Saturday, October 18, 2014

आकर्षण करोति इति श्रीकृष्ण

ॐ 
हरी भक्ति गंगा 
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आकर्षण करोति इति श्री कृष्ण 
कालो वा कारणम राज्ञो 
नमो भगवते तस्मै 
नारायणं नमस्कृत्यम
नारायणं सुरगुरुं जग्देकनाथं 
सत्यम सत्यम पुन: सत्यम II
   वामन पुराण में महाविष्णु नारायण के स्वरूप का वर्णन है I ईश्वर के विविध आयुध जो वे सदैव ग्रहण किये रहते हैं उनमे से एक सुदर्शन चक्र भी है I इसे कालचक्र भी कहते हैं I सुदर्शन चक्र छ: नुकीले नोकों वाला तीक्ष्ण आयुध हैI जिसके छ : विभक्त भाग छ : ऋतुओं के द्योतक हैं I 
१२ निहित हिस्से १२ देवताओं, अग्नि, सोम, मित्र, वरुण इंद्र, इन्द्राग्नी, वायु, विश्वदेव, प्रजापति व धन्न्वंतरी इत्यादि का प्रतिनिधित्व करते हैं I चक्र का मध्य भाग वज्र धातु से बना है जिसके गुण हैं भृवि माने समता,
भग माने तेज, 
निर्देश माने गति और सम्पदा ! सुदर्शन चक्र की हर नोक पर " सहस्त्रात हुं फट " अक्षर लिखे हुए हैं I विभिन्न कोणों में नारी शक्तियों का निवास है जिसका वर्णन इस प्रकार है ..
१ ) योगिनि - शक्ति क्रिया जो परिपूर्ण है 
२ ) लक्ष्मी - लक्ष्य प्राप्ति की शक्ति जो परम सत्य का                    द्योतक है।  
३ ) नारायणी - सर्वत्र व्याप्त महाशक्ति 
४ ) मुर्धिनी - मस्तिष्क रेखा से रीढ़ की हड्डी तक व्याप्त शक्ति 
५ ) रंध्र - ऊर्जा की वह गति जो सूक्ष्मतर होती रहती है वह 
६ ) परिधि - ' न्र ' शक्ति का स्वरूप 
७ ) आदित्य - तेज जो कि प्रथम एवं अंतहीन है 
८ ) वारूणी -चतुर्दिक व्याप्त जल शक्ति जिस के कारण सुदर्शन की गति अबाध है 
९ ) जुहू - व्योम स्थित तारामंडल से निस्खलित अति सूक्ष्म , ज्योति शक्ति व गति 
१० ) इंद्र - सर्व शक्तिमान 
११ ) नारायणी - दिग्दिगंत तक फ़ैली हुई पराशक्ति ऊर्जा या कुंडलिनी शक्ति 
१२ ) नवढ़ा - नव नारायण , नव रंग, नव विधि की एकत्रित शक्ति  स्वरूप ऊर्जा 
१३ ) गंधी - जो पृथ्वी तत्व की भांति चलायमान है 
१४ ) महीश - महेश्वर में स्थित आदि शक्तियाँ 
Maha Sudarshan Jaap & Yagya

आकार : सुदर्शन चक्र का व्यास सम्पूर्ण ब्रह्मांड तक व्याप्त होकर उसे ढँक सकने में समर्थ है और इतना सूक्ष्म भी हो सकता है कि, वह एक तुलसी दल पर भी रखा जा सकता है I
सुदर्शन प्रयोग व् महत्ता  : 
१ ) गोवर्धन परबत उठाने के प्रसंग में श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत के नीचे सुदर्शन चक्र को आधार बना कर रखा था I
२ )  शिशुपाल का वध इसी सुदर्शन चक्र से किया गया था I 
३ ) जयद्रथ वध के समय सुदर्शन चक्र का प्रयोग सूर्य को ढँक कर सूर्यास्त करने में हुआ था I

४ ) अर्जुन ने जो दीव्यास्त्र महाभारत युध्ध के समय प्रयुक्त कीये उन बाणों के घने आवरण को श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र  आधार देकर उन्हें अभेध्य कर दीये थे I 
५ ) राजा अम्बरीष पर दुर्वासा ऋषि क्रोधित हुए तब श्रीकृष्ण ने, विष्णु रूप से दुर्वासा ऋषि पर सुदर्शन चक्र से प्रहार किया था I 
६ ) नाथ सम्प्रदाय के परम तेजस्वी  महागुरु गोरखनाथ जी ने अपनी शक्ति से 
     सुदर्शन चक्र को स्तंभित कर दिया था I 
सामवेद में उल्लेख किया गया है कि, जब आहत और अनाहत ऊर्जा तरंगें 
एक साथ बहने लगतीं हैं उन्हें ' वासुदेव ' कहते हैं I 
श्रीकृष्ण : श्रावण अष्टमी को श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ था I श्री कृष्ण के मामा कंस ने अपनी बहन देवकी व जीजा वसुदेव जी को कारागार में कैद कर रखा था उसी काल कोठडी में आंठवें पुत्र रूप में परमात्मा नारायण ने या माहाविष्णु ने श्रीकृष्ण स्वरूप में आगमन किया था I 
राजा उग्रसेन व उनकी महारानी पवनकुमारी को एक दानव से कंस पैदा हुआ था I इस आसुरी सता का अन्य पापात्माओं सहित नाश करने के लिए ही ईश्वर का धरती पर पूर्ण अवतार रूप में एवं  जगत का उद्धार करने के लिए , संतों को सुख पहुंचाने के लिए, श्री हरि का  आगमन हुआ I  पिता वासुदेव  बाबा ने मध्य रात्रि में आंधी तूफ़ान और बरखा  बौछारों के बीच बालक कृष्ण को यमुना पार करवा कर नन्द जी  भारी ह्रदय से छोड़ दिया था। 
 
    महात्मा गर्ग ऋषि ने वासुदेव की दुसरी पत्नी रोहिणी व देवकी के पुत्रों का नामकरण किया I ज्येष्ठ भ्राता बलराम आदिशेष के अवतार हुए और नन्हे बाल कृष्ण ! रोहिणी जी व नवजात शिशुओं  को वासुदेव जी,  मध्य रात्रि में ही जन्म पश्चात , नन्द लाला जी व माता यशोदा जी के घर छोड़ आये थे I माता देवकी अपने पुत्र कृष्ण के वियोग में विलाप करतीं कारागृह में ही रहीं I नन्द बाबा का ग्राम जहां पवित्र  गौएं चरा करतें थीं वह भूभाग अति पवित्र  ' व्रजभूमि ' कहलाता है I  व्रजभूमि में कयी दानवों के वध की अलौकिक कथा लीला श्रीकृष्ण द्वारा की गईं थीं I 
       श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं के प्रसंगों में से जो माताओं को अति प्रिय है वह है मिट्टी खाना ! 
जब मैया यशोदा ने श्री कृष्ण को मिट्टी खाते देखा तब हठात कान्हा का मुख खुलवाया उस समय श्रीकृष्ण के मुखमंडल में माता यशोदा सम्पूर्ण ब्रह्मांड को घूमता हुआ देखकर अवाक रह गईं और मूर्च्छित हो गईं थी I yashoda and little krishna
            एक और प्रसंग है जहां कंस ने अदभुत पराक्रमी बालक कृष्ण को पकड़ने के हेतु से अपने सैनिक व गुप्तचर भेजे थे तब बृज के कई  गोप बालकों  ने श्रीकृष्ण की तरह अपने शीश पर ' मयूरपंख ' धारण कर लिया ताकि गुप्तचरों को ' मयूर पंख धारी बाल कृष्ण ' की पहचान ही न होने पाए कि ,
 कृष्ण कौन है ! 
            अन्य प्रसंगों में श्रीकृष्ण का चाणूर को मुष्ठीयुध्ध द्वारा वध करने से वे ' चाणूर मर्दनम ' कहलाये हैं तथा आगे असुर वक्रदन्त को गदा युध्ध से हराने का भी उल्लेख है I  
     पूतना वध , तृणाव्रत का वध , दूध भरी मटकी की बैलगाड़ी को उलट देना , फल बेचनेवाली के फल लेकर माई को धान के कण देना जो रत्नों  में बदल गये थे, माखन चोरी कर माखन को गोप बालकों के संग बाँट कर खाना और जब गोपियाँ शिकायत लेकर माँ यशोदा के घर पहुंचतीं हैं तब बाल कृष्ण घर के भीतर से निर्दोष रूप में निकल कर आते हैं इत्यादी कई लीलाएं, बाल कृष्ण रूप में कान्हा ने कीं थीं और समस्त बृज वासियों को महाआनंद का  रस पान करवाया थाI 
           पावन यमुना जी  का जल श्रीकृष्ण के सानिंध्य से पवित्र हो उठा और कालिया मर्दन लीला कर कान्हा ने दूषित जल को स्वच्छ किया और प्रकृति के हर तत्त्व को निर्मल कर दिया थाI गोवर्धन परबत के नीचे ब्रज के नर नारियों को मूसलाधार वर्षा एवं इंद्र के कोप से रक्षा प्रदान कर श्री कृष्ण ने पर्यावरण की सुरक्षा का पाठ आधुनिक युग  से बहुत पहले ही समाज के सामने एक महत्वपूर्ण मुद्दे की तरह उपस्थित किया थाI 
            शाल और तोशाल को , कंस द्वारा शासित मथुरा नगरी में  मल्ल युध्ध में परास्त किया तब कंस ने वासुदेव व नन्द बाबा को कैद कर उनके वध का आदेश दिया और उसी समय श्रीकृष्ण ने कंस के राज सिंहासन पर कूद कर कंस पर प्राणान्तक प्रहार किया कंस की गर्दन मरोड़ कर , कार्तिक शुक्ल दसमी के दिवस क्रूर आत्मा कंस  का वध किया था I कंस के नौ लघु भ्राताओं ने कृष्ण बलराम पर हमला किया परंतु उन्हें भी मृत्यु प्राप्त हुईI  
       कंस वध पश्चात , राजा उग्रसेन को पुनह मथुरा नरेश बनाया गया और माँ देवकी व वासुदेव जी को मुक्त किया गया उस समय श्रीकृष्ण १८ वर्ष के थे I
           गर्गाचार्य ने श्रीकृष्ण - बलराम का यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न कियाI तद्पश्चात उन्हें ऋषि सांदीपनी कश्यप के आश्रम में विद्याभ्यास के लिए प्रस्थान करते देख कर माता देवकी और यशोदा मैया के नयनों में अश्रु का ज्वार उमडा था I 
      सांदीपनी ऋषि ने धनुर्विद्या , वेदाभ्यास, धर्म, नीति शास्त्र  की शिक्षा से उन्हें पारंगत किया और श्रीकृष्ण ने कई नये आयुधों  की रचना भी  वहीं आश्रम में की थी जिसमे ' सुदर्शन चक्र ' भी है I
         ऋषि पुत्र पूर्णदत्त का अपहरण होने पर और नाग वंश की कुंवरी से विवाहित होने पर सांदीपनी उदास रहने लगे तब श्रीकृष्ण ऋषि पुत्र को आश्रम लौटा लाये और गुरु देव को प्रसन्न किया था I 
     वासुदेव जी के भाई देवभागा के पुत्र थे उद्धव !  जो कृष्ण के अनन्य सखा थे I मगध नरेश जरासंध ने अपने दामाद कंस की मृत्यु का बदला लेने, मथुरा पर आक्रमण किया तब यशोदा माई व गोप गोपियों की कुशल पूछने के लिए उद्धव को कृष्ण द्वारा, वृन्दावन  भेजा गया था I 
        दूसरी ओर अक्रूर जी को विदुर व मौसी कुंती  के पुत्र पांच पांडवों के कुशल क्षेम के लिए हस्तिनापुर भेजा गया था और धृतराष्ट्र ने अक्रूर जी को बतलाया कि वे कौरवों को मनमानी करने से रोक नहीं पाते हैंI इसी घटनाओं के आगे महाभारत की गाथा भी श्री कृष्ण के संग आगे बढती हैI महासमर के आरम्भ से पूर्व श्री कृष्ण ने अभूतपूर्व ' गीता ज्ञान ' दे कर अपने प्रिय सखा अर्जुन को ' कर्म का मर्म ' समझाया था और अंत में ' विराट स्वरूप ' के दर्शन दे कर स्वयं के ईश्वरतत्व की पुष्टी की थी I जय जय श्री कृष्ण ! 
Krishna and Arjuna at the Battlefield of Kurukshetra
- लावण्या  दीपक शाह 

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (20-10-2014) को "तुम ठीक तो हो ना.... ?" (चर्चा मंच-1772) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Asha Joglekar said...

Bahut hee sunder Lavinia ji.

मन के - मनके said...

मनभावन,सुंदर चित्रों के साथ.
सादर धन्यवाद श्री कृण की सुंदरतम छवि के लिये एवं विस्तृत ्जानकारी के लिये.

PRADEEP KULKARNI said...

सुंदर निवेदन