Wednesday, May 7, 2008

पुष्प की अभिलाषा : श्री माखनलाल चतुर्वेदी


पुष्प की अभिलाषा : श्री माखनलाल चतुर्वेदी


चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर, है हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।

कवि ने " सुर बाला" शब्द क्यों इस कविता में इस्तेमाल किया है " पुष्प की अभिलाषा" काव्य में श्री माखनलाल लाल जी ने ?? ....


उसके बरे में मेरी समझ अनुसार , यह " संकेत " है -- सांकेतिक शब्द चयन से स्वर्गीय , अप्सरा सम - - सुन्दरी का आभास स्पष्ट हो जाता है . देवों के सिर पर पुष्प चढाया जाता है ...किंतु , पुष्प की अभिलाषा है ....किसी वीर सैनिक की वह , चरण धूलि बने ..
काव्य - शिल्प का एक सशक्त चरण येही है कि , " IMAGE " याने कि , " अदृश्य - दृश्य " को भाव प्रवण व मुखरित कर जाए ऐसे शब्दों से , जो कवि कहना चाहता है , वह पाठक , के सामने स्पष्ट = साफ दिखायी देने लगता है । जब् कोई चित्र , आंखों के सामने होता है , उस समय , रंग , आकर , आकृति , दृश्य बहुत कुछ कह जाते हैं -- किंतु , उस के द्वारा उभरते दृश्य की जो प्रतिध्वनि और प्रतिसाद दर्शक के ह्रदय से भावों को आंदोलित करते हैं और जो भाव उठते हैं वही चित्र का स्थायी असर है .
Both POEM & PAINTINGS are ART forms. The effect they impart & the conotation they generate r " ABSTARACT " . The more successful is the attempt in creating SUCH art , the deeper emotion it invokes in the viewer's heart & leaves more lasting impression.
" चाह नही मैं ...सुर - बाला के गहनों में गूंथा जाऊं " इस पंक्ती के द्वारा , कवि कहते हैं कि , गहनों के साथ - साथ स्वर्ण तथा सुन्दरी का सामीप्य , व संनिन्ध्य भी पुष्प के लिए वाँछित नही ....जितना मातृ- भूमि पर शीश चढाने वाले , वीर सैनिक की चरण - रज बनना उसके लिए श्रेयस कर है । ऐसी उद्दात भावना से ही ये कविता कालजयी बन पायी है जिस का असर सदीयाँ बीत जाने पर भी दमकता रहेगा -
परम आदरणीय, हिन्दी के मूर्धन्य कवि श्री माखन लाल चतुर्वेदी जी को शत शत प्रणाम !
-- लावण्या

Monday, May 5, 2008

चोर का गमछा

ये चित्र प्रसिध्ध कवि श्री अशोक चक्रधर जी ने खीन्चा है --

बहुत कम ऐसा होता है जब् आप कोइ कविता पढ़ें और आप को , बखूबी हंसी के साथ साथ, करुना का भाव भी मन में आए !॥

ये कविता जब् मैंने पढी कविता - कोश में, जिसका कार्य भाई श्री ललित कुमार ने , शुरू किया जो आज , कई और लोगों की सहायता से , तैयार हो रहा है अगर आपने कविता - कोश न देखा हो तो मेरी आपसे नम्र इल्तजा है , आप अवश्य देखें इस साइट को ! यहां बहुत सारी कविता और कवि आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं --

आज , ये कविता आपके साथ शेर कर रही हूँ जो मुझे बहुत पसंद आयी और मन को छू गयी
चोर का गमछा छूट गया

जहां से बक्सा उठाया था उसने,

वहीं-एक चौकोर शून्य के पास

गेंडुरियाया-सा पड़ा चोर का गमछा

जो उसके मुंह ढंकने के आता काम

कि असूर्यम्पश्या वधुएं जब, उचित ही, गुम हो गई हैं इतिहास में

चोरों ने बमुश्किल बचा रखी है मर्यादा

अपनी ताड़ती निगाह नीची किए

देखते, आंखों को मैलानेवाले

उस गर्दखोरे अंगोछे मेंगन्ध है उसके जिस्म की

जिसे सूंघ/पुलिस के सुंघिनिया कुत्ते शायद उसे ढूंढ निकालें

दसियों की भीड़ में, हमें तो

उसमें बस एक कामगार के पसीने की गन्ध मिलती है

खटमिट्ठी

हम तो उसे सूंघ/केवल एक भूख को

बेसंभाल भूख को

ढूंढ़ निकाल सकते हैं दसियों की भीड़ में

रचनाकार: ज्ञानेन्द्रपति
"कविता कोश " से लिया गया

पता : www।kavitakosh।org














मेरे मन का भेदी

मेरे मन का भेदी : [ आइना : मेरा हमराज़ ]
बदरीया बीच जिम चन्दा ,तुझ में , झांके जो मूखडा ,
काजल की ओट समाया है ज्यूँ मेरी अँखियोँ में सजनवा !
सिंगार ऊतारूं , जब् जब् , सिंगार सजाऊं निस - दिन ,
तू मेरे मन का भेदी ,तुझ से न छिपी कोई बात !
जोबन को देखे दर्पण ,नयनन माँ जलती आग !
गए मोरे पिया गहन , वन , तू दिखलाना घर की बाट !
नीली सारी मोरी मैली भई, नील गगनवा चमके तारे ,
तुझ से कहती हूँ , सुन ले , तू ,पियु कब लौटेंगे मोरे दुवारे

- लावण्या

Saturday, May 3, 2008

गोरा और काला

ये चित्र है वैजयन्तीमाला का !
तुम काली हो ये फरीश्तों कि भूल है।
वो तिल लगा रहे थे कि स्याही बिख़र गयी।
अब मैं समझा तेरे गालों पर काले तिल का मतलब ,
दौलते हुस्न पर दरवान (watchman) बिठा रखा है ।
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बड़ी मुश्किल बाबा बड़ी मुश्किल , गोरे गोरे गलों पे है काला काला तिल ;-)
ये नृत्य, गीत देखिये
http://www.youtube.com/watch?v=6cQAUQc04f4


Friday, May 2, 2008

समीक्षा : " चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ " - लेखक श्री अमरेन्द्र जी


युवा कवि व लेखक अमरेन्द्र जी व सौ. हर्षा प्रिया


युवा कवि, सम्पादक व लेखक, श्री अमरेन्द्र जी की कहानियाँ पैन्ग्वीन बुक्स से प्रकाशित हुईँ हैँ नाम है, " चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ " जो , अमरेन्द्र जी की, लेखकीय प्रतिभा का प्रथम सोपान कहा जायेगा. शीर्ष कथा "चूडीवाला " पढकर मै प्रभावित हुई थी. कथानक भारतीयता से रँगा हुआ है जिसमेँ मुख्य पात्र "चूडीवाला" यानी " सलीम चाचा," गाँव गाँव घूमकर, चुडियाँ , बेचते हैँ और बहू बेटीयोँ को आत्मीय नज़र से देखते हैँ. उन्हेँ अपनी वृध्धावस्था का एहसास तब गहराता प्रतीत होता है कि जब जब उनकी नीयत पर आशँका जतायी जाती है एक बहू के , अनादरपूर्ण वाक्य से .....और मर्माँतक शब्द , उन्हेँ भीतर तक बेध जाते हैँ . यह बदलते रीश्तोँ की कहानी है जहाँ समाज खरीददार और विक्रेता बन कर रह गया है और रीश्तोँ की जगह धन विनिमय ने ले ली है. हमारी यादोँ मेँ बसा भारत, कब का बदल चुका है ये आघातकारी सत्य, बूढे सलीम चाचा के हारे थके तन, मन से निकल कर, पाठक के अन्तर्मन को भीतर तक झकझोर जाता है और जब ,औरसँबम्धोँ मेँ, मनुष्य की आस्था मेँ पडतीँ दरारेँ चटखतीँ,हैँ और जब , जब टूट कर बिखरतीँ हैँ तब, भूतकाल के समाज से वर्तमान की बेरुखी से लैस समाज मेँ पनप रही सभ्यता के ह्रास के हम मौन प्रेक्षक बनते हैँ !यही लेखक की सफलता है जो अपनी कहानी के जरिये हमेँ सामाजिक सत्य का सच्चा आइना दीखलाने मेँ सफल हो कर पात्रोँ के आपसी रीश्तोँ के तानो बानोँ से हमेँ बाँधने मेँ पूर्णत: सफल रहे हैँ इस कथा मेँ और पुस्तक की शीर्ष कथा को यादगार बनाते हैँ इस पुस्तक की दूसरी कथा जिसे मैँ त्वरित गति से पढ गई वह "मीरा " जो एक विदेशी नारी पात्र के जीवन सँघर्ष की कथा है और भारत की धरती से दूर रहते सम्वेदनाशील, कवि ह्रदय लिये लेखक की नये परिवेश से , स्वयम को जोडने की चेष्टा भी है, साथ साथ आत्म मँथन, जीवन के गहनतम क्षण की अनुभूति से भी पाठक को परिचित करवाती कथा है. मीरा नाम उस परदेसी स्त्री का है जिसका जीवन उतार चढावोँ से गुजरता हुआ भारतीय आध्यात्म मेँ कृष्णाराधना के समीप जाकर पाथेय ग्रहण करता है जो उसके शैशव काल के ऐकाँत को कुछ हद तक सँबल प्रदान करता है. उसी दौरान लेखक की अपनी माँ का निधन, भारत जाना , करुण प्रसँग मेँ शामिल होकर , दुबारा विदेश आ जाना , यह ह्रदय विदारक मनोदशा वही अनुभव कर पाता है जिसे ऐसे कठिन सँजोगोँ से गुजरना पडता है. सूफी सँत दरवेसोँ ने भी गाया है कि, "बहुत कठिन है डगर पनघट की " तो जहाँ कथा का मुख्य पात्र मीरा भी इसी कठिन पथ पर चल कर , हीम्मत से , अपने जीवन मेँ आयी कठिन परिस्थितियोँ से जूझती है लेखक भी, माँ के बिछोह से छलनी ह्रदय को सँजोये फिर पराये देस काम करने लौट आता है अकेले हाथोँ , " मातृत्त्व" का सामना करती हुई मीरा भी उसे दीख्लायी देती है. ईश्वर आस्था ही विषम क्षणोँ मेँ , मानव जीवन को पार करती है ये भी द्र्ष्टिगोचर है यही मानवता का हर धर्म से परे, जीवन यात्रा को आगे बढाने का अमर सँदेश है जो लेखक हमेँ बडी सहजता से देता है. "एक पत्ता टूटता हुआ" और चिडिया यूँ तो मानवीय प्राणी कथानकोँ से जुडी हुई कहानियाँ हैँ परँतु, इस मेँ परीलक्षित सँवेदना उन्हेँ मूक प्राणी व प्राकृतिक तत्व से उपर उठाकर मानवीय सँवेदनाओँ से जोडतीँ हैँ . चिडिया कथा मेँ , लेखक और चिडिया मानोँ एक दूसरे को ना बोलते हुए भी समझ रहे हैँ जब बुखार से तप रही हथेली पर बैठ कर चिडिया अपनत्व का इजहार करती हुई प्रतीत होती है और कभी इतना विश्वास कि अपनी सहेली चिडिया को भी मिलवाने ले आती है और अपनी सहेली का न होना भी आकर जतलाती हुई चिडिया मूक नहीँ, सँवेदना के हर बोल से अपनी बात कहती सी जान पडती है इतना सजीव चित्रण किया है अमरेन्द्र जी ने ...जो , सँयत भाषा मेँ , एक पँछी और मनुष्य का न रह कर , " हर प्राणी मेँ राम बसे " इस भक्ति कालीन सँतोँ की , उक्त्ति की प्रतीति करवाता सा लगता है. पत्ते की कथा, उसके उद्`भव पेड से गिरकर होती हुई, हमेँ भी यात्रा पे ले चलती है, जहाँ हम और लोगोँ से मिलते हैँ और विश्व की व्यापकता के साझीदार हो जाते हैँ .. भाई अमरेन्द्र की कहानियाँ अपने विविध पात्रोँ के सँग कभी गतिशीलता से तो कहीँ अपने ही स्थान पर समय के एक लँबे कालखँड को जो जी रहा हो ऐसी इमारत "ग्वासी " के जरीये हमेँ अलग अलग अनुभवोँ से परिचय करवातीँ हैँ .ये शहर का प्राचीन अवशेष प्राय: भवन ही नहीँ समस्त गतिविधियोँ का केन्द्र बिन्दु भी रहा है जो किशोर मन को सजीव अपने ही परिचित सा लगता है. भविष्य के कल्पनाकाश को, वर्तमान से जोडता हुआ, भूतकाल की नीँव पर खडा, अविचल प्रहरी सा ! जो विगत इतिहास को , जन जीवन के रोजमर्रा के जीवन से जोडने मेँ सक्षम होता है तब पाठक दार्शनिकता के बोध से बँध कर ठिठक जाता है, इतिहास से, समाज से, अपने परिवेश से जुड जाता है. ये "ग्वासी " कहानी की अन्तर्निहित शक्ति है जो प्रवाही भाषा के सहारे तटस्थता के प्रतीक मेँ समूचे जीवन का सार दीखला जाती है. " रेत पर त्रिकोण " 'रेलचलितमानस' और 'वज़न" ये अन्य ३ कथाएँ हैँ जिनमेँ से अँतिम दो हास्य व्यँग लिये हुए हैँ जिन्हेँ पाठक अवश्य पसँद करेँगेँ और तीन कोणोँ को सीधी रेखाओँ से जोडती कहानी, तीन मित्रोँ के सँघर्ष, उनके अपने नजरियोँ को उजागर करती हुई कथा है -- नीरज और सचिन, लेखक के मित्र हैँ जिनसे ये त्रिकोण पूर्ण बनता है. हरेक के लिये जीवन सँघर्षमय है परँतु जीवन जीने की प्रक्रिया और हल तीनोँ अपने अँदाज से चुनते हैँ ये कहानी किसी भी समाज के तीन व्यक्ति की कथा हो सकती है. आप, मैँ और कोई तीसरा ! इसी कारण, स्वाभाविक और आत्मीय सी जान पडती है. अम्रेन्द्र जी ने पूरी इमानदारी से अपने आसपास के समाज को, प्रकृति को परखा है , उससे ताल मेल साधा है और उनके पात्र मूक होँ या वाचाल, सभी पाठकोँ से , गहरी बात सरल भाषा मेँ कर जाते हैँ . ये उनके लेखक - मन की, सूक्ष्म दृष्टि की , उनके मानवीय व सहज ही सँवेदनशील अन्तर्मन की छविे पाठक से मिलवाने की प्रक्रिया का सफल प्रयोग है. नया प्रयोग है. जो अवश्य सराहा जायेगा चूँकि यहाँ पारदर्शीता है ! पाठक और लेखक के बीच ! जो हमेँ सीधे पात्रोँ, कथानक और हमारे अपने सामाजिक परीवेश से, सीधे ही जोड देतीँ, हमारी अपनी ही कहानियाँ हैँ ! अँत मेँ भाई अम्रेन्द्र जी को, जिन्हेँ मैँ, अपना अनुज मानती हूँ इस समीक्षा के जरीये एक बात अवश्य कहना चाहूँगी और वो ये है कि, वे अपने आपको, अपने अन्तर्मन को और विस्तृत करेँ , ताकि उनके नये नये प्रयासोँ से उपजे ऐसे ही सामाजिक बिम्ब हमेँ, नये आयामोँ से प्रकाशित हो कर, दीखेँ और अन्य विषयोँ पर भी उनके विचार, अन्य तत्त्वोँ के प्रति उनकी सँवेदना का उन्हीँ के कथा पात्रोँ से हम बार बार परिचय कर पायेँ ॥ इस कुशल, प्रथम प्रयास के लिये मैँ उन्हेँ , शुभ कामनाएँ व बधाई देती हूँ और भविष्य मेँ और गहरी बात उन्हीँ की कहानी से कह पाने के लिये आशा है कि मेरे इस प्रयास से, प्रेरणा देते हुए उनके लेखकीय मन को , नये भावाकाश तक पहुँचने के लिये , शब्दोँ के डैनोँ का उपहार भी देती हूँ ! .. लेखक "अमरेन्द्र " क्रियाशील रहेँ उसी सद्` आशा सहित, मेरी बात को यहीँ पर विराम देती हूँ --
शुभम्` --
-- लावण्या

Thursday, May 1, 2008

" अच्छा ! तो अमरीका मेँ भारतीय शादियाँ, इस तरह से होती है क्या ? "

जन्म
शादी का रिश्ता
वृध्ध दँपत्ति

" अच्छा ! तो अमरीका मेँ भारतीय शादियाँ, इस तरह से होती है क्या ? " ये कहा था, मेरी एक सहेली ने जब,हमारी बातचीत हो रही थी और मैँने उसे भारतीय रस्मोँ के बदले बदले से अँदाज़ के बारे मेँ उसे बतलाया --
ये ३ कौन से प्रसंग है जो हर इंसान के साथ जुड़े हुए होते हैं?

उत्तर आसान है : ~ पहला है, जन्म , दूसरा है शादी का रिश्ता और ३ रा है मृत्यु !
सारे सामाजिक संस्कार , रीति रिवाज , वेदों के समय से , आधुनिक युग तक , हर सभ्यता के उत्थान के साथ , हर भूखंड पर , मानव जीवन के विकास के साथ , बदलाव के साथ , ही सही परंतु , हर कॉम में, हर प्रदेश में , हर मानव के जीवन में , प्राय: पाये जाते हैं।
भारतीय मूल के लोग सदीयों से , व्यापार के लिए, अपने संजोग से या किसी उत्सुकता के रहते , अपने जन्म स्थान से दूर की यात्रा करते रहे हैँ। जहां कहीं हम भारतीय मूल के लोग गए, बसे, और नये सिरे से जीने लगे, हमारी संस्कृति से पाई विरासत भी सहेज कर लेते गए और नयी धरती पर हमने , इन्हें अपनाए रखा ।
हां, कई बार कुछ नया भी अपना लिया
ऐसा भी अकसर हुआ है
हमारे पूर्वज जमीन से जुड़े थे , खेती प्रधान देश ही रहा है भारत और जब् अंग्रेज़ गए ,
उसके बाद , समाज में काफी परिवर्तन आए।
आज अमरीका में भारतीय मूल के लोग बहुत विशाल संख्या में बसे हुए हैं। धर्म अनेक, जातियाँ अनेक , पर वही रीति रिवाज, वही व्रत त्यौहार इस पराई भूमि पर , आज भी , हमारे अपने से ही लगते हैं।
ये अलग बात है , यहां दीवाली की छुट्टी नहीं होती ....न होली की !
इतवार को या वीकएंड पर अकसर हिंदू मन्दिर , जैन देरासर या सीखों के गुरूद्वारे पे , भारतीय लोग अपने व्रत त्यौहार सम्पन्न करते दिखाई देते हैं। नयी नस्ल के बच्चे , जो भारत से दूर की भूमि पर पैदा हुए , उन्हें नही पता उनके माता , बाबुजी , अपने त्योहारों के बारे में पता लगे उसके लिए , कितने प्रयास करते हैं!
ये भारत में रहने वाले और जन्म लेनेवाले बालक के लिए , आम बात होती है। आज आप से , अमरीका में , ये तीनों प्रसंगों के साथ जो, बदलाव आए हैं उनके बारे में , दो शब्द कहना चाहती हूँ ।
१- जन्म : अमरीकी समाज में " बेबी शावर " मनाने की प्रथा है जिस भारतीयों ने भी अब अपना लिया है। कोइ लडकी जब् माँ बननेवाली होती है उसके सगे संबन्धी, सहेलियां और परिवार की दूसरी स्त्रीयां मिलकर, किसी दुपहरी में , एक जगह इकट्ठा होते हैं , चाय, कोफी , शरबत कोल्ड ड्रिंक्स के साथ साथ, हंसी मजाक, गीत और आनेवाले बच्चे के लिए उपयुक्त उपहार प्रेग्नँट कन्या को भेंट किए जाते हैं, कार्ड भी देते हैं ....कई बार , सहेलियां , इस मौके को " सर्प्राइज़ " ही रखतीं हैं और ये , उस कन्या के लए , और ज्यादा खुशी की घड़ी बन जाती है जब् उसे पता लगता है की सब उसे कितना चाहते हैं और उसके और आनेवाले शिशु के लिए , सभी ने मिलजुलकर इतना सारा , इंतजाम किया -- बच्चा पैदा हो जाए उसके बाद भी उपहार / gift , वो बोनस !! :-)
२ - शादी : आजकल , देसी भाई लोग भी बहुत शानदार मगर सौम्य शादी के फन्कशन का प्रबंध करने लगे हैं ...लड़का और लडकी एक दूसरे को पहले से पहचानते होते हैं अकसर -- लड़का , मंगनी के पहले अंगूठी बनवाकर , लडकी से बाकायदा प्रोपोकरता है , हां हो उसी के बाद अपने परिवार से तथा कन्या के परिवार से आगे बातचीत होती है , शादी तै की जाती है , सबसे पहले , मेहमानों को "सेव ध डे " के ख़त भेजे जाते हैं ताकि , किसी भी मेहमान को , आगे से , अपना , दिन और समय किस तरह , पहले से प्लान किया जाए उसके लिए समय मिले ...फ़िर कार्ड भेजे जाते हैं जिसमें आप की मंजूरी या ना - मंजूरी और परिवार से कितने लोग आ पायेंगें , ये पहले से लिखकर भेजना होता है और ये सारा काम कई महीने पहले हो जाता है ..शादी से पहले भी सहेलियां कन्या / वधु के लिए ,"ब्राइडल शावर " रखतीं हैं , जहां सिर्फ़ कन्या व उसकी सहेलियां ही होतीं हैं और खूब मजाक होता है, ब्युटी पार्लर से लेकर्, डाँस, डीस्को , रेस्टाँरँटज़ मेँ खाना पीना ये सभी उस का हिस्सा होते हैँ ..कन्या पक्ष की तैयारी अलग होती है वैसे ही वर पक्ष से दुल्हे के साथी, दोस्त भी गोल्फ या टेनिस या पार्टी करते हैं दुल्हे के साथ भी हंसी मजाक होता है उसकी आज़ादी के बाकी लम्हें ,बचे हैं उनमें यार दोस्त उसे मौज मन्नाने की , उन्हें जी लेने की सलाह देते हैं।
शादी के समय बुफे भेज हो या हर टेबल पे आनेवाले मेहमान का नाम , रखा होता है --
भोजन कक्ष या डाइनीँग होल के बाहर , कन्या की सहेली आपको , आपकी मेज का नंबर बड़े प्यार से पकडा देती है - कन्या के फेरे , सप्तपदी , ये रस्में , पूरी होतीं हैं और खाने के समय , परिवार से पिता , कन्या की खास सहेलियाँ वर के खास मित्र इत्यादी लोग अपनी अपनी यादेँ वर -वधू से जुडी मेह्मानोँ के साथ बाँटते हैँ -- उसके बाद ३, ४ घंटों तक खूब जोर शोर से नाच गाना होता है , नया जोडा अपना पहला नृत्य करते हैँ फिर कन्या अपने पिता के साथ और माँ अपने बेटे के साथ डाँस करती है और फिर सारे मित्र समुदाय को भी आमँत्रित किया जाता है। ये नाच गाना युवा वर्ग भाँगडा के साथ खूब देरी तक जब तक बडे बूढे थक कर बैठ जाते हैँ तब तक जारी रखते हैं।
विदाभी होती है ...वही मार्मिक प्रसंग होता है क्या भारत और क्या अमरीका !! ॥
३ -मृत्यु : आजकल, मन्दिर या देरासर में ही अकसर भजन , पूजा रखते हैं साथ साथ , कई बार , दिवंगत को जो चीजेँ पसंद होती हैं वही भोजन भी, भजन के बाद , सभी आनेवालोँ के प्रति, आभार प्रक़ट करने की औपचारिक छोटी स्पीच के बाद , परोसा जाता है -
लोग दिन भर काम करके दूर दूर से आते हैँ और अमरीकी समाज मेँ भी अक्सर ऐसे ही होता है कि फ्युनरल के बाद्, भोजन भी देते हैँ वही प्रथा अब कई भारतीयोँ ने भी अपनानी शुरु कर दी है - ये बदलाव है - अच्छा है या बुरा ये नहीँ कह रही - सिर्फ, आज हम बदलते नजरीये की बात कर रहे हैँ आशा है आप सभी को ये नया लगा होगा - अगर कोई सवाल होँ तब अवश्य पूछेँ --