Monday, August 24, 2009

"फ़ुरसतिया जी " .के पांच साल और हमारे ...कित्ते हुए पूरे ? .

श्री गणेश का आगमन

गौरी कुंड की कुछ मिटटी लेकर हाथों में ,
एक अकेली साँझ को , सोच रहीं माँ पारबती ,
"कब आयेंगे घर , मेरे , शिव ~ सुंदर ? "
केशर मिश्रित उबटन लेकर हाथों में
फिर खूब उसे मल मल कर , उतारा
यूं ही, अपने गोरे अंग से , खेल खेल में ...
बना दी , आकृति एक बालक की और हलके से ,
फूंक दिए प्राण , अपनी सांसों के और कहा ,
" देखो , ये मेरा पुत्र , विनायक है ! "

सूनी साँझ कहाँ फिर रहती सूनी सूनी ?
हुआ आगमन , श्री गणेश का जग में !
पारबती के प्यारे पुत्र अब आये जग में

शिवजी लौट रहे थे , छोड़ कैलाश और तपस्या
द्वार के पहरेदार बन खड़े हो गए बाल गणेश ,
अपनी माता के बन के रक्षक !

" फिर आगे क्या हुआ माँ ? कहो न ...".
पूछने लगी बिटिया मेरी , मुझसे !

एक सूनी साँझ के समय ,
सुन रही थी वोः मुझसे
यह कथा पुरानी और मैं ,
उसे करती जा रही थी , तैयार
रात्रि - भोज के पहले , ये भी , करना था ,
बस , अब , आते ही होंगें , मेहमान ! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
-- लावण्या
हमारे "फ़ुरसतिया जी ..असली कानपुरिया भाई साहब , जिनकी लेखन शैली के हम भी , ज्ञान भाई साहब ( अजी वही " इलाहाबादी / यूपोरियन ,
मानसिक हलचल चिठ्ठे के गंगा जी के दर्शन करवानेवाले भाई साहब )
ज्ञानदत्त पाण्डेय जी , की तरह " पंखे " मतलब फैन हैं !! .. :).
तो बात , ये कह रही थी के , अनूप सुकुल जी के पांच वर्ष पूरे हुए !!
हमारे ब्लॉग लेखन का आगाज़ ,
सितम्बर की १९ तारीख सन २००६ की पुण्यशाली तिथि के दिवस आरम्भ हुआ था -
-शुरू शुरू में , गुगल महाराज की किरपा से, सारे निर्देश , अंग्रेजी में पढ़कर , अंग्रेजी में ही लेखन आरम्भ किया था -- सोचा था, , हम एक नन्हे से जीव
इस महासागर सद्रश फैले मकडी के जाल से " विश्व व्यापी वेब " में , ना जाने कहाँ गोते लगाते , बहते, गिरते पड़ते , मौजों के थपेडों में , कहाँ कहाँ , बहेंगें ~~~~~~~~~~
पर , आखिरकार, हिन्दी ब्लॉग जगत के
" उड़न तश्तरी " फेम ,
" समीर लाल " समीर " भाई साहब,
आ ही पहुंचे :)
कहा,
" नारायण नारायण !!
दीदी , आप अपना चिठ्ठा , हिन्दी में लिखा करें ....
तब ज्यादा प्रसन्नता होगी ! "

उनके आदेश तथा सहकार से ,
" ब्लोग्वानी " चिठ्ठा ~ जगत " " नारद " जैसे ,संस्था - समूह संस्था के पेज पर भी ,
हमारे नन्हे वेब पेज का नाम , दर्ज हो गया !

चलिए ....
कई अन्य साथी वहां दीखे ...
बहुत स नया लेखन देखा , पढा ...
विस्तृत , हिन्दी लेखन भारत के दूर - सुदूर के प्रान्तों से ,
सच्ची और जानकारी पूर्ण बातों को , सचित्र , व अविरल धारा में , हर क्षण , परोस रहा था --
जिस तरह , ब्रेकिंग न्यूज़ , पल पल , अप डेट होतीं हैं,
हमारा , विश्व व्यापी हिन्दी आभासी जगत , ठोस तथ्यों को परोस रहा था ...

भारत से बिछुड़ने का तथा मेरे भारत से, मेरी भौगोलिक दूरी का ये रंज , कुछ हद तक , मिट गया ...
मैंने अपने आप को , भारत के करीब पाया ...
दक्षिण के मंदिर हों या कोइ पहले न सुना हो ऐसा कथानक , अब घर बैठे ही सुन लेती थी जैसे श्री शुभ्रमानियम जी का चिठ्ठा ... " मल्हार " आहा हां ...क्या छानबीन और कैसी कैसी अद्`भुत कथा ये नित नवीन , करते हुए , आसानी से , हमारे लिए , प्रस्तुत कर देते हैं के देखते ही बनता है ...
युवा चिठ्ठाकारों की शैली भी
अकसर होंठों पे मुस्कराहट ला देती है .
साहित्य शिल्पी : .http://www.sahityashilpi.com/
जिनमे अल्पनावर्मा जी, महावीर'
http://mahavirsharma.blogspot.com/
विवेकसिंह भाई ,नीरजजी, डा. अमर कुमार जी,
श्री पंकज भाई,
मानसी बिटिया, कंचन बिटिया , आभा बिटिया, लवली बिटिया शेफ़ालीजी, पूजा जी, , सागर भाई,अभिषेक भाई, मसिजीवी जी,
सुजाता जी , नीलिमा जी , बी एस पाबला जी , सृजन शिल्पी ,
श्री आदरणीय प्राण भाई साहब, जिनकी रचनाएं मन को गहरे तक स्पर्श करतीं है
http://kashivishvavidyalay.wordpress.com के अफलातून भाई
उन्मुक्त,जी, हर्षवर्धन जी,अनीताजी,
पारुल,
अनुराग भाई ,
यूनुस भाई ,

रचना,
शिवजी,

भाई श्री गिरिजेश जी
- जिन्होंने मात्र ४ महीने से ब्लॉग लेखन आरम्भ किया है
और एक आलसी का चिठ्ठा ऐसा धाकड़ लिखा की
फणीश्वर नाथ रेणू जी + प्रेमचंद बाबू की यादें ताज़ा कर दीं
( उन्हें कैसे भूल सकतीं हूँ ? भला ;)
दिनेशराय द्विवेदी जी का अनवरत हो या कानूनी सलाह , या ,

श्री अलबेला खत्री जी , सीमा गुप्ता जी ,

अब जिन सुन्दर और अथक परिश्रम से लिखे जा रहे चिट्ठों के नाम यहां देने से रह गए हैं ,
उन सभी से अग्रिम क्षमा याचना सहित , आगे बढ़ते हुए ,
मेरी प्रथम प्रविष्टी की और उन्मुख हूँ ..

Hello World,
Feels good to be somewhere in between the world of dreams and reality which is the Cyber space !

Democracy, individualism , a passion for achievements of the finest that is within us is self evident within the diapheonous spheres of existance here ........like a surrelists dream ...the WWW ....is alive with billion human thoughts and mine is a petal of a flower , a drop within the infinite Ocean of TIME !
So ..........here I'm , leaving my foot print on the sands of time........for all Eternity !
-- Lavanya

Tuesday, August 18, 2009

आज के फनकार : ( रेडियो प्रोग्राम ) : " आकाशवाणी " तथा "विविध भारती " के भीष्म पितामह , या वेदव्यास ? ( पृथ्वी पर , सबसे बड़ा रेडियो नेटवर्क ) --


" आकाशवाणी " तथा "विविध भारती " के भीष्म पितामह की यादें आपके सामने प्रस्तुत है --
" आज के फनकार " नाम से रेडियो प्रोग्राम आया करता था जिसमे हिन्दी फिल्म से सम्बंधित किसी कलाकार या रचानाकार के योगदान को याद करते हुए सुमधुर संगीत के साथ उनकी जीवनी पर भी प्रकाश डाला जाता था ...... प्रस्तुत है ' उसी के अंश :
अब कई गीत , जो इस प्रोग्राम में याद किये गए हैं उन्हें , मैंने भी अरसे से सुने नहीं ..शायद विविध भारती के archive में कहीं रखे हुए होंगें ...
शायद रेडियोवाणी व रेडियोनामा के प्रसिध्ध युनूस भाई हमें, इनमें से कई Rare / ( मुद्दत से अनसुने गीत ) सुनवाने की कृपा करें तो, आभारी रहूँगी ..

तरंग / रेडियो वाणी / रेडियो नामा :
रेडियो नामा, एक साझा मंच है जहां रेडियो से संबधित हर बात का स्वागत किया जाता है




युनूस भाई , खुद अपने बारे में , यूं, कहते हैं ,

My Photo vividh bharti में एनाउंसर । नए पुराने तमाम अच्‍छे गीतों में गहरी रूचि । दुनिया भर की फिल्‍मों में रूचि । स्‍वयं कविताएं और लेख लिखता हूं ।..मध्‍यप्रदेश के दमोह शहर में पैदा हुआ । और म.प्र. के कई शहरों में पला बढ़ा । बचपन से ही संगीत, साहित्‍य और रेडियो में गहरी दिलचस्‍पी रही । सन 1996 से मुंबई स्‍िथत देश के प्रतिष्ठित रेडियो चैनल विविध भारती vividh bharti 


अब प्रस्तुत है ," आज के फनकार " पंडित नरेंद्र शर्मा पर प्रसारित किया हुआ एक रेडियो प्रोग्राम :
" इश्वर सत्य है,सत्य ही शिव है, शिव ही सुन्दर है,
इस परम सत्य को उजागर करनेवाले, पण्डित नरेन्द्र शर्मा
आज हमारे बीच नहीं हैं ! सच तो यह है की वो कहीं गए नहीं है बल्कि बिखर गए हैं~ उनके गीतों, कविताओं और साहित्य से
जब चाहे उन्हें पाया जा सकता है ..
पं नरेन्द्र शर्मा जैसे शख्स इस दुनिया से जाकर भी यहीं रहते हैं .
पं. नरेन्द्र शर्मा एक व्यक्ति नहीं, एकसाथ कई व्यक्ति थे
श्रेष्ठ कवि, महान साहित्यकार, फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी गीतकार, दार्शनिक, आयुर्वेद के ज्ञाता, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी के विद्वान और उससे भी ऊपर एक महामानव!

हमारे बौने हाथ उनकी उपलब्धियों को छू भी नहीं सकते!इसलिए, आज हम केवल उनके फ़िल्मी गीतों के साथ ही सफ़र करेंगे ~
आज के फनकार में आज ज़िक्र पं नरेन्द्र शर्मा के लिखे फ़िल्मी गीतों का~ 

गीत : तुम आशा विश्वास हमारे
गीत : पहले न जाना था पहले ना जाना था
गीत : मैं बन की भोली ग्वालनिया
गीत : यशोमती मैया से बोले नंदलाला
गीत : माँ, तुमसे ही घर , घर कहलाया
गीत : चंद रोजा जिन्दगी है चार दिन की चांदनी है
गीत : है हाथ की रेखाएं , लिखती है चिंगारी




सन १९८९ की ११ फरवरी को एक आत्मा अपने पार्थिव देह को त्याग कर आकाश में विलीन हो गयी जिसने यह देह ७६ साल पहले उत्तर प्रदेश के जहांगीरपुर में धारण किया था। पं. नरेन्द्र शर्मा के रूप में वह दिन था २८ फरवरी १९१३ ~ 
४ वर्ष की बालावस्था में ही अपने पिता की ऊँगली उनके हाथों से छूट गयी और वह अपने परिवार में और भी लाडले हो गए बचपन से ही कवितायें उनके साथी बने रहे और शिक्षा पूरी कर, कवि के रूप में उन्हें ख्याति मिलने लगी। 


सं.१९४३ में , भगवती चरण वर्मा के साथ, वे बम्बई आ गएऔर यहां आकर जुड़ गए फिल्म जगत से
उन्होंने पहली बार बॉम्बे Talkies की फिल्म,
" हमारी बात " में गीत लिखे जिनके संगीतकार थे " अनिल बिस्वास " और अभिनेत्री थीं " देविका रानी " ! पारुल घोष की आवाज़ में इस फिल्म का यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था
सोंग : मैं उनकी बन जाऊं रे (हमारी बात )
इस फिल्म को दिलीप कुमार की पहली फिल्म होने का गौरव भी प्राप्त है(श्री दिलीप कुमार जी का फिल्म जगत में काफी लंबा सफ़र रहा है और उनका मशहूर नाम "दिलीप कुमार " भी पण्डित नरेंद्र शर्मा ने ही रखा था)( सुना है आजकल दिलीप साहब माने युसूफ खां सा'ब बीमार हैं ..मेरी दुआएं उनके साथ हैं, वे स्वस्थ रहें और उनकी खूब लम्बी उम्र हो )

अरुण कुमार और साथियों के गाये इस गीत ने पं नरेन्द्र शर्मा कोगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया।
सोंग : सांझ की बेला, पंछी अकेला (ज्वार - भाटा )

फिल्म
ज्वार भाटा ने पं नरेन्द्र शर्मा के क़दमों को
फिल्म जगत में जमा दिया।
उन दिनों यहां फ़िल्मी गीतों में उर्दू माहौल, शेर -ओ -शायरी और ग़ज़लों का रिवाज़ था।  लेकिन बावजूद इसके पं नरेन्द्र शर्मा ने अपने आप को साबित कर दिखाया।  फिल्म : ज्वार - भाटा के बाद उन्होंने " मालती - माधव " फिल्म के लिए, न केवल गाने बल्कि उसकी पटकथा भी लिखी।
सं १९४९ उन्होंने " वसंत देसाई " के संगीत निर्देशन में फिल्म" उद्धार " में गीत लिखे जिसका मोहन्तारा तलपडे का गाया यह गीत खासा लोकप्रिय हुआ था।
सोंग : बादल के चादर में (उद्धार )


सं. १९५२ में नवकेतन फिल्म्स के बैनर पर उन्होंने फिल्म " आंधियां " के गाने लिखे - जिसके संगीतकार थे उस्ताद अली अकबर खान !
आजादी के बाद जैसे फ़िल्मी गीत भी ताज़ी हवा में सांस लेने लगे थे।  प्लेबैकटेक्नोलॉजी और ज्यादा बेहतर होती गयी, कई नये नये गायकगायिकाओं ने इस जगतमें कदम रखे, जैसे फिल्म आंधियां केइस गीत में, आशा भोसले और हेमंत कुमार की जुगल बंदी थी ~ सोंग : वह चाँद नहीं है, दिल है किसी दीवाने का (आंधियां )

सं.१९४७ में पं नरेन्द्र शर्मा ने विवाहित होकर बम्बई में ही अपनी गृहस्थी बसा ली। सं.१९५३ में वे जुड़ गए आकाशवाणी से ---जहां उन्हें" सुगम संगीत " के कार्यक्रमों के नियोजन का दायित्व प्राप्त हुवा।

नवकेतन फिल्म्स की अगली फिल्म अफसर में सुरैया के स्वर का मोर पं.नरेन्द्र शर्मा के बोलों को पाकर, ऐसा नाचा की संगीतकार सचिन देव बर्मन की धुनें धन्य हो गयीं ~
सोंग : तुम सुहाग हो मैं सुहागिनी (अफसर )
सोंग : नैना दीवाने एक नहीं माने (अफसर )


उन दिनों आकशवाणी के कुछ गिने चुने केंद्र ही थे और उन सभी में शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों की अधिकता थी जिसकी वजह से आम जनता के रेडियो की सूइयां, रेडियो सीलोन को ही ढूंडा करती थी।
आकाशवाणी के कार्यकर्ताओं को एक विविध रंगी चैनल की ज़रुरत महसूस हुयी जिसके लिए,पं. नरेन्द्र शर्मा को राजधानी दिल्ली बुलाया गया। 
कभी वेदव्यास को भी राजधानी बुलाया गया था जिसके बाद रचना हुयी " महाभारत महाकाव्य की !
पं. नरेन्द्र शर्मा ने भी मनोरंजन की ऐसी महाभारत रची की रेडियो जगत में,एक मिसाल बनकर रह गयी !
इस महाभारत का नाम है ~~
" विविध भारती "  ३  अक्टूबर १९५७ को सुबह १० बजे जन्म हुआ विविध भारती का और पं. नरेन्द्र शर्मा को बनाया गया इसके चीफ प्रोड्यूसर !!
उन्होंने विविध भारती के बचपन को ऐसा
संवारा की दिन ब दिन उसकी निखार बढती चली गयी।  आज पृथ्वी पर विविध भारती, सबसे बड़ा रेडियो नेटवर्क है जिसके करीब ३५ करोड़ श्रोता हैं। अवकाश प्राप्ति तक पं नरेन्द्र शर्मा, विविध भारती के संरक्षक बने रहे . उसके बाद उन्होंने " एक बार फिर " फिल्म से, गीतकार के रूप में काम करना शुरू किया और एक बार फिर , गीत लेखन में उनका लोगों ने स्वागत किया . पं. नरेन्द्र शर्मा ने जब् जब् कलम उठाई, कागज़, धन्य हो गए .

सोंग : ज्योति कलश छलके (भाभी की चूड़ियाँ )
सोंग : सत्यम शिवम् सुंदरम (टाइटल सोंग )


पं. नरेन्द्र शर्मा ने गैर फ़िल्मी गीतों के आँगन में भी फूल खिलाये - जो आज भी उसी रूप से हवाओं को सुवासित कर रहे हैं.चाहे इन गीतों का भाव प्रेम हो या भक्ति, इनका आधार भारतीयहैं और प्रतिक प्रकृति और संस्कृति से लिए गए हैं

पं. नरेंद्र शर्मा के गैर फ़िल्मी गीत हैं :

गीत : सतरंग चुनर नवरंग पाग (नॉन -फिल्म )
गीत : नाच रे मयूर , खोलकर सहस्र नयन (नॉन -फिल्म )
गीत : प्रार्थना , सुनिए श्री भगवन (नॉन -फिल्म : भजन )
प्रार्थना : आईये प्रभू आईये (नॉन -फिल्म : भजन )

पं. नरेन्द्र शर्मा की कलम ११ फरवरी १९८९ के दिन अचानक चुप हो गयी ! उन दिनों दूरदर्शन पर भारत की जनता महाभारत का दर्शन कर रही थी।  कविता, साहित्य और गीतलेखन के गुरु द्रोणाचार्य या , भीष्म पितामह या आज के युग के ऋषि वेद व्यास और विविध भारती के पितामह के इस प्रस्थान से पूरा देश , शोक सागर में डूब गया था !
कितनी बार पंडितजी ने यह बताना चाहा की जीवन का मूल्य सपने से अधिक नहीं ! लेकिन इसका अर्थ ,हमें , कितनी देर बाद समझ आया उस वक्त कि जब गीतकार हम से बिछुड़ चुका था ..........
सोंग : ऐसी इन सपनों की माया , जैसे जल पर चाँद की छाया .....

संकलन :
- लावण्या

सुनिए एक और नॉन -फिल्म गीत : ~~~~~


Wednesday, August 12, 2009

" पूर्ण घटम`"


सत्यमेव जयते


बापू : " शांति ~ दूत "

हे भारत माँ के वीर पुत्र ,

तुमने अपनी बलि चढाई थी -
भारत माँ के पुण्य भाल पर ,
चन्दन की बिंदिया सजाई थी !
स्वर्ण - पात्र भरा रक्त चन्दन से,
माँ के अश्रु से भीग, हुआ गीला...
खादी के धागों को बुनकर के,
सूती माला , माँ को पहनाई थी !
सदियों से बंधन में बंधी थी ,
माँ के अरुण चरण, पडी बेडीयाँ
हाथों पर हरी हरी चूड़ियाँ छनकी ,
श्वेत शुभ्र वस्त्र की आभा झलकी ,
केसरिया नर वीर भगत सिंह ने
जब् , रण~ भेरी बजाई थी !
मोहन दास करमचंद गांधी थे तुम
किन्तु, स्वतन्त्र भारत जन मन के " बापू "
" बा " कस्तुरी - सी घिस गयीं , प्रेम से,
" शांति ~ दूत " की वो प्राण शक्ति थी !
स्वतन्त्र भारत के कोटि ह्रदय,
गाते हैं, प्रेम मय, मंगल गीत -
भारत भाग्य विधाता से हम,
मांग रहे , सुख , शांति, प्रीत ~ रीत !

देश रहे संपन्न, हो भूमि , उर्वरा,
काँधे से मिल कान्धा, तोड़, भेद भाव
संकीर्ण मति त्याग, जगे भारत के भाग !

मांग रहा भारत का हर लाल आज,
हे माँ भारती, कर कृपा, हे वरदा !
शस्य श्यामल , हिम किरीट धारणी ,
माँ भारत भारती , अग ~ जग तारिणी !
हम तुम्हारी संतान, मांगते बार बार ,
करें पद वंदना , करो कृपा, हे जग वंदना !

सितम्बर १५, २००६

सीनसीनाटी, ओहायो, उत्तर अमरीका

लिंक देखें - 

- लावण्या