Saturday, April 19, 2008

सूनी साँझ ...कुछ यूं बिताई हमने ......[ Flashback ]

http://www.youtube.com/watch?v=eQXXOQc1nFk

सूनी साँझ ...कुछ यूं बिताई हमने ...... [ Flashback ]

गौरी कुंड से कुछ मिटटी लेकर हाथों में ,
एक अकेली साँझ को , सोच रहीं माँ पारबती ,
" कब आयेंगे घर , मेरे , शिव ~ सुंदर ? "
केशर मिश्रित उबटन लेकर हाथों में तब, खूब उसे मल मल कर
उतारा फ़िर अपने अंग से खेल - खेल में॥
बना दी आकृति एक बालक की और हलके से ,
फूंक दिए प्राण अपनी सांसों के ....और कहा ,
" ऊ हो ... ये मेरा पुत्र , विनायक है ! "
सूनी साँझ कहाँ फ़िर रहती सूनी सूनी ?
हुआ आगमन , श्री गणेश का जग में !
पारबती के प्यारे पुत्र तब आए जग में !
शिवजी लौट रहे थे छोड़ कैलाश और तपस्या
द्वार के पहरेदार बन खड़े हो गए बाल गणेश ,
माता के बन के रक्षक !
" फ़िर आगे क्या हुआ माँ ? कहो न ..."।
पूछने लगी बिटिया मेरी , मुझसे !
एक सूनी साँझ के समय , सुन रही थी वह,
मुझसे यह कथा पुरानी और मैं , उसे करती जा रही थी तैयार ~
रात्रि - भोज के पहले , ये भी करना था !
बस , अब , आते ही होंगें , मेहमान !

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-- लावण्या

Thursday, April 17, 2008

चीर हरण की पूर्व भूमिका ~


द्वारिका में सांझ हुई थी ! कृष्ण , झूल रहे, झूले पे ,
हाथ , सरोता लिए रुका था - मन , राधा में , लीन हुआ था !
वृन्दावन की कुञ्ज गलिन में , यमुना तट पे , मौन खड़ा था !अन्यमनस्क , मन के तारों से , तभी , एक स्वर

हो गया झंकृत ! दबी हुई सिसकी थी क्या वह ?

आह ! लहू की बूँद , उभरी , कटी , अंगुली , वन - मालिन की !
सुभद्रा , रुक्मिणी , भामा , दौडीं , ये क्या हो गया !
द्रौपदी , निकट खड़ी चकित थीं !
सहसा , फाड़ दिया आँचल पट , बाँध दिया घाव कृष्णा ने झट पट ( द्रौपदी का , दूसरा नाम , " कृष्णा " है )
-द्वारिका धीश तब सहज मुस्काये -
" पाँचाली ! यह प्रीत तुम्हारी ! मैं , ऋणी, तुम्हारे बन्धन का ! "
यह नौ सो निन्यानबे धागे , बने चीर पंचाली के , आगे ,
हस्तिनापुर की राज्य - सभा में ,
द्रौपदी की लज्जा के पहरेदार बने !

कहते हैं श्री हरी सदा :
" पत्रं पुष्पं फलं , तोयम , माय भक्त्या प्रयाच्चाती इअदहम भक्त्य्पर्हत्म्श्नामी प्रयात्मनाह ": ई २६ ई
"यात्कारोशी यद्शानासी यज्जुहोशी दादासी यात इयात्त्पस्यासी कौंतैये ! तत्कुरुश्व मदर्पनाम " ई २७ ई
( Meaning of the above Sanskrit shloka फ्रॉम
Shrimad Bhagvad Geeta )
" जो भी मुझे प्रेम से देता , फूल , पर्ण याकि फल - जल ,
मैं , उसे , स्वीकारता हूँ !
जो भी तुम भोगते या दे देते ,याकि, जप तप , करते ,
मुझ को वह तर्पण मिलता है ! "
[ यह भगवत गीता का अमर सन्देश और सार है !
]

Wednesday, April 16, 2008

हिंदी से है तुम्हें प्यार ? ~~ 'अमेरिका की धरती से'

श्री अनूप व श्रीमती रजनी भार्गव
श्रीमती रेणू राजवंशी गुप्ता
साथ मुस्कुराते हुए युवा कवि श्री अभिनव शुक्ला

प्रस्तुत है -" सृजनगाथा " के पाठकों के लिए

http://www.srijangatha.com/2008-09/april/usa%20ki%20dharti%20se%20-%20lshahji.htm

'अमेरिका की धरती से' नामक कॉलम - संपादक

आजकल "ब्लॉग लेखन" एक स्वतंत्र तथा सशक्त विधा के रूप में मीडिया के केन्द्र में छाया हुआ है। इसमें पत्रिकाओं, समाचार पत्र, पुस्तक, घटनाक्रमों पर निजी विचारों आदि को सम्मिलित कर सकते हैं । ब्लॉगों की उपस्थिति से विश्व-स्तर पर जो कुछ घटता है उसे तुरंत जाना जा सकता है । श्रवण पर विश्वास करने वाले यूट्यूब देखते हैं । यूट्यूब की बात छिड़ी है तो आइये देखिये कवि श्री गोपाल दास नीरज जी को काव्य-पाठ करते हुए । ऐसा कौन होगा जो नीरज को गुनगुनाते हुए इधर से झट से न जाना चाहेगा !

एक अमेरिकन डायरी और .....
"ब्लॉग लेखन" क्या है ? ये शायद आप भली भांति जानते होंगें । अमरीका से लिखा जा रहा यह ब्लॉग है -

"अमेरिकन डायरी" । अमेरिकन डायरी को रचती हैं रजनी भार्गव । यह अमेरिका की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से कुछ खट्टी, कुछ मीठी, कुछ तीखी अनुभूतियों का पुलिन्दा है ।

घर बैठे अमेरिका जीवन, मौसम और भी बहुत कुछ का रोचक जानकारियों के लिए यह एक नयी शुरूआत है ।
रेणू
होने का मतलब
भारत से दूर बसे प्रवासियों ने हिन्दी साहित्य के प्रति अपनी श्रद्धा को सदा रेखांकित किया है । अपने संस्कारों से गद्य व पद्य में उसे स्वर दिया है । चलिए, आज ऐसी ही एक कवियत्री तथा लेखिका श्रीमती रेणू राजवंशी गुप्ता जी से आपकी मुलाक़ात करवाते हैं .


श्रीमती रेणू राजवंशी गुप्ता हिन्दी साहित्य जगत् की सक्षम लेखिका, कवियत्री होने के साथ साथ, भारतीय संस्कृति तथा हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार के लिए भी अथक परिश्रम करतीं हैं। उन्होंने घर पर ही, छोटे बच्चों के लिये हिन्दी शिक्षा केन्द्र खोल रखा है जहाँ अन्य महिलाएँ भी आ कर इस महत्वपूर्ण यज्ञ में हाथ बटाती हैं । उनकी कविता की पुस्तक है - प्रवासी स्वर । "कौन कितना निकट" तथा "जीवन लीला" दो कहानी संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं । अंजना संधीर द्वारा संपादित काव्य-कृति प्रवासिनी के बोल में रेणू जी की ४ कवितायें समादृत हैं । ज्ञातव्य हो कि यह संग्रह अमेरिका में महिला साहित्यकारों की कविताओं का चर्चित संग्रह भी है ।

रेणू जी मूलतः कोटा राजस्थान की हैं । एमए. अंग्रेज़ी, बी. ए. संस्कृत ओनर्स से करने के बाद उन्होंने अनेक वर्षों तक कम्प्यूटर साइंस का अध्यापन किया । बड़े और व्यस्ततम् व्यवसाय से जुड़े रहने पर भी वे अपने आवास पर कवि गोष्ठियों, साहित्यिक विमर्शों का आयोजन करती रहती हैं । कई बार हम सोचते हैं कि अमेरिका जैसे तेज़ गति वाले समाज में ऐसे कैसे संभव हो सकता है पर सच तो यह है कि रेणू जी जैसे लगनशील रचनाकार अपने लेखन और स्वाध्याय से आंतरिक जीवन को गतिशील बनाए रखते हैं यहीं से जीवन मूल्यों की खोज भी शुरू होती है । यही खोज मनुष्य को जीवन शक्ति से लबरेज़ कर देता है । यही तो कहना है रेणू जी का ।

अप्रैल में भारत से ३ कवि अमरीका पधार रहे हैं । और रेणू जी इस कार्यक्रम की तैयारियों में अभी से जुट गयीं हैं । इसी सिलसिले में उन्होंने मुझे पिछले दिनों फ़ोन किया । रात्रि भोज का आमंत्रण भी । श्री हरी बाबू बिन्दल भी पहले से विराजमान थे । हरी बाबू, कुछ अर्सा पहले लम्बी बीमारी से उबर कर भारत से फ़िर अमरीका आये थे । चेहरे में थकान साफ़-साफ़ पढ़ी जा सकती थी फिर भी उन्होंने अपनी ३ कवितायें तन्मयता के साथ सुनायीं । बिंदल जी से यह भी सुखद ख़बर मिली कि उनके समधी यानी जिंदल साह'ब हमारे शहर (सीन्सीनाटी)के हिंदू मन्दिर के लिए १०० एकड की ज़मीन की व्यवस्था में किस तरह सफलता अर्जित कर चुके हैं । भारतीय समाज के लोग इस मंदिर के लिए पर्याप्त जगह ख़रीदना चाहते थे । जिंदल साब उसे प्राप्त करने के लिए कितनी कठिन परिस्थितियों से गुज़रे थे जिनके बारे में, उन्होंने हमें विस्तार से बताया । यह समधी की संघर्षगाथा मात्र नहीं भारतीयों के स्वप्नों की फलीभूत होने की विजयगाथा भी थी । कुल मिलाकार संध्या बहुत रोचक रही ।

कविता में नारी, नारी में कविता
बात ही बात में कविता और नारी पर चर्चा होने लगी । रेणू जी का कहना था - "नारी समाज का अलंकार है । कविता साहित्य का अलंकार है। दोनों ही सौन्दर्य, लालित्य, लावण्य, रस और मर्यादा के बिम्ब हैं। कवि, मनीषियों ने कविताओं में नारी चरित्र के विभिन्न पक्षों को उभारा है। नारी कविता की शुरू से ही कथानक रही है। एक उर्दू शायर ने ग़ज़ल और कविता में अंतर करते हुए कहा है कि - "ग़ज़ल में प्रूष बोलता है और कविता में नारी बोलती है" तो, नारी कविता से अछूती कैसे रह सकती है ?

कवियत्रियों की समृद्ध परंपरा है हमारी भाषा में । भाषा का चमत्कार ही कहिए कि उसने नारी को काव्य के क्षेत्र में भी आदि को अग्रेषित किया है । वैदिक काल की गार्गी, मैत्रेयी से लेकर भक्ति काल की मीरा बाई तक और कविता के स्वर्णयुग की महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर आधुनिक युगकी अनेक कवियित्रियों ने साहित्य जगत् को मनोरम बनाया है । नारी ने कविता के माध्यम से एक ओर अपने परिवेश के संघर्ष, विसंगतियों और सामाजिक बंधनों को बखूबी समाज के सामने रखा है तो दूसरी और श्रृंगार, ममता, वात्सल्य, करुणा, वीरता और सहनशीलता आदि भावों को शाश्वत माना है ।
हिंदी से है तुम्हें प्यार ?
चलते-चलते रेणू जी की कुछ काव्य-पंक्तियाँ जिसमें वे इसी भाव को विन्यस्त करती हैं -
यदि हिन्दी से है तुम्हें प्यार,
तो हेल्लो की जगह करो, हाथ जोड़ कर नमस्कार !
जाओ किसी दर्शनीय स्थल,
सर्वभाषाओं के मध्य खोजना हिन्दी का नाम,
न हो तो, अवश्य करना अधिकारियों से दरकार
ख़रीदना हो कोई भारतीय साज़-सामान,
ढूँढना हिन्दी में लेबल हिन्दी में नाम,
रखना दूकानदार के सामने अपने विचार,
यदि हिन्दी से है तुम्हें प्यार,

जो हिन्दी की रोटी खाते,
हिन्दी के प्रयोग से कतराते,
हिन्दी फ़िल्मों में करोड़ों कमाते,
हिन्दी बोलने में शर्माते,
एसे लोगों के विरूद्द खोलना है हमें अभियानद्वार
यदि हिन्दी से है तुम्हें प्यार !

रेणू जी का पता है -


रेणू "राजवंशी " गुप्ता,


६०७० एग्लेट ड्राइव, वेस्ट चेस्टर, ओहायो


४५०६९ यू. एस ए.
-- लावण्या

Tuesday, April 15, 2008

सर रिचर्ड ऐतेन्बरो - Amazing Rare things

http://www.royalcollection.org.uk/microsites/amazingrarethings/

The Queen's Gallery, Buckingham Palace, London -

१४ मार्च - २८ सेप्टेम्बर २००८

१५ वीं सदी से १८ वीं तक कुदरत से लिए गए विविध जीव, इस , प्रदर्शनी में शामिल किए गए हैं। ब्रिटिश निर्माता , निर्देशक सर रिचर्ड ऐटेन्बरो , इस प्रदर्शनी के बारे में, आप को काफी बातें , बतालातें हैं ।

अफ्रीका, एशिया तथा अमरीकी भूखंडों में पाये जाने वाले नये जीवों को सचित्र

क्रमबध्ध संजोने का महत्त्वपूर्ण कार्य ५ कालाकारों ने बखूबी किया है -

जिनके नाम हैं -

Leonardo da Vinci,

the collector Cassiano dal Pozzo,

Wenceslaus Hollar,

Alexander Marshal,

Maria Sibylla Merian एंड

Mark Catesby

http://www.royalcollection.org.uk/microsites/amazingrarethings/discovery.asp

http://www.royalcollection.org.uk/default.asp?action=article&ID=३२२

बकीन्घम पेलेस http://www।royalcollection.org.uk/default.asp?action=article&ID=30

Monday, April 14, 2008

" न हम होगे " न तुम होगे "

ROME (AFP) - A pair of 6,000-year-old skeletons found by Italian archaeologists in a dying embrace will not be separated, team leader Elena Menotti has told AFP."We will do everything possible to preserve the bodies in the exact position of their grave,""There's no question of breaking their embrace."The skeletons were found last week during digging in an industrial zone near the northern city of Mantua and the find will be displayed at the city's archaeological museum.While scientists are still puzzling over how the pair died and why they were buried in this way, Menotti said their embrace was "testimony to a great feeling of love that has transcended time."For regardless of why they were buried in each other's arms, there had to have been feelings between them."

एक समाचार ने 'मुहब्बत " लफ्ज़ पर फिर एक बार सारा ध्यान केँद्रीत कर दीया !

-क्या कुछ नहीँ लिखा या कहा गया है इस एक शब्द पर ! अरे ॥ ढाई आखर है ना "प्रेम " का ! "प्यार" का भी एक से ज्यादा ही पडता है गिनती मेँ हिसाब-पर " इश्क " किसी हिसाब से बँधा है कहीँ ?

ये सुना होगा , कि," हीज़ाबे मुहोब्बत, हम उसको थे कहते, ना वो बोलते थे , न हम बोलते थे "या फिर ये कि," मोहोब्बत की किस्मत बनाने से पहले, ज़माने के मालिक, तू रोया तो होगा "उफ्फ~क्या और कहेँ ????कल एक बेशकिमती तोहफा डाक से आया ! श्रीमान राधेक़ाँत दवे जी ने व श्रीमती कुसुम दवे जी ने एक सँगीत ओडीयो टेप भेजी

नाम था " हुस्न -ए - जाँ : ~

सँगीत निर्देशक हैँ मुज़फ्फर अली -गीतोँ को गा रहीँ थीँ छाया गाँगुली -१) " यारो मुझे मुआफ रखो" ( मीर )

२) खूनेज करिश्मा नाज़ सितम ( नज़ीर अकबराबादी )

३) जब फागुन रँग ( नज़ीर)

४) पिया ब्याज प्याला ( कुतुब शाह) *( छाया व इकबाल सिद्दीकी )

५) निठुरे निठुरे॥अँगना बुहारुँ पहन के कँगना * (ज़रीना बेगम )और अँत का गीत था

६) न तुम होँगेँ न हम होँगेँ ॥" ( नज़ीर) * ( रोली सरन और नवेद सिद्दीकी )

अँतिम गीत, बडी, सहजता से आरँभ हुआ ~

~शब्द / अलफाज़् यूँ घुल रहे थे मानोँ, ज़िन्दगी की हुबहु तस्वीर उभर रही हो !~माशूका कह रही थी कि, ' आज हँस कर बोसा ले लो, प्यार से गले मिलो, चुहल करने के लिये, लतीफे सुनने सुनाने के लिये, आज का वक्त है, तो,। ॥मुहब्बत से पेश आओ हम से आकर मिलो, फिर न जाने, क्या हो ?-

" न तुम होगे न हम होगे "

गीत कुछ इस तरह से दीलोदीमाग मेँ बसने लगा कि पता भी न चला कब आँखेँ नम हुईँ , न जाने कब दबी सिसकीयाँ रह रह कर, मन मसोस कर, गहरे, कहीँ धधकते ज्वालामुखी की तरह, रुह को झकझोर कर सँगीत के साथ साथ, एकाकार हो गईँ !

ये नज़ीर का कलाम था कि, सब कुछ ले डूबा !

मेरे जीवन के दाम्पत्य के क्षण, ३३ सालोँ का लँबा सफर, उससे पहले, १६ /१७ साल की आयु मेँ , अपने जीवन साथी से , पहली बार मिलना, उससे पहले, एक ही गुजराती स्कूल मेँ कक्षा १ से , उन्हेँ देखना, साथ साथ, बडे होना, बचपन की देहलीज को पार कर, वयस्क होना, फिर, परिवार के सभी से जान पहचान , एक दूसरे के घर पर , भोजन करना, गप्पे लडाना, शादी ब्याह, २ सँतानोँ के अभिभावक बनना ~पुत्री सौ. सिँदुर का ब्याह, फिर सोपान की मँगेतर मोनिका से मिलना और उनकी शादी .....

~ ज़िँदगी, पलक झपकाती, किसी, तिलस्मी दुनिया से उतरी 'नाज़्नीन परी सी , मुस्कुराती, शरारत से, आँखेँ मुँद कर, हल्के से,माथा चूमकर, कह रही है," बता मैँ कौन हूँ ?" -

- इतना ही दील से निकला,

" तू मेरी सहेली है....रुह की परछाईँ है " -

-- लावण्या





Tuesday, April 1, 2008

माँ


ॐ
माँ
यह दोनो कविता मुझे प्रिय है ! " माँ "
की ममतामयी लहर जब कविता के रूप मे बहती है तब आधुनिक काल हो या प्राचीन हिन्दी भाषा की अमृत गँगा , यूँ ही , प्रवाहित होती हुई , जन साधारण के ह्र्दय , को भावना के आवेग , मे बहा ले जाती है.
सूरदास जी कान्हा कि अद्भूत लीला का बखान कर रहे है --

http://www.anubhuti-hindi.org/1purane_ank/2004/07_01_04.htmlhttp://www.अनुभूति

क़ान्हा य़शोदा मैया से शिकायात करते है अपने बडे भैया की, शरारत की !
" मैया मोही दाऊ बहुत खिजायो ...
ग़ोरे नन्द जसोदा गोरी ,

तुम कत श्यामल गात , चुटकी दै दै हसत बाल सब सीख देत बलबीर !"
नयनो के सामने पूरा दृश्य उजागर है।

शरारती बालाक की मनोहारी छवि, ममता से लिपटी बोली, मधुर मधुर नुपूर की छनकती किँकिणी समान प्रतीत होती है।

मोहन के मुख को गुस्से से लाल हुआ देख माँ यशुमती , प्रेम - वश रीझ उठतीँ हैँ -- कहती है ,
" सुनहु कान्हा बलभद्र , जनमत ही को धूर्त ,

सुर श्याम मोहे गो - धन कि सौ , हौ माता तू , पुत ! "
अब जब् माँ ने कह दिया कि ,

" मै और तुम एक दूजे के हैँ .. तुम , मेरे बेटे हो ! अपने बदमाश बडे भाई कि बात ना सुनो " एक माँ ही ये ममता समझ सकती है।

मुझे इस छवि ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है।

प्राचीन हिन्दी भाषा, यही से , चलकर आज २१ वी सदी तक आ गई है।

परन्तु मा के प्रति प्रेम - वात्स्ल्य आज भी कुछ ऐसी ही रीत से कविता या दोहो मे कहा गया --

सरदार कल्याण सिन्घ के दोहे भी मर्म कि बात कह रहे है ---

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/mamtamayi/kalyankedohe.हतं

" बच्चे से पुछो जरा , सबसे अचछा कौन ?

उनगली उठे उधर जिधर , माँ , बैठी हो मौन !"
और उस से भी बडी बात इस राज कि बात बताते हुए लिखते ये कहना कि ---
" करना मा को खुश अगर , कहते लोग तमाम ,

रोशनआ अपने काम से, करो पिता का नाम !"
कितनी बडी सीख दे दी है यहा कल्याण जी ने --

- भारत की हर माँ , यही चाहती आयी है कि पाल पोस कर बालक को इस लायक बना दे कि वो बुलन्दीयो को छु ले - ऐसे काम करे , कि जिससे माँ के सुहाग कि लाली सूरज की रोशनी सी जगमागने लगे --

- सपूत हो तब माँ छाया बनी रहती है , दीपक कि बाती बन कर जलती खपती रहती है , अपनी ग्रुहस्थी मे व्यस्त रहती है, किसी अपेक्षा के बिना प्रयास करती है कि, वो आगामी पीढी को सक्षम बनाये --

आज हम जो यहा तक आये है उस के पीछे ऐसी , भारत की कितनी माताओ का परिश्रम , नीव मे पडे फौलाद और इस्पात कि सद्रश्य है।

इसलिये मुझे नयी प्रणाली , नयी पीढी के लिये लिखे गये ये दोहे बहुत प्रभावित कर गये ! है दोहे छोटे छोटे मगर बात समझो तो बडी बात कहते है -

आशा है कि आप सभी को इन से प्रेरणा व सम्बल मिलेगा जैसा मुझ को प्राप्त हुआ है.
भविष्य से आशा और भारतीया वांग्मय से, ममता का अमर - सन्देशा !
सूरदास जी व सरदार कल्याण सिन्घजी दोनो ही हमारे लिये सेतु रच गये है ....
. रास्ता आगे हमे चलते चलते पार करना है !
ईति शुभम

अनुभूति से :~~

http://www.anubhuti-hindi.org/1purane_ank/2004/07_01_04.htmlhttp://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/mamtamayi/kalyankedohe.htm

- लावण्या