Saturday, August 2, 2008

ये भारत देश है मेरा ...जहाँ डाल डाल पर सोने की चिडियाँ करतीँ हैँ बसेरा


भारत , एक विशाल और प्राचीन देश है जहाँ विविधता का अद्भुत सामंजस्य पाया जाता है। " इंडीया " या भारत , महज एक स्वतंत्र और सार्वभौम देश ही नहीं, विचारों के सम्मिश्रण का प्रकट स्वरूप भी है। जिसकी नाज़ुक एकता , परस्पर गुंथे , अद्रश्य धागों से बंधी हुई है और अपनी भौगोलिक सीमाओं तक फ़ैली हुई है। अपने आप को सम्हाले हुए , विश्व को एहसास करवाते हुए , इस सत्य का कि," भारत आजाद है ..भारत आबाद है ...भारत...है ! "

एक त्रिकोण है, पूर्व में बंगाल की खाडी और पश्चिम दिशा में, अरबी समुद्र से आवृत , दक्षिण दिशा को हिंद महासागर की सीमाएं आरम्भ करतीं हैं जिसके भूखंड पर , १ अरब की आबादी बसती है !

उत्तर दिशा को हिमालय के हिमाच्छादीत पहाड़ , शोभित करते मुकुट बने दीखलाई देते हैं और राजस्थान की रेत से उठते कई सूरमा राजाओं के स्वप्न , मृगतृष्णा से तेज सूर्य के ताप में झिलमिलाते हुए ..अलोप हो जाते हैं !

हिम से ढँके ग्लेशीयरोँ से उतरती गंगा , यमुना ब्रह्मपुत्र , सतलुज, चिनाब , रावी और सिन्धु नदियाँ , उत्तर के रसाल भूभाग को सदीयों से , अपना अमृत जल पिलाती , कई नस्लों का, इतिहास गढ़ने में , अपना मूक , कर्तव्य पालन कर , आज भी धीर गंभीर बनी बहती जा रही हैं !

वर्तमान से भविष्य तक की धारा है ये ..भारत के शरीर की, शिरा और धमनियां हैं ये जो देखतीं हैं, कलकत्ता जैसे शहर को बस्ती से भरे हुए , उप नगर और नगर , जहाँ, आबाद हैं , हर तरह के प्राणी , जहाँ उन का बसेरा है।

बॉम्बे ,कलकत्ता , मद्रास , दिल्ली जैसे महानगर हैं और अलहाबाद, जयपुर , मैसूर, बनारस, लखनऊ, इंदौर , ग्वालियर जैसे संस्कृति के गढ़ भी हैं इस भारत देश में !

हर प्रांत की विविधता को , एक अद्रश्य , एकता के सूत्र में पिरोकर , जीता जागता , भारत देश ही नहीं है ये एक जेवर है , समूचे विश्व का !
हमारा भारत, जिसे परदेसी " इंडिया" कहते हैं और हसरत की निगाहों से देखते हैं और दिल ही दिल में , भारत आकर इस की विविधता में रंग जाने का सपना भी पालते हैं !
जी हाँ, ये सच है !
हम यहाँ, बौध्ध,ईसाई, इस्लाम, जैन धर्म ,ईसा मसीह का ख्रिस्ती धर्म प्रकृति पूजा , पारसीयोँ का जरथ्रुष्ट से शुरु हुआ धर्म , हर कोने मेँ फलता, फूलता हुआ देख लेते हैं --
८४५ भाषाएँ और असँख्य बोलियाँ , आर्य और द्रविड सभ्यता उत्तर और दक्षिण मेँ सुरक्षित और आज भी पनप रहीँ हैँ - तेलेगु, तमिल, कन्नड और मलायली भाषाओँ का साहित्य अति समृध्ध व विशाल है।
कहीँ केसरिया और नीली पगडी बाँधे सीख सँप्रदाय के बहादुर सिँघ आपको दीखाई देँगेँ तो कहीँ नागा साधुओँ का जत्था
" हर हर महादेव " के जयघोष के साथ कुम्भ स्नान मेँ गँगा मैया के आगोश मेँ समाने , धूल और समशान घाट की राख मले दौडता दीखलाई दे जायेगा और जँगलो मेँ , निसर्ग की गोद मेँ पलते , प्राकृत अवस्था मेँ जीते , आदिवासी दीख जायेँगे -
प्रखर ताप से काले हुई चर्म को, मुस्कान से रँगे, मुख हैँ तो कहीँ फ्रान्स से लायीँ गयीँ महँगी इत्र की शीशी से शरीर और महीन शीफोन की साडियोँ मेँ लिपटीँ महारानियाँ शोफर ड्रीवन
" रोल्स रोयस " कारोँ से उतरतीँ दीख जायेँगीँ -
इन्हीँ " "असूर्यशम्पाओँ " के लिये भाट चारण बिरदावली रचा करते थे!
माफ कीजिये, भारत की बात आते ही मेरी बिरदावली सी ये भूमिका भी अपनी ही रौ मेँ बह निकली है और गँगा माई की धारा - सी बहने लगी है।

हम आज मिलने चले हैँ भारत के ३ रे प्रधानमँत्री ,
स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी से...
जिनका जन्म हुआ था
अक्टूबर - २ , १९०४ को और उन्होँने देहत्याग किया
जनवरी - ११ , १९६६ को !
उनका जन्म हुआ मुग़ल सराय , उत्तर प्रदेश में !
उनके पिताजी का नाम था श्री शारदा प्रसाद जी!
माता पिता प्यार से उन्हें 'नन्हे ' कहकर ही पुकारते
थे ये प्रार्थना वे हमेशा करते :
" हे नानक ! मैं कुश ( घास ) की तरह लघु हो जाऊं , क्यूंकि दुसरे पौधे , नष्ट हो जायेंगे परन्तु, कुश हमेशा हराभरा रहेगा "
लाल बहादुरजी के पिता जब वे डेढ़ सालके थे, चल बसे!
वे जब शिशु ही थे तब एक दिन उनकी माता के हाथोँ से नदी मेँ गिर पडे और किसी गौपालक के हाथोँ मेँ जा गिरे - अब वह ग्वाला सँतान के लिये तरस रहा था उसने इसे देव का वरदान मान लिया और वो उन्हेँ अपने घर ले आया ! लाल बहादुर जी के माता पिता ने अखबार मेँ खबर छपवाई और उस ग्वाले को ये बात का पता चला तब उसका ह्र्दय पसीजा और उसने बालक को थाने जा कर लौटा दिया और तब वे पुन: अपने घर पहुँचे थे।
ये घटना अपने आप मेँ अजीब सी है।
माता रामदुलारी देवी ने २ बड़ी बहनों के संग लाल बहादुर को ले , ननिहाल में आसरा लिया।
नाना जी हजारीलाल जी के घर लाल बहादुर जी १० साल तक रहे। आगे की पढाई के लिए मामाजी के घर वाराणसी भेज दिए गए।
हरिस्चन्द्र हाई स्कुल मेँ, पढाई करते रहे और उसी अर्से एक बार दोस्तोँ के सँग, गँगा पार, मेला देखने पहुँचे।
धारा मेँ पानी उफान पर था और लौटकर पार आने के लिये नाविक को देने के लिये गाँठ मेँ अधेला भी नहीँ था !
अब क्या हो ?
स्वाभिमानी लाल बहादुर ने, नदी मेँ छलाँग लगा दी और तैर कर नदी पार कर वे घर पहुँचे थे।
काशी विध्यापीठ मेँ भी शिक्शा ली --
१९२७ , शास्त्री जी का विवाह मिर्झापुर की कन्या
" ललिता देवी " के सँग हुआ
दहेज की प्रथा का प्रचलन , उस समय एक आम बात थी ऐसे समय मेँ अपनी सज्जनता की मिसाल देते हुए, लाल बहादुर जी ने सिर्फ एक चरखा और खादी की कुछ लडेँ ही उपहार स्वरुप स्वीकार कीँ थीँ।
केन्द्रीय कानून मँत्रालय मेँ ,१९५२ , रेल मँत्रालय मेँ १९५२ -५६ , और व्यापार वाणिज्य मँत्री रहे १९५७ -६१ और गृह मँत्रालय मेँ , १९६१ -६३ रहे जब अचानक श्री जवाहरलाल नेहरू का १९६४ में निधन हो गया !
मई २७, १९६४ का दिन, भारत के लिये एक भयँकर आघात बनकर उपस्थित हुआ जब प्रधानमँत्री के पद पर आरुढ जवाहर लाल जी दोपहर को चल बसे !

मुझे याद है, पापाजी ने बतलाया था कि आकाशवाणी के दिल्ली के वरिष्ठ कार्यालय मेँ मानोँ सभी को साँप सूँघ गया हो और काटो तो खून भी न निकले ऐसी परिस्थिती मेँ आम कर्मचारी बौखलाया हुआ, गभराया हुआ, सँज्ञाशून्य सा हो गया था !
कई अधिकारी सहमे हुए, ये अँतराष्ट्रीय स्तर के समाचार को, जाहीर करने से सकपका रहे थे और पापाजी ने अपने ऊपर ये जिम्मेदारी लेते हुए कहा था,
" ये समाचार इसी समय, जनता को देना हमारा कर्तव्य है -"
और समाचार प्रसारित करते ही पहले पूरा भारत और फिर विश्व के सभी हिस्सोँ मेँ शोक की लहर दौड गई थी साथ ही १९६२ की चीनी हमले की अपमान की याद भी कहीँ दब गई थी।
उसके बाद के समय मेँ, भारत मेँ अन्न का अभाव उभर कर सामाने आया था। बँगलूर से लुधियाना तक लोगोँ के असँतोष की अग्नि बाहर आकर भडकती दीखलाई देने लगी थी....

...पँडित नेहरु के शाशन काल मेँ कृषि पर ध्यान नहीँ दिया गया था बल्कि उध्योग और बँध बाँधने मेँ , पँचवर्षीय योजनाएँ चल रहीँ थीँ कुछ सफल हुईँ थीँ कुछ नहीँ।
कश्मीर और कच्छ के रण पर पाकिस्तानी सेना दस्तक दे रही थी युध्ध आया , अभी आया ...
जिससे असँतोष, असहजता, व्याप्त थी।
ऐशिया के अन्य महत्त्वपूर्ण देशोँ मेँ फिर भी भारत अपनी अलग पहचान बना रहा था इतिहास को रच रहा था,
गढ रहा था।
जिस के पीछे एक नन्ही शक्ति खडी थी द्रढता से भारत के प्रधान मँत्री पद की बागडोर सम्हाले हुए थे
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी !
सज्जनता की शर्म ओढे , गुलाब का फूल सुफेद झक्क अचकन मेँ खोँसे, सुन्दर लँबे नेहरु जी के स्थान पर ,
छोटे सिर्फ कद से, परँतु अपने चारित्र्य के बल से ऊँचे,
इस सीधे सरल इन्सान पर
भारत की जनता की आस बँधी हुई थी।

शास्त्री जी ने जनता से अपील की थी
कि एक वक्त का भोजन छोड देँ और किसी जरुरतमँद इन्सान को भोजन खिलायेँ -
" जय जवान, जय किसान " का नारा भी
उन्होँने बुलँद किया था।
भारतीय सेना के २ दस्तोँ को पाकिस्तान के पास कच्छ की सीमा पे भेजा तो लोगोँ को उनके साहस का परिचय हो गया।

कैरो, मोस्को, युगोस्लाविया, बेलग्रेड और ओटावा की विदेश यात्राओँ से भारतीय शाँति का सँदेश लाल बहादुर जी ने पहुँचाया तो भारतीय आवाम ने उन्हेँ आदर दिया।

स्वदेश लौटे तो १६ प्राँतोँ के मुख्य मँत्रियोँ को बुलाकर खाध्यान्न के वितरण के लिये "रेशन -कार्ड " व्यव्स्था की शुरुआत करवायी।

पाकिस्तान के साथ युध्ध विराम की घोषणा के बाद,
जनरल अय्युब खाँ से शिखर मँत्रणा के लिये तब शास्त्री जी ताशकँद के लिये रवाना हुए।

ताशकँद इस वक्त उझ्बेकिस्तान का हिस्सा है पर पहले वो सोवियत सँघ का भाग रहा था।
सोवियत प्रमुख कोसीजीन के आग्रह पे ताशकँद करार पर लाल बहादुर शास्त्रीअय्युब खाँ ने ,
१० जनवरी १९६६ के दिन हस्ताक्षर किये -
दूसरे दिन १-३२ मिनट पर ह्र्दय गति रुक जाने के कारण शास्त्री जी का देहाँत हो गया !

आजतक कईयोँ का विश्वास है कि उनके अकाल मृत्यु के पीछे कोई साजिश थी - अब उसका कोई सबूत तो नहीँ है पर इस तरह बहुत कम देश के प्रमुख का परदेस मेँ निधन हुआ है - इसलिये ये प्रसँग आज भी अवास्तविक लगता है।

भारत के इस सच्चे सपूत की समाधि " विजय -घाट" दिल्ली मेँ बनी हुई है और भारत ~ रत्न से लाल बहादुर शास्त्री जी को देशने सम्मान दिया है।
आँध्र प्रदेश का क्रीडाँगण
"लाल बहादुर स्टेडीयम" कहलाता है।
भारत के लाल की कमी सबसे ज्यादा खली उनकी धर्मपत्नी श्रीमती ललिता देवी की बडी सी सिँदूरी बिँदिया की कमी से ! उनके भाल पर , सिँदूरी बिँदिया की गैरहाजरी से !
चूँकि, जब भी ललिता जी को हमने देखा तब , बडी सी बिँदिया सजाये , मुस्कुराता भाभी माँ सा चेहरा ही
आँखोँ के सामने आता रहा है।
भारत के प्रधान मँत्री पद पे फिर एक बार श्री गुलजारीलाल नँदा आये और भारत की स्वतँत्रता की यात्रा चलती रही ~~~
स्वर साम्राज्ञी लता मँगेशकर जी ने ललिता जी के लिखे कुछ भजन व गीतोँ को अपना स्वर देकर इस दँपत्ति को अपनी श्रध्धा से सन्मान दिया है -
ये भजन प्रस्तुत है।
शब्द यहाँ है -
अगर किसी के पास ये गीत हो तो अवश्य सुनवायेँ ।
नॉन - फ़िल्म / गायिका : लता मंगेशकर /
संगीत : श्री चित्रगुप्त जी :
लेखिका : श्रीमती . ललिता शास्त्रीजी / : १९६४ :
(बता दे कोई मोहे श्याम की डगरिया) - २
श्याम की डगरिया मोरे राम की डगरिया बता दे कोई मोहे श्याम की ...डगरिया....
कहाँ मैं ढोओँढ़ोओँ सीता रमन को कैसे मैं पाऔँ श्याम
सुन्दर को बता दे कोई श्याम से मिलने की जतनिया
बता दे कोई मोहे श्याम की डगरिया -२
श्याम सुन्दर की मोहनी मूरतराम-कृष्ण की सावली सूरत -२ दिखा दे कोई दोनों की मोहनी मूरतियाँ
बता दे कोई मोहे श्याम की डगरिया -२
निस दिन तरसत नैन हमारेकैसे मिलेंगे मोहे राम पिया रे -२ दिखा दे कोई ललिथ को श्याम कि नगरिया
बता दे कोई मोहे श्याम की डगरिया -२
श्याम की डगरिया मोरे राम की डगरियाबता दे कोई मोहे श्याम की डगरिया
-- लावण्या के नमन

15 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

भारत माता की जय!!
क्या उम्दा लेख लिखा है आपने.. मज़ा आ गया.. भारत के इतने आयाम एक ही लेख में बाँध दिए.. बधाई

Gyandutt Pandey said...

लाल बहादुर जी को देख कर मुझे लगता है कि एक साधारण - अति साधारण पृष्ठ भूमि वाले व्यक्ति के लिये भारत में शिखर पर जगह है।
और यह बहुत बड़ी बात है।

Advocate Rashmi saurana said...

Mera Bharat Mahan. bhut badhiya likha hai.

दिनेशराय द्विवेदी said...

सुंदर, महत्वपूर्ण और संग्रहणीय आलेख। बधाई आप को।

Vivek Chauhan said...

bhut badhiya lekh. jari rhe.

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया लिखा है,साथ ही बहुत जानकारी भी मिली।आभार।

राज भाटिय़ा said...

लावण्यम् जी, आप का लेख बहुत ही सुन्दर ओर भाव पुरण हे,आप ने लाल बहादुर शास्र्ती जी के बारे बताया, भारत मे आज तक सिर्फ़ लाल बहादुर जी ही एक ऎसे नेता हे जो सच मे एक ईमान दार थे, ओर अगर कुछ साल वो ओर रह जाते तो आज के भारत की तस्वीर ही अलग होती. धन्यवाद

डॉ. अजीत कुमार said...

लावण्या जी,
आपकी इस पोस्ट ने हममें देशभक्ति एक नया जज्बा पैदा किया है.
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी के बारे में कई प्रेरक प्रसंग हमने भी पढे हैं. आज आपकी जबानी उनके और ललिता जी के बारे में पढ़ कर अतीव आनंद की अनुभूति हुई.

Harshad Jangla said...

Lavanyaji

Wonderful and well described lekh.

Thanx.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

नीरज गोस्वामी said...

लावण्या जी
बहुत सारगर्भित लेख लगा आपका...जानकारी से भरपूर.
नीरज

अनुराग said...

ऐसे लोग अब नही मिलते ,न पैदा होते ,होते भी है तो एक उम्र तक जी नही पाते .....वो लोग अलग थे ,वो काल अलग था

Abhijit said...

shastriji par ye lekh likhne ke liye dhanyawaad. we pehle mantri the jinhone "naitik zimmedari" ka udaharan dene ke liye pad-tyag kiya tha. aise imandaar aur saaf chavi waale neta ke baare me sunte hain aur phir sansad me note lehrate huye neta dikhte hain....

Shastriji ki yaad dilane ke liye aise aur lekho ki avashyakta hai

pallavi trivedi said...

hamesha ki tarah aapka ye lekh bhi bahut umda hai...shastri ji ki yaad karane ke liye dhanyvaad.

Lavanyam - Antarman said...

श्री लाल बहादुर शास्त्री
व ललिता जी को
सम्मान देने के लिये
आप सभी का
बहुत बहुत आभार !
-लावण्या

Atul Shrivastava said...

बेहतरीन जानकारी भरा प्रासंगिक लेख।
आभार आपका......