Monday, March 31, 2008

नरगिस ~ ~ एक शब्द चित्र



नरगिस
लहरा कर, सरसरा कर , झीने झीने पर्दो ने,
तेरे, नर्म गालोँ को जब आहिस्ता से छुआ होगा
मेरे दिल की धडकनोँ मेँ तेरी आवाज को पाया होगा
ना होशो ~ हवास मेरे, ना जजबोँ पे काबु रहा होगा
मेरी रुह ने, रोशनी मेँ तेरा जब, दीदार किया होगा !
तेरे आफताब से चेहरे की उस जादुगरी से बँध कर,
चुपके से, बहती हवाने,भी, इजहार किया होगा
फ़ैल कर, पर्दोँ से लिपटी मेरी बाहोँ ने,
फिर् , तेरे, मासुम से चेहरे को, अपने आगोश मेँ, लिया होगा ॥
तेरी आँखोँ मेँ बसे, महके हुए, सुरमे की कसम!
उसकी ठँडक मेँ बसे, तेरे, इश्को~ रहम ने
मेरे जजबातोँ को, अपने पास बुलाया होगा
एक हठीली लट जो गिरी थी गालोँ पे,
उनसे उलझ कर मैँने कुछ और सुकून पाया होगा
तू , कहाँ है ? तेरी तस्वीर से ये पूछता हूँ मैँ !
आई है मेरी रुह, तुझसे मिलने, तेरे वीरानोँ में ,
बता दे राज, आज अपनी इस कहानी का
रोती रही नरगिस क्युँ अपनी बेनुरी पे सदा ?
चमन मेँ पैदा हुआ, सुखन्वर, यदा ~ कदा !!--

-- लावण्या शाह
http://anubhutihindi-naihawa.blogspot.com/

Saturday, March 29, 2008

स्मृति दीप

[ चित्र : विजयेन्द्र "विज" साभार ]
स्मृति दीप
भग्न उर की कामना के दीप,
तुम, कर में लिये,मौन, निमंत्र्ण, विषम, किस साध में हो बाँटती?
है प्रज्वलित दीप, उद्दीपित करों पे,
नैन में असुवन झड़ी!
है मौन, होठों पर प्रकम्पित,
नाचती, ज्वाला खड़ी!
बहा दो अंतिम निशानी, जल के अंधेरे पाट पे,
' स्मृतिदीप ' बन कर बहेगी, यातना, बिछुड़े स्वजन की!
एक दीप गंगा पे बहेगा,
रोयेंगी, आँखें तुम्हारी।
धुप अँधकाररात्रि का तमस।
पुकारता प्यार मेरा तुझे, मरण के उस पार से!
बहा दो, बहा दो दीप को
जल रही कोमल हथेली!
हा प्रिया! यह रात्रिवेला औ '
सूना नीरवसा नदी तट!
नाचती लौ में धूल मिलेंगी,
प्रीत की बातें हमारी!
लावण्या शाह

Thursday, March 27, 2008

कौन सा फूल ? ( एक कहानी )



कौन सा फूल ?
यह कथा भारत के एक गांव की है। गांव कोई भी नाम सोच लीजिये। है बात बहुत दिनों पहले की जब गांव में एक बारात आई थी। शादी ब्याह के अवसर पर सदा की तरह सारा गांव बरात के स्वागत में सज रहा था। दरवाजॉं पर बंदनवार झूल रहे थे। गेंदे के पीले फूलों के साथ अशोक के हरे चीकने पान हारों में गूंथ कर हवा में उमंगें बिखेर रहे थे।
गांव के छोटे बडे सभी स्वच्छ धुले या नये वस्त्र पहने लडक़ी वाले के आंगन के पास मंडरा रहे थे। दालान के सामने क्यारी में तुलसी मोगरों के खिले गुच्छों के बीच शोभायमान थी। सफेदी से पुता घर सूर्य की प्रखर किरणों के मध्य चमक-दमक रहा था। भीतर काफी भीड ज़मा थी। पुरूषों ने लाल और गुलाबी रंग के साफे बांध रखे थे। उनकी प्रसन्न मुद्रा पर कभी रौब तो कभी मुस्कान तैर जाती थी। स्त्रियां रंग बिरंगी रेशमी साडियां ओढे मुस्का रही थीं। उनकी बातें कभी चूडियों की खनक और कभी पायलों की छनछनाहट के बीच ज्वार-भाटे की तरह उतार चढाव लेती हर दिशा में फैली जा रही थी। कन्याएं घाघरा चोली चुनरी या लहंगा पहने चिडियों की तरह चहक रही थीं।
बारात आ पहुंची। अपनी दो सहेलियों के मध्य लाल चुनरी से ढंकी गुडिया सी नववधू वरमाला हाथों में जकडे हुए आ खडी हुई। उसकी महीन ओढनी पर सुंदर सलमें सितारे और सुनहरी गोटों का काम दमक रहा था। माथे पर बिंदिया दमक रही थी। कन्या ने अपने हाथों को ऊंचा कर के लाल गुलाब और सफेद नरगिस के फूलों से महकती वरमाला वर के गले में पहना दी। कन्या और वर के साथ खडी बारात ने तालियां बजा कर अपनी खुशी प्रकट की। इसके बाद दोनों पक्षों के रिश्तेदारों में मिलनी की रस्म अदा की गयी। विवाह मंडप में ब्याह की सारी गतिविधियां विधिपूर्वक पूरी होने लगी। ब्याह के बाद दावत शुरू हो गयी। ब्याह के भोजन के क्या कहने! मठडी-क़चौडी, पूडी-घेवर-लड्डू-इमरती-जलेबी-गुलाब-जामुन, सब्जियां-दाल- चावल-रायता ये सभी बारी बारी से परोसा जा रहा था। सभी ने छक कर भोजन किया। अब तो पान सुपारी लौंग इलायची भी आगयी और लोग स्वादिष्ट खाने के बाद सुस्ताने लगे। मेहमान और मेजबान सभी सन्तुष्ट थे।
कई अतिथि भोजन समाप्त कर एक बार फिर बधाई कह कर ब्याह के मंडप से दूर अपने घरों की ओर जाने लगे। जो घर के थे, रिश्तेदार और संबंधी घर के भीतर खुले चौक में पहुंचे।

चौक में फर्श पर कालीन व चादरें बिछी थीं। बडे बडे ग़ोलाकार तकिये भी रखे थे। सारे लोग वहां पसर कर आराम करने लगे। गपशप शुरू हो गयी। औरतें भी एक ओर हंसने बोलने लगीं। चर्चाएं छिड ग़यीं। सारा चौक चहक उठा। दूल्हा भी बारातियों के साथ अपने मित्रों के साथ बैठा था। दुल्हनिया अपनी हम उम्र सहेलियों से घिरी कुछ शरमाती हुई बैठी थी। ब्याह की विधि सकुशल पूरी हो गयी थी। दावत भी निपट गयी थी। लग्नोत्सव में कौन-कौन आया कौन न आ पाया ऐसी बातें लोग कर रहे थे।
घर के सब से बडे बुजुर्ग गला खखार कर बोले, ''अं....हं.....सुनो तो जरा...'' और दादा जी की आवाज सुनते ही धीमे से सन्नाटा छा गया। दादा जी के प्रतिभाशाली मुख को सब आतुरता से निहारने लगे। दादाजी शान्त मुद्रा में थे। गौरवर्ण चेहरा पकी हुई केशों वाली बडी-बडी मूछों से ढका था। वे भारतीय सेना के वरिष्ठ पद से निवृत्त हुए थे। सहसा रौबीले किंतु बडे संयत स्वर में उन्होंने कहा, ''यहां मेरा कुनबा एकत्र है। मेरी पोती के ब्याह की विधियां संपूर्ण होने पर मैं अतीव प्रसन्न हूं। वर कन्या को मैं आशीष देता हूं। न न... ख़डे ना होना बच्चों बैठे रहो। चरण स्पर्श हो चुके। बैठे रहो... ईत्मीनान से। '' इतना कह कर हाथों के संकेत से उन्होंने वर कन्या को अपनी जगह पर बैठे रहने की आज्ञा दी। जिसका पालन हुआ। दादाजी की बातें जारी थीं।
'' हां तो मैं क्या कह रहा था...? हां याद आया सभी को खूब बधाई और आभार! आप सभी ने खूब मन लगा कर काम किया तभी तो इतना सुंदर उत्सव रहा! शाबाश!! '' सब लोग मुस्कुराने लगे। ''अच्छा आज एक छोटा सा सवाल पूछूं? '' '' हां दादाजी पूछिये ना। '' सामूहिक आवाजें हर तरफ से उठने लगीं। '' हां हां दद्दू पूछिये.... '' छोटे अतुल की महीन आवाज सुन सब हंस पडे।
दादाजी ने हाथ हिला कर सबको शान्त होने की संज्ञा दी। फिर सब शान्त हो गये। दादाजी ने अपनी संयत व मधुर अवाज में पूछा, ''अच्छा बताओ तो कौन सा फूल सबसे श्रेष्ठ है। '' प्रश्न सुन कर सब अश्चर्य चकित हो कर मुस्कुराने लगे। अरे! दादाजी को यह आज क्या हो गया है? यह कैसा प्रश्न इस अवसर पर? परंतु दादा जी का दबदबा ऐसा था कि स्वतः कोई कुछ बोला नहीं। सब प्रश्न का उत्तर सोचने लगे। स्त्रियां भी सोच में पड ग़यीं।
दादाजी अब जरा मुस्कुराए। कहा, ''अरे भाई मैं कोई गूढ ग़म्भीर प्रश्न नहीं पूछ रहा। सीधा सा छोटा सा सवाल है। तुम सब अपने मन से जो उत्तर निकले कह देना। इतना सोच में पडने जैसा कुछ नहीं। सारे लोग निःश्वस्त हो कर मुस्कुराने लगे। छोटे चाचा जी जो बडे बातूनी थे झट से बोले, '' बाबा मैं तो गुलाब को ही सर्वश्रेष्ठ कहूंगा। '' दादाजी बोले, ''चलो ठीक है नवीन, गुलाब ही सही.... तो तुम्हारी पसंद गुलाब का फूल है। ...और कोई '' उन्होंने आगे पूछा।
अब हर दिशा से एक फूल का नाम सुनाई देने लगा। किसी ने पुकार कर कहा, ''दद्दू सूरजमुखी.... वो तो कितना बडा फूल है ना और जिस-जिस दिशा में सूर्य घूमता है सूरजमुखी का फूल भी उसी ओर मुड ज़ाता है। '' दादाजी ने सिर हिलाया और मुस्कुराए। भाभी बोलीं, ''दादाजी मोगरा! जिसकी वेणी बनाकर मैं अपने जूडे पर पहनती हूं। '' छोटी चाची बोलीं, ''अरी मोगरे से तो जुही का गजरा जादा खुशबू देता है। सो मैं तो कहूंगी कि जुही का फूल सर्वश्रेष्ठ है। ''
बडी चाचीजी कुछ सोच कर बोलीं, ''केवडा भी तो फूल ही कहलाएगा क्यों? गणेश जी के आगे पूजा में रखती हूं तो वही श्रेष्ठ है। अम्मा जो दुल्हन की मां थीं बोलीं, ''कमल! लक्ष्मी मैया जिस पर विराजे रहती है, मैं तो उस कमल के पुष्प को ही श्रेष्ठ कहूंगी... सबमें। '' दादाजी अब खुल कर मुस्करा रहे थे। सभी के सुझाव भी सुनते जा रहे थे।
अलग-अलग फूलों के गुणों तथा उनकी महत्ता के बखान को सुनकर सब खुश हो रहे थे।
दादाजी ने अब भी किसी फूल को श्रेष्ठ नहीं कहा था। अब देसी फूलों से चल कर विदेशी फूलों के नाम भी आने लगे - लिली, लवंडर, टयूलिप, कारनेशन, एस्टर वगैरह वगैरह। धीर-धीरे सबके स्वर मंद पडने लगे। दादाजी आंखें मीचे कुछ सोचे जा रहे थे। तभी सारे चुप हो गये। वातावरण शांत हो गया।
''दादु....'' एक महीन स्वर उठा। यह मधुर स्वर था नई नवेली दुल्हन का। सारे संबंधी नववधू की ओर देखने लगे। वह लजा गयी। आंखें नीची किये वह शर्म से गठरी हो गयी। दादू सतर्क थे। कहा, ''बेटी शर्माओ मत। बोलो तुम्हें कौन सा फूल पसंद है। बोलो बेटा... '' दादाजी के ममत्व से भीगे प्यार दुलार भरे आग्रह से कुछ हिम्मत जुटाकर कन्या मीठे स्वर में कहने लगी, '' दादु श्रेष्ठ फूल है रूई का। '' ''क्या कहा? कोई आश्चर्य से चौंक कर बोल उठा - ''रूई का फूल? कपास का फूल? कर्पाशा? वह कैसे?'' कन्या ने कहा, ''रूई का फूल लेकर मैने उससे एक धागा बुना। मेरे वीरजी के हाथ पर उसकी राखी बांध दी। जो हिस्सा बचा उसे अपनी हथेली पर रख कर बटा और बट कर दीपक के लिये बाती बनाई। दीप की लौ प्रज्जवलित कर के मैने उसे ईश्वर की सेवा में रखा। प्रभु की पूजा की। रूई के फाहे को धारण किये यह पुष्प भले रंग, रूप, गंध न रखता हो मगर उसकी निर्मल स्वच्छता में कितने सारे गुण छिपे हैं। रूई का वस्त्र हम मनुष्यों की लज्जा का आवरण बनता है सो वही श्रेष्ठ है। '' दादाजी ने नव परिणीता कन्या का सुझाव सुनकर प्रसन्नता से आगे बढ पौत्री को अपने चौडे सीने से लगा लिया।
''मेरी नन्हीं बिटिया! हां तुम्हारा उत्तर भी श्रेष्ठ है और तुम्हारी पसंद भी। सच कह रही हो - कितना उपयोगी पुष्प है रूई का। दीपक होता है पुरूष जिसका प्रकाश सारा संसार देखता है। परंतु रूई की बाती तिल-तिल कर के दीपक में लौ बन कर समाई जलती रहती है। वह बाती स्त्री है।'' दादु ने फिर बिटिया को प्यार से गले से लगाया। भर्राए गले से गंगा सी पवित्र अश्रुधारा से उसे आशीर्वाद सा अभिसिक्त करते दादाजी ''मेरी बिटिया, मेरी भोली बेटी '' कह कर आंखें मीचे खडे थे। छलछलाते आंसुओं की भावधारा से विभोर दादु की लाडली क्षण भर के लिये सबकुछ भूल गयी। सारी भीड इस परम पावन दृष्य को एकटक देख रही थी। अनेकों आंखें भर आयीं। सभी की आंखों के आगे अपने शैशव से अबतक बिताए अपने जीवन के पल चलचित्र की तरह साकार हो रहे थे। सोच रहे थे, ''यही तो संसार की रीत है। ''
लग्न हवेली के प्रवेश द्वार से तभी विदाई के सुर छेडती शहनाई गूंज उठी। विदा वेला आ पहुची थी। दादु अपनी प्यारी दुलारी बिटिया को थामे हुए हृदय पर पाषाण रखे उसे अपने वर के घर विदा करने के लिये एक एक पग अहिस्ता आहिस्ता आगे बढाते हुए चल पडे। क़न्या के विदा की मार्मिक वेला आ पहुंची थी।
- लावण्या ( जुलाई ६ , २००० )


Monday, March 24, 2008

वसंतोत्सव

साहित्यिक निबंध
वसंत ऋतु राज का स्वागत है! शताब्दियों से भारत के रसिक कवि-मनिषियों के हृदय, ऋतु-चक्र के प्राण सदृश "वसंत" का, भाव-भीने गीतों व पदों से, अभिनंदन करते रहे हैं।
प्रकृति षोडशी, कल्याणी व सुमधुर रूप लिए अठखेलियाँ दिखलाती, कहीं कलिका बन कर मुस्कुराती है तो कहीं आम्र मंजिरी बनी खिल-खिल कर हँसती है और कहीं रसाल ताल तड़ागों में कमलिनी बनी वसंती छटा बिखेरती काले भ्रमर के संग केलि करती जान पड़ती है। वसंत की अनुभूति मानव मन को शृंगार रस में डुबो के ओतप्रोत कर देती है।
भक्त शिरोमणि बाबा सूरदास गाते हैं -"ऐसो पत्र पठायो नृप वसंत तुम तजहु मान, मानिनी तुरंत! कागद नव दल अंब पात, द्वात कमल मसि भंवर-गात!लेखनी काम के बान-चाप, लिखि अनंग, ससि दई छाप!!मलयानिल पढयो कर विचार, बांचें शुक पिक, तुम सुनौ नार,"सूरदास" यों बदत बान, तू हरि भज गोपी, तज सयान!!
बसंत ऋतु के छा जाने पर पृथ्वी में नए प्राणो का संचार होता है। ब्रृज भूमि में गोपी दल, अपने सखा श्री कृष्ण से मिलने उतावला-सा निकल पड़ता है। श्री रसेश्वरी राधा रानी अपने मोहन से ऐसी मधुरिम ऋतु में कब तक नाराज़ रह सकती है? प्रभु की लीला वेनु की तान बनी, कदंब के पीले, गोल-गोल फूलों से पराग उड़ती हुई, गऊधन को पुचकारती हुई, ब्रज भूमि को पावन करती हुई, स्वर-गंगा लहरी समान, जन-जन को पुण्यातिरेक का आनंदानुभव करवाने लगती है।
ऐसे अवसर पर, वृंदा नामक गोपी के मुख से परम भगवत श्री परमानंद दास का काव्य मुखरित हो उठता है -"फिर पछतायेगी हो राधा, कित ते, कित हरि, कित ये औसर, करत-प्रेम-रस-बाधा!बहुर गोपल भेख कब धरि हैं, कब इन कुंजन, बसि हैं!यह जड़ता तेरे जिये उपजी, चतुर नार सुनि हँसी हैं!रसिक गोपाल सुनत सुख उपज्यें आगम, निगम पुकारै,"परमानन्द" स्वामी पै आवत, को ये नीति विचारै!
गोपी के ठिठोली भरे वचन सुन, राधाजी, अपने प्राणेश्वर, श्री कृष्ण की और अपने कुमकुम रचित चरण कमल लिए, स्वर्ण-नुपूरों को छनकाती हुईं चल पड़ती हैं! वसंत ऋतु पूर्ण काम कला की जीवंत आकृति धरे, चंपक के फूल-सी आभा बिखेरती राधा जी के गौर व कोमल अंगों से सुगंधित हो कर, वृंदावन के निकुंजों में रस प्रवाहित करने लगती है। लाल व नीले कमल के खिले हुये पुष्पों पर काले-काले भँवरे सप्त-सुरों से गुंजार के साथ आनंद व उल्लास की प्रेम-वर्षा करते हुए रसिक जनों के उमंग को चरम सीमा पर ले जाने में सफल होने लगते हैं।
"आई ऋतु चहुँ-दिसि, फूले द्रुम-कानन, कोकिला समूह मिलि गावत वसंत ही,मधुप गुंजरत मिलत सप्त-सुर भयो है हुलस, तन-मन सब जंत ही!मुदित रसिक जन, उमंग भरे हैं, नही पावत मन्मथ सुख अंत ही,"कुंभन-दास" स्वामिनी बेगि चलि, यह समय मिलि गिरिधर नव कंत ही!"
गोपियाँ अब अपने प्राण-वल्लभ, प्रिय सखा गोपाल के संग, फागुन ऋतु की मस्ती में डूबी हुई, उतावले पग भरती हुई, ब्रृज की धूलि को पवन करती हुई, सघन कुंजों में विहार करती हैं। पर हे देव! श्री कृष्ण, आखिर हैं कहाँ? कदंब तले, यमुना किनारे, ब्रृज की कुंज गलियों में श्याम मिलेंगे या कि फिर वे नंद बाबा के आँगन में, माँ यशोदा जी के पवित्र आँचल से, अपना मुख-मंडल पुछवा रहे होंगे? कौन जाने, ब्रृज के प्राण, गोपाल इस समय कहाँ छिपे हैं?
"ललन संग खेलन फाग चली!चोवा, चंदन, अगस्र्, कुमकुमा, छिरकत घोख-गली!ऋतु-वसंत आगम नव-नागरि, यौवन भार भरी!देखन चली, लाल गिरधर कौं, नंद-जु के द्वार खड़ी!!
आवो वसंत, बधावौ ब्रृज की नार सखी सिंह पौर, ठाढे मुरार!नौतन सारी कसुभिं पहिरि के, नवसत अभरन सजिये!नव नव सुख मोहन संग, बिलसत, नव-कान्ह पिय भजिये!चोवा, चंदन, अगरू, कुमकुमा, उड़त गुलाल अबीरे!खेलत फाग भाग बड़ गोपी, छिड़कत श्याम शरीरे!बीना बैन झांझ डफ बाजै, मृदंग उपंगन ताल,"कृष्णदास" प्रभु गिरधर नागर, रसिक कंुवर गोपाल!
ऋतु राज वसंत के आगमन से, प्रकृति अपने धर्म व कर्म का निर्वाह करती है। हर वर्ष की तरह, यह क्रम अपने पूर्व निर्धारित समय पर असंख्य फूलों के साथ, नई कोपलों और कोमल सुगंधित पवन के साथ मानव हृदय को सुखानुभूति करवाने लगता है। पेड़ की नर्म, हरी-हरी पत्तियाँ, रस भरे पके फलों की प्रतीक्षा में सक्रिय हैं। दिवस कोमल धूप से रंजित गुलाबी आभा बिखेर रहा है तो रात्रि, स्वच्छ, शीतल चाँदनी के आँचल में नदी, सरोवर पर चमक उठती है। प्रेमी युगुलों के हृदय पर अब कामदेव, अनंग का एकचक्र अधिपत्य स्थापित हो उठा है। वसंत ऋतु से आँदोलित रस प्रवाह, वसंत पंचमी का यह भीना-भीना, मादक, मधुर उत्सव, आप सभी के मानस को हर्षोल्लास से पुरित करता हुआ हर वर्ष की तरह सफल रहे यही भारतीय मनीषा का अमर संदेश है -
"आयौ ऋतु-राज साज, पंचमी वसंत आज,मोरे द्रुप अति, अनूप, अंब रहे फूली,बेली पटपीत माल, सेत-पीत कुसुम लाल,उडवत सब श्याम-भाम, भ्रमर रहे झूली!रजनी अति भई स्वच्छ, सरिता सब विमल पच्छ,उडगन पत अति अकास, बरखत रस मूलीबजत आवत उपंग, बंसुरी मृदंग चंग,यह सुख सब " छीत" निरखि इच्छा अनुकूली!!
बसंत ऋतु है, फाग खेलते नटनागर, मनोहर शरीर धारी, श्याम सुंदर मुस्कुरा रहे हैं और प्रेम से बावरी बनी गोपियाँ, उनके अंगों पर बार-बार चंदन मिश्रित गुलाल का छिड़काव कर रही हैं! राधा जी अपने श्याम का मुख तक कर विभोर है। उनका सुहावना मुख मंडल आज गुलाल से रंगे गालों के साथ पूर्ण कमल के विकसित पुष्प-सा सज रहा है। वृंदावन की पुण्य भूमि आज शृंगार-रस के सागर से तृप्त हो रही है।
प्रकृति नूतन रूप संजोये, प्रसन्न है! सब कुछ नया लग रहा है कालिंदी के किनारे नवीन सृष्टि की रचना, सुलभ हुई है "नवल वसंत, नवल वृंदावन, नवल ही फूले फूल!नवल ही कान्हा, नवल सब गोपी, नृत्यत एक ही तूल!नवल ही साख, जवाह, कुमकुमा, नवल ही वसन अमूल!नवल ही छींट बनी केसर की, भेंटत मनमथ शूल!नवल गुलाल उड़े रंग बांका, नवल पवन के झूल!नवल ही बाजे बाजैं, "श्री भट" कालिंदी के कूल!नव किशोर, नव नगरी, नव सब सोंज अरू साज!नव वृंदावन, नव कुसुम, नव वसंत ऋतु-राज!"

— लावण्या शाह



http://abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/vasantotsav/vasant.htm

Saturday, March 22, 2008

वहीदा रहमान : मेरे पसंदीदा गीत आज आपके लिए चुनकर , पेश कर रही हूँ

उमर एक बहती नदीया है जिसके बहाव में , इंसान, ख़ुद को बदला हुआ पाता है। साथ रह जातीं हैं यादें , इस जिंदगानी के सुहाने सफर की ...इंसान के अच्छे या बुरे कर्म , ज़माना , याद करता है और जीवन नदिया , बहती रहती है ..ऐसे ही , अविरल, छ्ल , छ्ल...कल कल, पल, पल ...
ऊपर के चित्र में , तारिका शम्मी जी हैं , सुफेद साडी पहने, बीच में वहीदा जी हैं , गुलाबी जामुनी आभा लिए साडी पहने हैं और आशा पारेख हरी साडी में हैं।
इस चित्र में स्वर साम्राज्ञी  सुश्री लता मंगेशकर जी अपनी बहन आशा जी का हाथ थाम कर चल रहीं हैं .. श्री.वहीदा जी व लता जी की जोड़ी ने , ऐसे अनमोल नगमे हिन्दी गीत जगत को दी हैं जोन हम सदा गुनगुनाते रहेंगें ....
मेरे पसंदीदा गीत व नृत्य आज आपके लिए चुनकर , पेश कर रही हूँ !
सुनिए ...और अवश्य बताएं की, आपको ये गाने कैसे लगे ? गीत कई सारे हैं, पर, आज इतने ही
http://www.youtube.com/watch?v=2KEbAecACzc
सर्प नृत्य -- वहीदा रहमान
http://www.youtube.com/watch?v=5XlMuKPOZ0Q&feature=related
तेरे बचपन को जवानी की दुआ देती हूँ -- मुझे जीने दो से
http://www.youtube.com/watch?v=fDGpJ9F5eh4&feature=रेलातेद
रात भी है कुछ भीगी भीगी
http://www.youtube.com/watch?v=0LrOOvLfcQY&feature=रेलातेद
हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबु
http://www.youtube.com/watch?v=k6-uHRa8isY&feature=रेलातेद
बेकरार करके हमें यूँ न जाइए ~~ ये गीत हेमंत दा की सौगात है हम सब के लिए
पियानो पर वही धुन सुनिए ~~~
ahttp://www.youtube.com/watch?v=5kYlSqkS5cU&feature=related

Thursday, March 20, 2008

" राधा के गोरे गोरे गाल , उस पे मोहन ने मल्यो गुलाल ,


बृज का रसिया खेले होरी 
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 राधा : स्वगत :  नाइन के भेस श्याम पायन पखार के ,
एडींन महावर सुरंग अंग दिनों है !
सकुची सलोनी सुकुमार नार , हा ये लाज
आज ब्रिजराजा मेरे काज इत कीनो है ! )
" राधा के गोरे गोरे गाल , उस पे मोहन ने मल्यो गुलाल ,
हो , मोहन मुरली वाले ने , राधे , रंग में रंग डारी !
राधे रंग में रंग डारी
खडी नन्द जू की उजरी अटारी ,

भोरी राधा लागे प्यारी प्यारी
मोहन मुरली वाले ने  राधे रंग में रंग डारी
छम्म छम्म बाजे पायलिया औ ' धिन्न धिन्न बाजे पखवाज
नाचें ताल दै , नगर की नारी , नाचे वृद्ध अरु बाल ,
मोहन मुरली वाले ने राधे रंग में रंग डारी
चुनरी बचा के भाभी चल दीं , माँ - भाभी मैं तो पे निहाल !
जन जन नाच रहा दई ताल कि ,
मोहन मुरली वाले ने राधे रंग में रंग डारी .........
राधे रंग में रंग डारी
भींजी राधा काँपे हुई बेहाल , मोहन ने चुटकी ली काट ओर
अंबर पे उडे रि केसर मिश्रित गुलाल , की मोहन मुरली वाले ने ॥

भोरी , राधे रंग में रंग डारी
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( प्रथम ४ पंक्तियाँ बृज साहित्य से साभार )
( - लावण्या )