Friday, June 29, 2007

...ज़िँदगी ख्वाब है..चेप्टर - - ७


रोहित और शालिनी , वहां से अपने अलग अलग रास्तोँ पर चल दिये .रोहित ने अपना अमरीका का काम समाप्त किया और कुछ समय निकाल के, केन्सास शहर , अपनी बडी दीदी प्रियँका से मिलने चला गया

-शालिनी अपने पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के काम मेँ लगी रही..

यूँ ही फिर समय रेत की तरह बीत गया.


"रे समय...तू, किस पाखी के डैन चुरा कर आया है ?
चुपचाप उडाये क्षण क्षण जीवन के, उडता जाये रे!
. तू, बतला, ओ अविचल, बहता तू जो प्रतिपल,
कौन लोक से आया है ? रे समय..ओ समय ..
तू, किस पाखी के डैन चुरा कर आया है ?"
एक दिन की बात है राजश्री बाजार ,सौदा लेने गयी थी .
मिठाई की दुकान मेँ दाखिल होते ही
उसकी निगाह रीना से जा टकरायी

जो काउँटर पे अपने पैसे दे रही थी -
रीना ने ही उसे अपने पास बुलाया था,
" राजश्री बहन, कैसी हो ? "
इतना सुनते ही राजश्री , रीना के नज़दीक आ गयी
- " मजे मेँ हूँ !- घर गृहस्थी मेँ समय कहाँ बीत रहा है ,
कैसे बतलाऊँ ?"
उसने कहा तो रीना भी मुस्कुराई -
- "हाँ कैसे हैँ पँखुरी और प्रताप ? "
उसने मीठे स्वर से पूछा तो राजश्री भी खुश हो गई -
- " बिलकुल आनँद मेँ हैँ -- आज वे दोनोँ अपने पापा के पास हैँ -
- तो वे उन्हेँ कौन सी नयी शरारत सीखला रहे होँगे क्या पता !"
राजश्री ने कहा तो दोनोँ को हँसने का मौका मिल गया !
-- इसी तरह यहाँ , वहाँ की बातेँ होने लगीँ -
- अचानक राजश्री ने कुछ गँभीर होकर पूछ लिया,
" एक बात पूछूँ रीना ? बुरा तो नहीँ मानोगी ? "
अब तक वे दुकान के बाहर आ गईँ थीँ -
- " ना पूछिये न दीदी क्या प्रश्न है ! " रीना बोली
तो राजश्री ने पूछ ही लिया
" तुम मेँ और रोहित मेँ क्या हुआ था ? क्यूँ दूर हो गये ? "
तो रीना ने कहा," सच बतलाऊँ ?
रोहीत - is a Hyper active personality in my opinion !
He is too , too much demanding !
He never can make up his mind on any one thing !
He is never satisfied with what is in front of him !
Ive noticed this habit in him ! "
रीना ने कहा,
" How do you say that humm " ? राजश्री ने उत्सुकतावश पूछा -
" well, nothing is enough for him !
even when I serve 3 types of condiments
he wants the fourth kind ...!
अब आप ही बतलाओ!..ये भी क्या तमाशा हुआ !
और ......इस तरह से नहीँ रह पाती थी !
अकसर ममी मुझसे पूछती रहती कि 'रीना बता क्या खाओगी ?
और रोहित के साथ ऐसा होता था कि जब हम खाने की मेज़ पर खाना खाने लगते तो कितनी भी डीशीस बनी होँ वो कोयी अलग चीज़ की डीमान्ड करने लगता ! जिससे मुझे घबराहट हो जाती --
i was not used to such behaviour you know.! ..
-- उसने रुँआसे स्वर मेँ धीमी आवाज़ मेँ इतना कह कर बात को वहीँ खत्म किया तो राजश्री ने भी आगे बात नहीँ बढायी ..
इतनी बात ज़ाहिर थी कि रीना भी परेशान थी ..
..अब राजश्री ने बातोँ का सिलसिला वहीँ दफनाते हुए
रीना के मन की तह को समझते हुए,
अपने घर की ओर क रुख अपनाया ..
'मियाँ बीवी के ऐसे विवाद, किसी कोर्ट कचहरी मेँ निपटे हैँ कभी ?'
राजश्री सोचती रही .
..'.की , आज इनका हल निकल पायेगा ?
असंभव ! '
घर पहुँचते ही उसने नन्हे प्रताप और चहकती हुई नन्ही पँखुरी को कुछ ज्यादह ही प्यार से चूमते हुए अपने से भीँच कर गले लगा लिया था -
- और फिर प्रकाश को रीना से अचानक हुई मुलाकात के बारे मेँ बतलाने लगी तो शाम कब रात मेँ ढल गई उन्हेँ पता ही न चला .
.सर्द हवाओँ को सहना पड जाये तो पँछी भी अपने घोँसलोँ को सहेजने लग जाते हैँ ! ये हर जीव का अपने आप को सुरक्षित रखने का नैसर्गिक प्रयास रहता है .राजश्री भी ऐसे ही प्रयास से अपने को रोक न पायी --
क्रमश:

2 comments:

Divine India said...

आदरणीय मैडम,
इस रचना में मुझे कविता की झलक बहुत पसंद आई…कहानी तो सुंदर है ही…साथ आपके लिखने का भी अंदाज…।

Lavanyam -Antarman said...

दीव्याभ,
आप ने मेरी हर रचना को जिस बारिकी से पढा है और प्रोत्साहन के शब्द लिखे उनके लिये सच्चे ह्रदय से आपकी आभारी हूँ --
ये कथा, मेरे अभिन्न मित्र की स्मृति को समर्पित मेरी भावभरी अँजली है -
स्नेह सहित
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