गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म , उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के राजपुर ग्राम मेँ १५८९ या १५३२ मेँ हुआ बतलाते हैँ। वे सरयूपारायणी ब्राह्मण थे। उन्हेँ वाल्मीकि ऋषि का अवतार कहा जाता है. उनके पिता का नाम आत्माराम शुक्ल दुबे व माता का नाम हुलसी था। उनके जन्म के समय से ही ३२ दाँत मौजूद थे और वे अन्य शिशु की भाँति जन्मते ही रोये नहीँ थे! तुलसीदास जी को बचपन मेँ "राम - बोला " कहकर पुकारते थे - उनकी पत्नी का नाम "बुध्धिमती" था परँतु वे "रत्नावली " के नाम से ही अकसर साहित्य मेँ पहचानी जातीँ हैँ - उनके पुत्र का नाम "तारक " था। तुलसीदस जी को रत्नावली के प्रति आसक्ति इतनी गहन थी कि वे उनका बिछोह सहन न कर पाते थे। एक दिन रत्नावली बिना अनुमति लिये, अपने पीहर चली गयी और भयानक बारिश के बीच ,और तूफानी नदी को एक मृत शव के सहारे, पार करके, मरे हुए सर्प को रस्सी समझकर , पकडकर, सहारा लेकर तुलसी, रत्ना के पास पहुँचे तब, पत्नी ने उलाहना देते हुए कहा कि, " मेरी हाड मांस से बनी देह पर इतनी आसक्ति के बदले ऐसी प्रीत श्री राम से करते तब , आप को अवश्य मुक्ति मिल जाती ! " यही रत्ना की बात तुलसी के मर्म को भेद गयी ! सोये सँस्कार जागे और वे सँसार त्याग कर १४ वर्ष तक तीर्थस्थानो मेँ घूमते रहे। हनुमान जी की क्र्पा से उन्हेँ प्रभु श्री रामचँद्र जी के दर्शन हुए और उन्होँने भावविभिर होकर कहा,
" गँगा जी के घाट पर, भई सँतन की भीड,
तुलसीदास चंदन रगडै,तिलक लेत रघुबीर "
विनय - पत्रिका, जानकी - मँगल तथा १२ पुस्तक उन्होँने रचीँ पँतु,सर्वाधिक लोकमान्य व लोकप्रियता हासिल करनेवाली उनकी अमर कृति "राम चरित मानस " ही है भारतीय भक्तिकाव्य में गोस्वामी तुलसीदासजी का "श्री राम चरित मानस " या तुलसी -राम अयन कौस्तुभमणि की भांति ही पूज्य है !
गोस्वामी तुलसीदासजी ने सन १५७४ मंगलवार ९ अप्रिल अर्थात संवत १६३१ रामनवमी के शुभ दिन , अयोध्या में रामचरित -मानस का श्री गणेश किया था । गोस्वामी तुलसीदासजी का जीवनकाल एस्विसों १५३१ -१६२३ पर्यंत रहा
.........अर्थात आज से ३८१ वर्ष पूर्व !
देशकाल परिवर्तन के अनुरूप ,कवि नरेन्द्र शर्मा ने 'रामचरित मानस ' को नये -नये माध्यमो द्वारा जनता तक पहुँचने की कल्पना की , संकल्प कीया ! आईये इस संदर्भ में कवि नरेन्द्र के महाकवि गोस्वामी तुलसीदासजी और 'राम चरितमानस' के प्रति भक्तिभाव , और श्रधाभाव सुनें :
"गोस्वामी तुलसीदासजी हिन्दी भाषा के तो सर्वश्रेष्ट कवि है ही , संसार भर में वह सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रतिषिठित माने जाते है ! उनका सबसे महान ग्रंथ 'राम चरित मानस ' है , जिसकी चौपाई और दोहे शिलालेख और शुभाषित, पुष्प बन गए हैं ! उन्होंने जनता के मनोराज्य में रामराज्य के आदर्श को सदा के लिए प्रतिष्टित कर दिया है ! किसान का कच्चा मकान हो या आलिशान राजमहल , गृहस्थ का घर हो या महात्मा का आश्रम , देश हो , या विदेश , सर्वत्र 'राम चरित्र मानस ' हिन्दी भाषा का सर्वोत्तम और सर्वमान्य पवित्र -ग्रन्थ माना जाता रहा है !
निरक्षर श्रोता हो , या शास्त्री -वक्ता , सामान्य जन हो , या अति विशिष्ट व्यक्ति , हिन्दी भाषी हो , या अहिन्दी भाषी देशी भाष्यकार हो , या विदेशी अनुवादक, 'राम चरित मानस ' सबके मन में भक्ति , ज्ञान और सदा चार की त्रिवेणी बनी हैं ! गोस्वामी तुलसीदास कृत 'राम -चरित मानस ' जनमानस में , राम -भक्ति का कमल खिलानेवाले सूर्य के समान प्रकाशित रहा है ! "
रामचरित मानस इन वौइस् ऑफ़ मुकेश जी संगीत : मुरली मनोहर स्वरूप का संकलन भी पण्डित नरेन्द्र शर्मा जी का ही प्रयास है ।
श्री रामचरित मानस में , सात कांड हैं । सुंदर - काण्ड मानस का पांचवा काण्ड है !किंतु लोकप्रियता की दृष्टी से इसे सदा से सर्वप्रथम स्थान प्राप्त है ! जैसा की इस काण्ड के नाम से प्रकट है --
मानस का यह अंश रामकथा प्रेमियौं को सर्वाधिक सुंदर लगता रहा है !
संसारी भक्त और सद्ग्रुहस्थ , संकट से छुटकारा पाने के लिये , " सुंदर -काण्ड " का पाठ करते रहे हैं और करते रहेंगे !
सुंदर -काण्ड में वर्णित रामकथा से सह -हृदय रामभक्त , भली -भांति परिचित हैं ! उनका कहना है के इस काण्ड में सम्पूर्ण रामकथा अपने सार -स्वरुप में उपलब्ध हो जाती है ! रामदूत हनुमान , सीताजी को पूर्व कथा सार - रूप में सुनाते हैं ! त्रिजटा के स्वपनानुकथान में , भावी घटनाओ का पूर्वाभास हमें मिल जाता है ! यही नही ,-लंकिनी के मुख से हम रावन की ब्रम्हाजी से वर -प्राप्ति और इस -के अंत की बात भी जान लेते हैं ! इस कांड का स्वतंत्र रूप से भी पाठ किया जाता है !
ये अँजनि पुत्र हनुमान जी का सबसे पुनीत स्तवन है :
http://www.youtube.com/watch?v=fKKSurfd6Ys
http://www.bollywoodsargam.com/bollywoodsargam_search.php?search_term=hanuman&searchop=seemoreall
- लावण्या
Saturday, May 17, 2008
"राम चरित मानस " :गोस्वामी तुलसीदास जी
Thursday, May 15, 2008
ऐलिफ़न्टा!
सदियों से मौन खडी प्रस्तर प्रतिमा क्या कहती है ?
ॐ नम : शिवाय .. ॐ नम : शिवाय ... ॐ नम : शिवाय .. ॐ नम : शिवाय .. ॐ नम : शिवाय ..
ऐलिफ़न्टा !
अगर आप अरबी समुँदर मेँ सैर पर निकल चलेँ तो , मुम्बई से ९ समुद्री मील दूर एक पुरातन टापु है जिसका नाम है, ऐलिफ़न्टा !
हाँ वही मुम्बई जहाँ की लोकल ट्रेन पीक आवर माने ओफिस पहुँचने की हडबडी वाले समय मेँ , लोगोँ से भरी हुई, दनदनाती, मुम्बई को चीरती हुई निकलती है , खुले दरवाजोँ से लोग, हैन्डल पकड कर, जीने और मरने के बीच, झूलते दीखाई देते होँ , जब, बसेँ, केपेसीटी से ज्यादा, लोगोँ का बोझ उठाये, रेँगतीँ हुईँ, मुम्बई शहर की मुख्य सडकोँ पे , आप , देखेँ और रिक्षा और टेक्सी के साथ अपार जन समुदाय का कभी न थमनेवाला दरिया आपका दिल दहला दे, ऐसे नज़ारोँ के आगे ये सोचना शायद जहन मेँ आता ही नहीँ के , इससे परे भी, कुछ है जो इसी महानगरी मुम्बई का एक अभिन्न अँग भी हो सकता है !!
तो, यही जगह है , ये एक ऐसी शांत और पुरातन - सी स्थली है ऐलिफ़न्टा आयलैन्ड !! मुम्बई से दूर फिर भी मुम्बई का हिस्सा है , तो वह ऐलिफन्टा का टापु ही है जी हां ,जहां स्कूल की ट्रिप पे भी कई बार घूमने का अवसर मिला और फ़िर, यूँ ही सहेलियों के साथ, भी घूमने गए हैं।
अपोलो बंदर , ताज महल पाँच सितारा होटल के ठीक सामने से, टिकट लेकर, किराये की किसी भी फेरी बोट मेँ आप, दूसरे सैलानियोँ के सँग, सवार हो जाइये, नाव हिचकोले लेती हुई, शोर करती हुई, अरब सागर के सलेटी पानी पे चल पडेगी ॥
धूप, सुफेद, कबूतरोँ जैसे सी - गल, आपके साथ साथ नीले आसमान पे उडते दीखेँगेँ और ९ समुद्री मीलोँ का फासला तै करते ही आप ऐलिफन्टा आयलैन्ड के नज़दीक पहुँच जायेँगेँ। सडक के मील और दरिया के मीलोँ मेँ भी अँतर रहता है । ऐसा सुना है तो ये दूरी ज्यादा नही --
ऐलिफ़न्टा की गुफा २ री और ६ वीं , शताब्दी में अस्तित्व में आयीं थीं । यूनेस्को ने इन को " वर्ल्ड हेरिटेज साईट " = 'विश्व विरासत स्थल " का दर्जा दिया हुआ है।
हर वर्ष , यहां , खुले आकाश के नीचे, टिमटिमाते तारों के साथ , नृत्य , संगीत के समारोह किए जाते हैं । जिन्हें देखकर एक सुखदाई अनूभूति होती है और एहसास होता है इस बात का , " ये मुम्बई , महज , एक मशीनी शहर नहीं है! इसकी आत्मा भी है !
जहां ऐसे कला और संगीत के आयोजन होते हैं।
आप मुम्बई के वासी हों या प्रवासी या अ - प्रवासी ..... एक बार अवश्य घूमने जाईयेगा , देखियेगा ...और , ऐलिफ़न्टा के टापू पे , शिवजी की प्रतिमा के दर्शन भी करियेगा !
-- लावण्या
Tuesday, May 13, 2008
मेरे महबूब -- H.S. रवैल संस्मरण
फ़िल्म निर्माण : कैमरा के आगे कलाकार और पीछे कार्यकर्ता --
सुनी सुनाई कहानियां
श्री राम व सीता बन मेँ :
श्री राम का कैकेयी माँ से मिलन , बड़ा करुण प्रसंग है -- रामायण कथा का ! हर्ष और विषाद दोनों जब् संग - संग चलते हैं तब करुना की पराकाष्ठा हो जाती है । उसीके सन्दर्भ में , आगे की कथा भी याद आ रही है की , बिल्कुल आख़िर में श्री राम , कौशल्या माँ के कक्ष में आए । माँ ने १४ बरसों का लाड अपने सरल , सीधे , सच्चे , एक मात्र , पुत्र , राम पर निछावर कर दिया ---माता कौशल्या , राम जी का हाथ पकड़ कर , उर्मिलाजी के भवन की और ले चली ........लक्ष्मनजी, माता सुमित्राजी के संग थे .......उर्मिलाजी , मौन - थीं ......
उनके कमरे की दीवारों पर हलके से धब्बे देख कर ,
रामजी और सीताजी ने कौशल्याजी से पूछा ,
" ये क्या है माँ ? " तब , कौशल्या माँ ने कहा ,
" ये उर्मिला के सिर पटकने से , दीवारों पर दाग = धब्बे लग गए हैं ! क्योंकि वह अपना दुःख , किसीसे कहती न ही थी -
माता कौशल्या का एक और प्रसंग सुना है की , अपने प्रिय पुत्र राम के वन - गमन के समय , माता कौशल्या , अयोध्या पुरी की , अश्वशाला भी , गयीं थी -- जब् उन्हें ये पता चला की , श्री राम के अश्व , भली भाँती उनका खाना , घास और चना इत्यादी नही खाते हैं ! और ये - राम के वियोग में , मूक पशु भी शोकाकुल हैं :-( और माँ कौश्लाया ने उन अश्वों को बहोत प्रेम से, सहलाया था और धीरज बंधाई थी की , " राम लौट आयेंगें , तुम भी उनकी प्रतीक्षा करो ! जैसे मैं करूंगी " -
ऐसे प्रसंग शायद रामायण में हों या नही , लोक - कथा वाली रामकथा हमारे लोक गीतों से जुड़ी , सदियों से , हमारी संस्कृति को मजबूत रखे हुए है --- और ऐसे प्रसंग सुन कर ही , श्री राम या श्री कृष्ण , हमारे लिए , पूजनीय ही नही , हमारे बहोत निकट आ कर हमारे अपने हो जाते हैं और हमारे ह्रदय में समां जाते हैं ----
I believe thisis the Genius of Indian thought !
सुनिये ये गीत :
केहू बन दिहले दोनु राजकुमार -
Yatra - Sucharita Gupta -
( In the context of the 14 years exile given to Ram and Lakshman according to Ramayana, the singer is asking Dashrath, how he could bring himself to do
http://www.beatofindia.com/mainpages/videos-all.htm -
-लावण्या
Sunday, May 11, 2008
२ रेडियो इंटरव्यू
( 2 ) Lata remembers Papa Pt Narendra Sharma In this remarkable interview legendry singer Lata Mangeshkar nostalgically talks about her early life and how Pt Narendra Sharma encouraged her in the days of her struggle। It was a special relationship। Lata called the great Hindi poet as Papa as she saw in him the image of her father। In this very informal interview with Pt Narendra Sharma's daughter Lavanya Shah Lata opens her heart। The interview was first broadcast at Radio Cincinnati's Indian programme Swaranjali। To Listen click here (Hindi)
Saturday, May 10, 2008
भारतीय धर्म, सँस्कार की खुशबु,आज विश्वव्यापी बन पाई है

मां को क्या कोइ सिर्फ़ एक दिन ही याद करता है ? या पिता को ? या गुरु को ? नहीं ..जी ।
ये तो, महज बहाना है वेस्टर्न सभ्यता का , अगर यहां ऐसे दिन ना रखते तब, व्यस्त , मशीनी जिन्दगी र हे लोग , शायद , इस एक दिन के लिए भी समय निकाल न पाते ..ऐसा भी नही लोग अपने माता , पिता को याद नही करते , करते भी हैं और जीवन की आपाधापी में समय अभाव में , या अन्य कारणों से व्यस्त हो जाते हैं ॥
आज, " माता ओं के ख़ास दिवस पर
" मेरी जन्मभूमि, मेरी , भारत माता को मेरे सलाम "
नरसिँह मेहता भी कह गये,
"गोळ विना सुनो कँसार्,
मात् विना सुनो सँसार
मात विना ते शो अवतार ? "
आपके आसपास की हर माँ को , अवश्य कहियेगा, " ओ माँ तुझे सलाम " !
http://www।indianera.com/slideshow/april/08041001/index.asp महात्मा गाँधी की जीवनी आज , भारत ही नही विदेश मेँ भी, हर किसी को प्रेरित करती है. न्यू योर्क शहर मेँ " टमारीन्ड कला दीर्घा " के सौजन्य से, गाँधी जी की विरासत क्या है उस से जुडे चित्रोँ की प्रदर्शनी लगायी गयी . जिस मेँ गाँधी बापू उपवास मेँ , दुर्बल अवस्था मेँ भी प्रसन्न मुद्रा मेँ लेटे हुए हैँ ये देखकर , दर्शकोँ के विस्मय ने तुरन्त गौरव व स्वाभिमान की भावना का स्थान ले लिया. कई भारतीय तथा विदेशी अतिथि गण गाँधी के प्रति श्रध्धा वचन कहते हुए अपने को धन्य महसूस कर रहे थे. ये देखेँ : ~~ http://www.indianera.com/slideshow/april/08041001/index.asp भारतीय धर्म, सँस्कार की खुशबु, हर प्राँत से निकलकर आज विश्वव्यापी बन पाई है जिसका आधार है भारतीयोँ का देशाटन तथा अपने सँस्कारोँ की धरोहर को हर भौगोलिक भूखँड पर बसते हुए भी, अपने देश से जो सौगात लेकर चले हैँ उस उद्दात परँपराओँ को सहेजे रखना ! कार्य क्षमता मेँ दक्ष भारतीय, चाहे युरोपीय देशोँ मेँ रहेँ या औस्ट्रेलिया, न्यूझीलैन्ड जैसे पूर्वीय छोर के द्वीपीय महाखँडोँ मेँ जा पहुँचे या कि, उत्तर अमरीका के कनाडा या अमरीका के ही क्योँ ना नागरीक बनेँ, हर परिस्थिती मेँ, भारतीय मूल के स्त्री व पुरुष, एक सफल कार्यकर्ता होने के साथ, आदर्श नागरीक तथाअपने मूल वतन भारत के प्रतिनिधि भी बन ही जाते हैँ. भारत के प्रति प्रेम, सदभाव, भारत के अतीत से जुडे सँस्कारोँ की विरासत को भी ये भारतीय जन अपने ह्र्दय से लगाये रखते हैँ . दोहरी भूमिका, दोहरा बोझ, अनेक विषम परिस्थितीयोँ मेँ भी हँसते हुए , द्रढ मनोबल से उठाये रखते हैँ और भारत के ज्वलँत प्रश्नोँ व समस्याओँ के प्रति भी सदा जागरुक रहते हैँ. जो धन कमाया उसका सद्` उपयोग भी कई प्रकार अपने नये अपनाये देश के अन्य नागरिकोँ के हित मेँ करते हुए, अपनी जिम्मेदारीयाँ उठाते हुए, भारत के करोडोँ भाई बहनो के लिये भी , अमरीका हो या इन्ग्लैँड या कि सिँगापोर या खाडी के अन्य मुल्क, वहाँ से हर भारत माँ का सच्चा सपूत या सुपुत्री भारत माँ के लिये अपने श्रम की बूँदोँ की कतरेँ , सेवा भाव से , चरण कमलोँ पर निछावर करती आयी है. ये देखेँ तेलेगु कौम का " सर्वधारी उगादी पर्व महोत्सव " : http://www.indianera.com/slideshow/april/08042102/index.asp तेलेगु भाई बहन उगादी मनाते हैँ तो गुजराती कौम सोत्साह स्वामीनारायण सँस्था से जुडकर , कच्छ के भूकँप की तबाही जैसे दारुण कुदरती हादसोँ के वक्त अपना श्रम दान्, धन दान करते नजर आते हैँ http://www.indianera.com/slideshow/april/08040501/index.asp ये चित्रमय लोकापर्ण है श्री बाल्मिकी प्रसाद सिँह की पुस्तक " बहुधा और " ९ / ११ के बाद " पुस्तक के बारे मेँ : और भारत से दूर रहते हुए भी अगली पीढी को होली के रँग भरे मस्ती के आनँद से भी इस तरह अवगत कराया गया देखिये लिन्क http://www.indianera.com/slideshow/08032405/index.asp
केरल से कई भारतीय खाडी मुल्कोँ मेँ काम करने जाते हैँ उनकी कार्य स्थिति के बारे मेँ बहारीन के श्रम मँत्री मजिद अल अलावी से परदेश मँत्री वायलार रवि जी ने (जो भारतीय कार्योँ से सँबँधित हैँ) उन्होँने, कई नये मुद्दोँ पर करार स्थापित किया -- करीब २८०, ००० भारतीय केरल से बहारीन मेँ काम कर रहे हैँ - व्यापार और वाणिज्य मँत्री कमल नाथ जी का तो ये कहना है कि अगर आफ्रीकी पिछडे और अकाल व युध्ध की दोहरी मार से व्यथित प्राँतोँ को अगर खाडी के देश , अरब गण राज्य और भारत मिलकर सहायता करते हैँ तब अफ्रीका मेँ राहत जो मिल सकती है और स्थिती पलट सकती है। ऐसी बातेँ सुनकर भविष्य के प्रति आशा बँधती है कि अगर विश्व अगर सचमुच एक ईकाई बनता जा रहा है और भूमँडलीकरण और वैश्वीकरण बाजार के साथ साथ विश्व बँधुत्व की भावना का प्रेणेता बनता जाये तब , २१ वीँ सदी मेँ, मनुष्य अनेक समस्याओँ के साथ जूझते हुए भी शायद , एक सँतोषकारक दिशा की ओर अग्रसर हो पायेगा। शायद मैँ आशावान हूँ, इसलिये, अनेक विडँबना और वर्जनाओँ के मध्य भी , आशा की हल्की किरण देखने की आदी हूँ ! चूँकि, सूरज वहीँ उस किरण के पीछे ही तो कुहासे से ढँका हुआ, एक नई सुबह का इँतज़ार कर रहा है! जहाँ से एक नया सुनहरा " मानव दिवस" अवश्य प्रकट होगा
-- लावण्या
Friday, May 9, 2008
ग्रीष्म की एक रात
रात उतर आयी गहरी कालिमा
साथ उमस लाई पीली नीलिमा
विवश थकान भरे तन मन मेरे,
अश्रु सुषुप्त मन बालू में
मन जगा , भागे अविरल चेतक सा -
नेत्र खींच ले पलक बिछोना,
हे मन, होंगें, ऐसे कितने प्राणी
बोझ लिए मंथन का !
हर तरफ़ ग्रीष्म जलन फ़ैली,
पीली तपन बिखरती,
गहरी सुनहरी, दिन भर ,
फ़िर, रात उतर आयी थकी बुझी ,
चाँद मुरझाया ,
गगन पे मैली सी चांदनी,
रात उतर आयी गहरी कालिमा
आज रात ...
-- लावण्या
Thursday, May 8, 2008
जीवंत प्रकृति


खिले कँवल से, लदे ताल पर,
मँडराता मधुकर~ मधु का लोभी.
गुँजित पुरवाई, बहती प्रतिक्षण
चपल लहर, हँस, सँग ~ सँग,
हो, ली !
एक बदलीने झुक कर पूछा,
"ओ, मधुकर, तू ,
गुनगुन क्या गाये?
"छपक छप -
मार कुलाँचे,मछलियाँ,
कँवल पत्र मेँ,
छिप छिप जायेँ !
"हँसा मधुप, रस का वो लोभी,
बोला,
" कर दो, छाया,बदली रानी !
मैँ भी छिप जाऊँ,
कँवल जाल मेँ,
प्यासे पर कर दो ये, मेहरबानी !"
" रे धूर्त भ्रमर,
तू,रस का लोभी --
फूल फूल मँडराता निस दिन,
माँग रहा क्योँ मुझसे , छाया ?
गरज रहे घन -
ना मैँ तेरी सहेली!"
टप, टप, बूँदोँ ने
बाग ताल, उपवन पर,
तृण पर, बन पर,
धरती के कण क़ण पर,
अमृत रस बरसाया -
निज कोष लुटाया !
अब लो, बरखा आई,
हरितमा छाई !
आज कँवल मेँ कैद
मकरँद की, सुन लो
प्रणय ~ पाश मेँ बँधकर,
हो गई, सगाई !!
Wednesday, May 7, 2008
पुष्प की अभिलाषा : श्री माखनलाल चतुर्वेदी

पुष्प की अभिलाषा : श्री माखनलाल चतुर्वेदी
चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर, है हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।
कवि ने " सुर बाला" शब्द क्यों इस कविता में इस्तेमाल किया है " पुष्प की अभिलाषा" काव्य में श्री माखनलाल लाल जी ने ?? ....
उसके बरे में मेरी समझ अनुसार , यह " संकेत " है -- सांकेतिक शब्द चयन से स्वर्गीय , अप्सरा सम - - सुन्दरी का आभास स्पष्ट हो जाता है . देवों के सिर पर पुष्प चढाया जाता है ...किंतु , पुष्प की अभिलाषा है ....किसी वीर सैनिक की वह , चरण धूलि बने ..
काव्य - शिल्प का एक सशक्त चरण येही है कि , " IMAGE " याने कि , " अदृश्य - दृश्य " को भाव प्रवण व मुखरित कर जाए ऐसे शब्दों से , जो कवि कहना चाहता है , वह पाठक , के सामने स्पष्ट = साफ दिखायी देने लगता है । जब् कोई चित्र , आंखों के सामने होता है , उस समय , रंग , आकर , आकृति , दृश्य बहुत कुछ कह जाते हैं -- किंतु , उस के द्वारा उभरते दृश्य की जो प्रतिध्वनि और प्रतिसाद दर्शक के ह्रदय से भावों को आंदोलित करते हैं और जो भाव उठते हैं वही चित्र का स्थायी असर है .
Both POEM & PAINTINGS are ART forms. The effect they impart & the conotation they generate r " ABSTARACT " . The more successful is the attempt in creating SUCH art , the deeper emotion it invokes in the viewer's heart & leaves more lasting impression.
" चाह नही मैं ...सुर - बाला के गहनों में गूंथा जाऊं " इस पंक्ती के द्वारा , कवि कहते हैं कि , गहनों के साथ - साथ स्वर्ण तथा सुन्दरी का सामीप्य , व संनिन्ध्य भी पुष्प के लिए वाँछित नही ....जितना मातृ- भूमि पर शीश चढाने वाले , वीर सैनिक की चरण - रज बनना उसके लिए श्रेयस कर है । ऐसी उद्दात भावना से ही ये कविता कालजयी बन पायी है जिस का असर सदीयाँ बीत जाने पर भी दमकता रहेगा -
परम आदरणीय, हिन्दी के मूर्धन्य कवि श्री माखन लाल चतुर्वेदी जी को शत शत प्रणाम !
-- लावण्या
Monday, May 5, 2008
चोर का गमछा
ये चित्र प्रसिध्ध कवि श्री अशोक चक्रधर जी ने खीन्चा है --
बहुत कम ऐसा होता है जब् आप कोइ कविता पढ़ें और आप को , बखूबी हंसी के साथ साथ, करुना का भाव भी मन में आए !॥
ये कविता जब् मैंने पढी कविता - कोश में, जिसका कार्य भाई श्री ललित कुमार ने , शुरू किया जो आज , कई और लोगों की सहायता से , तैयार हो रहा है अगर आपने कविता - कोश न देखा हो तो मेरी आपसे नम्र इल्तजा है , आप अवश्य देखें इस साइट को ! यहां बहुत सारी कविता और कवि आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं --
आज , ये कविता आपके साथ शेर कर रही हूँ जो मुझे बहुत पसंद आयी और मन को छू गयी
चोर का गमछा छूट गया
जहां से बक्सा उठाया था उसने,
वहीं-एक चौकोर शून्य के पास
गेंडुरियाया-सा पड़ा चोर का गमछा
जो उसके मुंह ढंकने के आता काम
कि असूर्यम्पश्या वधुएं जब, उचित ही, गुम हो गई हैं इतिहास में
चोरों ने बमुश्किल बचा रखी है मर्यादा
अपनी ताड़ती निगाह नीची किए
देखते, आंखों को मैलानेवाले
उस गर्दखोरे अंगोछे मेंगन्ध है उसके जिस्म की
जिसे सूंघ/पुलिस के सुंघिनिया कुत्ते शायद उसे ढूंढ निकालें
दसियों की भीड़ में, हमें तो
उसमें बस एक कामगार के पसीने की गन्ध मिलती है
खटमिट्ठी
हम तो उसे सूंघ/केवल एक भूख को
बेसंभाल भूख को
ढूंढ़ निकाल सकते हैं दसियों की भीड़ में
रचनाकार: ज्ञानेन्द्रपति
"कविता कोश " से लिया गया
पता : www।kavitakosh।org
मेरे मन का भेदी
मेरे मन का भेदी : [ आइना : मेरा हमराज़ ]
बदरीया बीच जिम चन्दा ,तुझ में , झांके जो मूखडा ,
काजल की ओट समाया है ज्यूँ मेरी अँखियोँ में सजनवा !
सिंगार ऊतारूं , जब् जब् , सिंगार सजाऊं निस - दिन ,
तू मेरे मन का भेदी ,तुझ से न छिपी कोई बात !
जोबन को देखे दर्पण ,नयनन माँ जलती आग !
गए मोरे पिया गहन , वन , तू दिखलाना घर की बाट !
नीली सारी मोरी मैली भई, नील गगनवा चमके तारे ,
तुझ से कहती हूँ , सुन ले , तू ,पियु कब लौटेंगे मोरे दुवारे
- लावण्या
Saturday, May 3, 2008
गोरा और काला
ये चित्र है वैजयन्तीमाला का !
तुम काली हो ये फरीश्तों कि भूल है।
वो तिल लगा रहे थे कि स्याही बिख़र गयी।
अब मैं समझा तेरे गालों पर काले तिल का मतलब ,
दौलते हुस्न पर दरवान (watchman) बिठा रखा है ।
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बड़ी मुश्किल बाबा बड़ी मुश्किल , गोरे गोरे गलों पे है काला काला तिल ;-)
ये नृत्य, गीत देखिये
http://www.youtube.com/watch?v=6cQAUQc04f4
Friday, May 2, 2008
समीक्षा : " चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ " - लेखक श्री अमरेन्द्र जी

युवा कवि व लेखक अमरेन्द्र जी व सौ. हर्षा प्रिया
युवा कवि, सम्पादक व लेखक, श्री अमरेन्द्र जी की कहानियाँ पैन्ग्वीन बुक्स से प्रकाशित हुईँ हैँ नाम है, " चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ " जो , अमरेन्द्र जी की, लेखकीय प्रतिभा का प्रथम सोपान कहा जायेगा. शीर्ष कथा "चूडीवाला " पढकर मै प्रभावित हुई थी. कथानक भारतीयता से रँगा हुआ है जिसमेँ मुख्य पात्र "चूडीवाला" यानी " सलीम चाचा," गाँव गाँव घूमकर, चुडियाँ , बेचते हैँ और बहू बेटीयोँ को आत्मीय नज़र से देखते हैँ. उन्हेँ अपनी वृध्धावस्था का एहसास तब गहराता प्रतीत होता है कि जब जब उनकी नीयत पर आशँका जतायी जाती है एक बहू के , अनादरपूर्ण वाक्य से .....और मर्माँतक शब्द , उन्हेँ भीतर तक बेध जाते हैँ . यह बदलते रीश्तोँ की कहानी है जहाँ समाज खरीददार और विक्रेता बन कर रह गया है और रीश्तोँ की जगह धन विनिमय ने ले ली है. हमारी यादोँ मेँ बसा भारत, कब का बदल चुका है ये आघातकारी सत्य, बूढे सलीम चाचा के हारे थके तन, मन से निकल कर, पाठक के अन्तर्मन को भीतर तक झकझोर जाता है और जब ,औरसँबम्धोँ मेँ, मनुष्य की आस्था मेँ पडतीँ दरारेँ चटखतीँ,हैँ और जब , जब टूट कर बिखरतीँ हैँ तब, भूतकाल के समाज से वर्तमान की बेरुखी से लैस समाज मेँ पनप रही सभ्यता के ह्रास के हम मौन प्रेक्षक बनते हैँ !यही लेखक की सफलता है जो अपनी कहानी के जरिये हमेँ सामाजिक सत्य का सच्चा आइना दीखलाने मेँ सफल हो कर पात्रोँ के आपसी रीश्तोँ के तानो बानोँ से हमेँ बाँधने मेँ पूर्णत: सफल रहे हैँ इस कथा मेँ और पुस्तक की शीर्ष कथा को यादगार बनाते हैँ इस पुस्तक की दूसरी कथा जिसे मैँ त्वरित गति से पढ गई वह "मीरा " जो एक विदेशी नारी पात्र के जीवन सँघर्ष की कथा है और भारत की धरती से दूर रहते सम्वेदनाशील, कवि ह्रदय लिये लेखक की नये परिवेश से , स्वयम को जोडने की चेष्टा भी है, साथ साथ आत्म मँथन, जीवन के गहनतम क्षण की अनुभूति से भी पाठक को परिचित करवाती कथा है. मीरा नाम उस परदेसी स्त्री का है जिसका जीवन उतार चढावोँ से गुजरता हुआ भारतीय आध्यात्म मेँ कृष्णाराधना के समीप जाकर पाथेय ग्रहण करता है जो उसके शैशव काल के ऐकाँत को कुछ हद तक सँबल प्रदान करता है. उसी दौरान लेखक की अपनी माँ का निधन, भारत जाना , करुण प्रसँग मेँ शामिल होकर , दुबारा विदेश आ जाना , यह ह्रदय विदारक मनोदशा वही अनुभव कर पाता है जिसे ऐसे कठिन सँजोगोँ से गुजरना पडता है. सूफी सँत दरवेसोँ ने भी गाया है कि, "बहुत कठिन है डगर पनघट की " तो जहाँ कथा का मुख्य पात्र मीरा भी इसी कठिन पथ पर चल कर , हीम्मत से , अपने जीवन मेँ आयी कठिन परिस्थितियोँ से जूझती है लेखक भी, माँ के बिछोह से छलनी ह्रदय को सँजोये फिर पराये देस काम करने लौट आता है अकेले हाथोँ , " मातृत्त्व" का सामना करती हुई मीरा भी उसे दीख्लायी देती है. ईश्वर आस्था ही विषम क्षणोँ मेँ , मानव जीवन को पार करती है ये भी द्र्ष्टिगोचर है यही मानवता का हर धर्म से परे, जीवन यात्रा को आगे बढाने का अमर सँदेश है जो लेखक हमेँ बडी सहजता से देता है. "एक पत्ता टूटता हुआ" और चिडिया यूँ तो मानवीय प्राणी कथानकोँ से जुडी हुई कहानियाँ हैँ परँतु, इस मेँ परीलक्षित सँवेदना उन्हेँ मूक प्राणी व प्राकृतिक तत्व से उपर उठाकर मानवीय सँवेदनाओँ से जोडतीँ हैँ . चिडिया कथा मेँ , लेखक और चिडिया मानोँ एक दूसरे को ना बोलते हुए भी समझ रहे हैँ जब बुखार से तप रही हथेली पर बैठ कर चिडिया अपनत्व का इजहार करती हुई प्रतीत होती है और कभी इतना विश्वास कि अपनी