकों को लुभाने के लिए ऐसे गरुड़ आकार के गुब्बारे "अमेरीकन ईगिल " स्वतँत्रता का प्रतीक, सजाये राह देख रहे थे - जब के , आजकल गाडियोँ की बिक्री कम हो कर घट गई है !
" लोस -एन्जोलिस " शहर मोशन पिक्चर्स इन्डस्ट्री का शहर भी कहलाता है - जगह जगह इसकी याद आती रहती है जब भी आप किसी ऐसे मकान के नज़दीक से गुजरते हो ..जहाँ उनकी ऑफिस हैं --
हाँ , ऐसे कई स्थल पहले भी देखे थे टूरिस्ट स्पोटज़ जैसे युनिवर्सल स्टुडीयो, डीज़नी वर्ल्ड, नोट्स बेरी फार्म, साँटा ~ मोनिका बीच , ( पेसेफिक महासागर पर स्थित एक )बीच ,जहाँ असँख्य पर्यटक और शहर के लोग रोज सैर करने, खेलने, व्यायाम करने सागर के जल मेँ स्कूबा डाइवीँग करने और फूटबोल खेलने रेत पर आ पहुँचते हैँ । और ये नज़ारा देखने लायक होता है ...मगर,
इस यात्रा का मकसद रीश्तेदारोँ और मित्रोँ से मुलाकात करने का था ...
और पोमोना की पहाडीयोँ पर मिलीँ डाक्टर उमी आँटी !
तकरीबन ३३ वर्षोँ के बाद !
साथ थी मेरे स्कुल की सहपाठी मेरी सहेली, 'निली ' !
हम साथ पढे, साथ -साथ स्कुल पास करके मीठीबाई, जुहु कोलिज मेँ दाखिला लिया और रोज ही एक साथ बम्बई की लोकल बस पे सवार होकर आते जाते ...
स्कुल जाते समय उसके पापा उसे मरुन रँग की मर्सीडीज़ कार मेँ छोडने जाया करते और वो रास्ते मेँ उतर जाती जब हमें , पैदल चलते देख लेती और उतरकर साथ चलती !
हम उससे कहते, " अरे बडी पागल है तू ! हमेँ भी काहे नहीँ बिठाल लेती अपने पापा से कह कर मर्सीडीज़ मेँ ? तू क्यूँ पैदल चल कर हमारे साथ स्कुल जाती है रे ? " और नीली मुस्कुराके रह जाती !
आज भी मेरी निली की मुस्कान वैसी ही सौम्य है जैसी ३३ साल पहले थी !
( चित्र में , नीली , डाक्टर उमी आंटी और मैं )
निली की छोटी बहन गीतु की २ बेटियाँ और बेटा श्याम और हम दोनोँ सहेलियाँ / मौसियाँ
निली के बापुजी :
बापुजी ने हैद्राबाद-सिँकदराबाद शहर के सीमावर्ती इलाके मेँ १६ एकड जमीन खरीदकर अँगूर के बाग भी लगाये थे जहाँ हमने एक गर्मी की छुट्टीयाँ बिताईँ थीँ - और बडे बडे पानी के कुँड मेँ तैरना सीखा था !! ;-) एक बहुत भव्य पुरानी हवेलीनुमा मकान था जहाँ हम रहे थे और खूब रँग पक्का करके बम्बई लौटे थे उसकी यादेँ भी ताज़ा हो गईँ !
( चित्र में : बापुजी : और हम दोनोँ सहेलियाँ )मेरे पति , दीपक जी भी हमारी स्कुल में सहपाठी थे और हम सभी में मित्रता थी -- हम लोग ३३ वर्षों बाद फ़िर एक साथ मुस्कुरा रहे हैं - चूंके निली , शादी के बाद न्यू जीलैंड चली गयी थी ...उसके पति वहीं जन्मे थे और ऐसे लोगों को ' किवी ' कहते हैं ..मतलब नेटिव !! (those who are native born in New Zealand ) सच , बहुत यादगार मिलन था हम लोगों का !!
लोस - एन्जिलिस पहुँचने से पहले हम फीनीक्स शहर मेँ रुके जहाँ हमारे समधी जी का घर है और वहीँ मुझसे मिलने आये रेल्वे के रीटायर्ड अधिकारी रह चुके
श्री प्रकाश शर्मा जी जिनकी ऊम्र ८५ वर्ष है उनका धेवता रवि नानाजी को लेकर आया ! वे मेरी बडी दीदी गायत्री जी की ननदके देवर हैँ !
वे, कविता भी लिखते हैँ --
हमारी बहुरानी मोनिका के नानाजी व नानी जी भी देहली से आये हुए थे उन सभी के साथ - चित्र में, श्री प्रकाश जी, दीपक जी, नानाजी काली टोपी पहने हुए, काला चश्मा लगाए हमारे समधी श्री करण भाई साहब , आगे मैं, नन्ही माया, नानी जी और श्रीमती अनीता जी ... हमें , हमारे इस बृहद परिवार से मिलना बहुत सुखद लगा !
इस बार हम फीनीक्स शहर में और भी कई मित्र व रिश्तेदारों से मिले ....
यात्रा के दिन पंख लगाए उड़ गए और हम भी उड़ते हुए मानो पलक झपकते , फ़िर घर आ गए !
मन में यादों को बसाए और वादा करके की ..फ़िर मिलेंगे ... जल्दी ही हम , दुबारा मिलेंगे ....
समय का चक्र , ऐसे ही घूमता रहता है ...
और फ़िर ये गीत याद आ गया ,
" काल का पहिया घूमे भैया , राम कृष्ण हरी ...राम कृष्ण हरी ....."
यात्रा पर चलने के लिए, आपका शुक्रिया ....
क्या पता वक्त के किसी मोड़ पर , हम मिल जाएँ ?
आशा है, आप को राम कृष्ण हरी , सुख शांति से रखें ॥
तब तक, खुदा हाफिज़ ...........
-- लावण्या










19 comments:

उन्मुक्त said...

सहेलियों, परिवारजनों से मिल कर अच्छा लगा।

Harshad Jangla said...

Lavanya Di

Wonderful Yatra, Nice Pictures and Interesting writings.
Thanx for sharing.
-Harshad Jangla
Atlanta, USA

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

चित्र कथा बहुत सुंदर दिखी . सुंदर चित्र सुंदर वर्णन .

Arvind Mishra said...

मेमोरीज येट ग्रीन ! अच्छा लगा ! आपसे सबसे एकसाथ मिलके ! खाएं पियें जीयें हंस हंस के ! शुभकामनाएं लिए सबके !

mehek said...

bahut achhe yaadon ke badal sundar

P.N. Subramanian said...

अच्छा लगा आपके LA और फिनिक्स का यात्रा विवरण. वर्षों बाद का मिलन कितना सुखदायी होता है! आभार.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

हम भी आपके साथ साथ इस चित्र यात्रा के जरिये घूम लिए बहुत बढ़िया

संगीता पुरी said...

आपके पोस्‍ट के साथ साथ हम भी लास एंजिल्‍स और फिनिक्‍स घूम आए...आपके चित्र अच्‍छे लगे...विवरण भी सुंदर था...अपने लोगों से मिलने का ऐसा ही अहसास होता है।

ताऊ रामपुरिया said...

आपका अभी का यात्रा वृतांत और पुरानी यादों का खजाना बहुत ही शुकुन दायक लगा. आप हमेशा बहुत ही अच्छे चित्रों और मधुर भाषा में लिखती हैं कि ऐसा लगने लगता है कि हम भी आपके साथ साथ हैं. बहुत शुभकामनाएं आपको.

रामराम.

राज भाटिय़ा said...

लावण्यम् जी यही सब अनुभुतिया हमे भी होती है जब हम भारत जाते है, ओर फ़िर वहा से वापिस आते तो भी, बहुत ही सुंदर चित्रो से सजाया आप ने यादो को, बहुत प्यारी लगी आप की यह यादे.
धन्यवाद

अल्पना वर्मा said...

आप ने तो आज खूब दूर की सैर करा दी और इतने सुन्दर चित्र भी दिखाए.आप के परिचित और परिवार जनों से मिल कर अच्छा लगा.
सच है बीते हुए पल कहाँ बीतते हैं वो तो हमेशा यादों में साथ रहते हैं.
अपनी सुन्दर यादों को हमसे बांटने के लिए शुक्रिया.

रंजना said...

आभार,अपने संस्मरण और परिजनों के विवरण हमारे साथ बांटने के लिए..बड़ा अच्छा लगा....

दिगम्बर नासवा said...

लावण्यम् जी
आपके साथ साथ, आपकी यादों के साथ साथ हमने भी सैर कर ली आपके शहर की, मसूस किया ३३ सालों में आये बदलाव को इस संसार में. सुखद यात्राओं के स्मरण भी उतने ही सुखद होते हैं.
आपके चित्र आपकी फोटोग्राफी कला को बखूबी दर्शाते हैं

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

अच्छा लगा जी पोस्ट देख-पढ़ कर।

आशुतोष दुबे "सादिक" said...

सुंदर चित्र सुंदर वर्णन .

हिन्दी साहित्य .....प्रयोग की दृष्टि से

डॉ .अनुराग said...

यादो के आकाश में आज आपका प्लेन देखा ...कई रंगों से रंग दिया था आसमान को इसने ...हर रंग की अपनी महक ..प्यार .जज्बा....अहसास...आज ही पत्नी से आपके बारे में बात कर रहा था .आपके स्नेहमयी व्यवहार की...इश्वर आपको ढेरो खुशिया दे....

Science Bloggers Association said...

अरे वाह, आपके बहाने हम भी वर्चुअल ही सही, कितनी जगह की सैर कर आए।

दिलीप कवठेकर said...

गाना जितना अच्छा है, उतना ही अच्छा है यह यात्रा वृत्तांत, और खुशनुमा रंगीनीयां सिमटे हुए चित्र!!

आप नें हम सब को अपने परिवार का एक अंग समझा, इसके लिये कृतार्थ हूं. यूंही जाजम बिछती रहे, आपकी यादों की जुगाली के रस निष्पत्ती को हम भी मेहसूस करें. कुछ हमारे आंखों के कोने भी भीगे, कुछ यादों के पंखों पर सवार हम भी उड आये....दिली सुकून के लिये और कोइ सामां चाहिये भला?

nalini said...

Lavanya it is beautiful.Apne to yaden fir se yaad dila de! It was touching.Thank you.