Monday, September 27, 2010

विश्वव्यापी चक्रवात के मध्य में , समन्वय और सुख शांति की खोज !

  • "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम
    पूर्णात पूर्णमुदच्यते ,
    पूर्णस्य पूर्णमादाय
    पूर्णमेवावशिष्यते ."

    विश्वव्यापी चक्रवात के मध्य में , समन्वय और सुख शांति की खोज !
२१ वीं सदी के आरम्भ का काल है और आम
इंसान
का जीवन आजकल तेज रफ़्तार से भागा जा रहा है जहां नित नये अनुभव होते हैं और तकनीकी माध्यमों के जरिए या कहें विश्वव्यापी वेब के जरिए , अब पूरा विश्व मानों संचार - सूचना की हलचल से आंदोलित हुआ, करीब आ गया है और सूचना, समाचार और अभिगम ये सारे
आज बड़ी तेजी से घूम रहे हैं .. ये एक आम अनुभव हो चला है .
व्यक्ति , समाज , विश्व , समाचार, विचार -- > हर तरफ बस, तेजी है ..
चक्रवात से इस उफान के मध्य , इस मंथन के आवेग के मध्य में , व्यक्ति ,
अपनी तटस्थता साधे रखना चाहता है ... ये भी एक विरोधाभासी सत्य है !
भारतीय मन , सदा, वि
रो
धाभासों के मध्य भी , द्वंद्व + उद्वेलन के रहते ,
समन्वय और सुख शांति की खोज में संलग्न रहा है ...
भारत का सनातन धर्म , हमारा सम्पूर्ण वांग्मय, हमारी विचारधारा ,
सदा ही अंतर्मुखी रही है ...
इसे कई विभूतियों ने बाह्य से आंतरिक की ओर चलनेवाली इस यात्रा को , आत्मा से परमात्मा की ओर आमुख , करवाती प्रक्रिया को , हमारी इस मनोदशा को, कई प्रबुध्ध, चैतन्य आन्दोलनों के स्वरों ने , सदियों से सहेज रखा है और संवारा है ....
हमारी इस अंतर्मुखी यात्रा को , मार्गदर्शन देते हुए गुरु परंपरा ने इस आत्मिक आन्दोलनों को बढ़ावा दिया है . प्राचीन ऋषि मुनि से लेकर, भारत के संत महात्मा तथा संत - कवि, सभी ने अपना अपना अभूतपूर्व योगदान इस अदभुत यात्रा में दिया है और इस तथ्य का स्वयं इतिहास साक्षी रहा है ...
भारतीय स्वतंत्रता के साथ और उसके पूर्व भी भारतीय संत परम्परा के संवाहक ज्योति पुरुषों ने भारत से दूर यात्राएं की थीं जिनमे प्रमुख नाम याद आ रहा है स्वामी विवेकानंद जी का !
स्वामी विवेकानन्द
स्वामी विवेकानन्द वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो नगर में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासम्मेलन में सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था । भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानंद की वक्तृता के कारण ही पँहुचा। वे श्री रामकृष्ण परमहंस जी के सुयोग्य शिष्य थे। उन्होंने अपने गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस के नाम से रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। विवेकानन्द में, अपने मत से पूरे विश्व को हिला देने की शक्ति थी । उन्होंने दुनिया भर में सनातन धर्म का डंका बजाया।
जिनके शिकागो अन्तराष्ट्रीय धार्मिक सभा में दीये भाषण ने अमरीका के पढ़े लिखे व्यक्तियों को चौंका कर , भारतीय धर्म के प्रति देखने को बाध्य कर दिया था .
कुछ ऐसे भी विरले व्यक्ति हुए हैं जो पले बड़े विदेश में परंतु जैसे ही भारतीय भूमि पर उनके कदम पड़े , भारतीय माटी के चमत्कार ने , उनको पूर्ण चैतन्य से जोड़ कर ऊर्ध्वगामी , उन्नति के पथ पर ,चलने का प्रसाद दिया
ऐसे ही अनुभव रहे श्रीअरविन्द के !
श्री अरविंदो का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता के.ड़ी जी नास्तिक थे और चाहते थे कि उनका बेटा पाश्च्यात संसकृति में पले बढ़े। इसलिए उन्होंने सात वर्ष की आयु में अरबिंदो को इंग्लैंड भेज दिया। अरबिंदो ने इंग्लैंड में सफलता पूर्वक अपनी शिक्षा पूरी की और अपने पिता के कहने पर वहाँ होने वाली भार्तीय सिविल सेवा की परीक्षा मे हिस्सा लिया लेकिन ये घुड़सवारी परीक्षण में असफल हो गए और 1893 में वापिस भारत आ गए। यहां आ कर उन्होंने बड़ौदा स्टेट सर्विस ज्वाइन कर ली, जहां ये अगले 15 वषों तक विभिन्न पदों पर कार्य करते रहे। इस दौरान इनमे भार्तीय संसकृति, राष्ट्रवाद और योग के प्रति प्यार व सम्मान का भाव जागृत हुआ। इन्होंने कुछ उपनिषदों का अनुवाद किया तथा गीता व दो अन्य महाकाव्य कालीदास और भवभूति पर भी कार्य किया। 1906 में ये कलकत्ता से बढ़ौदा आ गए और यहां नैशनल कॉलेज के प्रधानाचार्य बन गए। ये लगातार योग व ध्यान का अभ्यास करते रहे।
इनको क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण एक साल की जेल हो गई। जेल के दौरान ही इन्होंने भगवान कृष्ण की व्यापक अदृश्य शक्ति को अनुभव किया। जेल से रिहा होने के बाद ये पांडेचेरी चले गए जहां इन्होंने अपने जीवन का ज़्यादातर समय विभिन्न तरह की साधना के विस्तार में लगाया। इन्होंने कई किताबे लिखीं। जीवन के अंतिम समय में मां ने इनकी बहुत सहायता की जो कि मूल रूप से फ्रांस की थीं। 5 दिसंबर 1950 को अरबिंदो इस संसार को छोड़ कर चले गए।
उनके बाद आये स्वामी भक्तिवेदांत - (1896 – 1977)
जिन्होंने श्री कृष्ण संकीर्तन की अलख अमरीका में जगाई और " इस्कोन " नामक बहुत बड़ी संस्था की नींव रखी जिसने बड़े ही भव्य मंदिर , दुनियाभर में बनाए हैं
रजनीश भी अमरीका आये.............
Osho on Consciousness and Energy
और उनके आश्रम में फैले व्याभिचार जैसे नशीले पदार्थों का सेवन मुक्त यौन आचरण वगैरह बातों ने उन्हें मीडीया की सुर्ख़ियों के केंद्र में रखा -
तद्पश्चात आये - योगानंद जी !
उन के महत्वपूर्ण कार्य ने , क्रिया - योग प्रणाली को अमरीकी प्रजा में स्थापित किया
सन १८९३, ५ जनवरी गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में मुकुंद लाल घोष के नाम से जन्मे बालक ने आद्यात्मिक प्रगति के सोपान सरलता व तीव्र गति से पार किये १७ वर्ष की युवावस्था में श्री श्री युक्तेश्वर्गिरी के चरणों में शरण लेते ही , लहरी महाशय की प्रणाली के प्रखर आचार्य गुरु युक्तेश्वर जी की कृपा से महाअवतार बाबाजी
जिन्होंने " क्रिया योग पध्धति का सूत्रपात किया और जगत के अनेक व्यक्ति को मुक्ति मार्ग की ओर अग्रसर होने का प्रसाद दिया उन्ही यशस्वी परम्परा के श्री योगानंद संवाहक बने
जो आज भी असंख्य देसी एवं परदेसी शिष्यों द्वारा , एक व्यवस्थित संस्था के रूप में चल रही सफल संस्था है --

महर्षि महेश योगी

महर्षि महेश योगी

महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी 1918 को छत्तीसगढ़ के राजिम शहर के पास पांडुका गाँव में हुआ था। [१] उनका मूल नाम महेश प्रसाद वर्मा था। उन्होने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक की उपाधि अर्जित की। उन्होने तेरह वर्ष तक ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के सानिध्य में शिक्षा ग्रहण की। महर्षि महेश योगी ने शंकराचार्य की मौजूदगी में रामेश्वरम में 10 हजार बाल ब्रह्मचारियों को आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा दी। हिमालय क्षेत्र में दो वर्ष का मौन व्रत करने के बाद सन् 1955 में उन्होने टीएम तकनीक की शिक्षा देना आरम्भ की। सन् 1957 में उनने टीएम आन्दोलन आरम्भ किया और इसके लिये विश्व के विभिन्न भागों का भ्रमण किया। महर्षि महेश योगी द्वारा चलाया गए आंदोलन ने उस समय जोर पकड़ा जब रॉक ग्रुप 'बीटल्स' ने 1968 में उनके आश्रम का दौरा किया। इसके बाद गुरुजी का ट्रेसडेंशल मेडिटेशन पूरी पश्चिमी दुनिया में लोकप्रिय हुआ। [२] उनके शिष्यों में पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी से लेकर आध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा तक शामिल रहे।[

स्वामी मुक्तानंद जी , यू एस . ए . माने उत्तर अमरीका में सन १९७० में आये और सिद्ध योग धाम को प्रतिष्ठित किया सन १९७६ तक , सिद्ध योग की अस्सी = ८० शाखाएं ध्यान व योग सीखातीं हुईं जम गयीं थीं और ५ आश्रम भी बन गये थे जहां हजारों की संख्या में अमरीकी मेंबर बने थे --
सन १९७४ से १९७६ तक सिध्ध योग ध्यान संस्था एक फाऊंडेशन का स्वरूप ले चुकी थी --
आज मुक्तानंद जी की पट्ट शिष्या गुरुमायी चिद्विलासनान्द जो भारत में जन्मी महिला हैं
वही दक्षिण फाल्स बर्ग , न्यू योर्क प्रांत में सिद्ध आश्रम का संचालन करतीं हैं

आज आपको स्वामी मुक्तानंद जी के समीप ले चलते हुए, हर्ष हो रहा है
शायद, आप ने इनका नाम , आज से पहले भी सुन रखा हो !
आपको परम आदरणीय गुरु जी के शिष्य बनाने का मेरा कोइ आशय नहीं है ...
महज , इन के बारे में , कुछ पल अपने मन की पूर्व अवधारणाओं को एक ओर हटाकर ,
इन के जीवन पर द्रष्टि डालें यही मेरा , विनम्र अनुरोध है ...-
[ आजकल कई धर्गुरुओं के प्रति अंध श्रध्धा व आश्रम में पाखण्ड के चर्चे भी मीडीया में अकसर चर्चा में रहते हैं ...
हरेक व्यक्ति अपनी सोच समझ के अनुसार ही अपना जीवन जीता है
अत: किसी को धर्मांध , धर्मभीरु या पोंगापंथी बनाना ऐसा कोइ आशय इस लेख का नहीं है ]
तो आईये और मिलिए बाबा नित्यानंद जी से ..... वे , मुक्तानंद जी के गुरु थे ....
अगर आप इस गुरु परम्परा के बारे में सुनना चाहें तो आगे पढीये ..
चित्र में , हैं स्वामी चिन्मयानन्द जी , जिनके अनेकों आश्रम तथा संस्थाएं आज जगत के हर देश में बसी हुई हैं ,वे यहां भक्ति भाव से बड़े बाबा , परमहंस नित्यानंद जी के दर्शन करते हुए ,बाबा के चरण छूते हुए दीखलाई दे रहे हैं '.
महायोगी नित्यानंद जी पर अधिक जानकारी इस लिंक पर प्राप्त करीए
परम आदरणीय गुरु श्री नित्यानंद जी ने गणेशपुरी आश्रम में
अगस्त ८ , १९६१ के दिन , महासमाधि ली थी और उनका सन्देश है कि ,
निर्मल भक्ति ही ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल रास्ता है ........
चित्र में पवित्र शिव लिंग भीमेश्वर मंदिर , गणेशपुरी आश्रम मुम्बई के समीप

बाबा नित्यानंद जी की वाणी :

" ना कस्ते विद्यते देवो ना पाषाणे ना कर्दमे
भावेसू वर्तते देवास -तस्माद -भावं ना संत्यजेत "
ईश्वर नाही पत्थरों में हैं ना ही मिट्टी में ..ना काष्ट में ..
ईश्वर तो भक्त के भक्ति भाव में बसते हैं
इस कारण , भक्ति को अपनाओ अपने ईश्वर के प्रति श्रध्धा और भक्ति ,
विश्वास को कभी त्यागो नहीं
प्रेम, भक्ति और दृढ आस्था अपने ईष्ट के प्रति तथा गुरु के लिए ही अनेक आद्यात्मिक जागृति के सोपान पार करवा कर हर इंसान में बसी आत्म शक्ति को चैतन्य से परब्रह्म की ओर अग्रसर करने में सहायक होती है ..
भक्ति और भाव , श्रध्धा और विश्वास ही गूढ़ और अद्रश्य परमतत्त्व को उजागर करती है और तब ईश्वर स्वयं भक्त के समीप आ पहुँचते हैं और मुक्ति का मार्ग बस, उसी के आगेहै परम आदरणीय महायोगी नित्यानंद जी के एक शिष्य मुक्तानंद जी जग प्रसिध्ध हुए हैं
और वे अपने परम श्रध्धेय गुरु भगवान् नित्यानंद जी के लिए कहा करते थे कि,
" गुरुदेव, जन्म सिद्ध विभूति हैं ...."
[ photo ]


स्वामी मुक्तानंद जी
मेरा परम सौभाग्य रहा है कि मैंने मुक्तानंद जी के दर्शन कीये हैं - स्वामी मुक्तानंद जी के अमरीका प्रवास के बाद , बंबई हवाई स्थल पर स्वागत हुआ था अपार वदेशी शिष्यों तथा कई भारतीय भक्तों ने बाबा की वापसी को उत्सव की तरह मनाया था -बाबा स्वयं , एक ऊंचे आसन से उतरकर , समुदाय में खड़े लोगों के बीच विचरण करने लगे थे - मेरे नजदीक से जब् वे गुजरे तब उन्होंने हलके से माथे पर हाथ रखते हुए कहा, ' माँ, आ गया तुम ! " और आगे बढ़ गये थे ..पर मेरा अपना अनुभव है कि उस सहज स्पर्श के बाद ,कई पलों तक मेरा सर चकराने लगा था और मैं एक स्तम्भ को पकड़ कर ही संतुलन बनाए , वहां स्थिर खडी हो पायी थी . . ना मैं पने आपको कोइ साधिका समझती हूँ ना मैं किसी योग - प्रणाली से सीधा सम्बन्ध रखती हूँ परंतु भारतीय योग परम्परा तथा नाथ व सिध्ध प्रथा के सभी गुरु व उनसे सम्बंधित विभूतियाँ, भारत के अन्य सभी संत - कवि जैसे ज्ञानेश्वर महाराज, नरसिंह मेहता, तुकाराम, नामदेव, संत मीरां ,सूरदास, नानक देव, कबीर , बाबा तुलसीदास , रैदास , रमण महर्षि परमहंस रामकृष्ण तथा अरविंदो से लेकर प्राचीन आदिकवि वाल्मीकि व शुकदेव व्यास जैसे सभी के प्रति, मेरे ह्रदय में अपार श्रध्धा व सन्मान की भावना है ....
मेरी श्रध्धा और मेरा विश्वास ईश्वर के प्रति अडीग व अचल है और इस सरल भक्ति भाव के बीज मेरे पिता स्व. पण्डित नरेद्र शर्मा के समस्त जीवन को देखने से , उनकी बातों को यथामति समझने के प्रयासों से तथा उनके बतलाये हुए रास्तों पर यथासंभव चलने के बाद , परिमार्जित व प्रबल होती गयी मेरी भावना के कारण हीआज मैं जिस मनोभूमि में हूँ, वहां ईश्वर कृपा ईश्वर भक्ति मुझे हर सुगम या कठिन परिस्थिती के मध्य भी संबल प्रदान करती है
गुरुमायी चिद्विलासनान्द

अन्य गुरु जैसे मोरारी बापू स्वामी श्री रामदेव जी

श्री श्री रविशंकर जी दलाई लामा तथा दीपक चोपरा भी सनातन धर्म के आख्याता व गुरु के रूप में पूजनीय व प्रसिध्धहैं
मोरारी बापू

सद्गुरू श्री श्री रविशंकर जी
स्वामी रामदेव
दलाई लामा


- लावण्या

Saturday, September 11, 2010

सूनी साँझ ...कुछ यूँ बिताई , हमने ...



सूनी साँझ ...कुछ यूँ बिताई , हमने ......
[ Flashback ] 
" गौरी कुण्ड की कुछ मिटटी लेकर , हाथों में ,
एक अकेली साँझ को , सोच रहीं माँ पारबती ,
कब आयेंगे घर , मेरे , शिव ~ सुंदर ?
केशर मिश्रित उबटन लेकर हाथों में
तब खूब उसे मल - मल कर उतारा
फिर अपने अंग से खेल खेल में ...
बना दी आकृति एक बालक की और हलके से ,
फूंक दिए प्राण अपनी सांसों के और कहा ,
" देखो यह मेरा पुत्र विनायक है ! "
सूनी साँझ कहाँ फिर रहती सूनी सूनी ?
हुआ आगमन , श्री गणेश का जग में !
पारबती के प्यारे पुत्र तब आये जग में
शिवजी लौट रहे थे , छोड़ कैलाश और तपस्या
द्वार के पहरेदार बन खड़े हो गये बाल गणेश !
माता के बन गये वह रक्षक ! "

" फिर आगे क्या हुआ माँ ? कहो न ...".
पूछ रही थी बिटिया , मेरी , मुझसे !
एक सूनी साँझ के समय , जब्
वह सुन रही थी यह कथा , मुझसे
है कथा पुरानी और नयी कन्या है वो
और मैं, कर रही थी उस को , तैयार !
रात्रि - भोज के पहले , ये भी तो करना था ,
बस , अब , आते ही होंगें , आमंत्रित मेहमान ! 
[- लावण्या ]

ई - मेल, ब्लॉग , फेस बुक, ट्वीटर ये सारे विश्व के हर देश में बसे लोग , संपर्क व सम्प्रेषण के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। स्वर साम्राज्ञी सुश्री लतादीदीजी भी आजकल अपनी बात कहने लगीं हैं उन्होंने गणेश चतुर्थी पर ये सन्देश प्रसारित किया है आप भी पढीये 
" नमस्कार . आज गणेश चतुर्थी है। आप सभी को इस पवित्र गणपति त्यौहार की बहुत बहुत शुभकामनाएं
अभी -अभी, हर साल की तरह , हमारे घर श्री गणेशजी पधारे हैं
अब १० दिन तक सारा घर और वातावरण ख़ुशी का होगा आनंदमय और प्रसन्न होगा। हमारे घर यह परंपरा बहुत पुरानी है और इसे मेरे बाबा , मास्टर दीनानाथजी ने शुरू किया है और हम इसे आगे चला रहे हैं तब से हमने गणेशजी को घर लाना शुरू किया है
मेरे बाबा एक देश भक्त थे और उन पर लोकमान्य तिलकजी का काफी प्रभाव था , इसलिएबाबा ने घर पे गणेश उत्सव शुरू किया। मैं , आज , आपको मेरी गई हुई गणपति की पारंपारीक आरती , जो मराठी में है ,
सुनाती हूँ और इस का विडियो भी आप देख सकते हैं

Wednesday, September 1, 2010

स्त्री सशक्तिकरण और द ग्लास सीलिंग’ = "शीशे की छत " [ कोर्पोरेट कल्चर ]

"शीशे की छत ? " ये क्या है जी ।।।?

हाँ , हाँ शायद आपके ज़हन में भी शायद, फ़िल्म ‘वक़्त’ का मशहूर डायलोग, जिसे कलाकार राजकुमार साहब ने बड़ी अदा से कहा था -

' चिनॉय सेठ, जिनके मकान शीशे के होते हैं, वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते ! " कौंध गया हो ! अजी, याद आया क्या ?

अजी, शीशे के मकान हम ने भी बहुत देखे हैं पर आज के कोर्पोरेट व्यावसायिक जग में 'शीशे की छत' शब्द एक प्रसिद्ध मुहावरा बना हुआ है जिसे अँगरेज़ी में, 'glass ceiling ' कहते हैं । व्यापार, व्यवसाय कोर्पोरेशन में, अमेरीका या इंग्लैंड जैसे पाश्चात्य देश हों या एशिया के जापान या चीन या हमारा भारत भी, अकसर बड़ी-बड़ी इंटरनेशनल कम्पनियों के सर्वोच्च स्थान पर, हमेशा पुरुषों को पदासीन हुआ ही हम देखते हैं । महिलाओं या स्त्रियों को ऐसी सब से ऊँची और शक्तिशाली कुर्सी पर विराजमान हुआ हम कम ही देखते हैं ।

तो ये हुआ एक तरह से पारदर्शी छत का होना जिसे महिलाएँ बहुत कम तोड़ पायी हैं । भले ही किसी महिला में अन्य पुरुषों की तरह सारी विशेषताएँ, सारी कार्य कुशलता, कार्य दक्षता हो, पर कंपनी के सर्विच्च स्थान सीईओ के पद पर हमेशा पुरुषों का चुनाव करके उन्हें उस पद पर आसीन किया जाता है । ये एक तरह से सेक्सीज़म या रेसीज़म का प्रारूप है । ये एक तरह से ऊपरी चढ़ाई को रोकने का कृत्रिम प्रयास है, जो पारदर्शी नहीं है चूँकि ऐसी कोई प्रणाली या अधिनियम, कंपनी में कहीं लिखित रूप से मौज़ूद नहीं होते । एक व्यक्ति की प्रगति में बाह्य रूप से, शिक्षा, या किसी कार्य के पूर्व अनुभव की कमी होना जैसे बाह्य कारण होते हैं , जो प्रगति या आपकी नौकरी में आगे बढ़ने में रुकावट या अवरोध उत्पन्न कर सकते हैं ।

अमरीकी गणतंत्र ने सन 1964 में संविधान पारित किया जिसके तहत सामाजिक स्वतंत्रता से सम्बंधित क़ानूनन तौर पर, व्यक्ति का स्त्री या पुरुष होना, व्यक्ति की कार्य क्षमता या प्रगति में आड़े आना निरापद होगा । यह तथ्य ठोस रूप से सामने रखा गया था, जिससे प्रयाप्त कार्य कुशलता तथा सही कार्य प्रणाली के अनुभवों के बाद महिलाएँ भी सही प्रगति के पथ पर आगे बढ़ पायें और सर्वोच्च स्थान पर अपना पद ग्रहण कर पाएँ। इस क़ानून के तहत यही प्रयास किया गया था, उसी पर भार रखा गया था ।

अमरीकी स्टोक कम्पनी सम्बंधित पत्रिका 'वोल स्ट्रीट जर्नल ' में , सन 1986 के मार्च 24 तारीख के अंक में क़ेरोल हाय्मोवीट्ज़ [ Carol Himowitz ] और टीमोथी स्तेल्हार्द्ज़ [ Timothee Steilhardz ] ने सबसे पहली बार एक नया तथा पहले कभी जिसे प्रयोग ना किया गया हो ऐसा शब्द

’द ग्लास सीलिंग’ अपने आलेख में प्रस्तुत करते हुए स्त्रियों की प्रगति में अदृश्य व पारदर्शक व्यवधान होने की बात को उजागर करते हुए यह कोर्पोरेशन में होनेवाले वाकये को खुलकर समझाते हुए ये नया नाम दिया था जिसे मीडिया तथा जनता ने तुरंत अपना लिया और आम भाषा में ' ग्लास सीलिंग ' मुहावरा या शब्द , स्त्री सशक्तिकरण के मुद्दों के साथ सदा के लिए जुड़ गया ।

फिर ग्लास सीलिंग मुहावरे के मशहूर हो जाने पर इस पर संशोधन भी हुए । संशोधनों के बाद यह भी पता चला है कि सन 1984 में 'एड्वीक' पत्रिका के एक आलेख में, गे ब्र्यायनट ने सबसे प्रथम ग्लास सीलिंग मुहावरे का प्रयोग किया था । अब तो खोज विस्तृत होने लगी और पता चला कि, 1979 में ह्यूलीट पेकार्ड कंपनी में कार्यरत केथरिन लाव्रेंस और मेरीएन श्र्च्रेइबेर नामक दो महिलाओं ने इसी मुहावरे को समझाते हुए कहा था कि, बाहरी तौर पर महिलाओं की प्रगति भले सुचारू रूप से चलती हुई दिखलाई दे परंतु इस प्रगति के अवरोध में अदृश्य, पारदर्शक अवरोध खड़े किये जाते हैं, जो महिला कर्मचारी के प्रगति, प्रमोशन और सर्वोच्च पद पर आसीन होने के मार्ग में बाधाएँ व रुकावट उत्पन्न करते हुए हर स्थान पर हर प्रगति के रास्तों पर अवरोध उत्पन्न करने के लिए रखे जाते हैं ।

ग्लास सीलिंग से और भी कई नाम उत्पन्न हुए हैं --

  1. बैमबू सीलिंग - एशियन-अमेरिकेन महिलाओं के सर्वोच्च स्थान ग्रहण करने में किये गये अवरोधों के लिए प्रयुक्त मुहावरा बन गया है जिसके तहत मैनेजर या एक्स्सीक्युट पोजीशन के लिए अकसर ये बहाना बनाया जाता है कि इनमें लीडर बनने की क्षमता नहीं है या यह भी मिथ्या कारण बतलाया जाता है कि, इनमे आपसी बातचीत माने अच्छे कम्यूनीकेशन के गुण नहीं हैं । भले ही एशियन कर्मचारी महिलाओं में अन्य सारे गुण मौजूद हों जो उन्हें टॉप पोजीशन पर ले जाने में सहायक हों - तब ये उदाहरण देते हुए बैमबू सीलिंग शब्द प्रयुक्त किया जाता है-
  2. ग्लास एलेवेटर - ( या ग्लास एस्कलेटर ) जब पुरुष कर्मचारियों को प्रगति के सोपान आसानी से पार करने में कोर्पोरेशन कल्चर में हर सुविधा और गति प्रदान कर सहायता मिलती देखी जाती है और मेनेजर की पोस्ट पर पुरुषों को बैठाल दिया जाता हो ख़ास तौर से उन कार्य क्षेत्रों में, जहाँ महिला कार्यकर्ताओं का वर्चस्व और बहुसंख्या में उपस्थित होना आम बात हो । उदाहरणार्थ- नर्सिंग ।
  3. ग्लास क्लिफ्फ़ - ऐसी जगह पर आपको पदासीन किया जाए जहाँ आपके उस क्षेत्र में असफल होने के चांस ज़्य़ादादा हैं और कार्य भार अत्यधिक और मुश्किल किस्म का हो ऐसी कंपनी की चाल को ग्लास क्लिफ्फ़ मुहावरे का नाम दिया जाता है ।
  4. सेल्यूलोईड सीलिंग - होलीवूड चलचित्र निर्माण की अमरीकी जग विख्यात संस्था में भी हर सर्वोच्च संस्था या कार्यक्षेत्र में आप पुरुषों को ही पदासीन देखते हैं इस सत्य को लोज़ेन नामक व्यक्ति ने सन 2002 में सेल्यूलोईड सीलिंग के नाम से प्रचलित करते हुए यह नाम दिया था ।

अमरीका में ऐसे एकल परिवारों की संख्या में वृद्धि हो रही है जहाँ परिवार का ' मुखिया' = माने हेड ऑफ़ द फ़ेमेली ' एक स्त्री पात्र है सन 1970 से ऐसे परिवारों की संख्या में निरंतर बढ़ावा हो रहा है और ऐसे परिवार अमरीका में बड़ी तादाद में हैं परंतु वे अकसर ग़रीबी की रेखा के नीचे रहते हैं -

ज़्य़ादादातर, ऐसे स्त्री मुखिया वाले एकल परिवार की महिलाएँ तलाकशुदा होतीं हैं या इनमें से कई बिन ब्याही माएँ हैं । सन` 2000 की जन गणना के आँकड़ों के अनुसार 11 प्रतिशत परिवार अमरीका में ग़रीबी की हालत में जी रहे हैं । जबकि 28 प्रतिशत एकल मुखिया स्त्री वाले परिवार ग़रीबी की हालत में जीने को बाध्य हैं । बिनब्याही माँ अकसर कच्ची या कम उम्र में माता बनी हैं । पढाई शिक्षा सिर्फ़ स्कूल तक सीमित होते ना उनके पास कोई डिग्री है ना कोइ ऐसा हुनर है जिस के तहत उन्हें अच्छा रोज़गार प्राप्त हो सके इस कारण ऐसी महिलाओं को नौकरी या पेशा भी ऐसा ही मिल पाता है जो उन्हें कम आय ही प्राप्त करवाता है । बच्चों की परवरिश के लिए भगौड़े पति या जिनके साथ उनका शारीरिक सम्बन्ध रहा वे व्यक्ति बच्चे की आवश्यकता पूर्ति के लिए पैसा नहीं देते या तो बहुत कम हिस्सा अपनी सीमित आय में से दे पाते हैं । बच्चे के लिए प्राप्य ऐसी धनराशि को चाईल्ड सपोर्ट कहते हैं । अमेरीका में

' तलाक' ही धन की समस्या या इकॉनोमिक दीवालियेपन का एक प्रमुख कारण है ।

आईये आगे हम ऐसी महिला का उदाहरण देखते चलें । जिन्होंने ना ही ग्लास या सीलिंग शीशे की छत को तोड़ दिया बल्कि शानदार तरीक़े से कोर्पोरेट जगत में अपनी साख भी ऊँची की है । सफलतम महिलाओं की ऐसी सूची में, प्रमुख नाम इन्द्रा नूयी का है ये इन्द्रा नूयी जी भारतीय मूल की महिला हैं और अन्तरराष्ट्रीय पेप्सीको कंपनी की सर्वोच्च पद पर आसीन हैं माने सीईओ हैं ।

यह बेहतरीन कार्य श्रीमती इन्द्रा नूयी जी ने ना सिर्फ़ भारत में किया बल्कि अंतर्राष्टीय स्तर पर कर दिखलाया है जो वाक़ई क़ाबिले तारीफ़ है । आज इन्द्रा नूयी, जिनका जन्म स्थान चेन्नई है अमरीकी कोर्पोरेट जगत में, शायद सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची के प्रमुख नामों में अपनी गिनती करवा सकतीं हैं । वे इतनी प्रसिध्ध व कामयाब हैं । सी ई ओ माने चीफ़ एक्ज्यूक्युटिव ऑफ़िसर । इस पद पर आने से पहले इन्द्रा नूयी चीफ़ फ़ायनेंसर ऑफ़िसर यानी - सीईओ थीं और पेप्सी को इनटरनॅशनल कंपनी में किये कई सारे बदलावों का फ़ैसला लेकर उन फ़ैसलों से कंपनी को सफलता के रास्ते पर आगे बढ़ने में इन्द्रा नूयी का हाथ था जिससे उन्हें कंपनी के सर्वोच्च पद पर आसीन करने का मार्ग प्रशस्त हुआ । उन्होंने कंपनी को मज़बूत किया और सफलता के एक के बाद मुकाम भी जीत कर आगे बढ़तीं गयीं तब उनकी यह सफलता अमरीकी कोर्पोरेट जगत के लिए कोइ आश्चर्य का विषय ना रहा -

मिसिज इन्द्रा नूयीइन्द्रा  नूयी

कार्य कुशलता : इन्द्रा नूयी ने $ 33 बीलीयन का व्यापार कर रही कंपनी पेप्सी को। में ठन्डे पेय के साथ साथ कई तरह के खाद्यान्न नाश्तों में प्रयोग किये जाने वाले तैयार खाने के पैकज फ़ूड को भी बेचना शुरू किया । इन्द्रा नूयी ने सी ई ओ का पदभार सम्हालने के साथ-साथ कई दर्जन व्यापार बढाने के नये नुस्ख़े आजमाए । जैसे युमी ब्रांड इंक । कई रेस्तरां पेप्सी पेय को तैयार कर भरने की काँच की शीशियाँ मशीन से तैयार करनेवाले बोत्लींग प्लांट ( पी.बी.जी) = पेप्सी बोट्लींग ग्रुप और क्वेकर ओट्ज़ तथा गेतोरेड जैसे पहले से जमे हुए व्यापारों को पेप्सी में मिलाकर पेप्सी को और ज़्य़ादा व्यापक विस्तार दिया है । ट्रोपीकाना तैयार ओरेंज जूस कंपनी को $ 3.3 बीलीयन डालर में ख़रीद कर पेप्सी में मिलाने से पेप्सी कंपनी को अमरीका का सबसे मनपसंद और अधिक बिकनेवाला ओरेंज जूस का व्यापार भी मिला - ये भी एक अत्यंत सफल प्रयास रहा । इन्द्रा नूयी भी आम महिलाओं की तरह सुशिक्षित परिवार से हैं परंतु इन्द्रा की अप्रत्याशित सफलता, उनकी कोर्पोरेट कल्चर में ऊँचे तक पहुँच पाने के कारण विश्व में प्रसिद्धि पा गयी !

मद्रास या चेन्नई शहर दक्षिण भारत में मद्रास क्रीस्चीयन कोलेज से इन्द्रा नूयी ने बेचलर डीग्री हासिल करने के बाद, आईआईटी से मास्टर डिग्री बिजनेस ऐडमिनीस्ट्रेशन में प्राप्त की थी।

23 कर्ष की उम्र में, वे अमरीका पहुँचीं सुप्रसिध्ध येल विश्वविद्यालय से , पब्लिक और प्राइवेट मेनेजमेंट में मास्टर की डीग्री हासिल की और बोस्टन कंसलटिंग कंपनी में काम शुरू किया बाद में, मोटोरोला कंपनी में कार्य किया जहाँ इन्द्रा नूयी ,

व्यवस्था संस्थापक व प्रणाली निर्देशिका = डाईरेक्टर ऑफ़ स्ट्रेटेजी और प्लानिंग के पद पर थीं ।

सन 1994 में इन्द्रा नूयी ने पेप्सी को कंपनी में कार्यभार सम्भाला । इन्द्रा नूयी , भारत को प्रगति के पथ पर देख कर प्रसन्नता अनुभव करतीं हैं और उनकी बागडोर सम्हाली कंपनी " पेप्सी को " के लिए भी , आनेवाले समय में, भारत में विस्तृत व्यापारी सफलता का अनुमान करतीं हैं और आगामी वर्षों में $ 300 मिलियन या $ 500 मिलियन तक कि धनराशि इस व्यापार में जोड़ने की, संभावित - भावि योजना है जिसमे, 60 % प्रतिशत पेय व्यापार और 40 % नाश्तों में पैकज फ़ूड में किया जाएगा पंजाब प्रांत के साथ 15 वर्ष पूर्व $ 700 मिलियन से व्यापार शुरू किया गया था और वह भी और ज़्य़ादा बढ़ने की सभावना है ।

भारत में शिक्षा प्राप्त भारत में पली इन्द्रा नूयी आज पेप्सी पेय में कीट नाशक दवाईयों के अंश पाए जाने पर भारत में जो क्रोध और पेप्सी कंपनी के विरोध में रोष है उसे इन्द्रा पेप्सी की कर्णधार होने से किस तरह निपटेंगी। ये भी भविष्य ही बतलायेगा । इन्द्रा नूयी ने स्वीकार किया है कि, भारत में पेप्सी कंपनी को, व्यापार करने में, बहुत कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है । उनका कहना है कि, पेप्सी कंपनी को चीन में इतनी मुशिकलें नहीं आयीं ।

अब कुछ नये क़ानून भारत सरकार द्वारा - खाद्य पदार्थों के लिए भी रचे गये हैं और इन्द्रा नूयी ने इन क़ायदों का स्वागत किया है उनका कहना है कि, ऐसे क़ानून ना बिकनेवाले सिर्फ़ पेय पदार्थों के लिए लागू किये जाने चाहियें बलके हर प्रकार की खाद्य सामग्री में क्या क्या डाला गया है । वह स्पष्ट किया जाना चाहिये और हर पैकेज्ड फ़ूड पर भी । इसी तरह के कड़े क़ानून लागू किये जाने ज़रूरी हैं --

इन्द्रा नूयी का कहना है कि पेप्सी कंपनी भरसक प्रयास करती है कि सारे पदार्थ स्वच्छ और खाने लायक और पीने लायक हों ! फिर भी कीटनाशक दवाई के कण पेप्सी की शीशी में पाए गये जिनका उन्हें बहुत ज़्य़ादा दुःख व खेद है ।

चलिए, इन्द्रा नूयी आगे क्या करतीं हैं । उसकी पड़ताल मीडिया भी अवश्य करती रहेगी और आम जनता को अवगत भी करवाती रहेगी उस पर हमे पूरा यक़ीन है ।

अब हम भारत में सफलता के नये मापदंड स्थापित करनेवाली एक महिला से मिलें जिन्होंने कोर्पोरेट कल्चर में ‘शीशे की छत या ग्लास सीलिंग’को तोड़ दिखलाया है ।

चन्दा कोचरचंदा कोचर

मिलिए, अब चन्दा कोचर से !

चंदा कोचर - आईसीआई बैंक की वरिष्ठ अधिकारी हैं । यह पद उन्होंने बस कुछेक साल पहले ही सम्हाला है । अत: पिछले 14 महीने चन्दा कोचर के लिए मानों कड़ी परीक्षा के रहे हैं । परतु उन्होंने अपना लोहा मनवा लिया है साथ-साथ कंपनी के सर्वोच्च पद पर आसीन होकर कार्य क्षमता का सफल उदाहरण भी उपस्थित किया है ।

ICIE आई सी आई सी बैंक के अधिकार में , उनकी अन्य शाखाओं में भी चन्दा कोचर के निर्णायक संशोधनों का प्रभाव पडा है ।

आम लोगों के ख़रीद करने की आदत को बैंक किस तरह सूहुलियत देती है उसकी प्रणाली से जुड़े मुद्दों से चन्दा कोचर ने बैंक के कार्य में मानो हर दिशा में क्रान्ति लाकर खडी कर दी है । बैंक खातों से सम्बंधित लोगों को कई क्षेत्रों में ऋण देने से बैंक का व्यापार और मुनाफ़ा कई गुना बढ़ा है । इससे 60 प्रतिशत क्रेडिट कार्ड द्वारा प्रचारित व्यापार में भी वृध्धि हुई है । आज विश्व में व्यापार विनिमय क्षेत्रों में मंदी की हवा बह रही है जिसका असर बैन्किंग के क्षेत्र पर भी हुआ है । ऐसी अनिश्चितता से भरे वातावरण में चन्दा कोचर ने बैन्किंग को सुरक्षित क्षेत्र में स्थायी करने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है । आई सी आई बैंक की बागडोर सम्हालने के बाद चंदा कोचर ने 5 वर्षीय योजना रेखांकित की और उसी के अनुरूप कार्य प्रणाली को भी लागू किया है और अगर विश्व में पुन: तेज़ी का वातावरण आता है तब चंदा कोचर के नेतृत्व में उनका बैंक सफलता की हवाओं के सहारे अवश्य नये कीर्तिमान स्थापित करेगा इस बात में कोई संशय नहीं होना चाहिए


-- लावण्या

Sunday, August 22, 2010

अमर युगल पात्र : प्रस्तुत है ......... ऋषि वसिष्‍ठव ऋषि पत्नी देवी अरूंधती की उज्जवल जीवन गाथा


" अमर युगल पात्र " भारत के दम्पतियों पर आधारित श्रृंखला है
कुछ पूर्व परिचित या सर्वथा नवीन ,
स्त्री व पुरुष - द्वय के जीवन से
आप परिचित होंगें --
उत्तर अमरीका से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका " विश्वा में ,
" अमर युगल पात्र "श्रृंखला
" स्थायी स्तम्भ के अंतर्गत

आज " लावण्यम - अंतर्मन " ब्लॉग पर मिलिए प्रथम युगल
" गुरु वशिष्ठ व अरूंधती देवी के यशस्वी जीवन कर्म से : ~~
प्रस्तुत है .........

http://www.evishwa.com/


अमर युगल पात्र :
वसिष्‍ठ-अरुंधती
श्रीमती लावण्य शाह
सिनसिनाटी, ओहायो, अमेरिका
श्रीमती लावण्या शाह प्रसिद्ध कवि
और गीतकार
पं. नरेन्द्र शर्मा की पुत्री है।
आप मुंबई में पली व बढी।
पिछले १५ वर्षों से अधिक से
लावण्या जी अपने परिवार के साथ सिन्सिनाटी, ओहायो में रहती हैं। लावण्या जी का प्रथम काव्य संग्रह ``फिर गा उठा प्रवासी'' हाल ही में प्रकाशित हुआ है।
वसिष्‍ठ ऋषि ब्राह्मण वंश के मूलपुरुष कहलाते हैं। सप्‍तर्षियों में इनका तथा उनकी पत्‍नी अरुंधती का नाम है। अरुंधती ने अपने नाम की व्‍याख्‍या इस प्रकार की है—‘‘यह अपने पति वसिष्‍ठ को छोड़कर अन्‍य कहीं भी नहीं रहतीं तथा कभी अपने पति का विरोध नहीं करती।’’
वसिष्‍ठ स्‍वायंभुव मन्‍वंतर में उत्‍पन्‍न हुए ब्रह्मा के दस मानसपुत्रों में से एक हैं। कहते हैं कि वसिष्‍ठ का जन्‍म ब्रह्माजी के प्राणवायु (समान) से हुआ था। ‌वसिष्‍ठ ऋषि का ब्राह्मण वंश सदियों तक अयोध्‍या के सूर्यवंशी राजाओं का पुरोहित पद सँभाले रहा। इनकी दो प‌‌त्नियाँ बताई गई हैं। एक तो दक्ष प्रजापति की कन्‍या ‘उर्जा’ और दूसरी ‘अरुंधती’। अरुंधती कर्दम प्रजापति की नौ कन्‍याओं में से आठवीं गिनी जाती हैं। दक्ष प्रजापति की कन्‍या ‘सती’ से शिव ब्‍याहे थे। इस नाते से वसिष्‍ठ शिव के साढ़ू हुए। दक्ष प्रजापति के यज्ञ के ध्‍वंस के समय शिव ने वसिष्‍ठ का वध किया था। अरुंधती के अलावा ‘शतरूपा’ भी वसिष्‍ठ की पत्‍नी मानी गई हैं। (वे अयोनिसंभवा थीं।)

वसिष्‍ठ-अरुंधती का नाम सदा आदर से लिया जाता है। अरुंधती पतिव्रता सन्‍नारियों में उज्‍ज्‍वल स्‍थान प्राप्‍त किए हुए हैं। सप्‍तर्षि तारामंडल में अन्‍य ऋषियों के साथ अरुंधती को एकमात्र स्‍त्री और पत्‍नी, जो पति के सदैव साथ रहती हैं, होने का गौरव प्राप्‍त है। पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिकों ने ध्रुव से कुछ नीचे, उत्तर दिशा को प्रज्‍वलित करते हुए इस तारामंडल का नाम The Great Bear रखा है और सर्वोच्‍च स्‍थान पर स्‍थित ‘ध्रुव तारे’ को ‘पोलार बेर’ कहा जाता है। पुराणों में वर्णित है कि वसिष्‍ठ पत्‍नी ‘शतरूपा’ के ‘वीर’ नामक पुत्र को कर्दम प्रजापति की पुत्री ‘काम्‍या’ से विवाह होने के पश्‍चात् ‘प्रियव्रत’ तथा उत्तानपाद दो पुत्र हुए। उत्तानपाद को अत्रि ऋषि ने गोद लिया और उन्‍हीं के ‘ध्रुव’ नामक पुत्र हुआ।
अरुंधती कर्दम प्रजापति तथा माता देवहूति की कन्‍या थीं। कश्‍यप की कन्‍या अरुंधती का उल्‍लेख वायु पुराण, लिंग पुराण, कूर्म पुराण वगैरह में प्राप्‍त है। उनका विवाह वसिष्‍ठ से हुआ यह ज्ञात होता है। वसिष्‍ठ की प्राप्‍ति के लिए देवी अरुंधती ने सीता तथा रुक्‍मिणी की भाँति ‘गौरी-व्रत’ पूजन किया था। इसी कारण इन्‍हें विवाह सुख प्राप्‍त हुआ।

अरुंधती अत्‍यंत तपस्‍विनी तथा पति-सेवापरायण थीं। ऋषियों के पूछने पर उन्‍होंने सविस्‍तार धर्म-रहस्‍य, श्रद्धा, आतिथ्‍य-सत्‍कार, गौ सेवा, ग्राहस्‍थ्‍य धर्म तथा गोशृंग स्‍नान माहात्‍म्‍य की चर्चा की थी।
अग्‍निदेव की पत्‍नी ‘स्‍वाहा’ को एक बार अपने पतिदेव को रिझाने की इच्‍छा हुई। अग्‍नि ने कहा कि ‘मैं सप्‍तर्षियों की पत्‍नियों से बहुत प्रभावित हूँ। जब-जब ऋषिगण यज्ञ करते हैं तब मैं उनकी पवित्रता तथा धर्म की आभा देखता ही रहता हूँ।’ तब स्‍वाहा ने पति अग्‍नि देव को प्रसन्‍न करने की चेष्‍टा से छह ऋषियों की पत्‍नी का रूप धरा। हर बार वे अग्‍निदेव को लुभाने में तथा भ्रमित करने में सफल हुईं। अंतिम बार वे वसिष्‍ठ पत्‍नी अरुंधती का रूप धरने लगीं। जब-जब उन्‍होंने कोशिश की तब-तब उन्‍हें असफल ही होना पड़ा। अरुंधती देवी सी पतिव्रता के तेज के आगे छल-कपट व मायावी शक्‍तियाँ व्‍यर्थ हो गईं। तब संपूर्ण विश्‍व ने जाना की अरुंधती धर्म में कितनी अटल थीं।

एक बार सप्‍तर्षिगण बदरपाचनतीर्थ हिमालय में फल-मूल लाने गए थे। तब बारह वर्षों तक वर्षा बंद हो गई थी। अतः सप्‍तर्षि हिमालय पर ही रुक गए। शंकर भगवान अरुंधती की परीक्षा लेने हेतु दरिद्र ब्राह्मण का रूप धरकर वसिष्‍ठ के आश्रम पर पधारे। अरुंधती के पास कुछ न था। सो उन्‍होंने (लोहे के) बेर शंकर को दिए। शंकर ने कहा, ‘‘देवी, मैं निर्धन हूँ। कहाँ पकाता फिरूँगा? आप ही पका दीजिए।’’ अरुंधती ने अग्‍नि पर बेरों को पकने रखा और समय व्‍यतीत होवे, इस आशय से अनेक धर्म, ज्ञान के विषयों पर ब्राह्मण से चर्चा आरंभ की। चर्चा में लीन अरुंधती को पता भी न चला कि बारह वर्ष व्‍यतीत हो गए। सप्‍तर्षिगण फल-मूल लेकर लौटे। तब भगवान शंकर अपने असली स्‍वरूप में प्रगट हुए, उन्‍होंने अरुंधती की कड़ी तपस्‍या की भूरि-भूरि प्रशंसा की। और तभी से वह आश्रम पवित्र तीर्थस्‍थल बन गया।

अरुंधती और वसिष्‍ठ के पुत्र का नाम ‘शक्‍ति’ था। अन्‍य अरुंधती नामक कन्‍या ‘मेधातिथि’ मुनि की कन्‍या थी। वे ब्रह्मदेव की संध्‍या नामक मानस कन्‍या थी। चंद्रभागा नदी किनारे मेघातिथि मुनि के यज्ञकुंड से वह कन्‍यारूप में प्रगट हुईं। वे जब पाँच वर्ष की थीं ब्रह्मा ने उन्‍हें आकाश में विमान में बैठकर जा रहे थे तब देखा। उन्‍होंने मेधातिथि को आदेश दिया कि इसे साध्‍वी स्त्रियों के संपर्क में रखा जाए। तब मुनि मेधातिथि सावित्री देवी के पास गए तथा हाथ जोड़कर कहा कि–‘‘माँ, मेरी इस पुत्री को उत्तम शिक्षा दीजिए।’’ सावित्री देवी ने सहर्ष अरुंधती का स्‍वागत किया और सात वर्ष बीत गए।

अरुंधती अब बारह वर्ष की हुई। महासती बेहुला तथा सावित्री देवी के संग वे एक बार मानस पर्वत के उद्यान में गईं। वहीं अरुंधती ने तपस्‍या करते हुए वसिष्‍ठ ऋषि को देखा। दृष्‍टि मिलन होते ही दोनों एक-दूसरे पर आकर्षित हुए। जब सावित्री देवी को ज्ञात हुआ तब उन्‍होंने वसिष्‍ठ-अरुंधती का ब्‍याह रचाया। इस तरह जितने भी उदाहरण हैं पुराणों में, वहाँ वसिष्‍ठ और ‘अरुंधती’ पति-पत्‍नी के रूप में हम देखते हैं।
वसिष्‍ठ ऋषि की विश्‍वामित्र ऋषि के साथ दुश्‍मनी थी। वह ज्‍यादातर विश्‍वामित्र के अहंकार व क्रोध के ही कारण थी। वसिष्‍ठ ब्रह्मर्षि थे। उन्‍होंने इंद्रियों को जीत लिया था।

काम, क्रोध, मद, मोह, बंधन सभी से वे परे हो गए थे। विश्‍वामित्र ने ‘नंदिनी’ नामक कामधेनु का वसिष्‍ठ आश्रम से हठपूर्वक अपहरण करना चाहा। किंतु वे असफल रहे। विश्‍वामित्र ऋषि गायत्री मंत्र सिद्ध कर पाए परंतु अपने दर्प को न जीत पाए। वसिष्‍ठ की शांति व संयम को भंग करने के लिए तब उन्‍होंने वसिष्‍ठ-पुत्र ‘शक्‍ति’ की हत्‍या कर दी। माता अरुंधती पुत्र-वियोग में रो पड़ी। परंतु धीर-संयमी जितेंद्रिय वसिष्‍ठ ने अँधेरी रात्रि में अरुंधती को ढाढ़स बँधाया।

वसिष्‍ठ ने कहा,
‘‘हे माता! मैं तुम्‍हारे शोक को समझ पाता हूँ। तुम्‍हारे अश्रु को छू सकता हूँ।
तुम्‍हारी ‘मनोवेदना’ को अनुभव कर पाता हूँ।
परंतु इस क्षण मेरा मन विश्‍वामित्र के लिए रो रहा है। मुझे उस पर दया आ रही है।’’


तब अरुंधती ने रुँधे कंठ से पूछा,
‘‘क्‍यों नाथ? आपको विश्‍वामित्र के प्रति इस भयानक क्षण में क्‍यों सहानुभूति हो रही है?’’
वसिष्‍ठ ने उत्तर दिया,

‘‘मुझ पर क्रोध करके विश्‍वामित्र अपने तप की, बल की, वीर्य की, अपने मन की शांति का नाश कर रहे हैं। शक्‍ति हमारा पुत्र था। उसका वध करके विश्‍वामित्र को कुछ प्राप्‍त न हुआ।
मुझे दुःख है कि गायत्री मंत्र का द्रष्‍टा, गंभीर तपस्‍वी पता नहीं क्‍यों मुझ पर अपना वर्चस्‍व स्‍थापित करना चाहता है। वह जीते अपने आपको। कुमार्ग पर चलनेवाले ज्ञानी व तपस्‍वी के प्रति दयाभाव से मैं विगलित हो रहा हूँ।
काश! परम कृपालु परमात्‍मा उन्‍हें सन्‍मति दें और सच्‍ची राह सुझा दे।’’


वसिष्‍ठ का मन से निकला आशीर्वाद सुनकर विश्‍वामित्र (जो छुपकर सारी बातें सुन रहे थे)
ब्रह्मर्षि के चरणों में गिर पड़े। वे फूट-फूटकर रोने लगे।

वसिष्‍ठ ने बड़ी कोमलता से उन्‍हें उठाया। बड़ी स्‍निग्‍धता व सौजन्‍य से बिठाया। प्रेमपूरित हाथों से अश्रु पोंछे। माता अरुंधती ने पुत्र के हत्‍यारे का अतिथि-सत्‍कार किया। उसी क्षण से विश्‍वामित्र तपस्‍या की उच्‍चतम श्रेणी में प्रविष्‍ट हुए।

वर्तमान वैवस्‍वत मन्‍वंतर के मैत्रावरुणी वसिष्‍ठ व अरुंधती के अन्‍य पुत्र हैं–पराशर, कृष्‍ण द्वैपायन, शुक्र भूरिश्रवस, प्रभुशंभु और कृष्‍ण गौर। शक्‍ति, सुद्यम्‍नु, कुंडिन, वृहस्‍पति, भरद्वसु, भरद्वाज।
वसिष्‍ठ अयोध्‍या के राजा दशरथ के राजपुरोहित के रूप में बड़े प्रसिद्ध हुए। वे एक नीति विशारद मंत्री, पुरोधा तो थे ही–सर्वश्रेष्‍ठ ब्रह्मज्ञानी, तपस्‍वियों में श्रेष्‍ठ, क्षमाशील, अत्‍यधिक शांतिप्रिय व सहिष्‍णु थे। पुत्रकामेष्‍टि यज्ञ के समय वही दशरथ यज्ञ के ऋत्‍विज बने।

‘राम’ नामकरण भी इन्‍होंने किया। युवराज पदाभिषेक इन्‍हीं ने किया। ‘योगवसिष्‍ठ’ नामक ग्रंथ इन्‍होंने ही भारत को दिया है। धर्मशास्‍त्रकार वसिष्‍ठ रचित ‘वसिष्‍ठस्‍मृति’ नामक स्‍मृति ग्रंथ है। इसमें आचार, संस्‍कार, प्रायश्‍चित्त, रजस्‍वला, संन्‍यासी, आत‌तायी आदि के लिए नियम दिए गए हैं। ‘मनुस्‍मृति’ तथा ‘याज्ञवल्‍क्‍य स्‍मृति’ में भी इसका उल्‍लेख है। अन्‍य ग्रंथ– वसिष्‍ठ-कल्‍प, वसिष्‍ठ-तंत्र, वसिष्‍ठ-पुराण वसिष्‍ठ-शिक्षा, वसिष्‍ठ-संहिता, वसिष्‍ठ-श्रद्धाकल्‍प इत्‍यादि हैं।


वसिष्‍ठ ऋषि का आश्रम विपाशा नदी के किनारे ‘वसिष्‍ठशिला’ नाम से था। एक अन्‍य स्‍थान ‘कृष्‍ण शिला’ उनकी तपस्‍या भूमि थी। इसी कड़ी तपस्‍या के कारण उन्‍हें समस्‍त पृथ्‍वी का पुरोहित पद मिला।
ऋग्‍वेद में वसिष्‍ठ को मैत्रावरुण व उर्वशी अप्‍सरा का पुत्र कहा गया है। इस नाते हम कह सकते हैं कि वसिष्‍ठ वंश अति प्राचीन वंशों में गिना जा सकता है। ऋग्‍वेद के अनुसार वसिष्‍ठ का पुत्र शक्‍ति था तथा पौत्र का नाम ‘पाराशर’ शाक्‍त्‍य था। पाराशर के पुत्र हुए श्री कृष्‍ण द्वैपायन व्‍यास, जिन्‍होंने महाभारत ग्रंथ की रचना की।

वसिष्‍ठ सुवर्चस सँवरण राजा के पुरोहित थे। अतः वसिष्‍ठ नाम के कई ऋषिगण हैं तथा उनके वंश में अनेक महान् व्‍यक्‍ति आते हैं। उनमें से प्रमुख हैं :
1. वसिष्‍ठ देवराज—अयोध्‍या के त्रय्यरुण, त्रिशंकु एवं हरिश्‍चंद्र के काल में।
2. वसिष्‍ठ आपव—हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन के समकक्ष।
3. वसिष्‍ठ अथर्वनिधि—अयोध्‍या के बाहुराजा का समकालीन।
4. वसिष्‍ठ श्रेष्‍ठभाज—अयोध्‍या के मित्रसह कल्‍माषपाद सौदाह राजा के काल के।
5. वसिष्‍ठ अथर्वनिधि (द्वितीय)—अयोध्‍या के दिलीप खट्वांग के समकालीन।
6. वसिष्‍ठ दाशरथि—दशरथ व राम के अयोध्‍या के राजपुरोहित।
7. वसिष्‍ठ मैत्रावरुण—उत्तर पांचाल के पैजवन सुदास राजा के काल के।
8. वसिष्‍ठ शक्‍ति—वसिष्‍ठ मैत्रावरुण का पुत्र (वसिष्‍ठ शक्‍ति)।
9. वसिष्‍ठ सुवर्चस्—हस्‍तिनापुर के संवरण राजा के समकालीन।
10. वसिष्‍ठ—अयोध्‍या के मुचकुंद राजा का समकालीन।
11. वसिष्‍ठ—हस्‍तिनापुर के ‘हस्‍तिन्’ राजा के समकालीन।
12. वसिष्‍ठ धर्मशास्‍त्रकार—वसिष्‍ठस्‍मृति के रचियता।

सप्‍तर्षियों में स्‍थान प्राप्‍त किए हुए, आकाश में स्‍थित, पवित्र तारामंडल में अपना अडिग पद सँभाले हुए, अमर युगल पात्र ‘वसिष्‍ठ-अरुंधती’ को भारतवर्ष प्रणाम करता है।

कहते हैं, जब भी तपस्‍या सफल होने की सीमा में प्रवेश करती है

तब ईश्‍वर के आशीर्वाद की बधाई देते हुए प्रथम सप्‍तर्षियों का आगमन व दर्शन होता है।

रामचंद्र के गुरु वसिष्‍ठ व गुरुपत्‍नी अरुंधती को हम

पवित्रता से अंजलि बाँधे नमन करते हैं और विदा लेते हैं।

सप्‍तर्षि
1. अंगिरस् भृगु
2. अ‌त्रि
3. क्रतु
4. पुलत्‍स्‍य
5. पुलह
6. मरीचि
7. वसिष्‍ठ

खगोल शास्त्र में

इस सप्तर्षि तारा मंडल को " बीग डीपर " कहते हैं -
और स्वच्छ आकाश में ,सप्तर्षि , उरसा मेजर
निहारिका में , साफ़ दीखलाई पड़ते हैं

File:Ursa Major constellation detail map.PNG

Sunday, August 1, 2010

मृण्मय तन, कंचन सा मन

आदरणीया देवी नागरानी जी के संग भोजन कक्ष में , मैं
न्यू योर्क में आयोजित किये गये विश्व हिन्दी सम्मलेन में -
देवी जी बेहतरीन ग़ज़ल लिखतीं हैं पर उससे भी अच्छी
बात ये के बहुत भली व मिलनसार , गुणी महिला हैं
प्रकाशन :रविवार, 1 अगस्त 2010 |

मृण्मय तन, कंचन सा मन

लावण्या दीपक शाह


इंसान अपनी जड़ों से जुडा रहता है । दरख्तों की तरह। कभी पुश्तैनी घरौंदे उजाड़ दिए जाते हैं तो कभी ज़िंदगी के कारवाँ में चलते हुए पुरानी बस्ती को छोड़ लोग नये ठिकाने तलाशते हुए, आगे बढ़ लेते हैं नतीज़न , कोई दूसरा ठिकाना आबाद होता है और नई माटी में फिर कोई अंकुर धरती की पनाह में पनपने लगता है ।

यह सृष्टि का क्रम है और ये अबाध गति से चलता आ रहा है। बंजारे आज भी इसी तरह जीते हैं पर सभ्य मनुष्य स्थायी होने की क़शमक़श में अपनी तमाम ज़िंदगी गुज़ार देते हैं । कुछ सफल होते हैं कुछ असफल !

हम अकसर देखते हैं कि इंसानी कौम का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने पुराने ठिकानों को छोड़ कर कहीं दूर बस गया है । शायद आपके पुरखे भी किसी दूर के प्रांत से चलकर कहीं और आबाद हुए होंगें और यह सिलसिला, पीढी दर पीढी कहानी में नये सोपान जोड़ता चला आ रहा है । चला जा रहा है । फिर, हम ये पूछें - अपने आप से कि हर मुल्क, हर कौम, या हर इंसान किस ज़मीन के टुकड़े को अपना कहे ? क्या जहाँ हमने जनम लिया वही हमारा घर, हमारा मुल्क, हमारा प्रांत या हमारा देश, सदा सदा के लिए हमारा स्थायी ठिकाना कहलायेगा ?

उन लोगों का क्या, जिनके मुकद्दर में देस परदेस बन जाता है और अपनी मिटटी से दूर, वतन से दूर,अपनी भाषा और संस्कृति से दूर कहीं परदेस में जाकर उन्हें अपना घर, बसाना पड़ता है ?

स्थानान्तरण के कई कारण होते हैं । आर्थिक, पारिवारिक , मानसिक या कुछ और ये सारे संजोग बनते हैं। कोई व्यक्ति, कोई क्षण, निमित्त बन जाता है जब इंसान एक जगह से दूसरे की ओर चल देता है और जीवन नए सिरे से आरम्भ करता है । ऐसा सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं हुआ है । यह क़िस्सा कईयों के साथ हुआ है और आगे भी होता रहेगा । तब हम सोचें कि सबसे पहले भारत में रहनेवाले, भारत को अपना कहनेवाले, विशुध्ध भारतीय कौन थे ? वे आर्य थे या द्रविड़ थे ?

हम ये भी सोचें कि आज के महाराष्ट्र प्रांत में बसे मराठी भाषी ही क्या महाराष्ट्र की मधुरम धरा के एकमात्र दावेदार हैं ? क्या किसी अन्य प्रांत से आये मेहनतक़श इंसानों का कोई हक़ नहीं महाराष्ट्र में बसने का ? यहाँ काम करने का ? या आजीविका प्राप्त करने का ? सोचिये, राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी दादा बाळ ठाकरे व उनके अनुयायी गण, बिहार प्रांत से महाराष्ट्र आये, बिहारी प्रजा के लोगों से क्यों इतना बैर रखते हैं ?

भारत भूमि के नागरिक, बिहारी भाई मुम्बई की जगमगाहट व कामधंधे की बहुलता की आकर्षक बातों को सुनकर मुम्बई नगरी में अपनी क़िस्मत आजमाने के लिए, खींचे चले आये हैं । क्या उन्हें कोई हक़ नहीं मुम्बई में अपना ठौर ठिकाना ढूँढने का ?

समाचार पत्रों में, दूरदर्शन के फलक पर व मीड़िया में हम अक्सर देखते हैं - हिंसा, आगजनी, मारपीट और हाथापाई के भयानक दृश्य सताये गये भारतीय, एक प्रांत के दूजे प्रांत के गुस्साये लोगों से प्रताड़ित होते बेबस बिहारी और उन पर हाथ उठाते, वार करते मराठी माणूस के बीच घटित हुए द्रश्य देख देख कर मन में विषाद और कडुवाहट घुल जाती है ।

हाय रे इंसान ! मिटटी का तन, सोने सा मन लिए इंसान
क्यों कर इस दुर्गत में स्वारथ-रत है ?
यह क्या बर्ताव है एक मनुष्य का दूसरे के संग ?
हम इंसान इतने छोटे दिल के क्यों हैं ?

यह बात साफ़ हो जाती है जब हम ऐसे दृश्य देखते हैं कि इंसानियत मर चुकी है । पशुता जीत गयी है । इंसान की जंग में, एकमात्र दुर्गुणों की विजय हुई है। बदचलनी और मक्कारी की जय हुई है ! जय हो ! जय हो !!

ऐसे कैसे हो गये हैं हम लोग जो अपनी सीमा में किसी आगंतुक के लिए कोई भी जगह नहीं दे पाते ? हर इंसान के भीतर महाभारत' का दुर्योधन नायक बना हुआ है जो वनवासी पांडवों को सूई की नोक पर टिक जाए उतनी सी भी जगह देने से साफ़ इनकार कर देता है ! ध्रृतराष्ट्र के नयन ऐसा अनाचार देखते ही नहीं ! हमारे मन में कहीं छिपे भीष्म पितामह सा विवेक गर्दन नीचे लटकाए मौन श्वेत वस्त्रों से अपना मुख ढाँप कर विवश रेशमी गाव-तकिये का सहारा लिए । मौन है तो आचार्य द्रोण सा साहस, मूक होकर परिस्थिति से विवश होकर संधि प्रस्ताव की आस में, अश्वत्थामा से लोभ के पुत्र मोह में निमग्न है !

जिस तरह एक ट्रेन के डिब्बे में पहले से सवार यात्री नये आनेवाले यात्री को स्थान नहीं देते - फिर वह नव आगंतुक येन केन प्रकारेण, अगर अपनी जगह मुक़र्रर करने में कामयाब हो गया तब वह भी पहले से सवार यात्रियों की टोली का सभ्य बन जाता है । और फिर उसके बाद आनेवालों से वही इंसान ऐसे पेश आता है कि नये आनेवालों को वह भी जगह नहीं देता।

यह पशुता का भाव, अक्सर जंगल में शेर बाघ जैसे हिंस्र पशु भी करते हैं । शेर और बाघ अपनी सीमा रेखा के भीतर दूसरे शेर या बाघों को घुसने नहीं देते और हमला कर के नवागंतुक को खदेड़ देते हैं । हम भी प्राणी जगत के अंश हैं उन्हीं की तरह हमारे भी नियम क़ानून और मनोवृतियाँ हैं । जिस के कारण समाज में रहते हुए हम अक्सर अपनी समा अपनी कौम, अपने मुल्क से लगाव रखते हुए अपने स्वार्थों को अक्षुण्ण रखते हैं।

भारतीय वांग्मय ने "वसुधैव कुटुम्बकम`" का उद्घोष सदियों पूर्व अवश्य किया था परंतु दैनिक व्यवहार और पुस्तकिया ज्ञान में सदा फ़र्क रहा है । ऐसे बुद्ध-प्रबुद्ध करोड़ों में बिरले ही हुए ! कोई परम योगी सा ही संसार के इस लोभ, मद, मोह, मत्सर के जाल से विरक्त हो पाया है -- अन्यथा हम मनुष्य स्वार्थरत ही रहे ।

हम भारतीय परदेस जाकर लाखों की संख्या में आबाद हुए हैं । विश्व के हर कोने में आपको कहीं ना कहीं एकाध भारतीय अवश्य ही मिल ही जाएगा । गिरमीटिया मज़दूर होकर भारत से यात्री सूरीनाम, मारीशस, बाली द्वीप, जावा, सुमात्रा, वेस्ट इंडीज़, फिजी जैसे कई मुल्क़ों में अपना 'मृण्मय तन, कंचन सा मन' लिए पहुँचे थे । कई भारतीय ओस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इंग्लैण्ड, रशिया, अमरीका, यूरोपीय देशों में भी गये । विश्व के हर कोने में जा-जा कर भारतीय मूल के लोग बसे हैं और उन्हें अप्रवासी भारतीय कहा गया । आज ऐसी स्थिति है कि उत्तर अमरीका के न्यूजर्सी प्रांत के एडीसन शहर में वहाँ रहनेवाले इटालियन, जर्मन, डच या फ्रांसीसी या अँगरेज़ या कहें कि, यूरोपीय मूल के लोगों की बनिस्बत भारतीय प्रजा की बहुलता हो गयी है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी !

उत्तर अमरीका से प्रकाशित टाइम नामक पत्रिका (मैग्ज़ीन ) सुप्रसिद्ध है और विश्व स्तर पर बिकती है । उसकी पाठक संख्या भी करोड़ों की तादाद में है । उसी के एक पत्रकार जोईल स्टाइन ने, जो मूल इटालियन या इतालवी है; अपने एक आलेख में बदले हुए एडीसन शहर और वहाँ बढ़ती हुई भारतीय साग सब्जी की मंडी, रेस्तोरां, मंदिर, गुरूद्वारे, भारतीय परिधान व आभूषण बेचतीं दुकानों और वहाँ निर्विघ्न घुमते सैलानियों को देखकर दुःख और नोस्तेल्जीया प्रकट किया है - नोस्तेल्जीया माने ,परापूर्व स्थिति के प्रति अदम्य आकर्षण व उसे पुनः स्थापित करने की ललक !

देखें यह कड़ी:

देखें यह कड़ी लिंक : http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,1999416,00.html

यहाँ चित्र में, भारतीय लिपि से अँगरेज़ी अक्षरों में लिखा है - "वेलकम टू एडिसन न्यू जर्सी " ।

पूरे आलेख में भारतीयों के बढ़ते हुए प्रभाव से त्रस्त व आक्रांत होकर कुछ परेशान, कुछ झुंझलाकर क्लांत भाव है । यहाँ लिखा गया है और भारतीय प्रजा के आने से पहले जो व्याप्त था ऐसे इतालवी कल्चर की प्रभुता के दिनों की याद और फिर उन पुराने दिनों के लौट आने की कामना, माने इटालियन या यूरोपीयन कल्चर के प्रति भरपूर नोस्तेल्जीया की भावना इस लेख में साफ़ झलकती है । पत्रकार महोदय का नाम है जोईल स्टाइन ।

(आप भी ऊपर दी हुई लिंक पर जाकर, क्लिक कर , जोईल स्टाइन के आलेख को अवश्य पढ़ें)

अब भारतीय मीडिया भी कहाँ चुप रहनेवाला था ! आजकल के ग्लोबल गाँव में कोई समाचार छिपा नहीं रह पाता । वर्ल्ड वाईड वेब से जुड़े संसार में, ख़बर आनन-फानन में फ़ैल गयी । ख़बर पहुँच गयी भारत में और पूरे विश्व में । भारत से प्रकाशित हिन्दू समाचार पत्र ने इस आलेख की भर्त्सना करते हुए अपने जवाबी आलेख जवाबी में लिखा - अजी यही तो होना था ना अब मीडिया ग्लोबल जो हो गया । टाइम मेगेज़ीन ने जोईल स्टाइन के आलेख के कहा कि भारतीय प्रजा के मन को दुखी करने वाले आलेख के लिए हम माफ़ी चाहते हैं । यहाँ प्रश्न उभारा गया कि क्या भारतीय मूल की प्रजा को अमरीका में रहते हुए भविष्य में विक्षोभ उठाना पडेगा ?

१ ) http://www.thehindu.com/news/international/article504244.ece

" भारतीय प्रजा के मन को दुखी करने वाले आलेख के लिए
हम माफी चाहते हैं "

आँकड़े और सर्वे इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि महज विगत 1 वर्ष में 94,563 भारतीय मूल के विद्यार्थी समुदाय के अमरीका आगमन से डालर $ 2.39 विलियन धन राशि अमरीकी इकोनोमी में जुडी है । भारतीय मूल के अमरीका में बसे नागरिक अमरीकी अर्थ व्यवस्था में मिलियनों डालरों के हिसाब से योगदान श्रमदान करते हैं । भारतीय मूल की प्रजा भले ही अप्रवासी कहलाती हो, परंतु जहाँ भी भारतीय बसे हैं उन्होंने उस देश को समृद्ध किया है । यही नहीं कई प्रमुख व्यवसाय जैसे चिकित्सा, इंजीनियरिंग, आईटी और अन्य तरह के व्यापार उद्योग के क्षेत्रों में इन नये नागरिकों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है । हर मुल्क से आकर उत्तर अमेरीकी धरा पर बसे दूसरी कौम के लोगों के मध्य जीते हुए रहते हुए भी सदा भारतीयों ने अपनाए हुए देश के नियम व क़ानून का विधिवत तथा व्यवस्थित रूप से पालन भी किया है और भारतीय संस्कार भी संजोए रखा है । हाँ, कुछ अपवाद हर बात में देखे जाते हैं सो ऐसा भी नहीं की हर भारतीय बस श्री रामचंद्र का अवतार-सा श्रेष्ठ मानुष ही बना रहा है । अच्छे और बुरे इंसान हर तबक़े और हर कौम में, हर मुल्क में होते हैं और हम भारतीय भी इस मामले में सब के जैसे हैं । हम कोई अपवाद नहीं हैं ! हम भी महज इंसान ही तो हैं !

निष्कर्ष यही कि आज विश्वव्यापी बाज़ारवाद और समाजवाद के २ पहियों के बीच चली मीडिया की गाडी में बैठा आम अदना इंसान अपने आप को कहे भी तो क्या कहे ? क्या समझे या समझाये कि वह कौन है ? प्रवासी है या अप्रवासी है ? भारतीय है या एनआरआई है ? बिहारी है या महाराष्ट्र वासी है ?

कहाँ से चले थे हम और कहाँ पहुँचेंगे ? क्या इंसानियत, मैत्रीभाव, दया करुणा, आपसी भाईचारा, अमन पसंदगी, सुकून की तमन्ना, आनेवाले समय में, ये सारे शब्द सिर्फ़ 'दीवानों की डिक्शनरी' के शब्द मात्र रह जायेंगें ? लोभ, लालच, व्याभिचार, दुश्मनी, बैर, लडाई-झगडा , दंगा-फ़साद, बम के गोले, बारूदों के ढेर, ख़ून ख़राबा, व्याभिचार, अनाचार... क्या बस यही विश्व में हर तरफ़ जारी रहेगा ? मनुष्य कब सभ्य होगा ? कब सुसंस्कृत होगा ? पता नहीं ...ये होगा भी या नहीं...

आख़िर में ये भी देख लीजिये...

युद्ध विनाश के बादल लेकर आते हैं और तबाही की बरसात कर कहर बरपाते हैं .....

देखिए यहाँ

.जैसा इस लिंक में आप देख पायेंगें

मैं तो बस इतना ही कहूँगी –

हम तो कुछ भी नहीं हैं ज़िंदगी के सताये हुए,

सहते हैं हर जुल्म ज़िंदगी के बस मुस्कुराते हुए ।
- लावण्या