Monday, April 6, 2009

" पैसा फेँको, तमाशा देखो "

आप इस चित्र को देख कर सोच रहे हैं ना कि ये महिला कौन हैं ?
चलिए , नाम बता दूँ इनका - ( चूंकि ये पहेली वाली पोस्ट नही है :)
.............. ये हैं " समता सागर " और अब ये नीचे के चित्र में जो कन्या है ,
उनका नाम है " रुबिना डायलियक " देख लिया ना इन्हें ?
अब चलिए आगे बढ़ते हैं ..........
ये ऊपर की तस्वीर में , ' रुबीना ' है !
आजकल ये "बुध्धू बक्से ' के जरिए , यहां हमारे ड्राइंग रूम मे,
रोजाना आ पहुंचतीं हैं !!
नहीं ...नहीं ... ये कोई , आश्चर्य की बात नहीं है ...
" जी टी वी " के एक सीरियल में ये नायिका के पात्र में हैं !
जिसे मैं देखती हूँ और दुनिया भर में जहाँ ये " जी टीवी " प्रसारित होता होगा , सभी जगहों पे ये दोनों ही पहुँचते होंगें !
कथा का नाम है, " छोटी बहू " ( सिंदूर बिन सुहागिन :)
अब मुझे ये शो क्यूं पसंद है , बताऊँ ?
तब कारण है इसकी कथा , श्री कृष्ण की आराधना में अपना सर्वस्व भूल जानेवाली इस कन्या " राधिका " की कथा पे आधारित है
जिसे , वृन्दावन, मथुरा तथा दिल्ली के लोकेशन पर ,
वहाँ के मन्दिर, नदी , तालाब , पहाडी , घर, बाजार इत्यादी पे फिल्माया गया है ( अब शूटिंग कहीं भी हो दिखाते यही हैं ना :-)
और हमने कहाँ मथुरा वृन्दावन के दर्शन किए हैं जो हम सच और झूठ का भेद ,
जान पाते !!
बस ... यही सारा मेरे मन को भा गया है --
कृष्ण भक्ति में डूबे हुए बृजवासी , भले लगते हैं !
राधिका की भक्ति निर्मल लगती है
और कथानक उत्सुकता बनाए रखता है !
........आगे की श्री हरे मुरारी ही जाने !!
देखिये , इस सुंदर बाला की भोली मुस्कान , 'राधिका ' के रूप में ..
जी हाँ, ये नीचे के चित्र में , 'समता सागर जी ' ही हैं !
माँ देवकी के रोल में !
माथे पे सिंदूर की बड़ी बिंदिया दमक रही है,
पूरी मांग भी लाल कुमकुम से भरी हुई ,
सूती साडी बांधे , गरिमामयी मिसेज़ शास्त्री ,
डेनिम के जेच्केट और स्कर्ट से निकल कर,
इमेज बदले हुए , वाकई , मध्य भारत की
( सौ रीता तथा श्री ज्ञान भाई साहब पांडे के शब्दों में कहूं तब ,
अच्छी खासी " यूपोरियन " दिख रहीं हैं !
सच में हम लोग टीवी मीडिया तथा तकनिकी संसाधनों के जरिए
एक " ग्लोबल ग्राम " में रहने लगे हैं !
राजनीति हो या फिल्म , समाचार प्रसार इतना शीघ्र होता है कि , आज ओबामा टर्की पहुंचे नही के , विश्व भर में , ये न्यूज़ ' ब्रेकिंग न्यूज़ ' बनके फ़ैल जाती है !
अच्छा , बुरा सभी है -
फिल्म : आम जनता को प्रभावित करती है और साथ साथ आम जीवन से अक्स भी चुनती है, अपने रंग भर के , नए चित्र पेश करती है ...समाज की हर नस को पकडे रहती है फिल्में क्यूंकि , जनता जनार्दन , तभी अपना खून पसीने से , श्रम से कमाया धन , अँटी ढीली करके खर्च करती है ..." पैसा फेंको, तमाशा देखो " ....
अब ये नीचे भारतीय फिल्मी कलाकार हैं, करीना , सैफ , सुनहरे बाल लगाए और पश्चिम की पोशाक में सजे हुए हैं
और ये नीचे के चित्र में " श्री " सीरीयल में श्री की भाभी बनी हैं ! ( नाम पता नही :) मगर ये सारा समय, श्री की चिंता में , यहाँ से वहाँ, दौड़ भाग करतीं दीखाई देतीं हैं ! :)
हैं बड़ी प्यारी , भोली - भाली सी ...शायद आपने भी इन्हे देखा हो !
सीरीयल में एक " गुमनाम प्रेतात्मा " भी है , जिसने बेचारी "श्री ' का नव विवाहीत जीवन दूभर किया हुआ है । !
अब आगे की कथा आप , "जी टीवी ' पे देखियेगा :) हम नही ना बतायेंगें ...
मुझे कभी खुशी होती है, कभी गम !
हाँ , बिल्कुल हिन्दी फिल्मों की तरह ही !
जब देखती हूँ 'ग्लोबल ग्राम ' में अब इन्फ्लुएंस देश - विदेश की , कड़ी सीमा का अतिक्रमण करते हुए जन जन के मन को नए रंग देकर , नयी अनुभूतियाँ देने लगा है ! जिसका उदाहरण है ये अन्तिम चित्र : ये गोरी कन्याएं , ' बोलीवुड' से प्रभावित नृत्य करतीं हैं और उनकी मंडळी का नाम रखा है, " सिल्क रोड डांस " !
जो सिल्क रोड भारत से सिल्क & स्पाइसेज़ ले जाने के लिए इस्तेमाल किया गया था और परदेस से कारवाँ चल कर भारत आए थे आज , उसी भारत से इन्फ्लुएंस या ' भारतीयता के पहलू अपना असर ' दूर दराज की प्रजा तथा जन मानस तक पहुचा रहे हैं । और ये असर , उलट कर , भारतीय जनता को भी दूर देशों से वहाँ के असर या इन्फ्लुएंस देने लगी है --
ये सारा चुपके से हो रहा है ..जिसे ' बाजारीकरण ' भी कहते हैं !
" ग्लोबलाइजेशन !! " ये भी कहते हैं !!
अब आप पे निर्भर है , आप बहार की सभ्यता / संस्कृति से क्या अपनाना चाहते हैं और अपना क्या देना चाहते हैं !
वैश्विक संचार माद्यम त्वरित गति से , विश्व को पास लाने में सक्रीय है
.......हमारा हिन्दी ब्लॉग जगत भी इस मुहीम का हिस्सा है .....
जहाँ हम नित नए , विविध , अनदेखे, अनजाने स्थल तथा विषय से ,
अवगत होते हैं ...
" हम चाहें या न चाहें , हमराही बना लेतीं हैं हमको जीवन की राहें "
फ़िल्म : फ़िर भी
शब्द : स्व पण्डित नरेन्द्र शर्मा
आशा है, आप २१ वी सदी की संचार क्रान्ति से जुड़ कर , इसका लाभ उठा रहे हैं ॥
आप के क्या विचार हैं ? ये बदलाव जारी रहेगा ? भारत बदलेगा ? या विश्व बदलेगा ? ...कहीयेगा ...
- लावण्या






Posted by Picasa

22 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अच्छी जानकारियाँ दी हैं।
बधाई।

ताऊ रामपुरिया said...

अब आप पे निर्भर है , आप बहार की सभ्यता / संस्कृति से क्या अपनाना चाहते हैं और अपना क्या देना चाहते हैं !
वैश्विक संचार माद्यम त्वरित गति से , विश्व को पास लाने में सक्रीय है
.......हमारा हिन्दी ब्लॉग जगत भी इस मुहीम का हिस्सा है .....
जहाँ हम नित नए , विविध , अनदेखे, अनजाने स्थल तथा विषय से ,
अवगत होते हैं ...

बहुत सुंदर आलेख लिखा आपने. मुझे तो इस क्रांति पूरा विश्व ही बदलता लग रहा है. कोई अकेला ही कैसे बदलेगा. ये तो संचार क्रांति की
आंधी है.

रामराम.

mehek said...

sunder lekh

मुनीश ( munish ) said...

Both will change! Infact change is the only stable factor. 'Sansar' in Sanskrit, literally means 'one which is alvez moving'--'sam sarti yah samsaarah'.
Recently,heard of a blog-argument involving u. Lavanya ji u belong to a noble fold & u'll alvez find lot of supporters for u and count me among them . I do not know the details of arguement,but being a fan of ur father's poetry i thought of expressing solidarity with u .Jai Hind.

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत अच्छी खबर \ सच से अवगत कराया है ,लेकिन ये सीरियल वाली इतनी लम्बी अंतहीन कहानी लेकर चलतें हैं कि अन्ततः लोग बोर हो जातें है . आज भी महिलाओं को बेचारा बनानें में इनकी प्रमुख भूमिका है .जिस सीरियल का आपने जिक्र किया है उसमें 'समता सागर जी कितनी बेचारी और लाचार की भूमिका में हरदम नजर आतीं हैं .

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पहले यह तय करना आना चाहिए कि हमें क्या लेना चाहिए और क्या देना चाहिए?

संगीता पुरी said...

सच को दर्शाता सुंदर आलेख ... आज सब २१ वी सदी की संचार क्रान्ति से जुड़ कर , इसका लाभ उठा रहे हैं ... पर इसमें सही और गलत दोनों का ही प्रचार प्रसार तेजी से हो रहा है।

अल्पना वर्मा said...

'पंडित जी की पंक्तियाँ-
आज भी उतनी ही सही हैं-
'हम चाहें या न चाहें , हमराही बना लेतीं हैं हमको जीवन की राहें "


यह स्थिति कभी बदलेगी नहीं.
मैं टी वी सीरियल नहीं देखती और जी टी वी तो पसंद नहीं है. इस लिए इन चरित्रों पर क्या कहूँ.
हाँ यह तो है की फिल्में..टी वी के प्रोग्राम हमारे सभी के जीवन पर असर करते हैं.
जिस विषय पर लोग कभी बात करना पसंद नहीं करते थे उस विषय पर ' दोस्ताना [नयी]जैसी फिल्में बेधड़क आने लगी हैं. तो क्या कहीये?
जैसा लोग देखना चाहते हैं वैसा ही उन्हें दिखाया जाता है [vice-versa]

Dr. Smt. ajit gupta said...

मुझे 11 सितम्‍बर का स्‍मरण होता है। उस दिन दो घटनाएं घटित हुई थीं। एक थी 11 सितम्‍बर, जब विवेकानन्‍द शिकागो गए थे धर्म सम्‍मेलन में। उस समय ईसाइयों की मंशा थी कि इस सम्‍मेलन के माध्‍यम से हम यह सिद्ध कर देंगे कि हमारा धर्म ही महान है लेकिन विवेकानन्‍द के सम्‍बोधन ने ही भारतीय संस्‍कृति के दर्शन करा दिए और उनके मंसूबे धरे रह गए। दूसरा 11 सितम्‍बर को अमेरिका के वर्ल्‍ड ट्रेड सेन्‍टर पर हमला हुआ तब भी दुनिया को भारतीय संस्‍कृति का ही स्‍मरण हुआ जिसने विश्‍व बंधुत्‍व की और चराचर जगत की सुरक्षा की बात को अपना मूल माना है। अत: कोई भी दर्शन हमें चकाचौंध तो कर सकता है लेकिन हमें मिटा नहीं सकता। आज भारतीय संस्‍कृति की अवधारणा को दुनिया समझने लगी है और विदेशों में बसे भारतीय ही इस संस्‍कृति को पुन: स्‍थापित करेंगे ऐसा मेरा विश्‍वास है।

राधिका उमडे़कर बुधकर said...

अरे वाह लावण्या जी ये धारावाहिक जी टीवी पर किस समय प्रसारित होता हैं ,मैं जरुर देखूंगी :-)काफी मनोरंजक पोस्ट के लिए बधाई

डॉ .अनुराग said...

हिंदी सीरियल से हम दूर है लावण्या जी.कभी कभी रियल पर सरकार की दुनिया जरूर देख लेते है

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

.......हमारा हिन्दी ब्लॉग जगत भी इस मुहीम का हिस्सा है .....
जहाँ हम नित नए , विविध , अनदेखे, अनजाने स्थल तथा विषय से ,
अवगत होते हैं ...
" हम चाहें या न चाहें , हमराही बना लेतीं हैं हमको जीवन की राहें "

-------
बिल्कुल सटीक कहा आपने!

दिगम्बर नासवा said...

परिवर्तन संसार का नियम है............गीता में यह बात अबसे हजारों साल पहले ही लिखी गयी है............हम भारत वासी तो इस बात को इतने गहरे से मानते हैं की आभास ही नहीं होता परिवर्तन का............दिनिया बदलेगी, भारत बदलेगा.........ये तो निश्चित ही है .................सार्थक पोस्ट है आपकी

Sanchaar kranti इस गति को और भी तेज कर देगी

अनिल कान्त : said...

:)

Arvind Mishra said...

बिलकुल सही कहा आपने हम सच में एक वैश्विक संस्कृति के द्रष्टा और उपभोक्ता बनते जा रहे हैं !

vijaymaudgill said...

लावण्या जी मैं सीरियल नहीं देखता। क्योंकि फालतू चीज़ें देखना मुझे पसंद नहीं।

रंजना said...

सुन्दर आलेख !!! सोचने के लिए जो आपने दिया है,आशा है लोग उसपर विचार करेंगे...

वैश्वीकरण ने हमारे सामने जिस तरह से पूरे विश्व की सभ्यता संस्कृति को परोसकर रख दिया है,इसमें से अब यह पूरी तरह हमारे ऊपर है कि हम अपने लिए क्या चुनकर उठाना पसंद करते हैं.

P.N. Subramanian said...

मनोरंजक पोस्ट. हम तो सीरियल देखते भी नहीं और उसके लिए समय भी नहीं है. ब्लोग्स के माध्यम से ही इस संचार क्रांति से जुड़े हुए हैं.

दर्पण साह 'दर्शन' said...

change is a continuous process !! so it will change for sure!! don't know for good or bot bad tough . But let's hope better and prepare for the worst !!

good post :)

Harshad Jangla said...

Lavanya Di
Interesting write up.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

प्रेम सागर सिंह [Prem Sagar Singh] said...

आपकी अभिव्यक्ति अच्छी है, कारवाँ जारी रखें। आभार....

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अप सभी के यहाँ आकर अपनी बहुमूल्य टीप्पणी तथा समय देने के लिये बहुत आभार
- लावण्या