Saturday, August 8, 2009

एक खुली परियोजना : कविता कोश / उर्दू के अजीम तरीम मशहूर शायरों के कलाम -

कविता कोष एक स्वयंसेवी प्रयास है .

कई लोगों ने अथक परिश्रम कर हिंदी - उर्दू भाषा ही नहीं कई प्रादेशिक तथा

संस्कृत के शाश्वत काव्य को खोज कर , इन्टरनेट पर स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है
-
हिन्दी/उर्दू काव्य में युगाधार रहे रचनाकारों से लेकर नई पीढ़ी के युवा रचनाकारों तक -
कविता कोश में सैकडों रचनाकारों की रचनाओं का संकलन है।
हिन्दी काव्य के इस विशाल संकलन में आपका स्वागत है। यह एक खुली परियोजना है जिसके विकास में कोई भी भाग ले सकता है -आप भी! आपसे निवेदन है कि आप भी इस संकलन के परिवर्धन में सहायता करें। देखिये कविता कोश में आप किस तरह योगदान कर सकते हैं। इस समय कविता कोश में २०,८१४ पन्ने बन चुके हैं

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- ब्लॉग लेखन की तरह कविता कोष भी एक आधुनिक प्रयास है -
- रचनाकारों की पुस्तकें , पुस्तकालय या निजी संग्रह में मिला करतीं थीं --
आज कई प्राचीन युग से लेकर २१ वीं सदी तक की रचनाएं आपको ,
इंटरनेट सर्फ़ करते हुए पढने को मिल जाएँगीं --
आज , आपके लिए प्रस्तुत हैं उर्दू के अजीम तरीम मशहूर शायरों के कलाम -
- एक एक लफ्ज़ ऐसा जो दिल को चीर कर गहराई में उतर जाए


दिखाई दिये यूं कि बेख़ुद किया

मीर तक़ी 'मीर'
www.kavitakosh.org/meer


जन्म: 1723
निधन: 20 सितंबर 1810

उपनाममीर
जन्म स्थानआगरा, उत्तर प्रदेश, भारत
कुछ प्रमुख
कृतियाँ
--
विविध--
जीवनीमीर तक़ी 'मीर' / परिचय
चित्र:Globe-Connected-32x32.pngकविता कोश पता
www.kavitakosh.org/meer

    हमें आप से भी जुदा कर चले

    जबीं सजदा करते ही करते गई
    हक़-ए-बन्दगी हम अदा कर चले

    परस्तिश की यां तक कि अय बुत तुझे
    नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले

    बहुत आरज़ू थी गली की तेरी
    सो यां से लहू में नहा कर चले

      अहमद फ़राज़


      जन्म: 14 जनवरी 1931
      निधन: 25 अगस्त 2008

      उपनामफ़राज़
      जन्म स्थाननौशेरा, पाकिस्तान
      कुछ प्रमुख
      कृतियाँ
      खानाबदोश, ये मेरी गजलें वे मेरी नज़्में
      विविधअहमद फ़राज़ का मूल नाम सैयद अहमद शाह है। आप आधुनिक युग के उर्दू के सबसे उम्दा शायरों में गिने जाते हैं।
      जीवनीअहमद फ़राज़ / परिचय

      अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

      जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

      ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
      ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

      तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
      दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें

      ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
      नशा बड़ता है शरबें जो शराबों में मिलें

      आज हम दार पे खेंचे गये जिन बातों पर
      क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें

      अब न वो मैं हूँ न तु है न वो माज़ी है "फ़राज़"

      जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
      ( 2 )
      रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ

      आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

      कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत* का भरम रख
      तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

      पहले से मरासिम* न सही, फिर भी कभी तो
      रस्मे-रहे दुनिया ही निभाने के लिए आ

      किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
      तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

      एक उमर से हूँ लज्जत-ए-गिर्या* से भी महरूम
      ए राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिए आ

      अब तक दिल-ए-खुशफ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
      यह आखिरी शमाएँ भी बुझाने के लिए आ


      पिन्दार=ग़रूर; मरासिम=दस्तूर; गिर्या=रोना

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      कैफी साहब की लेखनी का जादू पेश है
      जन्म स्थानग्राम मेज़वान, आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत
      कुछ प्रमुख
      कृतियाँ
      आख़िरे-शब, झंकार, आवारा सज़दे
      विविधकैफ़ी आज़मी का मूल नाम अख़्तर हुसैन रिज़्वी था। आप राष्ट्रिय पुरस्कार और फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित हैं।

      वक्त ने किया क्या हंसी सितम

      कैफ़ी आज़मी


      जन्म: 1919
      निधन:

      तुम रहे न तुम, हम रहे न हम ।

      बेक़रार दिल इस तरह मिले
      जिस तरह कभी हम जुदा न थे
      तुम भी खो गए, हम भी खो गए
      इक राह पर चल के दो कदम ।

      जायेंगे कहाँ सूझता नहीं
      चल पड़े मगर रास्ता नहीं
      क्या तलाश है, कुछ पता नहीं
      बुन रहे क्यूँ ख़्वाब दम-ब-दम ।

      ( 2 )

      तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
      क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो

      आँखों में नमी हँसी लबों पर
      क्या हाल है क्या दिखा रहे हो

      बन जायेंगे ज़हर पीते पीते
      ये अश्क जो पीते जा रहे हो

      जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है
      तुम क्यों उन्हें छेड़े जा रहे हो

      रेखाओं का खेल है मुक़द्दर
      रेखाओं से मात खा रहे हो

      ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

      मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ 'ग़ालिब'


      जन्म: 27 दिसम्बर 1796
      निधन: 15 फ़रवरी 1869

      उपनामग़ालिब, असद
      जन्म स्थानआगरा, उत्तर प्रदेश, भारत
      कुछ प्रमुख
      कृतियाँ
      दीवान-ए-ग़ालिब
      विविधउर्दु के सबसे प्रमुख शायरों में से एक।
      जीवनीग़ालिब / परिचय

      दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

      आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

      हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
      या इलाही ये माजरा क्या है

      मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
      काश पूछो कि मुद्दआ क्या है

      जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
      फिर ये हंगामा, ऐ ख़ुदा क्या है

      ये परी चेहरा लोग कैसे हैं
      ग़म्ज़ा-ओ-इश्वा-ओ-अदा क्या है

      शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अम्बरी क्यों है
      निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा क्या है

      सब्ज़ा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
      अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है

      हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
      जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

      हाँ भला कर तेरा भला होगा
      और दरवेश की सदा क्या है

      जान तुम पर निसार करता हूँ
      मैं नहीं जानता दुआ क्या है

      मैंने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
      मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है

      ( 2 )

      हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले,

      बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ।


      निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन,

      बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले ।


      मुहब्बत में नही है फर्क जीने और मरने का,

      उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले ।


      ख़ुदा के वास्ते पर्दा ना काबे से उठा ज़ालिम,

      कहीं ऐसा ना हो यां भी वही काफिर सनम निकले ।


      क़हाँ मैखाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़,

      पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले।

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      आशा है आप को भी मेरी तरह सुकून मिला होगा
      - लावण्या

      Tuesday, August 4, 2009

      हमारे प्रकाशकों ने अभी लेखकों को भाव देना नहीं सीखा।

      उत्तर अमरीका में निवास करतीं सभी रचनाकार महिलाओं की कृतियाँ आपको इस पुस्तक में
      पढने को मिल जायेगी -- संपादिका हैं डाक्टर अंजना संधीर जी --
      पुस्तक का नाम है, ' प्रवासिनी के बोल '

      पूर्णिमा बर्मन जी

      http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2009/pravasi.htm

      पश्चिमी प्रकाशकों का सफल व्यापार चातुर्य एवं कई तरह के प्रश्न आज के साहित्य पर पढने को मिले - लेखिका सुप्रसिध्ध भारतीय मूल की, श्री सुषम बेदी जी ने इस लेख में सलमान रशदी के बर्ताव और पश्चिम के साहित्य संस्था द्वारा मिले रशदी के मुखिया मान लिए जाने पर भी अपना असंतोष व्यक्त किया है -
      प्रवासी भारतीयों का साहित्यिक उपनिवेशवाद : -सुषम बेदी

      सुप्रसिध्ध लेखिका है श्री सुषम बेदी जी

      सुषम जी का लिखा, विचारोत्तेजक निबंध अभिव्यक्ति पर आपने शायद देख भी हो

      " अभिव्यक्ति " की संपादिका हैं पूर्णिमा बर्मन जी

      - पूर्णिमा बर्मन जी का नाम कौन नहीं जानता ?

      शिक्षा :

      संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, स्वातंत्र्योत्तर संस्कृत साहित्य पर शोध, पत्रकारिता और वेब डिज़ायनिंग में डिप्लोमा।

      पीलीभीत (उत्तर प्रदेश, भारत) की सुंदर घाटियों में जन्मी पूर्णिमा वर्मन को प्रकृति प्रेम और कला के प्रति बचपन से अनुराग रहा। मिर्ज़ापुर और इलाहाबाद में निवास के दौरान इसमें साहित्य और संस्कृति का रंग आ मिला। पत्रकारिता जीवन का पहला लगाव था जो आजतक साथ है। खाली समय में जलरंगों, रंगमंच, संगीत और स्वाध्याय से दोस्ती, 1995 से यू ए ई में।

      कार्यक्षेत्र :

      पिछले पचीस सालों में लेखन, संपादन, फ्रीलांसर, अध्यापन, कलाकार, ग्राफ़िक डिज़ायनिंग और जाल प्रकाशन के अनेक रास्तों से गुज़रते हुए फिलहाल संयुक्त अरब इमारात के शारजाह नगर में साहित्यिक जाल पत्रिकाओं 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' के संपादन और कला कर्म में व्यस्त। इसके अतिरिक्त वे हिंदी विकिपीडिया की प्रबंधक भी हैं।

      दिल्ली में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, साहित्य अकादमी तथा अक्षरम के संयुक्त अलंकरण "प्रवासी मीडिया सम्मान", जयजयवंती द्वारा जयजयवंती सम्मान तथा रायपुर में सृजन गाथा के "हिंदी गौरव सम्मान" से विभूषित।

      प्रकाशित कृतियाँ :
      कविता संग्रह : 'वक्त के साथ'


      संपर्क :
      abhi_vyakti@hotmail.com


      नव वर्ष की मंगल कामनाएँ

      धुंध में डूबा ग्रीष्माकाश

      दुबई में नाट्य उत्सव

      अपनी तो पाठशाला

      अमरीकी गोली-बारूद

      टूटे गिटार का ग़म

      गर्म देश में बर्फ़ गिरी

      मुफ्त का सामान
      एक रेत-यात्रा यह भी
      बार्बी हुई पचास की
      पान बनारस वाला
      मंदी की ठंडी में उपदेशों की बंडी
      रंग बरसे
      जाना कहाँ रे
      बरसात में
      वर्तनी का वर्तमान
      श्रद्धांजलि
      हिंदी-विकिपीडिया सही दिशा की तलाश
      बड़े भाई साहब
      दौड़ से दूर
      चोरी चिड़ियों की
      बीते हुए दिन हाय
      सूरज चमक रहा!
      शोकाकुल सप्ताह
      हंगामा-ए-जलाबिया
      अकेलेपन का अंधेरा
      जिन्हें मैं," पर्ल "
      के प्यारभरे संबोधन से ही बुलाया करती हूँ ) ,
      बखूबी निभा रहीं हैं


      जन्म: 27 जून 1955
      हिंदी भाषा को सर्व प्रथम , विश्व जाल पर सदा के लिए , स्थापित करने के महत्त्वपूर्ण कार्य को पूर्णिमा जी

      उनसे पहली मुलाकात ,
      " काव्यालय " वेब साईट पर , हुई -
      पढने के बाद, मन किया , लेखिका को बधाई भी दूं ई मेल पता देखा और उन्हें प्रशस्ति पत्र भेज दिया था
      उत्तर आया और उस समय, कंप्यूटर सीखा ही था
      परंतु पूर्णिमा जी से बातचीत का सिलसिला आरम्भ हो गया था --
      कई सम्मान प्राप्त पूर्णिमा जी , समय और अवसर के अनुसार,
      भारतीय उत्सव, चुनिन्दा कथानक -
      जैसे गत माह का कदम्ब पर आधारित अंक तथा कई नवोदित व स्थापित रचनाकारों की कृतियों को
      अपने वेब मेगेज़ीन पर स्थान देतीं रहीं हैं
      वे ब्लॉग लेखन भी करती रहीं हैं
      " चोंच में आकाश " उनका जाल घर है
      परंतु प्रसिध्धि उन्हें सम्पादन से मिली और लेखिका का कर्म भी साथ साथ
      उन्होंने बखूबी निभाने का कठिन काम भी जारी रखा है --
      रक्षा बंधन के पावन उत्सव पर , मंगल कामनाएं देते, हर्ष अनुभव कर रही हूँ --
      कन्या जीवन , दो पाटों में बहता नदिया का नीर है --
      शैशव के चिरपरिचित घर को , पतिगृह के लिए , छोड़ कर जाती हुई कन्याएं ,
      नये घर को आबाद करने चल देतीं हैं --
      आजकल लड़के भी , शैशव के घर को छोड़ कर , अपनी नई गृहस्थी बसाते हैं -
      कई , दूर परदेस भी आकर बसते हैं जहां एकल परिवार होते हैं सर्वथा
      नवीन , नई पीढी का अपना वजूद , अपने ढंग से विकसित होता हुआ ,
      भारतीय परिवार में बढ़ते बच्चों को यहां ,
      " ए बी सी डी = या , अमेरीकन बोर्न confused देसी " भी कहते हैं !!
      घर की चारदीवारी के भीतर, सर्वथा भारतीय परम्पराएं , प्रणाम करना,
      हिन्दू प्रणालियाँ , या अपने धर्मानुसार की रूढिगत सोच, कुछ हद तक आज़ादी भी,
      बहुत ज्यादा लाड प्यार , बाहर जाकर , एकदम अमरीकन माहौल , इस दुधारे जीवन से ,
      पसोपेश में पलकर बढ़ते बच्चे ,
      कन्फ्यूजियायेंगे नहीं न तो और क्या होगा जी ? :)
      कई तरह की बातें सुनी हैं, -
      किस्सा - १
      - एक भारतीय दंपत्ति बच्चों पर इतनी बन्दीशें लगाता रहा के बालक विद्रोह कर बैठा ! शायद वह गोद लिया हुआ भी था और टैक्सस प्रांत में समाचार पढ़कर लोग सन्न रह गए जब् इस बेटे ने सोते हुए पेरेंट्स को , पूरे घर में आग लगाकर , उसी हालत में जलते हुए छोड़ दिया और बाहर आकर कार में स्वयं को भी गोली मार दी :-(
      - माता पिता की गलती यही थी के उसे , दुसरे बच्चों के संग रात्री में देर तक बाहर जाने से मना किया था !
      किस्सा - 2
      अभी की बात है - 2 माह पहले की , हमारे घर के पास , दक्षिणी परिवार के १३ , १४ साल के बच्चे ने ४ थी मंजिल की छत से कूदकर , प्राण त्याग दीये ! कारण अज्ञात है -- किसीने उसे स्कूल में परेशान किया होगा या किसी गर्ल फ्रेंड ने दिल तोड़ दिया या पढाई से निराश था या सामाजिक कारण थे ? अभी पता नहीं चला :-((
      मगर , इस हादसे की सुनकर उदासी इतनी हुई थी कि,
      माइकेल जैकसन की असमय मौत से भी ज्यादा , उस बच्चे के बारे में सोचते , मन उदास हो गया --
      किस्सा - ३
      दक्षिणी परिवार ये भी - पिता जी की तरते हुए ऑस्ट्रेलिया में मौत हो जाने के बाद, माँ , बच्चों पर ज्यादा अनुशाशन बरतने लगी थी - तीनो बच्चे , पढाई में अव्वल आते फिर भी कठोर अनुशाशन लगा रहता -- बड़ी लडकी डाक्टर बननेवाली थी और एक रात्री को क्या सूझी के माँ को , आखिरकार उन्ही की कार में , बंद कर , ख़त्म कर दिया -- मेंटल प्रताड़ना कारण बतलाते हैं और आज भी वह लडकी जेल में है - वहां, दूसरों को पढाती है --
      कुछ किस्से , अभूतपूर्व सफलता के भी सुनने में आते हैं -
      प्रथम पीढी , भारतीय संस्कारों की थाती लेकर , कड़ी मेहनत से ,
      सफलता अर्जित करने में प्रयासरत है --
      ये पढ़े लिखे सभी संस्कारी भारतीय ,
      मध्यम वर्ग के, परदेस में , नये मूल जमाने की , नई नई , कहानी है --
      आगे क्या होगा, किसी को पता नहीं --
      लगा आज ये आपके साथ शेयर करुँ.......
      नीचे का चित्र पारम्पारिक वेशभूषा में , भारतीय कन्या का नववधू स्वरूप ...
      यहां होनेवाली शादियाँ भी इसी तरह के द्रश्य सर्जित करतीं हैं ...बदलाव हो रहा है ......
      .परंतु कहीं त्रासदी है तो कहीं सफलता ........
      कदम बढ़ते हैं फिर लौट कर पीछे भूतकाल में कभी नहीं लौटते ...
      दिशा स्पष्ट करने का कोइ कम्पास भी तो नहीं है ..है तो सिर्फ ,
      हमारे बुजुर्गों से मिली सीख जो परिवार के भले के लिए ,
      हम से जो हो सके , वही करना ,
      फिर धरती के किसी भी भाग पर क्यों न हम अपना घर बसायें ..
      गुजराती कहावत है, ' धरती नो छेडो, घर !
      " मतलब, " घरती का अंतिम छोर, घर "
      - लावण्या

      Wednesday, July 29, 2009

      आओ , बरखा बून्दनिया

      यह कला कृति श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा (मेरी अम्मा ) द्वारा हलदनकर आर्ट इंस्टिट्यूट में , बनाई गयी थी ।
      ऐसे बिजली और बरखा का तांडव प्रकृति दिखलाती है तब, सारे जीव, अपने अपने आश्रय खोज कर, साँस रोके, सहम जाते हैं और बरखा का जल, जीवनदायी होता है पर कभी कभार तबाही भी बरपा देता है व उसके खौफ से मनुष्य डरते हैं। जीवनदात्री, स्त्री का शांत स्वरूप भी इसी प्रकृति के  शांत स्वरूप की तरह मंगलदायिनी  सा होता है । कालिका के कोप से , भक्त तो क्या , असुर और देवता तक डरते हैं । यही कालिका जब शांत स्वरूप लेकर, भक्त की मनोकामना पूर्ण करतीं हैं तथा अपने भक्त को  सुफल देतीं हैं तब भक्त स्वयं को मुक्ति के मार्ग पर आगे बढाए या तपस्या करे उस का फल भी माँ भगवती कृपावश देतीं हैं। इसी कारण वे , भगवती कहलातीं हैं । अपनी संतान की भूख शांत करनेवाली, माता अन्नपूर्णा कहलाती है । धन सम्पदा प्रदायिनी , महालक्ष्मी प्रसन्न होते ही, ' भरे भंडार वाली माता ' कहलातीं हैं ।देवी माँ का एक रूप भय और शोक देता है तो दूसरा , सुख और शांति !
      जीवन के हरेक पल में , धुप और छाया , सुख और दुःख , क्रोध और शांति , अग्नि और जल का विरोधाभास महसूस करता है इंसान !इन विरोधीभासी  अनुभूतियों में , जो सुखद है वही , प्रिय होता है । जिसे याद करने को मन करता है ।यही मनुष्य का स्वभाव है । 
      यहाँ अमेरिका में आज दिनभर बरखा की रिम - झिम होती रही । कुछ समाचार भी सुने जिन में से एक यह था कि २ सुंदर स्त्रियों का  देहांत हो गया। जिस के बारे में सुन कर मन उदास हो गया ।इस क्षणभंगुर जीवन और विरोधाभास का पुन: ध्यान हो आया । आपने भी सुना होगा , जयपुर राज्य की महारानी गायत्री देवी का निधन हो गया । दुःख हुआ।  सिने तारिका , लीला नायडू जिन्होंने फ़िल्म अनुराधा में काम किया था वे भी गुजर गयीं ।ईश्वर इन की आत्मा को शांति दे .....
       
      नीचे जो तस्वीर है उस में स्व राज कपूर जी की माता जी श्रीमती राम सरणी देवी, पृथ्वी राज कपूर की धर्म पत्नी हैं । हम उन्हें ' चाई जी ' कहकर बुलाते थे और वे भी बड़ी सुंदर और सुशील नारी थीं । वे अपने पति के जाने के १४ दिनों में , चल बसीं थीं । आज इनकी पड़ पोती , मशहूर सिने तारिका है - करीना कपूर , को आज के युवा खूब पहचानते हैं । जीवन चक्र की गतिमानता का यही एक स्वरूप है , जो हम समय के अन्तराल से , अनुभव करते हैं और इस जीवन के बहते प्रवाह को , पहचान पाते हैं । जो आज है वह कल नही रहेगा , जो कल था वह , काल के गाल में , समा जाएगा । इसीलिये, आज को पहचानो और आज जो है, उसी को अपना मानो ।
      आज नई सुबह,
      रिम झिम बूंदों के संग आयी है
      नई सुबह आयी है,
      उस का स्वागत है
      आओ, नए पैगाम लेकर आओ ,
      अपनी सुहानी रुत के नजारे
      दिखला  जाओ ,
      आओ भी तो तुम ऐसे की खुशियाँ        आओ ~
      जमाने के हर दस्तूर को बदल डालो,
      अपनी भीनी भीनी कशिश से ,
      हर भीगी आंखों को , सहला जाओ ।
      आओ ...आओ ..आओ ॥
      हे बरखा , बिजली , बादल छाओ ।
      हर जलते दिल को ठंडक देते जाओ ।
      बरसो, हलके हलके , डूब जाए मन
      गिनते हर पल , यादों के मंजर ,
      बन बुंदनियाँ मन को भाओ , 
      आओ आओ ,
      बरखा बून्दनिया , आओ 
      मेरे मन पाखी को हर्षाओ ।।
      -लावण्या

      Thursday, July 23, 2009

      किसने किया किस का इंतज़ार ?
      क्या पेड़ ने फल फूल का ?
      फल ने किया क्या बीज का ?
      बीज ने फ़िर, किया पेड़ का ?
      हर बार, ज़िंदगी जीत गई !
      प्रेमी ने पाई परछाईं ,
      अपने मस्ताने यौवन की ,
      प्रिय की कजरारी आंखों में ,
      शिशु मुस्कान चमकती - सी ,
      और, उस बार भी ज़िंदगी जीत गई !
      हर पल परिवर्तित परिद्रश्यों में,
      उगते रवि के फ़िर ढलने में,
      चंदा के चंचल चलने में,
      भूपाली के उठते स्पंदन में,
      रात , यमन तरंगों में ,
      हर बार, ज़िंदगी जीत गई !
      साधक की विशुध्ध साधना में,
      तापस की अटल तपस्या में,
      मौनी की मौन अवस्था में ,
      नि: सीम की निशब्द क्रियाओं में,
      मुखरित, हर बार ज़िंदगी जीत गई !
      - लावण्या


      सूर्य ग्रहण , आया और चला गया । विश्व में , श्रद्धालु, भक्त जन की भीड़ , नदी , सरोवर , समुद्र तथा ईश्वर आराधना के पवित्र स्थलों पर देखी गयी ।
      अभी तक, मनुष्य अपने आसपास हो रही विविध घटनाओं को पूरी तरह समझ नही पाया है ।
      हाँ , विज्ञान ने , अवश्य , बहुत प्रगति कर ली है ।
      तकनीकी आविष्कारों ने दूर संचार के नित नए आविष्कारों की मदद से , पृथ्वी के निवासी ,
      बहुल मानव समुदाय के लिए , समाचार संप्रेषण के जरिए , हर नए सूरज के साथ
      नवीन गतिविधियों का नज़ारा पेश करने का , काम , द्रुत गति से परोसना जारी रखा हुआ है ।
      वेब पर , कई जगह , सूर्य - ग्रहण के रोमांचकारी चित्र देखे ।
      सूर्य देव , हमारे सौर मंडल के प्रमुख शक्ति पुंज , अन्धकार और वलय से ग्रसित दिखे ।
      राहू - केतु , शायद , अपना जघन्य कृत्य कर रहे थे !
      पता नहीं इस का दूरगामी परिणाम क्या होगा ?
      जो भी घटेगा , उसका इतिहास , ही साक्षी रहेगा ।
      मनुष्य कर्म और मान्यताएं , समय और युग के साथ साथ बदलतीं हैं ।

      हमारी पृथ्वी को गर्म होने से रोकने के लिए , ये भी सुझाव दिया गया है के , हर सड़क , हर घर की छतों को , सुफेद रंग से रंग दिया जाए तब प्रकाश कीरने , पुन: व्योम में , चलीं जाएँगीं और इतनी ऊर्जा का संरक्षण होगा की जिससे कई लाख शहरों को बिजली मिल पायेगी । क्या पता , भविष्य में , ये सुझाव कार्यान्वित भी किया जाए ! क्या पता -
      बचपन में , याद है जब भी ग्रहण लगता और ख़त्म होता तब ना जाने कहाँ से, दान मांगने वालों के स्वर ,
      गलियों में गूँज उठते ,
      " दे दान .... छुट्टे ग्रहण ...."
      अम्मा , पुराने वस्त्र, अन्न , फल , रुपया इत्यादी तैयार रखती और उन्हें दे देतीं थीं !
      आज वो द्रश्य फ़िर , याद आ गया ।
      पापा जी के घर पर , साधू, बाबा , पीर फ़कीर , जोगी , ब्राह्मण , पण्डित लोगों का तांता लगा रहता था ।
      सभी को श्रध्धानुसार और जो भी बन पड़ता दिया जाता ।
      कई साधू , ऐसे भी होते थे जो कुछ ख़ास चीज , भी माँगा करते थे ।
      जैसे एक साधू बाबा ने पापा जी से , एक धोती , माँगी थी ॥
      और मुझे याद है, पापा जी ने अपनी सात - आठ धोतियाँ उठाईं और उन्हें पुछा ,
      " आपको कौन सी पसंद है ? वही ले लीजिये ! "
      मानो साधू बाबा की भी अपनी चोइस हो !!
      ऐसी कई बातें , आज भी , फुर्सत के पलों में , याद आ जातीं हैं ।
      जीवन धारा , बहती जाती है ।


      ये शक्ति और ऊर्जा का महासागर है , मंथर गति से , बहता अनेकानेक जीव को अपने ,
      जलधारा में समेटे , अबाध गति से बहता रहेगा ।
      आना - जाना , जीव - माया का खेल , यूँ ही चलता रहेगा ।
      एक लक्षण जो उजागर है वह , सातत्य और जीव का होना है ।
      जिसे हम , मनुष्य , हमारी " ज़िंदगी " कहते हैं और जब तलक साँसें चलतीं रहतीं हैं ,
      ज़िंदगी के संग हमारा रिश्ता , बंधा रहता है ।

      यही धर्म है, यही विज्ञान है और यही है सबसे बड़ा सच !

      बाकी जो भी , है, सब डोर हैं इस के संग बंधी हुई ...............
      विशाल व्योम के खुले , पट पर, उडती हुई , एक पतंग ...
      जिसका साँसों के तार से बंधना और समय के किसी मोड़ पर टूट कर , विलीन हो जाना ..............
      अपने रंग की चमक को , एक नन्हे बिन्दु में , समाकर , लोप हो जाना , यही जीवन है ।
      जीत सदा से होती है, "ज़िंदगी " की !!
      इसी लिए मैंने लिखा --
      " हर बार, ज़िंदगी, जीत गई ! "
      - लावण्या
























      Saturday, July 18, 2009

      रचना से रचियेता तक : क्या ब्लॉग लेखन , साहित्य है ?

      " उड़न तश्तरी " के मशहूर समीर लाल " समीर " जी
      श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी Gyandutt Pandey जी
      ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल
      http://halchal.gyandutt.com/
      नत्तु पांडे के साथ , झूले पर झूलिए
      नेट पर फैला साइबरित्य :
      ये आलेख इन्होने लिखा और साहित्य और ब्लॉग पर लिखा जानेवाला आजके युग का जितना भी लिखा जा रहा है उसके लिए
      ये नया शब्द सुझाया - " साइबरित्य "
      " शहर बने। जब गांव शहर की ओर चले तो सबर्ब (Urban>Suburban) बने। अब लोग सबर्ब से साइबर्ब (Suburb>Cyburb) की ओर बढ़ रहे हैं। की-बोर्ड और माउस से सम्प्रेषण हो जा रहा है। नई विधा पुख्ता हो रही है। बन्धुवर, यह गांव/शहर या सबर्ब का युग नहीं, साइबर्ब ..."


      टिप्पणियां [25] पसंद[5] बार पढ़ा गया[49]
      http://udantashtari.blogspot.com/

      " उड़न तश्तरी " के मशहूर समीर लाल " समीर " जी
      हिन्दी ब्लॉग से
      जो कोई भी इतेफाक रखता है ,
      उनके लिए ये नाम अपरिचित नहीं ! :)
      ऐसा कहना शायद अंडर स्टेटमेंट हो !
      उन्होंने भी प्रश्न किया था, के
      " ब्लॉग और साहित्य में क्या फर्क है
      कोई बताये "
      आज पुराने कागजात सहेजते हुए,
      एक पुरानी हस्त लिखित प्रति मिली है ।
      षड लिँग व्याख्या :
      (वही आप के समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ ! )

      उपक्रमोपसँहाराव्भ्यासो पूर्वता फलम्`
      अथर्वादोपपती च लिँग तात्पर्यनिर्णये

      रचनाकार को अपने आलेख / कृति के विषय मेँ
      ६ मुख्य नियमोँ का पालन करना होता है ।
      इसे षडलिँग व्याख्या कहते हैँ ।
      इन छ: आयामोँ का विधिवत निरुपण होने से "कृति" सम्पूर्ण बनती है ।

      १ ) उपक्रम : उपसँहार - यह प्रथम चरण है जहाँ विषय,
      विवेचन सँबँधी कथ्य स्पष्ट हो जाने चाहीये ।
      जिससे पाठक को विषय के बारे मेँ प्रथम " सत्य " ज्ञात हो सके आदि से कृति के अँत तक " एक समता " विषय सँबँधी रहे,
      इसकी भी रचनाकार को सावधानी बरतनी होती है ।
      २ ) अभ्यास : रचनाकार अपनी कृति के द्वारा विषय के " अभ्यास " का निरुपण करता है अपनी रचना / कृति मेँ, रचनाकार का क्या उद्देश्य रहा
      है उस सत्य से कृतिकार पाठक को परिचित करवाता है
      " विषय विवरण " क़ृतिकार की विषय के प्रति
      समझ और विषय के अध्ययन व मनन से ही
      " नव रचना " प्रकाश मेँ आती है ।
      ३) अपूर्वता : " नवीनता " हर रचनाकार अपनी रचना के माध्यम से
      कुछ नई बात कहने का प्रयास करता है।
      ईश्वर ने हर प्राणी को "अपूर्वता " प्रदान की है ।
      व्यक्ति विशेष है क्योँकि,
      हर व्यक्ति अपनी अनूठी प्रतिभा , समझबूझ ,
      विचारोँ तथा लाक्षणिकता क स्वामी है ।
      रचनाकार भले ही पुराने कथ्योँ को दोहराये ,
      पुरानी कहानी भी
      हर नये कहानीकार के द्वारा नवीन स्वरुप मेँ
      उभर कर सामने आती है ।
      ४) परिणाम : कृति की रचना के अँत मेँ " फल " होना चाहीये
      रचनाकार क्या कहना चाहता है ?
      रचनाकार एक स्वतँत्र व सशक्त नया स्वर है ।
      उसकी कृति समाज को क्या "सँदेसा " देना चाहती है ?
      रचनाकार को समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्तव कृति
      के "परिणाम " या " फल " द्वारा प्रतिपादित करना होता है ।
      ५) विस्तार : फल या कृति के विषय की अधिक जानकारी ,
      कृतिकार को विस्तार से पाठक के सामने रखनी होती है ।
      कृति के विषय - विशेष की प्रशँसा कृति मेँ निहित होनी चाहीये ।-
      तभी रचनाकार अपनी कृति के विशय मेँ तथा विषय सामग्री के विषय मेँ ,
      पाठक के मन पर गहरी छाप छोड पाता है ।
      विस्तार से किया गया वर्णन, पाठक को आकृष्ट करता है ।

      ६ ) समापन - कृति को समेटते हुए रचनाकार को अपनी बात को पूर्ण करना चाहीये और अनेक प्रश्न या मनोमँथन पाठक के लिये छोडते हुए
      "इति " कह्ते हुए
      अपनी बात को विराम देना भी उतना ही आवश्यक है
      जितना उपसंहार से
      कथानक का आरँभ करना होता है ।
      एक कुशल रचनाकार इतनी बातोँ पर ध्यान देगा
      तब अवश्य एक सर्वथा नवीन तथा उत्कृष्ट कृति की रचना सँभव होगी -
      और हाँ समापन करते हुए ,
      हम आप सभी को इतना ही कहेंगे ,
      मज़े से लिखिए , आपका ब्लॉग है !
      साहित्य के विभिन्न मठाधीशोँ तथा रखवालोँ के कोप से डरीयेगा नहीँ ना ...बस्स !
      आप अपने मन की तरँगोँ को विश्व जाल पर
      सुँदर फूल की तरह आरोपित कर दीजिये ॥
      कहीँ दूर तलक इसकी खुश्बु ....जायेगी....
      ऐसी हवा चली है ..
      - लावण्या

      Sunday, July 12, 2009

      सुश्री सुब्बालक्ष्मी / कैसे कैसे लोग आए और चले भी गए .............

      Madurai Shanmukhavadivu Subbulakshmi (Tamil: மதுரை சண்முகவடிவு சுப்புலட்சுமி, Mathurai Caṇmukavaṭivu Cuppulaṭcumi
      सुश्री सुब्बालक्ष्मी !
      यही नाम है " भारत रत्न " से सर्व प्रथम विभूषित किए जानेवाली इस महान गायिका का ! इन्होने , तमिल, तेलेगु, संस्कृत , हिन्दी, मलयालम, ,कन्नड़, बंगाली, गुजराती और मराठी भाषाओं में भी गीत गाये थे ।
      उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहब उन्हें सदा "सुस्वरलक्ष्मी " कहकर बुलाते थे । सुश्री सुब्बालक्ष्मीजी का जन्म , सितम्बर १९१६ को मदुरै तमिलनाडु में हुआ था ।उनका प्यार से बुलाया जानेवाला नाम था  "कुंजमा " !
      सं.१९४७ भारत स्वतन्त्र हुआ और उसी अरसे में "मीरा " राजपूतानी भक्त संत कवियत्री की जीवन गाथा पर आधारित फ़िल्म बनी जिस मे,
      सुश्री सुब्बालक्ष्मी जी ने इतना सजीव पात्र निभाया था के लोग उन्हें आधुनिक युग की मीरा जी कहने लगे ।
      " वेंकटाचल सुप्रभातम " सुश्री सुब्बालक्ष्मी जी के द्वारा गाया गया है  जो तिरुपति बाला जी की स्तुति स्वरूप आज भी प्रातः काल मन्दिर में, बजता है ।
      विष्णु सहस्त्र नाम, भज गोविन्दम, बाला जी पंचरत्न माला ये भी सुब्बालक्ष्मीजी के तपस्विनी के अमृत स्वर पा कर हर श्रोता को आज भी अभिभूत करने में सक्षम हैं ! तमिल भाषी २०० प्रमुख व्यक्ति विशेष की जीवन गाथा में से एक ना सुश्री  सुब्बालक्षमी अम्मा का  भी नाम है ।
      ( क्लिक करें )
      http://www.tamilnation.org/hundredtamils/mssubbulakshmi.htm

      पण्डित नरेंद्र शर्मा जी ने कई बरसों पहले, दक्षिण भारत में जन्मी सुश्री सुब्बालक्ष्मी जी की मीरा फ़िल्म के हिन्दी चित्रपट के लिए भी गीत लिखे थे ।
      मीरा जी का पात्र, सुब्बालक्ष्मी जी ने , बखूबी निभाया । १८ या १९ गीत से सजी इस फ़िल्म के लिए संगीत दिया  एस. वी. वेंकटरमण जी तथा रमानाथ व श्री नरेश भट्टाचार्य जी ने ! फ़िल्म के दीग्दर्शक थे एलीस आर डंकन !तमिल भाषा में बनी अत्यन्त सफल "मीरा " के गीतों को हिन्दी में बनी "मीरा " के लिए पण्डित नरेंद्र शर्मा ने गीत कथा के अनुरूप लिख दिए थे ।
      भजन : बसों मोरे नैनं में नंदलाल :
      राधा जी के ह्रदय के भाव मीरा जी के भजनों में मुखरित हुए थे ।
      ( क्लिक करें )
      Narendra Sharma : Meera baso more nainan mein

      प्रेम, भक्ति , मुक्ति :
      हाँ, यही नाम था उस रिकॉर्ड का जिसमे संगीत दिया था श्री ह्रदयनाथ मंगेशकर जी ने और गीत लिखे थे पण्डित नरेंद्र शर्मा ने और स्वर था
      भारत कोकिला सुश्री लता मंगेशकर दीदी का !
      http://www.raaga.com/channels/hindi/movie/HD000710.htmlasharan sharane shyaam hare : अशरण शरने श्याम हरे

      एक और फ़िल्म थी जीवन ज्योति, सं.१९५४ में इस फ़िल्म का
       गीत के बोल हैं ,
      " मन शीतल , नैना सुफल , जोड़ी जुगल सुहाई .....
      ओ देखो , देखो , नज़र लग जाए ना "
      जिसे संगीत्बध्ध किया था सचिन देव बर्मन जी ने और इस फ़िल्म के दूसरे गीत  साहीर साहब ने लिखे थे ।
      नवकेतन बैनर में बनी फ़िल्म "आंधियां " जो स्मृति लोप बन गयी है उसका संगीत दिया था उस्ताद अली अकबर खान साहब ने जो अभी संगीत जगत को सूना कर चल बसे हैं ।
      " घनश्याम के हैं, घनश्याम नयन
      मन मोरा बना , मन मोर सखी "
      ये गीत लिखा था पण्डित नरेंद्र शर्मा जी ने ...
      स्वर दिया था श्रीमती लक्ष्मी शंकर जी ने !

      आज इन महान कलाकारों को याद करते हुए ,
      यही सोच रही हूँ, कैसे कैसे लोग आए और चले भी गए .............
      जो आज हमारे साथ हैं, जैसे दीदी ( लतादी ) और ह्रदयनाथ भाई ,
      और कई सारे ऐसे ही अविस्मरणीय  नाम धारी कलाकार !
      उन्हें हम , ना भूलें ...

      क्यूंकि ये एक बहुत प्राचीन परम्परा और कला के प्रतिनिधि हैं ।

      मेरी इससे पहले लिखी प्रविष्टी पर कई नए और पुराने
      हिन्दी ब्लॉग जगत के साथी पधारे और कमेन्ट कर
      मुझे अनुग्रहित किया उन सभी की आभारी हूँ ।
      आते रहियेगा .........
      आज कल ज़रा व्यस्तता बढ़ गयी है ,
      कई नए आलेखों को देख नही पाई !
      उसके लिए , माफी चाहती हूँ ..........
      समय मिलते ही फ़िर आप सभी के साथ ,
      फ़िर उसी तरह नियमित रहने की कोशिश करूंगी ।
      तब तक ...........
      आप सभी के लिए शुभकामना प्रेषित हैं ।
      स स्नेह,
      - लावण्या