Tuesday, October 3, 2017

खिलती कलियाँ :

खिलती कलियाँ : ( बच्चों के लिए कहानी )
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यवनिका उठते गीत संगीत से शुभारम्भ : बच्चों के समवेत स्वर :
 " हम फूल हैं, हम फूल हैं, 
    हम फूल हैं इस बाग़ के - ( ३ ) 
     आओ....सब आओ , सब मिल कर गाओ , 
      इस जीवन में कुछ बन कर, इस देश का मान  बढाओ 
          आओ , आओ आओ आओ ....
             है देश हमारा प्यारा , इसे खुशहाल बनाओ 
              कुछ हैं पिछड़े , कुछ भूखे , इनका माथा सहलाओ ..
                आओ , आओ आओ आओ .... 
                 है काम बड़ा अब हमको, है आगे बढ़ते जाना 
                   बीती है समय की आंधी , फिर बाग़ नया लगाओ 
                      आओ , आओ आओ आओ ....
                          है भारत मेरा प्यारा, हम हैं तुझ पे बलिहारी 
                       यह  भूमि है स्वर्ग से प्यारी , इसे स्वर्ग से मधुर बनाओ 
                            आओ , आओ आओ आओ ....
                                    हम फूल हैं इस बाग़ के - ( ३ ) " 
सूत्रधार : 
बच्चों आज हम ज्ञान की विज्ञान की और आनंद और उमंग से भरी बातें करेंगें।  क्या आप सब तैयार हो हमारे संग एक लम्बे सफ़र के लिए ? 
भई, जर होंशियार हो जाओ ! वो  देखो , चाचा मस्ताना आ रहे हैं ! 
चाचा मस्ताना :"  आहा ! मेरे प्यारे बच्चों नमस्ते !
 मैं हूँ आपका चाचा मस्ताना ! आप सब का हमसफ़र  और दोस्त ! 
 मुझे बच्चों के संग रहना बहुत अच्छा लगता है ! मैं हमेशा 'मस्त' माने खुश रहता हूँ  इसलिए मेरा नाम है " मस्ताना " ! 
आप सब मुस्कुराते रहीये , खुश रहीये ...हां हां ऐसे  ही !  तकलीफों से, मुसीबतों से गभराना कैसा ? हम सदा, निडर रहें और आगे बढें ! आप सब हमारे प्यारे भारत देश की ' खिलती कलियाँ ' हों ! रंगबिरंगी फूलों सी कोमल  आपकी मुस्कान है !  आप सब को यूं मुस्कुराता हुआ देख कर मुझे बड़ी  प्रसन्नता हो रही है ! 
एक बालक : चाचा मस्ताना, चचा नेहरू अपने  सुफेदकोट में, लाल गुलाब का फूल  लगाते थे ना ? 
चाचा मस्ताना : अरे शाबाश ! खूब याद किया राकेश ! चाचा नेहरू को !
                     बिलकुल सही ! उन्हें बच्चे बड़े ही प्रिय थे ! वे भारत को खुशहाल, आबाद देखना  चाहते थे और गांधी बापू तो बच्चों के संग, बच्चा हो कर खेलने लग जाते थे !  तब गांधी बापू  कुछ समय  के लिए अंग्रेजों को भी भूल जाते थे। जिनसे आज़ादी हासिल करवाने का बड़ा काम किया बापू ने  ... 

कन्याओं के स्वर : " भरा समुन्दर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली , कितना पानी ? 
एक कन्या उत्तर देते कहती है : "  इतना पानी ..इतना पानी " ..
 आहा ! यहां मछली रानी आ गयी ..
   " मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है ,
      हाथ लगाओ तो डर जायेगी, बाहर निकालो तो मर जायेगी ! " 
 ( हाहाहा ...बच्चे तालियाँ बजा कर, किलकारियां लेते हुए ,  खूब हँसते हैं ...) 
चाचा मस्ताना :  " बच्चों , पानी से एक कहानी याद आ रही है.  सुनोगे ? 

एक समय की बात है।एक थे महा पुरुष " मनु " ! भारत भूमि  पर  प्राचीन काल था। मनु महाराज, ' कृतमाला ' नदी में स्नान कर रहे थे। उन्होंने ज्यूं ही पानी में हाथ डाला कि एक सुन्दर सी,  छोटी सी, प्यारी सी,  चमकते हुए रंगोंवाली एक मछली उनके हाथों में आ गयी !  उस रंगीन मछली को देखकर मनु महाराज  बड़े प्रसन्न हुए ! वे  उसे आपने महल में ले आये और एक कांच के बड़े से बर्तन में मछली को साफ़ जल भरवाकर उस में रख दिया और मछली तैरने  लगी तो उसे देख सभी बड़े प्रसन्न हुए। पर जानते हो आगे क्या हुआ ? वह मछली तो भई,  दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती ही चली गयी !तब मनु महाराज ने उस मछली को बर्तन से निकालकर, अपने महल के पास फैले एक  सुंदर सरोवर में रखा। पर  ये क्या !  वहां भी  वह मछली खूब बड़ी सी हो गई और बस फिर तो वह  बढ़ती ही  चली गयी ! मनु महाराज परेशान हो गए पर उनहोंने हिम्मत नहीं हारी  !  पुन: मछली को सरोवर से हटाकर उनके महल से दूर बहती हुई नदी में ले जाया गया। फिर दो दिन बीते और मछली तो अब अत्यंत विशाल  हो गई !  फिर तो वह नदी भी छोटी पड़ गई ! अब  तो मनु महाराज सेवकों की सहायता से मछली को विस्तरित सागर किनारे  ले आये !
बच्चों, उस चमत्कारी मछली की पूँछ और शरीर अब अतिशय विशाल हो गया था ! जानते हो बच्चों, ये मछली स्वयं भगवान महाविष्णु थे जो मत्स्य अवतार लेकर धरती पर अच्छे लोगों की रक्षा करने आये थे !
उन्होंने मनु राजा से कहा,
 
'  हे राजन ! आप का मन पवित्र है। मैं आपकी रक्षा करने आया हूँ। आप जगत के हर प्रकार के प्राणियों के जोड़े जैसे २ मोर, २ गैया, २ बंदर, २ भालू, २ शेरों को लेकर एक बडी सी  नौका पे  सवार हो जाइए। नौका को मेरे शरीर से बाँध लें।
आप सावधान होकर सुनें इस धरती पे अब प्रलय वर्षा होगी। आपकी नौका और उस मे सवार सारे प्राणी मुझ से बंधी नौका में सुरक्षित रहेंगें। मैं आप सभी की रक्षा करूंगा। " मनु महाराज ने यह सुनकर प्रणाम किया और भगवान की आज्ञा का पालन किया।
 
संत महात्मा महाराज मनु  ने मत्स्य के पीछे अपनी नौका बांध दी और जैसा भगवान् ने चेताया था धरती पर खूब वर्षा हुई ! हर तरफ  बाढ़  आई ! सारे प्रदेश डूबने लगे परंतु मनु महाराज की नाव को मत्स्य भगवान् की कृपा से, रक्षा का छत्र मिला और वे बच गये और उनकी नाव में सवार कई  तरह के प्राणी भी जीवित रहे ! 
एक बच्चा : सारी दुनिया डूब गयी ! हाय राम ! 
एक लडकी : मैं नहीं डूबूँगी ! मैं तो मेरे पापा के संग स्वीमींग करती हूँ ....
चाचा मस्ताना : अरे वाह ! बच्चों आप सब भी तैरना अवश्य सीखना, बड़े काम का है और व्यायाम भी है ! 
बच्चे समवेत : हां हां हम भी तैरना  सीखेँगेँ ..फिर हम नहीं डूबेंगें !    
चाचा मस्ताना : अच्छा बच्चों ये बतलाओ ,
                   पानी  पे झिलमिलाते सितारे देखे हैं आप ने ? 
कुछ बच्चे : जी हां चाचा मस्ताना , हमें ' तारे ' बहोत पसंद हैं ! 
एक बालक " मैं गाऊँ चाचा ? मेरे माँ ये गीत गातीं हैं  ...
" अले लल्ला लल्ला लोरी, दूध की कटोरी, दूध में पतासा, मुन्नी करे तमासा "  चन्दा मामा दूर के, पूए पकाए भुर के, आप खाओ थाली में,  मुन्ने को दें प्याली में " 
कुछ बालक : जगमग जगमग करते तारे, कितने सुन्दर कितने प्यारे ! 
                किसने सूरज चाँद बनाए ?  किसने काली रात बनायी ? 
                किसने  सारा जगत बनाया ? किसने ? बोलो किसने ? 
( मंच के परदे पे निहारिकाएं, तारा मंडल और ग्रहों, उप ग्रहों को घूमता हुआ द्रश्य दीर्घा पट दीखलायी देता है )
 " आओ , प्यारे तारे आओ, आकर मीठे सपन सजाओ,
 जगमग जगमग करते जाओ, हमें  अपना गीत सुनाओ " 
एक बड़ा सा प्रकाशमय तारा आकर रूकता है :
"  बच्चों क्या आप मेरी कहानी सुनोगे ?  मैं सदैव उत्तर दिशा में ही दिखाई देता हूँ और हमेशा  स्थिर रहता हूँ।  मैं ' ध्रुव तारक ' हूँ !  
एक बालक : हां मेरी स्कुल में सिखलाया था - आप तो " नोर्थ - स्टार " हो ! है ना? 
ध्रुव तारा : मुझे सब जानते हैं, मुझ से उत्तर दिशा को पहचानते हैं ! मेरी कहानी सुनाऊँ ? 
समवेत बच्चे : हां हां , सुनाईयेना ....
सूत्रधार का स्वर :
" एक समय की बात है , एक थे राजा जिनका नाम था ' उत्तानपाद ' जिनकी २ रानियाँ थीं !  एक थीं ' सुरुचि ' और दूसरी थीं ' सुनीति ' !
' ध्रुव ' सुनीति के पुत्र थे और उत्तम सुरुचि के !  राजा उत्तानपाद , उत्तम को बहुत प्यार करते। उसे गोदी में बैठालते पर ध्रुव को  ऐसा नहीं करते जिससे बालक ध्रुव के मन को दुःख पहुंचताथा।  
एक दिन की बात है।  राज सिंहासन पे माहराज उत्तानपाद , उत्तम को गोद में लेकर बैठे थे तो बालक ध्रुव भी वहां आया। 
ध्रुव : ' पिताजी ...पिताजी , मुझे भी बैठना है मुझे भी गोदी ले लो ना ! ध्रुव ने बड़े प्यार से अनुरोध किया। 
राजा उत्तानपाद : रूक  जाओ  ध्रुव ..देखो अभी तुम्हारा छोटा भैया यहां बैठा है ...राजा ने समझाते हुए ध्रुव से कहा।  
रानी सुरूचि :  " ध्रुव ! तुम बड़े हठी हो ! चलो भागो यहां से ...परेशान मत करो ...'फिर धीमे से वो बोली , ' अपने पिता जी की गोदी में बैठने के लिए तुम्हे नया जन्म लेना पडेगा ..हूंह ....'     
ये कड़वी बात को बालक ध्रुव ने सुन लिया और वह रूठ कर वहां से दूर चल दिया और जाते जाते फफक कर रोने लगा। 
अब ध्रुव अपनी माँ, रानी सुनीति के पास पहुंचा जो महाविष्णु की आराधना - पूजा करते आँखें मूंदें हाथ जोड़े हुए महाविष्णु की सुन्दर प्रतिमा के समक्ष बैठीं हुईं  थीं।  
अपने पुत्र की रूलाई के स्वर से माता सुनीति का ध्यान भंग हो गया। उन्होंने ध्रुव को बाहों में भर लिया और माथा चुम लिया और माँ उसे प्यार करने लगीं। 
ध्रुव रोते  हुए : "  माँ, माँ ...पिताजी मुझसे प्यार नहीं करते ! ...आज उन्होंने मुझे गोदी में नहीं बिठलाया , वे सिर्फ भैया को प्यार करते रहे ! ध्रुव ने रोते हुए कहा। 
माँ सुनीति : " मेरे बेटे, ईश्वर तुम्हे प्रेम करते हैं। साधारण मनुष्यों के स्नेह से ईश्वर के प्रेम की क्या तुलना होगी बेटे ! शांत हो जा ! "
माता सुनीति ने अपने पुत्र ध्रुव को महाविष्णु की प्रतिमा की ओर सम्मुख करते हुए बहुत सारा स्नेह जतलाया और कहा ' ये ईश्वर हैं बेटे, इन्हें  प्रणाम करो ' 
ध्रुव : ' माँ , मैं महाविष्णु से पूछना चाहता हूँ , क्या वे मुझे प्रेम करते हैं ? मैं जा रहा हूँ तपस्या करूंगा और प्रभू के दर्शन करूंगा ! ' 
सुनीति : ' अरे रूक जा मेरे लाल ! बेटे ध्रुव ! तू अबोध बालक है ! किस प्रकार ऐसी कड़ी तपस्या कर पायेगा !.. रूक जाओ पुत्र ! देखो यूं, हठ ना करो ...मैं तुम से प्रेम करती हूँ ...सच ! अब मान भी  जा बेटे ! ' 
माँ ने लाख समझाया परंतु, बालक ध्रुव ने एक ना मानी और महाविष्णु के दर्शन करने का प्रण करते हुए घोर तपस्या करने गहन वन में बालक ध्रुव चल दिया।
तपस्या करते महाविष्णु का नाम बार बार जपते हुए ध्रुव ने लंबा समय व्यतीत किया जिससे स्वयं ईश्वर महाविष्णु बालक ध्रुव की तपस्या और लगन  देख कर वे ध्रुव  के समक्ष एक दिन साक्षात प्रकट हो गये  और मुस्कुराते हुए महाविष्णु ने ध्रुव के माथे पर अपना हाथ रख दिया और प्यार से ध्रुव का माथा सहलाया।  
महाविष्णु :' पुत्र ध्रुव ! आँखें खोलो ..मैं आया हूँ और तुम मुझे,  सर्वाधिक प्रिय हो ! तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई है , मांगो क्या चाहते हो ?' 
ध्रुव ने प्रभू के कँवल जैसे सुन्दर व दिव्य चरण थाम कर अश्रू पूरित स्वर से कहा , 
' हे प्रभो , मैं आपके पास रहना चाहता हूँ ' 
महाविष्णु : ' तथास्तु पुत्र ! अब तुम्हारा स्थान उत्तर दिशा को प्रकाशित करते हुए, मेरे समीप सदैव  अचल रहेगा, तुम अमर रहोगे मेरे पुत्र ध्रुव ! ' 
चाचा मस्ताना : तो बच्चों, इस तरह उत्तर दिशा में " राजकुमार ध्रुव " तारक बन कर इस तरह स्थिर हो गये और आज भी ध्रुव वहीं हैं ! 
एक बालक : " चाचा जी, तब ध्रुव कितने यर्ज़  ( साल ) का था ?  " 
चाचा मस्ताना : अरे बेटे तपस्या करते हुए ध्रुव की उम्र थी बस पाँच साल की जब उसने इतनी कठोर तपस्या की थी ! अगर वह ५ साल का अबोध बालक ऐसी कड़ी तपस्या कर सकता है तो बताओ, स्कूल का होम - वर्क क्या भला कोई कठिन काम है ? आप सब अपना रोज का , स्वाध्याय = मतलब होम - वर्क, नियमित रूप से किया करो तब खूब तरक्की करोगे  और उसी से एक दिन बहुत बड़े इंसान बनोगे। तो बच्चों आप  मन लगाकर अपना काम करना। 
मेरे बच्चों ...सुनो , 
                    ' मेहनत से जो करते काम, जग में होता उनका नाम, 
                      परबत की छाती को फोड़, ऊपर जो है धारा आती ,
                       बाधाओं से लड़नेवाली, वह जीवन झरना कहलाती 
                       कलकल करती रहती हरदम, कभी नहीं करती आराम  
                       सात समुन्दर को कर पार, जो आता लेकर आलोक,
                       उस सूरज को किसी मोड़ पर, अन्धकार न सकता रोक !
                       आता लेकर सुबह सुहानी, जाता हमें दे कर मीठी शाम। 
                        कितनी छोटी ये चींटी रानी, पर हैं बडी लगन की पक्कीं,
                        हो गर्मी सर्दी , बरखा हर दिन चलती रहती जीवन चक्की 
                        उनके काम के आगे भारी भरकम हाथी हो जाता नाकाम ! 
                        मेहनत से जो करते काम, जग में होता उनका नाम .... " 
चाचा मस्ताना : अच्छा बच्चों अब बतलाओ, आपको कौन से खेल पसंद हैं  ?
                    बबलू     ..आप बताओ . 
बबलू : ' मुझे तो लुका छिपी सबसे अच्छी गेम लगती हैं ! 
चाचा : खूब कही बबलू जी ! हम भी खूब खेला करते थे पर अब तो चाची, हमें पकड कर ' आऊट ' कर देतीं हैं !  अच्छा अब आगे सुनो, एक दिन एक बहादुर बच्चे को उसके दुष्ट पिता ने  चोरी - छिपे   भगवान की पूजा करते हुए देख लिया था। 
कुछ बच्चे : कौन था वो बालक चाचा जी ? 
मस्ताना : एक समय की बात सुनो, एक था राक्षस - उसका नाम था हिरण्यकश्यपु ! वह दुष्ट बड़ा ही बलशाली था।  वह बड़ा घमंडी था।  अपने बाहुबल के कारण वह मनमानी करने लगा।  भगवान के नाम स्मरण से वह चिढ जाता और उस दुराचारी ने पूजा - पाठ ही बंद करवाने का  हुक्म दे दिया ! वह दुष्ट और घमंडी कहने लगा 
' मुझे प्रणाम करो ! ईश्वर कोई नहीं हैं ! बस मेरा ही सब ध्यान धरो " 
एक बालक : मेरी मम्मी उसकी बात कभी नहीं मानतीं 
                 वो तो रोज कृष्ण जी की पूजा करतीं हैं ! 
दूसरा बालक : मेरी मम्मी गिरजाघर जातीं हैं।  मोमबतियां जलातीं हैं 
तीसरा बालक : मेरी अम्मी रोजाना नमाज पढ़तीं  हैं ....
चौथा बालक :  हम गुरूद्वारे जाकर " वाहे गुरु दा खालसा जपते हैं जी ! " 
पांचवा बालक : मेरी मम्मी पापा और मैं, ' अगियारी ' जाते हैं। हम अग्नि देव                                   की पूजा करते हैं।  
चाचा मस्ताना : बच्चों, रास्ते अलग अलग हैं पर भगवान एक हैं ! यूं  समझ लो एक                     सुंदर बाग़ है जिस बाग़ के बीचों बीच एक  सुंदर पानी का फव्वारा है।                    अलग अलग रास्तों से चलकर हम सब वहां फव्वारे के पास पहुँचते हैं।                        पानी पीते हैं और अपनी प्यास बुझाते हैं।  हाँ अब कहो ,                                        ' पानी ' तो  एक सा  ही रहेगा न ?  जिस किसी रूप में आप सब                            को परम पिता ईश्वर पसंद हों उन्हें पूजो।  ईश्वर ही हमें सत्य का                         रास्ता दिखलाते हैं। उसी सत्य के रास्ते पे चलना सीखना मेरे बच्चों  !  
बच्चे : हां चाचा जी , फिर आगे क्या हुआ ? कहानी तो अधूरी रह गयी ! 

चाचा मस्ताना : हां तो उस दुष्ट राक्ष्स  के घर, एक सुंदर , नन्हा सा, कोमल सा, भोला भाला,  बालक ' प्रहलाद ' पैदा हुआ जो जन्म से ही सदा  हरिनाम ' हरि ' हरि ' जपा करता था और ईश्वर का नाम लिया करता ! 
  ' बालक प्रहलाद ' की भक्ति से उसके पिता ' हिरण्यकश्यपु ' नाराज होते रहे। उस निर्दयी ने अपने ही फूल से कोमल बालक को, पहाडी से नीचे फिंकवा दिया पर प्रभू ने प्रहलाद की रक्षा की और प्रहलाद बच गया ! 
             " जाको राखे सांईया, मारी सके न कोई " ये सच हुआ ! 
कुछ बच्चे : कैसा दुष्ट था ये राक्षस ! हाय ! 
चाचा मस्ताना : अब तो बच्चों, उस दुष्ट राक्षस का क्रोध और अधिक बढ़ गया।  उसने अपनी बहन प्रहलाद की बुआ ' होलिका ' को बुलवाने सेवकों को भेज दिया। वो आयी ! इसे प्रभू से वरदान मिला था कि, अग्नि से वह नहीं  जलेगी। तो वह दुष्ट बुआ होलिका, प्रहलाद को गोदी में लेकर आग के भीतर जाकर  बैठ गयी ! पर आश्चर्य ! प्रहलाद का बाल भी बांका न  हुआ और यही  होलिका धू - धू करती हुई आग की प्रचंड लपटों में जल कर भस्म हो गई  ! इस दारूण घटना को देखकर, भगवान जी को भी क्रोध आ गया ! शेर का मुख धरे, आधे सिंह और नीचे बलवान पुरुष का रूप लिए, भगवान नरसिंह स्वरूप लेकर प्रकट हुए ! हिरण्यकस्यप के राजमहल के एक खम्भे को चीर कर नरसिंह बाहर निकले और जोर से चिंघाड़े ..तो दसों दिशाएं भी भय  से थर थर कांपने लगीं !
भगवान नरसिंह : ' हे पापी  हिरण्यकस्यप ! अब तेरा अंतकाल आया ! 'और उसी क्षण अपने शेर के रूप लिए, तीखे नुकीले नाखूनों से, नरसिंह भगवान ने उस गंदे राक्षस को मार दिया ! तब, प्रहलाद ने आकर नरसिंह भगवान की स्तुति की तो भगवान् शांत हुए और अपने चतुर्भुज स्वरूप में आकर नरसिंह भगवान ने अपना असली सुन्दर कल्याणकारी स्वरूप दिखलाया।  वे ' महाविष्णु ' स्वरूप में चतुर्भुज रूप में  निर्मल, मधुर स्मित लिए प्रकट हुए  और उन्होंने प्रहलाद को ' राजा ' बना कर सिंहासन पर बैठाल  दिया। 
समवेत बच्चे : हे  ! हे !! हम भी राजा बनेंगें ....हम भी राजा बनेंगें ....
सूत्रधार :
चाचा मस्ताना बच्चों को लेकर एक उड़ने वाली कालीन पे जा खड़े हुए तो वह
 उड़ने लगी और अब वह भारत से आगे पश्चिम दिशा में उड़ चली।  
चाचा : अरे ! ये हम कहाँ आ पहुंचे ? बताओ बच्चों, हम कहां हैं ?  
बच्चे : ( नीचे झांकते हुए ) ये तो अरबस्तान लग रहा है चाचा जी ....... 
घूँघरूओं की , दिलरुबा की और मुरली जैसे सुरीले वाध्य यन्त्रों के स्वर सुनायी दीये और बच्चों ने देखा कि, रेत ही रेत बिछी हुई थी और ऊंटों के काफिले गुजर रहे थे।  खजूर के पेड़ों से कहीं कहीं हरियाली भी थी जहां चश्मों का पानी बह कर नन्ही झील बनी हुई थी। 
चाचा : बच्चों, यहीं पर हजरत मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था उन्होंने इंसानियत को इस्लाम का पाक पैगाम दिया था और कुराने शरीफ भी यहीं की सरज़मीन से आयी है। वे फ़रिश्ते थे जिनके पैगाम ने हज़ारों लोगों को अमन चैन का रास्ता दीखलाया !
' अय खुदा.. . तू है कहां, हम तेरे बंदें हैं , 
ये आसमां तेरा है सारा , ये नूर तेरा है  -
 अय खुदा ...अय खुदा ...
अय खुदा हम तेरे दामन में हैं पले, 
तेरी बदौलत , हम सभी , तेरा नाम लेकर चले 
अय खुदा ....अय खुदा  ...." 
एक बालक : मैं ईद के चाँद को देख कर खुश होता हूँ बड़े अब्बू को सलाम करता हूँ   मौलवी चाचा के साथ इबादत करता हूँ ! 
मौलवी : शाबाश मेरे बच्चे ..खुश रहो ...फूलो फलो ...
सूत्रधार : 
अरे ये चाचा आगे बढ़ते तेजी से कहाँ चल दीये ? अब कौन देस पहुंचे जनाब ?

चाचा : ये लो हम आ पहुंचे ' येरूस्शालेम ! ईसा की भूमि ! यहीं वे पैदा हुए थे 
ज़ोन, तुम  बतलाओ, ईसा माने जीज़स क्राइस्ट ! उनके बारे में कुछ बतलाओ हाँ जॉन कहो ...कहो, शरमाओ नहीं ...

ज़ोन : ईसा मसीह मुझे बहुत प्यारे लगते हैं। उन्हें सलीब पर देख मेरी आँखें भर आतीं हैं। ईसा मसीह, माता मरीयम के बेटे थे। ईसू ने भाईचारे व प्रेम का पाठ पढ़ाया था।  हमारी ' बाईबल ' में बहुत सी सुंदर कहानियां हैं। सुनोगे एक कथा ? लो सुनो 
 ' एक समय की बात है। .. एक बार, एक बीमार आदमी, सडक पर, थक कर गिर पडा ! वहां से एक सेठ गुजर रहे थे उन्होंने इस बीमार को देखा पर उन्हें दया नहीं आयी और वे उस बीमार आदमी को अनदेखा कर वहाँ से दूर चले गये। 
इसी तरह कई  सारे लोग आये और किसी ने भी मदद नहीं की और सब चले गये। कुछ देर बाद, वहां से एक गरीब आदमी गुजरा। वह बीमार आदमी के नजदीक आया। उसे सहारा देकर बैठाया, पानी पिलाया और अपनी रोटी तोडकर उसे खीलायी। फिर उस बीमार के घावों को साफ कर, इन घावों पर पट्टी भी बाँध दी तब वह बीमार स्वस्थ लगने लगा और उठ कर खड़ा हो गया ! रास्ते पर जो राहगीर लोग थे वे चकित होकर देखने लगे तो ! वहां  प्रकाश की किरणें छाने लगीं और वही  बीमार आदमी खुद, भगवान बन गये ! उस गरीब आदमी का हाथ पकड़ कर वे उसे अपने संग ' स्वर्ग में माने ' हेवन ' में ले गये !
चाचा : अरे वाह ज़ोन बड़ी उम्दा कहानी सुनायी तुमने ! इस कथा को  " ध गुड समारीटन " कहा है धर्म ग्रन्थ बाईबल में !
तो बच्चों इस कथा से हमें ये सबक मिलता है कि, हमेशा हमसे जो भी बन पड़े, हर किसी जरूरतमंद की सहायता  करें ! जो हमसे कमजोर है उन पर दया भाव रखें ..
सुनो , 
         ' मिलजुल कर हम काम करें तो, कोई काम कठिन नहीं रहता 
            एक दूजे का हाथ बंटाएं तो कोई मुश्किल काम नहीं रहता ! 
           क्यों बच्चों, सही कह रहा हूँ ना ? 
एक लडकी : गुरप्रीत , क्या इस राखी पे मैं तुम्हें राखी बाँध सकती हूँ ? 
गुरप्रीत : हां बहना ,  जरूर बाँधना ! मैं तेरी रक्षा करूंगा ...
             मेरी लाडली बहना के लिए जान भी  कुरबान है ..
लडकी : ना ना मेरा वीर, मेरा भईया, सौ साल जीये  ...खूब मज़े करे 
             मेरा भाई बड़ा बलशाली है भईया ...भईया ....
             है बहन बांधती राखी जिसको, वही उसका सच्चा भाई 
             हर मुश्किल में आकर सहलाता, वही है मेरा प्यारा भाई
             भैया मेरे, मेरे गहना, देखूं मैं तुझे हरदम यूं  मेरे अंगना   
             आया सावन झूला लेकर, भैया घर तेरे, मेरे सूना  रे अंगना ' 
बच्चे : झूला हमें कितना प्यारा लगता है जिस बच्चे ने झूला नहीं झूला हो उसका कैसा बचपन ! 
चाचा : झूला झूलते हमें न भूल जाना ! 
बच्चे : नहीं चाचा, हम आपके दोस्त हैं  ! आपको कभी नहीं भूलेंगें न ही छोड़ेंगें ! 
चाचा " बेहराम ,बेटे, थक गये हो क्या ? तुम भी कुछ बोलो न ..
बेहराम : मैं हूँ पारसी ..भारत भूमि पर हमारे पडदादा ईरान से आये थे और भारत में घुलमिल गये। पारसी लोग गुजरात प्रांत के ' संजाण ' नामके बंदरगाह पे, उतरे थे। 
एक छोटी बच्ची : बंदर ? कहाँ है बंदर ? 
चाचा : अरे छुटकी! बंदरगाह का मतलब है समुद्र किनारे जो धरती सागर से मिलती है वह सागर का किनारा बंदरगाह कहलाता है।वही जहां बड़ी बड़ी नाव किनारे आतीं हैं।  
तुतलाकर : मैं बोट में एक बाल पानी में घूमने गयी थी ...
दूसरी : हां ...ऐसे ही एक बोट आयी थी उसकी कहानी बेहराम सुना रहा है अब सुनो 

बेहराम : ' संजाण के राजा ने दूध से भरा कटोरा, पारसी भाईयों के पास भेजा मतलब  था कि मेरा नगर इस लबालब भरे  हुए कटोरे की तरह लोगों से भरा हुआ है  इस में जगह ही नहीं ! तब हमारे गुणी दादाओं ने उसी दूध से भरे कटोरे में थोड़ी चीनी मिला दी !  मतलब उनका जवाब था कि, ' हम दूध में शक्कर  घुल जाती है उस तरह , घुलमिल कर रहेंगें। '
एक बच्चा : देखूं क्या तू भी शक्कर जैसा मीठा है क्या बेहराम ? काटूं तुझे ? 
चाचा : अरे भाई अब हल्ला गुल्ला मत शुरू कर देना !  बेहराम शाबाश बेटे -शाबाश 
 अच्छा अब यह कथा सुनो !
 एक थे बालक अष्टावक्र!  नहीं सुना उनका नाम ? वे थे एक ऋषि के पुत्र ! अष्टावक्र के पिता बड़े ही विद्वान और महात्मा थे। अब अष्टावक्र का नाम ऐसे क्यूं रखा गया था पता है क्या ? नहीं ? कोई बात नहीं।  चलो मैं बतलाता हूँ क्योंकि, उस कुमार का शरीर आठ जगह से वक्र माने टेढा मेढ़ा था! पाँव,हाथ, कमर, गरदन, मूंह वगैरह ..कई लोगों को इसी तरह बीमारी के  कारण शरीर ऐसे टेढ़ा हो जाता है !
बच्चे : हाय बेचारा अष्टावक्र ! 
चाचा : न न ...वह बेचारा नहीं था , वह था अष्टावक्र परम ज्ञानी ऋषि कुमार ! 
 
एक दिन महाराज जनक  के राज दरबार  में अष्टावक्र आ पहुंचा। उसे देख कर पहले तो सब हंसने लगे। कुछ बुरे और शैतान लोगों ने अष्टावक्र का मज़ाक भी उड़ाया पर बच्चों परम् ग्यानी बालक अष्टावक्र शांत ही  रहा।  
फिर उसने ऐसी ज्ञान ,विज्ञान की बातें सुनाईं तो सभा में जितने भी  लोग जमा हुए थे सब चकित रह गए ! अष्टावक्र के ज्ञान पूर्ण बातों को सुन सब सन्न रह गये !
बड़े बड़े पंडितों को बात करते हुए अष्टावक्र ने जो  प्रश्न पूछे उन के  उत्तर उन भरी सभा में बैठे किसी भी पंडित को नहीं मालूम थे !  
तब शर्मिंदा होकर बड़े लोगों ने  जनक राजा के दरबार में बैठे बड़े बड़े पंडितों ने, सब ने अपनी  हार मान ली और अपने अपने कान पकड़े और जनक राजा ने और सभी ने उठकर  अष्टावक्र को आदर सहित सर झुकाकर प्रणाम किया और उस वीर ज्ञानी बालक का बहुत सन्मान किया। 
तो बच्चों, किसी के आँख न हो, कान न हो, हाथ, पाँव न हों या किसी के शरीर  के अवयवों में कमी को , कोई कमजोरी हो उनका कभी मज़ाक नहीं करना!
किसी की कमज़ोरी का मज़ाक उड़ाना  ये  बहुत बुरी बात है ! 
कई  फूल खिलने से पहले मुरझा जाते हैं ..समझे ना ? 
चाचा : गांधी बापू किसी को छोटा या बड़ा नहीं मानते थे सब के साथ एक सा व्यवहार किया करते थे। किसी का काम ऊंचा नहीं किसी का नीचा नहीं ! 
तो बच्चों, कोइ ऊंचा नहीं कोइ नीचा नहीं है !
एक लडकी : चाचा जी , मैं ' फ्लोरेंस नाईटिंगेल " की तरह नर्स बनना  चाहती हूँ और मेरे देश के सैनिकों को घाव लगेगा तो मैं उनकी सेवा करूंगी। 
सुनिए ये गीत ..
              " चाह नहीं  मैं , सुरबाला के घनों में गूंथा जाऊं , 
                 चाह नहीं प्रेमी माला में बींध प्यारी को ललचाऊँ 
                 मुझे तोड़ लेना वनमाली , उस पथ पर तुम देना फेंक 
                 मातृभूमि पर शीश चढाने , जिस पथ जाएँ वीर अनेक 
                      जिस पथ जाएँ वीर अनेक ...." 
एक लडका : चाचा मेरे बापू , खेती करते हैं।  वे  एक किसान हैं। मैं भी किसान बनूंगा  लड़का गीत गाने लगता है ~
"
 एय किसान गाये जा, प्यारे हल चलाये जा , आज धूप तेज है , 
  पर तुझे खबर कहाँ ? चल रही है लू चले, तुझको उसका डर कहाँ ? 
 एय किसान गाये जा....गाये जा....   गाये जा....   गाये जा....   " 
चाचा : बच्चों हमारा राष्ट्र गीत रवीन्द्रनाथ टैगौर ने लिखा है एक बार जब वे तुम्हारी तरह छोटे थे तब जिद्द करने लगे कि ' वो जिस पेन से लिखेंगें उस में नीली स्याही नहीं बल्के, फूलों का रस भरा जाएगा ! उनके चाचा जी ने बच्चे का मन रखते हुए ऐसा ही किया।कुछ  फूलों से रस निकाला गया और पेन में भरा गया पर अरे , धत्त तेरे की ...फूलों के रस से तो  कुछ लिखा ही न गया !   

बच्चे : जन गण मन अधिनायक जय हे ये राष्ट्र - गीत उन्हीं ने बड़े होकर लिखा है न ? पर  चाचा जी अभी हमारी बातें ख़त्म नहीं हुई अभी ये गीत हम नहीं गाएंगें हम तो आप से और कहानियां सुनना चाहते हैं चाचा मस्ताना ! कुछ और सुनाईये ना ! 

चाचा मस्ताना : बच्चों समय भागा जा रहा है। अब ये आख़िरी कहानी सुनाता हूँ।  भारत देश का नाम कैसे पडा जानते हो ? नहीं ? तो ध्यान से सुनो !  
एक थे राजा दुष्यंत उनकी पत्नी थीं शकुन्तला उन्हीं का बालक था वीर ' भरत ' वह बचपन में, सिंहों के साथ खेला करता था ...  
हमारे भारत देश में, गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा जैसी महान नदियाँ हैं ! उन्नत शिखर उठाये हिमालय की परबत मालिका हैं  और सह्याद्री, सतपुडा और विन्ध्याचल से परबत हैं !
इसी भारत भूमि पर  श्री राम, श्री कृष्ण के रूप में स्वयं भगवान अवतरित हुए हैं और उन्हीं सा मधुर बचपन हमारे देश के बच्चों का हो ! ये हमारी प्रार्थना है। हमारे भारत देश की हर माता बड़े प्यार, दुलार से फूलों की तरह सम्हाल कर अपने शिशुओं  को पालती पोसतीं हैं !
सच बच्चों , हमारे धन्य भाग्य है कि इस भारत - वर्ष में हम 
साथ साथ मिलजुल कर स्वतन्त्र भारत में रहते हैं। बच्चों हमें भारत को  एक सशक्त और गौरवशाली देश बनाना है। हम भारत माँ की सदैव सेवा करें ! हम भारत को अब कदापि पराधीन न होने देंगें ! आगे बढेंगें, हम  मिलजुल कर  बड़े बड़े काम करेंगें। ऐसे काम करना कि तुम्हारे माँ पिता का सर ऊंचा हो जाये ! 
                      समवेत स्वरों में गीत :
      " तुम में हिम्मत है पहाड़ों की, तुम में ताकत है हवाओं की 
                तुम मीठी बातें बोलोगे, जग को प्यार से जीतोगे 
                यह भारत अपना देश है, तुम भारत का  नया सवेरा हो 
भारत के स्त्री एवं पुरुष : हम तो पीछे रह जायेंगें , 
                                तुम को आगे जाना होगा 
                              आगे बढना यह नारा है,
                              भारत हमको प्यारा है 
                               जगती के भू मंडल पर
                             ये दमकता हुआ सितारा है 
                                 
                             हम भारतीय ! हम भारतीय  !
                                हैं भारतीय हम भारती ! 
                                 मातृभूमि के चरणों में
                                 कोटि वंदन हमारा है !

Monday, September 18, 2017

एक पल : सर्वनाश से पहले (अंतरिक्ष नाटक) - लावण्या शाह

एक पल : सर्वनाश से पहले(अंतरिक्ष नाटक) - लावण्या शाह
पात्र: 
सूत्रधार
तीन साहसी बच्चे- 
तूफान टक्कर (तूफान)
लाल लगाम (लाली)
छोटा राजा
खलनायक-
पाताल पापी
तीन वैज्ञानिक-
डा शिव
डा गिरधर
डा बूमक
एक सिपाही
(धरती की भीतरी सतह का दृश्य)
(सूत्रधार) - तूफान टक्कर, विल स्कारलेट और छोटा राजा धरती के भीतरी कोर में कैद हैं और एक बम, इस उपग्रह को विनाश के रास्ते ढकेलने के लिये आगे बढ रहा हैं।

पाताल पापी : "होशियार! यह छोटा विमान।

लाल लगाम : एक बात पक्की है, जिस किसीने भी हमें यहाँ पर बुलवाया है, वो हमसे मिलने नहीं आया। अरे! यहाँ पर तो सारा वीराना ही वीराना है।

तूफान टक्कर : (चौंक कर) "मैं सोच रहा हूँ कि कैसे..." (फिर चौंकता है) "अरे! संभलो।"
पाताल पापी : इस भूगर्भ में, आपका स्वागत है! (बात जारी रखते हुये) आशा है कि आपकी यात्रा सफल रही!"

तूफान टक्कर : आप कौन हैं?"

पाताल पापी: मैं, इस भूगर्भ का मालिक कहलाता हूँ!"

तूफान टक्कर: (स्वत: सोच में) भूगर्भ का मालिक?? यह नाम तो कुछ जाना-पहचाना सा लगता है!

पाताल पापी: "आप खामखाँ मेरी तारीफ कर रहे हैं!"

तूफान टक्कर: "याद आया! तुम्ही तो वे छाँटे हुए पागल इन्सान हो, जिसने, इस पृथ्वी को हथियाना चाहा था! पर जब तुम्हारी क्रान्ति निष्फल हो गयी तब तुम नदारद हो गये! अच्छा, अब यहाँ डेरा जमाये हो!"

पाताल पापी: (गुस्से से आवाज ऊँची हो जाती है) पागल, और मैं? सब मेरी जान के पीछे पड़ गये थे और मुझे इस भूगर्भ में आना पडा। पर मैं बदला लेकर ही रहूँगा।"

तूफान टक्कर : "अच्छा, यह बात है। बदला किस तरह से लोगे भला?"

पाताल पापी : (दुष्ट सी मुस्कान लिये) "आओ! बतलाता हूँ तुमने मॅग्नियम धातु का नाम तो सुना होगा? चम्मच भर मग्नियम एक पूरे शहर का विनाश कर सकता है। इस ग्रह से, एक छोर पर, मैंने, इस धातु का एक विशाल जत्था मौजूद पाया है हाँ इतना सारा है कि यह पूरा सौर मंडल धूल में मिल जाएगा। मुझे इस खनिज मग्नियम से धमाका लगाने भर की देर थी "

तूफान टक्कर : "और वे गुमशुदा वैज्ञानिक! एक एक अणु शक्ति विस्फोट के क्षेत्र में, कमाल हासिल किये हुये "

पाताल पापी: "बिलकुल सही याद किया। वे मेरी बात मानने पर राजी ही नहीं थे। इसीलिए, उनका सारा ज्ञान, इस कम्प्यूटर में, कैद कर लिया है। बस अब मुझे इसे तोड देने की शृंखला को, बटन दबाकर कर, शुरू करना पडेगा ! और सब खत्म और जब यह सुइयाँ, १२ के आँकडे पर पहुँचेंगी, तब इस धरती का विनाश हो जायेगा...हा...हा...हा...हा..."

तूफान टक्कर : "और साथ-साथ, तुम्हारा भी।"

पाताल पापी: "क्यों क्या मुझे सौ प्रतिशत पागल समझ रखा है? यह छोटी रेल देख रहे हो ना, वह मुझे धरती की ऊपरी सतह तक और वहाँ से ऊपर अंतरिक्ष की ओर ले चलेगी।"

तूफान टक्कर : ( अपने साथियों से) "हमें किसी भी तरह बच निकलना है!"

लाल लगाम : तुम्हारे दिमाग में कोई तरकीब सूझ रही है क्या?"

तूफान टक्कर : "जब छत गिरने लगे, तब भाग निकलो..."

लाल लगाम : (न समझते हुये) "क्या कहा?"

पाताल पापी: "मैंने सब सोच रखा है! बस घंटे भर में, यह दुनिया जिसने मेरा तिरस्कार किया था, वह मेरे बदले की आग में जल उठेगी। और मैं? मैं सही सलामत अंतरिक्ष की ओर उड चलूँगा। अरे क्या कर रहे हो...कौन?"

छोटा राजा : "माफ करना मैं सह-यात्रियों को अपने संग नहीं ले चलता।"

सूत्रधार : तूफान टक्कर, लाल लगाम और छोटा राज एक रहस्यमय घटना में घिरे हैं - - तीन, तीन महान विज्ञानिकों के लापता होने की रोमांचक घटना की छान-बीन कर रहे थे कि अचानक वे एक भूकम्प के चंगुल में फँस गये और धरती के भीतर धँस गये -- अब आगे सुनिये,"

लाल लगाम : "कोई फायदा नहीं! हम इस खड्ड के ऊपर नहीं जा पाएँगे।"

तूफान टक्कर : "लगता है कि किसी प्रकार के चुंबकीय क्षेत्र में हम लोग फँस गये हैं। होशियार! अपने आप को सँभाले रहो। हम पानी में छलाँग लगाने वाले ही हैं अब!

(लाल लगाम की आवाज पानी की सतह से ऊपर चीखती हुयी पुकार सी सुनायी देती है) - "अरे यार, यह तो कोई भूगर्भ नदी है, और हम तेज धारा में बहे जा रहे हैं।"

तूफान टक्कर : तैरने के लिये तैयार हो जाओ। हमारा यान और थपेड़े सह न पायेगा। यह यान बस अब टूटने वाला है।

लाल लगाम : जब छोटा था तब सोचा करता था कि तैरने में बडा मजा है!"

तूफान टक्कर : वे भूकम्प के झटके, धक्के, किसी दुर्घटना की वजह से पैदा नहीं हुए थे। जिस किसी ने भी उन तीन वैज्ञानिकों का अपहरण किया था, उसी ने अब हम लोगों के लिये भी, बुलावा भेजा है।"

छोटा राजा : "एक बार पता कर लूँ कि वो कौन पाजी है, फिर तो उसकी गर्दन होगी और मेरे हाथ।"

तूफान टक्कर : "मेरा अंदेशा यह है कि वही हमें ढूँढ लेगा।"

लाल लगाम : "मैं पहले कभी, किसी उपग्रह की भीतरी सतह तक गया नहीं।"

तूफान टक्कर : "तो बस यही आरजू रखो कि हम उपग्रह के भीतर नहीं, बाहर ही रहें।"

छोटा राजा : "यह जगह देख कर, मुझे तो कँपकँपी आ रही है। तूफान, सम्भलो!"

पाताल पापी: "कोई बात नहीं। यह लोग और कहीं नहीं जायेंगे।"

तूफान टक्कर : "अहा! रास्ता खत्म!"

लाल लगाम : "मैं जानता हूँ छोटे राजा कि तुम्हारा इरादा नेक था पर तुमने यह गलत सुरंग चुनी।"

पाताल पापी: "मेरे दोस्तों! तुम्हारी कामयाबी बस इसी बात में है कि तुमने तमाम दुनिया के सर्वनाश को तेजी दे दी। अल्विदा!"

(पागलों की तरह हँसता है)

छोटा राजा : "अब क्या करें तूफान?"

तूफान टक्कर : "काश मैं इस सवाल का जवाब दे पाता।"

सूत्रधार : "सच है, अब क्या हो? क्या तूफान, लाल लगाम और छोटा राजा इस भूगर्भ - कैद खाने से निकल पाएँगे? क्या वे इस पृथ्वी को सर्वनाश से बचा पाएँगे?"

तूफान टक्कर : ऊपर लाल लगाम! ऊपर खींचो!

लाल लगाम : "नहीं खींच पा रहा। मैं पूरी ताकत आजमा रहा हूँ पर यह हिल भी नहीं रहा।"

सूत्रधार : "क्या लाल लगाम, छोटा राजा और तूफान टक्कर इस भूकम्प के बाद भी बच निकलेंगे? और अगर बच भी गये तब क्या वे भूगर्भ के मालिक के हाथों पकड़े जायेंगे?"

तूफान टक्कर : "जी हाँ जनरल साहब! मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ और इस मामले में अवश्य कुछ करना चाहूँगा। छोटे राजा, एक अंतरिक्ष यान तैयार करो। पृथ्वी हमारा लक्ष्य रहेगी, चलने की तैयारी करो।"

छोटा राजा : (खुशी में मुस्कुराते हुए) मैं जानता था कि तुम यही कहनेवाले हो।

लाल लगाम : एक सवाल है - हम पृथ्वी पर जासूसी करने चलेंगे तो क्या हम गिरफ्तार नहीं हो जाएँगे?

तूफान टक्कर : "याद करो, जब छोटे राजा को जबरदस्त चोट लगी थी - - (अपना अँगूठा और उँगली दिखाते हुए) मौत से बस इतनी सी दूरी थी। और तब, तो डॉ. बूमक ने कोई सवाल नहीं किया था। (वही वैज्ञानिक, जो आज लापता है) उन्होंने एक गैर-कानूनी मुजरिम की जान बचाने के लिये अपने जान की बाजी लगा दी थी। और उसी वक्त हमने यह कसम खायी थी कि उनकी अच्छाइयों का बदला हम अवश्य देंगे।"

लाल लगाम : मैं तुम्हारी बात समझता हूँ, तब चलो, चलें

पाताल पापी: "अब बोलो मुझसे बात करो " (तभी कम्प्यूटर की आवाज बीच में सुनाई देती है )

कम्प्यूटर का स्वर : "यह कार्य पूरा हुआ। सुझाव है, दुबारा सारी प्रणाली की जाँच करें।"

पाताल पापी: बहुत बढिया मेरी जान! धन्यवाद! और सज्जनों आपका भी शुक्रिया। आपने अपने, वैज्ञानिक दिमाग का इस्तेमाल किया, उसका भी शुक्रिया।

(भयानक, भद्दी हँसी हँसते हुए उसकी आवाज विलीन हो जाती है)

लाल लगाम : "हम पृथ्वी के वातावरण में, प्रवेश कर रहे हैं।"

तूफान टक्कर : "इस नक्शे के हिसाब से, बम-विस्फोट-प्रयोग का स्थान है - - शून्य तीन शून्य! सौ फिसदी सच है लाली। जितनी ताकत हो लगा दो।"

एक पुरूष स्वर : "मेरे मालिक, एक अनजाना अंतरिक्ष-यान, आधुनिक-बम-विस्फोट के स्थान के करीब पहुँच गया है।"

पाताल पापी: "अच्छा! एक्स-रे, स्कैनर और रडार से सम्पर्क करो।"

छोटा राजा : "काश डॉ.बूमक और दूसरे दोनों इन्सान अब भी जीवित हों!"

तूफान टक्कर : "अगर जिंदा हुए तो मैं अवश्य उन्हें खोज निकालूँगा।"

पाताल पापी: (दुष्टता से मुस्कराते हुए) "हाँ, हाँ, अवश्य खोज निकालोगे तुम, उन्हें मेरे यार! मैं वही तो कोशिश करूँगा! मुझे भी बखूबी आता है उनसे किस तरह पेश आना चाहिए जो दूसरों के कामों में टाँग अड़ाता है।"

पाताल पापी: (अपने आदमी को आज्ञा देते हुए) "अंतरिक्ष यान का पीछा करो और भूकम्प के झटके देनेवाली मशीन को तैयार करो! साथ-साथ, चुम्बकीय खिंचाव के प्रवाह को भी शुरू करो। (मुस्कुराते हुए) हमारे घर, मेहमान आने ही वाले हैं!"

तूफान टक्कर : "लाली, देखो तो, वहाँ सामने क्या दिखलायी दे रहा है अरे जरा नजदीक ले चलो, पास से देखना चाहता हूँ।"

लाल लगाम : "ठीक है!

तूफान टक्कर : "मुझे तो यहाँ, भूकम्प का कोई निशान दिखाई नहीं दे रहा।"

लाल लगाम : "ना ही मुझे दिखलायी दे रहा।यहाँ पर तो कुछ ऐसा लग रहा है मानो।"

तूफान टक्कर : "एक पल रूको तो! यह कैसी आवाज है? लाली, ऊपर उठा लो यान को यह तो दूसरे झटके जैसा रे... अरे..."

पाताल पापी: "होशियार! यह छोटा विमान! यह बम, कुछ ही पलों में तितर-बितर हो जाएगा।"

तूफान टक्कर : "वो उड़ा हमें यहाँ से भाग निकलना होगा।"

छोटा राजा : "पर कैसे?"

तूफान टक्कर : "ओ छोटे राजा, अपनी माप की छड़ी दो तो जल्दी से!"

छोटा राजा : "तुम इस मापदंड से क्या करोगे?

तूफान टक्कर : "थोडा सा इंर्धन इस्तेमाल करूँगा।

तूफान टक्कर : "पीछे हटो बस यही आशा करूँगा कि रेल-इकाई पाताल पापी से, तुरन्त आ मिले किसी भी सूरत में तुम्हें इसे रोकना है-

लाल लगाम : 'बहुत ठीक!

तूफान टक्कर : "हम यहाँ, प्रज्वलन चाबी (डिटेक्टर फ्यूज) को जाँचते रहेंगे, चलो छोटे राजा।

छोटा राजा : "वाह क्या खूब निशाना मारा है! और वह भी सही वक्त पर!"

सूत्रधार : इस धरती पर कुछ विचित्र और भयानक दुर्घटनाएँ बस अब घटने ही वाली है।

डॉ. शिव : "डॉ. गिरधर, देखिये, बडा रोचक व सनसनीखेज यंत्र क्रियाशील है। यह क्या किस्सा खुल रहा है?"

दोनो डॉ. : "आहा! समझ लो भूकम्प..."

डॉ. शिव : "अरे मैं पकड़ नहीं पाऊँगा।"

एक सिपाही : "हम यहाँ से प्रस्थान करने को बिलकुल तैयार हैं डाक्टर।"

डॉ. बूमक : "अच्छी बात है क्रमिक गिनती आरम्भ हो जाये!"

सिपाही : "जी बहुत अच्छा।"

डॉ. बूमबाक : "अरे! अरे! भूचाल गिनती रोक दो... अरे... अरे... बचाओ "

(टी वी पर समाचार वाचक की तस्वीर और स्वर : "और इस भांति डॉ. बूमक के लापता होने की दु:खद घटना, जो, "आधुनिक विस्फोटक प्रयोग संस्थान" के इलाके के पास घटित हुयी, उससे सभी उद्विग्न हैं। इस दुर्घटना से कुल तीसरे महीने वैज्ञानिक के गायब होने का कुदरती हादसा घट गया है जिससे सभी परेशान हैं।")

सेनापति : "(नाराजगी भरा स्वर) कुदरती घटना खाक घटी है! पहले डॉ. गिरधर और फिर डॉ. शिव गायब हुये। और अब डॉ.बूमाक भी गए। सबसे शक्तिशाली, तेज दिमाग विज्ञान के क्षेत्र के, इस पृथ्वी के काबिल इन्सान गुम हो गये और एक के बाद एक, यह भूचाल के झटके और हम उनके शिकार! यह तो बड़ा विचित्र सा संयोग है! मैं नहीं मानता जरूर इस के पीछे कोई बडा भारी रहस्य है!"

डॉ. बूम्बाक : "मैं, अंतरिक्ष ग्रह कक्ष की पुलिस से सम्पर्क करने में, सफल हुआ! वे लोग जब हमें लेने आयेंगे तभी पाताल पापी और उसके साथियों को भी पकड लेंगे।"

तूफान टक्कर : "माफी चाहता हूँ डॉक्टर साहब! आपको फिलहाल, यही छोड़े जा रहा हूँ, पर हमें यहाँ से अब रफूचक्कर हो जाना चाहिये। इस के पहले कि वो लोग यहाँ आ पहुँचें।"

डॉ.बूमाक : "सही फर्मा रहे हो बरखुरदार, पर मैं आपका कर्ज किस तरह अदा कर पाऊँगा? कुछ तो ऐसा जरूर होगा जो मैं कर पाऊँगा।"

छोटा राजा : "ऐसी बात है! तब तो में गर्दन बाहर को किए देता हूँ, फिर गोलियों से घायल हो जाता हूँ और बाद में, आप फिर मेरी जान बचा लीजिएगा डॉक्टर।"

डॉ बूमाक और सभी हँसने लगते हैं छोटे राजा की बात पर।

१ मई २००३

Thursday, September 14, 2017

संवरण-तपती : अमर युगल पात्र

अमर युगल पात्र – संवरण-तपती : 

महाभारत, आदिपर्व

गंधर्वराज चित्ररथ ने अर्जुन को तपतीनंदन कहकर संबोधित किया। अर्जुन ने उनसे पूछा कि वे तो कुन्ती के पुत्र हैं, फिर तपतीनंदन कैसे हुए। इस पर गंधर्वराज ने सूर्यपुत्री तपती की कथा सुनाई।
आकाश में सर्वश्रेष्ठ ज्योति भगवान सूर्य हैं। उनकी प्रभा स्वर्ग तक व्याप्त है।
उन्हीं सूर्यदेव की पुत्री का नाम था ‘तपती’ !
 तपती अपने पिता  सूर्य के समान ज्योति से परिपूर्ण थी। अपनी तपस्या के कारण वह तीनों लोकों में तपती के नाम से पहचानी जाती थी। तपती सावित्री की छोटी बहन थी। तपती के जैसी सुंदर, सुशील कन्या, असुर योनि, नाग वंश,यक्ष समुदाय, या गंधर्व प्रजा - किसी में भी नहीं थी। उसके योग्य पुरुष पति ढूँढना, सूर्यदेव को भी भारी पड़ रहा था। सो वे हमेशा चिंतित रहते थे कि अब ऐसी रूपवती कन्या का विवाह करें भी तो किससे करें?
      उस समय पृथ्वी पर, पुरुवंश के राजा ऋक्ष के पुत्र ‘संवरण’ राज कर रहे थे। भगवान सूर्य के परम् भक्त थे। वे बड़े ही बलवान थे। वे प्रतिदिन सूर्योदय के समय अर्ध्य, पाद्य, पुष्प, उपहार, सुगंध, लेकर , अत्यंत पवित्र ह्रदय से, सूर्य देवता की पूजा किया करते थे। नियम, उपवास तथा तपस्या से सूर्यदेव को संतुष्ट करते और बिना अहंकार के पूजा करते। संवरण की भक्ति देख धीरे-धीरे सूर्यदेवता के मन में यह बात आई कि, यही राजपुरुष मेरी पुत्री ‘तपती’ के योग्य पति हैं।
        एक दिन की बात है – संवरण अपना उम्दा  घोड़ा लेकर जंगल की तराइयों में शिकार खेलने निकल पड़े। बहुत देर तक घुड़सवारी करने पर उनका घोड़ा भूख, प्यास के कारण, वहीं जमीन पर गिरकर मर गया। अचानक उनकी दृष्टि , निर्जन वन में निर्भय होकर विचरण करती, एक अकेली कन्या पर पड़ी।  वे उसकी ओर अनिमेष नयनों से निहारने लगे। उन्हें ऐसा लगा मानो साक्षात सूर्य की प्रभा ही पृथ्वी पर विचरण कर रही हो ! 

          उनके मन में विचार आया, ‘‘ओहो। इस युवती कन्या का स्वरूप दैवी है। ऐसा रूप मैंने नहीं देखा।’’ 
     राजा के नयन और मन कन्या में गड़ गए। वे सारी सुधबुध भूल गए। हिलना-डुलना भी भूल गए। जब वह कन्या एक वृक्ष के पीछे ओझल हुई तब उन्हें  चेतना आई। उन्होंने मन-ही-मन निश्चय किया कि ब्रह्माजी ने त्रिलोक के सौंदर्य को एकत्र करके इस मूर्ति को बनाया है। उन्होंने उस कन्या  के पीछे जाकर कहा,
‘‘हे त्रिलोक सुंदरि, तुम कौन हो ? किसकी पुत्री हो? इस निर्जन वन प्रांत में अकेले क्यों भ्रमण कर रही हो? तुम्हारी अनुपम काँति से, ये स्वर्णाभूषण  और भी अधिक  देदीप्यमान हो रहे हैं। तुम्हारे केशों में गूँथे लाल कमल की सुरभि से वातावरण सुगं‌धित हो उठा है। तुम अवश्य कोई अप्सरा या देवी हो। कहो तुम कौन हो? मैं तुम पर मेरा मन हार चुका हूँ। मैं, तुम्हारे प्रेम-पाश में बंध गया हूँ। कृपया, मेरा प्रणय-प्रस्ताव स्वीकार करो।’’
       कन्या सूर्यकुमारी ‘तपती’ राजा संवरण के ऐसे बोल सुनते ही लजा गईं।  वह कुछ बोली ही नहीं और बिजली कड़क उठे उसी तरह तत्क्षण अंतर्धान हो गई।
       अब ‘संवरण’ अत्यंत व्याकुल हो उठे  और असफल रह जाने पर विलाप करते-करते, बेहोश हो गए। जब ‘तपती’ ने व्योम से देखा कि राजा निश्चेष्ट हैं तब वह दयावश पुनः  प्रकट हुई और मीठी वाणी से कहने लगी,
‘‘राजन् उठिए। आप तो सत्पुरुष हैं, फिर इस तरह दयनीय स्थिति में क्यों जमीन पर लोट रहे हैं ?’’
तपती की अमृतमयी वाणी सुनकर संवरण की चेतना लौट आई। उन्होंने बड़े अनुनय से कहा, ‘‘अब मेरे प्राण तुम्हारे हाथों में हैं। मैं इस क्षण के पश्चात् तुम्‍हारे बगैर जी नहीं सकता। हे सुंदरी ! तुम मेरी इस अवस्था से व्यथित होकर यहाँ आई हो। अब मुझे छोड़कर कभी मत जाना। मुझ पर दया करो और मेरे साथ विवाह कर मुझे  स्वीकार करो।’’तपती ने कहा,
‘‘मेरे पिता जीवित हैं। आप उन्हीं से मेरे बारे में पूछें, यही योग्य है। आप जैसे धर्मज्ञ तथा विश्वविदित पुरुवंशीय सम्राट को पति रूप में पाने से मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैं भगवान् सूर्य की कन्या हूँ। विश्ववन्ध्य ‘सावित्री देवी’ की छोटी बहन हूँ।’’ इतना कहकर तपती आकाशमार्ग से अंतर्धान हो गई और संवरण फिर मूर्छित हो गए।
        उसी बीच राजा संवरण के बहुत सारे सैनिक उन्हें ढूँढते-ढ़ूँढते वहीं आ पहुँचे। उन्‍होंने राजा को फिर जाग्रत किया। राजा ने पूरे सैन्य को लौटा दिया और वे स्वयं अपने कुलगुरु वशिष्ठजी को याद करके मन को पवित्र करके एकाग्रता के साथ सूर्य देव की उपासना करने में जुट गए।
          ठीक बारह दिनों के पश्‍चात् महर्षि वशिष्ठ  वहाँ पधारे। उन्होंने संवरण को आश्वासन दिया, ढाँढस बँधाया और फिर सूर्यदेव के सम्मुख जाकर अपना परिचय दिया। प्रणामपूर्वक उन्होंने कहा कि, " आपकी पुत्री यशस्विनी तपती के लिए, मैं  अपने राजा संवरण को पति होने का सौभाग्य चाहता हूँ। हमारी प्रार्थना स्वीकारिए।’’ 
          सूर्य देव ने प्रार्थना सुन ली और गुरु वशिष्ठ के साथ अपनी सर्वांग सुंदरी कन्या को भेज दिया। गुरु वशिष्ठ के साथ आती हुई तपती को देखकर राजा संवरण अपने आनंद का संवरण न कर सके। इस प्रकार सूर्य की अटल आराधना तथा अपने गुरु की शक्ति के प्रभाव से, राजा संवरण ने, तपती जैसी नारी रत्न को प्राप्त किया।
       विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहण संपन्न हुआ।

तद्पश्चात  कुछ काल तक उसी शैल शिखर पर राजा ने विहार किया। बारह वर्ष पर्यंत वे वहीं रहे। राजकाज मंत्रियों के द्वारा चलने लगा। तब इंद्र देव ने जो वर्षा ऋतु के स्वामी हैं, उनके राज्य में पानी बरसाना बंद कर दिया। सर्वत्र सूखा-अकाल पड़ गया। लोग मरने लगे। इतना कि ओस तक न पड़ी। प्रजा मर्यादाहीन होकर एक दूसरे को लूटने लगी। तब वशिष्ठ मुनि ने अपनी तपस्या के प्रभाव से वर्षा करवाई।
       तपती-संवरण प्रजा पालन हेतु अपनी राजधानी लौटे। फिर से पैदावार शुरू हो गई। राज दंपत्ति ने सहस्रों वर्षों तक सुख भोगा। इसी तपती के गर्भ से राजा ‘कुरु’ का जन्म हुआ और इसी से कुरु वंश का प्रारंभ हुआ।
- लावण्‍या शाह 

Tuesday, August 29, 2017

अमर युगल पात्र : ऋषि वसिष्‍ठ व ऋषि पत्नी देवी अरूंधती की उज्जवल जीवन गाथा

अमर युगल पात्र : लेख मालिका ~~ प्रस्तुत है .........
ऋषि वसिष्‍ठ व ऋषि पत्नी देवी अरूंधती की उज्जवल जीवन गाथा



उत्तर अमेरिका से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ' विश्वा ' में यह आलेख छपा था।
http://www.evishwa.com/
अमर युगल पात्र : वसिष्‍ठ-अरुंधती
श्रीमती लावण्य शाह
सिनसिनाटी, ओहायो, अमेरिका
श्रीमती लावण्या शाह प्रसिद्ध कवि
और गीतकार
पं. नरेन्द्र शर्मा की पुत्री है।
आप मुंबई में पली व बढी।
पिछले १५ वर्षों से अधिक से
लावण्या जी अपने परिवार के साथ सिन्सिनाटी, ओहायो में रहती हैं। लावण्या जी का प्रथम काव्य संग्रह " फिर गा उठा प्रवासी '' , उपन्यास " सपनों के साहिल " व कहानी संग्रह " अधूरे अफ़साने " हाल ही में प्रकाशित हो चुके हैं।
२०१७ में " सुन्दर ~ काण्ड : भावानुवाद " प्रकाशित हो रहा है। आगामी पुस्तक " अमर युगल पात्र " से यह आलेख  प्रस्तुत है। 
वसिष्‍ठ ऋषि ब्राह्मण वंश के मूलपुरुष कहलाते हैं। सप्‍तर्षियों में इनका तथा उनकी पत्‍नी अरुंधती का नाम है। अरुंधती ने अपने नाम की व्‍याख्‍या इस प्रकार की है—‘‘यह अपने पति वसिष्‍ठ को छोड़कर अन्‍य कहीं भी नहीं रहतीं तथा कभी अपने पति का विरोध नहीं करती।’’
वसिष्‍ठ स्‍वायंभुव मन्‍वंतर में उत्‍पन्‍न हुए ब्रह्मा के दस मानसपुत्रों में से एक हैं। कहते हैं कि वसिष्‍ठ का जन्‍म ब्रह्माजी के प्राणवायु (समान) से हुआ था। ‌वसिष्‍ठ ऋषि का ब्राह्मण वंश सदियों तक अयोध्‍या के सूर्यवंशी राजाओं का पुरोहित पद सँभाले रहा। इनकी दो प‌‌त्नियाँ बताई गई हैं। एक तो दक्ष प्रजापति की कन्‍या ‘उर्जा’ और दूसरी ‘अरुंधती’। अरुंधती कर्दम प्रजापति की नौ कन्‍याओं में से आठवीं गिनी जाती हैं। दक्ष प्रजापति की कन्‍या ‘सती’ से शिव ब्‍याहे थे। इस नाते से वसिष्‍ठ शिव के साढ़ू हुए। दक्ष प्रजापति के यज्ञ के ध्‍वंस के समय शिव ने वसिष्‍ठ का वध किया था। अरुंधती के अलावा ‘शतरूपा’ भी वसिष्‍ठ की पत्‍नी मानी गई हैं। (वे अयोनिसंभवा थीं।)

वसिष्‍ठ-अरुंधती का नाम सदा आदर से लिया जाता है। अरुंधती पतिव्रता सन्‍नारियों में उज्‍ज्‍वल स्‍थान प्राप्‍त किए हुए हैं। सप्‍तर्षि तारामंडल में अन्‍य ऋषियों के साथ अरुंधती को एकमात्र स्‍त्री और पत्‍नी, जो पति के सदैव साथ रहती हैं, होने का गौरव प्राप्‍त है। पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिकों ने ध्रुव से कुछ नीचे, उत्तर दिशा को प्रज्‍वलित करते हुए इस तारामंडल का नाम The Great Bear रखा है और सर्वोच्‍च स्‍थान पर स्‍थित ‘ध्रुव तारे’ को ‘पोलार बेर’ कहा जाता है। पुराणों में वर्णित है कि वसिष्‍ठ पत्‍नी ‘शतरूपा’ के ‘वीर’ नामक पुत्र को कर्दम प्रजापति की पुत्री ‘काम्‍या’ से विवाह होने के पश्‍चात् ‘प्रियव्रत’ तथा उत्तानपाद दो पुत्र हुए। उत्तानपाद को अत्रि ऋषि ने गोद लिया और उन्‍हीं के ‘ध्रुव’ नामक पुत्र हुआ।
अरुंधती कर्दम प्रजापति तथा माता देवहूति की कन्‍या थीं। कश्‍यप की कन्‍या अरुंधती का उल्‍लेख वायु पुराण, लिंग पुराण, कूर्म पुराण वगैरह में प्राप्‍त है। उनका विवाह वसिष्‍ठ से हुआ यह ज्ञात होता है। वसिष्‍ठ की प्राप्‍ति के लिए देवी अरुंधती ने सीता तथा रुक्‍मिणी की भाँति ‘गौरी-व्रत’ पूजन किया था। इसी कारण इन्‍हें विवाह सुख प्राप्‍त हुआ।

अरुंधती अत्‍यंत तपस्‍विनी तथा पति-सेवापरायण थीं। ऋषियों के पूछने पर उन्‍होंने सविस्‍तार धर्म-रहस्‍य, श्रद्धा, आतिथ्‍य-सत्‍कार, गौ सेवा, ग्राहस्‍थ्‍य धर्म तथा गोशृंग स्‍नान माहात्‍म्‍य की चर्चा की थी।
अग्‍निदेव की पत्‍नी ‘स्‍वाहा’ को एक बार अपने पतिदेव को रिझाने की इच्‍छा हुई। अग्‍नि ने कहा कि ‘मैं सप्‍तर्षियों की पत्‍नियों से बहुत प्रभावित हूँ। जब-जब ऋषिगण यज्ञ करते हैं तब मैं उनकी पवित्रता तथा धर्म की आभा देखता ही रहता हूँ।’ तब स्‍वाहा ने पति अग्‍नि देव को प्रसन्‍न करने की चेष्‍टा से छह ऋषियों की पत्‍नी का रूप धरा। हर बार वे अग्‍निदेव को लुभाने में तथा भ्रमित करने में सफल हुईं। अंतिम बार वे वसिष्‍ठ पत्‍नी अरुंधती का रूप धरने लगीं। जब-जब उन्‍होंने कोशिश की तब-तब उन्‍हें असफल ही होना पड़ा। अरुंधती देवी सी पतिव्रता के तेज के आगे छल-कपट व मायावी शक्‍तियाँ व्‍यर्थ हो गईं। तब संपूर्ण विश्‍व ने जाना की अरुंधती धर्म में कितनी अटल थीं।

एक बार सप्‍तर्षिगण बदरपाचनतीर्थ हिमालय में फल-मूल लाने गए थे। तब बारह वर्षों तक वर्षा बंद हो गई थी। अतः सप्‍तर्षि हिमालय पर ही रुक गए। शंकर भगवान अरुंधती की परीक्षा लेने हेतु दरिद्र ब्राह्मण का रूप धरकर वसिष्‍ठ के आश्रम पर पधारे। अरुंधती के पास कुछ न था। सो उन्‍होंने (लोहे के) बेर शंकर को दिए। शंकर ने कहा, ‘‘देवी, मैं निर्धन हूँ। कहाँ पकाता फिरूँगा? आप ही पका दीजिए।’’ अरुंधती ने अग्‍नि पर बेरों को पकने रखा और समय व्‍यतीत होवे, इस आशय से अनेक धर्म, ज्ञान के विषयों पर ब्राह्मण से चर्चा आरंभ की। चर्चा में लीन अरुंधती को पता भी न चला कि बारह वर्ष व्‍यतीत हो गए। सप्‍तर्षिगण फल-मूल लेकर लौटे। तब भगवान शंकर अपने असली स्‍वरूप में प्रगट हुए, उन्‍होंने अरुंधती की कड़ी तपस्‍या की भूरि-भूरि प्रशंसा की। और तभी से वह आश्रम पवित्र तीर्थस्‍थल बन गया।

अरुंधती और वसिष्‍ठ के पुत्र का नाम ‘शक्‍ति’ था। अन्‍य अरुंधती नामक कन्‍या ‘मेधातिथि’ मुनि की कन्‍या थी। वे ब्रह्मदेव की संध्‍या नामक मानस कन्‍या थी। चंद्रभागा नदी किनारे मेघातिथि मुनि के यज्ञकुंड से वह कन्‍यारूप में प्रगट हुईं। वे जब पाँच वर्ष की थीं ब्रह्मा ने उन्‍हें आकाश में विमान में बैठकर जा रहे थे तब देखा। उन्‍होंने मेधातिथि को आदेश दिया कि इसे साध्‍वी स्त्रियों के संपर्क में रखा जाए। तब मुनि मेधातिथि सावित्री देवी के पास गए तथा हाथ जोड़कर कहा कि–‘‘माँ, मेरी इस पुत्री को उत्तम शिक्षा दीजिए।’’ सावित्री देवी ने सहर्ष अरुंधती का स्‍वागत किया और सात वर्ष बीत गए।

अरुंधती अब बारह वर्ष की हुई। महासती बेहुला तथा सावित्री देवी के संग वे एक बार मानस पर्वत के उद्यान में गईं। वहीं अरुंधती ने तपस्‍या करते हुए वसिष्‍ठ ऋषि को देखा। दृष्‍टि मिलन होते ही दोनों एक-दूसरे पर आकर्षित हुए। जब सावित्री देवी को ज्ञात हुआ तब उन्‍होंने वसिष्‍ठ-अरुंधती का ब्‍याह रचाया। इस तरह जितने भी उदाहरण हैं पुराणों में, वहाँ वसिष्‍ठ और ‘अरुंधती’ पति-पत्‍नी के रूप में हम देखते हैं।
वसिष्‍ठ ऋषि की विश्‍वामित्र ऋषि के साथ दुश्‍मनी थी।
वह ज्‍यादातर विश्‍वामित्र के अहंकार व क्रोध के ही कारण थी।
ऋषि  वसिष्‍ठ तो ब्रह्मर्षि थे, उन्‍होंने इंद्रियों को जीत लिया था।

काम, क्रोध, मद, मोह, बंधन सभी से वे परे हो गए थे। विश्‍वामित्र ने ‘नंदिनी’ नामक कामधेनु का वसिष्‍ठ आश्रम से हठपूर्वक अपहरण करना चाहा। किंतु वे असफल रहे। विश्‍वामित्र ऋषि गायत्री मंत्र सिद्ध कर पाए परंतु अपने दर्प को न जीत पाए। वसिष्‍ठ की शांति व संयम को भंग करने के लिए तब उन्‍होंने वसिष्‍ठ-पुत्र ‘शक्‍ति’ की हत्‍या कर दी। माता अरुंधती पुत्र-वियोग में रो पड़ी। परंतु धीर-संयमी जितेंद्रिय वसिष्‍ठ ने अँधेरी रात्रि में अरुंधती को ढाढ़स बँधाया।

वसिष्‍ठ ने कहा,
‘‘हे माता! मैं तुम्‍हारे शोक को समझ पाता हूँ। तुम्‍हारे अश्रु को छू सकता हूँ।
तुम्‍हारी ‘मनोवेदना’ को अनुभव कर पाता हूँ।
परंतु इस क्षण मेरा मन विश्‍वामित्र के लिए रो रहा है। मुझे उस पर दया आ रही है।’’ 


तब अरुंधती ने रुँधे कंठ से पूछा,
‘‘क्‍यों नाथ? आपको विश्‍वामित्र के प्रति इस भयानक क्षण में
क्‍यों सहानुभूति हो रही है?’’

वसिष्‍ठ ने उत्तर दिया,
‘‘मुझ पर क्रोध करके विश्‍वामित्र अपने तप की, बल की, वीर्य की, अपने मन की शांति का नाश कर रहे हैं। शक्‍ति हमारा पुत्र था। उसका वध करके विश्‍वामित्र को कुछ प्राप्‍त न हुआ। मुझे दुःख है कि गायत्री मंत्र का द्रष्‍टा, गंभीर तपस्‍वी पता नहीं क्‍यों मुझ पर अपना वर्चस्‍व स्‍थापित करना चाहता है। वह जीते अपने आपको। कुमार्ग पर चलनेवाले ज्ञानी व तपस्‍वी के प्रति दयाभाव से मैं विगलित हो रहा हूँ।
काश ! परम कृपालु परमात्‍मा उन्‍हें सन्‍मति दें और सत्य पथ सुझा दे।’’


वसिष्‍ठ का मन से निकला आशीर्वाद सुनकर विश्‍वामित्र (जो छुपकर सारी बातें सुन रहे थे)ब्रह्मर्षि के चरणों में गिर पड़े। वे फूट-फूटकर रोने लगे।

वसिष्‍ठ ने बड़ी कोमलता से उन्‍हें उठाया। बड़ी स्‍निग्‍धता व सौजन्‍य से बिठाया। प्रेमपूरित हाथों से अश्रु पोंछे। माता अरुंधती ने पुत्र के हत्‍यारे का अतिथि-सत्‍कार किया। उसी क्षण से विश्‍वामित्र तपस्‍या की उच्‍चतम श्रेणी में प्रविष्‍ट हुए।

वर्तमान वैवस्‍वत मन्‍वंतर के मैत्रावरुणी वसिष्‍ठ व अरुंधती के अन्‍य पुत्र हैं–पराशर, कृष्‍ण द्वैपायन, शुक्र भूरिश्रवस, प्रभुशंभु और कृष्‍ण गौर। शक्‍ति, सुद्यम्‍नु, कुंडिन, वृहस्‍पति, भरद्वसु, भरद्वाज।
वसिष्‍ठ अयोध्‍या के राजा दशरथ के राजपुरोहित के रूप में बड़े प्रसिद्ध हुए। वे एक नीति विशारद मंत्री, पुरोधा तो थे ही–सर्वश्रेष्‍ठ ब्रह्मज्ञानी, तपस्‍वियों में श्रेष्‍ठ, क्षमाशील, अत्‍यधिक शांतिप्रिय व सहिष्‍णु थे। पुत्रकामेष्‍टि यज्ञ के समय वही दशरथ यज्ञ के ऋत्‍विज बने।

‘राम’ नामकरण भी इन्‍होंने किया। युवराज पदाभिषेक इन्‍हीं ने किया। ‘योगवसिष्‍ठ’ नामक ग्रंथ इन्‍होंने ही भारत को दिया है। धर्मशास्‍त्रकार वसिष्‍ठ रचित ‘वसिष्‍ठस्‍मृति’ नामक स्‍मृति ग्रंथ है। इसमें आचार, संस्‍कार, प्रायश्‍चित्त, रजस्‍वला, संन्‍यासी, आत‌तायी आदि के लिए नियम दिए गए हैं। ‘मनुस्‍मृति’ तथा ‘याज्ञवल्‍क्‍य स्‍मृति’ में भी इसका उल्‍लेख है। अन्‍य ग्रंथ– वसिष्‍ठ-कल्‍प, वसिष्‍ठ-तंत्र, वसिष्‍ठ-पुराण वसिष्‍ठ-शिक्षा, वसिष्‍ठ-संहिता, वसिष्‍ठ-श्रद्धाकल्‍प इत्‍यादि हैं।


वसिष्‍ठ ऋषि का आश्रम विपाशा नदी के किनारे ‘वसिष्‍ठशिला’ नाम से था। एक अन्‍य स्‍थान ‘कृष्‍ण शिला’ उनकी तपस्‍या भूमि थी। इसी कड़ी तपस्‍या के कारण उन्‍हें समस्‍त पृथ्‍वी का पुरोहित पद मिला।
ऋग्‍वेद में वसिष्‍ठ को मैत्रावरुण व उर्वशी अप्‍सरा का पुत्र कहा गया है।
 इस नाते हम कह सकते हैं कि वसिष्‍ठ वंश अति प्राचीन वंशों में गिना जा सकता है। ऋग्‍वेद के अनुसार वसिष्‍ठ का पुत्र शक्‍ति था तथा पौत्र का नाम ‘पाराशर’ शाक्‍त्‍य था। पाराशर के पुत्र हुए श्री कृष्‍ण द्वैपायन व्‍यास, जिन्‍होंने महाभारत ग्रंथ की रचना की।

वसिष्‍ठ सुवर्चस सँवरण राजा के पुरोहित थे। अतः वसिष्‍ठ नाम के कई ऋषिगण हैं तथा उनके वंश में अनेक महान् व्‍यक्‍ति आते हैं। उनमें से प्रमुख हैं :
१. वसिष्‍ठ देवराज—अयोध्‍या के त्रय्यरुण, त्रिशंकु एवं हरिश्‍चंद्र के काल में।
२. वसिष्‍ठ आपव—हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन के समकक्ष।
३. वसिष्‍ठ अथर्वनिधि—अयोध्‍या के बाहुराजा का समकालीन।
४. वसिष्‍ठ श्रेष्‍ठभाज—अयोध्‍या के मित्रसह कल्‍माषपाद सौदाह राजा के काल के।
५. वसिष्‍ठ अथर्वनिधि (द्वितीय)—अयोध्‍या के दिलीप खट्वांग के समकालीन।
६. वसिष्‍ठ दाशरथि—दशरथ व राम के अयोध्‍या के राजपुरोहित।
७. वसिष्‍ठ मैत्रावरुण—उत्तर पांचाल के पैजवन सुदास राजा के काल के।
८. वसिष्‍ठ शक्‍ति—वसिष्‍ठ मैत्रावरुण का पुत्र (वसिष्‍ठ शक्‍ति)।
९. वसिष्‍ठ सुवर्चस्—हस्‍तिनापुर के संवरण राजा के समकालीन।
१०. वसिष्‍ठ—अयोध्‍या के मुचकुंद राजा का समकालीन।
११. वसिष्‍ठ—हस्‍तिनापुर के ‘हस्‍तिन्’ राजा के समकालीन।
१२. वसिष्‍ठ धर्मशास्‍त्रकार—वसिष्‍ठस्‍मृति के रचियता।
सप्‍तर्षियों में स्‍थान प्राप्‍त किए हुए, आकाश में स्‍थित, पवित्र तारामंडल में अपना अडिग पद सँभाले हुए, अमर युगल पात्र ‘वसिष्‍ठ-अरुंधती’ को भारतवर्ष प्रणाम करता है।
कहते हैं, जब भी तपस्‍या सफल होने की सीमा में प्रवेश करती है
तब ईश्‍वर के आशीर्वाद की बधाई देते हुए प्रथम सप्‍तर्षियों का आगमन व दर्शन होता है।
रामचंद्र के गुरु वसिष्‍ठ व गुरुपत्‍नी अरुंधती को हम पवित्रता से अंजलि बाँधे नमन करते हैं और विदा लेते हैं।
सप्‍तर्षि : ७  ऋषियों के नाम
१. अंगिरस् भृगु
२. अ‌त्रि
३. क्रतु
४. पुलत्‍स्‍य
५. पुलह
६. मरीचि
७. वसिष्‍ठ

खगोल शास्त्र में ( एस्ट्रोनॉमी में ) इस सप्तर्षि तारा मंडल को " बीग डीपर " कहते हैं
और स्वच्छ आकाश में , सप्तर्षि, उरसा मेजर 
निहारिका में, साफ़ दीखलाई पड़ते हैं। 

File:Ursa Major constellation detail map.PNG