Tuesday, May 13, 2008

मेरे महबूब -- H.S. रवैल संस्मरण

फ़िल्म निर्माण : कैमरा के आगे कलाकार और पीछे कार्यकर्ता --
ये गीत है मशहूर फ़िल्म " मेरे महबूब " का - हुस्ना और अनवर की प्रेम कहानी है ये , दोनों , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं और इनके मिलने में कितनी तकलीफें आतीं हैं ये इसकी कहानी है और मुस्लीम थीम पे बनी सफलतम फिल्मों में इस का शुमार किया जाता है -
और ये देखिये दिलीप कुमार और वैयजयन्तीमाला की फ़िल्म : संघर्ष
दोनों फिल्मों के निर्माता थे श्री हरनाम सिंग रवैल जी जिन्हें हिन्दी फ़िल्म संसार एच । एस । रवैल के नाम से पहचानता है ............
मेरी बचपन की यादों की गर्द में , रवैल अंकल और अंजना आंटी और उनकी बिटिया , रुही भी कहीं खो गए हैं । बस याद है जब् राज कपूर के देवनार फार्म वाले घर के खुले बाग़ में , अंजना आंटी जी ने एक बार 'ऋतू की शादी पे हीर गाते हुए सब को रुला दिया था ..बोल थे, " रख ले मेरी डोली नी माँ आज, रख ले मेरी डोली ...ना मैं लडियाँ , ना मैं बोली , रख ले मेरी डोली नी माँ .."
५ मई २००८ को उनका, बंबई शहर में , देहांत हो गया पर , ना जाने क्यूं , किसी ने उनको भावांजलि नही दी। :(
अखबार में कहीं ये ख़बर गायब हो गयी ...
ये दौर भावुकता का नही है।
१९६० में बनी " मेरे मेहबूब" आज भी मुस्लीम थीम पे बनी संगीतमय फ़िल्म में, नौशाद के जादुभारे , रेशमी गीतों से सजी अपनी अनोखी पहचान बनाए , वैसी ही दमक रही है और सदा दमकती रहेगी।
रवैल साहब का जन्म , लायलपुर पंजाब में हुआ था जहां से उनका संघर्षमय जीवन आरंभ हुआ। बीस बरस से कम उमर थी जब् वे बिना कोइ पैसा लिए मायानगरी मुम्बई आ गए अपनी तकदीर आजमाने !
पहले कहानी, पटकथा लेखन किया । "दोरंगिया डाकू " से १९४० में वे दिग्दर्शक बने । १९५० तक हास्य तथा मारधाड़ वाली फिल्में बनाईं । परंतु सफलता का सेहरा मुस्लीम सामाजिक कथा पे बनी "मेरे मेहबूब " से ही मिला।
इसमें श्री अशोक कुमार, निम्मी , राजेन्द्र कुमार और साधना ने सफल अभिनय किया। १९७१ में "मेहबूब की मेहंदी " भी उसी तरह की मुस्लीम थीम पे बनी जिसमें लीना चंदावरकर ने अभिनय किया और राजेश खन्ना ने साथ निभाया। जिसका ये गीत, लक्ष्मी कान्त प्यारेलाल की जोड़ी ने दिए संगीत से सजा , सदाबहार है और मुझे भी बहुत पसंद है -- सुनिए : ~~~
उस के बाद रवैल साहब ने मशहूर "लैला - मजनूँ " की दास्ताँ को परदे पे उतारा इस बार ऋषी कपूर और रंजीता कौर की जोड़ी को लेकर जिसका संगीत श्री मदन मोहन जी के दिए संगीत से शुरू हुआ --
उसी का ये गाना बहुत प्रसिध्ध हुआ -
" कोइ पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को " लता जी का गाया हुआ, जिस को लोगों ने सराहा पर , मदन मोहन जी का उसी अरसे , फ़िल्म की रीलीज़ के पहले देहांत हो गया और , जयदेव जी ने संगीत का रहा सहा काम पूरा किया।
उसके बाद " दीदारे यार " जीतेंद्र को लेकर बनायी , फ़िल्म ,
रवैल साहब के पुत्र राहुल रवैल की पेशकश थी ।
ये फ़िल्म बुरी तरह पीट गयी -
राहुल रवैल , की नाकामयाबी ने,
रवैल साहब की बरसों की मेहनत को पानी में मिला दिया ।
शायद "संघर्ष " १९६८ में बनी रवैल साहब की फ़िल्म जिसकी कथा बंगाल की प्रख्यात novel लेखिका श्री महाश्वेता देवी , ने लिखी थी और "संघर्ष " की कहानी १९ वीं सदी में, भारत में , प्रचलित , ठगों पे आधारित थी जिसमें काफी घुमाव थे drama और पात्र थे मंजे हुए कलाकार जयंत , बलराज सहनी , संजीव कुमार , दिलीप कुमार और वैयजयन्तीमाला।
राहुल रवैल ने अपने प्रख्यात पिताजी को श्र्ध्धांजलि देते हुए एक और प्रयास किया "जीवन एक संघर्ष " फ़िल्म बनाकर १९९० में ।
"मेरे मेहबूब " और "संघर्ष " दोनों ही देवदास तथा " ब्लैक " जैसी सफल फिल्मों के निर्माता , निर्देशक श्री संजय लीला भंसाली की सबसे पसंदीदा फिल्मों में से २ हैं --
वे कहते हैं के , " एक फ़िल्म निर्माता को आवश्यक है के वो ख़ुद को तथा अपने दर्शकों को हमेशा नयी चीज़ दीखालाये "
सुमधुर सँगीत से सजी इतनी सारी सफल फिलोँ के निर्माता निर्देसक रवैल साहब को , अँकल जी को मेरी विनम्र श्रध्धान्जलि -
-- लावण्या

सुनी सुनाई कहानियां

श्री राम व सीता बन मेँ : श्री राम का कैकेयी माँ से मिलन , बड़ा करुण प्रसंग है -- रामायण कथा का ! हर्ष और विषाद दोनों जब् संग - संग चलते हैं तब करुना की पराकाष्ठा हो जाती है । उसीके सन्दर्भ में , आगे की कथा भी याद आ रही है की , बिल्कुल आख़िर में श्री राम , कौशल्या माँ के कक्ष में आए । माँ ने १४ बरसों का लाड अपने सरल , सीधे , सच्चे , एक मात्र , पुत्र , राम पर निछावर कर दिया ---माता कौशल्या , राम जी का हाथ पकड़ कर , उर्मिलाजी के भवन की और ले चली ........लक्ष्मनजी, माता सुमित्राजी के संग थे .......उर्मिलाजी , मौन - थीं ......

उनके कमरे की दीवारों पर हलके से धब्बे देख कर ,

रामजी और सीताजी ने कौशल्याजी से पूछा ,

" ये क्या है माँ ? " तब , कौशल्या माँ ने कहा ,

" ये उर्मिला के सिर पटकने से , दीवारों पर दाग = धब्बे लग गए हैं ! क्योंकि वह अपना दुःख , किसीसे कहती ही थी -

माता कौशल्या का एक और प्रसंग सुना है की , अपने प्रिय पुत्र राम के वन - गमन के समय , माता कौशल्या , अयोध्या पुरी की , अश्वशाला भी , गयीं थी -- जब् उन्हें ये पता चला की , श्री राम के अश्व , भली भाँती उनका खाना , घास और चना इत्यादी नही खाते हैं ! और ये - राम के वियोग में , मूक पशु भी शोकाकुल हैं :-( और माँ कौश्लाया ने उन अश्वों को बहोत प्रेम से, सहलाया था और धीरज बंधाई थी की , " राम लौट आयेंगें , तुम भी उनकी प्रतीक्षा करो ! जैसे मैं करूंगी " -

ऐसे प्रसंग शायद रामायण में हों या नही , लोक - कथा वाली रामकथा हमारे लोक गीतों से जुड़ी , सदियों से , हमारी संस्कृति को मजबूत रखे हुए है --- और ऐसे प्रसंग सुन कर ही , श्री राम या श्री कृष्ण , हमारे लिए , पूजनीय ही नही , हमारे बहोत निकट आ कर हमारे अपने हो जाते हैं और हमारे ह्रदय में समां जाते हैं ----

I believe thisis the Genius of Indian thought !

सुनिये ये गीत :

केहू बन दिहले दोनु राजकुमार -

Yatra - Sucharita Gupta -

( In the context of the 14 years exile given to Ram and Lakshman according to Ramayana, the singer is asking Dashrath, how he could bring himself to do

http://www.beatofindia.com/mainpages/videos-all.htm -

-लावण्या

Sunday, May 11, 2008

२ रेडियो इंटरव्यू

दीदी और मैं और पापा
( 1 ) Remembering Pt Narendra Sharma: Bollywood's greatest Hindi poet : -
Hindi poet Pt Narendra Sharma fought for India's independence and then went to Mumbai to write some memorable songs like
'Jyoti Kalash Chalke' and 'Satyam Shivam Sundaram'।
Lata Mangeshkar revered him like her father।
In this interview, first broadcast on Cincinnati local radio, his daughter Lavanya Shah remembers her legendary father।
The All India Radio's entertainment channel was named by him as
'Vividh Bharati'।
To click here (Hindi)
( 2 ) Lata remembers Papa Pt Narendra Sharma In this remarkable interview legendry singer Lata Mangeshkar nostalgically talks about her early life and how Pt Narendra Sharma encouraged her in the days of her struggle। It was a special relationship। Lata called the great Hindi poet as Papa as she saw in him the image of her father। In this very informal interview with Pt Narendra Sharma's daughter Lavanya Shah Lata opens her heart। The interview was first broadcast at Radio Cincinnati's Indian programme Swaranjali। To Listen click here (Hindi)

Saturday, May 10, 2008

भारतीय धर्म, सँस्कार की खुशबु,आज विश्वव्यापी बन पाई है


को क्या कोइ सिर्फ़ एक दिन ही याद करता है ? या पिता को ? या गुरु को ? नहीं ..जी ।

ये तो, महज बहाना है वेस्टर्न सभ्यता का , अगर यहां ऐसे दिन ना रखते तब, व्यस्त , मशीनी जिन्दगी र हे लोग , शायद , इस एक दिन के लिए भी समय निकाल न पाते ..ऐसा भी नही लोग अपने माता , पिता को याद नही करते , करते भी हैं और जीवन की आपाधापी में समय अभाव में , या अन्य कारणों से व्यस्त हो जाते हैं ॥

आज, " माता ओं के ख़ास दिवस पर

" मेरी जन्मभूमि, मेरी , भारत माता को मेरे सलाम "

नरसिँह मेहता भी कह गये,

"गोळ विना सुनो कँसार्,

मात् विना सुनो सँसार

मात विना ते शो अवतार ? "

आपके आसपास की हर माँ को , अवश्य कहियेगा, " ओ माँ तुझे सलाम " !

http://www।indianera.com/slideshow/april/08041001/index.asp महात्मा गाँधी की जीवनी आज , भारत ही नही विदेश मेँ भी, हर किसी को प्रेरित करती है. न्यू योर्क शहर मेँ " टमारीन्ड कला दीर्घा " के सौजन्य से, गाँधी जी की विरासत क्या है उस से जुडे चित्रोँ की प्रदर्शनी लगायी गयी . जिस मेँ गाँधी बापू उपवास मेँ , दुर्बल अवस्था मेँ भी प्रसन्न मुद्रा मेँ लेटे हुए हैँ ये देखकर , दर्शकोँ के विस्मय ने तुरन्त गौरव व स्वाभिमान की भावना का स्थान ले लिया. कई भारतीय तथा विदेशी अतिथि गण गाँधी के प्रति श्रध्धा वचन कहते हुए अपने को धन्य महसूस कर रहे थे. ये देखेँ : ~~ http://www.indianera.com/slideshow/april/08041001/index.asp भारतीय धर्म, सँस्कार की खुशबु, हर प्राँत से निकलकर आज विश्वव्यापी बन पाई है जिसका आधार है भारतीयोँ का देशाटन तथा अपने सँस्कारोँ की धरोहर को हर भौगोलिक भूखँड पर बसते हुए भी, अपने देश से जो सौगात लेकर चले हैँ उस उद्दात परँपराओँ को सहेजे रखना ! कार्य क्षमता मेँ दक्ष भारतीय, चाहे युरोपीय देशोँ मेँ रहेँ या औस्ट्रेलिया, न्यूझीलैन्ड जैसे पूर्वीय छोर के द्वीपीय महाखँडोँ मेँ जा पहुँचे या कि, उत्तर अमरीका के कनाडा या अमरीका के ही क्योँ ना नागरीक बनेँ, हर परिस्थिती मेँ, भारतीय मूल के स्त्री व पुरुष, एक सफल कार्यकर्ता होने के साथ, आदर्श नागरीक तथाअपने मूल वतन भारत के प्रतिनिधि भी बन ही जाते हैँ. भारत के प्रति प्रेम, सदभाव, भारत के अतीत से जुडे सँस्कारोँ की विरासत को भी ये भारतीय जन अपने ह्र्दय से लगाये रखते हैँ . दोहरी भूमिका, दोहरा बोझ, अनेक विषम परिस्थितीयोँ मेँ भी हँसते हुए , द्रढ मनोबल से उठाये रखते हैँ और भारत के ज्वलँत प्रश्नोँ व समस्याओँ के प्रति भी सदा जागरुक रहते हैँ. जो धन कमाया उसका सद्` उपयोग भी कई प्रकार अपने नये अपनाये देश के अन्य नागरिकोँ के हित मेँ करते हुए, अपनी जिम्मेदारीयाँ उठाते हुए, भारत के करोडोँ भाई बहनो के लिये भी , अमरीका हो या इन्ग्लैँड या कि सिँगापोर या खाडी के अन्य मुल्क, वहाँ से हर भारत माँ का सच्चा सपूत या सुपुत्री भारत माँ के लिये अपने श्रम की बूँदोँ की कतरेँ , सेवा भाव से , चरण कमलोँ पर निछावर करती आयी है. ये देखेँ तेलेगु कौम का " सर्वधारी उगादी पर्व महोत्सव " : http://www.indianera.com/slideshow/april/08042102/index.asp तेलेगु भाई बहन उगादी मनाते हैँ तो गुजराती कौम सोत्साह स्वामीनारायण सँस्था से जुडकर , कच्छ के भूकँप की तबाही जैसे दारुण कुदरती हादसोँ के वक्त अपना श्रम दान्, धन दान करते नजर आते हैँ http://www.indianera.com/slideshow/april/08040501/index.asp ये चित्रमय लोकापर्ण है श्री बाल्मिकी प्रसाद सिँह की पुस्तक " बहुधा और " ९ / ११ के बाद " पुस्तक के बारे मेँ : और भारत से दूर रहते हुए भी अगली पीढी को होली के रँग भरे मस्ती के आनँद से भी इस तरह अवगत कराया गया देखिये लिन्क http://www.indianera.com/slideshow/08032405/index.asp

केरल से कई भारतीय खाडी मुल्कोँ मेँ काम करने जाते हैँ उनकी कार्य स्थिति के बारे मेँ बहारीन के श्रम मँत्री मजिद अल अलावी से परदेश मँत्री वायलार रवि जी ने (जो भारतीय कार्योँ से सँबँधित हैँ) उन्होँने, कई नये मुद्दोँ पर करार स्थापित किया -- करीब २८०, ००० भारतीय केरल से बहारीन मेँ काम कर रहे हैँ - व्यापार और वाणिज्य मँत्री कमल नाथ जी का तो ये कहना है कि अगर आफ्रीकी पिछडे और अकाल व युध्ध की दोहरी मार से व्यथित प्राँतोँ को अगर खाडी के देश , अरब गण राज्य और भारत मिलकर सहायता करते हैँ तब अफ्रीका मेँ राहत जो मिल सकती है और स्थिती पलट सकती है। ऐसी बातेँ सुनकर भविष्य के प्रति आशा बँधती है कि अगर विश्व अगर सचमुच एक ईकाई बनता जा रहा है और भूमँडलीकरण और वैश्वीकरण बाजार के साथ साथ विश्व बँधुत्व की भावना का प्रेणेता बनता जाये तब , २१ वीँ सदी मेँ, मनुष्य अनेक समस्याओँ के साथ जूझते हुए भी शायद , एक सँतोषकारक दिशा की ओर अग्रसर हो पायेगा। शायद मैँ आशावान हूँ, इसलिये, अनेक विडँबना और वर्जनाओँ के मध्य भी , आशा की हल्की किरण देखने की आदी हूँ ! चूँकि, सूरज वहीँ उस किरण के पीछे ही तो कुहासे से ढँका हुआ, एक नई सुबह का इँतज़ार कर रहा है! जहाँ से एक नया सुनहरा " मानव दिवस" अवश्य प्रकट होगा
-- लावण्या

Friday, May 9, 2008

ग्रीष्म की एक रात

रात उतर आयी गहरी कालिमा
साथ उमस लाई पीली नीलिमा
विवश थकान भरे तन मन मेरे,
अश्रु सुषुप्त मन बालू में
मन जगा , भागे अविरल चेतक सा -
नेत्र खींच ले पलक बिछोना,
हे मन, होंगें, ऐसे कितने प्राणी
बोझ लिए मंथन का !
हर तरफ़ ग्रीष्म जलन फ़ैली,
पीली तपन बिखरती,
गहरी सुनहरी, दिन भर ,
फ़िर, रात उतर आयी थकी बुझी ,
चाँद मुरझाया ,
गगन पे मैली सी चांदनी,
रात उतर आयी गहरी कालिमा
आज रात ...
-- लावण्या

Thursday, May 8, 2008

जीवंत प्रकृति



खिले कँवल से, लदे ताल पर,
मँडराता मधुकर~ मधु का लोभी.
गुँजित पुरवाई, बहती प्रतिक्षण
चपल लहर, हँस, सँग ~ सँग,
हो, ली !
एक बदलीने झुक कर पूछा,
"ओ, मधुकर, तू ,
गुनगुन क्या गाये?
"छपक छप -
मार कुलाँचे,मछलियाँ,
कँवल पत्र मेँ,
छिप छिप जायेँ !
"हँसा मधुप, रस का वो लोभी,
बोला,
" कर दो, छाया,बदली रानी !
मैँ भी छिप जाऊँ,
कँवल जाल मेँ,
प्यासे पर कर दो ये, मेहरबानी !"
" रे धूर्त भ्रमर,
तू,रस का लोभी --
फूल फूल मँडराता निस दिन,
माँग रहा क्योँ मुझसे , छाया ?
गरज रहे घन -
ना मैँ तेरी सहेली!"

टप, टप, बूँदोँ ने
बाग ताल, उपवन पर,
तृण पर, बन पर,
धरती के कण क़ण पर,
अमृत रस बरसाया -
निज कोष लुटाया !

अब लो, बरखा आई,
हरितमा छाई !
आज कँवल मेँ कैद
मकरँद की, सुन लो
प्रणय ~ पाश मेँ बँधकर,
हो गई, सगाई !!