Friday, May 27, 2022

महामुनि अगस्त्य जी ~तथा विदर्भ नरेश कन्या 'लोपामुद्रा' ( अमर युगल पात्र से )

 

ॐ 
ऋग्वेद का कथन है कि मित्र तथा वरुण नामक देवताओं का अमोघ तेज एक दिव्य यज्ञिय कलश में पुंजीभूत हुआ।उस कलश के मध्य भाग से, दिव्य तेज:सम्पन्न महर्षि अगस्त्य का प्रादुर्भाव, प्राचीन काल में, काशी  नगरी में हुआ था। 
" सत्रे ह जाताविषिता नमोभि: कुंभे रेत: सिषिचतु: समानम्। 
  ततो ह मान उदियाय मध्यात् ततो ज्ञातमृषिमाहुर्वसिष्ठम्॥ "
इस ऋचा के भाष्य में आचार्य सायण ने लिखा है कि,
 ' ततो वासतीवरात् कुंभात् मध्यात् 
  अगस्त्यो शमीप्रमाण उदियाप प्रादुर्बभूव।
    तत एव कुंभाद्वसिष्ठमप्यृषिं जातमाहु:॥' 
इस प्रकार कुंभ से अगस्त्य तथा महर्षि वसिष्ठ का प्रादुर्भाव हुआ।
 ( उपरोक्त तथ्य : कृष्ण्कोष से साभार )
        महामुनि अगस्त्य जी ऋषि वसिष्ठ के बड़े भ्राता तथा सप्तर्षियों में से एक हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के १६५  सूक्त से क्रम १९१  तक के सूक्त, ऋषि अगस्त्य द्वारा दृष्ट हैं। अतः अगस्त्य को मन्त्र द्रष्टा ऋषि कहते हैं।
' गया ग्राम के पास ' गयशिर 'नामक पर्वत है। बेंत के वन से घिरी अति मनोहारी महानदी पास ही बहती है। अनेक ऋषि मुनियों से सेवित ' धरणीधर ' पर्वत भी वहीं है। उस पर्वत पर ' ब्रह्मसर'  नामक पवित्र तीर्थ है वह साक्षात धर्मराज तथा श्री महादेव जी का निवास स्थान है। 
         एक समय की  बात है कि ब्रह्मसर तीर्थ पे भगवान अगस्त्य, सूर्यपुत्र यमराज धर्मराज से मिलने पधारे। शास्त्र चर्चा आरम्भ हुई। शमठ नामक संयमी व ब्रह्मचारी साधू ने उपस्थित विद्वान ने, अमृतराया के पुत्र, राजर्षि
' गय ' की कथा सुनाई। गय से ही उस स्थान को ' गया ' नाम मिला है। शमठ ने बतलाया कि, गय ने अनेकानेक यज्ञ ब्रह्मसर के समीप संपन्न किये थे। 
अगस्त्य ऋषि वार्तालाप के पश्चात तीर्थ में भ्रमण करने लगे। एक निर्जन स्थान पर,भूमि में बने एक गढ्ढे में, बहुत से साधू पुरुषों को सर के बल औंधे लटके हुए अगस्त्य को दिखलाई दिए।  समीप जाकर देखा तो वे अगस्त्य के पित्री थे। अगस्त्य को आश्चर्य हुआ तो अपने  पितरों से प्रणाम करते हुए पूछा, ' प्रणाम पितृगण महात्मा ! कृपया बतलाएं, आप इस प्रकार, अपार कष्ट  क्यों कर झेल रहे हैं ? ' वेदवादी पितरों ने उत्तर दिया,' पुत्र, संतान परम्परा के लोप की सम्भावना के कारण हमारी यह दुर्दशा हो रही है। कब तुम्हें संतान प्राप्ति होगी ? तुम कब पितृ तर्पण करोगे न जाने ! अतः हमारी ये दुर्दशा है। तुम्हें एक पुत्र  तो हमें और तुम्हें सद्गति मिल सकती है।" 
अगस्त्य अत्यंत तेजस्वी एवं सत्यनिष्ठ थे। हाथ जोड़ उन्होंने सविनय उत्तर दिया ,
' हे पितृगण मैं, इच्छा पूर्ण करूंगा। आप निश्चिन्त हों। '  
अपने पितरों की यह दुर्दशा देखने के बाद अगस्त्य मुनि ने विवाह करने का निश्चय किया। पुत्रोत्पति की इच्छा से अगस्त्य विदर्भ नगरी में आ पहुंचे जहां विदर्भ नरेश कन्या 'लोपामुद्रा'  अद्वितीय सुन्दरी और परम चरित्रवती के रूप में विकसित हो, राजमहल में सुशोभित थी। 
     अगस्त्य ऋषि ने लोपामुद्रा से विवाह प्रस्ताव रखा तो विदर्भ नरेश घबड़ा गए। ऋषि को आदर सत्कार सहित ठहराया। स्वयं अपनी पत्नी के पास आकर बोले, ' हे महारानी, यदि मैं ना करता हूँ  ~ तो महर्षि रुष्ट होंगे। यदि हाँ कह दूँ तब मेरी पुत्री को तपस्वीनी बन कर जीवन जीने के लिए बाध्य करता हूँ ! मैं करूं तो क्या करूँ ? उहापोह से मन विचलित है। ' महारानी धीरज बँधाने लगीं।  उस समय लोपामुद्रा  ने अन्तः पुर में अपनी सखियों व दासियों के मुख से ऋषि अगस्त्य के इस प्रस्ताव की बात सुनी। वह तुरंत अपने माता, पिता के समीप आयी। आदर सहित प्रणाम किये। तथा वे बोली, ' आप को प्रणाम ! परम ज्ञानी ऋषि अगस्त्य, जैसे महापुरुष अकारण कुछ नहीं करते। सदैव तापस शिरोमणि शिवशंकर से ब्याह रचाकर, गिरिवरनन्दिनी माता पार्वती, जगज्जननी कहलाईं। हैं सो ऐसे  तेजस्वी ऋषि अगत्स्य ने वृथा ऐसा  भेजा। होगा हमारे वंश को कीर्ति प्रदान  करने हेतु ही ऋषिवर पधारे हैं। हे माता हे पूज्य पिता , आप व्यर्थ में शोक न करें। इसी क्षण से मैं, महामना अगस्त्यजी का पति रूप में वरण करती हूँ' अपनी पुत्री की बोधयुक्त वाणी सुनकर विदर्भ नरेश व् महारानी अति प्रसन्न हुए। 
शास्त्रोक्त विधिपूर्वक ऋषि अगस्त्य से लोपामुद्रा का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ। पत्नी सहित अगस्त्य जी अगस्त्याश्रम आये। पत्नी से कहा ,' देवि लोपामुद्रा इन बहुमूल्य आभूषणों तथा रेशमी वस्त्रों का आश्रम में क्या उपयोग है अतः इन्हें त्याग दो। ' राजकुमारी लोपामुद्रा ने पति के आदेश मानकर, सुँदर महीन वस्त्र उतार कर  वल्कल, चर्म व छाल से तन सजाया तथा आभूषण के स्थान पर रुद्राक्ष धारण किये। 
         तदन्तर अगस्त्य ऋषि हरिद्वार में आश्रम बनाकर रहने लगे। पतिपरायणा लोपामुद्रा बड़ी तत्परता से ऋषिवर की सेवा करने लगीं। अगस्त्य ऋषि अपनी भार्या से, बड़े प्रेम से मधुर बर्ताव करते।  
            एक दिन ऋतुस्नान के पश्चात, तप से बड़ी हुई कांतिवाली  लोपामुद्रा को ऋषिवर ने देखा।अपनी पत्नी की सेवा, पवित्रता, संयम, कांति व रूप माधुरी ने उन्हें मुग्ध किया।समागम हेतु अगस्त्य ने कल्याणी का आह्वान किया। लोपामुद्रा ने सकुचाते हुए कहा, ' मुनिवर निस्संदेह पति पत्नी संतान प्राप्ति हेतु संसार बंधन में बांधते हैं। मेरी व आपकी प्रीती सार्थक हो। परन्तु हे ऋषिश्रेष्ठ, इन काषाय वस्त्रों में, तपस्विनी वेशभूषा में, मैं, आपके पास नहीं आऊंगी।कृपया मेरी इच्छानुसार मेरे लिए, वैसे ही वस्त्राभूषण जुटायें, जैसे अपने पिता के यहां धारण किया करती थी। '  अगस्त्य जी ने कहा, मेरे पास ऐसा धन ऐश्वर्य कहाँ ?~ 'लोपामुद्रा ने संयत किन्तु दृढ स्वर में कहा, ' स्वामी, आपके तपोबल के समक्ष कुबेर की संपत्ति वैभव नगण्य है। आप इच्छा करें तो समस्त संपत्ति क्षणमात्र में उपस्थित हो जाए ! ' 
अगस्त्य जी बोले , ' सत्य है।  मुझ में यह सामर्थ्य है, किन्तु देवी, मेरा  सँचित तपोबल ऐसा करने से क्षीण हो जाएगा। हाँ एक उपाय है, किसी सामर्थ्यवान राजवी  से दान दक्षिणा मांग लाता हूँ। '
      प्रथम वे राजा श्रुतर्वा  के राजमहल में आये।राजा ने श्रद्धा तथा आदर से सत्कार करते हुए ऋषि की माँग के अनुसार, अपना पूरा लेखा - जोखा उनके समक्ष रख दिया। आय - व्यय बराबर था।
अतः अगस्त्य ऋषि ने उससे  लेना अनुचित समझ कर वहां से प्रस्थान कर लिया। 
 महाराज बृहदश्व के राज दरबार से भी ऋषि निराश लौटे। आय - व्यय उसका भी समान था। सो ऋषि ने सोचा, ' यदि मैं इस का धन लेता हूँ, तो राज्य के अन्य प्राणी अपार कष्ट भोगेंगे ! ' तब उसका धन लेनेका संकल्प त्याग कर वे तीनों, पुरुकुत्स राजा ने महान पुत्र ,ईष्वाकुभूषण त्रसदस्यु के पास गए। उत्साह से त्रसदस्यु ने स्वागत किया किन्तु उसके पास भी अतिरिक्त धन का अभाव था। अब श्रुतर्वा, बृहदश्व तथा त्रसदस्यु - आपस में मंत्रणा कर, इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि,  संसार में असुर राज ' इल्वल ' ही धनी है। अतः वे सभी इल्वल के पास गए। 
अगस्त्य जी बोले ,' हे असुर राज इल्वल हम सभी आपको सामर्थ्यवान व धनकुबेर समझते हैं। अतः आप मेरी सहायता कीजिए। मैं थोड़ा धन  चाहता हूँ।   '
इल्वल, आदर सहित प्रणाम कर बोला, ' दे तो दूँ , पर मेरी आसुरी वृत्ति आपसे एक प्रश्न पूछना चाहती है। क्या आप ये बतला सकते हैं कि, मैं आपको कितना धन देना  चाहता हूँ ?  यदि आप मेरे गुप्त मनोभाव बतला सकें तो मैं, सहर्ष आपको धन दूंगा। ' 
             अगस्त्य ऋषि ने एक लम्बे निः श्वास लेकर सोचा ' यह कैसी अप्रिय प्रदर्शन ~ क्रीड़ा है ! ' ज्ञान के महासमुद्र सामान संसार के विलक्षण ज्ञानी अगस्त्य ऋषि के मन को यह सुझाव न भाया। तथापि वे बोले, ' हे असुरराज ! मेरे संग तुम्हारे राजप्रसाद में पधारे प्रत्येक राजन को तुम दस सहस्त्र गौएँ तथा दस सहस्त्र स्वर्णमुद्राएँ देना चाहते हो। मुझे उनसे दुगुनी गौएँ तथा स्वर्णमुद्राएँ देना चाहते हो। स्वर्ण निर्मित रथ जिसमें जिस में मन की गति से दो वेगवान अश्व विराव तथा सुराव जुते होंगें जो, धन राशि को उठाने कर मेरे आश्रम तक पहुंचा दें तुम यही समस्त मुझे देना चाहते हो। '
          ऋषि अगस्त्य की वाणी सुनकर सभी अचंभित हुए। इल्वल प्रसन्न हुआ। ऋषि को सहर्ष दान देकर, असुरराज पुण्यवान हुआ। राजाओं से विदा लेकर अगस्त्य लोपामुद्रा के पास लौटे। 
अपनी प्रिय पत्नी लोपामुद्रा की समस्त मनोकामनाएँ ऋषि अगस्त्य ने पूर्ण कीं।
 लोपामुद्रा हर्षित होकर बोलीं,' आपने मेरे समस्त मनोरथों को पूर्ण किया है। यह श्रृंगार अपने पति  प्रसन्नता हेतु धारण किये मैं आपके समक्ष उपस्थित हूँ। हे परम् तेजस्वी ऋषिवर कृपा कर एक ऐसा पुत्र मुजगे दें जो बुद्धिमान हो, बलशाली हो तथा पराक्रमी बने। '  
अगस्त्य जी बोले, ' हे परम सुंदरी ! तुम्हारी यह प्रसन्न छवि विलोक, मैं संतुष्ट हूँ। संतति के विषय में मेरे विचार सुनो। तुम एक सहस्त्र पुत्रों  बनने की इच्छा रखती हो या सौ पुत्रों की या तुम एक पुत्र ऐसा  चाहती हो जो सहस्त्रों के समकक्ष हो ? ' 
लोपामुद्रा बोलीं ' हे तपोधन ! मैं सहस्त्रों की तुलना में श्रेष्ठ हो ऐसा एक पुत्र चाहती हूँ। क्योंकि सहस्त्र अयोग्य पुरुषों में, एक योग्य एवं विद्वान पुरुष ही श्रेष्ठ ठहरता है। ' लोपामुद्रा का निर्णय सुन अगस्त्य ऋषि ने ' तथास्तु ' कहा।
 लोपामुद्रा को शैशव से माँ भुवनेश्वरी का श्री सिद्धिदात्री यंत्र एवं उपासना पद्धति की दीक्षा की प्राप्ति हुई थी। 
 लोपामुद्रा उवाच अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं। अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि |
 ऋग्वेद से ~ 
ऋषि :- लोपमुद्राऽगस्त्यौ
देवता :- दम्पती - युगल 

छन्द :- त्रिष्टुप्
स्वर :- धैवतः
लिपि-शुद्ध संस्कृत

न॒दस्य॑ मा रुध॒तः काम॒ आग॑न्नि॒त आजा॑तो अ॒मुत॒: कुत॑श्चित् । 

लोपा॑मुद्रा॒ वृष॑णं॒ नी रि॑णाति॒ धीर॒मधी॑रा धयति श्व॒सन्त॑म् ॥

ऋग्वेद के मंडल १ के सूक्त १७९ मंत्र ००४
(नदस्य) अव्यक्तशब्दं कुर्वतो वृषभादेः (मा) माम् (रुधतः) रेतो निरोद्धुः (कामः) (आगन्) आगच्छति प्राप्नोति (इतः) अस्मात् (आजातः) सर्वतः प्रसिद्धः (अमुतः) अमुष्मात् (कुतः) कस्मात् (चित्) अपि (लोपामुद्रा) लोपएव आमुद्रा समन्तात् प्रत्ययकारिणी यस्याः सा (वृषणम्) वीर्यवन्तम् (निः) नितराम् (रिणाति) (धीरम्) धैर्ययुक्तम् (अधीरा) धैर्यरहिता (धयति) आधरति (श्वसन्तम्) प्राणयन्तम् ॥४॥

हिंदी अनुवाद ~ (इतः) इधर से वा (अमुतः) उधर से वा (कुतश्चित्) कहीं से (आजातः) सब ओर से प्रसिद्ध (रुधतः) वीर्य रोकने वा (नदस्य) अव्यक्त शब्द करनेवालें वृषभ आदि का (कामः) काम (मा) मुझे  (आगन्) प्राप्त हो। अर्थात् उनके सदृश कामदेव उत्पन्न हो। 

(अधीरा) धीरज से रहित वा (लोपामुद्रा) लोप होजाना लुक जाना ही प्रतीत का चिह्न है। जिसका सो यह स्त्री (वृषणम्) वीर्यवान् (धीरम्) धीरजयुक्त (श्वसन्तम्) श्वासें लेते हुए अर्थात् शयनादि दशा में निमग्न पुरुष को (नीरिणति) निरन्तर प्राप्त हो। (धयति) उससे गमन भी करती है ॥४॥

लोपामुद्रा के गर्भाधान पश्चात ऋषि अगस्त्य तपस्या करने चले गए। सात वर्ष गर्भ पेट में पल कर बढ़ता रहा। सातवां वर्ष समाप्त होते दृढस्यु नामक बुद्धिमान, तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। दृढस्यु का दुसरा नाम इध्मवाहा भी है। दृढस्यु वेदों का सांगोपांग विद्वान एवं उपनिषदों का पाठ करनेवाला तेजस्वी ऋषिपुत्र था। ऐसे गुणवान पुत्र की प्राप्ति से अगस्त्य ऋषि के पितृगण तृप्त हुए। सभी पित्री सद्गति प्राप्त कर वे इच्छनीय ऊर्ध्व लोक को प्राप्त हुए। 

' अगस्त्याश्रम ' ~ 

एक बार नारद जी विध्याचल पर्वत से महामेरू परबत का महिमा मंडान करते गुणगान  करने लगे। विंध्य पर्वत ने सोचा, ' क्यों न मैं  मेरू के समान बढ़ूँ ! ' वह बढ़ने लगा। देवतागण भागे हुए अगस्त्य ऋषि के समीप आये।  प्रार्थना कर  कहने लगे ' हे ऋषिवर ! आप कृपा कर विंध्याचल परबत को स्तम्भित करें। ' 

अगस्त्य ऋषि अपनी धर्मपत्नी लोपामुद्रा सहित विंध्याचल को पार करने आये। पर्वतराज विंध्य ने सविनय ऋषिवर को प्रणाम किया। अगस्त्य ऋषि ने विंध्य को आदेश दिया, ' हे पर्वत राज मुझे प्रणाम करते हो,मेरा आदर करते हो तो मेरी बात सुनो। जब  लौट कर नहीं आता, तुम बढ़ना नहीं। इसी अवस्था में स्तम्भित, अचल रहना। ' विंध्याचल पर्वत ने ऋषि आज्ञा का पालन किया। अगस्त्य  ऋषि उत्तर भारत से दक्षिण भारत में आकर बस गए। 

             अब तक ना ही अगस्त्य ऋषि लौटे हैं ना ही विंध्य पर्वत बढ़ा ! ना ही पर्वतराज विंध्याचल अपने वचन को भूले हैं।दक्षिण भारत में मलयाचल पर्वत पर अगस्त्य ऋषि ने अगस्त्याश्रम की स्थापना की तथा दक्षिण भारतीय वांग्मय के वे पितृ पुरुष कहलाये। मान्यता है दक्षिण भारत में अगस्त्यकूट पर्वत पर वे  तपस्या रत हैं। दक्षिण भारत की अति प्राचीन ' तमिळ ' भाषा के तीन संघों मे से प्रथम दो संघों में अगस्त्य ऋषि का योगदान है। अगस्त्य नाटे कद के थे सो उन्हें ' कुरुमुनि ' भी कहते हैं।  तमिळ भाषा का व्याकरण,संगीत शास्त्र, साहित्य व नाट्य शास्त्र के दाता अगस्त्य ऋषि हैं। अगस्त्य ऋषि के शिष्य ' टॉकपयार ' ने ' टोकपायम ' व्याकरण शास्त्र ग्रन्थ लिखा। तमिलभाषी विद्वान श्रीमान विलुपुत्तरान का कहना है कि, ' अमृतवाणी तमिळ भाषा, भारतभूमि को अगस्त्य ऋषि द्वारा प्रदत्त दिव्य - प्रसाद है। 

अगस्त्य ऋषि द्वारा रचित सुप्रसिद्ध साहित्य :
ऋग्वेद में अगस्त्य ~ लोपामुद्रा संवाद है।  
 
 १ ) अगस्त्य ~ गीता २) अगस्त्य ~ संहिता ग्रन्थ में विद्युत ( बिजली ) उत्पादन से जुड़े सूत्र हैं। 

उदाहरणार्थ : 

संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌। 

छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥ 

दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:। 

संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥ 

-अगस्त्य संहिता

अर्थात :एक मिट्टी का पात्र लें, उसमें ताम्र पट्टिका (Copper Sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा (Copper sulphate) डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगाएं। 

 ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें। फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति (Electricity) का उदय होगा।

३ ) शिव ~ संहिता ४) द्वैध निर्णय तंत्र 

             वर्तमान काल भारतवर्ष में, राजगृह के निकट बिहार प्रांत में, उत्तर भारत का अगस्त्याश्रम स्थित है। प्राचीनकाल में पाण्डव भी अगस्त्याश्रम यात्रा करते हुए पहुंचे थे। इसे भृगु तीर्थ भी कहते हैं। यहां स्नान करनेसे प्राणी तेजस्वी हो जाता है ऐसी लोक मान्यता है। श्रीरामचन्द्र जी ने परशुरामजी के तेज को किन्ठित कर दिया था तद्पश्चात भृगु तीर्थ में स्नान व पूजन कर उन्हें तेज की पुनः प्राप्ति हुई थी। ज्येष्ठ पाण्डु पुत्र युद्धिष्ठिर के तेज को  कौरव पुत्र पापात्मा दुर्योधन के हर लेने पर भृगुतीर्थ में स्नान पूजन कर, युद्धिष्ठिर को अपना खोया हुआ तेज पुनः प्राप्त हुआ था। 

 अगस्त्य ऋषि से जुड़े अन्य रोचक प्रसंग ~ 

एक समय की बात है,  देवल ऋषि के आश्रम के समीप ' हु हु ' नामक गन्धर्व अपनी पत्नियों समेत जलक्रीड़ा करने आया था। नग्नावस्था में कोलाहल करते हुए  ' हु हु ' को ऋषिने श्राप दिया  ' जा तू व्याघ्र ( मगरमच्छ )  बन जा ! 

        त्रिकूट पर्वत के पास एक सरोवर में, पूर्व जन्म में राजा इन्द्रद्युम्न का हाथी के रूप में पुनर्जन्म हुआ था। पांड्य देश के राजा इन्द्रद्युम्न एक बार पूजा कर।  अगस्त्य ऋषि वहां पधारे। किन्तु पूजा में लीं इन्द्रद्युम्न को सुध ना रही। इस के कारण क्रुद्ध हुए अगस्त्य ऋषि ने  श्राप दिया,' ऋषियों का अनादर करनेवाले जा तू हाथी की योनि में जन्म ले ! ' 

      अब हाथी का जन्म लिए इन्द्रद्युम्न जल में प्रविष्ट हुए। ' हु हु ' जो व्याघ्र बना था उसने हाथी का पैर अपने बलिष्ट दांतों में जकड लिया। पूर्व जन्म के पुण्य कर्मों के प्रताप से हाथी बने इन्द्रद्युम्न महाविष्णु की स्तुति करने लगे। महाविष्णु गरूड़जी ने  पर सवार होकर, आकाश मार्ग से अवतरित हो, हु हु - व्याघ्र का सर काट कर हाथी की प्राण रक्षा की तदनन्तर दोनों को मुक्ति मिली। यही  पुराण प्रसिद्ध ' गजेंद्र ~ मोक्ष कथा '  है। 

                     श्रीरामचन्द्र जी ने श्री सीता स्वयंवर से पूर्व राक्षसी ताड़का का वध किया था। ताड़का सुकेतु यक्ष की पुत्री थी। ताड़का का विवाह ' इहराजा ' या ' सुन्द ' से हुआ था उसीका पुत्र ' मरीची ' था। पति सुन्द की मृत्यु के पश्चात तोड़ फोड़ करती, दौड़ती - भागती, ताड़का अगस्त्य ऋषि के आश्रम में  उत्पात करने लगी। अगस्त्य ऋषि के श्राप से ताड़का राक्षसी बन गयी तथा ताड़का पुत्र मरीचि कुरूप हो गया।  ताड़का अगस्त्याश्रम से निकल कर वन , वन भटकने लगी।  

 श्रीरामचन्द्र जी अगस्त्य ऋषि तथा लोपामुद्रा से वनवास में मिले थे। श्रीरामचन्द्र जी को दैत्यराज रावण के संग युद्ध करने से पूर्व अगस्त्य ऋषि ने सूर्य देवता का पवित्र मंत्र आदित्य ह्रदय स्रोत महामंत्र ' प्रदान किया था जिसके पाठ से श्रीराम विजयी हुए। अगस्त्य ऋषि ने श्रीरामचन्द्र जी को  अमोघ बाण, धनुष, अक्षय तूणीर तथा खड्ग दिए थे।
नहुष के स्वर्ग से पतन का श्राप भी ऋषि अगस्त्य ने दिया था। 

कालकेय राक्षस समुद्र में जा कर छिप जाते थे। दिनभर वे छिपे रहते तथा रात्रि में बाहर निकलकर ब्राह्मणों व ऋषियों का वध कर देते थे। सभी देवतागण एकत्रित होकर शेषशायी महानारायण  के वैकुण्ठ धाम पहुंचे। महानारायण ने उनसे कहा,

' पृथ्वी पर अगस्त्य ऋषि हैं आप उनसे विनती करें मुझे पूर्ण विशवास है कि वे इस समस्या का समाधान अवश्य करेंगें। देवतागण अगस्त्याश्रम आये।

ऋषि से अंजलिबद्ध विनती कर बोले, ' हे कृपालु ऋषिवर आप से पुण्यश्लोक धर्मात्मा पृथ्वी का कष्ट हरने में समर्थ हैं।कृपया कालकेय राक्षसों के उत्पात से विप्र - ऋषि जन को रक्षा प्रदान करें '

ऋषि अगस्त्य ने देवताओं से कहा ' आप निश्चिंत हों। मैं, कालकेयों का सँहार करूंगा। ' देवताओं  लेकर अगस्त्य घरहराते गर्जन टार्जन करते सागर तट पर आ पहुंचे। अपनी अंजलि में सागर के जल को भर भर के वे समुद्र जल का आचमन करने लगे। कुछ क्षणों में सागर सूख गया। कालकेय राक्षस जो छिपे थे , प्रकट हो गए तब देवताओं ने उन  का सँहार किया। यह सूखा समुद्र देख सभी ग्लानि से भर गए। महाविष्णु ने प्रकट होकर कहा, ' ऋषि अगस्त्य ने समुद्र सोख लिया। भगीरथ प्रयास से पृथ्वी पर जिस समय गँगा  अवतरण संभव होगा, यह समुद्र भी उस समय लहराएगा। पौराणिक साहित्य के अनुसार अगस्त्य-ऋषि ने भारत की आर्य-सभ्यता का सुदूर दक्षिण तथा समुद्र पार के देशों तक प्रचार किया था।

तत: सम्प्रस्थितो राजा कौंतेयो भूरिदक्षिण: 
  अगस्त्याश्रममासाद्य दुर्जयायामुवा
अमर युगल पात्र : ऋषि अगस्त्य व उनकी पत्नी लोपामुद्रा को शत शत प्रणाम। 
      ~~ इति ~ ~




Wednesday, May 25, 2022

कच - देवयानी - ययाति - शर्मिष्ठा

ॐ 

चंद्रवंशी राजा पुरुरवा के पुत्र हुए आयु। आयु के पुत्र हुए नहुष।  नहुष से ययाति जन्मे।ययाति की २ पत्नियां थीं नाम थे,  देवयानी तथा शर्मिष्ठा। पुरंदर या देवराज इंद्र  स्वर्ग के अधिपति की एक कन्या का नाम जयंती थीं। जयंती देवाधिपति दानवों के कुलगुरु शुक्राचार्य के आश्रम में १० वर्ष रहीं।
देव कन्या जयंती ने ऋषिवर की अत्याधिक सेवा की। दानवों के गुरुवर ऋषि शुक्राचार्य के आश्रम में जयंती से देवयानी का जन्म हुआ। किन्ही पुराणों में प्रियव्रत राजा की पुत्री ऊर्जस्वती को देवयानी की माता कहा गया है। परन्तु  पुराण कथाओं में  ' देवयानी ' सदैव ऋषि शुक्राचार्य की पुत्री कहलातीं रहीं हैं।  
उस काल में देव व दानवों में त्रिलोकी के अधिकार व साम्राज्य के लिए युद्ध हो रहा था। देवताओं ने अंगिरस माने गुरु बृहस्पति को विजय प्राप्ति के लिए अपना गुरु बनाया था। दानवों ने शुक्राचार्य को अपना पुरोहित चयनित किया था क्योंकि गुरु शुक्राचार्य के पास एक अलौकिक विद्या '  मृत संजीवनी विद्या ' थी।ऋषि गौतम से शिवजी के परम मन्त्र महामृत्युंजय मन्त्र की सिद्धि से जो असुर मृत हो जाता उसे, इस विद्या के तेजोबल से गुरु शुक्राचार्य जीवित कर देते।इस कारण असुर देवताओं से युद्ध में विजय प्राप्त कर रहे थे।  देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास यह विद्या न थी।तब देवताओं ने घबड़ाकर बृहस्पति के ज्येष्ठ पुत्र कच की शरण ली। कच से अनुरोध कर कहा कि,' हे परम् तेजस्वी कच !  कृपया आप गुरु शुक्राचार्य जी के पास जाएं। किसी प्रकार उनसे यह गुप्त ' संजीवनी विद्या ' प्राप्त कर लें। ' कच सहमत हुए। वे  शुक्राचार्य के आश्रम की ओर चल पड़े। 
भृगु ऋषि के पुत्र गुरु शुक्राचार्य, परम शिव भक्त थे। हिरण्यकश्यपु की पुत्री दिव्या के पुत्र उशना को कालान्तर में शुक्राचार्य नाम मिला। इस रिश्ते से शुक्राचार्य प्रह्लाद के भांजे थे।  
अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ:॥
 शुक्राचार्य : (शुक्र नीति)
  
अर्थात : कोई अक्षर ऐसा नहीं है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरू होता हो।  कोई ऐसा मूल (जड़) नहीं है जिससे कोई औषधि न बनती हो।  कोई व्यक्ति  अयोग्य नहीं होता, व्यक्ति द्वारा काम लेने वाले गुणी संयोजक ही दुर्लभ हैं।
 शुक्र नीति, नीति ग्रन्थ है। जिसमें  ज्ञान की चार शाखाएँ हैं। 
१) आन्वीक्षिकी, २) त्रयी, ३) वार्ता एवं ४) दण्डनीति को स्वीकार किया गया है।प्राचीन भारतीय चिंतन में राज्य को सप्तांग राज्य के रूप में परिभाषित किया गया है। राज्य सात अंगो से बना सावयवी है। वे चार अंग हैं ~ १) स्वामी, २ ) अमात्य, ३ ) मित्र, ४ ) कोश, ५ ) राष्ट्र, ६ ) दुर्ग, ७ ) सेना से बना है। 
शुक्रनीति में कहा गया है, ‘‘राज्य के इन सात निर्माणक तत्वों में स्वामी सिर, अमात्य नेत्र, मित्र कर्ण, कोश मुख, सेना मन, दुर्ग भुजाऐं एवं राष्ट्र पैर हैं।’’ 
एक अन्य प्रसंग में राज्य की तुलना वृक्ष से करते हुऐ राजा को इस वृक्ष का मूल, मंत्रियों को स्कन्ध, सेनापति को शाखा, सेना को पल्लव, प्रजा को धूल, भूमि से प्राप्त होने वाले कारकों को फल एवं राज्य की भूमि को बीज कहा गया है।
शुक्र ने राजाओं की वार्षिक आय के आधार पर आठ प्रकार के राजाओं का उल्लेख किया है। १) सामन्त २) माण्डलिक ३) राजा ४)  महाराजा ६) सम्राट७) विराट ८ ) सार्वभौम।
मत्स्य पुराण के अनुसार शुक्राचार्य का वर्ण श्वेत है। शुक्राचार्य को एकाक्ष नाम भी मिला हुआ है। इनका वाहन रथ है। रथ में अग्नि के समान आठ घोड़े जुते रहते हैं एवं रथ पर ध्वजाएं फहराती रहती हैं।इनका आयुध दण्ड है। शुक्र वृष और तुला राशि के स्वामी हैं। शुक्र की महादशा २०  वर्ष की होती है।
 
गुरु शुक्राचार्य की पुत्री का नाम देवयानी था, पुत्र का नाम शंद और अमर्क था। 
इनके पुत्र शंद और अमर्क हिरण्यकशिपु के यहां नीतिशास्त्र का अध्यापन करते थे।
 ऋग्वेद में भृगुवंशी ऋषियों द्वारा रचित अनेक मंत्रों का वर्णन मिलता है। 
 जिसमें वेन, सोमाहुति, स्यूमरश्मि, भार्गव, आर्वि आदि का नाम आता है। 
 गुरु शुक्राचार्य के आश्रम आ कर कच ने सविनय निवेदन किया। ' हे परम् ज्ञानी गुरुवर, मैं, ऋषि अंगिरा पौत्र , बृहस्पति पुत्र कच, आपको प्रणाम करता हूँ। 
कृपया आप मुझे अपने शिष्य रूप में स्वीकार करें तो मैं कृतार्थ हो जाऊंगा। 
मैं वचन देता हूँ कि मैं ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, आपके आश्रम में रहूँगा। '
गुरु शुक्राचार्य ने कहा,' पुत्र, कच,  स्वागत है। तुम्हारा सत्कार, बृहस्पति का सत्कार होगा।तुम सानंद मेरे पास रहो। ' अब कच गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में रहने लगे। वहाँ के काम में हाथ बंटाने लगे अपने गुरु शुक्र की गौओं को वे वन में चराने ले जाने लगे। दानव नहीं चाहते थे कि, देवलोक के गुरु बृहस्पति, जिन के प्रति  दानवों को, अत्याधित द्वेष - भाव था, उन्हीं का पुत्र, यह कच - गुरु शुक्राचार्य के पास शिष्य बनकर रह रहा है। कच उन से संजीवनी विद्या न सीख ले। इस आशंका से का असुरों के मन में अत्याधिक भय उत्पन्न हुआ था। संजीवनी की गुप्त विद्या की सुरक्षा हेतु, दानवों ने कच की दो बार ह्त्या की थी। 
एक दिन संध्या काल होते, गौएँ, अपने रक्षक ग्वाले की बिना आश्रम में लौटीं। 
तब चिंतित गुरु कन्या देवयानी ने अपने पिता शुक्राचार्य से कहा,  ' पिताजी  कच गौओं के साथ लौटे नहीं। या तो अवश्य कुछ अप्रिय घटना हुई है। या किसी ने कच की ह्त्या की हो मुझे ऐसा जान पड़ता है।'  इतना कह, आगे देवयानी रोने लगी।
गुरू शुक्राचार्य, देवयानी को साथ लिए वहीं पहुंचे जहां कच मृत पड़ा हुआ था।  
अब बिलखती हुई देवयानी ने कहा, ' हा पिता ! यह कैसा अप्रिय काण्ड हुआ ! मैं कच से, मौन भाव से, प्रेम करने लगी हूँ।  उनके बिना अब मैं जीवित न रहूंगी। मैं सत्य कह रही हूँ ! आपकी सौगंध ! '  अपनी पुत्री के अश्रु देखकर शुक्राचार्य स्नेह विगलित हो गए। कहा,' अरे बिटिया तू इतना घबड़ाती क्यूँ है ! ले मैं अभी इसे जीवित कर देता हूँ।' इस प्रकार कच को गुरु शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या से जीवन दान मिला। कुछ समय शान्ति से बीता। किन्तु एक संध्या कच आश्रम में पुनः लौट कर न आया।  इस बार दुष्ट असुरों ने  कच की ह्त्या कर के कच का शरीर भेड़ियों को खिला दिया था।  गुरु शुक्राचार्य ने संजीवनी मन्त्र पढ़कर अपने कमण्डलु से अभिषिक्त जल के छींटे छिड़कते हुए उच्च स्वर से पुकारा, ' आओ बेटा कच ! ' तत्क्षण भेड़िये के अंग प्रत्यंग को भेद कर, कच के अंग, एकदूसरे से जुड़ते हुए,गुरु सेवा में उपस्थित हो गए। देवयानी ने कच से पूछा कि,
' तुम्हारे साथ किस निर्मम ने ऐसा किया ? बताओ ये कैसे हुआ ? ' तब कच ने सारा वृतांत देवयानी को कह सुनाया। कुछ समय शाँति से बीता। परन्तु दुबारा कच के साथ पुनः वैसा ही हुआ।  गुरु शुक्राचार्य ने पुनः कच को जीवनदान दिया। 
 अब असुर एकत्रित हुए। कुटिल परामर्श व मंत्रणा करने के पश्चात असुरों ने एक युक्ति की। इस बार कच की ह्त्या कर उसे जलाकर भस्म कर दिया। उस भस्म को शुक्राचार्य की वारूणी पात्र में उंडेल कर, सेवा - भक्ति का स्वांग रचकर,
 गुरु के समीप गए। गुरु शुक्राचार्य के हाथों में भस्म मिश्रित सुरापात्र धमा दिया।
 गुरु शुक्राचार्य सुरा को पी गए।  देवयानी उसी समय दौड़ी हुई आयी और कहा,
       ' पिता जी कच अब तक लौटा नहीं। प्रातः काल पूजा के पुष्प लेने गया था। अब तो रात्रि हो चली है। अवश्य भारी विपत्ति आन पडी है। '  उसी समय कच ने गुरु के शरीर के भीतर से पुकारा, ' हे परम् कृपालु गुरुवर ! आपका यह शिष्य आपके शरीर के भीतर से बोल रहा है ! आप ही मेरे परम् दयालु प्राण रक्षक प्राण दाता हैं। मुझ परकृपा करें गुरुदेव ! ' शुक्राचार्य ने कहा,' अरे यह तो बड़ा कठिन काण्ड घटित हुआ है।मैं तुम्हें संजीवनी विद्या सिखलाता हूँ। मेरा पेट फाड़ कर तुम बाहर आ जाओ। सुयोग्य पुत्र की भाँति तुम, मुझे जीवित कर देना। '  
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गुरू शुक्राचार्य के शरीर से कच जीवित बाहर आये। तद्पश्चात कच  ने गुरू आज्ञा का पालन करते हुए संजीवनी विद्या से गुरु शुक्र को जीवित कर अपना प्रण निभाया । शुक्राचार्य को साष्टांग दंडवत कर बोले,' आज पश्चात आप ही मेरे माता, पिता, गुरु, भाई बँधु - बांधव सभी कुछ आप ही हैं।  मैं कृतज्ञ हूँ।आपने संजीवनी विद्या रूपी अमृत का मेरे इन कर्ण में, कर्णामृत समान प्रवेश करवाया है।आप धन्य हैं गुरुदेव ! मैं आपका सदैव आदर करूंगा। जो व्यक्ति गुरु का आदर नहीं करते, वे संसार में सर्वथा कलंकित होते रहते हैं।' 
चित्र : शुक्राचार्य और कच ~~ इस घटना पश्चात शुक्राचार्य को बड़ी ग्लानि हुई। सुरापान से विवेकहीन होना उन्हें आत्मग्लानि से भर गया। गुरु शुक्राचार्य ने श्राप  देते हुए कहा,' मैं समस्त ब्राह्मणों को श्राप देता हूँ कि जो ब्राह्मण सुरापान करेगा वह धर्मभ्रष्ट कहलाएगा। '
कच का  विद्या अध्ययन सम्पूर्ण हुआ। गुरु शुक्राचार्य ने कच की स्वर्ग लौटने की आज्ञा दी   कच अमरावती अपने धाम लौटने को उद्यत हुआ।  देवयानी उस क्षण कच के समीप आयी।मधुर, विनीत स्वर से बोली, ' कच , तुम कुलीन, सदाचारी, जितेंद्रीय, तापस स्वभाववाले हो। अब तुम स्नातक हुए। मैं तुम से प्रेम करती हूँ।अतः  मुझ सेविका का स्वीकार करो। ' कच ने हाथ जोड़कर सविनय प्रतिकार करते हुए कहा,' एक पिता के शरीर से तुम व मैं दोनों प्रकट हुए। इस संसार में आये।अतः तुम मेरी बहन हुईं। तुम्हारे आश्रम में आपके परिवार की स्नेह छैंया में, मैं सुखपूर्वक रहा।  देवी, अब कृपया घर लौटने की अनुमति प्रदान करें तथा मुझे आशीर्वाद दें। तथा यदाकदा मुझे स्नेह भाव से स्मरण कर लीजिएगा जैसे मैं करता रहूंगा। ' 
 कच के प्रेम प्रस्ताव ठुकराने से आहात हुई देवयानी अब कुपित हो गयी। सरोष बोली, ' मैं, गुरु शुक्राचार्य कन्या देवयानी, तुम्हें श्राप देती हूँ तुम्हारी संजीवनी विद्या, कभी सफल ना हो ! ' 
             कच ने विनम्रता से उत्तर दिया ' जो कुछ हो वही सही। मैं इस विद्या को अन्य को सीखलाऊँगा। मैं शाप का अधिकारी न था। देवी प्रणाम '  इतना कहकर कच, अमरावती लौट गए। स्वर्ग में देवतागण कच को लौट आया देख कर अति प्रसन्न हुए व उसका अभिनन्दन किया गया व कच को यज्ञ का भागी बनाया गया।संजीवनी विद्या प्राप्ति का उद्देश्य, देवों का मनोरथ कच द्वारा इस प्रकार सिद्ध हुआ।   
कुछ काल बीता। वृषपर्वा असुरों का  राजा था। उसकी पुत्री रूपवती शर्मिष्ठा थी। वह देवयानी की शिष्या भी थी।  एक दिवस कुछ कन्याओं सहित वह जल क्रीड़ा कर रही थी। देवराज इंद्र मरुत वरुण इत्यादि देवताओं के संग इसे निरख कर आनंद ले रहे थे।  मरूत से इंद्र के कहने पर वायु के झोंकों से स्त्रियों के वस्त्र भिगो दिए गए। तब शर्मिष्ठा ने भूल से अपनी गुरु देवयानी के वस्त्र धारण किये। जिसे देखते ही देवयानी अत्यंत कुपित हुई ! कहा,
' हे असुर कन्या , तेरी यह धृष्टता !  मेरे वस्त्र क्यों धारण किये ? ' शर्मिष्ठा गर्व सहित बोली ' रहने दो जीजी, क्यों अकारण क्रोध कर रही हो ! भूल से तुम्हारे वस्त्र धारण कर  लिए हैं। आप जानती हैं, मैं असुर नृपति वृषपर्वा की कन्या शर्मिष्ठा हूँ। वैसे, ध्यान रहे कि, आपके पिता, मेरे पिता के समक्ष, हाथ बांधे, उपस्थित रहते हैं। ' 
शर्मिष्ठा की ऐसी मन को चुभा देनेवाली वाणी से, देवयानी के क्रोध भरे ह्रदय में, जलते में मानों घी पड़ा ! दोनों क्रोधित थीं। सहसा शर्मिष्ठा, ने देवयानी के समीप आ कर देवयानी को खदेड़ कर, एक कुंए में धकेल कर शर्मिष्ठा, अपनी दासीयों सहित प्रस्थान कर गयी।  
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 शोकमग्न देवयानी उस अन्धकार भरी रात्रि में कुंएं में रहीं। बाहर न निकल पाईं। 
संयोगवश कुछ समय पश्चात नहुष पुत्र ययाति वहां से जा रहे थे। एक स्त्री के रुदन का स्वर सुन वे कुंएं के समीप आये।ययाति ने स्त्री की बाँह पकड़ कर उसे बाहर निकाला शर्मिष्ठा और देवयानी के लिए इमेज परिणाम
 तदुपरांत अपना परिचय देते हुए पूछा, ' देवी , आप कौन हैं ? इस विपत्ति में कैसे घिरीं ?  कृपया बतलाएं।'  देवयानी ने सविस्तार अपनी व्यथा - कथा कह सुनाई।
तब ययाति, देवयानी को ससम्मान गुरु शुक्राचार्य के आश्रम ले गए। 
देवयानी ने अपने पिता से क्रंदन करते हुए अपना सारा वृतान्त कह सुनाया।
 तब सक्रोध बोली, ' हे पिता, अब हम यहाँ कदापि न रहेंगें। चलिए हम कहीं अन्य स्थान को चलें ' इतने में असुरगण भी वहाँ आकर  पिता पुत्री से प्रार्थना करने लगे 
' हे गुरु पुत्री, कृपा कर आप शाँत हो जाएं । ' पिताने अपनी पुत्री को सांत्वना देते हुए कहा, ' पुत्री, क्रोध त्याग दो।शाँत चित्त से, विचार कर मुझे बतलाओ कि तुम, किस तरह, यहां रहने के लिए सहमत होगी ? मैं वचन देता हूँ, हम वही उपाय करेंगें।तुम बतलाओ तो सही, तुम किस प्रकार प्रसन्न रहोगी ? '  
कुछ समय विचार कर देवयानी बोली, ' हे परम् ज्ञानी पिता! आप सर्व समर्थ हैं।आप, उस अहंकारी असुर नरेश से कहें कि, राजपुत्री शर्मिष्ठा, अपनी एक सहस्त्र दासियों सहित, मेरी सेवा में, उपस्थित हो।' 
असुर नरेश तथा असुर समुदाय को गुरु शुक्राचार्य के आदेश का पालन करना ही था।    ताकि, संजीवनी विद्याधारी परम सशक्त गुरू शुक्राचार्य, वहीं उन लोगों के साथ बने रहें।  अतः देवयानी के प्रस्ताव को सर्वमान्य करते हुए इसे स्वीकारना पड़ा। 
कुछ काल बीतने पर एक दिवस ययाति पुनः शुक्राचार्य आश्रम में  पधारे। देवयानी, शर्मिष्ठा तथा असंख्य दसियों को वन में विहार करते देख, ययाति ने अभिवादन करते हुए प्रश्न किया, ' हे देवियों,  दासियों के मध्य, जैसे रात्रि आकाश में, तारिकाओं के मध्य चन्द्रमा के सदृश्य सुशोभित, आप दो चन्द्रिका सम कौन हैं ? कृपया, परिचय दें ' ~ देवयानी, मंद स्मित सहित उत्तर देने लगी, ' हे राजन आप इतनी शीघ्र भूल गए ? मैं वही देवयानी हूँ, जिसका आप ने उद्धार किया था। मेरे पीछे खड़ी है, वह मेरी सेविका, असुर नरेश पुत्री शर्मिष्ठा मेरी दासी है। '
तद्पश्चात देवयानी ने ययाति का परिचय, पिता शुक्राचार्य से करवाया।  गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में ययाति का भव्य आदर सत्कार हुआ।  देवयानी ने उस रात्रि को एकांत में अपने पिता से अपने मन के भाव कह दिए। उसने कहा कि, ' हे  परम दयालु पिता ! मैं अपने मनोभाव आप से छिपाना योग्य नहीं समझती।आप को ज्ञात है कि, महाराज  ययाति ने मेरी प्राण रक्षा कर, मेरा उद्धार किया। मैं, उन्हीं को अपना जीवन साथी बनाना चाहती हूँ। ' 
गुरु शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री के वचन सुन, उनके विवाह की सहर्ष स्वीकृति दे दी। 
महाराज ययाति से गुरु शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री देवयानी का विवाह संपन्न करवाया।  गुरु ने बेटी को विदा किया।
देवयानी का महाराज ययाति के राजमहल में भव्य स्वागत हुआ। अन्तः पुर में देवयानी महारानी की भाँति प्रतिष्ठित हुईं। शर्मिष्ठा तथा दासियाँ के रहने का प्रबंध देवयानी के राजमहल के समीप जो अशोक वाटिका में करवाया गया। 
 कालांतर में ययाति के देवयानी से दो पुत्र हुए। यदु व तुर्वसु। अन्तःपुर में, विलासिता के मध्य अपने दिन रैन व्यतीत कर रही देवयानी को इस बात का आभास भी न हुआ कि, ययाति ने शर्मिष्ठा से गन्धर्व विवाह कर लिया था !शर्मिष्ठा से ययाति को तीन पुत्रों की प्राप्ति हुई।जिनके नाम थे, द्रह्यु , अनु व पुरू ! 
      
एक दिवस देवयानी के संग ययाति राजमहल के उद्यान में टहल रहे थे।
 अचानक तीन सुँदर बालक आकर महाराज के चरणों से लिपट गए। देवयानी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कुतूहलवश पूछा, ' बालकों तुम कौन हो ? '  भोले  शिशुओँ ने महाराज ययाति की ओर ऊँगली उठाकर उन्हें ' पिताजी ' कहकर सम्बोधित किया तब देवयानी अत्यंत विस्मित हुई।  उसने बालकों से पूछा ," कहो तुम्हारी माता कहाँ हैं ? मुझे इसी क्षण उन के पास ले चलो। '  तीनों पुत्र दौड़कर, उसी उद्यान की एक शिला पर बैठीं, अपनी माँ शर्मिष्ठा के पास पहुंचे। 
देवयानी ने शर्मिष्ठा को देखते ही क्रोधित स्वर से प्रश्न किया,
 ' हे शर्मिष्ठे ! तुमने मेरा अप्रिय क्यों किया ? क्या तुम्हें मेरा भय नहीं ?
 मैं इसी क्षण तुम्हें मृत्यु - दण्ड दे सकती हूँ ! '  शर्मिष्ठा ने गर्व से ग्रीवा उठाकर, संयत स्वर से उत्तर दिया, ' मैंने जो भी किया, न्याय व धर्म सम्मत कार्य ही किया है। तब मैं क्यों भयभीत होऊँ ? '  शर्मिष्ठा ने, देवयानी द्वारा आरोपित किये हुए अपने दासीत्व बोध के अपमान का शायद इस प्रकार प्रतिकार किया था। देवयानी ने भले असुर नरेश राज - पुत्री शर्मिष्ठा को अपनी सेवा में हठ पूर्वक रख कर उसे अपमानित किया किन्तु शर्मिष्ठा का स्वाभिमान अक्षुण्ण रहा।शर्मिष्ठा ने अपनी मनमानी करते हुए, देवयानी के पति को स्बयं के पतिरूप में चुनकर, पूर्व पत्नी देवयानी को इस प्रकार अपमानित किया था।  

देवयानी क्रोधावेश से काँपती हुई, उसी क्षण अपने पिता गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में आयी तथा पिता से, शर्मिष्ठा ययाति के प्रेम - विवाह की घटना सविस्तार कह सुनाई। महाराज ययाति भी देवयानी के पीछे वहीं आन पहुंचे थे।  गुरु शुक्र ने, अपनी लाड़ली पुत्री शोक से व्यथित हो, शाप दिया कहा, ' हे राजन, यौवन व गर्व मद से चूर हो कर तुम  निरंकुश व्यवहार करनेवाले धूर्त हो ! जिस यौवन - मद से  गर्वित होकर तुमने यह धूर्त व्यवहार किया है, तुम्हारा वही  ' यौवन '  जाता रहेगा !  ये मेरा श्राप है ! ' --  गुरु की वाणी अमोघ थी। तत्काल ययाति वृद्धवस्था को प्राप्त हुए। काले भ्रमर से केश, श्वेत कपास से हो गए।  शरीर झुक गया। तेजस्वी मुखमण्डल कुम्हला गया।त्वचा झुर्रियां से वृद्ध हुईं । अब ययाति को ग्लानि हुई। वे गुरु शुक्राचार्य के चरणों में झुक कर क्षमा याचना करने लगे। तब गुरु शुक्र का ह्रदय पसीज गया। उन्होंने कहा, ' तुम चाहो तो किसी को भी अपना यह वृद्धत्त्व  हो। उन से यौवन माँग कर पुनः युवावस्था भोग सकोगे। ' भारी मन से, वृद्ध तन से, शिथिल चाल से, महाराज ययाति अपने राजप्रासाद में लौटे। 
ययाति ने अपने नगरवासियों से , राजमहल में सभी से प्रार्थना की। किन्तु एक भी व्यक्ति, अपना यौवन महाराज को देकर, बदले में उनसे, महाराज की वृद्धावस्था लेने के लिए राजी न हुआ। सभी पुत्रों ने अपनी अपनी असमर्थता प्रकट करते हुई असमर्थता प्रकट की।  उस समय ययाति पुत्र पुरु, पिता के समक्ष हाथ जोड़कर उपस्थित हुए। पुरु, पिता से सविनय बोले,' हे पिता ! मैं शर्मिष्ठा पुत्र पुरु, मेरे पिता महाराज ययाति को अपना यौवन देता हूँ। आपकी वृद्धावस्था को मैं, स्वीकार करता हूँ। '  पुरु के वचन समाप्त होते ही महाराज ययाति, पूर्ण यौवनावस्था से परिपूर्ण हो गए। सामने हाथ जोड़े उपस्थित पुरु अकाल वृद्धत्त्व  को प्राप्त हुआ !  अपने युवा पुत्र को इस प्रकार अकाल वृद्ध हुआ देखकर महाराज ययाति का ह्रदय अत्यंत व्यथित हुआ। पिता अपने पुत्र से लिपट गए। त्याग व उदारता की मूर्ति अपने पुत्र पुरु को महाराज ययाति ने अश्रु अंजलि देते हुए अनेकानेक आशीर्वाद दिए एवं पुरु को वरदान दिए।  यौवन भोगने के पश्चात महाराज ययाति स्वर्ग सिधारे।अपना यौवन पुनः अपने पुत्र पुरु को लौटा दिया। युवावस्था प्राप्ति पश्चात पुरु का राज्याभिषेक संपन्न हुआ। 
इस प्रकार कालान्तर में पुरुवंश की स्थापना हुई। 
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- लावण्या

कण्व ऋषि + कालिदास

 


महर्षि कण्व :
त्रेता युगीन महर्षि कण्व ऋग्वेद के मन्त्र प्रदाता रहे हैं। शुक्ल यजुर्वेद शाखा में कर्णेष व कण्व इन नाम का उल्लेख प्राप्त होता है। दक्षिण भारत की अति प्राचीन तमिळ भाषा के व्याकरणकार कण्व ऋषि रहे हैं।
उत्तराखण्ड़ की देवभूमि में मालिनी नदी के तट पर पवित्र कण्वाश्रम स्थित है।
महाराष्ट्र प्रांत के कनालदा ग्राम में, गिरना नदी तट पर भी एक कण्व आश्रम है ~
इस आश्रम में  शुकन पक्षी वृन्द के  मध्य में, अप्सरा मेनका द्वारा त्याज्य तथा  ऋषि विश्वामित्र की नवजात कन्या शकुंतला को महर्षि कण्व ने प्रथम बार देखा था। ऋषि कण्व ने अबोध बालिका को भूमि से यहीं प्रथम उठाया था इसका उल्लेख मिलता है । " निरंजन च वर्णे यस्मा च कुंतेहि परिरक्षिता  शकुन्तले य इति नामस्याः क्रितम च अपि ततोह मया " अर्थात : घने अरण्य में वह शकुन्त पक्षियों के मध्य सुरक्षित थी इस कारण इसे शकुंतला नाम दे रहा हूँ।
~~ कण्व ऋषि
कालिदास ~
संस्कृत भाषा के महाकवि कहलानेवाले सुविख्यात कवि  कालिदास का जन्म उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले के कविल्ठा गांव में हुआ था। कविल्ठा चारधाम यात्रा मार्ग में गुप्तकाशी में स्थित है।  गुप्तकाशी से कालीमठ सिद्धपीठ वाले रास्ते में कालीमठ मंदिर से चार किलोमीटर आगे कविल्ठा गांव है। बिहार के मधुबनी जिला के उच्चैठ ग्राम में कहा जाता है विद्योतमा (कालिदास की पत्नी) से
शास्त्रार्थ में पराजय के बाद कालिदास वहीं गुरुकुल में रुके थे । कालिदास को यहीं उच्चैठ की देवी भगवती से ज्ञान का वरदान प्राप्त हुआ था ऐसी कथा सुविख्यात है यहां आज भी कालिदास स्मृति में बसा डीह है। यहाँ की मिट्टी से बच्चों के प्रथम अक्षर लिखने की परंपरा आज भी यहाँ प्रचलित है।
कालिदास का उत्कर्ष अग्निमित्र के बाद १५०  ई॰ पू॰ - ६३४  ई॰ पूर्व का  रहा है। जो कि प्रसिद्ध ऐहौले  के शिलालेख की तिथि है,  इस में कालिदास का महान कवि के रूप में उल्लेख हुआ है।  कथाओं व किंवदंतियों के अनुसार कालिदास शारीरिक रूप से बहुत सुंदर थे।  किन्तु कहा जाता है कि प्रारंभिक जीवन में कालिदास अनपढ़ व महामूर्ख थे।
प्रश्न : एक साधारण  व्यक्ति से कालिदास, महाकवि किस प्रकार बने ?  इस से तथ्य से अति रोचक कथाएँ जुडी हुईं हैं। आज भी कालिदास की प्रेरक जीवनी जन मन को प्रेरणा देने में सक्षम है। भाषा सौंदर्य सशक्त साहित्यकार के मस्तिष्क से निसृत जन मानस के लिए दिया दैवी प्रसाद होता है।
कालिदास की जीवन कथा ~ कालिदास का विवाह विद्योत्तमा नाम की राजकुमारी से हुआ था  ऐसा कहा जाता है। राजकुमारी विद्योत्तमा अत्यंत बुद्धिमती थीं जिससे अभिमानी हो गईं थीं। उसने  प्रण लिया था  कि जो पुरुष
उसे शास्त्रार्थ में पराजित करने में सक्षम होगा, वह उसी के साथ विवाह करेगी। जब विद्योत्तमा ने शास्त्रार्थ में कई  विद्वानों को पराजित किया तो वे अपनी पराजय से मन ही मन कुपित हुए।  अपमान हुआ है ऐसे विचार से कर कुछ विद्वानों ने बदला लेने के लिए विद्योत्तमा का विवाह, महामूर्ख व्यक्ति के साथ कराने का निश्चय किया। वे किसी मुर्ख पुरुष की शोध में नगर भ्रमण करते हुए मार्ग में चलते चलते दूर आये। मार्ग में उन्हें एक वृक्ष दिखाई दिया जिस पर एक व्यक्ति वह जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था।  इस दृश्य को देख कर सभासदों ने सोचा कि " अरे यह युवक महा - मूरख लगता है !  इससे बड़ा मूर्ख तो कोई होगा ही नहीं !  "उन्होंने उसे राजकुमारी से विवाह का प्रलोभन देकर नीचे उतारा तथा समझा बुझा कर कहा-  " ए युवक तुम मौन धारण कर लो किन्तु जो हम कहें  वैसे ही करना "। धूर्त सभासदों ने स्वांग भेष बना कर उस युवक को राजकुमारी विद्योत्तमा के समक्ष प्रस्तुत किया।
     सभासदों का यह परिचय कथन कि " हमारे गुरु, आप से शास्त्रार्थ करने के लिए आए है, परंतु अभी मौनव्रती हैं, इसलिए वे, हाथों के संकेत से उत्तर देंगे। इनके संकेतों को समझ कर, हम वाणी में आपको उसका उत्तर देंगे।" विद्योत्तमा को अपने ज्ञान पर पूर्ण भरोसा था उसे दृढ विश्वास था कि वह इस युवक को परास्त कर देगी। अतः वह राजी हो गयी। शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ।
       राजकुमारी विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछने लगी। कालिदास अपनी बुद्धि से, मौन संकेतों से ही जवाब देने लगे।  प्रथम प्रश्न के रूप में विद्योत्तमा ने संकेत से एक उंगली दिखलाई --> आशय था कि- " ब्रह्म एक है।"
परन्तु कालिदास ने समझा कि, ये राजकुमारी मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है !
क्रोध में उन्होंने दो अंगुलियों का संकेत इस भाव से किया कि," तू मेरी एक आंख फोड़ेगी तो मैं - तेरी दोनों आंखें फोड़ दूंगा। " लेकिन सभासद जो कपटी थे वहीं उपस्थित थे। उन्होंने कालिदास के संकेत को कुछ इस तरह समझाया ~ कहा कि,
" राजकुमारी जी आप कह रही हैं कि ब्रह्म एक है लेकिन हमारे गुरु कहना चाह रहे हैं कि,"उस एक ब्रह्म को सिद्ध करने के लिए दूसरे (जगत्) की सहायता लेनी होती है।  अकेला ब्रह्म स्वयं को सिद्ध नहीं कर सकता। " राज कुमारी ने दूसरे प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया ! आशय था कि," तत्व पांच है। " उसे देख कर कालिदास को लगा कि, 'यह कन्या थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है !' उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखलाया कि," तू यदि मुझे गाल पर थप्पड़ मारेगी,
मैं घूंसा मार कर तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा। "  सभासद मण्डली उन कपटियों की टोली ने समझाया कि, " राजकुमारी जी गुरु कहना चाह रहे हैं कि, भले ही आप कह रही हो कि पांच तत्व अलग-अलग हैं पृथ्वी, जल, आकाश, वायु एवं अग्नि।
परंतु यह तत्व प्रथक्-प्रथक् रूप में कोई विशिष्ट कार्य संपन्न नहीं कर सकते।
अपितु आपस में मिलकर एक होकर-  उत्तम मनुष्य शरीर का रूप ले लेते है जो कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है।" इस प्रकार प्रश्नोत्तर से अंत में, विद्योत्तमा ने अपनी हार स्वीकार कर ली ।  शर्त के अनुसार कालिदास के संग राजकुमारी  विद्योत्तमा का विवाह हुआ।
विवाह  पश्चात कालिदास विद्योत्तमा को लेकर अपनी कुटिया में आये।
प्रथम रात्रि को  दोनों संग थे तो उसी समय रात्रि की नीरवता भंग करता हुआ ऊंट का स्वर सुनाई दिया । विद्योत्तमा ने संस्कृत में प्रश्न किया "किमेतत्" ? अर्थ : यह कौन प्राणी है ? "परंतु कालिदास के लिए तो संस्कृत भाषा काला अक्षर भैंस बराबर थी ! कालिदास ने सोचा ' शायद मेरी नवोढ़ा पत्नी भयभीत हो रही है ! "
अतः झट से उनके मुंह से निकल गया "ऊट्र" ऊट्र " ~~  कालिदास के स्वर से यह सुनते ही विदुषी विद्योत्तमा को पता हो गया कि, कालिदास निपट अनपढ़ हैं।  क्षण मात्र में चतुर राजकुँवरी ने सभासदों की क्रूर मंत्रणा तथा उसे अपमानित करने की इस कुटिल चाल को  भाँप लिया। वह क्रोध अतिरेक से अत्यंत कुपित  हो, थर थर कांपने लगी !  पलट कर विद्योत्तमा ने कालिदास को धिक्कारा ! गृह से निष्काषित करते हुए आदेश दिया कि, " सच्चे विद्वान् बने बिना लौटना नहीं । "

कालिदास अपनी नव परिणीता पत्नी के क्रोध एवं वाक् बाणों से अत्यंत शोकमग्न हो गए। राजकुमारी के आदेश पर गृहत्याग कर, कालिदास निर्जन वन की दिशा में अश्रु भरे नयनों से चल दिए। नगर की सीमा में स्थित देवी ग्रामदेवी के मंदिर में रात्रि का समय था सो, आश्रय लिया।शोकाकुल कालिदास ने माता भगवती देवी की प्रतिमा को निहारा तथा सच्चे मन से काली देवी की आराधना करना आरम्भ किया।  कहते हैं कि अतीव शोकाकुल अवस्था में कातर स्वर से रुदन करते हुए कालिदास ने मंदिर के गर्भ गृह में रखा देवी माँ का खड़ग उठा लिया तथा अपनी गरदन पर वार करने को उद्यत हुए करूण  स्वर से पुकारा ~~
" हे माँ मेरा शीश काट कर तुम्हारे चरणों पे न्योछावर कर रहा हूँ ! माता मेरा जीवन मिथ्या है।  अब आप ही मुझे मुक्ति दें  " कहते हैं कि, माता भगवती सच्चे मन से की हुई प्रार्थना सुन कर प्रकट हो गईं !
" आँहाँ हाँ पुत्र ! यह क्या कर रहे हो ? माता को अपने पुत्र की जीव ह्त्या अस्वीकार है  "  तद्पश्चात माता भगवती शारदा, महाकाली, महालक्ष्मी, महागौरी, देवी सरस्वती बारी बारी से मंदिर के गर्भगृह में साक्षात प्रगट हुईं तथा भक्त कालिदास को आशीर्वाद दे कर अंतर्धान हुईं ! साक्षात देवी का कान्तियुक्त स्वरूप जाकर मंदिर की पाषाण प्रतिमा में विलीन हुआ। देवी भगवती कालिका के आशीर्वाद से कालिदास के अन्तर्चक्षुः, ज्ञानेन्द्रियाँ दीप्त हो गईं।  देवी कृपा से कालिदास महामूर्ख से परिवर्तित हो कर परंम ज्ञानी बन गए।  असीम ज्ञान प्राप्ति से प्रदीप्त व्यक्तित्त्व लिए कालिदास पुनः स्वगृह  लौटे। 
अपनी पत्नी राजकुँवरी विद्योत्तमा के राज प्रासाद का द्वार खटखटा कर कालिदास ने कहा " कपाटम् उद्घाट्य सुन्दरि! (दरवाजा खोलो, सुन्दरी) " विद्योत्तमा ने चकित होकर कहा --" अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोई विद्वान लगता है )"  किम्वदन्ती के अनुसार, कालिदास ने विद्योत्तमा को अपना पथप्रदर्शक तथा  गुरु माना। अपनी पत्नी के कहे इस एक वाक्य को विद्योत्तमा द्वारा उच्चारित ३ शब्दों से, आगे के काल में कालिदास ने तीन महाकाव्य रच डाले ! इस भाँति अपने काव्यों द्वारा  अपनी विदुषी पत्नी को कालिदास नेसाहित्यकार के रूप में अपनी श्रद्धा व स्नेह - आदर प्रदान किया।
१ ) कुमारसंभवम् का प्रारंभ होता हैअस्त्युत्तरस्याम् दिशि… से,
२) मेघदूतम् का पहला शब्द है- कश्चित्कांता…३) रघुवंशम् की शुरुआत होती है- वागार्थवि  से।
कालिदास ने तीन नाटक (रूपक): अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् तथा  मालविकाग्निमित्रम्;  दो महाकाव्य: रघुवंशम् व  कुमारसंभवम्; तथा  दो खण्डकाव्य: मेघदूतम् और ऋतुसंहार की रचना की। 

महाकाव्य : अभिज्ञान शाकुंतलम के रचियेता की दूर देश में ख्याति एक पुस्तक में
काव्य शीर्षक का अर्थ है  ~ शकुंतला से परिचय ~ जर्मनी के साहित्यकार गोथे ने अभिज्ञान शाकुंतलम का पाठ किया था। वे कालिदास रचित काव्य को पढ़ कर आश्चर्य मिश्रित महाआनंद में डूब गए थे ! जनश्रुति है कि शाकुंतलम की पुस्तक को अपने सर पे उठाकर, गोथे  आह्लादित होकर नृत्य करने लगे।  गोथे ने  अभिज्ञान शाकुंतलम के लिए कहा कि, " यह कोइ साधारण ग्रन्थ नहीं है  अपितु साहित्य जगत की अप्रतिम एवं शाश्वत एवं अमर कृति है ! " अभिज्ञान शाकुंतलम " मानव इतिहास की प्रगति एवं विकास को प्रतिबिंबित करता सा स्वर्णिम पृष्ठ  है। यह साहित्य कृति नव पल्ल्वित पुष्प को  रसीले फल में रूपांतरित होने की नैसर्गिक प्रक्रिया का अनुसरण करती  हुई सी प्रतीत होती है। या धरती पर  मानवीय जीवन के अनुभवों को स्वर्गिक आनंद सिंधु में डूबने की आह्लादानुभूति करवाती सी रहस्यमयी प्रक्रिया सी अमर कृति है। या हम ऐसा भी कहें कि  मानवीय शरीर की संरचना जिस प्रकार पांच महाभूत के शाश्वत तत्त्वों से निर्मित होती है तथा उस भौतिक शरीर के आत्मिक अनुभव सदृश्य परिवर्तन का अद्भुत इतिहास समेटे हुए है ठीक उसी भाँति यह अविस्मरणीय साहित्यिक कृति है "
       अभिज्ञान शाकुंतलम रूपक काव्य में प्रयुक्त उपमाओं के लिए, संस्कृत-साहित्य के रचाकारों में महाकवि कालिदास अग्रणी हैं। वे जगत में सुप्रसिद्ध हैं। शाकुन्तल में भी उनकी उपयुक्त उपमा चुनने की शक्ति भली-भांति प्रकट हुई है । शकुन्तला के विषय में एक जगह राजा दुष्यन्त कहते हैं कि ‘वह ( शकुंतला ) ऐसा फूल है, जिसे किसी ने सूंघा नहीं है; ऐसा नवपल्लव है, जिस पर किसी के नखों की खरोंच नहीं लगी; ऐसा रत्न है, जिसमें छेद नहीं किया गया  तथा  ऐसा मधु है, जिसका स्वाद किसी ने चखा नहीं है।’
शकुंतला कथानक का आकर्षण ~ सदियाँ व्यतीत हो जाने पर भी  अदम्य रहा है। तथा समयावधि से परे देश विदेश में प्राचीन काल से आधुनिक युगों तक अक्षुण्ण रहा है। शकुंतला की कालजयी कथा की लौ ~ मानव समुदाय के मध्य निर्धूम सदियों से अपना उजाला बिखेरती रही है।

शकुंतला कथा की लोकप्रियता के उदाहरण :
भारत के बंगाल प्रांत में साहित्यकार ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने बांग्ला की प्राचीन साधू भाषा में शाकुंतलम पर आधारित नवलिका लिखी। यह संस्कृत से बंगाली भाषा का सर्व प्रथम अनुवाद है।कुछ समय पश्चात चलित भाषा बांग्ला के उप प्रकार में अबनींद्रनाथ टैगौर ने इस कथा को युवा वर्ग के लिए लिखा।
यूरोपीय देशों में सं १८०८ में कार्ल विल्हम फ्रेड्रिच शीगल महाशय ने महाभारत आदि पर्व से जर्मन भाषा में  शकुंतला की कथा को अनुवादित कर, प्रस्तुत किया। उसी के आधार पर सं. १८१९ में फ्रान्ज़ शूबर्ट ने रंगमंच के लिए नृत्य नाटिका शकुंतला तैयार की थी किन्तु यह प्रयास अपूर्ण रह गया। सं. १८२३ शकुंतला बेले नृत्य विधा  द्वारा अर्नेस्ट रेयर तथा थियोफाईल गौटियेर ने प्रस्तुत की थी। सं.१९०२ में रशियन संगीत कार श्रीमान सर्गे बाळासानियान ने रीगा शहर में शकुंतला नृत्य नाटिका तैयार की थी। सं.१९२१ में इटली के संगीतज्ञ श्रीमान फ्रांको अल्फानो ने " किंवदंती शकुंतला की " नामक ओपेरा तैयार किया था।
समाप्त :
~ लावण्या

अमर युगल दुष्यंत ~ शकुंतला की प्रणय गाथा ~


चंद्रवंश एक प्रमुख प्राचीन भारतीय क्षत्रियकुल आर्यों के प्रथम शासक (राजा) वैवस्वत मनु हुए। मनु की एक कन्या भी थी - इला जिस का विवाह बुध से हुआ जो चंद्रमा का पुत्र था। उन से पुरुरवस्‌ की उत्पत्ति हुई।  ईला के पुत्र "ऐल " कहलाए  वे, चंद्रवंशियों के प्रथम शासक हुए ।
पुरुरवा के छ: पुत्रों में आयु और अमावसु प्रसिद्ध हुए। महाराज आयु प्रतिष्ठान नगर के शासक हुए तो महाराज अमावसु कान्यकुब्ज नगर में एक नए राजवंश की स्थापना की। आगे कान्यकुब्ज के राजाओं में, जह्वु प्रसिद्ध हुए जिनके नाम पर गंगा का नाम ' जाह्नवी ' पड़ा।  महाराज आयु के राज्य शासन के उपरांत उन का ज्येष्ठ  पुत्र, नहुष प्रतिष्ठान का शासक हुआ।  नहुष के छह पुत्रों में ययाति को राजगद्दी प्राप्त हुई। महाराज ययाति के पाँच पुत्र हुए - यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु व  पुरु। आगे चलकर यही पुरु वंश -- यादव, तुर्वसु, द्रुह्यु, आनव व  पौरव कहलाए। ऋग्वेद में इन को पंचकृष्टय: कहा गया है। पौरवों ने मध्यदेश में अनेक राज्य स्थापित किए। गंगा व यमुना- नदियों के भूभाग पर शासन करनेवाले हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत का जन्म इसी पुरू कुल में हुआ तथा दुष्यंत अत्यंत सुप्रसिद्ध हुए। 

शकुंतला : शकुंतला व दुष्यंत की अमर युगल कथा महाभारत के आदिपर्व में
कथा का आरम्भ है। अत्यंत तेजस्वी ऋषि विश्वामित्र से होता है। यूं तो विश्वामित्र राजा थे किन्तु अपनी प्रखर तपस्या एवं तपोबल के कारण वे राजर्षि कहलाये। उन्हें कौशिक भी कहा जाता था। विश्वामित्र  गायत्री महामंत्र के द्रष्टा व परम उपासक थे। भूलोक में विश्वामित्र जैसे तपस्वी माँ गायत्री की आराधना कर रहे थे किन्तु स्वर्गलोक में देवराज इंद्र की राजधानी अमरावती स्वर्गलोक में  इंद्र घबड़ा रहे थे कि प्रखर तपस्या के बल से राजर्षि विश्वामित्र कहीं उनका इन्द्रत्व न हथिया लें । इंद्र के पास प्राचुत बैभव विलास उपलब्ध था। श्वेत हाथी ऐरावत भी था इंद्रसभा में अत्यंत रूपवती अप्सराएँ उर्वशी रम्भा, मेनका, तिलोत्तमा इत्यादि भी थीं । इंद्र ने तपस्यारत महर्षि विश्वामित्र की प्रबल तपस्या  भंग करने के हेतु से इंद्रलोक की सर्वांङ्ग सुंदरी अप्सरा मेनका को विश्वामित्र के समीप तत्क्षण प्रकट होने का आदेश दे दिया अतः अप्सरा मेनका ऋषि विश्वामित्र के समक्ष आ पहुँची।
  मेनका की सुंदरता से मोहित विश्वामित्र की तपस्या भंग हुई व इंद्र की युक्ति सफल हुई। अप्सरा मेनका गर्भवती हुई ! उसने  एक अत्यंत रूपवती कन्या को जन्म  दिया किन्तु अप्सरा मेनका  उसे जन्म दे उस अबोध बालिका को मालिनी नदी के तट पर छोड़, बालिका का परित्याग कर, पुनः इंद्रलोक चलीं गईं ।
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कुछ समय पश्चात कण्व ऋषि उस निर्जन स्थान पे आ पहंचे तो आश्चर्यचकित हो देखते रह गए कि शकुन पक्षियों द्वारा रक्षित एवं पालित एक अबोध नवजात शिशु  अति सुँदर नन्ही बालिका, धरा पर अपनी नन्ही नन्ही हथेलियों को भींचे कीलक रही है। ऋषि कण्व का ह्रदय उस अबोध शिशु की असहाय अवस्था देख पसीज गया। ऋषिवर ने  बालिका को भूमि से उठा लिया। शकुन पक्षी द्वारा जल पिला कर, बालिका की  प्राण - रक्षा करने के कारण, महर्षि कण्व ने उस कन्या को "शकुन्तला " नाम से पुकारा।  अतः यही नाम उस कन्या को मिला ! निर्जन वन से मिली इस कन्या शकुन्तला को ऋषि कण्व ने, अपनी पुत्री के रूप में  लालन-पालन करना आरम्भ किया ।
दुष्यंत का अर्थ के लिए इमेज परिणाम
शकुंतला कण्व ऋषि को पिता के स्थान पर अपनी श्रद्धा  एवं आदर दिया करती। आश्रम के पेड़ पौधों को वह नियमित जल पिलाती। आश्रम के आसपास वन प्राणी निर्भय होकर शकुंतला का स्नेह पाने आया करते। हिरणों को वह स्नेह सहित पुचकारती तो वे समीप आकर शकुंतला की कोमल हथेली से हरी नरम घास खाते
          एक दिन की बात है, हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत उसी वन में, आखेट करते हुए आ पहुंचे। दुष्यंत का अश्व तेज दौड़ता रहा तो महाराज दुष्यंत साथ के घुड़सवार पीछे छूट गए।अश्व दौड़ता रहा महाराज दुष्यंत वन प्रांतर की मनोहर सुषमा को निहारते हुए कण्व आश्रम के पास आ पहुंचे। सूर्य नारायण मध्याह्न आकाश में प्रदीप्त थे। अब महाराज दुष्यंत को प्यास लगी। अश्व को रोक कर वे उतरे।
आसपास दृष्टि दौड़ाई तो देखते क्या हैं कि एक अपूर्व सुंदरी कन्या मृग छौने के पास बैठी है। वे ये दृश्य ठगे से देखते ही रह गए। कितने ही क्षण ध्यान समाधिवत बीत गए। दुष्यंत समीप आए तथा मधुर व शाँत स्वर से प्रश्न किया।
दुष्यंत : " हे वन कन्या क्या तुम इंद्र सभा की अप्सरि हो ? "
शकुंतला अपरिचित किन्तु राजसी वस्त्र धारण किये हुए सुशोभन पुरुष को एकटक देखने लगी तथा लज्जावश शकुंतला के मुखमंडल पर अरुणिम आभा नैसर्गिक प्रतिक्रिया वश फ़ैल गयी। अब तो शकुंतला के कँवल सदृश्य गुलाबी मुख को लज्जा मिश्रित मंद मुस्कान कन्या को दिव्य आभा से दीपित करने लगी इस से सौंदर्य श्री में अभिवृद्धि हुई।
अब तो महाराज दुष्यंत इस अद्भुत वन कन्या के सौंदर्य को निहारते हुए कामदेवता अनंग के पुष्प बाण से मानों बिजली गिरी हो यूं बींध से गए। वे शकुंतला के समीप आये तथा अपने बलिष्ठ भुजा से उस अपूर्व सुंदरी की हथेली थामते हुए बोले, ' मैं दुष्यंत हूँ वन कन्या ! अब तुम अपना परिचय दो ' स्पर्श से रोमांचित हुई शकुंतला धरा पे दृष्टि गड़ाए लजाती हुई अपनी स्वर्ण किंकिणि सामान स्वर  मधुर वाणी से बोली,  " कण्व आश्रम में आपका स्वागत है. .... मेरे पिताश्री उपस्थित नहीं हैं मैं शकुंतला हूँ। .."
इस परस्पर आकर्षण व परिचय के पश्चात दुष्यंत व शकुंतला प्रणय पाश में बँध गए। दोनों ने गन्धर्व विवाह कर लिया। प्रकृति की मनुष्य पर सदैव विजय होती ही है। निमिष मात्र में जो प्रीत का बँधन बँधा वह क्षण, दिवस - रात्रि, समयावधि की सीमा रेखा से परे,  प्रेम - पंछी युगल अब क्रीड़ा - कल्लोल करते हुए सुख भोग करते रहे इस प्रणय वेला में वे मानों समस्त विश्व को ही भुला बैठे।

महाराज दुष्यंत को ढूंढते हुए उनके सैनिक वृन्द के आने पर भाव - समाधि टूटी। प्रेमी दुष्यंत अपनी प्रेयसी शकुंतला को समझाने लगे कि ' वे दोनों शीघ्र साथ होंगें। अपनी ऊँगली से रत्न जड़ित राज मुद्रिका उतार कर दुष्यंत ने शकुंतला को पहनाते हुए वचन दिया ' आज पश्चात तुम सदा सदा के लिए मेरी हुईं। यह मुद्रिका सम्हाल कर रखना प्रिये , वह  क्षण कितना अलौकिक होगा जब हमारा पुनर्मिलन होगा ! मैं दुष्यंत, हमारे प्रणय की साक्षिणी इस स्वर्ण मुद्रिका को, तुम्हारी कोमल ऊँगली पे पुनः सुशोभन  हुए देखूंगा। अपने पिताश्री ऋषि कण्व की आज्ञा ले कर  तुम मेरे राजभवन को सुशोभित करने आ जाओगी। अधीर हूँ किन्तु मुझे उस क्षण की प्रतीक्षा रहेगी आओगी न प्रिये ?  वचन दो !  "
शकुंतला का नन्हा सा ह्रदय अपने संग घटित हुए इन क्षणों को अभी ठीक से समझ भी नहीं रहा था कि, प्रेम सम्बन्ध परीणय के पश्चात अब बिछुड़ना यह घटनाचक्र तेज गति से शकुंतला के साथ घटने लगे थे।  भाग्य में यही सब लिखा था ! सो वही घटित हो रहा था जो नियति नटी करवाती है !
    शकुंतला एक अबोध किशोरी कन्या से, अब परिणीता हो चुकी थी। अपने स्वामी व सखा दुष्यंत को पुनः मिलने की आशा संजोये, भोली  शकुंतला अपनी आश्रम निवासिनी सखियों के संग मूक हिरनी सी चल दीं। वह बिरहिणी बार बार पीछे मुड़ कर अपने प्रेमी की आकृति मन में लेखती रही ! शकुंतला अब अकेली रह गई । 

राजा रवि वर्मा की कलाकृति
ऋषि कण्व आश्रम लौट कर आये तब शकुंतला की सखियों ने हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत के आगमन व प्रस्थान का वृतांत उन्हें विस्तार से कह सुनाया।
ऋषि कण्व ने अपनी पुत्री शकुंतला को गले लगाया तथा पुष्टि करते हुए प्रण किया कि,"वे शकुंतला को अपने पति महाराज दुष्यंत की राजधानी हस्तिनापुर अवश्य भेजने का प्रबंध करेंगें। महर्षि  शकुंतला से बोले ~ ' पुत्री, आश्रम के द्वार सदैव तुम्हारी प्रतीक्षा में विकल रहेंगें जिस भाँती यह मृग छौने रहेंगें। किन्तु पुत्री तुम इनकी चिंता न करना। आश्रम व वन प्रांत के समस्त पशु पक्षी, पेड़ पौधे तुम्हारे बिछोह से व्यथित तो अवश्य होंगें किन्तु तुम्हारे परिणय से संतुष्ट भी होंगें। बेटी, तुम सुख से अपने पति के व स्वगृह के लिए प्रस्थान करना !  मेरा तथा समस्त आश्रमवासियों का आशीर्वाद तुम्हारे संग संग रहेगा। '
    शकुंतला ने वृद्ध हो रहे ऋषि कण्व की ममता से गूँथी वाणी सुन कर उनके चरणों पर झुक गई।  अपने पिता समान ऋषिवर के आदर पूर्वक चरण स्पर्श किये तथा प्रसन्न हो कर वह दूर एक पेड़ की छाया में बैठ गयी।
संतुष्ट होकर तब वह अपने प्रियतम महाराज  दुष्यंत को पत्र लिखने लगी।
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मन ही मन आनंदित हो रही शकुंतला, अपने महाराज दुष्यंत से अपने आगमन के समाचार देते हुए आश्रम वासी ऋषि कण्व की सहर्ष अनुमति प्राप्त हुई है यह शुभ सन्देश पात्र द्वारा देना चाह रही थी।  इस आनंदानुभूति के क्षण में शकुंतला बाह्य वातावरण को लगभग भूल चुकी थी। भविष्य के मधुर स्वप्न अपने कोमल मन में संजोये, आशा की बेल को आकाश में फैलते हुए मानों निहारती हुई शकुंतला का ध्यान एकमात्र इस पत्र में केंद्रित हो गया। सम्पूर्ण  विश्व की गतिविधियाँ मानों ओझल हो गईं। अचानक एक कठोर स्वर ने शकुंतला को झकझोर कर भाव समाधि से हठात जगाया। शकुंतला उस कठोर स्वर से मानों जाग कर भयभीत चकित मृगी - सी ऋषि दुर्वासा के  क्रोध से रक्ताभ  हो रहे नयनों को विस्फरित नेत्रों से देखती रह गयी ऋषि दुर्वासा के क्रोधित मुख  से वह आहत होने लगी।

चित्र : शकुंतला द्वारा क्रोधित हुए ऋषि दुर्वासा
ऋषि दुर्वासा : " हे अभिमानी कन्या ! मैं ऋषि दुर्वासा तुम्हारे आश्रम का अतिथि हूँ।  मैं बारम्बार तुम्हें पुकारता रहा किन्तु तुमने तनिक भी ध्यान न किया।
    मेरी अवज्ञा करने वाली हे हठी कन्या। .. जाओ -- मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि जिसके ध्यान में मग्न होकर तुमने मेरी अवहेलना की है,  वही व्यक्ति तुम्हें भूल जाएगा "  कुपित ऋषि दुर्वासा का क्रोध अब भी शांत न हुआ था।  ऋषि कण्व व शकुंतला ने बारम्बार ऋषि दुर्वासा से क्षमा याचना की किन्तु सर्व प्रयास असफल रहे ! कुछ समय पश्चात दुर्वासा ने इतना अवश्य कहा कि, ' यदि किसी परिचित वस्तु को वह व्यक्ति देख लेगा तो उसे शकुंतला का स्मरण हो जाएगा। ' इस आशा की एक किरण से अपने महाराज दुष्यंत से पुनर्मिलन की आशा संजोये
शकुंतला आश्रम से हस्तिनापुर नगर जाने के लिए निकली। कण्व ऋषि शोकाकुल हुए तथा बोले कि, " पुत्री की इस बिदा - बेला के करूण क्षण में,यदि मेरी इस पालित पोषित कन्या के बिछोह से मैं इतना अधिक शोक संतप्त हूँ तब संतानों के बिछोह से अन्य गृहस्थ जन के मन की पीड़ा व संताप कितना अधिक होता होगा
उस की कल्पना भी नहीं कर पा रहा हूँ  "
ऋषि कण्व ने अपनी लाड़ली शकुंतला के संग आश्रम के बटुक विद्यार्थी भी देखभाल के लिए संग बिदा  किये।
    आश्रम से विदा होकर शकुन्तला, अब यात्रा करतीं हुईं नौका  में सवार हुई। उन्हें नदी जो पार करनी थी। नदिया का नीला जल हीलोरें ले रहा था।  जल में स्वर्णिम आभा लिए, चटुल मछलियाँ तैर रहीं थीं। शकुंतला के नयनों के अश्रु अभी सूखे न थे किन्तु दयावश अपने संग लाये अन्न के कण, वह मछलियों को खिलाने के लिए जल में बहाने लगी। मछलियां जल की सतह पे आ आ कर झट से अन्न कण मुंह में भर लेतीं। शकुंतला का ध्यान अब मछलियों के संग इस खेल में लग गया। मन अब यहां आ गया। दुर्वासा ऋषि का श्राप अब घटित होने को था सो अनहोनी घटनी ही थी सो घट ही गई ! भोली  शकुंतला को सुध ही न रही कि किस क्षण, उसकी ऊँगली से, निकल कर दुष्यंत की दी हुईराज मुद्रिका जल में फिसल कर डूब गई । शकुंतला इस दुर्घटना से अनभिज्ञ ही रही।
    महाराज दुष्यंत की राजधानी हस्तिनापुर में शकुंतला का आगमन ~~
हस्तिनापुर के राज प्रासाद में शकुंतला का आगमन हुआ। महाराज दुष्यंत राज सिंहासन पर आरूढ़ थे।
शकुंतला के संग आये आश्रमवासी बटुक ने महाराज को अवगत करवाते हुए आश्रम भगिनी शकुंतला का परिचय देते हुए कहा कि ' हे परम प्रतापी महाराज दुष्यंत,  यह आश्रम निवासिनी कन्या शकुंतला मेरी भगिनी हैं - ऋषि कण्व की पालित पोषिता कन्या हैं एवं यह आपकी भार्या हैं। अतः आप इन्हें स्वीकारें महाराज ' महाराज दुष्यंत ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण अपनी प्रेयसी पत्नी शकुंतला की स्मृति विस्मृत कर चुके थे। अतः महाराज दुष्यंत ने कहा, ' मेरे लिए यह यह सन्नारी सर्वथा अपरिचितता हैं ! यदि आप का कथन है कि मेरा इनसे कोइ पूर्व परिचय है तो  परिचय चिह्न दिखलाया जाए ' शकुंतला को सहसा दुष्यंत की दी हुई राज मुद्रिका का ध्यान हो आया ! " हाँ वही दिखला दूँ " यह सोच कर शकुंतला ने हथेली पे दृष्टि फेरी तो ऊँगली पर वह मुद्रिका न थी !" हा ~ देव यह कैसा दुर्भाग्य ! " असहाय शकुंतला व्यथित हो उठीं ! किन्तु शोक संतप्त शकुंतला के नयन कोर से अश्रु उमड़े तो ह्रदय में क्षोभ भी उमड़ पड़ा !
मानिनी शकुंतला असहाय तो थीं किन्तु क्षणार्ध के लिए भी अब इस राज प्रासाद में वे, रुकी नहीं ! अपना उत्तरीय नेत्रों से लगाए, स्वाभिमानी शकुंतला, महाराज दुष्यंत का राजमहल व महानगर  त्याग कर निर्जन वन की दिशा  में अकेली ही चल दीं !
Forsaken Sakuntala painting 
शकुंतला की व्यथा ~ कथा ~ महाराज दुष्यंत ने दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण अपनी प्रिया शकुंतला को पहचाना नहीं तब शकुंतला राज्य सभा का त्याग कर नगर से दूर निर्जन वन की दिशा में चलीं गईं। महाराज दुष्यंत शकुंतला के प्रस्थान के पश्चात राजकरण से उदासीन रहने लगे। मन ही मन वे द्वंद्व में रहने लगे।
ना ही सँगीत भाता नाही नृत्यांगनाओं का सम्मोहन उन्हें बाँध पाता ! मंत्री गण व सभासद सभी अपने महाराज की मनोदशा देख कर खिन्न रहते। कोइ उपाय सूझ न रहा था जो महाराज को प्रसन्न कर सके।
      एक दिवस एक मछुआरा राज सभा में उपस्थित होने की गुहार लगाता हुआ द्वारपालों से ऊँचे स्वरों में  कहने लगा " महारज्ज के समीप ले चलो मुज्हे शीघ्र राजसभा में चलो ! " द्वारपाल उसे महाराज दुष्यंत के समक्ष ले आये।  मछुआरे ने सविनय प्रणाम करते हुए सहर्ष उदगार किया, " महाराज की जय हो ! हे परम प्रतापी अन्नदाता ! आज एक अद्भुत काण्ड हुआ ! मेरे जाल में एक बड़ी मछली फंस गई जिस का मुख खुला था ! मैंने देखा तो स्वर्ण मुद्रिका मत्स्य के मुख में फंसी थी। महाराज ! यह रही वह स्वर्ण - मुद्रिका ! " मछुआरे ने ज्यों ही स्वर्ण मुद्रिका महाराज को सौंपी तो उसे देखते ही महाराज दुष्यंत को शकुंतला की स्मृति पुनः हो आयी। दुष्यंत को पछतावा हुआ। मछुआरे को इनाम दे कर विदा कर दिया गया किन्तु महाराज उद्विग्न हो उठे - अपनी सेना को चारों दिशाओं में दौड़ा दिया आदेश दिया -- ' जाओ महारानी शकुंतला को खोज निकालो ' सेना के सिपाही दसों दिशाओं में फ़ैल कर शकुंतला को खोजने लगे।  देवी शकुंतला ने कश्यप  ऋषि के आश्रम में आश्रय लिया था। गर्भवती शकुंतला ने निर्जन वन प्रांत में निर्भयता से रहते हुए अपने पुत्र भरत को जन्म दिया। बालक भरत अत्यंत बलशाली था। वन के हिंस्र पशु से बालक भरत निर्भय होकर खेला करता था। बाघ व सिंह पे भरत सवारी किया करता था। माता शकुंतला ने भरत के हाथ पे रक्षा के लिए काला डोरा बाँध दिया था जो सदैव भरत की रक्षा किया करता था।
       एक दिन महाराज दुष्यंत वन में घूमते हुए वहीं आ निकले। निर्भय एवं परम पराक्रमी बालक को सिंह सवार देख महाराज दुष्यंत आश्चर्यचकित हुए। अपने रथ से उतर कर महाराज ने बालक का नाम पूछा तो उत्तर मिला
" मेरा नाम भरत है ! " बालक को निहारते हुए दुष्यंत के ह्रदय में वात्सल्य उमडने लगा। सहसा बालक की बांह पर बँधा काला डोरा टूट कर भूमि पे जा गिरा ! इस दृश्य को देखते ही आश्रमवासी स्त्री भागती हुई माता  शक्ति शकुंतला  के समीप आई तथा कहने लगी ' हे माते एक दिव्य पुरुष पधारे हैं जो हमारे भरत के संग क्रीड़ा कर रहे हैं -- आप शीघ्र वहीं चलें ' शकुंतला तथा दुष्यंत कुछ क्षणों में एकदूजे के समक्ष उपस्थित थे।  महाराज दुष्यंत अपनी स्मृति ज्योति शकुंतला को निहार कर अति प्रसन्न हुए तथा अपनी पत्नी व् पुत्र को लिए अपनी राजधानी हस्तिनापुर लौटे वहाँ अमर युगल का आनंद उल्लास सहित स्वागत हुआ।
भारत वर्ष का नामकरण कहते हैं कि इसी बालक भरत के नाम से प्रतिष्ठित हुआ। भरत चक्रवर्तित सम्राट हुए।  चित्र : बाघ व सिंह पे सवार बालक भरत
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अमर युगल दुष्यंत ~ शकुंतला की प्रणय गाथा आधुनिक काल में भी जन जन के मन रंजित करती हुई अति प्रिय है तथा सदैव रहेगी। -
~ लावण्या