Tuesday, July 17, 2007

न्यूयार्क, सँयुक्त राज्य अमेरीका से, (Gulzar saab )-गुलजार साहब



महिला कवियत्रियोँ का समुदाय - मँच पर


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८वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन -- कुछ झलकियाँ --





सँयुक्त राष्ट्र सँघ के महासचिव श्रीयुत्` बान की मून्` ने कुछ हिन्दी वाक्योँ को,जब अपने लहजे से बोल कर सुनाया तब, सभागार मेँ बैठे,
दूर देशोँ से आये श्रोताओँ के समक्ष अपने हिन्दी के प्रति सजग प्रेम का उदाहरण देते हुए सभी का मन मोह लिया था -
-अँतराष्ट्रीय आँठवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन बहुत से अवरोध,
प्रति अवरोधोँ के साथ शुरु हुआ
पर सँयुक्त राष्ट्र सँघ के मुख्य प्रवेश द्वार पर, लहरा रही
हरी,नीली, पीली , लाल, सुफेद व धानी साडीयोँ की आभा ने
प्राँगण को भारतीय रुप रँग मेँ डूबो कर ,
न्यू योर्क के इस भव्य स्मारक के साथ,
हम भारतीय,
हिन्दी भाषा बोलने वालोँ के मन मेँ,
एक अनोखा अपनापन निर्मित करते हुए,
एक नई उर्जा , एक नयी उमँग भर दी थी.
बाहर एक, बँदूक की नली को मोड कर,
महात्मा गाँधी के "अहिँसा " के सँदेश को प्रतपादित करती,
प्रतिमा को देखकर, फिर ये विचार आ रहा था कि, विश्व मेँ अहिँसा का प्रचार व प्रसार हो तथा शाँति का सँदेश फैल कर २१ वीँ सदी के समग्र मानव जाति के लिये, एक "शाश्वत सर्वोदय " का सँदेश लाये और वह 'अमर सँदेश ' हमारी "हिंदी भाषा " मेँ ही हो !
आखिरकार, अपनी तस्वीर दीखलाकर, या प्रवासी अतिथि, पासपोर्ट दीखला कर, अपने निजी सामान का निरिक्षण करवा कर, सभागार मेँ दाखिल हुए
-व स्थान ग्रहण किया --
- भारत के प्रधान मँत्री मनमोहन जी ने
द्रश्य -श्रव्य माध्यम द्वारा
अपना सँदेश, श्रोताओँ तक पहुँचाया -
विदेश मेँ बसे भारतीय साहित्य को भी शैक्षणिक पाठ्य क्रम मेँ मान्यता दीलवाने की घोषणा का, सहर्ष स्वागत किया गया.
मेरे युवा कवि साथीयोँ का,
आँखोँ देखा विवरण भी यहाँ के २ लिन्कोँ पर अवश्य पढेँ -
- रोचक लगेगा -
-मैँने भी मेरी कविता सुनायी - गुलज़ार साहब के सामने! :-)
अन्य महानुभावोँ के सम्मुख !!
जिसे ऊँचे स्वर मेँ पढते हुए,
सुखद अनुभूति हुई -
- "कोटि कोटि कँठोँ से गूँजे, जय माँ! जय जय भारती"
के घोष से,
भारत का गौरव "भाषा भारती , माँ भारती" के प्रति मेरा प्रणाम, गणमान्य अतिथि समुदाय तक पहुँचा जिसकी मुझे खुशी है-
लावण्या

इसे भी आप,अवश्य देखेँ -- http://www.abhivyakti-hindi.org/vhs2008/vhs3.htm

अवश्य देखेँ -- http://www.vishwahindi.com/newsletter/14_july_newsletter.pdf

ब्लोग जगत के सभी साथीयोँ को नमस्कार ! --- ८ वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन

न्यू जर्सी रेडियो कार्यक्रम की उदघोशिका श्रीमती जासमींन जयवंत ,उस्ताद नासिर अहमद साहब , मैं [ लावन्या] श्रीमती सजनी भार्गव के साथ
ब्लोग जगत के सभी साथीयोँ को नमस्कार !मैँ हाल ही मे लौटी हूँ -- अष्टम - ८ वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन समाप्त हुआ . मेरा पिछला बयान , उस्ताद सज्जाद साहब के सदाबहार नगमोँ एवं उनकी कला पर था और इत्तिफाक देखिये, तीसरी और अँतिम शाम, उनके बेटे जो स्वयँ सुप्रसिध्ध मेन्डोलीन वादक हैँ उस्ताद नासिर अहमद साहब , उनसे मुलाकात हो गयी - ( --वे सुफेद कुर्ता पाजामा पहने हुए हैँ )--
गज़ल गायक श्री पँकज उधास जी के बगल मेँ नासिर भाई बैठे हुए थे, इतनी जिँदा सँगत दे रहे थे कि बार बार घ्यान उनकी ओर जाता रहा - प्रोग्राम मेँ उन्हे खूब तालियाँ भी मिलीँ और जब पँकज भाई ने उनका परिचय दिया तो एक सुखद आश्चर्य हुआ ! अरे! अभी तो इनके पिताजी का जिक्र किया था और मिलना भी हो गया --
तो देखिये --उस्ताद नासिर साहब को --

Sunday, July 8, 2007

सँगीत निर्देशक: सज्जाद हुसैन साहब के सुहाने गीत सुनिये

कलाम लिखा है कमर जलालाबादी साहब ने
स्वर दीये हैँ : मन्ना डे, सादत खाँ , मोहम्मद रफी साहब ने
इस गीत की बँदीश, गीत सँयोजन बेहद अनोखा है
.सँगीत शुरु होता है.

..रुकता है और मानो दरिया की मौज,
ज्वार -भाटा मेँ,
आगे पीछे हिलोर लेती हो इस तरह,
फिर बोल उभरते हैँ.

गायकी इतनी उम्दा है मानो गायक इबादत कर रहेँ होँ -
- सुनिये ..


फिल्म: हलचल
कलाकार: लता मँगेशकर
सँगीत निर्देशक: सज्जाद हुसैन
"ऐय दिलरुबा ...नज़रेँ मिला."
.. जाँ निसार अखतर सा'ब के शबनमी अल्फाज़
" भूल जा एय दिल, मुहब्बत का फ़साना"
bhool jaa ae dil muhabbat ka fasaana
Lata Mangeshkar [+]
Sajjad Hussain
लफ्ज़ दिये हैँ इस बेहतरीन गाने को शायर शम्स अज़ीमाबादी सा'ब ने
Khel
" ये हवा ये रात ये चाँदनी .."
तलत साहब को १७ बार गाना पडा था तब कहीँ जाकर गाना फाइनल हुआ था सज्जाद हुसैन साहब, कला के पूजारी थे. जब तक उनके जहन के मुताबिक गाना न सुनायी दे, वे उसे जनता के सामने कैसे ले आने को कैसे राज़ी होते? कला के सूरमा थे सज्जाद साहब. मौसीकी के उस्ताद और सँगीत की दीवानगी इस हद्द तक कि अपने काम के जुनून के सामने किसी को ठहरने न देते थे वे -- मेन्डोलीन का बाजा उनके हाथ मे आ जाये तब उसमे से मानो फरिश्तोँ की आवाज़े , बाहर आने लगतीँ थीँ.जैसे रविशँकर जी का सितार दुनिया मेँ अलग जादू बिखरता है ठीक सज्जाद साहब का मेन्डोलीन वाध्य भी मानो ज़िँदा हो जाता था !
सँगदील का यही गीत -
- मदन मोहन जी के एक गीत मेँ भी दीखलायी दिया , फिल्म थी "आखिरी दाव" गीत के बोल हैँ : "तुझे क्या सुनाऊँ मैँ दिलरुबा "
जिसको सुनकर सज्जाद साहब ने मदन मोहन जी से पूछा था, कि "तुमने मेरा गाना , मेरी धुन को क्योँ चुराया ?
सँगीत निर्देशकोँ के प्र -पितामह श्री अनिल बिस्वास जी का कहना था कि, "सज्जाद ही एक ऐसा सँगीत देनेवाला है हिन्दी फिल्मोँ मेँ जो बेजोड है - उसका कोयी सानी नहीँ -फिर आगे कहा कि "हम सभी कहीँ ना कहीँ से या किसी ना किसी बात से प्ररणा लेते हैँ तर्ज़ बनाने के लिये पर, सज्जाद का सँगीत कहीँ से नहीँ आया - सिवाय खुद सज्जाद के अपने आपे से !"
सज्जाद साहब के सँगीत का सफर शुरु हुआ था फिल्म दोस्त से जिस के लिये सज्जाद सा'ब मियाँ अली बख्श साहब के सहायक सँगीत निर्देशक की हैसियत से काम कर रहे थे. गायिका बेगम नूरजहाँ का गीत था दोस्त के लिये,
" बदनाम मुहब्बत कौन करे, दिल को रुसवा कौन करे " जो सँगीत के प्रेमी श्रोता, आज भी सुन के, याद करके आँहेँ भरते हैँ
जुलाई २१ ७९ साल की अपनी अनोखी सँगीत यात्रा खतम कर सज्जाद साहब सदा के लिये इस दुनिया को खामोश छोड कर उस पार, चले गये. पर उनके नगमोँ के जलवे आज भी बेशकिमती हीरोँ से बेसाखता दमक रहे हैँ !











Saturday, July 7, 2007

...ज़िँदगी ख्वाब है..चेप्टर -- - १० -- कथा की - अँतिम कडी (एक रात शालू का फोन आया ..........)

घर: रोहित और शालिनी का:~~
एक रात शालू का फोन आया ................
" राजश्री जाग रही थी हालाँकि रात के १२.३० बज रहे थे.
वो सोना चाहती थी परँतु, अपना काम निपटाते,
उसे इतनी देरी हो गई थी
- फोन की घँटी ने रात मे सन्नाटे को चीर कर
बजना शुरु किया तो
राजश्री, हडबडाकर, फोन की ओर लपकी..
."हेल्लो, कौन ? " उसने प्रश्न किया -
सामने से शालू की धीमी आवाज़ ने उसे चौँका दिया
" भाभी,...एक बुरे समाचार दे रही हूँ !
हमने अपने रोहित को खो दिया ! "
"क्या मतलब तुम्हारा ? "
राजश्री ने लगभग गभराहट मिश्रित,
भय के आवेग को रोकते हुअ, चिल्लाते हुए पूछा,
" we lost him bhabhi ..about an hour ago "
" राजश्री नो फिर रुँआसे स्वर से पूछा ,
"शालू, तुम क्या कह रही हो बेटे ? "
" भाभी, रोहित हमारे बीच अब नही रहे !
एकाध घँटे पहले ...अँतिम साँस ली..! "
अब शालिनी भी सुबक रही थी जिस की आवाज़ से,
राजश्री के दीमाग ने वो बात समझी,
जो उसका मन, अब भी मानने से इन्कार कर रहा था
और जब ये बात वो समझी तो वो भी रोने लगी --
उसे सूझा नही वो शालिनी से क्या कहे ?
नहीँ ..नहीं....
रोहित का मुस्कुराता चेहारा,
आँखोँ के सामने था,
रोहीत की आवाज़, "भाभी जी, कैसी हैँ आप ? "
उसके खास अँदाज़ मे कहने की आदत,
बार बार राजश्री के जहन मे घूम रहे थे.
अब तो राजश्री की रुलाई छूट पडी .
.ऐसे समाचार जब भी आते हैँ,
इन्सान बिलकुल हतप्रभ: हो जाता है.
अगर आप के तालुकात्त ,
किसी व्यक्ति से घनिष्ट होँ, मधुर होँ
तब सीधे ह्रदय पर चोट हो जाती है.
यही तो है, मनुजता का अहसास !
हम दुनिया मे रहते हैँ पर, सारे सँबँध,
रिश्तोँ पर कायम हैँ
जो सीधा दिल से जुडे रहते हैँ
भावनाएँ ना होँ
तो क्या इन्सान , इन्सान रह पायेगा ?
अगर हमारा ह्रदय द्रवित न हो,
किसी स्वजन के वियोग से,
तो क्या हममे मानवता बची रहेगी ?
नहीँ ना !
ऐसा कौन होगा जो
अपने मित्र या परिवार के सदस्य के बिछोह मे रोया न हो ?
ये आँसू हमारे मनुष्वत्त्व की असली पहचान है !
कभी कभार, अन्य भावनाएँ, मनुज, छिपा भी लेता है.
किसी पर प्रेम या आसक्ति की भावनाएँ दबी रह सकतीँ हैँ -
- वर्षोँ तक !
पाप या कुकर्म की प्रेरणा ,
या ईर्ष्या, जलन, डाह की झहीरीली फुँकार,
दबी, सुप्त नागोँ के फण सी, या, कटुता नागफणी के दँश सी,
भयानक होते हुए भी, द्रष्टिगोचर नही हो पातीँ.
आँखोँ से मनुष्य देखता है इस माया रुपी विश्व को !
फिर भी,
इसी नयन के मूँदते,
ये सँसार स्वप्न मेँ परिणीत हो जाता है
और इन्सान सोचता है ..
.......: सच ! ये ज़िँदगी ..ख्वाब ही तो है ! .
.." मैँ कौन हूँ ? एक शरीर ?
भौतिक सुखोँ की लिप्सा मे प्रयत्नशील,
जीवन निर्वाह मेँ कार्यरत, एक जीव ?
तो जैवी कौन ?
आत्मा का सत्य क्या है ?
क्योँ है आत्मा ?
किसने देखा है परमात्मा को ?
आकाश के उपर है स्वर्ग ?
जन्नत ?
जिसके ख्वाब, हर इन्सान
आँखे खोलके और बँद करके देखता रहता है?
सूफी सँतोँ ने, दरवेशोँ ने, मौला के लिये,
न जाने कितनी बार, पुकार कीँ,.......
साधु सँतोँने, योगीयोँने,
ना जाने कितने तरीकोँ से,
उस एक "सत्य " को खोजा.
..हर इन्सान की यात्रा
इसी तरह, चलती रही है
जिस के ज़ोर पर, ये फानी दुनिया कायम है !
ये तो दार्शनिकता की बातेँ हैँ
जो हम अपने आपको साँत्वना देने के लिये गढते हैँ.
सत्य फिर भी हमेशा सत्य रहता है.
अपने आप मेँ पूर्ण !
पूर्णता से निकला, पूर्ण को जनम देता
फिर भी जो रहता है, पूर्ण का पूर्ण !
रहस्यपूर्ण !
जिस पर से पर्दा, यदा कदा हटा है.
बिरले व्यक्तियोँ की तपस्या से
,मसीहा के आगमन से,उनके अनुभव से ,
वे हमे राह बता कर चले गये हैँपर,
आम ,साधारण इन्सान कि अक्ल मे,
ये सारी बात कहाँ आतीँ हैँ ?
आज राजश्री और शालिनी बस २ दुखी ह्रदय से भरे इन्सान थे !
बस ! इससे अधिक कुछ नही!
"भाभी, आप के लिये इन्तज़ाम हो रहा है.
.आप और प्रकाश भाई आ जाइये.
.रोहित से मिलने नही आओगे?"
राजश्री को लगा कि वह, सात समुद्रोँ की दूरी पाटकर,
नन्ही सी कन्या को कलेजे से लगा ले ! काश !
वे लोग पास मे होते.....
आमने -सामने -
- कितनी सँयत थी शालिनी इस वक्त भी !
" हाँ बेटे हम लोग आ रहे हैँ .
.तुम से मिलने..मेरी बहादुर बिटिया है तू !"
राजश्री ने कहा और फिर दोनोँ रोहित की बातेँ, याद करने लगे -
प्रकाश और राजश्री रोहित के घर गये - पर वहाँ रोहित नहीँ था. उसकी तस्वीर थी फूलोँ के सुगँधित हार से ढकी हुई-मुस्कुराता हुआ चेहरा -वही हिम्मती अँदाज़, स्वप्न साकार करने की क्षमता लिये एक आधुनिक दीर्घद्रष्टा की छवि मे जा कर , उनका मित्र छिप गया था और मानोँ उनसे कह रहा था, " आप लोग नही आये ना मुझसे मिलने ? अब आये हो जब मैँ नहीँ रहा !'तब राजश्री और प्रकाश को शालू ने बतलाया कि, दीदी प्रियँका ने रोहित का चेक -अप किया था - पूरे शरीर का ! रोहित ने कहा कि उसे सर दर्द रहने लगा था - हो सकता है, अत्याधिक काम की व्यस्तता के कारण ही ये हो! पर, दीदी डाक्टर जो थीँ ! ब्रैन स्केन करके ही मानीँ और पता चला कि उनके प्यारे छोटे भाई को ब्रेन का कन्सर था जो काफी बढ गया था. बातोँ बातोँ मे, शालिनी तक भी ये राज़ पहुँचा तो शालिनी ने जिद्द पकड ली कि वो रोहित की सेवा -सुष्रुषा से ज्यादह रोहित का सान्निध्य चाहती है और शादी क्रना चाहती है ! रोहित ने उसे बहुत समझाया पर शालू ने एक ना मानी -- इसी के फलस्वरुप दोनोँ की शादी हुई थी जिस के कारण झवर भाईसा नाराज़ हुए थे चूँकि रोहित, प्रियँका दीदी और शालिनी के अलावा किसी को ये बात का पता उन तीनोँ ने लगने न दिया था. उसके बाद के ३ वर्ष स्वप्न से बीते.अँतिम दिनोँ मेँ रोहित ने, बँबई के,एक अस्पताल का जीर्णोध्धार करवाने के लिये १० करोड रुपये की धनराशि खर्च की थी -उसके वकील रात दिन रोहित की इन अँतिम इच्छा रुपी योजनाओँ को कार्यान्वित करने मे व्यस्त थे.
रोहित ने, लँदन और अमेरीका के, म्युजियमोँ को दान किया. ब्रज के १० हज़ार बच्चोँ के लिये,दोपहर के भोजन के लिये धनराशि जमा करवायी और शालू ने ही बतलाया कि अँतिम समय मे उस के विचार तीव्रता से आ, जा रहे थे
- कभी वह बोलता," गाँधी जी "
- फिर बेहोश हो जाता -
फिर कहता," मेरी स्कूल "
- फिर होश खो देता , फिर शालू से कहता,
"तुम वचन दो कि मेरी हर योजना को बँद नही होने दोगी
-उन्हे पूरा करोगी !"
शालू ने कहा, "मैँ वचन देती हूँ , मेरे रोहित ! -"
और आखिर शालू ने अपना हाथ छुडा लिया था
जिसे रोहित ने कस कर पकड रखा था
- शालू अस्पताल के पलँग के पैताने खडी हो
तो रोहित ने उसकी ओर देखते हुए, प्राण त्याग दिये !
नैन दीप की ज्योति, महा ज्योति मे विलीन हो गयी
-उसकी भव्य अँतिम यात्रा मे कैसे फूल रहेँगे कितने बडे, ये भी सारा रोहित ने तै किया था , वो भी शालिनी नेपूरा किया. और कई सारी घर मे खिँची चित्र विथी देखते हुए, आज भी प्रकाश और राजश्री, मानने के लिये तैयार नही कि उनका हँसमुख, बहादुर और स्फूर्तिला दोस्त, रोहित सशरीर उनके साथ नही रहा
-क्या यही है ज़िँदगी ?थोडी हँसी, थोडी खुशी, कुछ नगमे, कुछ वादे .....
....और......और ...आप बत्तायेँ ?
क्या है ज़िँदगी ? .
....मैँ तो यही कहूँगी, कि,...
.....ज़िँदगी ........ख्वाब है !....
...उसके अलावा, और कुछ नही........
(- ये कथा मेरे परम मित्र को समर्पित है जिसकी याद आज भी आँसू से आँखेँ भिगो देतीँ हैँ ,,अगर आत्मा है, तो मेरे मित्र की आत्मा को चिर शाँति मिले परमात्मा का सामीप्य मिले यही मेरी प्रार्थना है .
..ईश्वर, स्वीकारियेगा !
इति -
- लावण्या



...ज़िँदगी ख्वाब है..चेप्टर -- ९ * सपनों का संसार *

*सपनोँ का सन्सार*
अंतर मनसे उपजी मधुरारागिनीयों सा,
होता है दम्पतियोँ का सुभग सँसार ,
परस्पर, प्रीत,सदा सत्कार, होसाकार,
कुल वैभव से सिँचित, सुसँस्कार !
तब होता नहीँ, दूषित जीवन का,
कोई भी, लघु - गुरु, व्यवहार...
नहीँ उठती दारुण व्यथा हृदयमें,
बँधते हैँ प्राणोँ से तब प्राण !
कौन देता नाम शिशु को ?
कौन भरता सौरभ भँडार ?
कौन सीखलाता रीत जगत की ?
कौन पढाता, दुर्गम ये पाठ ?
माता और, पिता दोनोँ हैँ,
एक यान के दो आधार,
जिससे चलता रहता है,
जीवन का ये कारोबार !
सभी व्यवस्था पूर्ण रही तो,
स्वर्ग ना होगा क्या सँसार ?
ये धरती है इँसानोँ की,
नहीँ दिव्य, सारे उपचार!
एक दिया,सौ दीप जलाये,
प्रण लो, करो,आज,पुकार!
बदलेँगेँ हम, बदलेगा जग,
नहीँ रहेँगे, हम लाचार!
कोरी बातोँ से नहीँ सजेगा,
ये अपने सपनोँका सँसार!
तो चलिये ...
फिर एक बार, रोहित दवे और मिसिज़ शालिनी दवे की दुनिया की ओर चलेँ..

रोहित ने शालिनी से देर -सबेर शादी की, पर मानोँ , दुनिया के सारे आनँद एक साथ अपनी नन्ही सी, सिमटी -सी, उनकी प्यार के दायरे मेँ उलझी , उलझी -सी दुनिया मेँ समेटने की होड लगा दी थी उसने -- सारी दुनिया की खुशी एक तरफ रह गयी और रोहित , शालिनी की खुशीयोँ का पलडा,सब से भारी हो चला था..
..
प्रकाश और राजश्री, ई -मेल से, अपने दोस्त, रोहित के, सतत, सँपर्क मेँ, रहने लगे थे.शालिनी भी खुश रहने लगी थी. वे दोनोँ डावोस शहर, स्वीटज़रलैन्ड "गणमान्य" , कोदोबारा ऐवोर्ड मिला था ,उसे लेने, साथ साथ गये थे और वहाँ आल्प्स पर्वत शृँखला के कईदर्शनीय स्थलोँ की सैर कर आये. उनके ई -पत्र मेँ भी, सुखद यात्रा विवरण उनकी खुशीयों की तरहछलका बिखरा,झलक रहा था ! राजश्री सबसे ज्यादह प्रसन्न थी !
बार बार कहती ," देखा !मैँ न कहती थी कि शालू ही रोहित के लिये बिलकुल सही है ! पर अफसोस ! हमारी बात , मानता ही कौन है ? "
तो प्रकाश हँस कर कह देता, " मैँ ने सारी बातेँ मानीँ हैँ आपकी, महारानी साहिबा ! पर हम तो अब भी, आपकी कृपा के पात्र नहीँ बने ! "
"अरे, जाओ जाओ ...आप जैसा झूठोँ का सरदार और कोयी नहीँ ! " कहकर राजश्री भी मुस्कुराने लगती -
-फिर, रोहित ने फोन किया और बहुत आग्रह करके कहा कि, " आप दोनोँ यहाँ हमारे मेहमान बन कर आइये - "
रोहित ने अपने वृध्ध माता, पिता, दीदी डा. प्रियँका, का पूरा परिवार, सभी को अपने नये घर के उद्`घाटन के अवसर पर न्योता भेजा था और सभी की हवाई यात्रा के टीकट भी साथ भेजे थे ..सो उनके परिवार के इस खुशी के मौके पर, रोहित, राजश्री और परिवार को भी स -परिवार आमँत्रित कर रहा था -
- प्रकाशने आभार प्रकट करते हुए कहा, " इस बार नहीँ आ पायेँगे हम लोग ..पर हमारा आना उधार रहा ! जल्दी ही आयेँगे और तुमसे मिलेँगे भी -- "
उसके बाद कुछ माह बीते ही नहीँ थे कि फिर रोहित का फोन आ गया - कहने लगा," मैँ और शालिनी, अटलान्टिक महासागर मेँ, वैभवशाली सुविधा से सजी [Cruise ]- "क्रूज़ "की यात्रा पे जाने का प्लान बना रहे हैँ -- आप लोग भी आ जाइये हमारे साथ - -- इन्फोसीस के नारायण मूर्ति जी भी साथ होँगेँ -- हम साथ साथ समय बीतायेँगे -- बडा मज़ा आयेगा -- आ जाओ -- "
इस बार भी प्रकाश को मनाही करनी पडी -- अरे ! रोहित उदारह्रदय से बुला रहा था पर ऐसे दोस्त के पैसे से घूमने जाना क्या ठीक होता है ? नहीँ जी ..
उसने राजश्री से कहा, " हम भी जायेँगे ..पर इस साल मुझे काम बहुत है, अभी तो छुट्टी नहीँ ले सकुँगा -- "
फिर सुना शालिनी और रोहित पूरे १ महीने तक क्रूज़ लेकर, बहामा, कैरेबीयन, वर्जीन आइलैन्ड, वेस्ट इन्डीज़ के छोटे छोटे द्वीपोँ की सैर करते रहे ~
~मानोँ पीछले कुछ सालोँ के कडुवे अनुभवो को , मन से निकालने का भरसक प्रयास जारी था
-- शालिनी के मृदु व्यवहार से रोहित रीना के साथ गुजारे ३ वर्षोँ के कटु अनुभव मानोँ भूलने की प्रक्रिया मेँ व्यस्त था .
उनकी खुशी और जीवने के बारे मेँ सुनकर प्रकाश ,
राजश्री भी बहोत खुश रहने लगे थे -
- झवर भाई सा , वसुँधरा दीदी इत्यादी से भी, हर हफ्ते, उनकी बातेँ होने लगीँ थीँ, सभी यही कहते,चलो, देर आये दुरुस्त आये ! खुश रहेँ दोनोँ , और क्या !
2 साल बाद:
एक रात शालू का फोन आया ................
क्रमश: ~~