Tuesday, May 26, 2009

तेरी शहनाई बोले, सुनके दिल मेरा डोले ...

रंग में डूबी हुई एक ग़ज़ल है वो इस जर्रा ए ज़मीन पाक की , हीना है वो
भीगी भीगी रुत में ,
भीगे भीगे से ये अहसास
भीगे भीगे मौसम में ,
भीगे लम्हों की ये प्यास !

जादू सा छाया है ह र सू ,
कोहरे की चादर फ़ैली है ,
धुन्धलाये से नज़ारे ,
गुम सुम चाँद तारे हैं !

ऐसे में कैसी ये आहट ,
झांझरी रुन झुन करती
फिजाओं में तैर जाये
ये किसकी है आहट ?

तुम चलो ,तो चूल पड़े जहाँ
तुम रुको , तो थम जाये समां
दिल का धडकना फिर बेवजह ,
आप आये सनम जो अब यहां !
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
तुम आओ सनम , फिजा में बजने लगी शहनाईयाँ
तारों की चिलमन को हटाकर चाँद भी झाँकने लगा अब ,
देखने को उतावला हुआ , तुम्हारा मुखडा , मेरे महबूब ,
पैरों में बजती , रूकती ये पाजेब , मेरी निगोड़ी ,
मेरे ही दिल को धड़काती रहती है , देकर

झूठे दिलासे , की आयेंगे पिया तुम्हारे ,
होश सम्हालो , रूक जाओ न , और सुन लो ,
रागिनी मधुर सी , बजती है जो फिजाओं में !
************************************************************************
(- लावण्या )
अब सुनिए ,
बिस्मिल्लाह खां साहब का बजाया अद्`भुत राग : मालकौंस ,

http://www.sawf.org/audio/malkauns/bismillah_malkauns.ram
अब ये ना कहियेगा , आप खान साहब से भी मिलीं थीं क्या ?
जी नहीं .... ऐसा मेरा सौभाग्य नहीं ! मगर, मुरीद हूँ मैं उनके हुनर की !
९१ साल की उमर में , ६०, ७० लोगों के परिवार को सम्हाले हुए , उस्ताद जी जब् चल बसे थे तब लगा मानो , शहनाई के साज़ से , रूह भी रुखसत कर गयी !
खान साहब, ५ बार नमाज़ अदा करते थे और कला की देवी सरस्वती को भी भजते थे ।
हिंदू मुस्लीम एकता के प्रतीक खान साहब को पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और फ़िर सर्वोच्च सम्मान "भारत रत्न " से नवाजा गया है । वे , बनारस के रहनेवाले थे ।
सो, सारा मधुर रस भी , घोल लिया था उत्तर प्रदेश की बोली का और कजरी , शादी ब्याह की ताने , उनकी शहनाई से जब् भी बजतीं तब , सुननेवाले , ठगे रह जाते !
"गूँज उठी शहनाई " फ़िल्म में , "शहनाई " भी , एक प्रमुख किरदार के रूप में थी !
संगीतकार थे वसंत देसाई और शहनाई बजाई थी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब ने
इस फ़िल्म के सभी गीत आप यहां सुनियेगा .....
और
मेरे , कई संस्मरण निजी हैं ।
परंतु , कई दुर्लभ बातें , मैं, अकसर मेरे , संकलन से लेती हूँ ।
जी हां , कई डायरियां हैं, कई पुराने पन्ने हैं !
(अभिषेक भाई , सुन रहे हैं ना आप ? :)
मानो जिंदगानी के बीते हुए लम्हे हैं
जिन्हें , सँजोकर रखने की कोशिश भर है ।
बहुत सारा , देस के संग छूट गया
........
भला हो , इस इन्टरनेट युग का !!
सर्च करने पे , कई , पुरानी बातों को वही , पुनः प्रस्तुत करने में मदद करता है ।
आप लोग , मेरा लिखा पढ़ते हैं, अपने अभिप्राय , सुझाव व विचार , प्रकट करते हैं
उसके लिए , बहुत बहुत शुक्रगुजार हूँ .....
सफर के साथी , आप सभी का शुक्रिया !

स्नेह ,
- लावण्या




19 comments:

दिलीप कवठेकर said...

आपके साथ आपके पोस्ट पर विचरण करना, यूं लगता है कि चांद के पार ले जा रही है एक परी हमें. हल्के हल्के कदम से, थण्डी हवा की बयार लिये ये भावना से गीले शब्द हमें मेहसूस कराते हैं उन सभी नोस्टाल्जिया से भरे मधुर क्षणों को, जो हमने कभी पिछले सालों में व्यतीत किये हैं.या फ़िर उन श्वेत श्याम फ़िल्मों की कहानी के परिप्र्येक्ष को हम भोगते है. कहीं ना कहीं अपनी ही कहानी का तसव्वूर कराती हुई ग़म और तनहाईयों से भरी वो शामें याद करते हुए , अपने अपने आशियां को तलाशते हुए....

दीदी , आपकी हर बात में एक विश्वास है, Authenticity है, आदर है. यूं ही माहौल बनाती रहें, लिखती रहें. हम तो नही लिख सकते इतना साहित्यिक और नक्काशीदार, बस आप हमें उंगली पकड कर ले जाती है, हम निकल पडते है,खुली सड़क पर...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

खान साहब की शहनाई सुन धन्य हो गए।

ताऊ रामपुरिया said...

यहां आकर एक अलग ही लोक की अनुभुति होती है. जो लगता है आपकी सहजता की वजह से है. बिल्कुल जैसे कोई राग बज रहा हो. नहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

http://taau.in

Harshad Jangla said...

Lavanya Di
Very impressive post. This film's songs are my very favorite songs. Khan Saab was a gem.
Thanx.
-Harshad Jangla
Atlanta, USA

Udan Tashtari said...

उस्ताद साहब की शहनाई तो घर पर बजी तीन दिन और खूब सुनी गई. आज सुन्कर अच्छा लगा.

अनिल कान्त : said...

maza aa gaya !!

Science Bloggers Association said...

बिस्मिल्लाह साहब की शहनाई एक दैविय आनन्द से नहला देती है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

राज भाटिय़ा said...

शहनाई सुन कर अजीब सा लगता है, जेसे कोई अपने दिल का दर्द इस शहनाई मै ऊडेल रहा हो, बिस्मिल्लाह साहब की शहनाई की तो बात ही ओर है, बहुत सुंदर लगी .
धन्यवाद

अभिषेक ओझा said...

रचना और संस्मरण दोनों बेहद अच्छे लगे... आज तो सचमुच 'फिजा में बजने लगी शहनाईयाँ'.
और हाँ बिलकुल सुन रहा हूँ :) आपकी हर पोस्ट का हर एक शब्द पढता/सुनता हूँ. साथ में उस धन्य डायरी की किस्मत सोच रहा हूँ जिसमें आपके संस्मरण लिखे हैं !

रंजना said...

वाह !! आनंदम आनंदम !!!

बहुत बहुत आभार आपका लावण्या दी.

pran said...

LAVANYA JEE,
AAPKEE SUDAR LEKHNEE KO
PADHNA AUR TISPAR KHAAN SAHIB KEE
MOHAK SHAHNAAEE KO SUNNA SONE PAR
SUHAAGAA WAALEE BAAT HAI.UTTAM
PRASTUTI KE LIYE MEREE BADHAAEE.

Arvind Mishra said...

ऊपर की टिप्पणियों में मेरी भावनाएं अभिव्यक्त हुई हैं ! आपके संस्मरण और बिस्मिलाह खान की युगलबंदी -वल्लाह !

नीरज गोस्वामी said...

खान साहेब की शेहनाई और आपकी रचना...दोनों ने जादू सा कर डाला दिल पर...ब्लेक एंड वाईट में किसका चित्र है?

नीरज

कंचन सिंह चौहान said...

खान साहब के बारे में जानना अच्छा लगा।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

For Neeraj bhai ~~~

Black & White photo , jo meri post ke sath hai, wo Farah Naaz , actress hai -

Tabu ki Badi bahen hai -- Pehle Cinema mei dikh jaati thee fir suna, Dara Singh ( the great Wrestler )
ke Son ke sath shadi ho gayee thee -
Ab pata nahee Farah kahan hai ?

(I used to like her --
She has a thick & heavy voice but exceptionally feminine face !
Don't you think ? :)

Ok --
thought to let you know ................

with warm regards,
- Lavanya

शोभना चौरे said...

bhut hi sundar post .
dilip kvthekar ji ki bat shayd mere man ke hi udgar hai apke liye .apko bhut dhnywad itni surili chije sunvane ke liye .aur dilipji ko bhi dhnwad itni achi tippni ke liye .

अल्पना वर्मा said...

ऐसे में कैसी ये आहट ,
झांझरी रुन झुन करती
फिजाओं में तैर जाये
ये किसकी है आहट ?

बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ हैं.आप की दोनों कवितायेँ बेहद पसंद आयीं..दिलीप जी ने कितने अच्छे शब्दों में ब्लॉग विचरण का वर्णन किया है.आप के ब्लॉग पर आना एक सुखद अहसास दे जाता है.
शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां साहब की shanayee के तो हम भी मुरीद हैं.. --वैसी shanayee अब कहाँ सुनने को मिली दोबारा?टी वी पर उन के बीमार होने पर..उनका इंटरव्यू दिखाया गया था..ज़मीन से जुड़े थे वह...आखिरी दिनों में भी अपने वही पुराने घर में रह रहे थे.एक सच्चे और उम्दा कलाकार के रूप में सभी उन्हें याद करते हैं.
आप के निजी संस्मरणों को हम भी सुनना चाहेंगे.अंतर्जाल की दुनिया ने बहुत कुछ दिया है..आप के दिए लिंक पर जा कर सुनूंगी..बुक मार्क कर लिया है.आभार

सागर नाहर said...

सुबह सुबह आपकी पोस्ट पढ़ने और खाँ साहब की शहनाई को सुनने के बाद जो आनन्द मिला उसके लिये इतना ही कह सकूंगा "बहुत खूब"।
:)

Pyaasa Sajal said...

ek hi post me itna kuch samet liyaa tha...sahi maayne me ye kai kai posts ke baraabar hai apne mahatv me...
aise uparw aali wo tasveer farah ki hai kya??...yaddasht kamzor pad gayee hai... :)


www.pyasasajal.blogspot.com