Monday, June 11, 2007

सुश्री दिलीप कुमार उर्फ युसुफ खाँ की बातेँ ~ अँतिम भाग



हम जब जब मिलते थे गालिब , मीर तकी के शेर कहते और सुनते थे.मीर तकी ने एक शेर मेँ कहा है --

" यह पूछा गुल ने कि क्या है सबात ? कली ने मुस्कुरा कर, तबस्सुम किया "

[ फूल ने कली से कहा कि इस सँसार मेँ क्या है ? सुनकर कली जोर से मुस्कराई और मुस्कुराते ही वह कली से फूल बन गई , जो चँद क्षणोँ का मेहमान होता है और मुर्झा जाता है ! ]

गालिब मुश्किल -पसँद शायर माने जाते हैँ उसका उदाहरण है --

" सादगी मेँ भी आयना आफरीनी है ? -"

- दूसरा है,

" नक्शे नाज़े बुते तज्जाज़ व आगोशे रकीब पताउस पैमाना मानी माँगे "

[ My Beloved Deity is in the arms of my Rival , Mani is a well known writer . He says that he has asked for the legs of a Peacock ( which are ugly ) to make a Pen to describe the Beauty of his Beloved . He wants to use the ink for writing from the feathers of a peacock which are the most beautiful ]

इस तरह नरेन भैया भी हमेँ उनके गीत व कविताएँ सुनाते थे --

( फिर गाते हुए ) --

" रुक कहाँ चली , ओ चँद्र वदन, चँपे की कली , गोकुल की लली ...
रूक कहाँ चली !"

गालिब का एक और शेर याद आया --

" दामेँ हर मौज मेँ है हलक एक सद्`काम निहँग जाने क्या गुजरी है शम्मा पे, सहर होने तक "

इस तरह की सारी, कई तरह की चर्चाएँ होते रहतीँ थीँ और समय कहाँ चला जाता, पता ही नहीँ चलता था !

This is not the  END !

जो भी मैँने यहाँ कहा है, वा तो सिर्फ इब्तिदा है, उसकी इन्तहा नहीँ।
यानी आप ऐसा न समझ लेँ कि बात मैँने खत्म की -- बातेँ बहुत हैँ , लेकिन मैँ उन्हेँ "अनकही " ही छोड रहा हूँ !

-- सुश्री दिलीप कुमार उर्फ युसुफ खाँ

स्व. पँडित नरेन्द्र शर्मा के स्मृति ग्रँथ "शेष ~ अशेष " से साभार

अगर आपको "शेष ~ अशेष " पुस्तक के अन्य सँस्मरण पढने होँ तो क्र्पया सँपर्क करेँ :

श्री परितोष नरेन्द्र शर्मा , ५९४, १९ वाँ रास्ता, खार, बम्बई- ४०००५२ भारत

प्रस्तुति : -- लावण्या

6 comments:

Divine India said...

दिलीप साहब की बात ही क्या एक संपूर्ण कलाकार थे और भारत का गौरव भी…मैं थोड़ा विलंब से पहुँचा यहाँ पर पूरा पढ़ने की कोशिश करूगाँ धीरे-2।

Lavanyam -Antarman said...

हाँ दीव्याभ इत्मीनान से पढ लो --ाकई दिलीप साहब एक सँपूर्ण कलाकार थे --
कितने समर्पित रहे वे अपने हुन्नर को हमेशा बढाते रहे -

Udan Tashtari said...

मजा आया संपूर्ण विवरण पढ़कर. और किस्से सुनाईयेगा, इंतजार रहता है.

Lavanyam -Antarman said...

धन्यवाद समीर भाई,
सच! अजी इस किताब मेँ कमाल की हस्तीयाँ हैँ
जब भी हो सकेगा, एक एक कर के सारे लेख
बाँटती रहुँगी इन मेँ से कई सारे लोग आज़ इस दुनिया मेँ नहीँ हैँ
सिर्फ उनकी आवाज़ रह गई है उनमेँ से एक मेरी बडी बहन वासवी भी है जिसने
यह पापाजी पर सँस्मर्णार्थ पुस्तक छपवाई थी "शेष ~ अशेष " और सिलाई, हस्त -कला
का काम कर के जो भी पैसा इकटठा हुआ उसीसे वासवी ने पूरी किताब छपवाई थी
अब 'पितृ प्रेम' की ऐसी मिसाल दुर्लभ ही बन गई है, है ना ?
आप सब मेरे लिये पापा जी , वासवी और अम्मा की कमी को पूरा कर रहे हैँ -
स्नेह,
लावण्या

अनूप शुक्ला said...

बहुत अच्छा लगा इसे पढ़कर!

Lavanyam -Antarman said...

धन्यवाद अनूप जी -
स्नेह,
-- लावण्या