Tuesday, April 21, 2009

बड़े मामा जी की यादें

मेरे ननिहाल के सदस्यों की तस्वीर

अब आपको बतला दूं कि, इस पुरानी तस्वीर में , मध्य में मेरे नाना जी श्रीमान गुलाबदास गोदीवाला जी हैं जिनकी गोद में , बड़े मामाजी की बिटिया , रचना है। नानाजी के एक तरफ़ बड़ी मामी जी , श्रीमती धन गौरी जी हैं और दूसरी तरफ़ , मेरी नानी जी , श्रीमती कपिला जी हैं जिनकी गोद में , मैं हूँ ! नानी जी की बगल में , मेरी अम्मा श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा हैं

अम्मा के ठीक पीछे , सबसे बड़े मामा जी श्री बालकृष्ण गोदीवाला खड़े हैं ! जिन्हें हम सभी , प्यार से " बाबर मामा " कहा करते थे। वे ब्रिटीश समय के बंबई में, एक , अग्नि शामक दस्ते में काम करते थे।

उन्होंने ये किस्सा बतलाया था जब बंबई बंदरगाह में खड़े एक बहुत बड़े जहाज पर , बम विस्फोट हुआ था।

मामाजी के अग्नि शामक दल को भी वहाँ भेजा गया था जब वहाँ उपरी डेक पर आग लगी हुई थी । मामा जी के साथ , एक अँगरेज़ गोरा अफसर भी खडा था । बाबर मामा ने , समयसूचकता से , उसे भी अरब समुद्र के गहरे जल में , धक्का मार कर गिराया और उसके पीछे पीछे, वे ख़ुद भी , पानी में कूद गए थे ! दोनों की जान बच गयी थी जब की कई दूसरों की हालत गंभीर हो गयी थी। कुछ घायल थे और कुछ जान गँवा बैठे थे।

बाबर मामा अकसर , खाखी , आधी पतलून ही पहना करते थे । ख़ास तौर से बंबई की महा भयंकर , मूसलाधार बरखा के दिनों में !

जून माह के मध्य से दशहरे तक , बंबई , बारीश की चपेट में , बस एक पानी का सैलाब सी नगरी , नज़र आती है । वे हमें रेलवे स्टेशन तक कई दफे छोड़ने आते और ठीक स्टेशन के सामने , बस कंडक्टर को जोरों से " सी ...श .." जैसी आवाज़ में कड़क होकर पुकारते और वो बस वहीं रोक देता था ! हम बहुत प्रसन्न होते और खूब हँसते भी और उतर कर , २ मिनटों में , स्टेशन तक पहुँच जाते ! शायद वे पुलिस अधिकारी से लगे हों उस बस कंडक्टर को !

बाबर मामा के बारे में , मेरी अम्मा बतलातीं थीं , के जन्म के समय, उनका वजन १३ पाउंड था ! और मेरी " बा " माने नानी जी , सिर्फ़ १४ वर्ष की थीं ! उन्हें जन्म देकर " बा" २ दिनों तक , बेसुध - सी रहीं थीं ! जन्म से ही इतने , हट्टे ~ कट्टे , बाबर मामा जी, हमेशा बेहद स्ट्रोंग बने रहे । उसका एक और वाक़या है, जब अम्मा के बेबी होनेवाला था और वे लोग अस्पताल पहुंचे । अम्मा चल नहीं पा रहीं थीं और मामा जी ने अम्मा को उसी अवस्था में, हलके से फूल की तरह उठा लिया था और तीन मंजिल चढ़ते हुए , डाक्टर के सामने ले गए थे। ऐसे ही कई किस्से हैं मेरे सबसे बड़े मामा जी , श्री बालकृष्ण जी वल्द " बाबर मामा जी " के बारे में !

वे बा और नाना जी के संग , ५५ साल से भी ज्यादा , एक ही घर में, बंबई के बांद्रा उप नगर के अपने "कपिल - वास्तु " घर में , आबाद रहे !

भरी उमर में , ८७ वर्ष के हुए जब उनका देहांत हुआ ।

उपरोक्त चित्र में, उनकी सबसे बड़ी पुत्री माधुरी उनके बगल में हैं । और माधुरी जी के बगल में, सबसे छोटे मामा जी, श्री राजेन्द्र गुलाब दास गोदीवाला हैं।

उन्हें हम लोग , राजू मामा कह कर बुलाते थे ....

उनकी कथा भी बहुत रोचक है ....

आप पढ़ना चाहेंगें क्या ? तब प्लीज़ देखिये ये लिंक ..........

मेरे राजू मामा जी , विनोबा भावे जी के साथ " भू दान यज्ञ " में भी हिस्सा ले चुके थे और गुजरात के कई ग्रामों में , रास्ते बनाने से लेकर, स्कुल , भी बनाया करते थे ।

उनका विवाह कुमारी शीला देशपांडे जी के साथ हुआ था । जिनकी बड़ी बहन, कुसुम ताई देशपांडे , आजीवन अविवाहीत रहीं और विनोबा जी के आश्रम का संचालन किया करतीं थीं ।

राजू मामा जी और शीला मामी का ब्याह कैसे हुआ उसकी कथा रोचक है, आप भी देखिये ,

mag http://www।abhivyakti-hindi।org/visheshank/navvarsh/vinoba।htm

आज इतना ही ............

आशा है, आप को इन से मिलना अच्छा लगा होगा ।

आपके विचार अवश्य लिखियेगा ...बहुत स्नेह सहित,

- लावण्या

22 comments:

विजय गौड़ said...

बहुत ही आत्मीय संस्मरण है। अच्छा लगा।

ताऊ रामपुरिया said...

बाबर मामाजी के बारे मे पहले भी पढ चुके हैं, बाबर मामाजी के किस्से हमेशा ही मजेदार होते हैं, आगे भी आपके पारिवारिक लोगों के बारे मे पढना अच्छा लगेगा.

पर मुझे बाबर मामाजी के किस्से पढना ज्यादा मनोरंजक लगता है, नामकरण भी आप लोगों ने जोरदार किया हुआ है उनका..उपर से आपकी लेखन शैली के क्या कहने?

ब्हुत शुभकामनाएं.

रामराम.

Arvind Mishra said...

स्वर्णिम यादें !

"अर्श" said...

लावण्या दी नमस्कार,
आप मेरे ब्लॉग पे आई बहोत ही अच्छा लगा .. हलाकि मैं थोडा सा असमंजस में हूँ के मैं आपको क्या दीदी कहूँ या क्या कहूँ क्यूँ के मेरे गुरु देव श्री पंकज सुबीर जी भी आपको दीदी बुलाते है तो क्या मैं बुला सकता हूँ...? वेसे आपका ब्लॉग पढा बहोत ही खूबसूरती से आपने अपनी स्वर्णिम यादों को संजो के रखा है और उसे बड़े ही करीने से लिखा है आपने... बहोत बहोत बधाई आपको ...
आपका प्यार और आशीर्वाद यूँ ही मुझे मिलता रहेगा यही उम्मीद करता हूँ ..
आभार
आपका
अर्श

L.Goswami said...

पढ़कर अच्छा लगा ..क्या पुराने दिन सभी के एक से होते हैं ..स्वर्णिम !!

पारुल "पुखराज" said...

black n white chitr badey acchey lagtey hain di :)

नीरज गोस्वामी said...

आपके परिवार जन से मिल कर बहुत अच्छा लगा...सभी विलक्षण प्रतिभा वान और सुन्दर हैं...पारुल जी ने सच कहा श्वेत श्याम चित्रों का कोई जवाब नहीं.
नीरज

Abhishek Ojha said...

आपकी बचपन की सुनहरी यादों में हम भी गोता लगा आये. आपके मामाजी से मिलना सुखद रहा. और ये नीचे वाली तस्वीर तो बड़ी क्यूट है :-)

Harshad Jangla said...

Lavanya Di
Enjoyed the golden memories with great pictures.It is always good feelings to read anything regarding Mumbai!
Thanx for sharing.
-Harshad Jangla
Atlanta, USA

Alpana Verma said...

आपने अपने आत्मीय संस्मरण हम से बांटे,और साथ में इतनी सुन्दर सुन्दर तस्वीरें भी हम से बांटीं ,ख़ास कर नीचे दी गयी बहनों वाली तस्वीर तो बहुत ही प्यारी है.बाबर मामा का व्यक्तित्व तो बड़ा ही जानदार और प्रभावशाली लगा.सब से मिल कर बहुत अच्छा लगा.

रंजू भाटिया said...

सुन्दर यादो के साथ सुन्दर तस्वीरें हैं यह ...आप तो आज भी हम बहने वाली तस्वीर में उसी मध्य वाली लड़की जैसी ही क्यूट हैं :)

कुश said...

हमारा भी कथन नोट किया जाए श्वेत श्याम चित्रों का कोई जवाब नहीं.. पिछली बार जोधपुर गया था तो कई पुराने चित्र ले आया..

Gyan Dutt Pandey said...

आपकी पोस्ट के बहाने मुझे वर्धा का विनोबा जी का आश्रम याद आ गया।
कहां से कहां की याद आ जाती है।

दिनेशराय द्विवेदी said...

दीदी! आप के ननिहाल के परिवार के बारे में जान कर बहुत अच्छा लगा। मेरे नाना को तो मैं ने देखा नहीं पर मामा जी की बहुत समृतियाँ हैं। वे शौकिया शास्त्रीय संगीतप्रेमी, बहुत अच्छे गायक और नामी ज्योतिषी थे। लेकिन व्यावसायिक रूप से एक बीड़ी उद्योग के स्वामी थे। कभी उन के बारे में अवश्य ही लिखूंगा।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बड़ी प्यारी पोस्ट है।

अनिल कान्त said...

पढ़कर अच्छा लगा ...यादें याद आती हैं

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Unknown said...

आपके ननिहाल की स्‍मृतियां जितनी मधुर आपके लिए हैं, उतनी ही मनभावन हमें भी लगती हैं। मामा जी और मामी जी के विवाह की कथा तो सचमुच रोचक है...फिल्‍मों की कहानियों जैसी।

डॉ .अनुराग said...

रंग बिरंगे इस जमाने में इस ब्लेक एंड व्हाइट तस्वीर की अपनी खासियत इसके किरदारों की तरह है....यादो के ये झूले इन्सान को अक्सर झूलने चाहिए ...जीवन में मिठास बरकरार रहती है ओर एक ख़ुशी भी.....

पंकज सुबीर said...

दीदी साहब ये तस्‍वीरें ही तो होती हैं जो हमको उन दिनों में वापस लेजाती है । आप अपनी आत्‍म कथा ज़ुरूर लिखिये क्‍योंकि आपकी शैली इतनी अच्‍छी है कि उसमें संस्‍मरणों में जैसे जान ही आ जाती है । ननिहाल के बारे में क्‍या कहूं । ननि‍हाल तो हम व्‍यक्ति के अंदर उम्र भर रहता है।

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

सुमधूर यादों को बांटने के लिये बधाई ।

शोभना चौरे said...

आपके बाबर ममाजी के बारे मे पढ़कर आंनद आ गया |
मे आपके ब्लाग पर पहली बार आई लेकिन मुझे ऐसा ल्गा मानो हमारी पहचान बहुत पुरानी है |
लगता है आज के 50 साल पहले के परिवरो मे कितनी समानता और आत्मीयता होती थी |
बधाई

Reema Lipare-Fozdar said...

Ohhh lavanya masi...this is so good...i read it for amma.even she liked it very much!