Monday, April 8, 2013

' सपनों के साहिल ': देवदासी प्रथा : मेरे उपन्यास का पूर्व कथानक

ॐ 
सपनों के साहिल : 
न १९२० का समय !  इतिहास के मोड़ पर रूका है समय और देख रहा है  गुलामी की जंजीरों से बंधे  भारतवर्ष को ! कश्मीर से कन्याकुमारी और पश्चिम छोर पर अफघानिस्तान से लेकर पूर्व में बर्मा तक फैला एकछत्र , अखंड भारत वर्ष ! अपने देशवासीयों के जीवन की गहमागहमी में  रचा बसा भारत देश!  जहां एक नया सवेरा साकार हो कर , स्वतंत्रता का आन्दोलन बनकर , भारत के वीर संतानों के प्रयासों से ,  धीरे धीरे गति पकड़ कर,  भारत माता के  मालिक बन बैठे अंगरेजी शासन को दूर हटाने  के मंसूबे पाल रहा है हां, ये वही  वेद भूमि भारत है। पुराणों में वर्णित कथा जहां जन्म लेकर ग्रंथों में उकेरी गयी हैं । शास्त्रों  में वर्णित ' जम्बूद्वीप ' भारत वर्ष  आज  उपस्थित है अपने वर्तमान के साथ
          इतिहास की  बदलती हुई करवटों के साथ भारत भूमि ने कयी बदलावों को देखा है  अनगिनत राजा , महाराजा , संत , साधू ,  सन्यासी  योगी , कलाकार , रचनाकार यहां अवतरित हुए  और चले गये  समय बीतता  गया  जो पीछे छूटा वह इतिहास के पन्नों में छिप गया और नित नये पात्र उभर कर आते रहे 
                    भारत भूमि की समृध्धि और वैभव से आकर्षित होकर कयी  विदेशी आक्रमणकारी भी खींचे चले आये  कुछ यहीं रूक गये तो  कुछ, आतंक और विनाश , युध्ध और लूटपाट  करने के पश्चात , अपार संपत्ति लूट कर चले गये  मुगलिया सल्तनत की नींव भी इसी तरह  आक्रमणकारी बाबर के आगमन के बाद ही पडी थी 
           आज सन १९२० में  भारत भूमि पर परदेसी हुकूमत जारी है । अब अंग्रेजों की बारी  है। जो दिल्ली पे राज करे वो भारत का भी राजा ! गोरे राजा की तस्वीर भारत के रूपये  पे जडी हुई है चूंकि राज्य सत्ता आज  गोरों के हाथों में है
       भारत बदल तो रहा है पर धीरे धीरे ! सड़कें बन रहीं हैं  माल से लदे जहाज , ग्रेट ब्रिटन से ,  भारत आने लगे हैं और रेल यात्रा भारत को एक सूत्र में पिरो रही है  गांधीजी का सत्याग्रह आन्दोलन देश के लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगा है भारत के गाँवों में अब भी छूआछूत , वर्ण व्यवस्था , गरीब और अमीर वर्ग की रेखाएं  ज्यों की त्यों , खींचीं हुईं हैं  और  समाज को जड़ता और रूढ़ियों  में जकड़े हुए इस वक्त टूटने के कोई आसार जतला नहीं रहीं।  जनरल डायर के पिछले साल किये नृशंस और जघन्य जलियांवाला बाग़ हत्याकांड ने भारतीय जन मानस को इस दुःख की बेला में एक सूत्र में पिरोकर मानों जोड़ दिया है अमृतसर में घटी इस घटना की दूर सुदूर दक्षिण भारत के छोटे बड़े गाँव और कस्बों तक खबर फ़ैल चुकी है कि , निर्मम गोरे जनरल ने महिला और भोले भाले बच्चों तक को गोलियों से भून देने का फरमान दिया था
                                
जो कोई ये सुनता एक पल को निस्तब्ध  , अवाक  खड़ा रह जाता ! ' हे देव ! ऐसा अत्याचारी तो कंस न था ना ही रावण ही होगा ...बड़े अधम हैं ये फिरंगी जो ऐसे पाप करते हैं ! ' लोग कहते और गांधी जी के प्रति श्रध्धा से नत मस्तक हो जाते 
                       भारत की कृषि प्रधान व्यवस्था भी अब बदल रही थी  जिस धान्य से अधिक धन की प्राप्ति हो ऐसे रूई की खेती पर  या नील या तमाकू जैसे धनार्जन के लिए लगायी  फसल पे  किसान की आस टिकने लगी थी चूंकि , यही कपास ब्रिटन की मेनचेस्टर और लेंकेशायर की कपड़ा मीलों के लिए जहाज़ों में लद कर भेज दिया जाता और बना बनाया कपड़ा भारत पहुंचता . हाथ करघे तथा अन्य बुनकरों के व्यवसाय , मंदी भुगतने लगे थे  तमाकू , सिगरेट बनाने के लिए निर्यात हो रहा था और नील रंग की खपत बढ़ रही थी .  ब्रिटीश राज सता के दमन का कुचक्र , कयी दिशाओं में अपनी धार से , जन जीवन को घायल करता अपनी धुरी पर घूम रहा था . जिसके  क्रूर वार से  कितने ही इंसान मार ख़ा कर लहूलुहान हो रहे थे परिवार उजड़ रहे थे. भारत के गाँव गरीबी की ओर झुकने लगे थे और पारम्पारिक उद्योग चरमराकर टूटने लगे थे
                 भारत में असंख्य छोटे , बड़े  राज घराने तब भी स्वतन्त्र थे उनकी अपनी सेनाएं थीं । राजा के चित्र लिए पैसों के सिक्के थे  नोट थीं  शासन था और उन राज परिवारों की शान शौकत , दबदबा और चकाचौंध अपनी चरम सीमा पर तब  भी कायम था  सन १९२० के समय में इन  ऊंचे घराने में जी रहे श्रीमंत  और धनिक वर्ग अपनी अपार  संपदा के  मद में चूर , शानो शौकत और रंगरेलियों में आबाद जीवन गुजार रहा था . 
 कयी राजा महाराजा योरोप जाकर ,  वहां के जीवन में , घुलमिलकर , सानन्द अपना  समय बिताते  थे .  राज परिवार के सदस्यों ने मानों  आँखों पे पट्टी बाँध रखी है . उस गुलाबी पट  के पीछे से उन्हें दुनिया  रंगीन और  हसीन नजर आ रही थी 
              आइये अब चलें भारत के दक्षिण की ओर ! 

रात्रि का समय है और दक्षिण भारत के ऐसे ही समृध्ध राज घराने के  राज महल की खुली खिडकियों से फ़ैल रहा प्रकाश,  बाहर घिरे अन्धकार को मानों अपने गौरव से महिमा मंडीत करता परास्त कर रहा है महल के बाग़ की हरियाली अन्धकार की चादर ओढ़े सो रही है परंतु कयी रात्रि वेला में खिलते फूलों की सुगंध पवन में फ़ैल रही है  राज महल से कुछ कोस की दूरी पर राज्य का मुख्य मंदिर है 
            काले पाषाण से बना यह प्राचीन मंदिर दूर दूर के प्रान्तों तक सुप्रसिद्ध है . यहां शिव , नटराज स्वरूप में विद्यमान हैं  चार हाथवाली कांस्य प्रतिमा भारतीय संस्कृति की परिभाषा लिए सदीयों से इस भव्य मंदिर के गर्भ गृह में , विद्यमान है 
              शिव - नटराजन ,  दाहिने हाथ में डमरू  धारण किये हैं  शिवजी के  डमरू से ही प्रथम प्रणव नाद उत्पन्न हुआ  ॐ कार से ज्ञान का सृजन हुआ और सृष्टि का आरम्भ हुआ  महर्षि  पाणिनी  को व्याकरण ज्ञान इसी डमरू के नाद के प्रसाद स्वरूप प्राप्त हुआ था  अत: उन्होंने पाणीनीय व्याकरण के प्रथम अध्याय को " शिव सूत्र " कहा और अपने ग्रन्थ में ,  भाषा व्याकरण के नियम प्रतिपादीत किये थे  बांयें हाथ में  परम शिव , अग्नि को उठाये हुए है और दुसरे दाहिने हाथ से भक्त गण को अभय मुद्रा से आद्यात्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते स्थिर खड़े हैं  नटराज शिव का दूसरा  बांया हाथ,  नीचे पग की ओर संकेत करते हुए झुका  हुआ है मानो  कह रहा है ,
 ' शरणागति स्वीकारो . मैं तुम्हारी  आत्मा को मुक्त करूंगा ताकि आवागमन के  फेर से तुम मुक्त हो जाओ  '  
सदाशिव एक बौने  असुर की आकृति पर  बांये  पैर  से स्थिर खड़े  हैं  ये बौना असुर ,  अज्ञान का प्रतीक है  शंकर भगवान् का दांया पैर,  कमर से ऊपर उठ गया है  इस योगमुद्रा में, पैर  ऊंचे किये हुए नटराज शिव  अपने अदभुत सौन्दर्य से ' सुन्दरेश्वरा ' नाम को चरितार्थ करते हुए , सुशोभित हैं 
        महादेव ने  जटाधारी  मस्तक  पर चंद्रमा धारण किया हुआ है  विश्व का सर्वाधिक विषैला  कोबरा नाग  , कैलाशपति के दाहिने बाजूबंद के स्थान से फुफकारता हुआ नटराज शिव का अलंकरण बना शोभायमान है और  महाविष्णु  जिस तरह वक्ष पर कौस्तुभ मणि धारण करते हैं , भोलेनाथ  ने अपने वक्ष पर उस स्थान पर नर  मुंड धारण किया है और वे इन विलक्षण आभूषणों को धारण किये  प्रसन्न व  शांत मुद्रा में तप लीन हैं 
                         महा अदभुत स्वरूप है शिव शंकर का !  जिसे देख हरेक भक्त निशब्द और मौन खडा रह जाता है । नटराज शिव , ब्रह्म का साक्षात स्वरूप हैं  ! आठ तत्व , आकाश, वायु, अग्नि, धरा, जल ,  मन , बुद्धि और अहंकार तो प्रकट हैं जिन्हें ज्ञानवान पहचानता है परंतु नौवां तत्त्व गुप्त है।   जिसे कोई नहीं जानता ! न ही जिसे व्याख्या में बांधकर समझाया जा सकता है।  
         नटराज का तीसरा नेत्र बंद रहता है। तांडव नृत्य करते शिव नटराज सृष्टि के प्रलय काल में यह तीसरा नेत्र जो कपाल पर दो भृकुटी के मध्य में स्थित है, खोलकर, सम्पूर्ण विनाश कर सृष्टि चक्र का प्रलय कर देते हैं नटराज के चारों  ओर बना हुआ  अग्नि का वर्तुल  जिसे ' प्रभावती ' कहते हैं , वह इसी पूर्ण संहार का प्रतीक है नव सर्जन और नव निर्माण भी शिव आज्ञा से ही ब्रह्मा जी द्वारा निर्मित होता है यह मूर्ति, पल्लव वंश के राज परिवारों के आदेश पर मूर्तिकारों ने सप्तम या आठवीं सदी में  निर्मित की थी नृत्य करते नटराज महा योगी हैं 
              वेदाचार्य योग गुरु पतंजलि द्वारा पूजित शिव लिंग भी यहीं संग्रहीत है कथा है , आदीशेष  भगवान को शिव तांडव देखने की उत्कट इच्छा हुई 
      तब शिवजी ने उन्हें वरदान दिया और कहा कि ,
' तुम पतंजलि के रूप में जन्म लोगो , मेरे दर्शन करोगे और तभी मेरा तांडव नृत्य भी देख पाओगे '  
     इसी रमणीय मंदिर के पास साधना करते हुए आचार्य पतंजलि को शिव वरदान से यह सुख प्राप्त हुआ था इस शिव अनुकम्पा के पश्चात स्वयं पतंजलि नाट्य शास्त्र में प्रवीण हो गये थे त्रिचिनापल्ली से २० किलोमीटर  दूर , तिरुपत्तर के ब्रह्म्पुरीश्वर मंदिर में पतंजलि महाराज की जीव समाधि है  यहीं ब्रह्माजी ने १२ शिव लिंगों की स्थापना की थी 
           योगाचार्य  महर्षि पतंजलि ने दीक्षीतार ब्राह्मण पुजारी  को कैलाश प्रांत से लाकर दक्षिण भारत में स्थायी किया और  शिवोहम भाव से, यहां प्रतिदिन की जाती आराधना अर्चना ,  रहस्यमय पूजाविधि सीखलायी थी जिस विधि से, शिव परब्रह्म के आकाश तत्त्व की पूजा अर्चना सदीयों से यहां संपन्न होती रही है  
          शिवा या देवी उमा को शिवकामी  सुन्दरी या शिवानन्द नायिका कहते हैं चित्त के आकाश या अम्बर  और उसी  रिक्त स्थान में स्थित परब्रह्म परमात्मा ही नटराज शिव स्वरूप से  इस देव मंदिर में , सदीयों से  पूजित हैं।  यह ऐसा अनोखा व अदभुत तथा  अति प्राचीन मंदिर है  
        महादेव शंकर योग के आदिगुरू हैं और नृत्य शास्त्र के भी जनक हैं  प्रभू महेश ने तांडव नृत्य और देवी पार्वती ने लास्य नृत्य गन्धर्व वृन्द और अप्सराओं को सिखलाया  नृत्य शास्त्र का ज्ञान तब भरत मुनि को देकर पृथ्वी पर भेज दिया गया । जिसे ' नाट्य शास्त्र ' में ईसा पूर्व २०० वीं सदी में ग्रन्थ के रूप में संगृहीत किया गया आज तक, यही भरत मुनि द्वारा लिखा गया नाट्य शास्त्र भारत के नृत्यों का आधार है
        चौल राज परिवार और राजवंश के शासन काल में ' देवदासी ' प्रथा प्रचलित थी थान्जुवर के ब्रुहदारेश्वर मंदिर ग्राम में ४०० से अधिक देवदासीयों  का समुदाय समाज का अंग था  मंदिर के साथ लगे विशाल प्रांगण में, वाध्य यन्त्रों के ज्ञाता , गायक पुजारी , पाक शास्त्र में निपुण सेवक वृन्द , पुजारी , माली स्वर्णकार , शिल्पी , बढई मंदिर निर्माण में दक्ष वास्तुकार , मूर्तिकार जैसे कयी सारे मुख्य मंदिर और राज वंश की सेवा में संलग्न थे 
           कालिदास के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ' मेघदूत ' में उज्जयनी नगरी में महाकालेश्वर मंदिर में देवदासी प्रथा की ओर संकेत किया गया है तान्जोर , ट्रावन्कोर राज्यों में देवदासी संख्या की बहुलता थी देवदासी नृत्य कर देवता को रिझाते हुए अपनी आत्मा के उत्थान पर केन्द्रीत रहते हुए कला के चरम बिन्दु पर पहुँचती थी परंतु ' राज नर्तकी ' महाराजाधिराज को रिझाने के लिए नृत्य प्रस्तुत करती थी . इसी कारण ' राजदासी ' कहलाती थी  
      देवदासी प्रथा सनातन हिन्दू धर्म के अति विशाल वितान के नीचे , एक प्रथा मात्र थी परंतु अंग्रेज सरकार जो अधिकतर ईसाई धर्म का अनुशरण करता था और भारत के नये बुध्धीजीवी , अंगरेजी शिक्षा पध्धति से शिक्षा प्राप्त , समाज सुधारक वर्ग को ' देवदासी प्रथा ' के उन्मूलन की अधिक चिंता हो आयी थी भारत में मौजूद , अधिकाँश वेश्यालय अंग्रेज़ी हूकुमत के संरक्षण में पनप रहे होने के बावजूद , देवदासी प्रथा का अंग्रेजों ने नये कानून बनाकर विरोध किया जिस विरोध में भारत का पढ़ा लिखा वर्ग , समाज सुधार की भावना लिए , उनके साथ हो लिया  

रुक्मिणी  देवी
जन्म : २९  फरवरी  १९०४
मदुरै  तमिलनाडु  भारत 
 थियोसोफीकल सोसायटी ने नृत्यांगना रुक्मिणी देवी अरूंडेल का विवाह जोर्ज अरूंडेल के संग हुआ था जब रुक्मिणी मात्र १६ वर्ष की थीं और जे. कृष्ण्मूर्ति के गुरु जोर्ज  ४२ साल  के थे जोर्ज  स्वयं लिबरल केथोलिक चर्च के बिशप थे और वाराणसी सेन्ट्रल हिन्दू कोलेज के इतिहास विषय के प्राद्यापक भी थे भारत नाट्यम नृत्य शैली की आधुनिक प्रचलित रीति इन्हीं दम्पति की उपज है  कलाक्षेत्र  भारत नाट्यम के आधुनिक स्वरूप का प्रथम महाविद्यालय रुक्मिणी और जोर्ज अरुंडेल दम्पति ने भारत वर्ष को उपहार में दिया है जिसकी प्रसिद्धी जग विख्यात है 

Balasaraswati
बाला सरस्वती 

बाला सरस्वती ...
     बाला सरस्वती के प्रयासों को सहायता देकर देवदासी प्रथा के संग  विनिष्ट होने के कगार पर , भारत की अति प्राचीन नाट्य संपदा ,  प्राचीन भारत नाट्यम नृत्य प्रणाली जिसे ' साडीर '  भी कहते हैं, उस को लुप्त होने से बचाने में सहायता की थी 
              अन्यथा आज भारत के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में चाव से और भारतीय कला के प्रति अभिमान की भावना से देखे जा रहे भारत नाट्यम, ओडीसी  और मोहिनी अट्टम जैसे अति प्राचीन नृत्य शायद हमे देखने को नसीब न हो पाते   
          सन १९८८ में देवदासी प्रथा को आंध्र प्रदेश में समाप्त करने की घोषणा की गयी थी और समूचे स्वतन्त्र भारत में कानून बनाकर इस प्राचीन प्रथा को  समाप्त करने की घोषणा हुई  सन २००४ तक देवदासी प्रथा  के किस्से उभरते रहे  कर्नाटक प्रांत में सन १९८२ से देवदासी प्रथा का कडा विरोध आरम्भ हो चुका था . कर्नाटक प्रांत में देवदासी को ' बसवी ' कहते थे , तो महाराष्ट्र में ' मातंगी ' नाम लिया जाता था  कहीं उन्हें ' नल्ली ' तो कहीं ' मुरली ' तो कहीं ' वेंकटसन्नी ' या ' थेयारीडीयन  भी पुकारा  जाता था       

 ओरीस्स्सा के जगन्नाथ मंदिर की ' मेहरी ' भी जगत के नाथ ईश्वर के प्रति श्रध्धा रूपी नर्तन से भक्ति की पताका फहराती थी  महरी नाम है ' मोहन की नारी ' का !
                      ओडीसी नृत्य के आचार्य पंकज चरण दास कहते हैं, ' पञ्च  महा रिपु अरी  इति महरी ' जो पांच महा पापों की काटनेवाली  आरी है वह महरी है  सन १३६० में सुलतान शाह ने ओरीस्सा पर धावा बोला और तब से स्त्रियाँ, परदे की आड़ में अपनी लज्जा छिपाने लगीं और ' महरी प्रथा भी लुप्त प्राय: होने लगी   तब इन महरियों की संख्या , सन १९५६ तक मात्र ९ और सन १९८० तक मात्र ४ की संख्या रह गयी थी   उनके नाम थे , हरप्रिया , कोकिल्प्रभा , परोश्मोनी  एवं  शशिमोनी . कुछ वर्षों पश्चात , शशिमोनी और परोश्मनी नव्कलेबर , नन्द उत्सव तथा रथ उत्सव जैसे जगन्नाथ पुरी के उत्सवों में भाग लेतीं दीखलायी पड़ जातीं थीं  
           कर्नाटक प्रांत में देवदासी प्रथा १० सदीयों से अटूट चली आ रही थी  वहां ' येल्लाम्मा ' देवी की पूजा की जाती है  जामदग्न ऋषि पत्नी रेणुका परशुराम की माता ही देवी येल्लाम्मा ' नाम से  कर्नाटक में स्थित देवदासी सम्प्रदाय में प्रसिध्ध हैं और पूजी जातीं हैं  
              देवदासी  ईश्वर से ब्याही हातीं हैं जब् मंदिर में गर्भ गृह के समक्ष ईश्वर मूर्ति से कन्या का विवाह किया जाता है  कन्या का ऋतुमती होना उत्सव का रूप ले लेता है ।  इस ईश्वर के संग विवाह समारोह के हो जाने पर वह कन्या देवदासी , ' नित्य सुमंगली ' या ' अखंड सौभाग्यवती '  कही जाती है   

 - लावण्या

Tuesday, April 2, 2013

होली की रंगीन यादें ..." पिया के घर में पहला दिन "



ॐ 
 होली की  रंगीन यादें ..." पिया के घर में पहला दिन "
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मेरी अम्मा श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा की हमे सुनायी हुई  यह यादें  आपके संग बाँट रही हूँ। 
        मेरी अम्मा सुशीला का विवाह प्रसिध्ध गीतकार नरेंद्र शर्मा के संग , सन १९४७ की १२ मई के दिन , छायावाद के मूर्धन्य कविवर श्री सुमित्रानंदन पन्त जी के आग्रह से बंबई शहर में संपन्न हुआ था।  
          पन्त जी अपने अनुज समान कवि नरेंद्र शर्मा के साथ बंबई शहर के उपनगर माटुंगा के शिवाजी पार्क  इलाके में रहते थे। हिन्दी के प्रसिध्ध साहित्यकार श्री  अमृतलाल नागर जी व उनकी धर्मपत्नी प्रतिभा जी ने कुमारी सुशीला गोदीवाला को गृह प्रवेश  करवाने का मांगलिक  आयोजन संपन्न किया था। 
      सुशीला , मेरी अम्मा अत्यंत  रूपवती थीं और  दुल्हन के वेष में उनका चित्र आपको मेरी बात से सहमत करवाएगा ऐसा विशवास है।  
विधिवत पाणि -- ग्रहण संस्कार संपन्न होने  के पश्चात वर वधु नरेंद्र व सुशीला को सुप्रसिध्ध गान कोकिला सु श्री सुब्बुलक्ष्मी जी व सदाशिवम जी की गहरे नीले रंग की गाडी जो सुफेद फूलों से सजी थी  उसमे बिठलाकर घर तक लाया गया था।     
        द्वार पर खडी नव वधु सुशीला को कुमकुम  से भरे एक बड़े थाल पर खड़ा किया गया और एक एक पग रखतीं हुईं लक्ष्मी की तरह सुशीला ने  गृह प्रवेश किया था।  तब दक्षिण भारत की सुप्रसिध्ध गायिका सुश्री सुब्बुलक्ष्मी जी ने मंगल गीत गाये थे। मंगल गीत में भारत कोकिला सुब्बुलक्ष्मी जी का साथ दे रहीं थें उस समय की सुन्दर नायिका और सुमधुर गायिका सुरैया जी भी  ! 
      विवाह की बारात में सिने  कलाकार श्री अशोक कुमार, दिग्दर्शक श्री चेतन आनंद, श्री  विजयानंद, संगीत निर्देशक श्री अनिल बिस्वास, शायर जनाब सफदर आह सीतापुरी, श्री रामानन्द सागर , श्री दिलीप कुमार साहब  जैसी मशहूर कला क्षेत्र की हस्तियाँ शामिल थीं। 
      सौ. प्रतिभा जी ने नई दुल्हन सुशीला को फूलों का घाघरा फूलों की चोली और फूलों की चुनरी और सारे फूलों से  बने गहने , जैसे कि , बाजूबंद, गलहार, करधनी , झूमर पहनाकर सजाया था। 
     कवि शिरोमणि पन्त जी ने सुशीला के इस फुल श्रुंगार से सजे  रूप को ,  एक बार देखने की इच्छा प्रकट की और नव परिणीता सौभाग्यकांक्षिणी  सुशीला को देख कर वे 
बोले   ' शायद , दुष्यंत की शकुन्तला कुछ ऐसी ही लगीं होंगीं ! '       
      
 ऐसी सुमधुर ससुराल की स्मृतियाँ सहेजे अम्मा हम ४ बालकों की माता बनीं उसके कई बरसों तक मन में संजोये रख अक्सर प्रसन्न होतीं रहीं और  ये सुनहरी यादें हमारे संग बांटने की हमारी उमर हुई तब हमे भी कह कर  सुनाईं थीं।  जिसे आज दुहरा रही हूँ। 
        
सन १९५५ से कवि  श्री नरेंद्र शर्मा  को ऑल  इंडिया रेडियो के ' विविध भारती ' कार्यक्रम जिसका नामकरण भी उन्हींने किया है उसके प्रथम प्रबंधक, निर्देशक , निर्माता के कार्य के लिए भारत सरकार ने अनुबंधित किया था। इसी पद पर वे १९७१ तक कार्य करते रहे। उस दौरान उन्हें बंबई से नई देहली के आकाशवाणी कार्यालय में स्थानांतरण होकर कुछ वर्ष देहली रहना हुआ था। 
  
हमारे भारतीय त्यौहार ऋतु अनुसार आते जाते रहे हैं।  सो इसी तरह एक वर्ष ' होली ' भी आ गयी। उस  साल होली का वाकया कुछ यूं हुआ ...
          
नरेंद्र शर्मा को बंबई से सुशीला का ख़त मिला ! जिसे उन्होंने अपनी लेखन प्रक्रिया की बैठक पर , लेटे हुए ही पढने की उत्सुकता से चिठ्ठी फाड़ कर पढने का उपक्रम किया ! किन्तु, सहसा , ख़त से ' गुलाल ' उनके चश्मे पर, हाथों पे और रेशमी सिल्क के कुर्ते पे बिखर , बिखर गया ! उनकी पत्नी ने बम्बई नगरिया से गुलाल भर कर यह ख़त भेज दिया था और वही गुलाल ख़त के लिफ़ाफ़े से झर झर कर गिर रहा था और उन्हें होली के रंग में रंग रहा था ! आहा ! है ना मजेदार वाकया ?

           नरेंद्र शर्मा पत्नी की शरारत पे मुस्कुराने लगे थे ! 

 इस तरह दूर देस बसी पत्नी ने , अपने पति की अनुपस्थिति में भी उन के संग  ' होली ' का उत्सव ,  गुलाल भरे संदेस भेज कर के पवित्र अभिषेक से संपन्न किया ! कहते हैं ना , प्रेम यूं ही दोनों ओर पलता है   
           
हमारे भारतीय उत्सव सर्वथा भारतीयता  के विशिष्ट गुण लिए हुए हैं जिन्हें परदेस में बसे हर प्रवासी  हसरत भरे दिल से याद करता है। 
        जैसे आज अमरीकी धरती  पे रहते हुए मैं याद कर रही हूँ और आप  सभी के लिए सस्नेह, एक दमकता सा गुलाल का टीका भेज रही हूँ , होली मुबारक हो ! 
सुशीला जी 















लावण्या शाह 





From : http://rashmiravija.blogspot.in/2013/03/blog-post_23.html

Thursday, March 7, 2013

महिला दिवस 2013 : बलात्कार कैसे रोके जाएं? सवाल वेब दुनिया के, जवाब लावण्या दीपक शाह के


लावण्या दीपक शाह



महिला दिवस 2013 : बलात्कार कैसे रोके जाएं?
सवाल वेबदुनिया के, जवाब आपके

महिला दिवस 2013 को मनाए जाने के पूर्व वेबदुनिया टीम ने हर आम और खास महिला से भारत में नारी सुरक्षा को लेकर कुछ सवाल किए। हमें मेल द्वारा इन सवालों के सैकड़ों की संख्या में जवाब मिल रहे हैं। हमारी कोशिश है कि अधिकांश विचारों को स्थान मिल सके। प्रस्तुत हैं वेबदुनिया के सवाल और उन पर मिली मिश्रित प्रतिक्रियाएं....  
  
उत्तर अमेरिका से लेखिका लावण्या दीपक शाह के विचार   *
वेबदुनिया : भारत को महिलाओं के लिए सुरक्षित कैसे बनाया जाए?  

उत्तर : समाज के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। साथ साथ सरकार भी जिम्मेदार है। *
वेबदुनिया : भारतीय महिलाओं का सही मायनों में सशक्तिकरण आप किसे मानते हैं?-आर्थिक स्वतंत्रता-दैहिक स्वतंत्रता-निर्णय लेने की स्वतंत्रता  
 उत्तर : तीनों मुद्दे स्त्री स्वातन्त्र्य को सशक्त करेंगें।  
* वेबदुनिया : घरेलू हिंसा के लिए मुख्य रूप से महिलाओं की खामोशी या सहनशक्ति जिम्मेदार है, क्या आप सहमत हैं?  
 उत्तर : महिलाएं समाज में पुरुष प्रधान पारिवारिक सत्ता के अधीन रहकर कार्य करतीं रहीं हैं। सहनशक्ति और स्त्री के ममत्त्व ये किसी भी महिला के गुणों पर सदैव पुरुषत्त्व के अधिकारों को हावी होते हुए सदियों से हमने भारत ही नहीं हर देश के समाज में देखा है। कुछ स्त्रियां अपनी अलग पहचान बनाने में सक्षम हो पाई हैं। परन्तु आज भी एक विशाल स्त्री समुदाय स्वतन्त्र नहीं दिखलाई पड़ता। स्त्री स्वतंत्रता को 'स्त्री हाथ से निकल गई' जैसी उक्तियों से जोड़ा जाता है और उसे लांछित किया जाता है।  

* वेबदुनिया : बॉलीवुड की बालाओं का भारत की ग्रामीण बालिकाओं पर नकारात्मक असर पड़ता है?   
उत्तर : बॉलीवुड की बालाएं, धनार्जन की होड़ में बॉलीवुड के हीरो के साथ रेस में दौड़ रहीं हैं पिछली पीढ़ी की हीरोइन आज की हीरोइन के मुकाबले कम कमा रहीं थीं। आज सिनेमा, साहित्य, समाचार पत्र, मैग्जीन जैसे 'वेबदुनिया' इत्यादि वैश्विक स्तर पर फैला हुआ है। मैं मानती हूं कि, सभी जिम्मेदार हैं..हर संस्था या व्यक्ति सुर्ख़ियों भरी, सनसनीखेज खबरें और बातें छापते हैं या प्रचारित करते हैं। एक ओर हम स्त्री-सुरक्षा की गंभीर समस्या पर वार्तालाप कर रहे हैं और दूसरी ओर वेबदुनिया या एनडीटीवी जैसे समाचार पोर्टल खुद ऐसे अश्लील हीरोईनों के चित्र छापता है और प्रचारित करता है। जिसका केप्शन/ शीर्षक हो' देखिए फलां एक्ट्रेस हॉट स्वीमिंग सूट में ' तब यह क्या सही होगा?
ऐसे चित्र ही युवा पीढ़ी को आकर्षित करते हैं और मामला आखिर 'धन' बनाने के चक्कर में उलझ के खत्म! अगर हम स्त्री-सुरक्षा की सोचें तो यहां त्वरित बदलाव आवश्यक है।  
* वेबदुनिया : : क्या स्त्री आज भी महज देह ही मानी जाती है, इंसान नहीं? 
 उत्तर : ' स्त्री 'भी' इंसान है। पुरुषों की तरह और उसे भी पुरुषों की तरह समाजिक प्रतिष्ठा और अधिकार मिलने आवश्यक हैं।  

* वेबदुनिया : क्या बदलते दौर में आने वाली पीढ़ी के मन में महिलाओं के प्रति सम्मान संभव नहीं है?
उत्तर : आशा तो यही करूंगी के महिलाओं के प्रति सम्मान बढ़ें। 

* वेबदुनिया : बलात्कार जैसी घटनाएं रोक पाना संभव है? अगर हां तो कैसे, और नहीं तो क्यों? 
उत्तर : 'बलात्कार ' सम्पूर्णतया रोक पाया असंभव है। क्योंकि जब तक समाज पूरी तरह एक स्वस्थ मानसिक स्तर पर नहीं पहुंचता 'पशुता' से भी गिरे हुए पाप कर्म में लिप्त मानसिक रोगी जो निरीह, निर्दोष बालिकाओं और महिलाओं के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करता है उसे सुधारने के लिए, सामजिक शिक्षा और सच्चे और सात्विक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना होगा। 

* वेबदुनिया : बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं और क्यों?
उत्तर : भोगवादी सांस्कृतिक बहाव, 'आज हम हैं और हमें किसी का डर नहीं' ने आज के बिगड़े व्यक्ति को ज्यादा कठोर मानस का इंसान बना दिया है। हक तो लड़ झगड़ कर हासिल करना सभी को आ गया है परतु अपनी जिम्मेदारी के प्रति सर्वथा उदासीन रहना भी आज के इंसान में हम देख रहे हैं। 

* वेबदुनिया : मासूम बच्चियों के साथ बढ़ती बलात्कार की वारदातों के पीछे आखिर कौन सी विकृ‍ति होती है? 
उत्तर : 'हम पकड़े नहीं जाएंगें और सजा भी कम मिलेगी। और चारों तरफ बेशर्मी और अनादर, सरकारी संस्थान और अधिकतर व्यक्तियों का लालची और स्व-केन्द्रीत व्यवहार ही ऐसी विभत्स वारदातों के लिए आग में घी का काम कर रहे हैं। 'कन्या' की सुरक्षा का ध्यान पग-पग पर रहे। यह परिवार से लेकर समाज की हर 'स्त्री' की जिम्मेदारी है। अगर परिवार का कोई पुरुष अनुचित व्यवहार करता है तब उसे खुल कर के सजा दिलवाना जरूरी है। भले ही वह पिता, चाचा, ससुर, मामा , भाई, भतीजा, भांजा ही क्यों न हो ! 

* वेबदुनिया : क्या विदेशों में महिलाओं की स्थिति भारत से बेहतर है? 
उत्तर : सऊदी अरेबिया में अगर कोई चोरी करे तो हाथ काट दिए जाने की सजा है परन्तु वहीं तालिबानी पुरुष एक बुर्के में लिपटी स्त्री को पत्थर और कोड़े से पीट देते हैं। अफ्रीका में स्त्री की स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ी है जहां हरेक प्रांत में असुरक्षा और आतंक फैला हुआ है। पाश्चात्त्य देशों में बलात्कार होते तो हैं परन्तु क़ानून महिलाओं के लिए लड़ता है और दोषी को सजा भी मिलती है। भारत के लिए आवश्यक है कि पश्चिम का अंधानुकरण ना करें। हां स्वच्छता, अनुशासन, कर्म के प्रति प्रतिबद्धता जैसी बातों को जरूर सीखें। सिने - तारिका , होलीवुड की हीरोइन सी दीखने के बजाय क्यों न भारतीयता का पर्याय बनें ? 

Sunday, February 10, 2013

" ही इझ नो मोर "...


ही इझ नो मोर ! ११ फरवरी पापा की पुण्य तिथि --

स्व . पंडित नरेन्द्र शर्मा का यह शताब्दी वर्ष है - जन्म फरवरी  28 सन 1913  पुण्यतिथि : फरवरी 11 1989 

(ये चित्रों का कोलाज़ मेरी दीदी श्री लता मंगेशकर जी ने बना कर भेजा है सभी चित्र लता दीदी ने ही खींचे हैं )
स्व पँडित नरेन्द्र शर्माकी कुछ काव्य पँक्तियाँ :
" रक्तपात से नहीँ रुकेगी, गति पर मानवता की
हाँ मानवता गिरि शिखर, गहन, गह्वर
सीखै पाशवत व्यथा छिपे सीमा
 नहीँ मनुज के, गिर कर उठने की क्षमता की !

 आज हील रही नीँव राष्ट्र की,
व्यक्ति का स्वार्थ ना टस से मस !
राष्ट्र के सिवा सभी स्वाधीन,
व्यक्ति स्वातँत्र अहम के वश!
राष्ट्र की शक्ति सँपदा गौण,
मुख्य है, व्यक्ति व्यक्ति का धन!
नहीँ रग कोई अपनी जगह,
राष्ट्र की दुखती है नस नस!
राष्ट्र के रोम रोम मेँ आग,
बीन " नीरो " की बजती है
बुध्धिजीवी बन गया विदेह ,
राष्ट्र की मिथिला जलती है !
क्राँतिकारी बलिदानी व्यक्ति,
बन बैठे हैँ कब से बुत !
कह रहे हैँ दुनिया के लोग,
कहाँ हैँ भारत के सुत ?
क्योँ ना हम स्वाभिमान से जीयेँ?
चुनौती है, प्रत्येक दिवस !
जन क्राँति जगाने आई है,
उठ हिँदू, उठ मुसलमान-
सँकीर्ण भेद त्याग,
उठ, महादेश के महा प्राणॅ !
क्या पूरा हिन्दुस्तान, न यह ?
क्या पूरा पाकिस्तान नहीँ ?
मैँ हिँदू हूँ, तुम मुसलमान,
पर क्या दोनोँ इन्सान नहीँ ?"
नहीँ आज आश्चर्य हुआ,
क्योँ जीवन मुझे प्रवास ?
अहंकार की गाँठ रही,
निज पँसारी के हाथ !
हो भ्रष्ट न कुछ मिट्टी मेँ मिल,
केवल गल जाए अंहकार ,
मेरे अणु अणु मेँ दिव्य बीज,
जिसमेँ किसलय से छिपे भाव !
पर, जो हीरक से भी कठोर !
यदि होना ही है अँधकार,
दो, प्राण मुझे वरदान,
खुलेँ, चिर आत्म बोध के बँद द्वार!
यदि करना ही विष पान मुझे,
कल्याण रुप हूँ शिव समान,
दो प्राण यही वरदान मुझे!
तिनकोँ से बनती सृष्टि,
सीमाओँ मेँ पलती रहती,
वह जिस विराट का अँश,
उसी के झोँकोँ को ,
फिर फिर सहती !
हैं तिनकोँ मेँ तूफान छिपे ,
ज्योँ, शमी वृक्ष मेँ छिपी अगन !
-  पँडित नरेन्द्र शर्मा
कृष्ण - गीत :
राधा नाचे कृष्ण नाचे, नाचे गोपी जन !
मन मेरा बन गया सखी री सुँदर वृँदावन .
कान्हा की नन्ही ऊँगली पर नाचे गोवर्धन
राधा नाचे कृष्ण नाचे, नाचे गोपी जन !
मन मेरा बन गया सखी री सुँदर वृँदावन ।

श्याम सांवरे , राधा गोरी , जैसे बादल बिजली !
जोड़ी जुगल लिए गोपी दल , कुञ्ज गलिन से निकली ,
खड़े कदम्ब की छांह , बांह में बांह भरे मोहन !
राधा नाचे कृष्ण नाचे , नाचे गोपी जन !
वही द्वारिकाधीश सखी री , वही नन्द के नंदन !
एक हाथ में मुरली सोहे , दूजे चक्र सुदर्शन !
कान्हा की नन्ही ऊँगली पर नाचे गोवर्धन !
राधा नाचे कृष्ण नाचे , नाचे गोपी जन
जमुना जल में लहरें नाचें , लहरों पर शशि छाया !
मुरली पर अंगुलियाँ नाचें , उँगलियों पर माया !
नाचें गैय्याँ , छम छम छैँय्याँ , नाच रहा मधु - बन !
राधा नाचे कृष्ण नाचे , नाचे गोपी जन !
मन मेरा बन गया सखी री सुँदर वृँदावन .
गीत रचना : पँडित नरेन्द्र शर्मा
तीन वर्ष की मैं - लावण्या 
 

जब हम छोटे थे तब पता नहीँ था कि मेरे पापा जो हमेँ इतना प्यार करते थे वे एक असाधारण प्रतिभाशाली व्यक्ति हैँ जिन्होँने अपने कीर्तिमान अपने आप बनाए  
और वही पापा जी, 
हमेँ अपनी नरम हथेलियोँ से , ताली बजाकर गीत सुनाते
और हमारे पापा,उनकी ही कविता गाते हुए हमेँ नृत्य करता देखकर मुस्कुराते 
हुए गाते थे
"राधा नाचे कृष्ण नाचे, 
नाचे गोपी जन !
मन मेरा बन गया सखी री सुँदर वृँदावन 
कान्हा की नन्ही ऊँगली पर नाचे गोवर्धन "
ये गीत पापा जी जब गाया करते थे तब शायद मेरी ऊम्र ४ या ५ बरस की रही होगी.....


११ फरवरी करीब आ रही है और पापा जी की फिर याद, बार बार् , मन को मसोस जाती है -
१९८९ की काल रात्रि थी ९ बजे थे और हम चारोँ, मैँ,मँझली, बडी बहन वासवी, मुझसे छोटी बाँधवी हमारे पति, (सबसे छोटा परितोष पूना गया था ) और अम्मा पापा जी के इन्टेन्सीव वोर्ड मेँ, खडे थे , जब्, अम्मा , पापा जी के,पैरोँ को सहला रहीँ थीँ और पापा अनवरत "प्रभु ...प्रभु " कुछ रुक रुक  कर बोल रहे थे। हल्की लकीर मुस्कान की भी थी उनके पान से रँगे होँठेँ पर ...हाँ पान, जो आखिरी बार टहलते हुएशाम के करीब ४.३० बजे , उसे, रास्ता पार करके, नुक्कड की दुकान से लाये थे 
अम्मा से कहा था,'सुशीला , तुम चाय बनादो , मैँ तुम्हारे लिये पान ले आता हूँ "
पिछले ७ दिनोँसे, पापा ने, अपना भोजन नहीवत्` कर दिया था - सिर्फ सँतरा मुसम्बी का जुसही पीते थे ! 
वो भी दिन मेँ बस २ बार , शाम ढलने से पहले ! अम्मा भी परेशान थीँ -मुझसे ३ दिन पूरे हुए तब शिकायत भी की थी, " लावणी पापा न जाने क्यूँ सिर्फ जूस ही पी रहे हैँ और बेटे, फल भी खत्म् हो गये हैँ !"
मैँने फौरन बात काटते हुए कहा,
"अम्मा, मैँ हमारे महराज जी को अभी भेजती हूँ ..कुछ तो मेरे पास हैँ उनका जूस पीला देना और वे और बाज़ार से लेते आयेँगेँ मैँ समझा दूँगीँ "
'खैर ! बात आई गई हो गई ..
पापा निर्माता निर्देशक श्री बी. आर. चोपडा जी की "महाभारत " टी.वी.सीरीझ के निर्माण से जुडे हुए थे और सारी प्रक्रिया मेँ आकँठ डूबे हुए थे॥
रोजाना मीटीँग्स्, सुबह ९ बजे से तैयार , निकलते और शाम देरी से लौटते ! 
फल भिजवाने के दूसरे दिन, मैं, शाम को अम्मा पापा जी के घर पहुँच गई ..देखा , पापा चाय सामने रखे,गुमसुम से पालथी लगाये, डाइनीँग टेबल की क्रीम नर्म चमड़े से बनी कुर्सी पर बैठे हैँ ! -ये बिलकुल साधु सँतोँ जैसा उनका पोज रहता था सूती मलमल की , धोती, उनके पैरोँसे लिपटी रहती थी,वो पैर जो हमेशा चलते रहे ..काम का बोझ सरलता से उठाये ॥
अम्मा किचन से आयीँ और छोटी स्टील और ताँबे की कडाही मेँ गेहूँ का शीरा तभी बना के लाईं थीं -
जिसे १ निवाले जितना पापा ने मुझे दिया , खुद खाया और बस्! खत्म हो गया !!
-अम्मा को नहीँ दिया गया ! शायद वो मेरे "परम योगी" पिता का अँतिम प्रसाद था ॥
३ दिन गुजरे इस बात को और पान लेकर पापा लौटे तब तक उन्हेँ बैचेन देख अम्मा ने मुझे फोन किया मैँ चप्पलेँ पैरोँ मेँ डालकर भागी ॥
पता नही क्या सोचकर रुपयोँका बँडल भी पर्स मेँ जल्दी से डाल दिया ! मुझसे छोटी बाँधवी अपने पति दीलिप के सँग डाक्टर को लेकर आ पहुँची
पापा ने बडी विनम्रता से उठकर सब का स्वागत नमस्ते से किया परँतु उन्हेँ दिल का सीवीयर दौरा पडा है ऐसा डाक्टर ने कहा तब हम सभी, कुछ घबडाये -तुरँत कार मेँ अस्पताल जाने को निकले ॥
अम्मा पीछे की सीट पे मेरे साथ बैठीँ थीँ और पापा जी ने अम्मा का हाथ अपने सीने से लगा रख था और वे "प्रभु " प्रभु " बोल रहे थे !
मैँने सोचा, ' अगर मामला सीरीयस होता तब वे अवश्य "राम राम" बोलते ॥ गाँधी बापू की तरह !! ॥  मेरे पापा जी को कुछ नही होनेका ..वे स्वस्थ हो जायेँग़े ..' सोचा,  अरे, परितोष को , उसकी ज़िद्द पे ही, कितने प्रेम से, पीठ सहला कर नयी गाडी लाने भेजा था उन्होँने !
परितोष कहता, "पापा आप भी नयी कार मेँ काम पर जाया करिये ना, सभी जाते हैँ !" और पापा मुस्कुरा के रह जाते ॥
वे तो अक्सर, दूरदर्शन, आकाशवाणी,अन्य शैक्षिकणिक सँस्थानोँ के आमंत्रणों पर, ट्रैन, बस या अक्सर पैदल ही मीलोँ बम्बई मेँ घुम आत थे !
इतनी सहजता से, मानोँ ये कोई मुशिकल काम ही नहीँ !! और पापा के असँख्य प्रसँशक, मित्र, सहकर्मी, बडे बडे कलाकार, साहित्यकारोँ का
घर पर ताँता लगा रहता  !
           ऐसे पापा अस्पताल पहुँचे तब हार्ट स्पेशीयालीस्ट१ घम्टे विलम्ब से आये ! :-( :-(...और, अम्म नो हाथ फेरा तो पापा ने उनकी ओर देखा और आहिस्ता से आँखेँ मूँद लीँ ! बस्स ! क्या हुआ इसका किसी को भान न था :-((
एक मेरे पति दीपक के सिवा ..उसने अम्मा को प्यार से कहा, " चलिये अब घर जाकर थोडा, सुस्ता लेँ अम्मा आप भी थक गयीँ होँगीँ "
और अम्मा अनमने ढँग से बाहर आयीँ और दीपक उन्हेँ बाँद्रा से, खार के घर ले गये. हम तब भी वहीँ खडे थे पापा को घेरे हुए ...
और एक दूजे से कह रहे थे ,आज मैँ रात पापा के पास रहूँगी , कल तुम रहना "
पापा जी की , नर्म हथेली सहलाते वक्त , उन्होँने मुझे ढाढस बँधाया था, " बेटा, सब ठीक हो जायेगा" जैसे वे हमेशा कहा करते थे 
पर ,अम्मा के जाते ही हम पर मानोँ सारा आकाश टूट पडा और धरती खिसक गयी जब नर्स ने रुँआसे स्वर से कहा " ही इझ नो मोर "...

पंडित नरेन्द्र शर्मा ' सम्पूर्ण रचनावली ' तैयार है।  कृपया अधिक जानकारी के लिए देखें : 
परितोष नरेंद्र शर्मा 
टेलीफोन : दूरभाष : 226050138
 ई मेल : panditnarendrasharma@gmail.com 

प्रेषक :  - लावण्या दीपक शाह