Tuesday, October 4, 2016

माँ दुर्गा नौ शक्तियों का वर्णन /उत्तर अमरीका गणराज्य में भारतीय परंपराएं व त्यौहार

ॐ 
भारत विविधता में एकता समेटे हुए एक महादेश है।भारत के विशाल उपखंड पर अनेक त्यौहार एवं  उत्सव, भारत के प्रत्येक प्रांत में बसे हुए विभिन्न कौम के नागरिकों द्वारा अलग अलग तरीकों से मनाए जाते हैं। भारतीय मूल के लोग अब विश्व के सातों खण्डों में बस गए हैं।वे अपने संग भारतीय परंपराएं , तीज त्यौहार और धार्मिक अनुष्ठानों को भी दैनिक जीवन में खूब मन से सम्पूर्ण आयोजन कर , संपन्न करते हैं। 
        उत्तर अमरीका गणराज्य के ५० प्रांत हैं। इन प्रत्येक प्रान्त में  भारतीय मूल के लोग भारत से आकर बसे हुए हैं। 
गुजरात से अमरीका आकर बसी प्रजा गरबा , डांडिया के लोक नृत्यों का सामूहिक आयोजन कर माँ अम्बिका भवानी की आरती करते हुए श्रद्धा विगलित हुए , प्रसाद धरते हैं और पारंपरिक लोक गीतों को जो मध्यकालीन भारत में प्रत्येक गाँव और छूटे बड़े जनपदों में गाया जाता रहा है उन्हीं गीतों को अब अमरीका में भी सहर्ष , सोल्लास गाते हुए गोलाकार में प्राचीन लोक नृत्य करते हैं। हर्षित होते हैं। 
पंजाब से आये हुए भारतीय लोग नवरात्रि में माता का जगराता आयोजित करते हैं।माँ  को नई चुनरी चढ़ाई जाती है और अखंड भजन पाठ किया जाता है। कई श्रद्धालु ९ दिन उपवास रख कर फलाहार और उपवास के व्यंजन ही खाते हैं। उनकी श्रद्धा और आस्था में कोइ फर्क नहीं आया कि अब यह भारतीय भारत में नहीं रहते बल्कि वे अब अमरीकी नागरिक हो गए हैं ! वही जोश, वही परंपराएं और वही माहौल कायम है ! 
     बंगाल से आये लोग माँ दुर्गा की स्थापना करते हैं और बंगाल में प्रात: काल में जो बंगाली भद्र लोक  माँ दुर्गा की स्तुति सुना करते थे अब वे अमरीका में स्थानांतरित होकर भी यही स्तुति सुनते हैं। 
महादेवी नव रात्रि के पावन ९ दिनों में ९ स्वरूपों में पूजित हैं।जिनके नाम इस प्रकार हैं। 
१ ) शैलपुत्री : सती स्वरूप में शिव पत्नी और प्रजापति की कन्या सती योगाग्नि में भस्म हो गईं और पुनर्जन्म पर्बतराज  हिमालय की बेटी बनकर देवी का जन्म हुआ। शैल या पर्बत की पुत्री शैलपुत्री कहलाईं।उनके अन्य नाम भवानी, हेमावती, पार्वती, सती व परा प्रकृति है।ललाट पर अर्ध चंद्र , दाऐं हस्त में त्रिशूल व बाएं में कमल धरे नंदी बैल पर विराजमान देवी माँ 
मूलाधार चक्र कीअधिष्ठात्री देवी हैं। 

ध्यान

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥
पूर्णेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

कवच

ओमकार: में शिर: पातु मूलाधार निवासिनी।
ह्रींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥
श्रींकार पातु वदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।
फट्कार पात सर्वांंगे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥
शैलपुत्री देवी 
मूलाधार चक्र कीअधिष्ठात्री 
Shailaputri Sanghasri 2010 Arnab Dutta.JPG
माँ दुर्गा की नौ ९ शक्तियों का वर्णन २) दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है।
ब्रह्मचारिणी द्वितीय
ब्रह्मचारिणी देवी
 यहाँ ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रह्मचारिणी अर्थात तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल है।


ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गांं त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।
३) माँ दुर्गा की तृतीय शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। 
चंद्रघंटा तृतीय
देवी चंद्रघंटा
 नवरात्रि विग्रह के तीसरे दिन इन का पूजन किया जाता है। माँ का यह स्वरूप शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी लिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनका शरीर स्वर्ण के समान उज्ज्वल है, इनके दस हाथ हैं। दसों हाथों में खड्ग, बाण आदि शस्त्र सुशोभित रहते हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने वाली है। इनके घंटे की भयानक चडंध्वनि से दानव, अत्याचारी, दैत्य, राक्षस डरते रहते हैं।

ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

कवच

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥
४) माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है। कूष्माण्डा देवी
अपनी मन्द हंसी से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारंण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण से भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। जब सृष्टि नहीं थी और चारों ओर अंधकार ही अंधकार था तब इन्होंने ईषत हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। यह सृष्टि की आदिस्वरूपा हैं और आदिशक्ति भी। इनका निवाससूर्य मंडल के भीतर के लोक में है। सूर्यलोक में निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। 

ध्यान

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

कवच

हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिगिव्दिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजं सर्वदावत
५) पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। 
स्कन्दमाता पंचम
स्कन्दमाता देवी
इन्हें स्कन्द कुमार कार्तिकेय नाम से भी जाना जाता है। यह प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे 
ध्यान
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥
शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥
अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥
नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥
सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥
तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥
पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥

६) कात्यायनी षष्टम : 

६) कात्यायनी षष्टम
कात्यायनी देवी

ध्यान

ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।कवच

हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥
वाणंवपणमृते हुं फट्‌ बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥
शास्त्रों में कहा गया है कि इस चक्र में अवस्थित साधक के मन में समस्त बाह्य क्रियाओं और चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है और उसका ध्यान चैतन्य स्वरूप की ओर होता है, समस्त लौकिक, सांसारिक, मायाविक बन्धनों को त्याग कर वह पद्मासन माँ स्कन्दमाता के रूप में पूर्णतः समाहित होता है। साधक को मन को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।

ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

कवच

कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥

कालरात्रि सप्तम
कालरात्रि देवी
विवरणनवरात्र के सातवें दिन माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप 'कालरात्रि' की पूजा होती है।
स्वरूप वर्णनइनके शरीर का रंग काला, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जोब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं, जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं। इनका वाहन 'गर्दभ' (गधा) है। दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में खड्ग है।
पूजन समयचैत्र शुक्ल सप्तमी को प्रात: काल
धार्मिक मान्यताभगवती कालरात्रि का ध्यान, कवच, स्तोत्र का जाप करने से 'भानुचक्र' जागृत होता है। इनकी कृपा से अग्नि भय, आकाश भय, भूत पिशाच स्मरण मात्र से ही भाग जाते हैं।
संबंधित लेखकाली देवी
अन्य जानकारीइस दिन साधक का मन सहस्त्रारचक्र में अवस्थित होता है। साधक के लिए सभी सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है।
७) दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है। इनके शरीर का रंग घने अंधकार की भाँति काला है, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं, जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं। इनकी नासिका से श्वास, निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं। इनका वाहन 'गर्दभ' (गधा) है। दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में खड्ग है। माँ का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है किन्तु सदैव शुभ फलदायक है। 

ध्यान

करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

स्तोत्र पाठ

ह्रीं कालरात्रि श्रींं कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥
कामबीजजपान्दा कामबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं ह्रीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

कवच

ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥
८) महागौरी 

महागौरी देवी

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥

स्तोत्र पाठ

सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, हृदयो।
क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो॥
९ ) सिद्धिदात्री नवम
सिद्धिदात्री देवी
   
९) दुर्गा की नवम शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली माता इन्हीं को माना गया है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां होती हैं। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। इन्हीं की अनुकम्पा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वह संसार में अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। माता सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी नीचे वाली भुजा में चक्र, ऊपर वाली भुजा में गदा और बांयी तरफ नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्पहै। नवरात्रि पूजन के नवें दिन इनकी पूजा की जाती है। भगवती सिद्धिदात्री का ध्यान, स्तोत्र व कवच का पाठ करने से 'निर्वाण चक्र' जाग्रत हो जाता है।

ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥
परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

कवच

ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो।
हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥
महादेवी दुर्गा आश्विन माह की अमावस्या के बाद सप्तमी, अष्टमी और नवमी को अपने भक्तों के पास पृथ्वी पर आती हैं और दशमी को लौट जाती हैं।महालया से नवरात्रि का आरम्भ होता है और भक्तजन सप्तशती के पाठ का आरम्भ कर देवी महाशक्ति के प्राकट्य  व देवी के स्वागत  में सजग हो जाते हैं।
माँ  देवी सद्यः सृजन हैं।  सद्यः विनाश हैं। वे भीमकान्त हैं। वे परम सुन्दरी हैं। वे विकट -विकराल हैं। उनकी काया कान्त है, उनकी काया अस्थिमात्र है। वे भव्य हैं ,अभव्य हैं। वे वस्त्रवेष्टित सुमनोहरा हैं। वे मुक्तकेशी, रौद्रमुखी, महोदरी, अग्निज्वाला हैं। अमेयविक्रमा हैं।  क्रूर हैं, सिंहवाहिनी, सर्वमंत्रमयी हैं ,वे चामुंडा हैं , वाराही हैं, वे देवमाता हैं, सर्वविद्यामयी हैं, सर्वास्त्रधारिणी हैं, पुरुषाकृति हैं, वे असाध्य हैं साध्य हैं वे सर्वस्वरूपा हैं , सर्वेश हैं।
 दुर्गमच्छेदिनी,दुर्गतोद्धारिणी,
दुर्गमध्यानदा,दुर्गमा,दुर्गमार्गप्रदा,
दुर्गमोहादुर्गमांगी,दुर्गभीमा दुर्गा हैं।
जब महादैत्य ने भैसे का विकराल रूप धारण कर समस्त लोकों को विक्षोभित कर दिया तब देबी मधुपान करने लगीं। उनका चेहरा मदप्रभाव से लाल होगया, वाणी लडखडाने लगी और वे जोर -जोर से हँसती  हुई बोलीं-
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिवाम्यहम।
मया त्वयि हतेत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः।
ऐ मूढ! जबतक मैं मद्यपान कर रही हूँ ,तबतक क्षणभर तू गरज ले।यहीं मेरे हाथों तुम्हारे वध के पश्चात  देवता गर्जन करेंगे।
दुर्गा सप्तशती महातेजस स्थिति का विस्फूर्जन है।यह शब्दों की सीमा से पार का महानाद है।यह चित्तोत्कर्ष का चरम है । यह महानन्द का अविरल निनाद है ।
 ‘नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्यै नमोनमः’ की पुनः पुन: उच्चारणावृत्ति श्रोता को चरम भावदशा के लोक में प्रक्षेपित कर देती है।
वहाँ वाणी रूपादि से परे अनहद नाद बन जाती है। एक ऐसी गूँज बनकर भीतर प्रतिध्वनित होती है जो हमें जन्मजन्मान्तरों से जोड देती है।शरीर संवेग में परिणत होकर अनुभूति मात्र बन कर रह जाता है।
Durga by TARUNYAM


बीरेन्द्र कृष्ण भद्र महालया के शुभ प्रभात में आकाशवाणी कोलकाता से 'महिषासुर मर्दिनी' का प्रसारण होता रहा है । वीरेन्द्र कृष्ण भद्र जी की सावेश और आरोह - अवरोहपूर्ण वाणी में दुर्गासप्तशती का पाठ सुनना सही अर्थों में एक असाधारण और रोमांचक अनुभव है। 
सुदूर दक्षिण में बसे तमिलनाडु में  नवरात्रि  के नौ दिनों में  दुर्गा माँ की सहायता करने आये असंख्य देवी देवताओं का मानों जमघट लग जाता है जिसकी  झांकी ' गोलू - पूजा ' कहलाती है। गोलू पूजा में अपने घर के कक्ष में देवी देवताओं की मूर्तियों को सजाया जाता है। सजाते हैं और अतिथि गैन को चाय कॉफी नाश्ता जलपान करवाते हैं। आरती - प्रसाद नैवेद्य से ९ दिन माता दुर्गा की आराधना पूजा , व्रत किया जाता है। ७ सीढियां बनाई जातीं हैं जिन पर यह खिलौने सजाए जाते हैं।   खिलौनों की शोभा , आहा देखते ही बनती है। 
इस बार अमरीकी चुनावों की झांकी भी प्रदर्शित की गई ! देखें -- 
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Wednesday, September 28, 2016

वैश्विक कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा

 वैश्विक कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ~ 
 
श्री तेजेन्द्र शर्मा आधुनिक हिंदी साहित्य के सक्षम हस्ताक्षर हैं। वे लेखक तो हैं  ही किन्तु लन्दन निवासी होने के बावजूद, यूरोप  की भौगोलिक सीमा में बंधे हुए न रह कर, एक वैश्विक हिंदी कथाकार की हैसियत से पहचाने जाते हैं। 
     इंसान कहीं भी रहे, भावनाएं तो विश्व के हरेक देश में, मानव मन में, एक सी ही उभरतीं हैं। ऐसी मानवीय संवेदनाओं को अपने लेखन से उजागर करते हुए, तेजेन्द्र शर्मा जी ने  हिंदी साहित्य में, अपनी कथाओं द्वारा अपार ख्याति प्राप्त की है। आधुनिक हिंदी साहित्य के तेजेन्द्र जी, सशक्त शब्द शिल्पी हैं और इसी कारण उन की कहानियाँ जब जब लिखी गईं तब तब एक विशाल पाठक वर्ग ने उसे पढ़ा, सराहा और एक नए  सिरे से, बदलते हुए सामाजिक परिवेश को समझा। उर्दू, पंजाबी और नेपाली भाषी लेखकों ने, अपनी अपनी भाषाओं में तेजेन्द्र जी की कहानियों को अनुदित किया । 
      भारत के जगरांव ग्राम में सन १९५२, अक्टूबर की १२ तारीख  को तेजेन्द्र जी का जन्म, पंजाब प्रांत में हुआ था। शैशव के कुछ वर्ष बीते और परिवार शहर में रहने आ गया । 
     तेजेन्द्र जी ने  देहली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी विषय में एम. ए. किया और  कम्प्युटर विधा में डिप्लोमा भी लिया। अंग्रेज़ी, हिंदी पंजाबी, उर्दू और गुजराती भाषाओं के वे जानकार हैं। 
   भारत  से लन्दन तक की तेजेन्द्र भाई साहब की जीवन - यात्रा, किसी घुमावदार, अति मानवीय संघर्षों से भरी कहानी से कम नहीं। 
स्वयं उनहोंने कहा है , 
"  जगरांव से लुधियाना जाना,
    ग्रामद्रोह कहलायेगा
     लुधियाने से मुंबई में बसना
       नगरद्रोह बन जायेगा
    मुंबई से लंदन आने में
   सब का ढंग बदल जाता है
     पासपोर्ट का रंग बदल जाता है !" 
एक रचनाकार बनने से पहले तेजेन्द्र जी की बाल्यवस्था में परिवार का अनेकों बार तबादला हुआ था। नीड का निर्माण फिर फिर की सी प्रतीति  और पिता का क्रोधी किन्तु निडर और साहसी स्वभाव, माता का असीम स्नेह, भारतीय रिश्ते नातों की डोर से बंधा शैशव, परिवार से जुड़े  रिश्तों से मिला अपार स्नेह संबल, यह सभी एक बच्चे के मन को मानवीय संवेदनाओं के विविध स्पन्दनों से भरते रहे। 
                   जीवन के किसी मोड़ पर  मिला हरजीत दीदी का निर्मल स्नेह भी भविष्य के लेखक के जहन  में ऐसा बसा कि  कहीं न कहीं, किसी न किसी मोड़ पर, तेजेन्द्र शर्मा के लेखन द्वारा, विश्व में फैले हुए असंख्य पाठकों के मन को छु गया ! 
   अपनी युवावस्था में तेजेन्द्र  जी ने  भारतीय विमान सेवा में २२  वर्ष  गुजारे। उस वक्त  तेजेन्द्र जी को दुनियाभर के लोगों को नज़दीक से देखने समझने का मौका मिला। यह अनुभव, सुफेद बादलों पे उड़ते एरोप्लेन में भी तेजेन्द्र शर्मा के लेखक मन के मौन भावों को, कहानियों का आकार देने से ना चुके। अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में तेजेन्द्र जी कहते हैं , ' मेंरा मुख्य उद्देश्य है पाठक के साथ एक संवाद पैदा करना। जो मैं सोच रहा हूँ, वह पाठक तक पहुँचे, यह मेरा मुख्य उद्देश्य रहता है। ' 
                दिन गुजरते रहे परंतु नियति ने अब बड़ी कठिन परीक्षा ली ! उनके हँसते खेलते परिवार को यकायक सहमा दिया। तेजेन्द्र जी ,धर्मपत्नी इंदु जी, बिटिया दीप्ती और पुत्र मयंक सभी के जीवन में  दारुण, अत्यंत दुखद मोड़ आया! इंदु जी जानलेवा कैंसर से जूझ रहीं थीं। कैंसर सा असाध्य रोग और अपनी पत्नी का वह अंतिम समय, तेजेन्द्र जी न जाने कैसे झेल गए ! 
        इंदु जी के जाने के बाद, कथाकार के जीवन को सर्द  हवाओं ने आ घेरा और फिर ज़िन्दगी में तब्दीलीयां आईं। कहते हैं कि,
' तब्दीलीयां जब भी आती हैं ,मौसम  मे...
   किसी का यूं अचानक  चले जाना, 
    बरसों तलक , बहुत याद आता है ! ' 
उनकी धर्मपत्नी, सहचरी, रचनाकार की प्रेरणा शक्ति, जिसे अंग्रेज़ी में ' muse ' कहते हैं,  उनका चले जाना, असहय दुःख भी अब इस रचनाकार को सहना था। 
     तेजेन्द्र जी की आत्म स्वीकृति है कि हिंदी भाषा के प्रति एक लेखक की हैसियत से उन्हें रुझान बख्शनेवालीं, व्यक्ति , श्रीमती इंदु तेजेन्द्र शर्मा जी हीं थीं। कहानी लेखन की विधा के लिए तेजेन्द्र जी कहते हैं ' कहानी स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा है। ' इंसान की ज़िंदगानी भी तो वैसी ही होती है। 
          सौ. इंदु जी का इस तरह, असमय जीवन पथ पर छोड़ जाना और कैंसर दैत्य से विकट संघर्ष और  इंदु जी से बिछोह का दारुण दंश, कथाकार के मन के इंद्रधनुष को, विषाद के गहरे रंगों से बेध गया। कथाकार की कला, करुण रस  से बिंध कर और निखरती चली गई।
    तेजेन्द्र जी ने यही कहा ' एक कहानीकार के तौर पर मैं अपने आप को मूलतः हारे हुए व्यक्ति के साथ खड़ा पाता हूँ, जीतने वाले के साथ जश्न नहीं मना पाता।' 
        इस दौरान इंदु जी के संग २१ वर्ष का बंबई शहर सहवास और विश्व भ्रमण, जीवन के अनुभवों को परिपक्व करते रहे थे। ये सारे अनुभव  कथाकार  तेजेन्द्र शर्मा के रचनाकार मन को, नीजी संवेदनाओं को, विविध रंगों से तराशते रहे थे । 
       तेजेन्द्र जी की रचनाशीलता हिंदी सिनेमा, रेडियो, स्टेज जैसे संचार माध्यम द्वारा भी अभिव्यक्त हुई और  निरंतर प्रगति करती रही।इसी काण उनकी कहानियों के पात्र सजीव लगते हैं। उनके हाव भाव तक पाठक दृश्यों को पढ़ते वक्त, देख पाते हैं। अपनी कथा पढ़ने की सूझ बुझ तेजेन्द्र जी को विविध कला क्षेत्रों में दक्षता पूर्वक कार्य करने से ही बखूबी आती है।'  शांति '  नामक टीवी सीरियल में भी तेजेन्द्र जी के कार्य को खूब सराहा गया। 
       इंदु जी के जाने के बाद,  इंदु जी की स्मृति में, तेजेन्द्र जी ने ' इंदु कथा सम्मान ' की नींव बंबई में ही रखी। कालान्तर में जब तेजेन्द्र शर्मा जी लन्दन आकर बस गए तब ' इंदु कथा अंतरराष्ट्रीय सम्मान ' स्थानांतरित होकर अन्तरराष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार बना।   
तेजेन्द्र जी ने उस दौर के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा है, ' ११ दिसम्बर १९९८ को मैं लन्दन में बसने के लिए आया। उस समय मेरी आयु ४६ वर्ष थी। मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी। और न ही कोई बहुत बड़ा बैंक बैलेन्स था। मैं एअर इण्डिया की शाही नौकरी छोड़ कर आया था जहाँ अमरीकी डॉलर में पगार मिलती थी और भारतीय रुपये में खर्चा करता था। मुझे  अपने परिवार को पालना था। लन्दन शहर ने मुझे पहले बीबीसी में समाचार वाचक की नौकरी दी और फिर ब्रिटिश रेल में ड्राइवर की। यानि कि उस उम्र में मुझे नौकरी नहीं, नौकरियाँ मिलीं – और वो भी एकदम भिन्न क्षेत्रों में। ' 
            लन्दन रेलवे विभाग में कार्यरत तेजेन्द्र जी की कथाओं ने अब देस और परदेस को एक साथ समेट  लिया है। कहानीकार के  कथा शिल्प को अब व्यापक विस्तार मिला। 
          तेजेन्द्र जी की इस दौर की  कहानियाँ  मानव मन और सामाजिक उतार चढावों के तानों बानों से कसी हुईं, बुनी हुईं, सर्वकालिक हो गईं और इसी कारण से  तेजेन्द्र शर्मा जी की कहानियाँ, सार्वभौम विषय वस्तु के कारण, लन्दन तक सीमित न रह कर, भारत में बसे पाठकों को नवीन कथा विषय की इन कहानियों को पढ़ने के लिए उत्सुकता से बाध्य करतीं रहीं। आज तेजेन्द्र जी की कथाएं भारत में पाठ्यक्रम का हिस्सा बन चुकी हैं । 
       एक साक्षात्कार में बेबाकी से उत्तर देते हुए तेजेन्द्र जी कहते हैं कि  ' हम प्रगतिशील लोग धर्म के मामले में बहुत मॉडर्न हैं और परम्पराओं के विरुद्ध हैं। किन्तु जहाँ तक लेखन का सवाल है वही दकियानूसी रवैया रखते हैं। ' 
      ' काला सागर, ढिबरी टाइट, देह की क़ीमत, क़ब्र का मुनाफ़ा, तरकीब, पाप की सज़ा, मुझे मार डाल बेटा, एक बार फिर होली, पासपोर्ट का रंग, बेघर आँखें, कोख का किराया, टेलिफ़ोन लाइन/ जैसी कहानियाँ  लिखनेवाले तेजेन्द्र जी कहते हैं 
'  मैं शायद उन गिने चुने लेखकों में शामिल हूँ जिनके लेखन में आज का समाज जगह पाता है।'
             आधुनिक काल को अपने लेखन से विश्व के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करनेवाले रचनाकार को आधुनिक हिंदी साहित्य के सक्षम कथाकार तेजेन्द्र भाई को  मैं इसीलिए ' रैनेसान्स मेन ' या '' Renaissance Man ' या ' नवजागरण का कथाकार ' मानती हूँ। 
     आधुनिक इतिहास और मध्य युग को  जिस तरह यूरोप में रेनेसांस युग कहते हैं वह समय काल  १४ वीं से १७ वीं शताब्दी के दौरान  फैला हुआ है। यह कालखंड यूरोप में कई बदलाव लाया। इसी प्रकार भारतीय चेतना को वैश्विक फलक तक लाने का साहस तेजेन्द्र शर्मा जैसे रचनाकार, अपने लेखन द्वारा  आज के मध्य युगीन भारतेंदु युग के पश्चात के साहित्य को आधुनिक २१ वीं सदी के हिंदी साहित्य को जोड़ने का काम करते हुए मानों एक सेतु रच कर पूरा कर रहे हैं। 
        तेजेन्द्र जी के अभिप्राय,  ' कहानी ' और ' लेखक '  के लिए गौर तलब है।  वे कहते हैं कि, " कोई कहानी सच नहीं होती और कहानी से बड़ा सच कोई नहीं होता। एक कवि और कहानीकार के सच में भी अन्तर होता है। कवि का एक अपना सच होता है जो कि आवश्यक नहीं की शाश्वत सत्य ही हो। कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने भीतर का सत्य़ खोज सकता है।" 
' प्रतिबिम्ब ' तेजेन्द्र जी की लिखी हुई पहली कथा है। ' रेत का घरौंदा ' ईंटों का जंगल ' कड़ियाँ ' काला सागर, ' ढिबरी टाइट ' ,पासपोर्ट का रंग ' जिस पर कविता भी लिखे गई उसी से चाँद पंक्तियाँ 
 ' भावनाओं का समुद्र उछाल भरता है
   आइकैरेस सूरज के निकट हुआ जाता है
  पंख गलने में कितना समय लगेगा?
    धडाम! धरती की खुरदरी सतह
     लहु लुहान आकाश हो गया!
    रंग आकाश का कैसे जल जाता है?
     पासपोर्ट का रंग कैसे बदल जाता है? ' 
बेघर आँखें ' सीधी रेखा की परतें ', ' ये क्या हो गया ', '  कब्र का मुनाफ़ा ' ,' देह की कीमत ' , ' दीवार में रास्ता ' इत्यादी  अनेक कथाएं, आधुनिक युगबोध की कहानियां हैं। 
     इसी कारण तेजेन्द्र जी के भीतर का इंसान लेखक बना तो उन के जमीर ने यही कहा ' हारा हुआ आदमी भारत में है तो ब्रिटेन में भी है और अमरीका में भी है। जिस आदमी को सद्दाम ने दबा रखा था वो भी हारा हुआ आदमी था। जिस किसी की साथ अन्याय होता है – मेरा हारा हुआ आदमी वह है। और मैं बेझिझक उसके साथ सदा खड़ा रहूँगा। ' 
' ये घर तुम्हारा है ' तेजेन्द्र जी का  कविता ग़ज़ल संग्रह हैं जिसकी  शीर्ष कविता में तेजेन्द्र जी कहते हैं 
" नदी की धार बहे आगे,मुड क़े न देखे
न समझो इसको भंवर अब यही किनारा है " 
       तेजेन्द्र जी को उनके लेखन एवं सम्पादन के लिए एवं हिंदी सेवा के लिए असंख्य पुरस्कारो से नवाजा गया है। सुपथगा सम्मान-१९८७ में मिला। ढिबरी टाइट के लिये महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार-१९९५ प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों प्रदान किया गया। सहयोग फ़ाउंडेशन का युवा साहित्यकार पुरस्कार-१९९८ में दिया गया। यू.पी. हिन्दी संस्थान का प्रवासी भारतीय साहित्य भूषण सम्मान-२००३, प्रथम संकल्प साहित्य सम्मान- दिल्ली २००७ में प्राप्त हुआ। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा का डॉ॰ मोटूरि सत्यनारायण सम्मान-२०११ में और अंतरराष्ट्रीय स्पंदन कथा सम्मान २०१४ में मिला। 
    लन्दन में रहकर हिंदी रचनाकारों को अंतरराष्ट्र्रीय स्तर पर सम्मानित करती हुई  संस्था को हाऊस ऑफ लॉर्ड्ज़ ' में स्थापित करने का श्रेय श्री तेजेन्द्र जी का है। विश्व के विभिन्न देशों में बसे अन्य रचनाकारों को संस्था द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। हिंदी भाषा के प्रति यही सच्चा समर्पण है। 

कवि और लेखकों को लोगबाग कभी कभार याद कर लेते हैं बाकि अक्सर यही देखने में आता है कि रचनाकारों को साहित्य + लेखन के साथ जीवन में कड़ा संघर्ष ही अधिकतर झेलना पड़ता है। 
    एक पाठक, सौ मित्रों के समान होता है और जो लेखक की पुस्तक पढ़ने के बाद, उस पर कुछ कहे, वह तो लाखों में कोइ एक होता है। लेखक का हौसला बढ़ानेवाले की बात को मन में रखे हुए, लिखते रहना ही एक रचनाकार की वास्तविक नियति है।
      इस निष्कर्ष पर पहुंचकर अद्भुत कथाकार तेजेन्द्र जी से यही अपेक्षा रहेगी कि वे निरंतर सक्रीय रहें , लिखते रहें। अछूते विषयों पर, कलम चलातें  रहें और मानव संवेदनाओं से सभर कहानियां बुनते रहें जिस से भारत के लेखक और प्रवासी भारतीय लेखक के बीच का कृत्रिम  भेद मिट जाए और विश्व में कटुता और विभाजन की त्रासदी हारे ! जीत हो मानवता की और सच्चे मानवीय मूल्यों की और खेमों या विघटन कारी भावना की करारी हार हो ! अभी तेजेन्द्र शर्मा जी को बहुत कुछ लिखना शेष है और हमें, उनका लिखा हुआ पढ़ना ! मेरी सद्भावनाएँ रचनाकार तेजेन्द्र शर्मा जी के उज्जवल भविष्य के लिए प्रेषित करते हुए अतीव हर्ष हो रहा है। 
शुभमस्तु ! 
- श्रीमती लावण्या दीपक शाह 
 ओहायो प्रांत सीनसीनाटी शहर से 



Saturday, August 13, 2016

श्री मैथिली शरण गुप्त - अतित के चल चित्र "दद्दा का घर -- देल्ही १९६२ "

 दद्दा का घर -- देल्ही १९६२ " 


``सखि वे मुझसे कह कर जाते,
तो क्या वे मुझको अपनी पथ बाधा ही पाते।
नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते
पर इनसे जो आँसू बहते
सदय हृदय वे कैसे सहते?
जायँ सिद्धि पावें वे सुख से
दुखी न हों इस जन के दु:ख से
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
आज अधिक वे भाते।''
 --श्री मैथिली शरण गुप्त
अतित  के  चल  चित्र  : दद्दा  का  घर  -- देल्ही  १९६२ 
देल्ही  की  लू  भरी   गर्मियों  का   मौसम  था।  हम  लोग  बम्बई  से  २  महीनो  की  स्कूल  की  छुट्टियों  के  दौरान , पापाजी  के  पास  देहली  आये  हुए  थे  [ पापाजी से मेरा आशय है  मेरे  पिता  / स्वर्गीय  पं. नरेन्द्र  शर्मा  ]
 पापाजी  उस  समय  AIR के  चीफ़  प्रोडूसर  / डिरेक्टर  के  पद  पर  थे  और  उनका  देल्ही  रहना  आवश्यक  था।  भारत  सरकार  ने  उन्हें  बम्बई  से  देल्ही  बुलवा  लिया  था।  हम  लोग  बम्बई  में  जन्मे,  पले , बड़े  हुए  थे  और  नयी  दिल्ली  हमे सदा " पराई  नगरी  " ही  लगती  थी। हमारे मन में पापाजी  से  मिलने  का  उत्साह  तो  था  पर  दिल्ली   की  गर्मियों  के बारे में जितना सुन रखा था उसे अनुभव करने का समय सामने आ पहुंचा था और इस भयानक गर्मियों के मौसम ने हमें  मन ही मन परेशान  कर  रखा  था। इसी उहापोह को  मन में समाए,  हम  सब  आ  ही  पहुंचे  थे देल्ही !
दद्दा, श्री  मैथिलि शरण  गुप्त , उस समय राज्य  सभा  के  M.P. थे।  ठीक  राष्ट्र पति  भवन  के  चौराहे  को  पार  कर,  जो  पहला  मकान  पड़ता  था,  उसकी  पहली  मंजिल  पर, पूज्य दद्दा  को  एक  फ्लैट , भारत  सरकार  द्वारा, रहने  के  लिए  दिया  गया  था। दद्दा ,  गर्मी  की  छुट्टियों  के  संसदीय  सत्र  में, कुछ माह  के लिए , अपने  मूल  वतन , झांसी  जा  रहे  थे।  पर  जब  हम  [ मेरी  अम्मा , श्रीमती  सुशीला  नरेन शर्मा  और  हम  ४  भाई  , बहेन  ] ३  दिनों  के  लम्बे  प्रवास  के  बाद , देहरादून  एक्सप्रेस  [ जो  हर  स्टेशन  पर  रूक  रूक  कर , ३  दिनों  के  बाद  बम्बई  से  देल्ही  पहूँचती  थी  और  ' एक्सप्रेस '  कहलाने  के बिलकुल  लायक  नहीं  थी  ;-)) ] उस  से  यात्रा  पूरी  कर  के,  हम  लोग, मतलब, मैं , लावण्या, मुझसे  बड़ी  बहन  वासवी, छोटी  बांधवी  और  भाई  - परितोष  और  हमारी  अम्मा, श्रीमती  सुशीला  नरेन्द्र  शर्मा, ये  हम  सब , दद्दा  के  घर  पहुंचे। वहां  दद्दा  से  मिलते  ही, हम  सब  बच्चों  ने, उन्हें  पैर  छू  कर, विधिवत  प्रणाम  किया।  दद्दा  ने  हमारे झुके हुए सरों  पर अपने कांपते हुए  हाथ  रख  कर  आशीर्वाद  दिए। अम्मा  को  देख  प्रस्सन्न  हुए  और  कहा ,
" अच्छा  हुआ  बहु  तुम  आ  गयीं !  चौका  सम्हालो  और  देख  लो , मैंने  अनाज , आटा , दाल,  चावल  सभी  रखवा  दिया  है।  तुम  इसे  अपना  ही  घर  समझना  और  आनंद  पूर्वक  रहना।  मैं  लौट  आऊँगा  और  तुम  लोगों  से  मिलूंगा।  "
उस प्रथम साक्षात्कार के वक्त परम पूज्य दद्दा की  निश्छल  हंसी  आज  भी  मुझे  याद  है। मेरी  उमर , उस  वक़्त, करीब  ११  या  १२  वर्ष  की  होगी। 



दद्दा , खूब  लम्बे  थे। दुबले  पतले  भी  थे  और  गर्मियों  में  महीन  सूती  धोती 
 और  एक  सूती  " अंग -  वस्त्रम  " बिलकुल  गांधीजी  की  तरह  लपेटे  रहते थे।  

पूज्य दद्दा का स्वामीभक्त सेवक था, नाम था गिरधारी !  
 वही  उनकी  देख  भाल किया करता  था। बड़े  से  बड़ी  हस्ती  आ  जाये  या  कोई  सर्वथा  अपरिचित  या  कोई  नवागंतुक हो, सब को  एक सरीखा  नाश्ता  वह  एक  बड़ी  सी  थाली  पर  सजा  कर  दे  जाता  था। नाश्ते  में  हमेशा  यही  परोसा  जाता  था  ...१  छोटा  सा  लड्डू   , पुदीने   की  एकदम  हरी  चटनी  का  छोटा  सा  एक  बिंदु  और  पाव  टुकड़ा  [ १ / ४  ] ....मठडी  !! :-))
  
हमें देहली की गर्मी को दूर भगाने के लिए सीलींग पर लटका पंखा दिखा और हम बच्चों ने जैसे ही पंखे के स्वीच को ओन  किया तो पूजनीय दद्दा , कहने लगे  कि ' हमारी भारत  सरकार  बिजली  का  बिल  चुकाती  है  और  हमे बिजली का  सही  इस्तेमाल  करना  चाहिए  !  दुरूपयोग  नहीं  करना  चाहिए  ...और  वे , १  नंबर  पर  ही  पंखा  / फेन .... चलते  थे  और  पूरे  पसीने  से  भीग  जाते  थे  !! :-))
यह  उनका  बड़प्पन   भी  था  और  बच्चों  सी  निश्छल  मासूमियत  भी  थी शायद जो उन्हें ऐसे नियम और सिद्धांत पर अटल रखे हुए थी।  उनके  व्यक्त्तित्व  में  और  उनकी  सादगी में जो  भोलापन  था उसके आगे   हम  में  से  कोई  उनकी  कही  बात  का  प्रतिकार  नहीं  कर  पाया ! 
 हाँ  उनके  झाँसी  के  लिए  प्रस्थान  होने  के  बाद , फेन  / पंखा   खूब  तेजी  से  चलता  रहा  पर  हम लोग समझ गए कि देल्ही  की  गर्मी  के  सामने  वो  बेचारे  की  भी कोइ बिसात  न थी !! 
दद्दा  ने  वासवी  की  हस्ताक्षर  इकट्ठा  करनेवाली  एक  कॉपी  में  यह  पंक्तियाँ लिख  कर  वासवी को दीं थीं - यह पंक्तियाँ उसी समय दद्दा ने हस्ताक्षर करते हुए हमारे समक्ष रचीं थीं और यह पंक्तियाँ उनकी किसी अन्य रचना में नहीं हैं और  अप्रकशित  हैं ।  वासवी  जितने भी रचनाकारों से, कवियों से मिलती तब हर  कवि  से आग्रह किया करती थी की ' कृपया ,बिलकुल  नयी  रचना  को ही आप  मेरी  इस  हस्ताक्षर एकत्रित करनेवाली पुस्तक  में  लिख  दीजिए !
 जो पंक्तियाँ परम् पूज्य ददद्दा ने लिखीं वे भी  सुन लीजिए  ,
" अपना  जितना  काम आप  ही  जो  कोई  कर  लेगा  ,
पा  कर  उतनी  मुक्ति  आप  वह  औरों  को  भी  देगा  ! "
[ और  नीचे  हस्ताक्षर  किये , " -- मैथिलिशरण  गुप्त  " ]
          दद्दा  के  फ्लैट  के  पडौस  में  एक  अशोक  भाई  रहते  थे। वे  राष्ट्र पति  भवन  के   चीफ़  पेस्ट्री  ' शेफ  (' पाक शास्त्री ' ) थे  !! उनके  हाथों  से  तैयार  किये  गये , बहुत  बढ़िया  पुद्दिंग्स , कस्टर्ड , जेल्लो  , आईस क्रीम और केक  खाने का अवसर  भी  उसी  दौरान  हमे  मिला  था। आज वे, स्मृतियाँ मधुर  याद  बन कर मन में  रस  घोल रहीं हैं  !
 - लावण्या 
 
  

Wednesday, January 27, 2016

२१ वीं सदी में महिला लेखन , चुनौती और संभावनाएं

ॐ

' समय की धारा में बहते बहते
   हम आज यहां तक आये हैं 
   बीती सदियों के आँचल से 
   आशा के फूल,सजा लाये हैं
   हो मंगलमय प्रभात धरा पर
   मिटे कलह का कटु उन्माद ,
   वसुंधरा हो हरी - भरी, नित,
   चमके खुशहाली का प्रात ! '
मेरी कविता प्रत्येक मनुष्य के लिए शुभ कामना सन्देश स्वरूप है। स्वस्तिमय शब्द हों, उन्नत भविष्य हो, विश्व में शान्ति रहे इसी से समग्र मनुजता की विजय होगी। 
    स्त्री, समाज की आधी आबादी है। आधुनिक युग में स्त्री को एक ओर प्रगति के सोपान पर अग्रसर होने के सुअवसर मिले हैं तो साथ साथ अवरोधों के रोड़ों ने  स्त्रियों  के,  उठते कदम की कवायद को बार - बार स्तम्भित भी किया है। परन्तु स्त्री, युगों युगों से ऐसे प्रत्याघातों से लड़ती हुई, आज २१ वीं  सदी तक आ पहुँची  है। महिला लेखन भी स्त्री संघर्ष की लम्बी कहानी का एक हिस्सा है। महिला लेखन एकांतिक साधना है।  जिसकी  अटूट गाथा  इतिहास में दर्ज है। 

हम देखते हैं कि प्राचीन वेदों में प्रसिद्ध नारी पात्र , अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं। जिनमे अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी  रोमशा, इंद्राणी आदि सुप्रसिद्ध हैं |
      गुप्त कालीन, मौर्य एवं बुद्ध के युग  से चलकर मध्य युगीन नारी के सामाजिक एवं व्यक्तिगत स्वातंत्र्य पर नियंत्रण बढ़ता गया। साहित्य सृजन इस के उपरान्त भी थमा नहीं। दक्षिण भारत की अंड़ाल ने कृष्ण प्रेम की प्रेम धारा बहायी।  आज भी दक्षिण भारत में श्रद्धा - भक्ति से अंडाल की पदावली गायी  जातीं हैं। 
कश्मीर में भक्ति रस से सभर स्त्री लिखित कविता लल्लेश्वरी योगिनी ने गायीं हैं  जो अमर हो गयीं  ! 
मीरां बाई के पद आज  न सिर्फ राजस्थान के रहे किंतु वे विश्व साहित्य की अनमोल  धरोहर हैं। कर्नाटक की अक्का महादेवी , महाराष्ट्र की संत मुक्ता बाई और जनाबाई और बंगाल की शारदा देवी माँ ने अपने अपने व्यक्तित्त्व से, वाणी की गंगा से जन मन की मलिनता को धोया है। 
अंग्रेज़ों के राज्य विस्तार ने भारत का  स्त्री - स्वातंत्र्य, घर की चारदीवारी के बीच, कैद कर दिया था। भीषण मानवीय हानि , उथल पुथल और विस्थापन के बाद, भारी क्षति से पीड़ित  सं १९४७ में भारत स्वतंत्र हुआ। श्री और संपदा का असहय ह्रास हुआ। अक्सर  युद्ध काल में स्त्री को ही अधिक भुगतना पड़ता है। 
अतः उस पाकिस्तान हिंदुस्तान विभाजन का दर्द , महिला लेखन में अमृता प्रीतम जैसी पंजाब की बेटी ने आंसू पिरोकर लिखी अपनी रचनाओं में पेश किया। ' अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ ' कवयित्री अमृता प्रीतम (१९१९-२००५) द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कविता है जिसमे १९४७ के भारत विभाजन के समय हुए पंजाब के भयंकर हत्याकांडों का अत्यंत दुखद वर्णन है।
स्वतंत्र भारत की महिलाएं न सिर्फ अपनी पारंपारिक भाषाओं में रचनाएँ कर रहीं  हैं किन्तु प्रवासी महिला अपने आवासीय प्रदेशों से और अन्य महिलाएं अपने प्रादेशिक भाषा के लेखन से अपनी पहचान बना रहीं हैं। 
आधुनिक समय में , कुछ भारतीय लेखिकाएं, अंतर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर रहीं हैं।  जैसे अमरीका में झुम्पा लाहिड़ी ! इन्होंने  बुकर पुरस्कार प्राप्त किया।  
 या अरूंधती राव की तरह वामपंथी और अपने खुले विचारों से लिखीं पुस्तकों से ये विश्व में कुतूहल का विषय बनी हुईं हैं। महिला लेखन प्रत्येक रूप में यथा संभव  जारी है। 
मेरे विचार : प्रत्येक महिला का ह्रदय वात्स्ल्य  भाव का अजस्र सिंधु सागर है। विश्व के प्रति , समाज के लिए और परिवार की ज़िम्मेदारियों के संग अपने व्यक्तित्व को विभिन्न खाकों में बांटते हुए २१ वीं सदी के आरम्भ में स्त्रियां,  बहु - आयामी जीवन जी रहीं हैं। 

आज का समय,  सेल फोन, फेसबुक, ब्लॉग , ट्वीटर जैसे अत्याधुनिक उपकरणों से सजे संचार माद्यमों से संचालित मशीनी युग का कालखण्ड है। बाज़ारवाद के फैलते, विश्व में मुनाफ़ाखोरी में बढ़त हुई है  और उद्योगों की बहुलता से सामाजिक परिवर्तन को द्रुत गति मिली है जिससे मानव जीवन में भारी बदलाव आया है।     स्त्री भी इस सत्य से प्रभावित हुई है और स्त्री लेखन में इन के प्रत्याघात अंकित हैं । 
      अक्सर स्त्री लेखन करतीं समस्त महिलाएं अपने व्यक्तिगत जीवन में से समय निकाल कर ही अपने लेखन को आकार - प्रकार  दे पातीं हैं। 

मैं इन महिलाओं से तादात्म्य स्थापित कर पाती हूँ चूंकि मैं भी अपनी पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवहारगत जिम्मेदारियां निभाते हुए लेखन कार्य से जुडी रही हूँ। 
सं. १९८९ से अमरीका में रहती हूँ और भारतीय समाज में हो रही तब्दीलियों  के साथ साथ, उत्तर अमरीका के समाज को नजदीक से देखा परखा है और उसी के बारे लिखा है।  
दोनों मुल्कों के नागरिकों के प्रति मेरे मन में  चिंता भी है और भविष्य के लिए फिर भी , शुभआशा  ही बलवती हुई है। 
विश्व में मनुष्य की प्रगति और उन्नति के प्रति मैं सदैव सजग रही हूँ। जो भी देखा है और अनुभवों के आधार पर  सीखा है उस से ही लेखन कार्य संपन्न किया है। 
हाँ यह  कह  सकती हूँ कि मेरा ब्लॉग लेखन मेरी साहित्य साधना का एक हिस्सा  रहा है। 
कविता संग्रह ' फिर गा  उठा प्रवासी ' , उपन्यास ' सपनों के साहिल ' देवदासी प्रथा पर आधारित, महिला उत्थान विषय पर  केन्द्रित हैं। 
अमरिकी  समाज में रहतीं महिलाओं के जीवन से जुडी कथाएँ और सर्वथा  भारतीय परिवेश में महिला की स्थिति दर्शाती कहानियाँ  मेरी तीसरी पुस्तक ' अधूरे अफ़साने ' कहानी संग्रह में समाहित हैं। साथ साथ विविध विषयों पे सामयिक आलेख, यात्रा विवरण , संस्मरण , शोध इत्यादी ब्लॉग लेखन में निरंतर उभरे हैं। 
जो महिलाऐं  साहित्य साधना से मुख नहीं मोड़ पातीं वे सतत सृजनशील रहतीं हैं। चाहे वे जिस किसी परिस्थिति में क्यों न रहें ! यह स्वभाव बन जाता है। 
मेरा ब्लॉग ' लावण्यम अंतर्मन ' विविध विषयों पर शोधपूर्ण आलेखों का संग्रह है। 
' लावण्यम अंतर्मन '  ब्लॉग पर कई अनोखे  विषयों की जानकारी लिए हुए आलेख पढ़ पायेंगें। 
कुछ महत्त्वपूर्ण विषय आपके साथ साझा कर रही हूँ।
१ ) यु. एन. ओ. UNO  में हिन्दी :   
http://www.lavanyashah.com/2011/09/blog-post.html 
२ ) प्रवासी भारतीय अमरीका में 
३ ) महिला दिवस 2013 : बलात्कार कैसे रोके जाएं? http://www.lavanyashah.com/2013/03/file-2013-2013.html
४ ) स्त्री सशक्तिकरण और द ग्लास सीलिंग’ = "शीशे की छत " कोर्पोरेट कल्चर पर आधारित आलेख 
http://www.lavanyashah.com/2010/09/blog-post.html
  कुछ अंश -    
 ग्लास सीलिंग मुहावरे के मशहूर हो जाने पर इस पर संशोधन भी हुए। संशोधनों के बाद यह भी पता चला है कि सन १९८४  में 'एड्वीक' पत्रिका के एक आलेख में, गे ब्र्यायनट ने सबसे प्रथम ग्लास सीलिंग मुहावरे का प्रयोग किया था । अब तो खोज विस्तृत होने लगी और पता चला कि, १९७९ में ह्यूलीट पेकार्ड कंपनी में कार्यरत केथरिन लाव्रेंस और मेरीएन श्र्च्रेइबेर नामक दो महिलाओं ने इसी मुहावरे को समझाते हुए कहा था कि, बाहरी तौर पर महिलाओं की प्रगति भले सुचारू रूप से चलती हुई दिखलाई दे परंतु इस प्रगति के अवरोध में अदृश्य, पारदर्शक अवरोध खड़े किये जाते हैं, जो महिला कर्मचारी के प्रगति, प्रमोशन और सर्वोच्च पद पर आसीन होने के मार्ग में बाधाएँ व रुकावट उत्पन्न करते हुए हर स्थान पर हर प्रगति के रास्तों पर अवरोध उत्पन्न करने के लिए रखे जाते हैं ।
अमरीका में ऐसे एकल परिवारों की संख्या में वृद्धि हो रही है जहाँ परिवार का ' मुखिया' = माने हेड ऑफ़ द फ़ेमेली ' एक स्त्री पात्र है सन १९७० से ऐसे परिवारों की संख्या में निरंतर बढ़ावा हो रहा है और ऐसे परिवार अमरीका में बड़ी तादाद में हैं परंतु वे अकसर ग़रीबी की रेखा के नीचे रहते हैं। 
ज़्य़ादादातर, ऐसे स्त्री मुखिया वाले एकल परिवार की महिलाएँ तलाकशुदा होतीं हैं या इनमें से कई बिन ब्याही माएँ हैं । सन` २०००  की जन गणना के आँकड़ों के अनुसार ११ % प्रतिशत परिवार अमरीका में ग़रीबी की हालत में जी रहे हैं जबकि २८  प्रतिशत एकल मुखिया स्त्री वाले परिवार ग़रीबी की हालत में जीने को बाध्य हैं। बिनब्याही माँ अकसर कच्ची या कम उम्र में माता बनी हैं। पढाई शिक्षा सिर्फ़ स्कूल तक सीमित होते ना उनके पास कोई डिग्री है ना कोइ ऐसा हुनर है जिस के तहत उन्हें अच्छा रोज़गार प्राप्त हो सके इस कारण ऐसी महिलाओं को नौकरी या पेशा भी ऐसा ही मिल पाता है जो उन्हें कम आय ही प्राप्त करवाता है। बच्चों की परवरिश के लिए भगौड़े पति या जिनके साथ उनका शारीरिक सम्बन्ध रहा वे व्यक्ति बच्चे की आवश्यकता पूर्ति के लिए पैसा नहीं देते या तो बहुत कम हिस्सा अपनी सीमित आय में से दे पाते हैं। बच्चे के लिए प्राप्य ऐसी धनराशि को चाईल्ड सपोर्ट कहते हैं। अमेरीका में ' तलाक' ही धन की समस्या या इकॉनोमिक दीवालियेपन का एक प्रमुख कारण है।
अंत में महिला लेखन की चुनौतियों को हम महिलाएं स्वीकार करते हुए संघर्षरत रहें और हमारे ईमानदारी से परखे प्रसंग, अनुभवों से आगामी पीढ़ी का मार्ग दर्शन करने में हम धैर्य एवं साहस के साथ निरंतर आगे बढ़ें यही कृत संकल्प करते हुए मानव कल्याण की भावना से पूरित सर्वोदय के लिए प्रयासरत रहें यह मंगल कामना करें। 
भारत की बेटी आगे बढ़े। अंतरिक्ष के द्वार कल्पना चावला ,  सुनीता विलियम्स जैसी भारत की बिटिया के लिए अब खुले हैं।   
उस तरह  प्रत्येक  महिला के लिए भी सीमाऐं  ना ही ब्रह्माण्ड के विस्तृत छोर  तक रहीं हैं ना ही स्त्री के कोमल ह्रदय की कंदराओं में वे कैद रहे पाएंगीं ।
नारी मन की भावनाओं को मुक्तांगण चाहिए ! उन्हें मुक्त धारा में बहने दें। पयस्विनी अमृत धारा ने ही मानव शिशु को अमृत पान करवाया है और विष - पान से बचाया  है। अत : महिला लेखन, स्त्री सृजन सृष्टि का नियामक अधिनियम एवं बल है और सदैव रहेगा।  इसे मुक्तगगन में विहरने दो ! 
कविता : कौन यह किशोरी ?
चुलबुली सी, लवँग लता सी,

कौन यह किशोरी ?

मुखड़े पे हास,रस की बरसात,

भाव भरी, माधुरी !

हास् परिहास, रँग और रास,

कचनार की कली सी,

कौन यह किशोरी?

अल्हडता,बिखराती आस पास,

कोहरे से ढँक गई रात,

सूर्य की किरण बन,

बिखराती मधुर हास!

कौन यह किशोरी?

भोली सी बाला है,

मानों उजाला है,

षोडशी है या रँभा है ?

कौन जाने ऐसी ये बात!

हो तेरा भावी उज्ज्वलतम,

न होँ कटँक कोई पग,

बाधा न रोके डग,

खुलेँ होँ अँतरिक्ष द्वार!

हे भारत की कन्या,

तुम,प्रगति के पथ बढो,

नित, उन्नति करो,

फैलाओ,अँतर की आस!

होँ स्वप्न साकार, मिलेँ,

दिव्य उपहार, बारँबार!

है, शुभकामना, अपार,

विस्तृत होँ सारे,अधिकार!

यही आशा का हो सँचार !

-श्रीमती  लावण्या दीपक शाह 

परिचय :   श्रीमती लावण्या दीपक  शाह

 सुप्रसिद्ध कवि स्व० श्री नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं और वर्तमान में  अमेरिका में रह कर अपने पिता से प्राप्त काव्य-

परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

समाजशास्त्र और मनोविज्ञान विषयों में बी.ए. (आनर्स) की उपाधि प्राप्त 

लावण्या , भारत के  सुप्रसिद्ध पौराणिक ' जयगाथा ' पर आधारित 

महाग्रंथ का दूरदर्शन पर  प्रसारित स्वरूप टीवी धारावाहिक "महाभारत" के 

लिये  कुछ दोहे लिख चुकी हैं। 

भारतीय दूतावास न्यू यॉर्क के निमंत्रण पर संस्था में  कविता - पाठ किया। 

उत्तर अमेरिका में इनकी लिखीं कविताएँ  और स्व० नरेन्द्र शर्मा और 

स्वर- साम्राज्ञी लता  मंगेशकरजी से  जुड़े संस्मरण,  अमरीका के 

' स्वरांजलि रेडियो कार्यक्रम '  लिंक : 
http://www.sopanshah.com/lavanya/Swranjali_LavanyaShah_1.mp3

 एवं ' सलाम नमस्ते ' रेडियो कार्यक्रम   डलास  शहर , टेक्सास प्रांत अमेरिका से  प्रसारित हुए हैं।

स्व. गायक मुकेशजी पर आधारित संमरणात्मक रेडियो वार्ता यूरोप के 

नैधरलैंड प्रांत से प्रसारित हुए ।  


वे , उत्तर अमरिका की '  अंतर राष्ट्र्रीय हिन्दी समिति ' द्वारा प्रकाशित मुख 

पत्रिका ' विश्वा ' में उप - सम्पादिका हैं। लिंक  :


कोलम्बस ओहायो शाखा में :


President — Smt. Lavanya Shah


कविता पुस्तक  " फिर गा उठा प्रवासी "  इन्होंने अपने पिता जी की 

प्रसिद्ध कृति " प्रवासी के गीत "  को समर्पित की हैं। 

उपन्यास ' सपनों के साहिल ' का प्रकाशन हो चुका है। उपन्यास का 

दीर्घकालीन फलक  सन १९२० के भारत से चलकर  स्वतन्त्र भारत की 

कहानी से जुड़ा २१ वीं सदी तक ४ पीढ़ियों की गाथा को  समेटे हुए है। 

लावण्या जी की प्रकाशनाधीन पुस्तकें : 

१) भारत के अमर युगल पात्र 

२ ) सुंदरकांड : भावानुवाद 

३ ) अधूरे अफ़साने - कथा संग्रह-  इत्यादी 


लावण्या दीपक शाह के ब्लॉग : 

१ ) अंतर्मन - अंतर्मन - लिंक : 


२ ) लावण्यम ~ अंतर्मन 


मेसन , ओहायो उत्तर अमरीका से