Thursday, August 28, 2014

' कॉफी विथ कुश '

' कॉफी विथ कुश '
[ कुश जी हिन्दी ब्लॉगर हैं और राजस्थान के निवासी हैं। ' कॉफी विथ करण जौहर ' की तर्ज़ पर, हिन्दी ब्लॉगरों का इंटरव्यू ले कर ' 
कुश ने एक नई श्रृंखला आरम्भ की थी। कुछ वर्ष पूर्व कॉफी विथ कुश '  में हम भी बुलाये गए थे। पेश हैं कुश के प्रश्न और लावण्या शाह के उत्तर !]
Q. कैसा लग रहा है आपको यहा आकर ? 
   A. जयपुर के गुलाबी शहर मेँ , हम ,कुश जी के सँग, कोफी पी रहे हैँ ..तो " सेलेब्रिटी ' जैसा ही लग रहा है जी !
   आपसे रुबरु होने का मौका मिला है ~ शुक्रिया !
Q. सबसे पहले तो ये बताइए ब्लॉग्गिंग में कैसे आना हुआ आपका ?
  A. " Blogging " is like "sitting in the  " Piolet's Seat .. &  flying the plain solo ..
         मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ -
       एक दिन रात का भोजन, निपटा कर , मैँ ,  कम्प्युटर पर सर्फ़ कर रही थी और गुगल पे ' ब्लोग ' बनाने की सूचनाएँ पढते हुए
        मैँने मेरा प्रथम ब्लोग " अन्तर्मन "   बना दिया।  वह पहला ' ब्लॉग '  अँग्रेज़ी मेँ था। और तभी से ," सोलो प्लेन"  समझिये,
           " इन ट्रेँनीँग" - सीखते हुए, चला रहे हैँ :-)
        Q.  हिन्दी ब्लॉग जगत में किसे पढ़ना पसंद करती है आप ?
       A. मैँने प्रयास किया था इस पोस्ट मेँ कि जितने भी जाल घरोँ का नाम एकत्रित करके यहाँ दे सकूँ - वैसा  करूँ -
    अब कोई नाम अगर रह गया हो तो क्षमा करियेगा।  पर मुझे सभी का लिखा पसँद है सिवा उसके
    जो पढनेवाले का दिल दुखा जाये ~ बाकि कई नये ब्लोग पर रोचक और ज्ञानवर्धक सामग्री भी मिल ही जातीँ हैँ। 
    सभी को मेरी सच्चे ह्र्दय से , शुभ कामनाएँ दे रही हूँ।  स्वीकारियेगा !
     कृपया, ये लिन्कॅ देखेँ ~
Q. हिन्दी ब्लॉग जगत की क्या खास बात लगी आपको ?
  A. हिन्दी ब्लोग जगत मेरे भारत की माटी से जुडा हुआ है।  कई सतहोँ पर! जहाँ आपको मनोरँजन भी मिलेगा, ज्ञानपूर्ण बातेँ भी, राजनीति से      लेकर, शब्दोँ की व्युत्त्पति या खगोल शास्त्र, पर्यटन, सदाबहार नगमे, या नये गीत, एक से एक बढकर गज़ल, शायरी, गीत और नज़्म, व्यँग्य, विचारोत्तेजक लेख etc एक छोटे से कस्बे मेँ जीता भारत या विदेश का कोई कोना,  यादेँ, सँस्मरण ,  सभी कुछ पढने को मिल जाता है। 
जो नावीन्य से भरपूर होता है।  जिसका मूल कारण है व्यक्ति की स्वतँत्रता और अनुभवोँ को दर्शाने की आज़ादी ! जिसे सामाजिक स्वतंत्रता के तहत हम अंग्रेज़ी में कहें तो ' Freedom of expression ' है। यह एक लोकताँत्रिक विधा है।  यही ब्लोग की प्राण शक्ति है और उस मेँ समायी उर्जा है। 
Q. क्या आप किसी कम्यूनिटी ब्लॉग  भी लिखती है?
   A.  नहीँ तो ...ये अफवाह किसने उडायी ? :)
Q. आपके बचपन की कोई बात जो अभी तक याद हो ?
   A. हुम्म्म ................. मैँ बम्बई पहुँच गई हूँ......
       खयालो के धुन्ध मेँ, दीखलाई देती है ३ साल की एक नन्ही लडकी , शिवाजी पार्क की भीड भाड मेँ , शाम के धुँधलके मेँ ! अब लोग घर वापस    जाने के लिये, पार्क के दरवाजोँ से बाहर यातायात के व्यस्त वाहनोँ के बीच से रास्ता ढूँढते निकल लिये हैँ और ये लडकी , अपने आपको अकेला,   असहाय पाती है।  घर का नौकर शम्भु, भाई बहनोँ को लेकर, कहीँ भीड मेँ ओझल हो गया है और अपने को अकेला पाकर, जीवन मेँ पहली बार
 बच्ची को डर का अहसास हुआ है।  पूरी शक्ति लगाकर इधर उधर देखते हुए बिजली की खँभा दीखाई पडता है उसी को अपने नन्हे हाथोँ को फैला,
   कस के पकड लेते ही आँखोँ मेँ आँसू आ जाते हैँ और उसे देख,  २ नवयुवक ठिठक कर रुक जाते हैँ और पूछते है, 
    " बेबी, क्या तुम घूम गई हो ?  अकेली क्यूँ हो ? " थर्र्राते स्वर मेँ, अपनी ढोडी उपर किये स्वाभिमान से उत्तर देती हुई वो कहती है,
        " मैँ नहीँ हमारा शम्भु भाई घूम गया है ! "  और वह  ३ बरस की नन्ही कन्या, मैँ ही थी :-)
     ईश्वर कृपा से वे दोनोँ युवक, मेरे रास्ता बताने से , मुझे घर तक छोड गये और दरवाजा खुलते ही,
     " अम्मा .." की पुकार करते ही अम्मा की गोद मेँ , मैँ फिर सुरक्षित थी !
     और उन दोनोँ युवकोँ ने, अम्मा को,  खूब डाँटा था और अम्मा ने उनसे माफी माँगते खूब अहसान जताया था। 
    आज सोचती हूँ अगर मैँ घर ना पहुँची होती तो ?!
 Q. कॉलेज के दिनो की कोई बात ?
    A. आहा ...यौवन के दिन भी क्या दिन होते हैँ !! भविष्य का रास्ता, आगे इँद्रधनुष सा सतरँगी दीखलाई देता है। 
    - अजाना, अनदेखा, अनछुआ -- रोमाँच मिश्रित भय से और आशा की किरणोँ से लिपटा, नर्म बादलोँ की गाडी मेँ बैठे, दुनिया की सैर करने को     उध्यत!  एक नये अहसास को हर रोज सामने ले आनेवाला समय,  जो हर किसी के जीवन मेँ ऐसे आता है कि जब तक कि कोई उसको परखेँ, वो बीत    भी जाता है ! अगर बचपन के दिन सुबह हैँ तो कोलिज के दिन मध्याह्न हैँ। 
   एक दिन कोलिज मेँ अफघानिस्तान से आये एक शख्स ' नूर महम्मद ' ने मेरी सहेली रुपा के लिये, दूसरे लडके को, कोलेज के बाहर सडक पर,
  चाकू से घायल कर लहू लुहान कर दिया था।  हम लडकियाँ सहम गईँ थीँ। इस का असर ये हुआ कि घर गई तब १०१ * ताप ने मुझे आ घेरा !
                       दूसरे दिन एक मित्र जिसका नाम अनिल था और वो सबसे सुँदर था। उसका दोस्त आया और बतलाया कि अनिल ने खुदकुशी कर ली !
  शायद उसके पर्चे ठीक नहीँ गये थे और फेल होने की आशँका से उसने ऐसा कदम उठाया था।  ये दोनोँ किस्से मुझे आज तक भूलाये नहीँ भूलते !
 युवावस्था और कॉलेज के दिन अब बीत गए परन्तु  कविता में यादें शेष हैं।  ' वह कॉलेज के दिन ' कविता का लिंक ~ 
Q. जीवन की कोई अविस्मरणिय घटना ?
   A. मेरी पहली सँतान बिटिया सिँदुर का ९ वाँ महीना चल रहा था।  उसे हमने शाम के खाने पे बुलाया तो वो सेल फोन से नर्स को पूछ रही थी 
   " क्या मैँ मेरा फेवरीट शो देखने के बाद वहाँ आ सकती हूँ ? "  नर्स ने कहा "नहीँ जी, फौरन आओ"  !
         दूसरे दिन हम भी वहाँ गये उसे लेबर पेन चल रहा था और मैँ प्रभु नाम स्मरण करते जाप कर रही थी।  मन मेँ एक डर था कि अभी नर्स     या डाक्टर आकर कहेँगेँ कि हम इसे ओपरेशन के लिये ले जा रहे हैँ। परँतु, सुखद आश्चर्य हुआ जब हेड नर्स ने हम से कहा, 
   " आप लोग बाहर प्रतीक्षा कीजिये। अब समय हो रहा है " हम बाहर गये और मानोँ कुछ पल  मुस्कुराती हुई वो लौट आई और कहा 
    " अब आप लोग आ सकते हैँ "  भीतर सिँदुर थी और मेरा नाती " नोआ"=  Noah  था। उस सध्यस्नात,  नवजात शिशुको हाथोँ मेँ उठाया तो वह     पल मुझे मेरे जीवन का सबसे अविस्मरीणीय पल लगा। 
 Q. अपने परिवार के बारे में बताइए  ?
   A. मेरे परिवार मेँ हैँ , मेरी बिटिया सिँदुर, दामाद ब्रायन, नाती नोआ और बेटा सोपान और बहु मोनिका देव मेरे पति दीपक और मैँ !
 Q. ब्लॉगिंग से जुड़ा कोई दिलचस्प अनुभव ?
   A .  हम जब ब्लोगिँग करते हैँ तब निताँत एकाँत मेँ, अपने विचारोँ को Key Board / की बोर्ड के जरिये ,
       खाली पन्ने पे उजागर करते हैँ।  उसके बाद आपका लिखा कौन , कहाँ पढता है इस पे आपका कोई अधिकार नहीँ। 
      इस नजर से ये सर्व जन हिताय हो गया। - एक पोस्ट श्रध्धेय अमृतलाल नागर जी ( मशहूर कथाकार हैँ ) 
    उन के पापाजी पे लिखे सँस्मरण को पोस्ट करने से पहले, उन पे नेट पर सामग्री ढूँढते , "रीचा नागर" के बारे मेँ पता चला। 
       और सँपर्क हुआ जिसकी खुशी है। रिचा साहित्यकार श्री अमृतलाल नागर जी की धेवती है। 
   और कवि प्रदीपजी वाली पोस्ट को उनकी बिटिया ने पढकर मुझे ई मेल से संपर्क किया था उसकी भी खुशी है। 
Q आप ही की लिखी हुई आपकी कोई पसंदीदा रचना ?
   Aसुनिये ~~
 रात कहती बात प्रियतम,
  तुम भी हमारी बात सुन लो,
थक गये हो, जानती हूँ,
प्रेम के अधिकार गुन लो !
है रात की बेला सुहानी,
इस धरा पर मनुज की,
नीँद से बोझिल हैँ नैना,
नमन मैँ प्रभु,नुज की,!
रात कहती है कहानी,
थी स्वर्ग की शीतल कली,
छोड जिसको आ गये थे-
उस पुरानी - सखी की !

रात कहती बात प्रियतम !
तुम भी सुनो, मैँ भी सुनुँ !
हाथ का तकिया लगाये,
पास मैँ लेटी रहूँ !
 Q.  पसंदीदा फिल्म ? क्यो पसंद है ? 

A. " मुगल - ए - आज़म "  मेरी पसँदीदा फिल्म है।  मधुबाला दिलीप कुमार, पृथ्वीराज कपूर दुर्गा खोटे और अन्य सभी सह कलाकारोँ का उत्कृष्ट अभिनय, नौशाद साहब का सुमधुर , लाजवाब सँगीत और एक से बढकर एक सारे गाने, वैभवशाली चित्राँकन, कथा की नायिका की मासूमियत और खूबसुरती जो उसके जीवन का अभिशाप बन गई और अनारकली का त्याग ! प्रेम के लिये आत्म समर्पण !  बहुत सशक्त भावोँ को जगाते हैँ। 
बस्स वही सब पसँद है ~~
Q. पसंदीदा पुस्तक ? क्यो पसंद है ?
 A. वैसे तो लम्बी लिस्ट है ..पर सच मेँ " सुँदर काँड " मेँ चमत्कारी शक्ति है ! हनुमान जी का सीता मैया को राक्षस राजा रावण की 
अशोक वाटीका मेँ खोजना और पाप का नाश और सत्य पर विजय हमेशा नई आशा का सँचार करता है ~
 और एक पुस्तक है " शेष - अशेष " मेरे पापाजी पर बहुत सारे सँस्मरणात्मक लेखवाली ..
 उसे पढते समय , अक्सर, पढ़ते हुए बीच में छोड देती हूँ क्यूँकि ..आँसू आ ही जाते हैँ उनकी और अम्मा की यादेँ तीव्र हो उठतीँ हैँ। 
 Q. अपनी बीती हुई ज़िंदगी में अगर कुछ बदलने का मौका मिले तो क्या बदलना चाहेंगे आप ? 
 A. कोई ऐसा मौका हाथ से जाने नहीँ दूँगीँ जब , किसी दुखी या लाचार और हताश मानव के लिये कुछ कर ना पायी ...
आज आप हँस बोल लो , कल क्या हो किसे पता है ?
 Q. ब्लॉगिंग के लिए इतना वक्त कैसे निकाल पाती है आप
 A. घर के काम शीघ्रता से करने की आदत हो गई है अब और काफी समय , जितना वक्त है उसे , सही तरीके से
 उपयोग मेँ लाने की कोशिश करती हूँ और हाँ, यहाँ ( अमेरिका मेँ ) बिजली कम ही जाती है :-)
घर मेँ , आधुनिक उपकरण ही ज्यादातर काम पूरा करते हैँ .. पर,  खाना, अब भी ,  मैँ ही बनाती हूँ ! क्यूँके ,
अभी ऐसा कोई "रोबोट= यँत्र मानव " मिला ही नहीँ !! :-))
 Q. बचपन में कितनी शरारती थे आप ? कोई शरारत ? 
A. जी हाँ शरारती तो थी ही, छोटे भाई बहनोँ को कहानी सुनाती तो बाँध कर एक जगह पे बैठाये रखती थी :) 
हमारे सामने एक आँटीजी आग्रा से रहने बम्बई आयीँ थीँ।  वे रोज ही सिनेमा देखने चल देतीँ थीँ हम लोग उन्हेँ "ठमको आँटी " प्राइवेट मेँ बुलाते थे ना जाने एक दिन क्या सूझी कि उनके घर कुँकु से लिपटा नारीयल, फूल और डाकू भैँरोँ सिँह के नामवाली चिठ्ठी  छोड  आये ... 
खत का मजमूँ था ...."घर मेँ रहा करो नहीँ तो तुम्हारे जान की खैर नहीँ ! "
आँटीजी ने पुलिस बुलवाने का उपक्रम किया तब जाकर अम्मा के सामने डाकूओँ ने आत्म समर्पण कर दिया था !! 
 एक और बात याद है बचपन के दिनों की - ओलिम्पिक खेल की मशाल की देखा देखी, सारे मित्रोँ को पेन्सिल पकडावा के बाग के बीच लगे पीले गेँदे के फूलोँ की क्यारियोँ के इर्दगिर्द , कई सारे चक्कर लगवाये थे हम गा रहे थे, "मेरे इरदगिर्द शागिर्द "....
और उन सब को कहना होता था,  " अग्नि गोल  ..अग्नि गोल "
कुछ देर बाद सब ने कहा " ये कैसी रेस है जी जहाँ गोल घूमते पसीने से तर हमेँ कोई मेडल भी नहीँ मिल रहा " ...
आज बरसोँ बाद ये शैतानियाँ याद आयी और  नादानियोँ पे हँसी आ रही है ~~ 

1 comment:

santosh porwal said...

बहुत सुन्दर पढकर मन आनन्दित हुवा।
भगवान श्री कृष्ण के बारे में बहुत कुछ पढ़ा, यहाँ पर कुछ नया पढ़ने को मिला। मन को बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद