Tuesday, July 1, 2008

दीदी और पापा

दीदी ने ये चित्र संकलित किए और खींचे भी हैं
कुमारी लता मंगेशकर - युवावस्था का एक चित्र - ये नीचेवाला मेरे पास है --
पापा जी, संजीव कोहली ( मदन मोहनजी के पुत्र और दीदी )
पापाजी और दीदी २ ऐसे इंसान हैं जिनसे मिलने के बाद , मुझे ज़िंदगी के रास्तों पे आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा मिली है -
सँघर्ष का नाम ही जीवन है। कोई भी इसका अपवाद नहीं -
सत्चरित्र का संबल, अपने भीतर की चेतना को प्रखर रखे हुए किस तरह अंधेरों से लड़ना और पथ में कांटे बिछे हों या फूल, उनपर पग धरते हुए, आगे ही बढ़ते जाना ये शायद मैंने इन २ व्यक्तियों से सीखा। उनका सानिध्य मुझे ये सीखला गया कि, अपने में रही कमजोरियों से किस तरह स्वयं लड़ना जरुरी है - उनके उदाहरण से , हमें इंसान के अच्छे गुणों में विशवास पैदा करवाता है।

पापा जी का लेखन , गीत, साहित्य और कला के प्रति उनका समर्पण और दीदी का संगीत , कला और परिश्रम करने का उत्साह , मुझे बहुत बड़ी शिक्षा दे गया ।

उन दोनों की ये कला के प्रति लगन और अनुदान सराहने लायक है ही परन्तु उससे भी गहरा था उनका इंसानियत से भरापूरा स्वरूप जो शायद कला के क्षेत्र से भी ज्यादा विस्तृत था ! दोनों ही व्यक्ति ऐसे, जिनमें इंसानियत का धर्म , कूटकूट कर भरा हुआ मैंने , बार बार देखा और महसूस किया ।

जैसे सुवर्ण , शुध्ध होता है, उसे किसी भी रूप में उठालो, वह समान रूप से दमकता मिलेगा वैसे ही दोनों को मैंने हर अनुभव में पाया। जिसके कारण आज दूरी होते हुए भी इतना गहरा सम्मान मेरे भीतर पैठ गया है के , दूरी , महज एक शारीरिक परिस्थिती रह गयी है। ये शब्द फ़िर भी असमर्थ हैं मेरे भावों को आकार देने में --

दीदी ने अपनी संगीत के क्षेत्र में मिली हर उपलब्धि को सहजता से स्वीकार किया है और उसका श्रेय हमेशा परम पिता , ईश्वर को दे दिया है।

पापा और दीदी के बीच , पिता और पुत्री का पवित्र संबंध था जिसे शायद मैं मेरे संस्मरण के द्वारा बेहतर रीत से कह पाऊँ -

हम ३ बहनें थीं - सबसे बड़ी वासवी , फ़िर मैं, लावण्या और मेरे बाद बांधवी

हाँ, हमारे ताऊजी की बिटिया गायत्री दीदी भी , सबसे बड़ी दीदी थीं जो हमारे साथ साथ अम्मा और पापाजी की छत्रछाया में पलकर बड़ी हुईं। पर सबसे बड़ी दीदी , लता दीदी ही थीं - उनके पिता पण्डित दीनानाथ मंगेशकर जी के देहांत के बाद १२ वर्ष की नन्ही सी लडकी के कन्धों पे, मंगेशकर परिवार का भार आ पडा था जिसे मेरी दीदीने , बहादुरी से स्वीकार कर लिया और असीम प्रेम दिया अपने बाई बहनों को जिनके बारे में , ये सारे किस्से मशहूर हैं । पत्र पत्रिकाओं में आ भी गए हैं --

उनकी मुलाक़ात , पापा से , मास्टर विनायक राव, जो सिने तारिका नंदा के पिता थे , के घर पर हुई थी - पापा को याद है दीदी ने " मैं बन के चिडिया , गाऊँ चुन चुन चुन " ऐसे शब्दों वाला एक गीत पापा को सुनाया था और तभी से दोनों को एकदूसरे के प्रति आदर और स्नेह पनपा --

दीदी जान गयीं थीं पापा उनके शुभचिंतक हैं - संत स्वभाव के गृहस्थ कवि के पवित्र ह्रदय को समझ पायीं थीं दीदी और शायद उन्हें अपने बिछुडे पिता की छवि दीखलाई दी थी।

वे हमारे खार के घर पर आयीं थीं जब हम सब बच्चे अभी शिशु अवस्था में थे और दीदी अपनी संघर्ष यात्रा के पड़ाव एक के बाद एक, सफलता से जीत रहीं थीं -- संगीत ही उनका जीवन था - गीत साँसों के तार पर सजते और वे बंबई की उस समय की लोकल ट्रेन से , स्टूडियो पहुंचतीं जहाँ रात देर से ही अकसर गीत का ध्वनि- मुद्रण सम्पन्न किया जाता चूंके बंबई का शोर शराबा शाम होने पे थमता - दीदी से एक बार सुन कर आज दोहरा ने वाली ये बात है !

कई बार वे भूखी ही, बाहर पडी किसी बेंच पे सुस्ता लेतीं थीं , इंतजार करते हुए ,ये सोचतीं

" कब गाना गाऊंगी पैसे मिलेंगें और घर पे माई और बहन और छोटा भाई , इंतजार करते होंगें , उनके पास पहोंच कर , आराम करूंगी ! "

दीदी के लिए माई कुरमुरोँ से भरा कटोरा , ढँक कर रख देतीं थी जिसे दीदी खा लेतीं थीं पानी के गिलास के साथ सटक के ! आज भी कहीं कुरमुरा देख लेतीं हैं उसे मुठ्ठी भर खाए बिना वे आगे नहीं बढ़ पातीं :)

ये शायद उन दिनों की याद है - क्या इंसान अपने पुराने समय को कभी भूल पाया है ? यादें हमेशा साथ चलतीं हैं, ज़िंदा रहतीं हैं -- चाहे हम कितने भी दूर क्यों न चले जाएँ --

फ़िर समय चक्र चलता रहा - हम अब युवा हो गए थे -- पापा आकाशवाणी से सम्बंधित कार्यों के सिलसिले में देहली भी रहे ..फ़िर दुबारा बंबई के अपने घर पर लौट आए जहाँ हम अम्मा के साथ रहते थे , पढाई करते थे ।

हमारे पडौसी थे जयराज जी - वे भी सिने कलाकार थे और तेलेगु , आन्ध्र प्रदेश से बंबई आ बसे थे। उनकी पत्नी सावित्री आंटी , पंजाबी थीं / (उनके बारे में आगे लिखूंगी ) --

उनके घर फ्रीज था सो जब भी कोई मेहमान आता , हम बरफ मांग लाते शरबत बनाने में ये काम पहले करना होता था और हम ये काम खुशी , खुशी किया करते थे ..पर जयराज जी की एक बिटिया को हमारा अकसर इस तरह बर्फ मांगने आना पसंद नही था - एकाध बार उसने ऐसा भी कहा था " आ गए भिखारी बर्फ मांगने ! " जिसे हमने , अनसुना कर दिया। ! :-)) ...आख़िर हमारे मेहमान , का हमें उस वक्त ज्यादा ख़याल था ...ना के , ऐसी बातों का !!

बंबई की गर्म , तपती हुई , जमीन पे नंगे पैर, इस तरह दौड़ कर बर्फ लाते देख लिया था हमें दीदी नें ..... और उनका मन पसीज गया !

- जिसका नतीजा ये हुआ के एक दिन मैं कोलिज से, लौट रही थी , बस से उतर कर , चल कर घर आ रही थी ... देखती क्या हूँ के हमारे घर के बाहर एक टेंपो खडा है जिसपे एक फ्रिज रखा हुआ है रसीयों से बंधा हुआ !

तेज क़दमों से घर पहुँची , वहाँ पापा , नाराज , पीठ पर हाथ बांधे खड़े थे !

अम्मा फ़िर जयराज जी के घर , दीदी का फोन आया था , वहाँ बात करने आ , जा रहीं थीं ! फोन हमारे घर पर भी था - पर वो सरकारी था जिसका इस्तेमाल , पापा जी सिर्फ़ , काम के लिए ही करते थे और कई फोन हमें , जयराज जी के घर रिसीव करने दौड़ कर जाना पड़ता था ! दीदी , अम्मा से , मिन्नतें कर रहीं थीं

" पापा से कहो ना भाबी, फ्रीज का बुरा ना मानें ! मेरे बाई बहन आस पडौस से बर्फ मांगते हैं ये मुझे अच्छा नहीं लगता - छोटा सा ही है ये फीज ..जैसा केमिस्ट दवाई रखने के लिए रखते हैं ... "

अम्मा पापा को समझा रहीं थीं -- पापा को बुरा लगा था -- वे , मिट्टी के घडों से ही पानी पीने के आदी थे ! ऐसा माहौल था मानों गांधी बापू के आश्रम में , फ्रीज पहुँच गया हो !!

पापा भी ऐसे ही थे ! उन्हें क्या जरुरत होने लगी भला ऐसे आधुनिक उपकरणों की ? वे एक आदर्श गांधीवादी थे - सादा जीवन ऊंचे विचार जीनेवाले , आडम्बर से , सर्वदा , दूर रहनेवाले, सीधे सादे, सरल मन के इंसान !

खैर ! कई अनुनय के बाद अम्मा ने , किसी तरह दीदी की बात रखते हुए फ्रीज को घर में आने दिया और आज भी वह, वहीं पे है ..शायद मरम्मत की ज़रूरत हो ..पर चल रहा है !

हमारी शादियाँ हुईं तब भी दीदी , बनारसी साडियां लेकर आ पहुँचीं ..अम्मा से कहने लगीं, " भाभी , लड़कियों को सम्पन्न घरों से रिश्ते आए हैं ! मेरे पापा कहाँ से इतना खर्च करेंगें ? रख लो ..ससुराल जाएँगीं , वहाँ सबके सामने अच्छा दीखेगा " --

कहना न होगा हम सभी रो रहे थे ..और देख रहे थे दीदी को जिन्होंने उमरभर शादी नहीं की पर अपनी छोटी बहनों की शादियाँ सम्पन्न हों उसके लिए , साडियां लेकर हाजिर थीं ! ममता का ये रूप , आज भी आँखें नम कर रहा है जब ये लिखाजा रहा है ...मेरी दीदी ऐसी ही हैं । भारत कोकीला और भारत रत्ना भी वे हैं ही ..मुझे उनका ये ममता भरा रूप ही , याद रहता है --

फ़िर पापा की ६० वीं साल गिरह आयी -- दीदी को बहुत उत्साह था कहने लगीं ,

"मैं , एक प्रोग्राम दूंगीं , जो भी पैसा इकट्ठा होगा , पापा को , भेंट करूंगी ! "

पापा को जब इस बात का पता लगा वे नाराज हो गए, कहा,

" मेरी बेटी हो , अगर मेरा जन्मदिन मनाना है , घर पर आओ, साथ भोजन करेंगें , अगर , मुझे इस तरह पैसे दिए , मैं तुम सब को छोड़ कर, काशी चला जाऊंगा , मत बांधो मुझे माया के फेर में ! "

उसके बाद, प्रोग्राम नहीं हुआ - हमने साथ मिलकर , अम्मा के हाथ से बना उत्तम भोजन खाया और पापा अति प्रसन्न हुए !

आज भी यादों का काफिला चल पडा है और आँखें नम हैं ...इन लोगों जैसे विलक्षण व्यक्तियों से , जीवन को सहजता से जीने का , उसे सहेज कर, अपने कर्तव्य पालन करने के साथ, इंसानियत न खोने का पाठ सीखा है उसे मेरे जीवन में कहाँ तक , जी पाई हूँ , ये अंदेशा , नहीं है फ़िर भी कोशिश जारी है .........

- लावण्या







52 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

पापा और दीदी तो दुनियाँ भर के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। यह आलेख मेरी भी आँखें नम कर गया।

ghughutibasuti said...

बहुत ही सुन्दर यादों की पोटली खोली है आपने। सुनाते रहिएगा।
घुघूती बासूती

Neeraj Rohilla said...

लावण्याजी,
मेरी उम्र बहुत छोटी है लेकिन ऐसे ही बहुत से किस्से अपनी आंखो के आगे देखे हैं । पडौस के घर टीवी देखने जाना, फ़िर बर्फ़ के लिये किसी का घर आना और जब हम छुट्टियाँ मनाने मथुरा आते तो हम अपने पडौसी के घर बर्फ़ मांगने जाते ।

आस आस पडौस में सब सम्पन्न हैं और कोई एक दूसरे से आंख मिलाकर प्रेम से बात भी नहीं करता । सबकी तिजोरियाँ भर गयी हैं और दिल खाली हो गये हैं ।

आपके इन संस्मरणों को पढकर बहुत अच्छा लगा, लताजी के व्यक्तित्व की सादगी और उनके आचरण के बारे में कुछ भी कहना बहुत कम होगा । ईश्वर उन्हें दीर्घायु करे ।

राज भाटिय़ा said...

लावण्याजी,आप के पिता सच मे प्रेरणा के स्रोत हे तभी तो आप भी ऎसी हे,मुझे बहुत अच्छा लगा, ओर कॊई शव्द नही मिल रहे जिस से आप के पापा ओर लता जी के बार तारीफ़ कर सकु,सभी शव्द तुच्छ लगते हे,बस आप कॊ ओर आप के लेख के पात्रो को नमन करता हू,
ध्न्यावाद

Abhishek Ojha said...

यादें तो जीवन का सहारा हैं... और आपकी यादें... हम सबके लिए, प्रेरणा का स्रोत.

Harshad Jangla said...

Lavanyaji

As always these kinds of writings inspire us and teach us the real values of life. Memories are always cheerful to remember. Koti koti Naman to Papaji and Long Live Didi!
Thanx.
-Harshad Jangla
Atlanta, USA

Smart Indian said...

लावण्या जी,
आपके संस्मरण पढ़कर बहुत अच्छा लगा. आगे भी आता रहूँगा पढने के लिए.

Udan Tashtari said...

आपकी यादों की वादी में हम भी खो गये पढ़ते पढ़ते...मान सकता हूँ कि आँखें नम होंगी. बहुत शिद्दत से याद करते हुए लिखा है. आभार अपने यादों के सफर में हमें हमसफर बनाने के लिए. स्नेह बनाये रखें.

Gyan Dutt Pandey said...

उस समय फिल्म की दुनियां में सम्बन्धों का इतना माधुर्य था। आजकल क्या चल रहा है - लगता है, बहुत औपचारिक हो गया होगा?

कुश said...

आपके ब्लॉग पर आना हमेशा एक सुखद एहसास देता है.. इस बार तो बस कमाल है.. आपके पास कमाल की यादें है यूही शेयर कीजिएगा.. बहुत बहुत आभार आपका

mehek said...

bahut sawedan shil yaadein hai,ankhein bhar aayi.sundar .

सुजाता said...

आपका यह संस्मरण पढ कर आपकी भावनाओं को समझ पा रही हूँ । ऐसे ढेरो संस्मरण आपकी यादों की गठरी में होंगे ,जो नही लिखे गये , उन्हें मैं पढने को आतुर हूँ ।

डॉ .अनुराग said...

निशब्द हूँ...ओर भावुक भी.......

डॉ .अनुराग said...

निशब्द हूँ...ओर भावुक भी.......

पारुल "पुखराज" said...

di, aur bhi batayie..abhi to mun bheeg gaya...

डा० अमर कुमार said...

आत्मकथायें मुझे बहुत ललचाती हैं,
आत्मकथा न होकर भी यह जीवन कथा टुकड़ों में ही रस बिखेर रही है ।
एक साथ एक जगह सम्पूर्ण मिल जाये, तो क्या कहने ?

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

दिनेश भाई जी,
धन्यवाद आपका... मेरी बातोँ को पढने का....
और सच कह रहे हैँ ,
प्रेरणा मिले वैसे ही है दोनोँ -
दीदी और पापा !

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

घुघूती जी,
आभार -
हाँ, आज इन्हीँ यादोँ को शेर करने का मन हुआ और ये आपके सामने है -
स्नेह,
-लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

नीरज भाई,
हताश हो जाती हूँ जब धनिक वर्ग मेँ फैला ऐसा सुर्व्यवहार देखती हूँ - हम क्यूँ दूसरोँ के दुख से व्यथित नहीँ हो पाते ?
आप मथुरा से हैँ क्या ? वहाँ के कीशन जी हमारे परिवार के मित्र हैँ जिनका बेटा अब अनिल शर्मा प्रोड्युसर है -
दीदी की सादगी , मँ कमाल का सौँदर्य है और उनका दील बहुत बडा है - मेरे सौभाग्य हैँ जो उनसे इतना परिचय हुआ -
स्नेह,
-लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

राज भाई साहब,
मेरे भी आपको तथा समस्त परिवार जन को प्रणाम !
- ये सभी के लिये ह्र्दयविदारक समय है !
( so soon after the great loss for your family )
धीरज से गुजारियेगा और ईश्वर स्मरण ही , ऐसे मेँ , धैर्य प्रदान करता है -
स्नेह,
-लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

शुक्रिया अभिषेक भाई -
स्नेह,
-लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Harshad bhai,
on our Latadidi Group we share many such remembrances of our respected & beloved Didi -
Thank you so much -
Your feelings are greatly appreciated.
with warm regards,
Lavanya

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अनुराग भाई,
आप अवश्य आया करियेगा -
(आप का शहर बहोत दूर नहीँ ) -
शुभकामनाओँ सहित,
स्नेह,
-लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

समीर भाई,
मेरा अनुरोध भी याद रखियेगा -
Thanx 4 this kind comment & आपके जीवन के प्रसँग और साधना भाभी जी तथा परिवार की बातेँ शेर करियेगा
आप जब भी हँसाते हैँ , दिन एकदम बढिया गुजरता है -
स्नेह,
-लावण्या

कंचन सिंह चौहान said...

ohhh kaise anchhue pahalu hai.n... man bhar aaya..Di Aisi bate aur bhi bataiyega sun kar hausal bhi milta hai aur sukun bhi

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

ज्ञान भाई साहब,
आजकल की फिल्मी दुनिया मेँ भी सुनते हैँ कि शाह रुख खान, करण जौहर, और फरहा खान ( ओम शाँति ओम की निर्मात्री ) वगैरह से बहुत घनिष्ट व स्नेहपूर्ण सँबँध रखते हैँ -
लोग बदल जाते हैँ ,
सँबँधोँ का माधुर्य और अँतरँगता व्यक्ति पे निर्भर है -
ये मेरा सौभाग्य था
जो मेरी यादेँ इतनी मधुर हैँ -
स्नेह
-लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अवश्य कुश भाई!
जो जीवन मेँ
भोगा है,
देखा है,
महसूस किया
वही आज अमूल्य निधि और धरोहर बन गया सारा -
वही बाँटती हूँ जो मेरे पास है -
स्नेह
-लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Mehek ji,
bahot bahot shukriya ..jo aapne eese pasand kiya .
sa sneh,
lavanya

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सुजाता जी,
हाँ भरसक प्रयास करुँगी!
जो यादेँ हैँ उन्हेँ, शेर करुँ -
आप सब इतना प्रोत्साहन और प्यार देते हैँ तो मुझे भी प्रेरणा मिलती है
हौसला अफज़ाई के लिये बहुत बहुत शुक्रिया -
स्नेह
-लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

डाक्टर आप पेशे से हैँ अनुराग भाई !पर, सँवेदना एक कवि ह्र्दय सी पाई है !
इन्सान अव्वल दर्जे के हैँ जो आपकी हर पोस्ट से जाहीर है! :)
आप को ये बातेँ अवश्य अच्छी लगी ये जानती हूँ -
स्नेह
-लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Haan, Parul, ab jo yaadon ki gathariya khulee hai, to baatein niklengeen hee
bahut sneh sahit,
- lavanya

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

डाक्टर साहब,
( अमर भाई साहब )
कइयोँ ने कहा है कि मुझे सँस्मरण या आत्मकथा जैसा शीघ्र ही लिखना चाहीये ... अभी सारा याद है ! समय का सही उप्योग करना आवश्यक है और तब शायद मैँ ऐसा लिखने मेँ सफल हो पाऊँ !
ये ब्लोग भी एक ऐसा ही माध्यम बना है !
पर लिखते हुए बहुत समय लगता है - कई अशुध्धियाँ भी रह जातीँ हैँ कभी कम्प्युटर सुस्त पड जाता है -
फिर भी, कोशिश करुँगी -
स्नेह
-लावण्या

रंजू भाटिया said...

मधुर यादे बांटी है आपने इस पोस्ट में लावण्या जी .यूँ ही बताती रहे

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

शुक्रिया रँजू जी
जी हाँ प्रयास जारी रहेगा -
बहुत स्नेह के साथ,
-लावण्या

art said...

is aalekh dwara aapne hame apni yaadon men shaamil hone diya...bahut bahut shukriya

Unknown said...

सचमुच ऐसे विलक्षण लोगों के जीवन से मानवता के महानतम मू्ल्‍यों की सद्प्रेरणा मिलती है। यह सब पढ़ने के बाद हमारी भी आंखें नम हो आयीं। अब जो दुनिया सामने आ रही है, कहां देखने को मिलता है यह सब। पुराने दिनों, पुराने लोगों की बात ही कुछ और थी। इन प्रेरणादायक यादों का साझा करने के लिये हार्दिक आभार।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Priy Kanchan,
tumhe achcha laga uski mujhe bhee bahut khushee hai - prerna leker hume jeevan ke raston pe aage badhte jana chahiye, yehi thik hai - bahut sneh ke sath,
Lavanya

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Swati ji,
Hindi Blog jagat mujhe apne parivaar sa hee lagta hai - ees yatra mei shamil hone ke liye aapka bhee shukriya :)
sneh,
Lavanya

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अशोक जी आप सही कह रहे हैँ - हमारी आगेवाली पीढी कितनी महान है !
...शुक्रिया,आपकी टीप्पणी का
-लावण्या

sanjay patel said...

जीवन में सात्विकता किसे कहते हैं ये पापाजी जैसे महामानव के जीवन से ही सीखा और जाना जा सकता है.मैं कभी उनसे नहीं मिला लेकिन विविध भारती से बजती उनकी रचनाओं और यत्र तत्र उनके बारे में पढ़ता रहा तो लगता रहा कि ये व्यक्ति तो चलता फ़िरता आश्रम है.सादा तबियत,वैष्णव आचरण,अथक परिश्रमी और निर्विवाद रहने वाले पं.नरेन्द्र शर्मा जैसी शख़्सियत के घर में सुकंठी लता मंगेशकर का आना-जाना ...अहा कैसा दृष्य होता होगा वह ...जैसे शब्द रूपी तुलसी चौरे पर सुर का दीप जगमगा उठा हो.

मुझे लगता है तत्कालीन बॉम्बे और अब के मुम्बई में कवि प्रदीपजी और पं.नरेन्द्र शर्मा का परिवार वैसे ही थे जैसे मेरे शहर के आसपास बसे दो ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर(उज्जैन) और ओंकारेश्वर ...एक शिप्रा का घाट तो दूसरा नर्मदा का.

लता दीदी का संघर्ष तो जीजिविषा से भरा एक महाग्रंथ है...अनिल विश्वास जी जब लता मंगेशकर पुरस्कार लेने इन्दौर आए थे तब मुझे बताया था कि लता की तपस्या को उन्होंने अपनी आँख से देखा है.वह (लता दी)तक़रीबन आठ से दस कि.मी.पैदल चल कर उनके घर रिहर्सल के लिये आया करती थी और दादा गाने की धुन बता कर स्टुडियो चले जाते और तीन चार बजे तक आते तब तक निर्बाध गातीं रहतीं ...दादा कहते लता चल खाना बना लेते हैं..साथ मिल कर खाएंगे...तो लताजी कहतीं दादा वह तो मैने बना लिया...परोस दूँ आपके-मेरे लिये...बताइये तो लावण्याबेन आज ऐसे तपस्वी लोग मिलेंगे..मिलेगी ऐसी श्रध्दा ...ऐसा समर्पण...पं.दीनानाथ मंगेशकर की इस सोनचिरैया (या सुर चिरैया) ने अपने कुटुंब के लिये जो त्याग किया वह विलक्षण,अनुकरणीय और मार्मिक है.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

एक गीत अक्सर दीदी गातीँ हैँ मराठी मेँ है - उसका अर्थ है " हे पिता ! आपने अमरबेली लगाई थी ( सँगीत की ) जिसकी बेल आकाश तक जा पहुँची है , शब्द ढूँढने की कोश्श करुँगी - अकसर दूरदर्शन पे बजता था - वही गीत दीदी ने अपने पिताजी की यादोँ के लिये करुणा विगलित श्रध्धासे गाया है - उनको आजतक, उनके जाने का गम है ! पापाजी को आश आप मिल पाते ..आप का मन उनके प्रति सात्विक प्रेम से भर उठता ये पक्का विश्वास है, हर विषय के वे जानकार थे और धारा प्रवाह बोलते थे. व्यवहार मेँ कोयी छल कपट तो लेश मात्र भी नहीँ एकदम चोखा मन थाअ उनका - अगर किसीको कोई बात पसँद भी ना आये , वे हमेशा सच्ची और अच्छी बात पे ही जोर देते थे और किसीसे कुछ भी कहने से हिचकते न थे हाँ विनम्रता से और आत्मीयता से ही हर बात कही जाती थी - जिसका अपवाद हम भी नहीँ - पराये और अपने सब उनको एकसमान थे - सँजय भाई, आपने कितना अच्छा लिखा है पापा और दीदी के बारे मेँ - आप हमेशा बढिया और गँभीरता से लिखते हैँ परँतु,आज, मेरा मन गद्`गद्` हो गया -- वण्दना आँटी जी को भी लिन्क भेजा है - आपके सँगीत के खजाने से आनँद देते रहियेगा और हमेँ ज्ञान बाँटते रहियेगा
बहुत स्नेह के साथ,
-लावण्या

Harshad Jangla said...

Lavanyaji/Sanjaybhai
I have read your comments/reply again and again.I have got an unforgettable feelings after reading them. Wonderful,excellent..I can't find words.The word 'Sur-Chiraiya" has gone into my heart!Sanjaybhai, will you give some detailed meaning of this nice word?
Thanx to both of you again.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

मीनाक्षी said...

आज सोच कर बैठी थी कि कुछ लिखूँगी लेकिन पढ़ने का मोह कहाँ छूटता है और ऐसा पढ़ना छूट जाता तो अफसोस होता... सच में पढ़ते पढ़ते आँखे नम है तो ज़रूर लिखते लिखते आपकी आँखे भी भीगी होगी... यादों के पल बाँटते रहिएगा...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

जी अवश्य मीनाक्षी जी
स्नेह बनाये रखियेगा

- लावण्या

Unknown said...

Respected Ammaji,
Thanks a lot for sending me such valuable mail.

Thanks and regards,
Abhiram

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

चि. अभिराम
जीते रहो बेटे -
खुश रहो -
और आपकी टीप्पणी के लिये भी आभार स स्नेह आशिष सहित,
- लावण्या

Ritu Verma said...

Lavanya Ma, Apka ye blog padh kar meri bhi aakhen nam ho gayin.....what selfless attitude Pandit ji and Lata didi have.....at times the soul to soul connect is greater than the umblical chord connect.....Thank you for sharing such a beautiful relation but I am always hungry for more.....Love u...

Arvind Mishra said...

गहन और भावपूर्ण। आपको ऐसे प्रेरणा पुरुषों का सानिध्य मिला, जीवन धन्य हुआ। आपकी रचनाधर्मिता उसी प्रेरणा का सुफल है।

Arvind Mishra said...

*प्रेरक व्यक्तियों

shail said...

वक्त की कूंची कुशल चितेरी
उकेरती चलती मनभावन चित्र
बहजाते कुछ लहरों पर तैरते
अंकित कुछ अंतर्मन आज भी
वैसे ही सजे-धजे...
तुम्हारी भावलहरियों में डूबना-उतराना अच्छा लगा लावण्या! पुण्य से ही ऐसी विभूतियों का साथ मिलता है, बहुत सौभाग्यशाली हो कि वह तुम्हें पिता और दीदी के रूप में मिले।
शैल अग्रवाल
http://www.lekhni.net

सागर नाहर said...

दस-बारह साल बीत गए जीजी ब्लॉगिंग करते हुए! ब्लॉगिंग या चिट्ठाकारी का वह दौर कितना अच्छा था जब ज्यादातर मित्र संगीत/साहित्य/कला आदि पर लेख, विता/कहानियां लिखते और दूसरों की पोस्ट्स पढ़ने की प्रतीक्षा करते थे।
आज दस साल बाद भी इस पोस्ट ने एक बार फिर से आँखे नम कर दी।
कितनी सुन्दर पोस्टस है यह। आप ऐसे ही लिखतीं रहें और हम पढ़ते रहें।
बधाई, शुभकामनाएं और सादर प्रणाम।

Unknown said...

लावण्या जी,

हृदय को छूने वाला प्रसंग। बहुत सुन्दर।

- सुभाष काक