Friday, December 18, 2009

भारत में , और विदेशों में भी भारत के सब से ज्यादह प्रसिध्ध नेहरु परिवार के कुछ अज्ञात या कम जाने पहचाने सदस्यों के बारे में और कुछ कवितायेँ भी ....

प्रथम भारतीय ध्वज
वीर सावरकर द्वारा निर्मित : सन १९०६
एकम सत्य
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कौन रहा अछूता जग में,
सुख दुःख की छैंया से ?
धुप छांह का खेल जिन्दगी
ये सच , जाना पहचाना !
सभी हमारे, हैं सब अपने,
कौन है जग में पराया ?
जीवन धारा एक सत्य है
हर सांस ने जिसे संवारा -
इस छोर खड़े जो,
उस छोर चलेंगे
रह जायेंगे, कुछ सपने
है मौजों के पार किनारा
कहती बहती ये धारा !
अगम अगोचार , सत्य ,
ना जाना, पर, जाना है पार ,
नैन जोत के ये उजियारे
मिल जायेंगे उस में,
जो है बृहत प्रकाश !

- लावण्या

सभी को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ भवानी प्रसाद मिश्र की एकप्रसिद्ध बाल कविता प्रस्तुत है-
( साभार डा. जगदीश व्योम के जाल घर से )

साल शुरु हो दूध दही से
साल खत्म हो शक्कर घी से
पिपरमैन्ट, बिस्कुट मिसरी से
जहें लबालब दोनों खीसें
मस्त रहें सडकों पर खेलें
नाचें कूदें गाएँ ढेलें
ऊधम करें मचाएँ हल्ला
रहें सुखी भीतर से जी से
साँझ, रात, दोपहर, सवेरा
सब में हो मस्ती का डेरा
कातें सूत बनाएँ कपडे
दुनिया में क्यों डरें किसी से
पंछी गीत सुनाएँ हमको
करं दोस्ती पेड फूल से
लहर लहर से नदी नदी से
आगे पीछे ऊपर नीचे
रहें हँसी की रेखा खींचे
पास पडोस गाँव घर बस्ती
प्यार ढेर भर करं सभी से।

-भवानी प्रसाद मिश्र

और गीत : उड़ जा रे कागा बन का : मीरा भजन : स्वर : लता दी
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माँ

माँ कबीर की साखी जैसी
तुलसी की चौपाई-सी
माँ मीरा कीपदावली-सी
माँ है ललितस्र्बाई-सी।

माँ वेदों की मूल चेतना
माँ गीता की वाणी-सी
माँ त्रिपिटिक के सिद्धसुक्त-सी
लोकोक्तरकल्याणी-सी।

माँ द्वारे की तुलसीजैसी
माँ बरगद कीछाया-सी
माँ कविता की सहजवेदना
महाकाव्य की काया-सी।
माँ अषाढ़ की पहली वर्षा
सावन की पुरवाई-सी
माँ बसन्त की सुरभि सरीखी
बगिया की अमराई-सी।

माँ यमुना की स्याम लहर-सी
रेवा की गहराई-सी
माँ गंगा की निर्मल धारा
गोमुख की ऊँचाई-सी।

माँ ममता का मानसरोवर
हिमगिरि सा विश्वास है
माँ श्रृद्धा की आदि शक्ति-सी
कावा है कैलाश है।

माँ धरती की हरी दूब-सी
माँ केशर की क्यारी है
पूरी सृष्टि निछावर जिस पर
माँ की छवि ही न्यारी है।

माँ धरती के धैर्य सरीखी
माँ ममता की खान है
माँ की उपमा केवल है
माँ सचमुच भगवान है।
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- डॉ० जगदीश व्योम

डॉ. जगदीश व्योम

http://www.anubhuti-hindi.org/kavi/j/jagdish_vyom_dr/index.htm


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आइये, अब भारत में , और विदेशों में भी भारत के सब से ज्यादह प्रसिध्ध नेहरु परिवार के कुछ अज्ञात या कम जाने पहचाने सदस्यों के बारे में भी थोड़ा जानें ..............
पण्डित मोती लाल जी की धर्म पत्नी श्रीमती स्वरूप रानी थीं
The Nehru Family

स्वरूप रानी , उनकी दूसरी पत्नी थीं ... ऐसा कहा जाता है कि
( उनकी पहली पत्नी और १ और पुत्र का देहांत हो गया था )
- पंडित मोती लाल जी, पंडित गंगा धर नेहरु जी के पुत्र थे, गंगाधर जी देहली में ब्रिटीश साम्राज्य के एक पुलिस कर्मचारी थे और गंगा धर जी लक्ष्मी नारायण नेहरु जी के सुपुत्र थे ...
Pandit Motilal Nehru


In office
1919 – 1920

Jawaharlal Nehru

Nehru, ca. 1927

In office
August 15, 1947 – May 27, 1964

भारतीय गणतंत्र के प्रथम प्रधान मंत्री ,शपथ ग्रहण करते हुए सत्ता हस्तरन्र्तित हुई लोर्ड माऊंट बेटन के हाथों से ..भारतीय जनता के हाथों में




ttp://video.google.com/videoplay?docid=6218045611920270760#docid=6986855603795328951

नेहरु जी की दुसरी बहन कृष्णा हठी सिंह :

नेहरु जी की दुसरी बहन थीं कृष्णा ठी सिंह और उनके पुत्र हैं अजितसिंह जिनका विवाह पहले अमृता जी से हुआ था और संतान हैं, निखिल , विवेक और रवि
उनके पुत्र हैं .
अजित सिंह जिनका विवाह - बाद में अमरीकी महिला हेलेन से हुआ :
http://en.wikipedia.org/wiki/Ajit_Hutheesing --
२००६ में हेलेन का न्यू योर्क में देहांत हुआ --
http://query.nytimes.com/gst/fullpage.html?res=9402E2DE133AF936A35756C0A9609C8B63
Helen & Ajit's Wedding in India (1996 )
रवि हठी सिंह : http://en.wikipedia.org/wiki/Ravi_Hutheesing
इंदिरा जी


Rajiv Gandhi
......राजीव गांधी ...................
Congress Party President, Prime Minister

.संजय गांधी

Member of Parliment

प्रियंका गांधी / वाड्रा अपने २ बच्चों के संग पुत्र : रेहान और पुत्री मेयरा साथ बैठी हैं इतालियन नानी माँ , सोनिया गांधी की माँ , पोलो मेनिया ........

Rahul Gandhi राहुल गांधी -------------------------------------->
विजय लक्ष्मी नेहरु पंडित :
२ चित्र
Vijaya Lakshmi Panditj

(अगस्त १८ , १९० 0 - दिसम्बर १ , १९९० )
विजय लक्ष्मी नेहरु , भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु जी की बहन हैं । सन १९२१ में , रंजित सीताराम पंडित से उनका ब्याह हुआ वे प्रथम महिला हैं जिन्होंने सन १९३७ में केबिनेट पोस्ट संभाली थी सोवियत राष्ट्र संघ , संयुक्तगणराज्य अमरीका और मेक्सिको केलिए भी वे भारतीय प्रतिनिधि बनकर उन देशों में रहीं। ( १९४९ से १९५१ ) आयरलैंड के लिए १९४९ से १९५१ तक और १९५८ से १९६१ तक . स्पेन और संयुक्त ब्रीटीश राष्ट्र संघ में भारत एलची = Ambassador बन कर रहीं थीं सन १९५८ से १९६१ तक . १९४६ से १९६८ उन्होंने भारतीय प्रतिनिधि मंडल की प्रमुख बन कर , यूनाईटेड नेशंस में शिरकत की थी ।
अब आज्ञा .............बहुत सामान परोस दिया है ...आप के लिए ...
कुछ न कुछ आपको अवश्य , नया लगा होगा इसी आशा सहित, नमस्ते

Sunday, December 13, 2009

आपके लिए कुछ कवितायेँ

भारत माता
विधा दायिनी सुमति , श्वेत्वस्त्राव्रुता देवी सरस्वती


आज आपके लिए कुछ कवितायेँ लेकर उपस्थित हूँ ....................
माँ , अल्मोड़े में आए थे
जब राजर्षि विवेकानंदं,
तब मग में मखमल बिछवाया,
दीपावलि की विपुल अमंद,
बिना पाँवड़े पथ में क्या वे
जननि! नहीं चल सकते हैं?
दीपावली क्यों की? क्या वे माँ!
मंद दृष्टि कुछ रखते हैं?"

"कृष्ण! स्वामी जी तो दुर्गम
मग में चलते हैं निर्भय,
दिव्य दृष्टि हैं, कितने ही पथ
पार कर चुके कंटकमय,
वह मखमल तो भक्तिभाव थे
फैले जनता के मन के,
स्वामी जी तो प्रभावान हैं
वे प्रदीप थे पूजन के।"

कविश्रेष्ठ श्री सुमित्रा नंदन पन्त की काव्य रचना
[ जो हम बच्चों को ,पू. पापा जी ने कंठस्थ करवाई थी और हम अकसर इसे
अतिथियों के समक्ष गा कर सुनाया करते थे ]

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ये कविता " काव्य पुस्तक " प्यासा - निर्झर " से : कृपया चित्र पर क्लीक करीए :
शीर्षक है " पुरा नव पान "

" माता और शिशु : कविता : शिशु हैं भारतीय नागरिक और माता भारत माँ हैं

अब एक कविता मेरी

" स्वर्ण कलश "

स्वर्ण ~ कलश निकल आया री !
सखी, स्वर्ण ~ कलश नभ पर छाया री !
नर्तन करते , द्रुम - तृण अविरल,
नभ नील सुरभी रस आह्लादित`
सँवेदन मन मेँ, है रवि नभ मेँ,
उज्ज्वल प्रकाश लहराया री !
सखी, स्वर्ण ~ कलश उग आया री !

यन्त्रवत जीवन जन धन मन,
युगान्तर सीमित निकट चित्तभ्रम कलि का सम्मोहन,वशीकरण बन,

मन से मन तक लहराया री !
सखी, स्वर्ण कलश चढ आया री !

नर पुन्गव सब है लौट चले,

युग प्रभात की होड लगी,

युग सन्ध्या आगे दौड पडी,

वामन ह्र्दय, किन्पुरुष कलेवर,

थाम अज्ञ है खडे हुए !

सखी, स्वर्ण कलश अरुणाया री !

युग अन्त प्रतीति प्रकट हुई,
महाकाली मर्दन को उमड पडी,
युग सन्ध्या है निगल रही,
काल अमावस रात की-
कलिका के घून्घर मे जा छिप,
स्वर्ण~ कलश, कुम्हलाया री!
सखी, स्वर्ण कलश ढल जाता री!
- लावण्या

Friday, December 4, 2009

महाभारत : और श्री बी आर चोपड़ा जी की यादें .........

रूपा गांगुली --
मेरे आराध्य श्री कृष्ण हैं -
- मेरे मन के भाव, इसी गीत में प्रकट हैं सुनियेगा .........
.http://www.youtube.com/watch?v=sqRfhMWjbn4&feature=fvw

रूपा गांगुली
श्री बी. आर. चोपड़ा जी ने दूरदर्शन पर ' महाभारत ' की कथा को, आधुनिक युग के लिए प्रस्तुत किया। इस धारावाहिक ने, अब तक दर्शक संख्या में, बने पुराने सारे रेकोर्ड तोड़ दीये। सबसे ज्यादा टीआरपी, इसी प्रग्राम को मिली है।

पूज्य पापाजी, पण्डित नरेंद्र शर्मा इस टीवी सीरीज के साथ, ' परामर्श दाता + कांसेप्ट देनेवाले तथा इस के कई गीतों के रचियता के रूप में जुड़े।
दूरदर्शन ने जब सुप्रसिध्ध निर्माता, निर्देशक, श्री बलदेव राज चोपड़ा जी को, महाभारत पर धारावाहिक बनाने का कार्य सौंपा और अनुबंधित किया तब, सबसे पहले, इस महत्त्वपूर्ण प्रोजेक्ट के लिए, टीम तैयार करने का कार्य आरम्भ हुआ। कई महत्त्वपूर्ण बातें, एक तार में, बंधकर, सुचारू रूप से कार्य आरम्भ हो, उस के लिए, योग्य व्यक्ति की एक बृहत् टीम बनाना शुरू हुआ।
बंबई शहर, जो बोलीवुड माने भारतीय फ़िल्म निर्माण का गढ़ है वहाँ, हर तरफ़, श्री बी आर चोप्रा जी जो निर्माता थे, उनकी, जिससे भी बातें होतीं, सभी से एक सुझाव अवश्य मिलता कि, बंबई में, पण्डित नरेंद्र शर्मा रहते हैं और वे साहित्य, संस्कृति व भारतीय परम्पराओं के चलते फिरते ज्ञान कोष या विश्वकोश से हैं - उन्हें आप अपनी टीम में शामिल कर लीजिये तब आपका काम आसान हो जाएगा और सुचारू रूप से चलने लगेगा ।
बी. आर. अंकल ने ' अफ़साना, शोले, एक ही रास्ता, नया दौर, साधना, क़ानून, गुमराह, वक्त, हमराज़,  धुंध, पति, पत्नी और वो, इन्साफ का तराजू, निकाह, और बहादुर शाह ज़फर पर धारावाहिक और कमर्शियली, अत्यन्त सफल फिल्मे पहले ही बना कर, अपनी हस्ती और अपनी निर्माण संस्था को हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में, एक ऊंचा मकाम दिलवा दिया था। उनकी फ़िल्में अकसर सामाजिक प्रश्नों पर केन्द्रीत रहतीं थीं। जैसे साधना, धूल का फूल, निकाह, इन्साफ का तराजू जैसी फिल्मों की पटकथा में भी है । सुनिए, फ़िल्म : नया दौर का ये गीत, जो मुझे पसंद है
http://www.youtube.com/watch?v=eva5VGP9ASA&feature=player_embedded
http://www.youtube.com/watch?v=eva5VGP9ASA&feature=player_embedded
अब बारी थी पौराणिक कथा को नया अवतार देने की और एक दिन हमारा घर और पण्डित नरेंद्र शर्मा को खोजते हुए, उनकी लम्बी सी इम्पोर्टेड गाडी, हमारे घर के दरवाज़े के बाहर आकर  रुकी - घर पर अतिथि आए जिनसे पापा भद्रता से मिले । अभिवादन किया।  फ़िर, उन्होंने पापाजी से, कई बार और मुलाक़ात की और उन्हें, कार्य के लिए, अनुबंधित किया ।
पापा जी की उसके बाद, बी आर फिल्म्ज़ की ऑफिस में, रोजाना मीटिंग्स होने लगीं। पापा जी ने जैसे जैसे इस अति विशाल महाग्रंथ की कथा को, बतलाना शुरू किया तब यूनिट के लोगों का कहना है के ऐसा प्रतीत होने लगा मानो, हम उसी कालखंड में पहुँच कर सारा द्रश्य , पंडितजी की आंखों से घटता हुआ, देखने लगे ! " समय " ये भी एक महत्त्वपूर्ण पात्र है महाभारत कथा में .....और उसके लिए अविस्मरणीय  स्वर दिया है श्री हरीश भीमानी जी ने ....
जो समस्त कथा का सूत्रधार है ।
कभी कभी पापा जी, कथा में इतना डूब जाते के, उठ कर खड़े हो जाते या टहलते हुए, कोई कथानक को, स - विस्तार बतलाते, तमाम पेचीदगियों के साथ, महाभारत कथा के पात्रों के मनोभाव, उनके मनोमंथन या स्वभाव की बारीकियों को भी समझाते । तब, पापा की कही कोई बात व्यर्थ न जाए , इस कारण से, जैसे ही, पापाजी का बोलना आरम्भ होता, टेप रेकॉर्डर ओं कर लिया जाता ताकि, सब आराम से , सुना जा सके ---
एक बार  पापा जी ने कहा, " भीष् पितामह , हमेशा श्वेत वस्त्र धारण किया करते थे " 
बी. आर. अंकल और राही साहब जो पटकथा लिखा रहे थे वे दोनों पूछने लगे,
' आपको कैसे पता ? "
तब, पापा जी ने, बतला दिया कि, अमुक पन्ने पर इस का जिक्र है -
जब पितामह, मन ही मन प्रसन्न होते हुए बालक अर्जुन से शिकायत करते हैं,
'
वत्स, देखो तुम्हारे धूलभरे, वस्त्रों से, मेरे श्वेत वस्र, धूलि धूसरित हो जाते  हैं सब हैरान रह गए के इतनी बारीकी से कौन कथा पढता है भला ?
और राही मासूम रज़ा साहब ने इसी को, पटकथा लेखक के रूप मे, कलम बध्ध भी किया और भीष्म पितामह के किरदार को सजीव करनेवाले मुकेश खन्ना को, श्वेत वस्त्रों में ही, शुरू से अंत तक,  सुसज्जित किया गया । ये बातें भी, महाभारत के नए स्वरूप और नए अवतार के इतिहास का एक पन्ना बन गयीं राही साहब ने कहा है कि
' महाभारत ' की भूलभूलैया में , मैं, पण्डित जी की ऊंगली थामे थामे, आगे बढ़ता गया' । "
पापा जी के सुझाव पर, युधिष्ठीर को पाँच पांडवों में सबसे शांत वही थे ऐसे कलाकार को चुना गया
हाँ, द्रौपदी के किरदार के लिए रूपा गांगुली का नाम मेरी अम्मा , सुशीला नरेंद्र शर्मा ने सुझाया था और बी आर अंकल ने उन्हें कलकत्ता से, स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलवा लिया और वे चयनित हुईं ।
सीरीज़ को महाराज भरत के उत्तराधिकारी के चयन की दुविधा से आरम्भ किया गया । तब राजीव गांधी सरकार केन्द्र में थी। कई चमचों ने वरिष्ठ अधिकारियों को भड़काने के लिए कहा,' ये उत्तराधिकारीवाली बात इस में क्यों है ? इसे निकालें '
[ शायद नेहरू परिवार के लिए भी ये बात , लागू हो रही थी ]
परन्तु , पापा जी और बी आर अंकल देहली गए  और पापा ने कहा
' अगर अब आप ऐसी बातों को निकालने की कहेंगें अब आप का ही बुरा दीखेगा '
और इस संवाद को , काटा नही गया ! ये भी यादें हैं ...
फ़िर , आए शांतनु राजा और मत्स्यगंधा का प्रणय बिम्ब
यहाँ शूटिंग के बाद भी सींन, खाली खाली स लग रहा था ।
पापा जी ने कहा,
' ये गीत दे रहा हूँ , इसे इस खाली स्थान पर रखिये , अच्छा लगेगा यहाँ पर '
वो गीत था , " दिन पर दिन बीत गए " ..........
चोपरा अंकल दूसरे दिन, एक चेक लेकर आए , उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब पापाने ये कहते उसे लौटा दिया कि, ' चोपराजी, आपने मुझे जब नुबंधित किया है तब मेरा फ़र्ज़ बनता है के इस सीरीज़ की सफलता के लिए भरसक प्रयास करूं - मैं गीतकार भी हूँ आप ये जानते थे , अतः इसे रहने दीजिये " - चोपरा अंकल ने बाद में, हमें ये कहा के,
' बीसवें सदी में जीवित ऐसे संत - कवि को ,
मैं , हाथ में लौटाए हुए पैसों के चेक को थामे ,
बस, विस्मय से देखता ही रह गया ! "
उन्होंने अपनी श्रध्धान्जली अंग्रेज़ी में लिखी है जो पापा जी के असमय निधन के बाद छापी गयी पुस्तक" शेष - अशेष " में सम्मिलित है ।
वे कहते हैं, ' ये कोई रीत नहीं..हमें छोड़ कर जाने की ' और उन्होंने पापाजी को एक फ़रिश्ता - या एंजेल कहा है ।
हम परिवार के सभी, पापा जी के जाने से, टूट चुके थे ।
धारावाहिक, जारी था ।
बी. आर. अंकल का दफ्तर, मेरी ससुराल के बंगलो, के सामने ही था ।
एक दिन, शाम को टहलते हुए ,दीपक [ मेरे पति ] और मुझे, राजकमल जी , जो संगीत दे रहे थे, गली के नुक्कड़ पर ही मिल गए । बातें हुईं - पापा को सजल नयनों से वे याद करने लगे , तब दीपक ने कहा,
' अंकल , ये लावण्या ने भी कई दोहे, हाभारत सम्बंधित लिखे हैं '
उन्हें आश्चर्य हुआ और बोले,
' तब लिखे और घर में रखे हैं ? क्यों भला ?..ले आओ एक दिन, हम भी सुनेंगें ..
अगर कहीं योग्य लगें तब उसे रख लेंगें '
उनके आग्रह से, आश्वस्त हो, जब मैं, दफ्तर में पहुँची तब, ४ एपिसोड , बन कर तैयार हो रहे थे ।बी. आर. अंकल के पैर छु कर, रज़ा साहब के बगल में, जब मैं बैठी, तब पापा जी की बहुत याद आई !  आयी
प्रसंग था - १ - सुभद्रा हरण,
२ - द्रौपदी और सुभद्रा का सर्व प्रथम बार, इन्द्रप्रस्थ में द्रौपदी के अंत;पुर में मिलन और
३ - जरासंध - वध ....इत्यादी ...
पार्श्व - संगीत , दोहे अभी तलक, जोड़े नही गए थे ...सिर्फ़ रफ्फ कोपी की प्रिंट, ही तैयार थीं ...
मैंने, ये दोहे लिखकर दीये जिन्हें , महाभारत टी वी धारावाहिक में , शामिल किया गया । हाँ, मेरा नाम , कहीं शीर्षक में ना ही देखा होगा आपने ।
परन्तु, मुझे आत्म संतोष है इस बात का कि मैं अपने दिवंगत पिता के कार्य में अपने श्रध्धा सुमन रूपी, ये दोहे, पूजा के रूप में , चढ़ा सकी .........
ये एक पुत्री का पितृ - तर्पण था । आप भी देखिये ; ~~~~
- द्रौपदी द्रौपदी और सुभद्रा मिलन :
" गंगा यमुना सी मिलीं , धाराएं अनमोल ,
द्रवित हो उठीं द्रौपदी , सुनकर मीठे बोल "
और सबसे प्रथम दोहा जो सुभद्रा हरण के प्रसंग पर लिखा था उसके शब्द हैं ।१ - सुभद्रा हरण,
' बिगड़ी बात संवारना , सांवरिया की रीत ,
पार्थ सुभद्रा मिल गए , हुई प्रणय की जीत
http://www.youtube.com/watch?v=ufGYTrmb3Gc&feature=player_embedded

३ - जरासंध - वध
अभिमानी के द्वार पर, आए दींन दयाल,
स्वयं अहम् ने चुन लिया, अपने हाथों काल "

द्रौपदी चीर हरण
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" सत असत सर्वत्र हैं , अबला सबला होय
नारायण पूरक बनें, पांचाली जब रोये "
मत रो बहना द्रौपदी , जीवन है संग्राम
धीरज धर , मन शांत कर , सुधरेंगें , बिगड़े काज "
ये दोहा भी आपने धारावाहिक में सूना होगा जो श्री कृष्ण द्रौपदी को सांत्वना देते हुए पांडवों के वनवास के समय मिलने आते हैं तब कहते हैं

कीचक वध
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" चाहा छूना आग को गयी कीचक की जान,
द्रौपदी के अश्रू को मिला आत्म -सम्मान ! "
भीष्म पितामह जब घायल हुए उस प्रसंग पर एक दोहा लिखा था ,
जो यूँ है, [ ये सिर्फ़ डायरी में कैद है ] ,
' जानता हूँ, बाण है यह प्रिय अर्जुन का,
नहीं शिखंडी चला सकता एक भी शर ,
बींध पाये कवच मेरा किसी भी क्षण,
बहा दो संचित लहू, तुम आज सारा ...'

चलिए .......
आज इतना ही , फ़िर मिलेंगें ...
तब तक , सब के जीवन में , योगेश्वर श्री कृष्ण की कृपा, बरसती रहे
यही मंगल कामना है ...
- लावण्या