Wednesday, May 7, 2008

पुष्प की अभिलाषा : श्री माखनलाल चतुर्वेदी


पुष्प की अभिलाषा : श्री माखनलाल चतुर्वेदी


चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर, है हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।

कवि ने " सुर बाला" शब्द क्यों इस कविता में इस्तेमाल किया है " पुष्प की अभिलाषा" काव्य में श्री माखनलाल लाल जी ने ?? ....


उसके बरे में मेरी समझ अनुसार , यह " संकेत " है -- सांकेतिक शब्द चयन से स्वर्गीय , अप्सरा सम - - सुन्दरी का आभास स्पष्ट हो जाता है . देवों के सिर पर पुष्प चढाया जाता है ...किंतु , पुष्प की अभिलाषा है ....किसी वीर सैनिक की वह , चरण धूलि बने ..
काव्य - शिल्प का एक सशक्त चरण येही है कि , " IMAGE " याने कि , " अदृश्य - दृश्य " को भाव प्रवण व मुखरित कर जाए ऐसे शब्दों से , जो कवि कहना चाहता है , वह पाठक , के सामने स्पष्ट = साफ दिखायी देने लगता है । जब् कोई चित्र , आंखों के सामने होता है , उस समय , रंग , आकर , आकृति , दृश्य बहुत कुछ कह जाते हैं -- किंतु , उस के द्वारा उभरते दृश्य की जो प्रतिध्वनि और प्रतिसाद दर्शक के ह्रदय से भावों को आंदोलित करते हैं और जो भाव उठते हैं वही चित्र का स्थायी असर है .
Both POEM & PAINTINGS are ART forms. The effect they impart & the conotation they generate r " ABSTARACT " . The more successful is the attempt in creating SUCH art , the deeper emotion it invokes in the viewer's heart & leaves more lasting impression.
" चाह नही मैं ...सुर - बाला के गहनों में गूंथा जाऊं " इस पंक्ती के द्वारा , कवि कहते हैं कि , गहनों के साथ - साथ स्वर्ण तथा सुन्दरी का सामीप्य , व संनिन्ध्य भी पुष्प के लिए वाँछित नही ....जितना मातृ- भूमि पर शीश चढाने वाले , वीर सैनिक की चरण - रज बनना उसके लिए श्रेयस कर है । ऐसी उद्दात भावना से ही ये कविता कालजयी बन पायी है जिस का असर सदीयाँ बीत जाने पर भी दमकता रहेगा -
परम आदरणीय, हिन्दी के मूर्धन्य कवि श्री माखन लाल चतुर्वेदी जी को शत शत प्रणाम !
-- लावण्या

17 comments:

अभिषेक ओझा said...

अरे ये कविता तो बचपन की याद दिला गई... स्कूल में पढ़ा था.

Vibha Rani said...

baat to sahi hai. aksar mai is kavita ka sandarbh deti hoon, par aaj ke bachche isaka alag interpretation karate hain. unaki nazar mein yah kavi apanii chahat hai. koii phool kyon aisa chahegaa, jab use pata hi nahi ki sainki jiivan kya hai. yah usii tarah hai jis tarah aaj ke bachche prem chand ke 'kafan' se shamat nahin. do naakaaraa, logo par kahnai likh mari? devdas jaise hara, parajit, sharab mein khud ko dubo debnevala icon unhe nahi chahiye. ham apane atiit se lipate hoyte hai, magar bachchon kii naii soch bhii svagat yogy hai.

Udan Tashtari said...

बहुत दिनों के बाद पढ़ी. आभार आपका पढ़वाने के लिये.

हर्षवर्धन said...

बहुत दिन बाद ये कविता पढ़ी लेकिन, यही कुछेक कविताएं हैं जो इतने दिनों बाद भी याद हैं।

Parul said...

अरे दी, इस कविता पर तो हमने स्कूल मे भाव नृत्य किया था।कितना कुछ याद आ गया--:)

DR.ANURAG ARYA said...

सच मे अभिषेक ने ठीक कहा....बचपन मे ये कविता पढी थी.....फ़िर कभी कभी दूरदर्शन पे सुनाई दे जाती थी....

कंचन सिंह चौहान said...

hmm mere guru ji kahate hai.n ki ye kavita jitna saral hai utni hi gahari hai...mai bhi sahamat hu.n

Gyandutt Pandey said...

बहुत ओजस्वी कविता है राष्ट्रकवि की।

Lavanyam - Antarman said...

अभिषेक जी,
आपको स्कूल की कविता याद आ गयी , है ना ?
मुझे ये कविता बहोत पसँद है -
-- लावण्या

Lavanyam - Antarman said...

Vibha ji,
Mere Jaal Ghar per aane ka shukriya aur aapki tippani ke liye bhee.
Aaj kal ke bachchon ko Bharat ki paradheen avastha ke bare mei hume fir se avgat karate rehna chahiye.
Kavi ka hriday, Phool, paththar, Chand, Badal, Dharti sabhee mei, Maanviya Gun aur ahsaas dekh lete hain.
ees kavita mei bhee, Kavi sapeksh hai Phhol ke madhyam se we Uddat Rastra - Prem ki Bahwna ka nirupan kerte hain.
Prem Chand ji ki "KAFAN" kahanee us samay ke Bharat ki, aanchalik katha hai -
Sharad babu ka Devdas, aaj bhee jo vatartha se palayan karta hai, us insaan ke liye hum kehte hain Ye to Devdas ho gaya ! " parantu, Devdas ki katha, aaj bhee, log padhtee hain...aur bhavukta mei kayee beh jate hain to kisiko Paro aur Devdas ka Na mil pana aaj bhee, dukh deta hai-
Nayee soch ke bachche, swatantra Bharat mei pale ya Videsh mei bade hon tub unka nazariya, badalna bhee ek natural, change hee hai -
Hume unse sirf itna kehna chahiye, " Ram ne Pita ki agya se banwas sweekar kiya " kya we galat the ?
Bus, Wo Us Kaal ki katha hai - jab insaan , alag the - aaj ees Machinee yug mei hum alag hain - Meri
Baat , jara , lambee ho gayee Vibha ji :)
Sa sneh,
- Lavanya
Lavanya

Lavanyam - Antarman said...

समीर भाई, हर्षवर्धन जी,
धन्यवाद !
पारुल , आपका भाव -नृत्य काश मैँ देख पाती ! ;-)
अनुराग भाई, हाँ दूरदर्शन वालोँ ने इस भाव्नात्मक कविता का सही इस्तेमाल किया है -
कँचन जी, मेरी भी सहमति है आप से और गुरुजी से !
ज्ञान भाई साहब, जी, दिनकर जी, मैथिलीशरण गुप्त , माखन लाल चतुर्वेदी, निराला जी
महादेवी जी, पँत जी, प्रसाद जी , सुभद्रा कुमारी चौहान जी जैसे हिन्दी कवि ,
हमारे भारत की शान हैँ -
लावण्या

Manish said...

ये कविता मुझे हमेशा से पसंदीदा रही है . यहाँ पढ़वाने के लिए शुक्रिया !

राज भाटिय़ा said...

अरे वाह बचपन मे पढी थी, ओर आज यहा पढ कर बचपन याद आ गया, ध्न्यवाद

Lavanyam - Antarman said...

राज भाई व मनीष भाई
आपका भी पुन: आभार !
-- लावण्या

Dr. Harekrishna Meher said...


प्राय ४३ वर्ष पहले ओड़िशा के हाईस्कूल में हमारे पाठ्यक्रम में यही कविता थी । शीर्षक था 'फूल की चाह' । बाद में संस्कृतायित शब्द 'पुष्प की अभिलाषा' हुआ । बहुत सुन्दर एवं प्रभावशाली रचना है ।

* डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

Dr. Harekrishna Meher said...

प्राय ४३ वर्ष पहले ओड़िशा के हाईस्कूल में हमारे पाठ्यक्रम में यही कविता थी । शीर्षक था 'फूल की चाह' । बाद में संस्कृतायित शब्द 'पुष्प की अभिलाषा' हुआ । बहुत सुन्दर एवं प्रभावशाली देशात्मबोधक रचना है ।

shikha maheshwari said...

बहुत सुन्दर भावार्थ किया है | दूरदर्शन पर सुनने के बाद से ही उसकी धून प्रेरणादायक लगी थी और आज बच्चो को पढ़ाते वक्त वही धून से गाकर समझाती हूँ |
शिखा माहेश्वरी , मुंबई