
रूपा गांगुली --

मेरे आराध्य श्री कृष्ण हैं -
- मेरे मन के भाव, इसी गीत में प्रकट हैं सुनियेगा .........
.http://www.youtube.com/watch?v=sqRfhMWjbn4&feature=fvw
रूपा गांगुली

श्री बी. आर. चोपड़ा जी ने दूरदर्शन पर ' महाभारत ' की कथा को, आधुनिक युग के लिए प्रस्तुत किया। इस धारावाहिक ने, अब तक दर्शक संख्या में, बने पुराने सारे रेकोर्ड तोड़ दीये। सबसे ज्यादा टीआरपी, इसी प्रग्राम को मिली है।
पूज्य पापाजी, पण्डित नरेंद्र शर्मा इस टीवी सीरीज के साथ, ' परामर्श
दाता + कांसेप्ट देनेवाले तथा इस के कई गीतों के रचियता के रूप में जुड़े।
दूरदर्शन ने जब सुप्रसिध्ध निर्माता, निर्देशक, श्री बलदेव राज चोपड़ा जी को, महाभारत पर धारावाहिक बनाने
का कार्य सौंपा और अनुबंधित किया तब, सबसे पहले, इस महत्त्वपूर्ण प्रोजेक्ट के लिए, टीम तैयार करने का कार्य आरम्भ हुआ। कई महत्त्वपूर्ण बातें, एक तार में, बंधकर, सुचारू रूप से कार्य आरम्भ हो, उस के लिए, योग्य व्यक्ति की एक बृहत् टीम बनाना शुरू हुआ।
बंबई शहर, जो बोलीवुड माने भारतीय फ़िल्म निर्माण का गढ़ है वहाँ, हर तरफ़, श्री बी आर चोप्रा जी जो निर्माता थे, उनकी, जिससे भी बातें होतीं, सभी से एक सुझाव अवश्य मिलता
कि, बंबई में, पण्डित नरेंद्र शर्मा रहते हैं और वे साहित्य, संस्कृति व भारतीय परम्पराओं के चलते फिरते ज्ञान कोष या विश्वकोश से हैं - उन्हें आप अपनी टीम में शामिल कर लीजिये तब आपका काम आसान हो जाएगा और सुचारू रूप से चलने लगेगा ।
बी. आर. अंकल ने ' अफ़साना, शोले, एक ही रास्ता, नया दौर, साधना, क़ानून, गुमराह, वक्त, हमराज़, धुंध, पति, पत्नी और वो, इन्साफ का तराजू, निकाह, और बहादुर शाह ज़फर पर धारावाहिक और
कमर्शियली, अत्यन्त सफल फिल्मे पहले ही बना कर, अपनी हस्ती और अपनी निर्माण संस्था को हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में, एक ऊंचा मकाम दिलवा दिया था। उनकी फ़िल्में अकसर सामाजिक प्रश्नों पर केन्द्रीत रहतीं थीं। जैसे साधना, धूल का फूल, निकाह, इन्साफ का तराजू जैसी फिल्मों की पटकथा में भी है । सुनिए, फ़िल्म :
नया दौर का ये गीत, जो मुझे पसंद है
http://www.youtube.com/watch?v=eva5VGP9ASA&feature=player_embedded
http://www.youtube.com/watch?v=eva5VGP9ASA&feature=player_embeddedअब बारी थी पौराणिक कथा को नया अवतार देने की और एक दिन हमारा घर और पण्डित नरेंद्र शर्मा को खोजते हुए, उनकी लम्बी सी इम्पोर्टेड गाडी, हमारे घर के दरवाज़े के बाहर आकर रुकी - घर पर अतिथि आए जिनसे पापा भद्रता से मिले । अभिवादन किया। फ़िर, उन्होंने पापाजी से, कई बार और मुलाक़ात की और उन्हें, कार्य के लिए, अनुबंधित किया ।
पापा जी की उसके बाद, बी आर फिल्म्ज़ की ऑफिस में, रोजाना मीटिंग्स होने लगीं। पापा जी ने जैसे जैसे इस अति विशाल महाग्रंथ की कथा को, बतलाना शुरू किया तब यूनिट के लोगों का कहना है के ऐसा प्रतीत होने लगा मानो, हम उसी कालखंड में पहुँच कर सारा द्रश्य , पंडितजी की आंखों से घटता हुआ, देखने लगे ! " समय " ये भी एक महत्त्वपूर्ण पात्र है महाभारत कथा में .....और उसके लिए अविस्मरणीय स्वर दिया है
श्री हरीश भीमानी जी ने ....
जो समस्त कथा का सूत्रधार है ।
कभी कभी पापा जी, कथा में इतना डूब जाते के, उठ कर खड़े हो जाते या टहलते हुए, कोई कथानक को, स - विस्तार बतलाते, तमाम पेचीदगियों के साथ, महाभारत कथा के पात्रों के मनोभाव, उनके मनोमंथन या स्वभाव की बारीकियों को भी समझाते । तब, पापा की कही कोई बात व्यर्थ न जाए , इस कारण से, जैसे ही, पापाजी का बोलना आरम्भ होता, टेप रेकॉर्डर ओं
न कर लिया जाता ताकि, सब आराम से , सुना जा सके ---
एक बार पापा जी ने कहा, " भीष् पितामह , हमेशा श्वेत वस्त्र धारण किया करते थे "
बी. आर. अंकल और राही साहब जो पटकथा लिखा रहे थे वे दोनों पूछने लगे,
' आपको कैसे पता ? "
तब, पापा जी ने, बतला दिया कि, अमुक पन्ने पर इस का जिक्र है -
जब पितामह, मन ही मन प्रसन्न होते हुए बालक अर्जुन से शिकायत करते हैं,
' वत्स, देखो तुम्हारे धूलभरे, वस्त्रों से, मेरे श्वेत वस्र, धूलि धूसरित हो जाते हैं सब हैरान रह गए के इतनी बारीकी से कौन कथा पढता है भला ?
और राही मासूम रज़ा साहब ने इसी को, पटकथा लेखक के रूप मे, कलम बध्ध भी किया और भीष्म पितामह के किरदार को सजीव करनेवाले मुकेश खन्ना को, श्वेत वस्त्रों में ही, शुरू से अंत तक, सुसज्जित किया गया । ये बातें भी, महाभारत के नए स्वरूप और नए अवतार के इतिहास का एक पन्ना बन गयीं राही साहब ने कहा है कि
' महाभारत ' की भूलभूलैया में , मैं, पण्डित जी की ऊंगली थामे थामे, आगे बढ़ता गया' । "
पापा जी के सुझाव पर, युधिष्ठीर को पाँच पांडवों में सबसे शांत वही थे ऐसे कलाकार को चुना गया
हाँ, द्रौपदी के किरदार के लिए
रूपा गांगुली का नाम मेरी अम्मा , सुशीला नरेंद्र शर्मा ने सुझाया था और बी आर अंकल ने उन्हें कलकत्ता से, स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलवा लिया और वे चयनित हुईं ।
सीरीज़ को महाराज भरत के उत्तराधिकारी के चयन की दुविधा से आरम्भ किया गया । तब राजीव गांधी सरकार केन्द्र में थी। कई चमचों ने वरिष्ठ अधिकारियों को भड़काने के लिए कहा,' ये उत्तराधिकारीवाली बात इस में क्यों है ? इसे निकालें '
[ शायद नेहरू परिवार के लिए भी ये बात , लागू हो रही थी ]
परन्तु , पापा जी और बी आर अंकल देहली गए और पापा ने कहा
' अगर अब आप ऐसी बातों को निकालने की कहेंगें अब आप का ही बुरा दीखेगा '
और इस संवाद को , काटा नही गया ! ये भी यादें हैं ...
फ़िर , आए शांतनु राजा और मत्स्यगंधा का प्रणय बिम्ब
यहाँ शूटिंग के बाद भी सींन, खाली खाली स लग रहा था ।
पापा जी ने कहा,
' ये गीत दे रहा हूँ , इसे इस खाली स्थान पर रखिये , अच्छा लगेगा यहाँ पर '
वो गीत था ,
" दिन पर दिन बीत गए " ..........
चोपरा अंकल दूसरे दिन, एक चेक लेकर आए , उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब पापाने ये कहते उसे लौटा दिया कि,
' चोपराजी, आपने मुझे जब अनुबंधित किया है तब मेरा फ़र्ज़ बनता है के इस सीरीज़ की सफलता के लिए भरसक प्रयास करूं - मैं गीतकार भी हूँ आप ये जानते थे , अतः इसे रहने दीजिये " - चोपरा अंकल ने बाद में, हमें ये कहा के,
' बीसवें सदी में जीवित ऐसे संत - कवि को ,
मैं , हाथ में लौटाए हुए पैसों के चेक को थामे ,
बस, विस्मय से देखता ही रह गया ! "
उन्होंने अपनी श्रध्धान्जली अंग्रेज़ी में लिखी है जो पापा जी के असमय निधन के बाद छापी गयी पुस्तक
" शेष - अशेष " में सम्मिलित है ।
वे कहते हैं, ' ये कोई रीत नहीं..हमें छोड़ कर जाने की ' और उन्होंने पापाजी को एक फ़रिश्ता - या एंजेल कहा है ।
हम परिवार के सभी, पापा जी के जाने से, टूट चुके थे ।
धारावाहिक, जारी था ।
बी. आर. अंकल का दफ्तर, मेरी ससुराल के बंगलो, के सामने ही था ।
एक दिन, शाम को टहलते हुए ,
दीपक [ मेरे पति ] और मुझे, राजकमल जी , जो संगीत दे रहे थे, गली के नुक्कड़ पर ही मिल गए । बातें हुईं - पापा को सजल नयनों से वे याद करने लगे , तब दीपक ने कहा,
'
अंकल , ये लावण्या ने भी कई दोहे, महाभारत सम्बंधित लिखे हैं । '
उन्हें आश्चर्य हुआ और बोले,
'
तब लिखे और घर में रखे हैं ? क्यों भला ?..ले आओ एक दिन, हम भी सुनेंगें ..
अगर कहीं योग्य लगें तब उसे रख लेंगें । '
उनके आग्रह से, आश्वस्त हो, जब मैं, दफ्तर में पहुँची तब, ४ एपिसोड , बन कर तैयार हो रहे थे ।बी. आर. अंकल के पैर छु कर, रज़ा साहब के बगल में, जब मैं बैठी, तब पापा जी की बहुत याद आई !
आयी ।
प्रसंग था - १ - सुभद्रा हरण, २ - द्रौपदी और सुभद्रा का सर्व प्रथम बार, इन्द्रप्रस्थ में द्रौपदी के अंत;पुर में मिलन और
३ - जरासंध - वध ....इत्यादी ...
पार्श्व - संगीत , दोहे अभी तलक, जोड़े नही गए थे ...सिर्फ़ रफ्फ कोपी की प्रिंट, ही तैयार थीं ...
मैंने, ये दोहे लिखकर दीये जिन्हें , महाभारत टी वी धारावाहिक में , शामिल किया गया । हाँ, मेरा नाम , कहीं शीर्षक में ना ही देखा होगा आपने ।
परन्तु, मुझे आत्म संतोष है इस बात का कि मैं अपने दिवंगत पिता के कार्य में अपने श्रध्धा सुमन रूपी, ये दोहे, पूजा के रूप में , चढ़ा सकी .........
ये एक पुत्री का पितृ - तर्पण था । आप भी देखिये ; ~~~~
२ - द्रौपदी द्रौपदी और सुभद्रा मिलन :" गंगा यमुना सी मिलीं , धाराएं अनमोल ,
द्रवित हो उठीं द्रौपदी , सुनकर मीठे बोल "
और सबसे प्रथम दोहा जो सुभद्रा हरण के प्रसंग पर लिखा था उसके शब्द
हैं ।१ - सुभद्रा हरण,
' बिगड़ी बात संवारना , सांवरिया की रीत ,
पार्थ सुभद्रा मिल गए , हुई प्रणय की जीत
http://www.youtube.com/watch?v=ufGYTrmb3Gc&feature=player_embedded
३ - जरासंध - वध
अभिमानी के द्वार पर, आए दींन दयाल,
स्वयं अहम् ने चुन लिया, अपने हाथों काल "
द्रौपदी चीर हरण
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
" सत असत सर्वत्र हैं , अबला सबला होय
नारायण पूरक बनें, पांचाली जब रोये "
मत रो बहना द्रौपदी , जीवन है संग्राम
धीरज धर , मन शांत कर , सुधरेंगें , बिगड़े काज "
ये दोहा भी आपने धारावाहिक में सूना होगा जो श्री कृष्ण द्रौपदी को सांत्वना देते हुए पांडवों के वनवास के समय मिलने आते हैं तब कहते हैं
कीचक वध
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
" चाहा छूना आग को गयी कीचक की जान,
द्रौपदी के अश्रू को मिला आत्म -सम्मान ! "
भीष्म पितामह जब घायल हुए उस प्रसंग पर एक दोहा लिखा था ,
जो यूँ है, [ ये सिर्फ़ डायरी में कैद है ] ,
' जानता हूँ, बाण है यह प्रिय अर्जुन का,
नहीं शिखंडी चला सकता एक भी शर ,
बींध पाये कवच मेरा किसी भी क्षण,
बहा दो संचित लहू, तुम आज सारा ...'
चलिए .......
आज इतना ही , फ़िर मिलेंगें ...
तब तक , सब के जीवन में , योगेश्वर श्री कृष्ण की कृपा, बरसती रहे
यही मंगल कामना है ...
- लावण्या