Friday, February 15, 2008

मलिका पुखराज ...मलिका - ऐ तरन्नुम


लिका पुखराज ...मलिका - ऐ -- तरन्नुम को सुनिए लो फ़िर बसंत आयी

http://www.youtube.com/watch?v=jq3bb33sElU&feature=related

लो फ़िर बसंत आयी --- सुनिए ये नगमा , मलिका जी, ताहीरा की आवाज़ में
मलिका पुखराज ओर ताहीरा सैयद उनकी बिटिया -- लाइव -- अभी तो मैं , जवान हूँ

http://www.youtube.com/watch?v=GUuXAHfQz7k&feature=related
रीम झीम रीम झीम पड़े फुहार http://members.tripod.com/oldies_club/malika_pukhraj.htm
जन्म: १९२१ - जम्मू कश्मीर में हुआ ओर देहांत -- २००४ लाहौर पाकिस्तान में हुआ
उस्ताद अल्लाह बख्श साहब ने मलिका पुखराज को संगीत शिक्षा दी।
कश्मीर के महाराजा हरी सिंहजी के राज दरबार में ८ साल की उम्र में , मलिका ने गीत गा कर सभी को रीझाया तभी से वे , राज दरबार से जुड़ गयीं -उसके बाद, ८ दशक तक वे, ठुमरी, गजल, भजन, लोक गीत व पहाडी गीतों में उनके हुन्नर ओर महारथ की वजह से , मशहूर हुईं ओर पाकिस्तान जाकर बस गयीं। सैयद शब्बीर हुसैन खान साहब से ब्याह रचाया ओर ६ संतानों की माँ बनी -

साथ ही संगीत का सफर जारी रहा। Song Sung True उन्होंने अपनी आत्म कहानी लिखी है - जिस हाल, मैं, पढ़ रही हूँ जिसके कारण , उनके बारे में जानकारी हासिल करने की उत्सुकता हुई ओर इस प्रविष्टी का आगाज़ हुआ -
इसी किताब में एक जगह वे लिखतीं हैं " देहली में , मैं, २ बहनों से मिली : चवन्नी ओर दुअन्नी , जितनी चवन्नी , बदसूरत थी उतनी ही दुअन्नी बला की खुबसुरत थी पर, दोनों गातीं बहुत अच्छा थीं " उस पुराने समय की देहली शेहेर की बातें , कश्मीर के जम्मू इलाके की कई बातें तथा उनकी तालीम के बारे में , फ़िर कश्मीर के महाराजा हरी सिंह जी के , राज्याभिषेक के बारे में जितनी बातें मलिका जी ने बयान की है , वाकई , यादगार है जो हमें गुज़रे हुए जमाने के तौर तरीकों से, रूबरू , करवाती दिलचस्प बातें हैं .... पढने लायक है ये उपन्यास के रूप में लिखी हुई आत्मकथा , अपने अंदर , एक गुजरे हुए जमाने के बारे में , बहुत सारा , समेटे हुए ...

Thursday, February 14, 2008

झूमता मौसम मस्त महीना : हैप्पी वैलेंटाइन'स डे

Jhoomta Mausam - Hindi Version
Jhoomta Mausam - Adaptation in Greek
पुरूष स्वर: झूमता मौसम मस्त महीना
चाँद सी गोरी , एक हसीना,
आँख में काजल, प्यार का मौसम,
मुंह पे पसीना याल्ला याल्ला दील ले गयी
स्त्री स्वर : कोई रंगीला सपनों में आके,
एक नजर से अपना बना के,
प्यार का जादू, हम पे चला के,
याल्ला याल्ला, दील ले गया !

हम से मिले तुम सजन , तुम से मिले हम , बरसात में

प्यार कर लो ...इस दुनिया में आए हो , बस इकरार कर लो ...

Wednesday, February 13, 2008

"कवितांजलि" : आदित्य प्रकाशजी -"रेडियो सलाम-नमस्ते" :

आदित्य प्रकाश
Monday, 11 February २००८ http://www।hindimedia.in/content/view/1189/141/
dallas.jpgहमारे देश में फिल्म और टीवी दुनिया के लोग हिन्दी के नाम पर करोड़ों अरबों रुपये की कमाई करते हैं, मगर किसी भी मौकै पर हमारे फिल्मी सितारों, निर्देशकों और इससे जुड़े हर शख्स को हिन्दी बोलने में मानो शर्म महसूस होती है। अब तो फिल्म समारोहों में जाकर दो दो कौड़ी के विदूषक, जिन्हें अभिनेता की बजाय जोकर कहना ज्यादा बेहतर होगा हिन्दी के शब्दों की खिल्ली उड़ाते हैं और उस समारोह में भाजपा के नेता और हिन्दी की कमाई खाने वाले शत्रुघ्न सिन्हा तालियाँ बजाकर उन जोकरों की बातों पर वाहवाही करते हैं। दूसरी ओर हमारे देश से हजारों मील दूर ऐसे लोग हैं जो जिन्होंने अपने वतन, मिट्टी और भाषा और साहित्य को जिंदा ही नहीं रखा है बल्कि निःस्वार्थ सेवा कर इसे और समृध्द बना रहे हैं। पेश है अमरीका के डैलास से श्री आदित्य प्रकाश की यह रपट कि किस तरह एक रेडिओ कार्यक्रम से पाकिस्तानी, बंगलादेशी और भारतीय का भेद मिट गया है और सभी लोग अपने आपको एक ही देश से जुड़ा महसूस करने लगे हैं।
विदेश में भीड़ में अकेले खो ना जाएं, इसके लिये सामाजिक संस्थाएं, मंदिर, देशी पर्व त्यौहार पर उत्सव अकेलेपन को अवश्य दूर करता है और व्यक्ति अपने देश से जुडा़ महसूस करता है। सामुदायिक रेडियो जहाँ भारत पाकिस्तान और बांगलादेश के लोग एक मंच पर "देसी" बन कर अमेरिका में अपनी पहचान बना पाने में सक्षम हो पाते हैं। दो वर्ष पहले, अमेरिका के डैलस शहर में एक नया रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ, "रेडियो सलाम-नमस्ते" जिसे हर भारतीय और पाकिस्तानी अपना रेडियो समझता है। आज इस रेडियो से हिन्दी, उर्दु, तेलुगु, तमिल, गुज्रराती, पंजाबी और नेपाली भाषा में एक एक घन्टे के कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते है। यह अमेरिका का पहला एफ़-एम (104.9 fm) रेडियो स्टेशन है जो सातों दिन, चौबीसो घंटे अपना कार्यक्रम प्रसारित करने के लिये चर्चित है। वैसे तो इस रेडियो स्टेशन से कई कार्यक्रम प्रस्तुत किये जातें हैं, पर हिंदी कविता पर विशेष कार्यक्रम "कवितांजलि" अपने आप में विश्व में अनूठा बन गया है।

हर रविवार रात्रि 9 बजे से यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है जिसके लिये अमेरिका के हिंदी प्रेमी आतुरता से प्रतीक्षा करते हैं। "कवितांजलि" ने कविता के माध्यम से दुनिया भर के कविता प्रेमियों को एक साथ लाने का जो प्रयास किया है, उसे दुनिया भर के रसिक श्रोताओं ने सराहा है। इस मंच पर भारत के कई लोकप्रिय कवि पाठ कर चुके हैं जिनको सुन कर अमेरिका में बसे भारतीयों को हजारों मील दूर भी अपने वतन की मिट्टी की महक मिलती रहती है और वे अपने आपको इस माटी से जुड़ा महसूस करते हैं। इस कार्यक्रम से अमेरिका में हिंदी कि दशा और दिशा, दोनो का पता चलता है। इस रेडिओ के माध्यम से जय शंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की छंद बद्ध कविताओं को सस्वर को प्रस्तुत कर उन्हे पुनर्जीवित किया गया है।

भारत में से जिन कवियों ने इस रेडियो कार्यक्रम से अपना काव्य पाठ किया, उनमे कुमार विश्वास, सुनील जोगी, राजेश चेतन, ओम व्यास, पवन दीक्षित, मनोज कुमार मनोज, दीपक गुप्ता, अर्जुन सिसोदिया, मनीषा कुलश्रेष्ठ, डाँ कविता वाचकनवी आदि प्रमुख हैं। जबकि प्रवासी कवियों में: अंजना संधीर, लावण्या शाह (लावण्याजी जाने माने गीतकार स्वर्गीय पं. नरेंद्र शर्मा की पुत्री है), इला प्रसाद, अभिनव शुक्ल, रेखा मैत्र, प्रियदर्शिनी, कुसुम सिन्हा, देवेन्द्र सिंह, अर्चना पांडा, रेणुका भटनागर, सुधा धिंगरा, हरिशंकर आदेश, डाँ ज्ञान प्रकाश, शशि पाधा, कल्पना सिंह चिटनिस आदि ने काव्य पाठ कर अमरीका में बसी भारत की नई पीढ़ी और भारतीयों की पुरानी पीढ़ी को अपनी भाषा और साहित्य के सौंदर्य से परिचित ही नहीं कराया है बल्कि हमारी साहित्य और संस्कृति को एक नया आयाम दिया है। साहित्यकारों में इंटरनेट के माध्यम से हिन्दी के नवोदित रचनाकरों को मंच देने में सक्रिय भूमिका निभाने वाले रापयुर के श्री जयप्रकाश मानस (सॄजनगाथा) का भी इस आयोजन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

आज स्थिति यह हो गई है कि कविता के इस कार्यक्रम के लिए अमरीका में बसे भारतीय बेसब्री से इंतजार करते हैं। अभी हाल में कवि आदेश जी ने पहली बार इस कार्यक्रम को सुना तो अपना अनुभव काव्य में ही भेज दिया (कुछ पंक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत हैं)-
"गीत में नव प्राण भरता कार्यक्रम कवितांजलि,
विश्व में हर ओर से, हर छोर से कवि जुड़े रहें।
रच रहा इतिहास नूतन कार्यक्रम कवितांजलि॥
पुनर्जीवित हो उठे हैं "पंत", "जय शंकर प्रसाद",
नव दिशा दिखला रहा है कार्यक्रम कवितांजलि॥


खुशी कि बात है कि इस रेडियो को ऑनलाइन विश्व भर में कहीं भी कभी भी सुना जा सकता है। आप चाहें तो अपने घर में बैठकर भी इस कार्यक्रम का मजा ले सकते हैं। www.radiosalaamnamaste.com और अगर कार्यक्रम सुनते-सुनते आपके अंदर किसी कविता का जन्म हो जाए तो तो फोन उठाएं और काल करें: 972-401-1049. इसी माह "कवितांजलि" अमेरिका में अपना एक वर्ष पूरा कर रही है।

(लेखक इस कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता हैं और वे अपने हिन्दी प्रेम के कारण इसके लिए निःशुल्क सेवाएं देते हैं)

Friday, February 8, 2008

ही इझ नो मोर ! ११ फरवरी पापा की पुण्य तिथि --

(ये चित्रों का कोलाज़ मेरी दीदी श्री लता मंगेशकर जी ने बना कर भेजा है सभी चित्र लता दीदी ने ही खींचे हैं )
११ फरवरी करीब आ रही है और पापा जी की फिर याद, बार बार् , मन को मसोस जाती है -१९८९ की काल रात्रि थी ९ बजे थे और हम चारोँ, मैँ,मँझली, बडी बहन वासवी, मुझसे छोटी बाँधवीहमारे पति, (सबसे छोटा परितोष पूना गया था ) और अम्मा पापा जी के इन्टेन्सीव वोर्ड मेँ, खडे थे , जब्, अम्मा , पापा जी के,पैरोँ को सहला रहीँ थीँ और पापा अनवरत "प्रभु ...प्रभु " कुछ रुक रुक कर बोल रहे थे।
हल्की लकीर मुस्कान की भी थी उनके पान से रँगे होँठेँ पर ..
.हाँ पान, जो आखिरी बार टहलते हुएशाम के करीब ४.३० बजे , उसे, रास्ता पार करके, नुक्कड की दुकान से लाये थे -
अम्मा
से कहा था,'सुशीला , तुम चाय बनादो , मैँ तुम्हारे लिये पान ले आता हूँ "
पिछले ७ दिनोँसे, पापा ने, अपना भोजन नहीवत्` कर दिया था -
सिर्फ सँतरा मुसम्बी का जुसही पीते थे !
वो
भी दिन मेँ बस २ बार , शाम ढलने से पहले ! अम्मा भी परेशान थीँ -मुझसे ३ दिन पूरे हुए तब शिकायत भी की थी, " लावणी पापा न जाने क्यूँ सिर्फ जूस ही पी रहे हैँ और बेटे, फल भी खत्म् हो गये हैँ !"
मैँने फौरन बात काटते हुए कहा,
"अम्मा, मैँ हमारे महराज जी को अभीभेजती हूँ ..कुछ तो मेरे पास हैँ उनका जूस पीला देना और वे और बाज़ार से लेते आयेँगेँ मैँ समझा दूँगीँ "
'खैर ! बात आई गई हो गई ..
पापा
निर्माता निर्देशक श्री बी. आर. चोपडा जी की "महाभारत " टी.वी.सीरीझ के निर्माण से जुडे हुए थे और सारी प्रक्रिया मेँ आकँठ डूबे हुए थे॥
रोजाना मीटीँग्स्, सुबह ९ बजे से तैयार , निकलते और शाम देरी से लौटते !
फल
भिजवाने के दूसरे दिन, मैं, शाम को अम्मा पापा जी के घर पहुँच गई
-देखा , पापा चाय सामने रखे,गुमसुम से पालथी लगाये, डाइनीँग टेबल की क्रीम नर्म चमड़े से बनी कुर्सी पर बैठे हैँ
-ये बिलकुल साधु सँतोँ जैसा उनका पोज रहताथा सूती मलमल की , धोती, उनके पैरोँसे लिपटी रहती थी,वो पैर जो हमेशा चलते रहे ..काम का बोझ सरलता से उठाये ॥
अम्मा किचन से आयीँ और छोटी स्टील और ताँबे की कडाही मेँ
गेहूँ का शीरा तभी बना के लाईं थीं -
जिसे १ निवाले जितना पापा ने मुझे दिया , खुद खाया और बस्! खत्म हो गया !!
-अम्मा को नहीँ दिया गया !
शायद वो मेरे "परम योगी" पिता का अँतिम प्रसाद था ॥
३ दिन गुजरे इस बात को और पान लेकर पापा लौटे तब तक उन्हेँ बैचेन देख अम्मा ने मुझे फोन किया मैँ चप्पलेँ पैरोँ मेँ डालकर भागी ॥
पता नही क्या सोचकर रुपयोँका बँडल भी पर्स मेँ जल्दी से डाल दिया ! मुझसे छोटी बाँधवी अपने पति दीलिप के सँग डाक्टर को लेकर आ पहुँची
-पापा ने बडी विनम्रता से उठकर सब का स्वागत नमस्ते से किया परँतु उन्हेँ दिल का सीवीयर दौरा पडा है ऐसा डाक्टर ने कहा तब हम सभी, कुछ घबडाये
-तुरँत कार मेँ अस्पताल जाने को निकले ॥
अम्मा पीछे की सीट पे मेरे साथ बैठीँ थीँ और पापा जी ने अम्मा का हाथ अपने सीने से लगा रख था और वे "प्रभु " प्रभु " बोल रहे थे !
मैँने सोचा, अगर मामला सीरीयस होता तब वे अवश्य "राम राम" बोलते ॥
गाँधी बापू की तरह !! ॥
मेरे पापा जी को कुछ नही होनेका ..वे स्वस्थ हो जायेँग़े ..
.अरे, परितोष को , उसकी ज़िद्द पे ही, कितने प्रेम से, पीठ सहला कर
नयी गाडी लाने भेजा था उन्होँने !
परितोष कहता, "पापा आप भी नयी कार मेँ काम पर जाया करिये ना, सभी जाते हैँ !" और पापा मुस्कुरा के रह जाते ॥
वे तो अक्सर, दूरदर्शन, आकाशवाणी,अन्य शैक्षिकणिक सँस्थानोँ के आमंत्रणों पर, ट्रैन, बस या अक्सर पैदल ही मीलोँ बम्बई मेँ घुम आत थे !
इतनी
सहजता से, मानोँ ये कोई मुशिकल काम ही नहीँ !!
और
पापा के असँख्य प्रसँशक, मित्र, सहकर्मी, बडे बडे कलाकार, साहित्यकारोँ का
घर पर ताँता लगा रहता -
ऐसे
पापा अस्पताल पहुँचे तब हार्ट स्पेशीयालीस्ट१ घम्टे विलम्ब से आये !
:-(और, अम्म नो हाथ फेरा तो पापा ने उनकी ओर देखा और आहिस्ता से आँखेँ मूँद लीँ ! बस्स ! क्या हुआ इसका किसी को भान न था :-((॥
एक मेरे पति दीपक के सिवा ..
उसने
अम्मा को प्यार से कहा,
" चलिये अब घर जाकर थोडा, सुस्ता लेँ अम्मा आप भी थक गयीँ होँगीँ "
और अम्मा अनमने ढँग से बाहर आयीँ और दीपक उन्हेँ बाँद्रा से, खार के घर ले गये. हम तब भी वहीँ खडे थे पापा को घेरे हुए ...
और
एकदूजे से कह रहे थे ,आज मैँ रात पापा के पास रहूँगी , कल तुम रहना "
--पापा जी की , नर्म हथेली सहलाते वक्त , उन्होँने मुझे ढाढस बँधाया था,
" बेटा, सब ठीक हो जायेगा" जैसे वे हमेशा कहा करते थे ॥
पर ,अम्मा के जाते ही हम पर मानोँ सारा आकाश टूट पडा और धरती खिसक गयी जब नर्स ने रुँआसे स्वर से कहा" ही इझ नो मोर "...

Tuesday, February 5, 2008

विश्व के सर्वोच्च शक्तिमान इन्सान : पोप

प्रभू ईसा मसीह,संत पीटर को चाबी देते हुए
पोप का धर्म प्रतीक
पोप बेनेडिक्ट
चित्र में : माता मरियम को ईसा मसीह की अनुभूति, देवदूत की उपस्थिति में
येरूशालेम चर्च आज भी चर्च समुदाय का मुखिया माना जाता है।
अलेक्ज़ान्द्रिया शहर यहूदी शिक्षा ओर संस्कृति का केन्द्र रहा है.
सन : ३० से लेकर १३० तक वहीं ख्रिस्ती धर्म की नींव राखी गयी थी।
सन १९५ पॉप विक्टर प्रथम ने, रोम शहर , कि जिसे इसा मसीह के शिष्य पीटर ने स्थापित किया था , उसे, अन्य चर्चों में , प्रमुख स्थान दिया।
पोप लीयो ने सन ४५१ में , कोंस्तान्तिनोपाल शहर के बदले,
रोम का वर्चस्व , पुनः मजबूत किया।
पोप हीराक्लास ने सन २३२ में और सीरीसीयस ने भी पोप के रूप में प्रतिष्ठा पायी थी।
बायाजेंटीयम साम्राज्य में , रोम पेपल सता की मुख्य जगह रही।
चार्ल्समेंगने प्रथम राज पुरुष रहा जिसे सम्राट के पद पर ,
पोप ने , धार्मिक विधि से पदासीन किया था।

पोप का चुनाव कार्डिनेल , करते हैं जो सदस्यों के मध्य से ही करने की प्रथा है।
सन ११७९ में हर कार्डिनेल को समान दर्जा दिया गया।
सन १३७८ में पोप अर्बन , का चुनाव, बाहर से किया गया जों एक अपवाद था।
सन १२७४ की ७ मई को ये निर्णय लिया गया की पोप के देहांत होने पर १० दिन के भीतर , ८० वर्ष की उम्र के नीचे के सभी कार्डिनेल, पेपल कोंक्क्लेव में , बंद होकर , गुप्त मत विधि से , नये पोप का चुनाव करेंगें ।
इस का तरीका था , अपने स्वर से या माथा हिलाकर किया जाना
सन १६२१ में पोप जोन पोल द्वितीय ने , मतपत्र ओर बक्से द्वारा मतदान आरंभ करवाया जो सीस्तीन चेपल में किया जाता है -
- जीहाँ वही जगह जो वेटिकन सिटी , पोप का आवास है जहां , माइकल एन्जेलो द्वारा , विश्व की , सबसे कलात्मक चित्रकारी , गुम्बद नुमा , चर्च की भींतों पर और छत पे उकेरी गयीं हें। Sistin Chapel की रचना , यहूदी सम्राट सोलोमन के पुराने मंदिर के अनुपात से की गयी है जिसका विवरण पुराने टेस्टामेंट में मौजूद है ।
राफेल नामक कलाकार की बनी टेपेस्ट्री भी
संत पीटर एवं पोल के जीवन के विषय पर आधारित हें।
देखें लिंक :
http://mv.vatican.va/3_EN/pages/CSN/CSN_Main.html
सनातन धर्म से ख्रिस्ती धर्म कयी मामलोँ मेँ भिन्न है
- पोप बेनेडीक्ट बीयर शौक से पीते हैँ !
देखिए http://www।thehimalayantimes.com/fullstory.asp?filename=aFanata0scqzpba8a8a3pa.axamal&folder=aHaoamW&Name=Home&dtSiteDate=20080130
जब् कि हिन्दु धर्म के सँत मदिरापान नही करते -
अन्य सभी धर्म के ऐसे कई मसले हें जो उन्हें एक दुसरे के
रीति रिवाजों से अलग करते हें --
सर्वधर्म समभाव मेरी मान्यता है और रहेगी -
हर धर्म के मूल में निहित अच्छाइयों को ही ग्रहण करने से ,
आत्मोध्धार मिलता है -

Monday, February 4, 2008

"लाराज़ थीम " : डाक्टर जीवागो से + डॉ.नो-- होलीवुड़ से

अब सुनिए ये धुन : ~~और पहचानिए ज़रा, किस किरदार पर इसे फिल्माया गया है ?
http://music.barnesandnoble.com/search/mediaplayer.asp?ean=826663976458&disc=1&track=7
हां....ये हैं विश्व के सबसे प्रख्यात, गुनेह्गारों को पकड़ने में जिनकी महारत है वैसे खुफिया एजेंट श्रीमान ००७ याने के, 007 'डबल ओ सेवेन माने जेम्स बोंड की फिल्म का शुरुआती संगीत , इस संगीत के चलते ही आप , बंदूक, रहस्य, खुफ़िया गातिविधियां, विभिन्न सरकारों के जालसाजी के गोरखधंधे, crime, एस्पिओनाज
दुनियाभर पर राज करने के मनसूबे लिए, शक्तिशाली, खलनायक, विष , सोना, अस्त्र, हिंसक पशु से भीन्ड़्त के सनसनीखेज कारनामों की रोमांचक दुनिया में कदम रखते हैं जहां ,
कौभांड , सुनियोजित प्लान के जिससे , पूरे विश्व की तबाही हो जाये ऐसे मनसूबे लिए, खतरनाक और शक्तिशाली मुजरिम , जिन्हें ये , ब्रिटीश खुफिया एजेंट जेम्स बोंड , समय रहते नाकामयाब कर देते हैं उस की कथा ," इयान फ़्लेमींग " ने लिखी -- और ब्रितानी सर्वोच्च सुरक्षा संस्था एम. के के अंतर्गत , इस जासूसों के बादशाह को काम करते दीखालाया -- फिल्म के जरिये कई दील दहलाने वाले, द्रश्यो में, तीव्र गति से चलती उजागर होती कथा आप देखते हैं आज तक , जेम्स बोंड की फिल्मों ने , अटूट धन सम्पति का इजाफा किया है


इस तरह का प्रमुख संगीत एक पूरी फिल्म की पहचान बन जाती है और चित्रपट के द्रश्य, संगीत, कलाकारों का अभिनय इत्यादी , दर्शकों के मन पर बरसों तक छाए रहतें है ! क्या आप को ऐसी "मुख्य धुन " लिए कोइ हिन्दी फिल्म याद आ रही हैं ?
जहां कहीं भी ये धुन बजी नहीं के आपको फिल्म , उसके पात्र, कथा , सीनेमोटोग्रफी , कहानी के घुमावदार मोड़ , आपने कब और किस सिनेमा होल में ये फिल्म देखी थी,
कौन था साथ, ? आप की उम्र क्या थी ? आप शादी शुदा थे या कुंवारे थे ?
ये सारी बातें याद आ जातीं हैं इतनी सशक्त होतीं हैं ये शीर्ष धुन !

ये जो लिंक आप के लिए , ऊपर दी है उसे सुनिए .......... कुछ याद आया ?

ये होलीवुड की रशियन परिद्रश्य पे बनी अमरीकी फिल्म है ..चित्रण इतना प्रभावशाली है के देखते समय आप महसूस करेंगें मानो आप रशिया पहुंच गए हैं ...
ये लेख़क बोरिस पेस्तार्नाक की कहानी है
डाक्टर जीवागो
की जीवनी पर बनी फिल्म की मुख्य धुन है !
होलीवुड की फिल्मों की ऐसी कई धुनों में , ये सबसे प्रिय धुन है मेरी !

...ये मेरा मानना है और भी कई लोगों की ये चहेती धुन है।
इसे "लाराज़ थीम " कहा जाता है --

- हाल ही में, फिल्म की नायिका जुली क्रीस्टी ने भारत आ कर उनकी
साल६६ की उम्र में , पहली बार एक पत्रकार से शादी की --
लारा को, इस धुन को, और जुली को लारा के रूप में , हमेशा याद रखा जाएगा।
डाक्टर जीवागो इजिप्ट देश के ओमर शरीफ नायक बने थे। ये एक प्रेम कथा है - रशिया में बोल्शेवीक क्रांति के समय, कई अमीर घरानों के , लोग विस्थापित हुए थे। ऐसे ही समय के और इतिहास के चलते चक्रों के बीच, लारा और जीवागो, कई बार मिलते रहे और अलग होते रहे ...फिल्म के अन्तिम द्रश्य में, लारा बस में बैठ कर चली जाती है और रास्ते पर खडे डाक्टर जीवागो, उसे पुकार भी नहीं पाते ..भावावेश में उनका स्वर रुंध जाता है -

जब जब उन्हें लारा की याद आती है और उनके प्रेम की, तब तब, ये धुन बजती रहती है पार्श्व में.... जो उनके विरह को सजीव , साकार करने में सफल हुई है।
....फिल्म देख पायें तब चुकियेगा नहीं ...ये एक ऐसी चित्र कथा है जिसको मूल कहानी के करीब रखकर , बनाने में , सफलता मिली है।