Friday, May 2, 2008

समीक्षा : " चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ " - लेखक श्री अमरेन्द्र जी


युवा कवि व लेखक अमरेन्द्र जी व सौ. हर्षा प्रिया


युवा कवि, सम्पादक व लेखक, श्री अमरेन्द्र जी की कहानियाँ पैन्ग्वीन बुक्स से प्रकाशित हुईँ हैँ नाम है, " चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ " जो , अमरेन्द्र जी की, लेखकीय प्रतिभा का प्रथम सोपान कहा जायेगा. शीर्ष कथा "चूडीवाला " पढकर मै प्रभावित हुई थी. कथानक भारतीयता से रँगा हुआ है जिसमेँ मुख्य पात्र "चूडीवाला" यानी " सलीम चाचा," गाँव गाँव घूमकर, चुडियाँ , बेचते हैँ और बहू बेटीयोँ को आत्मीय नज़र से देखते हैँ. उन्हेँ अपनी वृध्धावस्था का एहसास तब गहराता प्रतीत होता है कि जब जब उनकी नीयत पर आशँका जतायी जाती है एक बहू के , अनादरपूर्ण वाक्य से .....और मर्माँतक शब्द , उन्हेँ भीतर तक बेध जाते हैँ . यह बदलते रीश्तोँ की कहानी है जहाँ समाज खरीददार और विक्रेता बन कर रह गया है और रीश्तोँ की जगह धन विनिमय ने ले ली है. हमारी यादोँ मेँ बसा भारत, कब का बदल चुका है ये आघातकारी सत्य, बूढे सलीम चाचा के हारे थके तन, मन से निकल कर, पाठक के अन्तर्मन को भीतर तक झकझोर जाता है और जब ,औरसँबम्धोँ मेँ, मनुष्य की आस्था मेँ पडतीँ दरारेँ चटखतीँ,हैँ और जब , जब टूट कर बिखरतीँ हैँ तब, भूतकाल के समाज से वर्तमान की बेरुखी से लैस समाज मेँ पनप रही सभ्यता के ह्रास के हम मौन प्रेक्षक बनते हैँ !यही लेखक की सफलता है जो अपनी कहानी के जरिये हमेँ सामाजिक सत्य का सच्चा आइना दीखलाने मेँ सफल हो कर पात्रोँ के आपसी रीश्तोँ के तानो बानोँ से हमेँ बाँधने मेँ पूर्णत: सफल रहे हैँ इस कथा मेँ और पुस्तक की शीर्ष कथा को यादगार बनाते हैँ इस पुस्तक की दूसरी कथा जिसे मैँ त्वरित गति से पढ गई वह "मीरा " जो एक विदेशी नारी पात्र के जीवन सँघर्ष की कथा है और भारत की धरती से दूर रहते सम्वेदनाशील, कवि ह्रदय लिये लेखक की नये परिवेश से , स्वयम को जोडने की चेष्टा भी है, साथ साथ आत्म मँथन, जीवन के गहनतम क्षण की अनुभूति से भी पाठक को परिचित करवाती कथा है. मीरा नाम उस परदेसी स्त्री का है जिसका जीवन उतार चढावोँ से गुजरता हुआ भारतीय आध्यात्म मेँ कृष्णाराधना के समीप जाकर पाथेय ग्रहण करता है जो उसके शैशव काल के ऐकाँत को कुछ हद तक सँबल प्रदान करता है. उसी दौरान लेखक की अपनी माँ का निधन, भारत जाना , करुण प्रसँग मेँ शामिल होकर , दुबारा विदेश आ जाना , यह ह्रदय विदारक मनोदशा वही अनुभव कर पाता है जिसे ऐसे कठिन सँजोगोँ से गुजरना पडता है. सूफी सँत दरवेसोँ ने भी गाया है कि, "बहुत कठिन है डगर पनघट की " तो जहाँ कथा का मुख्य पात्र मीरा भी इसी कठिन पथ पर चल कर , हीम्मत से , अपने जीवन मेँ आयी कठिन परिस्थितियोँ से जूझती है लेखक भी, माँ के बिछोह से छलनी ह्रदय को सँजोये फिर पराये देस काम करने लौट आता है अकेले हाथोँ , " मातृत्त्व" का सामना करती हुई मीरा भी उसे दीख्लायी देती है. ईश्वर आस्था ही विषम क्षणोँ मेँ , मानव जीवन को पार करती है ये भी द्र्ष्टिगोचर है यही मानवता का हर धर्म से परे, जीवन यात्रा को आगे बढाने का अमर सँदेश है जो लेखक हमेँ बडी सहजता से देता है. "एक पत्ता टूटता हुआ" और चिडिया यूँ तो मानवीय प्राणी कथानकोँ से जुडी हुई कहानियाँ हैँ परँतु, इस मेँ परीलक्षित सँवेदना उन्हेँ मूक प्राणी व प्राकृतिक तत्व से उपर उठाकर मानवीय सँवेदनाओँ से जोडतीँ हैँ . चिडिया कथा मेँ , लेखक और चिडिया मानोँ एक दूसरे को ना बोलते हुए भी समझ रहे हैँ जब बुखार से तप रही हथेली पर बैठ कर चिडिया अपनत्व का इजहार करती हुई प्रतीत होती है और कभी इतना विश्वास कि अपनी सहेली चिडिया को भी मिलवाने ले आती है और अपनी सहेली का न होना भी आकर जतलाती हुई चिडिया मूक नहीँ, सँवेदना के हर बोल से अपनी बात कहती सी जान पडती है इतना सजीव चित्रण किया है अमरेन्द्र जी ने ...जो , सँयत भाषा मेँ , एक पँछी और मनुष्य का न रह कर , " हर प्राणी मेँ राम बसे " इस भक्ति कालीन सँतोँ की , उक्त्ति की प्रतीति करवाता सा लगता है. पत्ते की कथा, उसके उद्`भव पेड से गिरकर होती हुई, हमेँ भी यात्रा पे ले चलती है, जहाँ हम और लोगोँ से मिलते हैँ और विश्व की व्यापकता के साझीदार हो जाते हैँ .. भाई अमरेन्द्र की कहानियाँ अपने विविध पात्रोँ के सँग कभी गतिशीलता से तो कहीँ अपने ही स्थान पर समय के एक लँबे कालखँड को जो जी रहा हो ऐसी इमारत "ग्वासी " के जरीये हमेँ अलग अलग अनुभवोँ से परिचय करवातीँ हैँ .ये शहर का प्राचीन अवशेष प्राय: भवन ही नहीँ समस्त गतिविधियोँ का केन्द्र बिन्दु भी रहा है जो किशोर मन को सजीव अपने ही परिचित सा लगता है. भविष्य के कल्पनाकाश को, वर्तमान से जोडता हुआ, भूतकाल की नीँव पर खडा, अविचल प्रहरी सा ! जो विगत इतिहास को , जन जीवन के रोजमर्रा के जीवन से जोडने मेँ सक्षम होता है तब पाठक दार्शनिकता के बोध से बँध कर ठिठक जाता है, इतिहास से, समाज से, अपने परिवेश से जुड जाता है. ये "ग्वासी " कहानी की अन्तर्निहित शक्ति है जो प्रवाही भाषा के सहारे तटस्थता के प्रतीक मेँ समूचे जीवन का सार दीखला जाती है. " रेत पर त्रिकोण " 'रेलचलितमानस' और 'वज़न" ये अन्य ३ कथाएँ हैँ जिनमेँ से अँतिम दो हास्य व्यँग लिये हुए हैँ जिन्हेँ पाठक अवश्य पसँद करेँगेँ और तीन कोणोँ को सीधी रेखाओँ से जोडती कहानी, तीन मित्रोँ के सँघर्ष, उनके अपने नजरियोँ को उजागर करती हुई कथा है -- नीरज और सचिन, लेखक के मित्र हैँ जिनसे ये त्रिकोण पूर्ण बनता है. हरेक के लिये जीवन सँघर्षमय है परँतु जीवन जीने की प्रक्रिया और हल तीनोँ अपने अँदाज से चुनते हैँ ये कहानी किसी भी समाज के तीन व्यक्ति की कथा हो सकती है. आप, मैँ और कोई तीसरा ! इसी कारण, स्वाभाविक और आत्मीय सी जान पडती है. अम्रेन्द्र जी ने पूरी इमानदारी से अपने आसपास के समाज को, प्रकृति को परखा है , उससे ताल मेल साधा है और उनके पात्र मूक होँ या वाचाल, सभी पाठकोँ से , गहरी बात सरल भाषा मेँ कर जाते हैँ . ये उनके लेखक - मन की, सूक्ष्म दृष्टि की , उनके मानवीय व सहज ही सँवेदनशील अन्तर्मन की छविे पाठक से मिलवाने की प्रक्रिया का सफल प्रयोग है. नया प्रयोग है. जो अवश्य सराहा जायेगा चूँकि यहाँ पारदर्शीता है ! पाठक और लेखक के बीच ! जो हमेँ सीधे पात्रोँ, कथानक और हमारे अपने सामाजिक परीवेश से, सीधे ही जोड देतीँ, हमारी अपनी ही कहानियाँ हैँ ! अँत मेँ भाई अम्रेन्द्र जी को, जिन्हेँ मैँ, अपना अनुज मानती हूँ इस समीक्षा के जरीये एक बात अवश्य कहना चाहूँगी और वो ये है कि, वे अपने आपको, अपने अन्तर्मन को और विस्तृत करेँ , ताकि उनके नये नये प्रयासोँ से उपजे ऐसे ही सामाजिक बिम्ब हमेँ, नये आयामोँ से प्रकाशित हो कर, दीखेँ और अन्य विषयोँ पर भी उनके विचार, अन्य तत्त्वोँ के प्रति उनकी सँवेदना का उन्हीँ के कथा पात्रोँ से हम बार बार परिचय कर पायेँ ॥ इस कुशल, प्रथम प्रयास के लिये मैँ उन्हेँ , शुभ कामनाएँ व बधाई देती हूँ और भविष्य मेँ और गहरी बात उन्हीँ की कहानी से कह पाने के लिये आशा है कि मेरे इस प्रयास से, प्रेरणा देते हुए उनके लेखकीय मन को , नये भावाकाश तक पहुँचने के लिये , शब्दोँ के डैनोँ का उपहार भी देती हूँ ! .. लेखक "अमरेन्द्र " क्रियाशील रहेँ उसी सद्` आशा सहित, मेरी बात को यहीँ पर विराम देती हूँ --
शुभम्` --
-- लावण्या

3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

अमरेन्द्र जी की कहानियों की समीक्षा अच्छी लगी। उन की कहानियाँ पढ़ने का प्रयत्न करूंगा।

Gyandutt Pandey said...

देखते हैं अमरेन्द्र जी को कब पढ़ पाते हैं। परिचय कराने के लिये धन्यवाद।

Lavanyam - Antarman said...

amarendrak02@yahoo.com
दिनेश भाई साहब और ज्ञान भाई साहब आप अम्रेन्द्र जी से सीधी सँपर्क कर सकते हैँ
वे आपको किताब प्राप्ति के बारे मेँ बत देँगेँ --