Wednesday, May 25, 2022

कण्व ऋषि + कालिदास

 


महर्षि कण्व :
त्रेता युगीन महर्षि कण्व ऋग्वेद के मन्त्र प्रदाता रहे हैं। शुक्ल यजुर्वेद शाखा में कर्णेष व कण्व इन नाम का उल्लेख प्राप्त होता है। दक्षिण भारत की अति प्राचीन तमिळ भाषा के व्याकरणकार कण्व ऋषि रहे हैं।
उत्तराखण्ड़ की देवभूमि में मालिनी नदी के तट पर पवित्र कण्वाश्रम स्थित है।
महाराष्ट्र प्रांत के कनालदा ग्राम में, गिरना नदी तट पर भी एक कण्व आश्रम है ~
इस आश्रम में  शुकन पक्षी वृन्द के  मध्य में, अप्सरा मेनका द्वारा त्याज्य तथा  ऋषि विश्वामित्र की नवजात कन्या शकुंतला को महर्षि कण्व ने प्रथम बार देखा था। ऋषि कण्व ने अबोध बालिका को भूमि से यहीं प्रथम उठाया था इसका उल्लेख मिलता है । " निरंजन च वर्णे यस्मा च कुंतेहि परिरक्षिता  शकुन्तले य इति नामस्याः क्रितम च अपि ततोह मया " अर्थात : घने अरण्य में वह शकुन्त पक्षियों के मध्य सुरक्षित थी इस कारण इसे शकुंतला नाम दे रहा हूँ।
~~ कण्व ऋषि
कालिदास ~
संस्कृत भाषा के महाकवि कहलानेवाले सुविख्यात कवि  कालिदास का जन्म उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले के कविल्ठा गांव में हुआ था। कविल्ठा चारधाम यात्रा मार्ग में गुप्तकाशी में स्थित है।  गुप्तकाशी से कालीमठ सिद्धपीठ वाले रास्ते में कालीमठ मंदिर से चार किलोमीटर आगे कविल्ठा गांव है। बिहार के मधुबनी जिला के उच्चैठ ग्राम में कहा जाता है विद्योतमा (कालिदास की पत्नी) से
शास्त्रार्थ में पराजय के बाद कालिदास वहीं गुरुकुल में रुके थे । कालिदास को यहीं उच्चैठ की देवी भगवती से ज्ञान का वरदान प्राप्त हुआ था ऐसी कथा सुविख्यात है यहां आज भी कालिदास स्मृति में बसा डीह है। यहाँ की मिट्टी से बच्चों के प्रथम अक्षर लिखने की परंपरा आज भी यहाँ प्रचलित है।
कालिदास का उत्कर्ष अग्निमित्र के बाद १५०  ई॰ पू॰ - ६३४  ई॰ पूर्व का  रहा है। जो कि प्रसिद्ध ऐहौले  के शिलालेख की तिथि है,  इस में कालिदास का महान कवि के रूप में उल्लेख हुआ है।  कथाओं व किंवदंतियों के अनुसार कालिदास शारीरिक रूप से बहुत सुंदर थे।  किन्तु कहा जाता है कि प्रारंभिक जीवन में कालिदास अनपढ़ व महामूर्ख थे।
प्रश्न : एक साधारण  व्यक्ति से कालिदास, महाकवि किस प्रकार बने ?  इस से तथ्य से अति रोचक कथाएँ जुडी हुईं हैं। आज भी कालिदास की प्रेरक जीवनी जन मन को प्रेरणा देने में सक्षम है। भाषा सौंदर्य सशक्त साहित्यकार के मस्तिष्क से निसृत जन मानस के लिए दिया दैवी प्रसाद होता है।
कालिदास की जीवन कथा ~ कालिदास का विवाह विद्योत्तमा नाम की राजकुमारी से हुआ था  ऐसा कहा जाता है। राजकुमारी विद्योत्तमा अत्यंत बुद्धिमती थीं जिससे अभिमानी हो गईं थीं। उसने  प्रण लिया था  कि जो पुरुष
उसे शास्त्रार्थ में पराजित करने में सक्षम होगा, वह उसी के साथ विवाह करेगी। जब विद्योत्तमा ने शास्त्रार्थ में कई  विद्वानों को पराजित किया तो वे अपनी पराजय से मन ही मन कुपित हुए।  अपमान हुआ है ऐसे विचार से कर कुछ विद्वानों ने बदला लेने के लिए विद्योत्तमा का विवाह, महामूर्ख व्यक्ति के साथ कराने का निश्चय किया। वे किसी मुर्ख पुरुष की शोध में नगर भ्रमण करते हुए मार्ग में चलते चलते दूर आये। मार्ग में उन्हें एक वृक्ष दिखाई दिया जिस पर एक व्यक्ति वह जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था।  इस दृश्य को देख कर सभासदों ने सोचा कि " अरे यह युवक महा - मूरख लगता है !  इससे बड़ा मूर्ख तो कोई होगा ही नहीं !  "उन्होंने उसे राजकुमारी से विवाह का प्रलोभन देकर नीचे उतारा तथा समझा बुझा कर कहा-  " ए युवक तुम मौन धारण कर लो किन्तु जो हम कहें  वैसे ही करना "। धूर्त सभासदों ने स्वांग भेष बना कर उस युवक को राजकुमारी विद्योत्तमा के समक्ष प्रस्तुत किया।
     सभासदों का यह परिचय कथन कि " हमारे गुरु, आप से शास्त्रार्थ करने के लिए आए है, परंतु अभी मौनव्रती हैं, इसलिए वे, हाथों के संकेत से उत्तर देंगे। इनके संकेतों को समझ कर, हम वाणी में आपको उसका उत्तर देंगे।" विद्योत्तमा को अपने ज्ञान पर पूर्ण भरोसा था उसे दृढ विश्वास था कि वह इस युवक को परास्त कर देगी। अतः वह राजी हो गयी। शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ।
       राजकुमारी विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछने लगी। कालिदास अपनी बुद्धि से, मौन संकेतों से ही जवाब देने लगे।  प्रथम प्रश्न के रूप में विद्योत्तमा ने संकेत से एक उंगली दिखलाई --> आशय था कि- " ब्रह्म एक है।"
परन्तु कालिदास ने समझा कि, ये राजकुमारी मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है !
क्रोध में उन्होंने दो अंगुलियों का संकेत इस भाव से किया कि," तू मेरी एक आंख फोड़ेगी तो मैं - तेरी दोनों आंखें फोड़ दूंगा। " लेकिन सभासद जो कपटी थे वहीं उपस्थित थे। उन्होंने कालिदास के संकेत को कुछ इस तरह समझाया ~ कहा कि,
" राजकुमारी जी आप कह रही हैं कि ब्रह्म एक है लेकिन हमारे गुरु कहना चाह रहे हैं कि,"उस एक ब्रह्म को सिद्ध करने के लिए दूसरे (जगत्) की सहायता लेनी होती है।  अकेला ब्रह्म स्वयं को सिद्ध नहीं कर सकता। " राज कुमारी ने दूसरे प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया ! आशय था कि," तत्व पांच है। " उसे देख कर कालिदास को लगा कि, 'यह कन्या थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है !' उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखलाया कि," तू यदि मुझे गाल पर थप्पड़ मारेगी,
मैं घूंसा मार कर तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा। "  सभासद मण्डली उन कपटियों की टोली ने समझाया कि, " राजकुमारी जी गुरु कहना चाह रहे हैं कि, भले ही आप कह रही हो कि पांच तत्व अलग-अलग हैं पृथ्वी, जल, आकाश, वायु एवं अग्नि।
परंतु यह तत्व प्रथक्-प्रथक् रूप में कोई विशिष्ट कार्य संपन्न नहीं कर सकते।
अपितु आपस में मिलकर एक होकर-  उत्तम मनुष्य शरीर का रूप ले लेते है जो कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है।" इस प्रकार प्रश्नोत्तर से अंत में, विद्योत्तमा ने अपनी हार स्वीकार कर ली ।  शर्त के अनुसार कालिदास के संग राजकुमारी  विद्योत्तमा का विवाह हुआ।
विवाह  पश्चात कालिदास विद्योत्तमा को लेकर अपनी कुटिया में आये।
प्रथम रात्रि को  दोनों संग थे तो उसी समय रात्रि की नीरवता भंग करता हुआ ऊंट का स्वर सुनाई दिया । विद्योत्तमा ने संस्कृत में प्रश्न किया "किमेतत्" ? अर्थ : यह कौन प्राणी है ? "परंतु कालिदास के लिए तो संस्कृत भाषा काला अक्षर भैंस बराबर थी ! कालिदास ने सोचा ' शायद मेरी नवोढ़ा पत्नी भयभीत हो रही है ! "
अतः झट से उनके मुंह से निकल गया "ऊट्र" ऊट्र " ~~  कालिदास के स्वर से यह सुनते ही विदुषी विद्योत्तमा को पता हो गया कि, कालिदास निपट अनपढ़ हैं।  क्षण मात्र में चतुर राजकुँवरी ने सभासदों की क्रूर मंत्रणा तथा उसे अपमानित करने की इस कुटिल चाल को  भाँप लिया। वह क्रोध अतिरेक से अत्यंत कुपित  हो, थर थर कांपने लगी !  पलट कर विद्योत्तमा ने कालिदास को धिक्कारा ! गृह से निष्काषित करते हुए आदेश दिया कि, " सच्चे विद्वान् बने बिना लौटना नहीं । "

कालिदास अपनी नव परिणीता पत्नी के क्रोध एवं वाक् बाणों से अत्यंत शोकमग्न हो गए। राजकुमारी के आदेश पर गृहत्याग कर, कालिदास निर्जन वन की दिशा में अश्रु भरे नयनों से चल दिए। नगर की सीमा में स्थित देवी ग्रामदेवी के मंदिर में रात्रि का समय था सो, आश्रय लिया।शोकाकुल कालिदास ने माता भगवती देवी की प्रतिमा को निहारा तथा सच्चे मन से काली देवी की आराधना करना आरम्भ किया।  कहते हैं कि अतीव शोकाकुल अवस्था में कातर स्वर से रुदन करते हुए कालिदास ने मंदिर के गर्भ गृह में रखा देवी माँ का खड़ग उठा लिया तथा अपनी गरदन पर वार करने को उद्यत हुए करूण  स्वर से पुकारा ~~
" हे माँ मेरा शीश काट कर तुम्हारे चरणों पे न्योछावर कर रहा हूँ ! माता मेरा जीवन मिथ्या है।  अब आप ही मुझे मुक्ति दें  " कहते हैं कि, माता भगवती सच्चे मन से की हुई प्रार्थना सुन कर प्रकट हो गईं !
" आँहाँ हाँ पुत्र ! यह क्या कर रहे हो ? माता को अपने पुत्र की जीव ह्त्या अस्वीकार है  "  तद्पश्चात माता भगवती शारदा, महाकाली, महालक्ष्मी, महागौरी, देवी सरस्वती बारी बारी से मंदिर के गर्भगृह में साक्षात प्रगट हुईं तथा भक्त कालिदास को आशीर्वाद दे कर अंतर्धान हुईं ! साक्षात देवी का कान्तियुक्त स्वरूप जाकर मंदिर की पाषाण प्रतिमा में विलीन हुआ। देवी भगवती कालिका के आशीर्वाद से कालिदास के अन्तर्चक्षुः, ज्ञानेन्द्रियाँ दीप्त हो गईं।  देवी कृपा से कालिदास महामूर्ख से परिवर्तित हो कर परंम ज्ञानी बन गए।  असीम ज्ञान प्राप्ति से प्रदीप्त व्यक्तित्त्व लिए कालिदास पुनः स्वगृह  लौटे। 
अपनी पत्नी राजकुँवरी विद्योत्तमा के राज प्रासाद का द्वार खटखटा कर कालिदास ने कहा " कपाटम् उद्घाट्य सुन्दरि! (दरवाजा खोलो, सुन्दरी) " विद्योत्तमा ने चकित होकर कहा --" अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोई विद्वान लगता है )"  किम्वदन्ती के अनुसार, कालिदास ने विद्योत्तमा को अपना पथप्रदर्शक तथा  गुरु माना। अपनी पत्नी के कहे इस एक वाक्य को विद्योत्तमा द्वारा उच्चारित ३ शब्दों से, आगे के काल में कालिदास ने तीन महाकाव्य रच डाले ! इस भाँति अपने काव्यों द्वारा  अपनी विदुषी पत्नी को कालिदास नेसाहित्यकार के रूप में अपनी श्रद्धा व स्नेह - आदर प्रदान किया।
१ ) कुमारसंभवम् का प्रारंभ होता हैअस्त्युत्तरस्याम् दिशि… से,
२) मेघदूतम् का पहला शब्द है- कश्चित्कांता…३) रघुवंशम् की शुरुआत होती है- वागार्थवि  से।
कालिदास ने तीन नाटक (रूपक): अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् तथा  मालविकाग्निमित्रम्;  दो महाकाव्य: रघुवंशम् व  कुमारसंभवम्; तथा  दो खण्डकाव्य: मेघदूतम् और ऋतुसंहार की रचना की। 

महाकाव्य : अभिज्ञान शाकुंतलम के रचियेता की दूर देश में ख्याति एक पुस्तक में
काव्य शीर्षक का अर्थ है  ~ शकुंतला से परिचय ~ जर्मनी के साहित्यकार गोथे ने अभिज्ञान शाकुंतलम का पाठ किया था। वे कालिदास रचित काव्य को पढ़ कर आश्चर्य मिश्रित महाआनंद में डूब गए थे ! जनश्रुति है कि शाकुंतलम की पुस्तक को अपने सर पे उठाकर, गोथे  आह्लादित होकर नृत्य करने लगे।  गोथे ने  अभिज्ञान शाकुंतलम के लिए कहा कि, " यह कोइ साधारण ग्रन्थ नहीं है  अपितु साहित्य जगत की अप्रतिम एवं शाश्वत एवं अमर कृति है ! " अभिज्ञान शाकुंतलम " मानव इतिहास की प्रगति एवं विकास को प्रतिबिंबित करता सा स्वर्णिम पृष्ठ  है। यह साहित्य कृति नव पल्ल्वित पुष्प को  रसीले फल में रूपांतरित होने की नैसर्गिक प्रक्रिया का अनुसरण करती  हुई सी प्रतीत होती है। या धरती पर  मानवीय जीवन के अनुभवों को स्वर्गिक आनंद सिंधु में डूबने की आह्लादानुभूति करवाती सी रहस्यमयी प्रक्रिया सी अमर कृति है। या हम ऐसा भी कहें कि  मानवीय शरीर की संरचना जिस प्रकार पांच महाभूत के शाश्वत तत्त्वों से निर्मित होती है तथा उस भौतिक शरीर के आत्मिक अनुभव सदृश्य परिवर्तन का अद्भुत इतिहास समेटे हुए है ठीक उसी भाँति यह अविस्मरणीय साहित्यिक कृति है "
       अभिज्ञान शाकुंतलम रूपक काव्य में प्रयुक्त उपमाओं के लिए, संस्कृत-साहित्य के रचाकारों में महाकवि कालिदास अग्रणी हैं। वे जगत में सुप्रसिद्ध हैं। शाकुन्तल में भी उनकी उपयुक्त उपमा चुनने की शक्ति भली-भांति प्रकट हुई है । शकुन्तला के विषय में एक जगह राजा दुष्यन्त कहते हैं कि ‘वह ( शकुंतला ) ऐसा फूल है, जिसे किसी ने सूंघा नहीं है; ऐसा नवपल्लव है, जिस पर किसी के नखों की खरोंच नहीं लगी; ऐसा रत्न है, जिसमें छेद नहीं किया गया  तथा  ऐसा मधु है, जिसका स्वाद किसी ने चखा नहीं है।’
शकुंतला कथानक का आकर्षण ~ सदियाँ व्यतीत हो जाने पर भी  अदम्य रहा है। तथा समयावधि से परे देश विदेश में प्राचीन काल से आधुनिक युगों तक अक्षुण्ण रहा है। शकुंतला की कालजयी कथा की लौ ~ मानव समुदाय के मध्य निर्धूम सदियों से अपना उजाला बिखेरती रही है।

शकुंतला कथा की लोकप्रियता के उदाहरण :
भारत के बंगाल प्रांत में साहित्यकार ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने बांग्ला की प्राचीन साधू भाषा में शाकुंतलम पर आधारित नवलिका लिखी। यह संस्कृत से बंगाली भाषा का सर्व प्रथम अनुवाद है।कुछ समय पश्चात चलित भाषा बांग्ला के उप प्रकार में अबनींद्रनाथ टैगौर ने इस कथा को युवा वर्ग के लिए लिखा।
यूरोपीय देशों में सं १८०८ में कार्ल विल्हम फ्रेड्रिच शीगल महाशय ने महाभारत आदि पर्व से जर्मन भाषा में  शकुंतला की कथा को अनुवादित कर, प्रस्तुत किया। उसी के आधार पर सं. १८१९ में फ्रान्ज़ शूबर्ट ने रंगमंच के लिए नृत्य नाटिका शकुंतला तैयार की थी किन्तु यह प्रयास अपूर्ण रह गया। सं. १८२३ शकुंतला बेले नृत्य विधा  द्वारा अर्नेस्ट रेयर तथा थियोफाईल गौटियेर ने प्रस्तुत की थी। सं.१९०२ में रशियन संगीत कार श्रीमान सर्गे बाळासानियान ने रीगा शहर में शकुंतला नृत्य नाटिका तैयार की थी। सं.१९२१ में इटली के संगीतज्ञ श्रीमान फ्रांको अल्फानो ने " किंवदंती शकुंतला की " नामक ओपेरा तैयार किया था।
समाप्त :
~ लावण्या

अमर युगल दुष्यंत ~ शकुंतला की प्रणय गाथा ~


चंद्रवंश एक प्रमुख प्राचीन भारतीय क्षत्रियकुल आर्यों के प्रथम शासक (राजा) वैवस्वत मनु हुए। मनु की एक कन्या भी थी - इला जिस का विवाह बुध से हुआ जो चंद्रमा का पुत्र था। उन से पुरुरवस्‌ की उत्पत्ति हुई।  ईला के पुत्र "ऐल " कहलाए  वे, चंद्रवंशियों के प्रथम शासक हुए ।
पुरुरवा के छ: पुत्रों में आयु और अमावसु प्रसिद्ध हुए। महाराज आयु प्रतिष्ठान नगर के शासक हुए तो महाराज अमावसु कान्यकुब्ज नगर में एक नए राजवंश की स्थापना की। आगे कान्यकुब्ज के राजाओं में, जह्वु प्रसिद्ध हुए जिनके नाम पर गंगा का नाम ' जाह्नवी ' पड़ा।  महाराज आयु के राज्य शासन के उपरांत उन का ज्येष्ठ  पुत्र, नहुष प्रतिष्ठान का शासक हुआ।  नहुष के छह पुत्रों में ययाति को राजगद्दी प्राप्त हुई। महाराज ययाति के पाँच पुत्र हुए - यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु व  पुरु। आगे चलकर यही पुरु वंश -- यादव, तुर्वसु, द्रुह्यु, आनव व  पौरव कहलाए। ऋग्वेद में इन को पंचकृष्टय: कहा गया है। पौरवों ने मध्यदेश में अनेक राज्य स्थापित किए। गंगा व यमुना- नदियों के भूभाग पर शासन करनेवाले हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत का जन्म इसी पुरू कुल में हुआ तथा दुष्यंत अत्यंत सुप्रसिद्ध हुए। 

शकुंतला : शकुंतला व दुष्यंत की अमर युगल कथा महाभारत के आदिपर्व में
कथा का आरम्भ है। अत्यंत तेजस्वी ऋषि विश्वामित्र से होता है। यूं तो विश्वामित्र राजा थे किन्तु अपनी प्रखर तपस्या एवं तपोबल के कारण वे राजर्षि कहलाये। उन्हें कौशिक भी कहा जाता था। विश्वामित्र  गायत्री महामंत्र के द्रष्टा व परम उपासक थे। भूलोक में विश्वामित्र जैसे तपस्वी माँ गायत्री की आराधना कर रहे थे किन्तु स्वर्गलोक में देवराज इंद्र की राजधानी अमरावती स्वर्गलोक में  इंद्र घबड़ा रहे थे कि प्रखर तपस्या के बल से राजर्षि विश्वामित्र कहीं उनका इन्द्रत्व न हथिया लें । इंद्र के पास प्राचुत बैभव विलास उपलब्ध था। श्वेत हाथी ऐरावत भी था इंद्रसभा में अत्यंत रूपवती अप्सराएँ उर्वशी रम्भा, मेनका, तिलोत्तमा इत्यादि भी थीं । इंद्र ने तपस्यारत महर्षि विश्वामित्र की प्रबल तपस्या  भंग करने के हेतु से इंद्रलोक की सर्वांङ्ग सुंदरी अप्सरा मेनका को विश्वामित्र के समीप तत्क्षण प्रकट होने का आदेश दे दिया अतः अप्सरा मेनका ऋषि विश्वामित्र के समक्ष आ पहुँची।
  मेनका की सुंदरता से मोहित विश्वामित्र की तपस्या भंग हुई व इंद्र की युक्ति सफल हुई। अप्सरा मेनका गर्भवती हुई ! उसने  एक अत्यंत रूपवती कन्या को जन्म  दिया किन्तु अप्सरा मेनका  उसे जन्म दे उस अबोध बालिका को मालिनी नदी के तट पर छोड़, बालिका का परित्याग कर, पुनः इंद्रलोक चलीं गईं ।
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कुछ समय पश्चात कण्व ऋषि उस निर्जन स्थान पे आ पहंचे तो आश्चर्यचकित हो देखते रह गए कि शकुन पक्षियों द्वारा रक्षित एवं पालित एक अबोध नवजात शिशु  अति सुँदर नन्ही बालिका, धरा पर अपनी नन्ही नन्ही हथेलियों को भींचे कीलक रही है। ऋषि कण्व का ह्रदय उस अबोध शिशु की असहाय अवस्था देख पसीज गया। ऋषिवर ने  बालिका को भूमि से उठा लिया। शकुन पक्षी द्वारा जल पिला कर, बालिका की  प्राण - रक्षा करने के कारण, महर्षि कण्व ने उस कन्या को "शकुन्तला " नाम से पुकारा।  अतः यही नाम उस कन्या को मिला ! निर्जन वन से मिली इस कन्या शकुन्तला को ऋषि कण्व ने, अपनी पुत्री के रूप में  लालन-पालन करना आरम्भ किया ।
दुष्यंत का अर्थ के लिए इमेज परिणाम
शकुंतला कण्व ऋषि को पिता के स्थान पर अपनी श्रद्धा  एवं आदर दिया करती। आश्रम के पेड़ पौधों को वह नियमित जल पिलाती। आश्रम के आसपास वन प्राणी निर्भय होकर शकुंतला का स्नेह पाने आया करते। हिरणों को वह स्नेह सहित पुचकारती तो वे समीप आकर शकुंतला की कोमल हथेली से हरी नरम घास खाते
          एक दिन की बात है, हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत उसी वन में, आखेट करते हुए आ पहुंचे। दुष्यंत का अश्व तेज दौड़ता रहा तो महाराज दुष्यंत साथ के घुड़सवार पीछे छूट गए।अश्व दौड़ता रहा महाराज दुष्यंत वन प्रांतर की मनोहर सुषमा को निहारते हुए कण्व आश्रम के पास आ पहुंचे। सूर्य नारायण मध्याह्न आकाश में प्रदीप्त थे। अब महाराज दुष्यंत को प्यास लगी। अश्व को रोक कर वे उतरे।
आसपास दृष्टि दौड़ाई तो देखते क्या हैं कि एक अपूर्व सुंदरी कन्या मृग छौने के पास बैठी है। वे ये दृश्य ठगे से देखते ही रह गए। कितने ही क्षण ध्यान समाधिवत बीत गए। दुष्यंत समीप आए तथा मधुर व शाँत स्वर से प्रश्न किया।
दुष्यंत : " हे वन कन्या क्या तुम इंद्र सभा की अप्सरि हो ? "
शकुंतला अपरिचित किन्तु राजसी वस्त्र धारण किये हुए सुशोभन पुरुष को एकटक देखने लगी तथा लज्जावश शकुंतला के मुखमंडल पर अरुणिम आभा नैसर्गिक प्रतिक्रिया वश फ़ैल गयी। अब तो शकुंतला के कँवल सदृश्य गुलाबी मुख को लज्जा मिश्रित मंद मुस्कान कन्या को दिव्य आभा से दीपित करने लगी इस से सौंदर्य श्री में अभिवृद्धि हुई।
अब तो महाराज दुष्यंत इस अद्भुत वन कन्या के सौंदर्य को निहारते हुए कामदेवता अनंग के पुष्प बाण से मानों बिजली गिरी हो यूं बींध से गए। वे शकुंतला के समीप आये तथा अपने बलिष्ठ भुजा से उस अपूर्व सुंदरी की हथेली थामते हुए बोले, ' मैं दुष्यंत हूँ वन कन्या ! अब तुम अपना परिचय दो ' स्पर्श से रोमांचित हुई शकुंतला धरा पे दृष्टि गड़ाए लजाती हुई अपनी स्वर्ण किंकिणि सामान स्वर  मधुर वाणी से बोली,  " कण्व आश्रम में आपका स्वागत है. .... मेरे पिताश्री उपस्थित नहीं हैं मैं शकुंतला हूँ। .."
इस परस्पर आकर्षण व परिचय के पश्चात दुष्यंत व शकुंतला प्रणय पाश में बँध गए। दोनों ने गन्धर्व विवाह कर लिया। प्रकृति की मनुष्य पर सदैव विजय होती ही है। निमिष मात्र में जो प्रीत का बँधन बँधा वह क्षण, दिवस - रात्रि, समयावधि की सीमा रेखा से परे,  प्रेम - पंछी युगल अब क्रीड़ा - कल्लोल करते हुए सुख भोग करते रहे इस प्रणय वेला में वे मानों समस्त विश्व को ही भुला बैठे।

महाराज दुष्यंत को ढूंढते हुए उनके सैनिक वृन्द के आने पर भाव - समाधि टूटी। प्रेमी दुष्यंत अपनी प्रेयसी शकुंतला को समझाने लगे कि ' वे दोनों शीघ्र साथ होंगें। अपनी ऊँगली से रत्न जड़ित राज मुद्रिका उतार कर दुष्यंत ने शकुंतला को पहनाते हुए वचन दिया ' आज पश्चात तुम सदा सदा के लिए मेरी हुईं। यह मुद्रिका सम्हाल कर रखना प्रिये , वह  क्षण कितना अलौकिक होगा जब हमारा पुनर्मिलन होगा ! मैं दुष्यंत, हमारे प्रणय की साक्षिणी इस स्वर्ण मुद्रिका को, तुम्हारी कोमल ऊँगली पे पुनः सुशोभन  हुए देखूंगा। अपने पिताश्री ऋषि कण्व की आज्ञा ले कर  तुम मेरे राजभवन को सुशोभित करने आ जाओगी। अधीर हूँ किन्तु मुझे उस क्षण की प्रतीक्षा रहेगी आओगी न प्रिये ?  वचन दो !  "
शकुंतला का नन्हा सा ह्रदय अपने संग घटित हुए इन क्षणों को अभी ठीक से समझ भी नहीं रहा था कि, प्रेम सम्बन्ध परीणय के पश्चात अब बिछुड़ना यह घटनाचक्र तेज गति से शकुंतला के साथ घटने लगे थे।  भाग्य में यही सब लिखा था ! सो वही घटित हो रहा था जो नियति नटी करवाती है !
    शकुंतला एक अबोध किशोरी कन्या से, अब परिणीता हो चुकी थी। अपने स्वामी व सखा दुष्यंत को पुनः मिलने की आशा संजोये, भोली  शकुंतला अपनी आश्रम निवासिनी सखियों के संग मूक हिरनी सी चल दीं। वह बिरहिणी बार बार पीछे मुड़ कर अपने प्रेमी की आकृति मन में लेखती रही ! शकुंतला अब अकेली रह गई । 

राजा रवि वर्मा की कलाकृति
ऋषि कण्व आश्रम लौट कर आये तब शकुंतला की सखियों ने हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत के आगमन व प्रस्थान का वृतांत उन्हें विस्तार से कह सुनाया।
ऋषि कण्व ने अपनी पुत्री शकुंतला को गले लगाया तथा पुष्टि करते हुए प्रण किया कि,"वे शकुंतला को अपने पति महाराज दुष्यंत की राजधानी हस्तिनापुर अवश्य भेजने का प्रबंध करेंगें। महर्षि  शकुंतला से बोले ~ ' पुत्री, आश्रम के द्वार सदैव तुम्हारी प्रतीक्षा में विकल रहेंगें जिस भाँती यह मृग छौने रहेंगें। किन्तु पुत्री तुम इनकी चिंता न करना। आश्रम व वन प्रांत के समस्त पशु पक्षी, पेड़ पौधे तुम्हारे बिछोह से व्यथित तो अवश्य होंगें किन्तु तुम्हारे परिणय से संतुष्ट भी होंगें। बेटी, तुम सुख से अपने पति के व स्वगृह के लिए प्रस्थान करना !  मेरा तथा समस्त आश्रमवासियों का आशीर्वाद तुम्हारे संग संग रहेगा। '
    शकुंतला ने वृद्ध हो रहे ऋषि कण्व की ममता से गूँथी वाणी सुन कर उनके चरणों पर झुक गई।  अपने पिता समान ऋषिवर के आदर पूर्वक चरण स्पर्श किये तथा प्रसन्न हो कर वह दूर एक पेड़ की छाया में बैठ गयी।
संतुष्ट होकर तब वह अपने प्रियतम महाराज  दुष्यंत को पत्र लिखने लगी।
shakuntala (sybolic image)
मन ही मन आनंदित हो रही शकुंतला, अपने महाराज दुष्यंत से अपने आगमन के समाचार देते हुए आश्रम वासी ऋषि कण्व की सहर्ष अनुमति प्राप्त हुई है यह शुभ सन्देश पात्र द्वारा देना चाह रही थी।  इस आनंदानुभूति के क्षण में शकुंतला बाह्य वातावरण को लगभग भूल चुकी थी। भविष्य के मधुर स्वप्न अपने कोमल मन में संजोये, आशा की बेल को आकाश में फैलते हुए मानों निहारती हुई शकुंतला का ध्यान एकमात्र इस पत्र में केंद्रित हो गया। सम्पूर्ण  विश्व की गतिविधियाँ मानों ओझल हो गईं। अचानक एक कठोर स्वर ने शकुंतला को झकझोर कर भाव समाधि से हठात जगाया। शकुंतला उस कठोर स्वर से मानों जाग कर भयभीत चकित मृगी - सी ऋषि दुर्वासा के  क्रोध से रक्ताभ  हो रहे नयनों को विस्फरित नेत्रों से देखती रह गयी ऋषि दुर्वासा के क्रोधित मुख  से वह आहत होने लगी।

चित्र : शकुंतला द्वारा क्रोधित हुए ऋषि दुर्वासा
ऋषि दुर्वासा : " हे अभिमानी कन्या ! मैं ऋषि दुर्वासा तुम्हारे आश्रम का अतिथि हूँ।  मैं बारम्बार तुम्हें पुकारता रहा किन्तु तुमने तनिक भी ध्यान न किया।
    मेरी अवज्ञा करने वाली हे हठी कन्या। .. जाओ -- मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि जिसके ध्यान में मग्न होकर तुमने मेरी अवहेलना की है,  वही व्यक्ति तुम्हें भूल जाएगा "  कुपित ऋषि दुर्वासा का क्रोध अब भी शांत न हुआ था।  ऋषि कण्व व शकुंतला ने बारम्बार ऋषि दुर्वासा से क्षमा याचना की किन्तु सर्व प्रयास असफल रहे ! कुछ समय पश्चात दुर्वासा ने इतना अवश्य कहा कि, ' यदि किसी परिचित वस्तु को वह व्यक्ति देख लेगा तो उसे शकुंतला का स्मरण हो जाएगा। ' इस आशा की एक किरण से अपने महाराज दुष्यंत से पुनर्मिलन की आशा संजोये
शकुंतला आश्रम से हस्तिनापुर नगर जाने के लिए निकली। कण्व ऋषि शोकाकुल हुए तथा बोले कि, " पुत्री की इस बिदा - बेला के करूण क्षण में,यदि मेरी इस पालित पोषित कन्या के बिछोह से मैं इतना अधिक शोक संतप्त हूँ तब संतानों के बिछोह से अन्य गृहस्थ जन के मन की पीड़ा व संताप कितना अधिक होता होगा
उस की कल्पना भी नहीं कर पा रहा हूँ  "
ऋषि कण्व ने अपनी लाड़ली शकुंतला के संग आश्रम के बटुक विद्यार्थी भी देखभाल के लिए संग बिदा  किये।
    आश्रम से विदा होकर शकुन्तला, अब यात्रा करतीं हुईं नौका  में सवार हुई। उन्हें नदी जो पार करनी थी। नदिया का नीला जल हीलोरें ले रहा था।  जल में स्वर्णिम आभा लिए, चटुल मछलियाँ तैर रहीं थीं। शकुंतला के नयनों के अश्रु अभी सूखे न थे किन्तु दयावश अपने संग लाये अन्न के कण, वह मछलियों को खिलाने के लिए जल में बहाने लगी। मछलियां जल की सतह पे आ आ कर झट से अन्न कण मुंह में भर लेतीं। शकुंतला का ध्यान अब मछलियों के संग इस खेल में लग गया। मन अब यहां आ गया। दुर्वासा ऋषि का श्राप अब घटित होने को था सो अनहोनी घटनी ही थी सो घट ही गई ! भोली  शकुंतला को सुध ही न रही कि किस क्षण, उसकी ऊँगली से, निकल कर दुष्यंत की दी हुईराज मुद्रिका जल में फिसल कर डूब गई । शकुंतला इस दुर्घटना से अनभिज्ञ ही रही।
    महाराज दुष्यंत की राजधानी हस्तिनापुर में शकुंतला का आगमन ~~
हस्तिनापुर के राज प्रासाद में शकुंतला का आगमन हुआ। महाराज दुष्यंत राज सिंहासन पर आरूढ़ थे।
शकुंतला के संग आये आश्रमवासी बटुक ने महाराज को अवगत करवाते हुए आश्रम भगिनी शकुंतला का परिचय देते हुए कहा कि ' हे परम प्रतापी महाराज दुष्यंत,  यह आश्रम निवासिनी कन्या शकुंतला मेरी भगिनी हैं - ऋषि कण्व की पालित पोषिता कन्या हैं एवं यह आपकी भार्या हैं। अतः आप इन्हें स्वीकारें महाराज ' महाराज दुष्यंत ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण अपनी प्रेयसी पत्नी शकुंतला की स्मृति विस्मृत कर चुके थे। अतः महाराज दुष्यंत ने कहा, ' मेरे लिए यह यह सन्नारी सर्वथा अपरिचितता हैं ! यदि आप का कथन है कि मेरा इनसे कोइ पूर्व परिचय है तो  परिचय चिह्न दिखलाया जाए ' शकुंतला को सहसा दुष्यंत की दी हुई राज मुद्रिका का ध्यान हो आया ! " हाँ वही दिखला दूँ " यह सोच कर शकुंतला ने हथेली पे दृष्टि फेरी तो ऊँगली पर वह मुद्रिका न थी !" हा ~ देव यह कैसा दुर्भाग्य ! " असहाय शकुंतला व्यथित हो उठीं ! किन्तु शोक संतप्त शकुंतला के नयन कोर से अश्रु उमड़े तो ह्रदय में क्षोभ भी उमड़ पड़ा !
मानिनी शकुंतला असहाय तो थीं किन्तु क्षणार्ध के लिए भी अब इस राज प्रासाद में वे, रुकी नहीं ! अपना उत्तरीय नेत्रों से लगाए, स्वाभिमानी शकुंतला, महाराज दुष्यंत का राजमहल व महानगर  त्याग कर निर्जन वन की दिशा  में अकेली ही चल दीं !
Forsaken Sakuntala painting 
शकुंतला की व्यथा ~ कथा ~ महाराज दुष्यंत ने दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण अपनी प्रिया शकुंतला को पहचाना नहीं तब शकुंतला राज्य सभा का त्याग कर नगर से दूर निर्जन वन की दिशा में चलीं गईं। महाराज दुष्यंत शकुंतला के प्रस्थान के पश्चात राजकरण से उदासीन रहने लगे। मन ही मन वे द्वंद्व में रहने लगे।
ना ही सँगीत भाता नाही नृत्यांगनाओं का सम्मोहन उन्हें बाँध पाता ! मंत्री गण व सभासद सभी अपने महाराज की मनोदशा देख कर खिन्न रहते। कोइ उपाय सूझ न रहा था जो महाराज को प्रसन्न कर सके।
      एक दिवस एक मछुआरा राज सभा में उपस्थित होने की गुहार लगाता हुआ द्वारपालों से ऊँचे स्वरों में  कहने लगा " महारज्ज के समीप ले चलो मुज्हे शीघ्र राजसभा में चलो ! " द्वारपाल उसे महाराज दुष्यंत के समक्ष ले आये।  मछुआरे ने सविनय प्रणाम करते हुए सहर्ष उदगार किया, " महाराज की जय हो ! हे परम प्रतापी अन्नदाता ! आज एक अद्भुत काण्ड हुआ ! मेरे जाल में एक बड़ी मछली फंस गई जिस का मुख खुला था ! मैंने देखा तो स्वर्ण मुद्रिका मत्स्य के मुख में फंसी थी। महाराज ! यह रही वह स्वर्ण - मुद्रिका ! " मछुआरे ने ज्यों ही स्वर्ण मुद्रिका महाराज को सौंपी तो उसे देखते ही महाराज दुष्यंत को शकुंतला की स्मृति पुनः हो आयी। दुष्यंत को पछतावा हुआ। मछुआरे को इनाम दे कर विदा कर दिया गया किन्तु महाराज उद्विग्न हो उठे - अपनी सेना को चारों दिशाओं में दौड़ा दिया आदेश दिया -- ' जाओ महारानी शकुंतला को खोज निकालो ' सेना के सिपाही दसों दिशाओं में फ़ैल कर शकुंतला को खोजने लगे।  देवी शकुंतला ने कश्यप  ऋषि के आश्रम में आश्रय लिया था। गर्भवती शकुंतला ने निर्जन वन प्रांत में निर्भयता से रहते हुए अपने पुत्र भरत को जन्म दिया। बालक भरत अत्यंत बलशाली था। वन के हिंस्र पशु से बालक भरत निर्भय होकर खेला करता था। बाघ व सिंह पे भरत सवारी किया करता था। माता शकुंतला ने भरत के हाथ पे रक्षा के लिए काला डोरा बाँध दिया था जो सदैव भरत की रक्षा किया करता था।
       एक दिन महाराज दुष्यंत वन में घूमते हुए वहीं आ निकले। निर्भय एवं परम पराक्रमी बालक को सिंह सवार देख महाराज दुष्यंत आश्चर्यचकित हुए। अपने रथ से उतर कर महाराज ने बालक का नाम पूछा तो उत्तर मिला
" मेरा नाम भरत है ! " बालक को निहारते हुए दुष्यंत के ह्रदय में वात्सल्य उमडने लगा। सहसा बालक की बांह पर बँधा काला डोरा टूट कर भूमि पे जा गिरा ! इस दृश्य को देखते ही आश्रमवासी स्त्री भागती हुई माता  शक्ति शकुंतला  के समीप आई तथा कहने लगी ' हे माते एक दिव्य पुरुष पधारे हैं जो हमारे भरत के संग क्रीड़ा कर रहे हैं -- आप शीघ्र वहीं चलें ' शकुंतला तथा दुष्यंत कुछ क्षणों में एकदूजे के समक्ष उपस्थित थे।  महाराज दुष्यंत अपनी स्मृति ज्योति शकुंतला को निहार कर अति प्रसन्न हुए तथा अपनी पत्नी व् पुत्र को लिए अपनी राजधानी हस्तिनापुर लौटे वहाँ अमर युगल का आनंद उल्लास सहित स्वागत हुआ।
भारत वर्ष का नामकरण कहते हैं कि इसी बालक भरत के नाम से प्रतिष्ठित हुआ। भरत चक्रवर्तित सम्राट हुए।  चित्र : बाघ व सिंह पे सवार बालक भरत
दुष्यंत शकुंतला के लिए इमेज परिणाम
अमर युगल दुष्यंत ~ शकुंतला की प्रणय गाथा आधुनिक काल में भी जन जन के मन रंजित करती हुई अति प्रिय है तथा सदैव रहेगी। -
~ लावण्या 

Saturday, August 28, 2021

हिंदी भाषा का जन्म,विकास और क्रमबद्ध उन्नति ~ 1

 


प्रश्न - १ : भाषा का विकास और उनकी क्रमबद्ध उन्नति ~
उत्तर - १ भाषा का विकास और उनकी क्रमबद्ध उन्नति सभ्यता या
अंग्रेज़ी में कहें तो सिविलाइज़ेशन विश्व के विभिन्न भौगोलिक
स्थानों पर ख़ास कर नदी किनारों पर जीवन जीने की सुविधा के कारण पनपे
और अबाध्य क्रम से विकसीं और आज मानव जाती, सभ्यता ~  २१ वीं सदी के आरंभिक काल तक आ पहुँची है।
भारत भूमि पर प्राचीन सभ्यता के भग्न अवशेष सिंधु नदी के पास
मोहनजोदाड़ो व हड़प्पा तथा  कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा
और राखीगढ़ी इसके प्रमुख केन्द्र थे। इसे  हम सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से पहचानते हैं। पूर्व हड़प्पा काल :३,३००मान्यता है कि इन  विश्व के प्रथम  नगर ग्राम में
 आबाद सभ्यता, आठ हज़ार वर्ष पुरानी है।
 भारत की  उत्तर पश्चिम दिशा में कालान्तर में,
कई सदियों पश्चात, जिसे हम आज ' हिंदी भाषा ' कहते हैं तथा जो
हमारी आज की बोलचाल की हिंदी भाषा है इसका उद्भव व चलन
पश्चिम में राजस्थान से पूर्व में वैधनाथ व झारखंड
तक हुआ  है।
उत्तर में, हिम खंड से सातपुडा तक हिंदी भाषा  का प्रसार कई जनपदों
एवं नगरों में जैसे प्रयाग, काशी, अयोध्या, मथुरा, वृंदावन, हरिद्वार,
बद्रीनाथ, उज्जैन इत्यादि हैं ।
       भारतवर्ष की प्राचीनतम भाषा देववाणी संस्कृत है तथा संस्कृत से प्राकृत तथा
अपभ्रंश भाषाएं निकलीं  प्राकृत की अंतिम अवस्था ' अवहट्ट ' से खड़ी बोली निकली।
जिसे चंद्रधर शर्मा ' गुलेरी जी ने ' पुरानी हिंदी ' कहा।
बौद्ध धर्म ग्रन्थ बहुधा पाली भाषा हैं तो जैन आगम अर्ध - मागधी भाषा में हैं !
अखिल भारतीय चेतना हिंदी के मूल में है।
भाषा शास्त्र और व्याकरण की दृष्टि से आज की हिंदी खड़ी बोली से निकली है।
उत्तर भारत के जनपदों की  १६ सोलह भाषाएं हैं जैसे, १) मैथिली, २) मगही
३) भोजपुरी ४) अवधी ५) कनौजी ६)  छत्तीसग़ढी ७) बघेलखंडी ८) बुंदेलखंडी
९)ब्रज १०) कुमायूनी ११) गढ़वाली १२) मालवी १३) नेमाडी १४) बागड़ी
१५) मेवाड़ी १६) कौरवी ~ खड़ी बोली का कौरवी दुसरा नाम है। कुछ मतभेद भी हैं
किन्तु आज की हिंदी बोली का उद्गम ख़ड़ी बोली से है यह सर्व मान्य है।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र खड़ी बोली को ' नई बोली ' कहते हैं। भारतेन्दु जी ने कहा ~
" निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
    बिनु निज भाषा - ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल " 
        अपभ्रंश को शौरसेनी, कौरवी या नई बोली कहते हैं जिस में पहले, गद्य या अंग्रेज़ी  में जिसे ' प्रोज़ ' कहेंगे  उस में प्रयुक्त हुई।  बाद में  पद्य या काव्य  की भाषा बनी।  ऐसा नहीं कि इस नई बोली का विरोध न हुआ !  ब्रज भाषा तथा खड़ी बोली के बीच तकरार रही ~ मैथिली की उत्पत्ति मागधी प्राकृत से हुई है मैथिली का प्रथम प्रमाण रामायण में मिलता है। यह त्रेता युग में मिथिला नरेश राजा जनक की राजभाषा थी।  इस प्रकार यह इतिहास की प्राचीनतम भाषाओं में से एक मानी जाती है। विद्यापति की सरस पदावली या गीतिकाव्य गीत गोविन्द के रचयिता जयदेव ने मैथिली भाषा को प्रतिष्ठित किया।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र जीवन परिचय (Bhartendu Harishchandra Jeevan Parichay)
भारतेन्दु हरिश्चंद्र  

जब भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने लिखीं अंग्रेज़ों की प्रशंसा में कविताएँ | पुनीत  कुसुम - लेख - पोषम पा
विश्व का कोई सा भी साहित्य हो, वह अपनी अपनी भाषा में ही रचा जाता है सो  इन दोनों में 'चोली दामन का साथ है सही  है।
१९ वीं  सदी से बीसवीं सदी  तक हिंदी साहित्य विश्व ने अनेक अनेक जगमगाते
बुद्धिजीवी देदीप्यमान नक्षत्रों को उभारा। १९ वीं सदी काल से  भारतीयों का यूरोपीय संस्कृति से संपर्क हुआ। ब्रिटिश राज्य ने भारत को नई परिस्थितियों में धकेला। नए युग में संघर्ष और सामंजस्य के नए आयाम सामने आए और इस नयी युग चेतना के संवाहक रूप में हिन्दी के खड़ी बोली गद्य का व्यापक प्रसार उन्नीसवीं सदी से  हुआ। आर्य समाज और अन्य सांस्कृतिक आन्दोलनों ने भी आधुनिक हिंदी गद्य को आगे बढ़ाया।
हिंदी भाषा व साहित्य के आरंभिक रचनाकारों का संक्षिप्त  परिचय ~
~ १९ वीं सदी 
     गद्य साहित्य की विकासमान परम्परा के प्रवर्तक आधुनिक युग के प्रवर्तक और पथप्रदर्शक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे। जिन्होंने साहित्य का समकालीन जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया। यह संक्रान्ति और नवजागरण का युग था। नवीन रचनाएँ देशभक्ति और समाज सुधार की भावना से परिपूर्ण हैं। अनेक नई परिस्थितियों की टकराहट से राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य की प्रवृत्ति भी उद्बुद्ध हुई। इस समय के गद्य में बोलचाल की सजीवता है। लेखकों के व्यक्तित्व से सम्पृक्त होने के कारण उसमें पर्याप्त रोचकता आ गई है। सबसे अधिक निबंध लिखे गए जो व्यक्तिप्रधान और विचार प्रधान तथा वर्णनात्मक भी थे। अनेक शैलियों में कथा साहित्य  लिखा गया, अधिकतर शिक्षाप्रधान। पर यथार्थवादी दृष्टि और नए शिल्प की विशेषता श्रीनिवास दास के "परीक्षा गुरु' में  है। देवकीनन्दन खत्री का तिलस्मी उपन्यास 'चंद्रकांता' इसी समय प्रकाशित हुआ और बहुत प्रसिद्ध हुआ।  पर्याप्त परिमाण में नाटकों और सामाजिक प्रहसनों की रचना हुई।  प्रतापनारायण मिश्र, श्रीनिवास दास, आदि इस समय के प्रमुख नाटककार हैं।
बीसवीं सदी ~ सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ दो हैं।
एक तो सामान्य काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली की स्वीकृति और दूसरे हिन्दी गद्य का नियमन और परिमार्जन। इस कार्य में सर्वाधिक सशक्त योग सरस्वती पत्रिका के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी जी हैं । इसे द्विवेदी युग भी कहा गया। द्विवेदी जी और उनके सहकर्मियों ने हिन्दी गद्य की अभिव्यक्ति क्षमता को विकसित किया। निबन्ध के क्षेत्र में द्विवेदी जी के अतिरिक्त बालमुकुन्द, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, पूर्ण सिंह, पद्मसिंह शर्मा भी उल्लेखनीय हैं। उस के बाद गुलेरी जी , कौशिक आदि के अतिरिक्त प्रेमचंद जी और प्रसाद जी की भी आरंभिक कहानियाँ इसी समय प्रकाश में आई।बसे प्रभावशाली समीक्षक द्विवेदी जी थे जिनकी संशोधनवादी और मर्यादा निष्ठ आलोचना ने अनेक समकालीन साहित्य को पर्याप्त प्रभावित किया। मिश्रबन्धु, कृष्णबिहारी मिश्र और पद्मसिंह शर्मा इस समय के अन्य समीक्षक हैं।
सुधारवादी आदर्शों से प्रेरित अयोध्या सिंह उपाध्याय ने अपने "प्रिय प्रवास' में राधा का लोकसेविका रूप प्रस्तुत किया और खड़ी बोली के विभिन्न रूपों के प्रयोग में निपुणता भी प्रदर्शित की। मैथिलीशरण गुप्त ने "भारत भारती' में राष्ट्रीयता और समाज सुधार का स्वर ऊँचा किया और "साकेत' में उर्मिला की प्रतिष्ठा की। इस समय के अन्य कवि द्विवेदी जी, श्रीधर पाठक, बालमुकुंद गुप्त, नाथूराम शर्मा 'शंकर', गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही' आदि
१९२० से १९ ४० तक आते आते सर्वाधिक लोकप्रियता उपन्यास और कहानी को मिली। सर्वप्रमुख कथाकार प्रेमचंद हैं। वृन्दावनलाल वर्मा के ऐतिहासिक उपन्यास  प्रसिद्ध हुए उपन्यास भी उल्लेख है। हिन्दी नाटक इस समय जयशंकर प्रसाद के नाटकों से नवीन धरातल पर आरोहित हुआ।
हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में रामचन्द्र शुक्ल ने सूर, तुलसी और जायसी की सूक्ष्म भाव स्थितियों और कलात्मक विशेषताओं का मार्मिक उद्घाटन किया और साहित्य के सामाजिक मूल्यों पर बल दिया। अन्य आलोचक है श्री नन्ददुलारे वाजपेयी, डॉ. नगेन्द्र तथा डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी।

~ लावण्या


Thursday, January 7, 2021

" पृथ्वीराज रासौ : सँयोगिता - पृथ्वीराज की वीर गाथा : अमर युगल पात्र ग्रन्थ से

 ॐ 

चंदरबरदाई कृत " पृथ्वीराज रासौ " से प्रेरित ~  काव्य कृति तब अमरता प्राप्त कर लेती है जब कथा - नायक व कथा - वस्तु तथा कहनेवाला भी दिव्य हो ! चारण चंद्रबरदाई रचित " पृथ्वीराज रासौ " ऐसी ही, अमर कृति  है।  ६१ सर्गों में  विभाजित महाकाव्य में काव्य कवित्त छप्पय, दोहा, तोमर, त्रोटक, गाहा व  आर्या का प्रयोग  ' रासौ '  महाकाव्य में चंद्र बरदाई  ने किया  है। जैसे कादंबरी के संबंध में प्रसिद्ध है कि उसका पिछला भाग बाण भट्ट के पुत्र ने पूरा किया है, वैसे  प्रचलित है कि " रासो " के पिछले भाग को चंदबरदाई  के पुत्र ' जल्हण ' ने  पूरा  किया । 

रचयिता राव चंद बरदाई भट्ट, जो चंडिसा राव के कलादी गौत्र से थे व पृथ्वीराज के बचपन के अनन्य मित्र भी थे,  पृथ्वीराज के राज दरबार के वे, राजकवि थे। अपने महाराज की युद्ध यात्राओं के समय, वीर रस की कविताओं से सेना को प्रोत्साहित किया करते थे। चंदरबरदाई अपने मित्र पृथ्वीराज चौहान के कवि  मित्र थे जिन्होंने अपने सखा को सुख व दुःख के क्षणों में, हानि तथा लाभ में 
एक सा स्नेह दिया तथा अपने मित्र को उन्हें बारम्बार विषम परिस्थितियों के मध्य भी साहस एवं धैर्य के साथ सम्हाला था। 
 पृथ्वीराज रासौ कथा के नायक, वीर राजा पृथ्वीराज  के चरित्र चित्रण पर केंद्रित है। कथा में नायक के संग उनकी प्रेमिका तथा पत्नी संयोगिता भी नायिका हैं ! कथानक के एक महत्त्वपूर्ण पात्र स्वयं कवि चंदरबरदाई  हैं !
' रासौ ' महाकाव्य में, छः रस हैं किन्तु प्रधानता वीर रस की है। सर्वप्रथम चंदरबरदाई को बिरदावली से अभिसिक्त करें। 
  " ति कबि आई कवियही संपत्ते 
     नव रास भाख ज पुच्छन  लत्ते 
    कवी अनेक बहु बूढी गुन  रत्ते  
     कहि न एक कवी चन्द समत्ते "
भारतवर्ष की प्राचीन भूमि पर चाहमान वंश में, शाकम्भरी नगरी में श्री सोमेश्वर नामक राजा राज करते थे। राजमाता का नाम था कर्पूर देवी ! इनके दो पुत्र थे। पृथ्वीराज तथा यशराज !
पृथ्वीराज चौहाण : को उनके नाना अनंगपाल ने दत्तक लिया था। 
जन्म१२/३/१२२० भारतीयपञ्चाङ्ग के अनुसार,
१/६/११६३ आङ्ग्लपञ्चाङ्ग के अनुसार
पाटण, गुजरातराज्य 
तब पाटण पत्तन अण्हिलपाटण के नाम से प्रसिद्ध था। ११९१-९२ में, जयंक नामक कश्मीरी कवि ने " पृथ्वीराज विजय महाकाव्य " लिखा था उसी का श्लोक है ~ 

ज्येष्ठत्वं चरितार्थतामथ नयन-मासान्तरापेक्षया,

ज्येष्ठस्य प्रथयन्परन्तपकया ग्रीष्मस्य भीष्मां स्थितिम्। 
द्वादश्यास्तिथि मुख्यतामुपदेशन्भोनोः प्रतापोन्नतिं,
तन्वन्गोत्रगुरोर्निजेन नृपतेर्यज्ञो सुतो जन्मना॥ "

पुत्र के जन्म के पश्चात् पिता सोमेश्वर अपने पुत्र का भविष्यफल बताने के लिए राजपुरोहितों को निवेदन करते हैं। उसके पश्चात् बालक का भाग्यफल देख कर राजपुरोहितों ने "पृथ्वीराज" नामकरण किया।" पृथ्वीराज विजय महाकाव्य " में नामकरण का उल्लेख  इस प्रकार है ~~ 


" पृथ्वीं पवित्रतान्नेतुं राजशब्दं कृतार्थताम्। 

   चतुर्वर्णधनं नाम पृथ्वीराज इति व्यधात् "

' पृथ्वीराज रासो' काव्य में  नामकरण का वर्णन करते हुए चन्द्रबरदाई लिखते हैं


 ' यह लहै द्रव्य पर हरै भूमि। 

  सुख लहै अंग जब होई झूमि॥'

अर्थात ~ पृथ्वीराज नामक बालक महाराजाओं के छत्र, अपने बल से हर लेगा। सिंहासन की शोभा को बढाएगा अर्थात् कलियुग में पृथ्वी में सूर्य के समान देदीप्यमान होगा।

पृथ्वीराज की बाल्यावस्था :  कुमारपाल के शासन में चालुक्यों के प्रासाद में जन्मा, पृथ्वीराज बाल्यावस्था से ही वैभवपूर्ण वातावरण में पलने लगा ।वैभव सम्पन्न प्रासाद में, पृथ्वीराज के चारों ओर, परिचायिकाओं का बाहुल्य था।
दुष्ट ग्रहों से बालक की रक्षा करने के लिए, सेविकाएँ  विभिन्न मार्गों का अवलम्बन लेतीं थीं। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य में महाकवि जयानक द्वारा ये वर्णन प्राप्त है।
" महाविष्णु के दशावतार का मुद्रण किया हुआ  कण्ठाभरण = कण्ठ का आभूषण बालक पृथ्वीराज को पहनाया गया था। दुष्टग्रहो से रक्षा हेतु, व्याघ्रनख से निर्मित आभरण  सेविकाओं ने बालक को पहनाया था। व्याघ्र के नख को धारण करना मङ्गल मानते है। अतः राजस्थान में परम्परागत रूप से व्याघ्र के नख को सुवर्ण के आभरण में पहनते थे। बालक के कृष्ण केश और मधुकर वाणी, सभी के  मन को मोहित करते थे।शिशु के  सुन्दर ललाट पर लगाया हुआ ' तिलक ' बालक के सौन्दर्य में अभिवृद्धि करते । उज्जवल दन्त हीरक समान आभायुक्त थे। नेत्र में किया  ' अञ्जन ' आकर्षण को अधिक बढाता था। घुटनों द्वारा जब बालक यहाँ वहाँ घुमता था, तब उसके वस्त्र धूलिकामय होते थे। खेलते हुए पुत्र को देख कर माता कर्पूरदेवी अपने पुत्र का कपोल चुम्बन लेतीं थी।


" मनिगन कंठला कंठ मद्धि, केहरि नख सोहन्
       घूंघर वारे चिहूर रुचिर बानी मन मोहन्त

    केसर समुंडि शुभभाल छवि दशन जोति हीरा हरन। 
   नह तलप इक्क थह खिन रहत, हुलस हुलसि उठि उठि गिरत॥
     रज रंज्जित अंजित नयन घुंटन डोलत भूमि। 
      लेत बलैया मात लखि भरि कपोल मुख चूमि॥"


इस प्रकार अण्हिलपाटण के सहस्र लिङ्ग सरोवर से  अलङ्कृत सोपानकूप के मध्य में स्थित राजप्रासाद के विशाल भूभाग में पृथ्वीराज का बाल्य काल सुखपूर्वक व्यतीत हुआ। कुछ बड़े होने पर पृथ्वीराज का अध्ययन अजयमेरु प्रासाद में  विग्रहराज द्वारा स्थापित सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ में संपन्न हुआ। युद्धकला व शस्त्र विद्या का ज्ञान पृथ्वीराज ने प्राप्त किया। यद्यपि आदिकाल से ही शाकम्भरी के चौहान वंश स्रामाज्य की राजभाषा संस्कृत थी। उस काल में उस भूखण्ड पर  संस्कृतप्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी तथा अपभ्रंश भाषाएँ प्रचलित थीं। पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लेख है कि,मृगशिरा नक्षत्र व सिद्धयोग में कुमार पृथ्वीराज, राजा पृथ्वीराज  पंद्रह वर्ष  की आयु में राज्य सिंहासन पर आरूढ हुए। 


सं. ११७८ से ११९२ के कालावधि पर्यन्त, पृथ्वीराज चौहान वंश के हिंदू क्षत्रिय राजा थे। उत्तर भारत में, १२ वीं सदी के उत्तरार्ध में, वे, अजमेर (अजयमेरु ) व दिल्ली पर राज्य करते थे। पृथ्वीराज इन नामो से प्रसिद्ध हैं ~  भारतेश्वर, पृथ्वीराजतृतीय, हिन्दूसम्राट्, सपादलक्षेश्वर, राय पिथौरा इत्यादि। वे भारतवर्ष  के अंतिम - प्रमुख, हिन्दू राजा थे। पृथ्वीराज ' योगिनीपुर ' ( आज की दिल्ली ) पर राज्य  करते थे। उन के धवल राजमहल के द्वार पर ' न्याय का घंटा ' बंधा रहता था। प्रजा वत्सल पृथ्वीराज  न्यायप्रिय राजा थे  व बलवान, वीर तथा धनुर्विधा में अत्यंत कुशल थे। कैवांस नामक मंत्री राजकरण में पृथ्वीराज के संग कार्य करता था। पृथ्वीराज के पास एक चपल तेज गति से दौड़नेवाला अश्व था जिसका नाम ' नाटरामभश्व ' था। अपने बाहुबल पर आश्वस्त पृथ्वीराज आखेट के लिए निकलता तो ऐसा भास् होता मानों वन सिंहों के मध्य नरसिंह का आगमन हुआ हो ! 
तुर्क देश के  राजा शहाबुद्दीन को युद्ध में सात, सात बार पराजित करनेवाले पृथ्वीराज ने सुवर्ण की बेड़ियोँ में उसे बाँधा था किन्तु राजमाता कर्पूर देवी अत्यंत दयालु व् धार्मिक प्रकृति की थीं उनके आदेश पर सातों बार शहाबुद्दीन को जीवनदान देते हुए पृथ्वीराज ने रिहा किया।
संयोगिता के लिए इमेज परिणाम 
जयचंद राठौड़ ~ उसी कालखण्ड में, भारतवर्ष के एक अन्य क्षेत्र कन्नौज में राजा जयचंद सप्त क्षेत्र का सेवन करता था। महाराष्ट्र, थट्टा , नीमच, वैरांगर, कर्णाट, करवीर , गुण्ड व गुर्जर, मालव, मेवाड़ , मण्डोवर  के सभी राजाओं पर जयचंद अपना प्रभुत्त्व स्थापित कर चुका था। अपने यश व कीर्ति  को  सुदृढ़ रूप देने के लिए अब जयचंद ने राजसूय यज्ञ करने का निश्चय किया। उसने सभी  राजाओं को अपने नगर में होनेवाले राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होने का आदेश दूतों द्वारा  सन्देश भिजवाया। जयचंद  जैन धर्म का पालन करता था।उसकी पुत्री, राजकुमारी  संयोगिता रूपवती व बहादुर राज कन्या थी।
संयोगिता ~कईयों की मान्यता है कि ' संयुक्ता ' अप्सरा रम्भा थीं। संयोगिता, इतिहास में तिलोत्तमा, कान्तिमती, संजुक्ता या संयुक्ता आदि नामों से सुप्रसिद्ध हुईं।
जयचंद का आदेश व निमंत्रण लेकर दूत निकले उस समय संयोगिता अपने पालतू मृग शावकों को, राजमहल के अपने उद्यान में,  हरी हरी पत्तियाँ ले चबैना खिला रही थी।  एक सेविका ने आकर संयोगिता से कहा, ' राजकुमारी जी की जय हो ! महाराजश्री ने अपने कई दूतों को राजसूय यज्ञ के निमंत्रण पत्र देकर, चारों दिशाओं में राज कर रहे राजाओं को हमारे कनौज आने का आमंत्रण दिया है  किन्तु एक चौहानवंश के दिल्लीपति, वीर पृथ्वीराज को आमंत्रित नहीं किया। ' 
        संयोगिता ने अनेकों के मुख से पृथ्वीराज की वीरता के किस्से सुन रखे थे। पृथ्वीराज की वीरता से संयोगिता पहले से प्रभावित थी। वह वीर राजपूतानी थी। ऐसी वीरता के चर्चे सुन अपना ह्रदय, मन ही मन ~  पृथ्वीराज से जोड़ चुकी थी। उसने प्रण लिया ~ 
" संयोगि जोग वर तुम्ह आज 
   ब्रत  लिअउ वरण प्रथीराज राज " 
एक दूत पृथ्वीराज के दरबार में जा पहुंचा तथा बढ़ाचढ़ाकर अपने महाराज जयचंद के राजसूय यज्ञ के बखान करने लगा। राजयसभा में उपस्थित गुरुजन गोविंदराज ने दूत का प्रस्ताव  सुनते ही  उसका विरोध किया।  कहा,
               " जानहिं न राई जयचंद मूल, 
                  जानहिं त  देसु जोगिनी पुरेसु 
                   जु  प्रथिमी नहीं चहुआन कोइ ?
                      देषई संभ्ह ते हि सिंघ रूप। 
                      मानहिं न जग्गु मनि अन्न भूप। "
   अर्थात ~ हम जयचंद के राज्य को मुख्य नहीं मानते। हम तो योगिनीपुर के पृथ्वीराज को आदर्श मानते हैं। क्या पृथ्वी पर कोइ चौहाण शेष नहीं रहा ? सभी हमारे पृथ्वीराज को सिंघ के समान रूप से देखते हैं। किसी अन्य को हम जगत्पति राजा नहीं मानते। वयोवृद्ध गोविंदराज के इस वीरोचित्त उद्गार सुनकर जयचंद के दूत त्वरित गति से निकल भागे। 
         कनौज पहुंचकर दूतों ने अपने महाराज जयचंद के समक्ष हाथ जोड़ कर पृथ्वीराज की सभा में जो कुछ घटित हुआ सो वह सब डरते डरते  कह सुनाया। जयचंद दूतों के मुख से पृथ्वीराज की बिरदावली सामान गोविंदराज का कथन सुनकर आग बबूला हो उठा। सभा को समाप्त कर शीघ्र अपने अन्तः पुर में चला आया। वहाँ उद्यान में बैठे अपना क्रोध शाँत कर रहे महाराज जयचंद ने उसी उद्यान में अपनी पुत्री संयोगिता की दो सेविकाओं के मुख से, अपनी चहेती पुत्री राजकुँवरी संयोगिता ने पृथ्वीराज से विवाह करने का जो प्रण लिया था, उस के बारे में सारा वृतांत सुना। दासियाँ हाथ मटका मटका कर बार बार दुहरा रहीं थीं ~" संयोगि जोग वर तुम्ह आज  ब्रत  लिअउ वरण प्रथीराज राज "  
दासियों की उक्ति सुनते ही अब तो जलते में मानों घी पड़ा! जयचंद का क्रोध शाँत होने की अपेक्षा महाज्वाला बन कर धधकने लगा। जयचंद के आमात्यों ने आकर अपने महाराज के क्रोध का शमन करने हेतु समझाया ' हे महाराज आप अपना राजसूय यज्ञ का शुभ व्रत पूर्ण कीजिए।उस चौहाण से हम बाद में निपट लेंगें। ' जयचंद ने उनके कथन को योग्य माना। किन्तु मन में पृथ्वीराज चौहाण के प्रति जो कटुता एवं वैमनस्य था उस के प्रतिरूप समान, पृथ्वीराज के कद काठी की एक सुवर्ण प्रतिमा बनाने का आदेश, अपने स्वर्णकारों  दिया। पृथ्वीराज को छोटा दर्शाने के लिए एक मंत्री को आदेश दिया ' इस सुवर्ण प्रतिमा को, द्वारपाल के स्थान पर रखा जाए। '
कनौज के राजमहल के प्रतोली द्वार पर तैयार हुई स्वर्ण प्रतिमा को द्वारपाल के स्थान पे रख दिया गया। राजसूय यज्ञ के साथ साथ अपनी पुत्री राजकन्या संयोगिता
का स्वयंवर भी घोषित कर दिया। राजमहल के प्रवेश द्वार पर  पृथ्वीराज की प्रतिमा को रखवाया गया। 
यज्ञ का शुभ दिवस देव पंचमी के दिन सूर्य के पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करनेवाले थे
तथा चन्द्रमा के तीसरे गृह में स्थिर होने के  शुभ अवसर को पण्डितों ने चुना था। पृथ्वीराज को कनौज के राजसूय यज्ञ तथा संयुक्ता - संयोगिता के स्वयंवर की सारी जानकारियां उसके गुप्तचरों ने आकर बतलाईं थीं। जयचंद ने अपनी पुत्री के पृथ्वीराज से विवाह के प्रण व हठ के कारण, संयुक्ता को, गंगा नदी के किनारे एक ऊंचे आवास में रहने के लिए भेज दिया था। पृथ्वीराज के चुनिंदा सामंतो ने कहा , 
' तिहि पुतिय सुनी गन इतउ, टाट वचन तजि काज 
   कइ वहि गंगहि संचरहुँ , कइ पानि गहऊँ प्रथीराज। '  
अर्थात - जयचंद की पुत्री संयोगिता के बारे में सुना है वह यहां तक कहने लगीं  है कि,' पिता के वचन व स्वयंवर के कार्य का त्याग कर या तो मैं गंगा में बह लूंगी या पृथ्वीराज को वरूंगी '
यह सुनते पृथ्वीराज को अपार आश्चर्य हुआ। वही भाव,  अनुराग बना। मन ही मन सोचा, ' दम्भी जयचंद ने भले ही जो सोचा हो दैव ( भावि ) में अवश्य  कुछ भिन्न संजोग है '
जयचंद  ने संयोगिता के मन से पृथ्वीराज की छवि हटाने के अनेकों प्रयास किये। 
संयोगिता मानिनी थीं। साम, दाम दण्ड भेद के प्रयोग से, पृथ्वीराज के  प्रति संयोगिता के सम्मोहन से हाथ छुड़ाने के प्रयत्नों में सेविकाएं, दासियाँ जुट गईं ।  किन्तु संयोगिता की दृढ हठ  के आगे सारे उपाय विफल हुए। 
                पृथ्वीराज अपने संग से चुनिंदा शूरवीर राजपूत सूरमाओं को लेकर, इक्कीस योजन की दूरी तीन दिन व तीन रात्रि में पार करते हुए कनौज आ पहुंचे।
कनौज शहर के समीप बहते गँगा मैया के दर्शन हुए तो पृथ्वीराज ने प्रणाम किया। वहीं च
कते हुए घड़ों में, गँगा जी का जल भरती हुई स्त्रियाँ दिखलाई दीं। नगर नारियों के वस्त्र लाल, पीले व नीले रंगों के थे जो प्रातः काल के  स्वच्छ  प्रकाश में आभा बिखेर रहे थे। चंदरबरदाई कवि मित्र भी महाराज  पृथ्वीराज के संग, यह मनोरम दृश्य देख रहे थे।  कवि  ह्रदय चितेरा होता है, सो सहसा चंद बोले,
' इन सुंदरियों की पीठ पर झूलती वेणी ऐसे प्रतीत हो रहीं हैं मानों उनका शरीर स्वर्ण से निर्मित हुआ हो तथा उनके स्वर्णिम स्तम्भ पर सूर्यदेव चढ़ कर महाराज आपके विजयश्री की घोषणा कर रहे हैं ' पृथ्वीराज अपने कवि सखा के उपमाओं पर ठठाकर हंस पड़े उत्तर दिया, ' अरे मित्र चंद रहने भी दो ! अभी तो तुमने कनौज की यशस्विनी नारियों को देखा ही नहीं! मात्र इस प्रदेश की  पनिहारियाँ  ही देखीं हैं ! ' चंदबरदाई अपने मित्र के कटाक्ष पर मुस्कुराने लगे। कहा,' आज्ञा दो,  मित्र ! राजपरिवार की टोह लेकर आता हूँ ' 
अपने सखा से आज्ञा लेकर चंदबरदाई जयचंद के राजदरबार में छद्म नाम से पहुंचे। दरबार में भिन्न नाम से बरदाई ने पृथ्वीराज की वीरता तथा महाराज जयचंद की वीरता के गीत गाये। अपनी प्रशंसा सुनकर तो जयचंद प्रसन्न हुआ किन्तु  पृथ्वीराज का बखान अनसुना कर दिया।  चारण की प्रशंसा
सुन क जयचंद, चंदबरदाई की कवितावली से प्रभावित हुआ था अतः पूछने लगा, 
' चारण आप किस स्थान पर ठहरे हैं ? ' चंदबरदाई ने ठिकाना बतलाया तो अगली प्रातः जयचंद चंदबरदाई की छावनी में आ पधारे ! छावनी में उपस्थित पृथ्वीराज के गठीले शरीर तथा रौबदार राजपूती बड़ी बड़ी मूंछों को देखकर जयचंद का माथा ठनका ! उसने प्रश्न किया,  ' यह सैनिक कौन है ? '
चंदबरदाई ने मन के भावों को भली प्रकार छिपाते हुए कहा, ' महाराज जयचंद ! यह मेरा अनुचर है। मैं, अपनी सुरक्षा के लिए इसे अपने संग लिए भ्रमण करता रहता हूँ ! ' 
जयचंद को चंदबरदाई के कथन पर अविश्वास हुआ। किन्तु अगले दिवस राजसूय यज्ञ था। अतः जयचंद ने सोचा, ' आज नहीं  ! कल यज्ञ, पूर्ण हो जाए, पश्चात  मैं इस छावणी के सभी जन पर,  धावा बोल कर, इन्हें बंदी बना लूंगा। कल की पूजा निर्विघ्न समाप्त कर, तद्पश्चात इन्हें बंदी बना लूँगा ' इतना सोचकर जयचंद छावणी से प्रस्थान कर गया ! संध्या होने लगी। जयचंद के लौट जाने पर, पृथ्वीराज अपने मित्र चंदबरदाई को गले लगाकर खूब हँसे। 
         रात्रि का एक प्रहर बीत चुका था। संयोगिता के नयनों से निद्रा ओझल थी। वह अपनी सखी से कहने लगी, ' हे आली, मेरे मन के  गुप्त भाव गुरुजनों से कह नहीं पाती। हाँ एक मात्र तुम्हें कह सकती हूँ। जिसने मेरे पिता के चमकीले खडग के भय से आत्म समर्पण नहीं किया उसी नर - वीर को मैं चाहती हूँ ! '
सखी मुँहलगी थी कहने लगी, ' हे बुध्धिहीना अबोध राज कुंवरी ! कहाँ वह लघु कुल का वंशज तथा कहाँ आप ! आप कनौज नरेश की पुत्री हैं, हमारी राजदुलारी हैं।  हमारी राजेश्वरी  हैं ! ' तब तड़प कर संयोगिता बोली, ' अरी दुष्टा,  रहने दे ! उसी सूरमा नर वीर ने, अजमेर राज्य में धूम मचा रखी है ! मंडोवर राज्य को उन्हीं ने पराजित किया। मोरी के राजा से कर वसूल किया!  रणथम्भोर के  रण मैदान में विजयश्री  प्राप्त की ! कालिंजर को जल निमग्न किया ! अरे, उस शूरवीर चौहाण की कृपाण तो राजाओं के खेत रुपी  राज्यों को काटनेवाली ' हँसिया ' बनी हुई है। ' अपनी राजकुमारी से पृथ्वीराज चौहाण की प्रसंशा सुनकर वही सखी मुस्कुराने लगी। बोली, ' कुँवरी आपके मन के भाव आज शब्दों में आ ही गए ! जिस प्रकार चंद्र्मा के खिलने पर पावन गँगा जी में कमलिनीयाँ आतुरता से खिल उठतीं हैं तथा मुग्ध भाव से इन्दु ( चंद्र ) की शीतल किरणों का पान कर, चंद्र देव का ध्यान करतीं  हैं, उसी प्रकार हे कुँवरी, आपकी समस्त बुद्धिमता, चतुरता तथा वाणी बस एकमात्र पृथ्वीराज का बखान करतीं रहतीं हैं ! हे सखी, आप के इन सुँदर अंग प्रत्यंग पर, मदन - ज्वर  व्याप्त  है। यह उसी प्रेम रोग का प्रताप है '
 
रात्रि बीत चली। उसी  समय गँगा जी की पावन जलधारा पर प्रतिध्वनित होता हुआ सैनिक वाद्य बजने लगा। संयोगिता शर्वरी ( रात्रि ) में उठ रही इस वीर ध्वनि से प्रभावित होकर अपने  झरोखे पर आ खड़ी हुईं व गँगा धारा पर दृष्टिपात किया। संयोगिता आश्चर्चकित हो, निहारतीं रहीं ~ गँगा जी की पवित्र जल ~ धारा  के मध्य खड़े, कामदेव के समान सुँदर, हर ( शिवजी ) के सामान बलिष्ठ, एक नर को, जो गँगा जी की उत्ताल तरंगों को, अपने हाथों से उछाल रहा था तथा अपने हाथों से एक, एक मोती, जलधारा में बह रहीं मछलियों के मुख में डाले जा रहा था। इस प्रयास में कुछ मोती जल धारा में डूबे  जा रहे थे। चंद्रमा की चांदनी में ऐसा अलौकिक दृश्य देख कर संयोगिता, ठगी सी रह गईं ! संयोगिता के संग अन्य दासियाँ भी यह दृश्य देख रहीं थीं।  
किसी ने कहा,' यह तो कोइ सिद्ध मुनि लगते हैं। किसी ने कहा,' दानव हैं या स्वर्ग से उतरे कोइ देवता हैं ? ' परन्तु एक चतुर दासी ने कहा, ' यह नरेंद्र पृथ्वीराज हैं ! ' यह सुनते ही संयोगिता शर्मा कर भय से थर थर काँपने लगी। अपने नेत्रों को अपने कोमल करों से मूँद लिया। क्षणार्ध पश्चात राजकुँवरी संयुक्ता ने अपनी एक दासी के हाथों, मोतीयों से  भरा थाल, वहीं भिजवाया जहां पृथ्वीराज जल धारा में अब भी खड़े थे। दासी चुपचाप पृथ्वीराज के निकट जाकर खड़ी हो गयी। पृथ्वीराज भी मस्त हो, मोती लुटाता रहा। जब थाल के सारे मोती चूक गए तब दासी ने अपनी मोती माला उतार कर थमा दी।
अब पृथ्वीराज ने मुड़कर पूछा, ' तुम कौन हो ? ' दासी ने अपना परिचय दिया  सादर प्रणाम किया तथा कहा ' महाराज मैं कनौज राजकुमारी संयोगिता की दासी हूँ ' पृथ्वीराज बोले ' आपकी कुँवरी से मिलने ही तो कनौज आया हूँ चलो वहीं ले चलो राजकुमारी के पास '
सँयोगिता के भवन में पृथ्वीराज ने साधिकार प्रवेश किया। दासी पीछे पीछे चल रही थी।सँयोगिता अब पृथ्वीराज के समक्ष उपस्थित थीं। पृथ्वीराज ने उसे आलिंगनबद्ध किया। मानों दर्द को रिध्धि प्राप्त हुई। दोनों के मिलन पर मानों पवित्र पाणिग्रहण संस्कार पूर्ण हुआ। सँयोगिता ने बिदाई के ताम्बूल अर्पित किये। 
   " पायातु पंग पुत्रीय जयति जयति योगिनी पुरेस 
      सर्व विधि निषेधस्य यः तम्बोलस्य समादायं। " 
                              अर्थात ~ पंगपुत्री ( सँयोगिता ) की रक्षा करें। 
हे योगिनीपुर ( दिल्ली ) के स्वामी ! आपकी जय हो, जय हो ! सभी प्रकार से आपको रोक रही हूँ उसके प्रतीक  इस ताम्बूल को स्वीकार कीजिए ! "  इतना कहते हुए, सँयोगिता ने विवाह कंकण, पृथ्वीराज के सशक्त हाथों पर बाँध दिया।
पृथ्वीराज अपनी छावणी
पर आ कर अपने सामंतों से जा मिले। उन में से एक कान्ह ने पूछा,' महाराज यह क्या है ? "  तब पृथ्वीराज ने बतलाया की, ' मैंने जयचंद की बाला का वरण  किया।  उस का प्रण पूरा किया। अभी मैं उसे विलाप करते हुए उसे छोड़ कर यहां आया हूँ। ' तब वीर कान्हा उत्तेजित होकर बोलै,
' महाराज हम सौ सुरमा राजपूतों के रहते हमारी भाभीसा रोवें ! यह कैसे हो सकता है ? क्या हम ने  यूं ही दिखावे की तलवारें बाँध रखीं हैं?  महाराज चलें जयचंद की सेना से युद्ध  तो हम करते रहेंगें किन्तु  पहले आपकी ब्याहता, हमारी भभीसा को छुड़ाते हैं ! '

सँयोगिता ने वीर राजपूतों की टोली को आते देखा तो भय कातर होकर सखियों से कहने लगी ' सखियों 
मेरे प्रिय पर लोग ऊँगली ना उठावें ! लोग ये ना कहें की युद्ध के भय से इन्होंने मेरे आवास की शरण ली ! ' किन्तु वहां पधारे वीर योद्धा
 कान्ह ने समीप आ कर कहे वक्तव्य , ' हे भाभीमाँ आप कहें तो कनौज को योगिनीपुर बना दूँ ! आप योगिनिपुर पति के संग सिंहासन पर आसीन हों ! मैं तथा मेरे साथी निर्भय हैं। हम युद्ध से कदापि भयभीत नहीं होते । हम तो  आपको हमारे संग लिवाने के लिए ही यहां आये हैं। ' यह  वीरोचित राजपूत की वाणी सुनकर राजकुँवरी से राजरानी पद पर आसीन हुईं सँयोगिता के नयनों से हर्ष के अश्रु बहने लगे। पृथ्वीराज से कर - बद्ध प्रार्थना करते हुए वे बोलीं,
 ' हे नाथ ! कनौज के जन समाज से भरे दरबार के समक्ष, आपकी प्रतिमा के गले में मेरी विजय माला से आपका अभिनंदन कर, आपको पति रूप में वरूँगी। प्रतिज्ञा है, कल सँयोगिता  स्वयंवर का  यह दृश्य सभी देख लें। ' पृथ्वी राज ने संयोगिता का स्वीकार किया। 
अगले दिवस सँयोगिता  के राजसी स्वयंवर में जो पृथ्वीराज को अपमानित करने की भावना से उनकी स्वर्ण  प्रतिमा निर्मित की गयी थी उसे द्वारपाल के स्थान पर रखा गया था उसी स्थान पर,  पृथ्वीराज स्वयं आ कर खड़े हुए। संयोगिता ने राजसभा में उपस्थित सभी राजाओं को अनदेखा करते हुए,  द्वारपाल की प्रतिमा की दिशा में चरण बढाए तथा अपने कोमल करों में थामी सुगन्धित जयमाला महारा  पृथ्वीराज के गले में पहना दी । अब असली पृथ्वीराज ने अपनी पत्नी सँयोगिता का हाथ थाम कर उसे अपने संग लिया। इस भाँति पृथ्वीराज - सँयोगिता का विवाह भरी सभा के मध्य हुआ।  पृथ्वीराज ने सँयोगिता का हरण कर, उसे अपने प्रिय अश्व नाटरामभश्व पर बैठाल लिया। स्वामीभक्त अश्व, योगिनीपुर की दिशा में स्वतः अपनी स्वामिनी तथा स्वामी को लिए हुए मुड़कर तेज गति से दौड़ पड़ा। 
संयोगिता स्वयंवर के लिए इमेज परिणाम
 पृथ्वीराज ने अपने श्वसुर जयचंद के लिए सँदेसा भिजवाया ~ ' दहेज़ के रूप में तुमसे युद्ध की आकांक्षा है ! मेरी स्वर्ण प्रतिमा द्वारपाल के स्थान पर रखकर मुझे अपमानित करने की यही सजा है ! '
पृथ्वीराज के सँयोगिता को हर कर अपने संग ले जाने से जयचंद की सेना उनके पीछे दौड़ पडी। पृथ्वीराज के वीर सामंतों ने कहा , ' हे हमारे साम्भर राज, हम सेना को रोकेंगे। आप महारानी को लेकर शीघ्र हमारे नगर पहुंचें ' ! 
गुहलौत,  नागौर का दाहिमा, चंद्रपुण्डीर 
सोलंकी का सूरमा सारंग, कूरंभ,
राज पालन देव, यह वीर योद्धा प्रथम दिवस के युद्ध में, वीरगति को प्राप्त कर गए ।
अन्य साथी सामंतों वीरों की तलवारें झनझनाने  लगीं। दूसरे दिन के युद्ध में गुर्जर का माल चंदेल, थट्टा का भूपाल भाण भट्टी, सामळा शूर, अच्छ परमार  व धार का निरवान वीर, देहत्याग कर युद्ध स्थल में गिरे। पृथ्वीराज के अनेक वीर सामंतों ने वीरता से युद्ध क्षेत्र में, हँसते हुए अपने  प्राण खोये किन्तु इस युद्ध के होते हुए महाराज पृथ्वीराज महारानी संयोगिता के संग अपनी राजधानी योगिनीपुर सकुशल पहुँच गए। निराश होकर सीने में प्रतिशोध भाव से धधकती ज्वाला लिए जयचंद कनौज खाली हाथ लौट आया। 
       विवाह पश्चात पृथ्वीराज, राजकार्य भूल गए। भोग विलास में रात्रि दिवस बीतने लगे। छः ऋतुएँ वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर आ आ कर लौ गईं परन्तु पृथ्वीराज सँयोगिता की भोग - विलास समाधि ना टूटी ! 
     एक दिन चंद्रबरदाई अपने मित्र महाराज पृथ्वीराज के महल में राजगुरु को संग लेकर आये। महाराज के लिए अन्तः पुर में एक सन्देश एक कहला भेजा  ~ 
" गोरी रत्तउ तुव धरा, तुं गोरी अनुरत्त " अर्थात " गोरी तुझ पर राजी है या तेरी भूमि पर ? तू गोरी पर मर मिटा ! ' आगे पत्र में लिखा था ~  " अप्पज वान चहुआन सुनि, प्रान रषिक प्रारम्भ करि - सामंत नहीं सा - मंत करि, जिनि बोलइ ढिल्लिय जु धरि " अर्थात ~' हे चौहान सुन ! बाण तो अपने अधीन हैं। उद्योग कर, अपने प्राणों की रक्षा कर  ~ संतों से मंत्रणा कर कि तेरे कारण ये साम्राज्य, ये धरा डूब न जाए ' पत्र सन्देश पढ़ते ही लज्जा वश पृथ्वीराज भूमि पर गिर पड़े। उठकर अपना तरकश सम्हाला। सोया हुआ पौरुष जागा मानों सोया हुआ सिंह जाग उठा !  
सँयोगिता उसे रोकने की चेष्टा में कहने लगी, 
  ' कहु सु प्रियह पउमिनिय कंत धनु धरउ तउ न धनु 
       सुष सुषमार आरोहु असर सँसार मरन मन। 
       दिन दिनिनयर दिन चंदु रयनि दिन दिन हि आवहि। 
       जंतु जंतु इह रमनि स्रवन लग्गावि समझावहि। 
        अरधंग  धरा अरधंग  हम  अरधनगी अरधंग भरि। 
        जस हंस हंस तह हँसिनी सर सुक्कई पंकज न परि '
अर्थात ~ वही धन, धन है जो भोगा जाय। काम सुख सच्चा सुख है। प्रेम रहित जीवन मृत्यु  समान है। मनुष्य जीवन उस क्षण समाप्त हो जाता है। यदि धरा पृथ्वीराज की पत्नी है, तो सँयोगिता भी पत्नी है। मुझे सार्थक कीजिए नाथ ! 
हँस ~ हँसिनी  का जोड़ा मरने तक साथ रहता है ! '  
पृथ्वीराज ने अपना जी कड़ा कर उत्तर दिया, ' हे वीर पत्नी, तूने मुझे मेरे बाहुबल के कारण वरण  किया। आज युद्ध में जाने से मुझे  क्यों रोक रही हो ? हे क्षत्राणी ! हे वीर राजपूत रमणी ! अब प्रणय की बेला गई ! विजयश्री तिलक लगाकर प्रस्थान करने दें, यही आप को शोभा देता है, यही उचित है '
        अपने प्राण नाथ के वचन सुन नयनों से उमड़ते हुए अश्रुधारा में अपने रक्त को मिला कर सँयोगिता ने अपने स्वामी पृथ्वीराज के प्रशस्त भाल पर विजय तिलक लगा दिया । पृथ्वीराज ने प्रस्थान किया। 
पति पत्नी बिछुड़े। चंद्रबरदाई रचित ' पृथ्वीराज रासौ ' में यही इस पवित्र दंपत्ति युगल पात्रों का अंतिम मिलन दर्शाया गया है। 
        प्रतिशोध की ज्वाला लिए जयचंद ने विश्वासघात किया। जयचंद ने तुर्की शहाबुद्दीन को पृथ्वीराज के नगर प्रवेश के गुप्त रहस्य बतलाये। जिस शाहबुद्दीन को अपनी माता महारानी कर्पूर देवी के कहने बार पृथ्वीराज ने सात, सात बार जीवनदान दिया था उसी दुष्ट ने, अब किले के भेद जान कर, पृथ्वीराज को युद्ध में परास्त किया।  तथा बंदी बनाकर कारागार में  डाला। तद्पश्चात अपने नगर ले चलकर आग में तपती  हुई सलाखें गर्म कर, उन से पृथ्वीराज के  दोनों नयनों को निर्ममता से छेद दिया,  जिससे पृथ्वीराज अंध हो गया। अत्याचारी के सीने में तब भी आग बाकी थी । चित्र : चंद्र बरदाई 

कुछ काल पश्चात चारण चंद्रबरदाई, अपने मित्र पृथ्वीराज की शोध में, अपने महाराज व प्रिय सखा को खोजता  हुआ, तुर्क शहाबुद्दीन के नगर तक आ पहुंचा। पृथ्वीराज  कारागार में है यह जानकार उसे अत्यंत शोक हुआ। किसी प्रकार बंदीगृह पहुँच कर वह अपने परम  मित्र से मिला।    
            पृथ्वीराज का मनोबल परास्त हो चुका था व पृथ्वीराज, अत्यंत शोकाकुल था। अपना सर्वस्व  हार चुका था। वह अपने प्राणों के प्रति मोह को भी खो चुका था ' चन्द्रबरदाई ने  उसे भड़काया, कहा ' हे बंधे हुए सिँह, तू काल से भी विकराल काल स्वयं है ! पापी शहाबुद्दीन ने छल से सिँह को कैद कर लिया ! इस छल का बदला लेना होगा। मैं तेरे साथ हूँ मित्र  ! ' अपने मित्र की उत्साहवर्धक बातें सुनकर पृथ्वीराज का सोया हुआ पौरुष जाग उठा।  दोनों ने आपस में मंत्रणा की। तद्पश्चात चंद्रबरदाई शाहबुद्दीन के समक्ष उपस्थित हुआ। बोलै, ' हे बादशाह ! तुम्हारा कैदी पृथ्वीराज अँधा हो गया तो क्या हुआ ? वह  तुम्हारे सरे सैनिकों से अब भी बेहतर निशाना लगा सकता है। वह अचूक निशानेबाज है - मेरे वचन को आजमा कर देख लो ! '   चंद्र बरदाई की बात सुनकर शहाबुद्दीन का कौतुहल जागा। अब चंद्र ने आगे कहा, ' हे बादशाह आपके शाही फरमान पर ही यह पृथ्वीराज बाण पकड़ने को राजी हुआ है। सो अब आप ही आदेश दें - आपके स्वर में यह बाण चलाने का आदेश गूंजे, तभी वह अपने अचूक निशाने का करतब दिख्लायेगा '   
शहाबुद्दीन ने पृथ्वीराज के अचूक निशाने को परखने के लिए उसे धनुष्य बाण  दिए। आयोजन किया गया। अब कवि मित्र  चंद्रबरदाई ने अपना कवित्त बांचा ~ “ चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान”
 
अर्थात् ~ चार बांस, चैबीस गज व  आठ अंगुल जितनी दूरी के ऊपर सुल्तान बैठा है ~  इसलिए चौहान तुम चूकना नहीं !  अपने लक्ष्य को हासिल करो। '
पृथ्वीराज चौहान ने इसी कवित्त  के आधार पर निशाना साधकर तीर छोड़ा।
जो सीधे ऊँचाई पर बैठे गौरी के सीने में जा लगा। दरअसल, चंदबरदाई की कविता से पृथ्वीराज को गौरी की दूरी का तो अंदाज़ा हो गया था, लेकिन वो किस दिशा में यह पता लगाना अभी बाकी था। तब चंद्रवरदाई ने गौरी से कहा कि, 'पृथ्वीराज आपके बंदी हैं, सो आप इन्हें आदेश दें ! तभी पृथ्वीराज  आपकी आज्ञा प्राप्त कर अपने शब्द भेदी बाण का प्रदर्शन करेंगे। ' इस पर ज्यों ही घोरी  ने पृथ्वीराज को प्रदर्शन की आज्ञा का आदेश दिया।  प्रदर्शन के दौरान घोरी के " शाबास शुरू  करो " लफ्ज के उद्घोष से  पृथ्वीराज को घोरी  किस  दिशा में बैठा है यह मालूम हो गया उन्होंने तुरन्त बिना एक पल की भी देरी किये, अपने एक ही बाण से मुहम्मद घोरी के अपने एक बाण के वार से प्राण हर लिए और उसे, मार गिराया ! 
                        शहाबुद्दीन के प्राण गंवाकर गिरते ही उसका सचिव, तातार खां क्रोध में लपक कर आया। उसने पृथ्वीराज के प्राण लेने चाहे। किन्तु तब तक चंद्रबरदाई लपक कर अपने मित्र पृथ्वीराज के पास आ चुके थे।

दोनों ने अपनी अपनी छिपी हुई कृपाण निकाल लीं तथा तुरंत एक दूसरे के ह्रदय में उन तीक्ष्ण कटार को खोंप दिया। कटार के तेज प्रहार से दोनों ने एकसाथ, उसी क्षण, ' हर हर महादेव ' का जय घोष  करते हुए अपने अपने प्राण खोये  ! दोनों एक साथ स्वर्ग सिधारे।   

भारत वर्ष के गरिमामय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ में शूरवीरता की ज्वलंत कथा का एक अध्याय जुड़ गया। लोकोक्ति है कि, " चंद्र से अलग पृथ्वी नहीं ! चंद्रबरदाई से विलग सखा पृथ्वीराज नहीं !"
  " पृथ्वीराज रासौ " इसी कथा की यशस्विनी कीर्तिगाथा है। वीर रस से सभर एक उच्च स्तर की शौर्य गाथा है। नव रस से निर्मित " पृथ्वीराज रासौ " एक अपूर्व ग्रन्थ ही नहीं है अपितु एक महाकाव्य है।  इस में प्रयुक्त छंदों को चंद्रबरदाई ने अपने रक्त समर्पण द्वारा अमृतदान दिया है। श्रृंगार,  वीर रस से निर्मित,करूण रस से भींजा हुआ, बीभत्स रस समेटे, भय, अद्भुत एवं शाँत ऱस को काव्य में सिंचित किये ' पृथ्वीराज रासौ '  भारतीय काव्य परम्परा का अद्भुत साहित्यिक आभूषण  है।
" रासउ असंभु नवरस सरस् छंदु चहुँ किअ अमिअ सम। 
                   श्रृंगार, वीर, करुणा, विभछ , भय , अद्भुतह संत सम। " 

पृथ्वीराज संयोगिता की पुत्री ' बेला'  के लिए यह प्रसिद्ध है कि, वह कुतुबमीनार पर चढ़ कर, प्रातः गँगा मैया के दर्शन करने के पश्चात  अन्न ग्रहण किया करती थी।
      आज के आधुनिक समय में जिसे देहली नगर का ' लाल किल्ला ' कहते हैं उसे पृथ्वीराज के शासन काल में, ' लालकोट ' के नाम से पुकरा जाता था। उसी किले में, महारानी सँयोगिता तथा उनकी ननद जी पृथ्वीराज की बहन ' पृथा ' को पृथ्वीराज के प्राण त्याग का अशुभ सन्देश मिला तो दुर्ग में, मृत्यु सा भयंकर सन्नाटा छा गया। पृथ्वीराज के दुश्मन आततायी आक्रमण करेंगें यह निश्चित था। अनेकों प्राणों की विनाश लीला, स्त्रियों के शील भंग की संभावना भी थी। अतः वीरांगना राजपूत रमणियों ने, जौहर कर, अपने अपने पवित्र शरीरों को,पवित्र अग्नि - स्नान द्वारा अग्नि देव की कोख में समर्पण करने का प्रण लिया। चिताएँ शरीर  पर्यन्त धू धू कर जलतीं रहीं , शेष रहीं भारतीय इतिहास के ज्वलंत अमर युगल दंपत्ति की वीर गाथा !
शत शत  प्रणाम  !
" सँयोगिता - पृथ्वीराज की वीर गाथा ! प्रणाम  ! चंद्रबरदाई के महानायक - महानायिका अमर  रहें ! 
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- लावण्या ~   : आगामी पुस्तक : अमर युगल पात्र :