Sunday, June 10, 2007

४८ पाली हिल~ आशियाना युसुफ खान उर्फ दीलिप कुमार साहब का : ~


४८ पाली हिल ~
आशियाना युसुफ खां उर्फ दिलीप कुमार साहब का : ~`
" न राजा रहेगा न रानी रहेगी .. ये दुनिया है फानी सो फानी रहेगा ये माटी सभी की कहानी कहेंगी " 

..याद है न ये गीत ? वी.शाँताराम जी की कहानी चित्रपट पर यही सन्देश सुनाते हुए  इस गीत के जरीये  इस "सत्य " को जिसे हमने इतिहास की कई ध्वँस अवशेष हुई इमारतोँ मेँ भी देखा है। कोई भी बाकी नहीँ रहा ! ना टीपू न अशोक ! ना ऐलेक्जेन्डार न सीज़र ! न अकबर ना शिवाजी !
आज यह खबर जब टाइम्स मेँ देखी तो पुराने दिन याद आये।  समाचार पात्र में खबर छपी थी कि ' पाली हिल मुम्बई शहर के बान्द्रा उपनगर  में स्थित दिलीप कुमार साहब का बँगला अब टूटनेवाला है।  बांद्रा उपनगर हमारे खार नामक  उपनगर के बस बगल मेँ है।  वहीं पर छोटी पहाड़ी नुमा ढलान को पाली हील कहते हैं। ये इलाका, काफी हराभरा हुआ करता था। बचपन से न जाने कितनी बार, हम वहाँ लम्बी वोक करते हुए पहुँच जाया करते थे।  जब कुछ बडे हुए, तब हमे फिल्म देखने का  का शौक भी लग चुका था। 
 मेरी अम्मा सुशीला नरेन्द्र शर्मा  हमेँ फिल्म देखने के लिए  सिर्फ टीकट का पैसा दे देतीँ थीँ।  तो थियेटर तक हम , मैँ और मेरी बहने ; वासवी और बाँधवी और बडे ताउजी की बिटिया गायत्री दीदी  और हमारी मछेरन कामवाली जो मेरी पक्की सहेली थी , काशी यह हम सारे लोग - पैदल ही चले जाते थे। 
कभी  बान्द्रा टाकीज़, तो कभी लीडो सिनेमा, जो जुहु किनारे था, या फिर कभी बान्द्रा स्टेशन के पासवाला 'नेप्च्यून टाकीज़ " वगैरह !  कई बारी पाली हिल या जुहु और डाँडा के बीच बाँध के रास्ते से भी चल कर पहुँचते थे। 
 एक बार काशी के मछुआरे रीश्तेदार ने लकडी की नाँव मेँ हमे लीडो तक पहुँचाया था ! 
 एक दफा, "मधर इँडीया " देखने अम्मा भी साथ थीँ तब अम्मा ने कुछ पैसे देकर एक बैलगाडी वाले से हम बच्चोँ को कुछ दूरी तक बैठने के लिये राज़ी कर लिया था और वह मेरी मेरी  एकमात्र " बैलगाडी यात्रा" रही है मेरे जीवन की ;-) तो, पाली हिल का इलाका हिन्दी सिने जगत की कई नामी हस्तियोँ का ठिकाना रहा है।  
~ ~ दिलीप कुमार साहब का बँगला ४८ पाली हिल के नाम से ठीक बस्ती के बीचोँबीच एक "एन्कर" की तरह विराजमान है। आज टाइम्स मेँ पढा कि यह "लेन्डमार्क" भी अब टूटने वाला है ! पढ़कर सचमुच बहुत दुख हुआ सोचने लगी ...' क्या बम्बई इतनी तेज़ी से बदल रहा है ? '

मेरा शहर ..जहाँ मेरा जन्म हुआ, बडी हुई और  ३ साल के लिये केलीफोर्निया के "लोस ` अन्जीलिस" शहर मेँ भी रह कर वापिस बँबई रहने आ गई थी  तब पापा जी अम्मा के पास रहना मेरे जीवन का एक अनमोल स्मृति कोष है। 
सुना है, श्री दिलीप कुमार जी का नाम भी मेरे पापाजी ने ही सुझाया था। 
~~~ बोम्बे टाकीज़ की फिल्म "हमारी बात" के लिये एक नया स्टार पसँद किया गया था ~
` युसुफ खाँ ~` देविका रानी जो निर्मात्री थीँ उन्हेँ नया नाम रखने की सूझी।  एक नाम जहाँगीर भी चुना गया था पर, दिलीप कुमार पापाजी के ज्योतिष ज्ञान के हिसाब से बडा लकी" साबित होनेवाला था और हुआ भी !!
खैर !!

आज दिलीप कुमार जी को दादा साहेब फालके पुरस्कार से नवाज़ा गया है। जो मेरी नज़रोँ मेँ उन्हेँ बहुत पहले ही मिल जाना चाहिये था!
सायरा बानो और उनकी माँ सुँदरी नसीम बानो जी का घर भी , दिलीप सा'ब के पुराने घर के नज़दीक ही है। 

हमारे घर १९ वेँ रास्ते खार से आँबेडकर रोड की ऊँचाई की तरफ बढते हुए पाली हिल के हरीयाले छोटे से टीलेदार इलाके मेँ प्रवेश करने पर पहले खलनायक प्राण साहब का बडा मकान आता है। उनके कुत्ते के लिये लाल किला नुमा कुत्ता ~ घर बनवाया गया था :-) जिसे देखकर हमेँ बडा अचरज होता था !
फिर आगे कमाल अमरोही साहबट्रेजेडी-क्वीन =मीना कुमारी जी का फ्लेट पहले मँज़िल पर वह मकान पडता था।  उसकी दाहिनी तरफ सिर्फ लडकियोँ की स्कूल पेटीट हाई स्कूल जिसके सामने एक फ्लेट मेँ सँगीतकार अनिल बिस्वासजी की पत्नी आशालता जी व उनके बच्चे रहते थे। फिर वहाँ नायिका वीणा जी का घर भी था। 
 मीना जी के घर से आगे बढने पर उषा किरन और डो.मनहर खेर ( तन्वी आज़्मी के माता , पिता - तनवी, शबाना के भाई फोटोग्राफर आजमी से ब्याही हैँ )  और ठीक सामने दीलिप सा'ब का घर था! 
इस घर मेँ असँख्य पर्शीयन कार्पेट हुआ करते थे।  सायरा जी व दिलीप सा'ब  की शादी के बाद, शाम के खाने पर सिर्फ २०० के करीब लोग आमँत्रित थे। जिसमेँ राज कपूर कृष्णा राज कपूर, देवानँद व कल्पना कार्तिक जी जैसी सुप्रसिध्ध हस्तियाँ थीं और पापा , अम्मा और हम ४ बच्चे भी थे! लोन पर जगमगाते रोशनी के बल्ब के बीच सायरा जी हल्की सी गुलाबी साडी मेँ कितनी सुँदर दीख रहीँ थीँ वह किसी भी फोटो मेँ कैद न हो पाया है !

उनकी नाज़ुक ,लँबी गरदन पर बेशकिमती हीरोँ का हार एक पतली सी धागे की डोरी से बँधा देखा था मैँने ! टूट जाता उसका शायद उन्हेँ डर भी नहीँ था !
 दिलीप अँकल पापा जी को बहुत प्यार करते थे।  मेरी बडी बहन वासवी के जन्म के बाद वे अस्पताल से उनकी बडी गाडी मेँ पहली बार अम्मा और उस नवजात बच्ची को पापाजी के घर तक लाये थे।  दिलीप अंकल की सबसे बडी बहन "आपा" जी  का उनके घर पर राज चलता था।  भरेपूरे कुनबे का वही पूरा पूरा ध्यान रखा करतीँ थीँ। 
 शादी के कई वर्षोँ बाद दिलीप सा'ब सायरा जी  के घर पर ही अक्सर रहा करते थे और अपने घर भी आया , जाया करते थे। उनका परिवार भी फलफूल कर बढता जा रहा था। 
 दिलीप सा'ब जैसा शालीन व्यक्ति , हर समय हँसमुख, उर्दु ज़बाँ के धनी और सच्चे एहसास वाले लोग फिल्म इँडस्ट्री मेँ कम ही हुए हैँ।  ये सारी बातेँ उनके व्यक्तिगत जीवन से जुडी हुई हैँ। उनकी फिल्मी कारकिर्दी के बारे मेँ तो बहोत कुछ लिखा गया है और सभी जानते हैँ।  
देवदास, मधुमती,गँगा जमुना,लीडर..जैसी फिल्मोँ को दर्शक वर्ग क्या कभी भुला पायेगा ? ना ...कभी नहीँ
तो दिलीप अँकल से पापाजी के जाने के बाद मिलना हुआ था। 
वासवी को उन्हेँने समय दिया था और कहा था कि ' आ जाओ..सायरा जी के बँगले पर ! ' 
मैं और वासवी पहुँचे तो घर के बडे की तरह पूछा था, " फ्रेश होना है क्या ? " फिर पापा जी से जुडी उनकी यादोँ को बयान करने लगे ..
" ऐ दोस्त, किसी हमदमे दरीना का मिलना
बेहतर है मुलाकातेँ मसीहा और फिज़ार से .."
जिसे हमने पुस्तक ,"शेष ~ अशेष" मेँ " एक हसीन शख्शियत " के तौर पर छापा है। 
अब आगे पढिये - दिलीप सा'ब ने और क्या क्या कहा ...

क्रमश:

Thursday, June 7, 2007

मँजी हुई अदाकारा : रेखा जी !




रेखा जी के जीवन के बारे मेँ इतना तो सभी जानते हैँ कि वे दक्षिण भारत के मशहुर नायक शिवाजी गणेशन की पुत्री हैँ ...माँ का नाम था पुष्पवल्ली -
रेखा की और बहनेँ भी हैँ जिन्हेँ वे बहुत प्यार करतीँ हैँ - एक बार ब्याह भी किया तो अजीब हादसा हुआ कि उनके पति की १ माह के भीतर मौत हो गई !
फिल्मोँ मेँ कच्ची ऊम्र मेँ काम शुरु किया " सावन ~ भादोँ " मेँ नवीन निस्चल के साथ रुपहले पर्दे पर सशक्त अभिनय किया तो दर्शकोँ ने उन्हेँ साँवले रँग की होते हुए भी सराहा. बिस्वजीत के साथ उनकी कुछ सनसनीखेज़ तस्वीरेँ भी आईँ थीँ जिसे उनकी कारकीर्दी को बढावा देने के लिये ही समाचार पत्रोँ मेँ छापा गया. उस वक्त की रेखा सही शब्दोँ मेँ "बिन्दास" कहीँ जा सकतीँ हैँ --


मैँने उन्हेँ देखा था रणधीर कपूर और बबीता की शादी के वक्त ! रेखा जी ने उस वक्त काँजीवरम सिल्क की साडी पहन रखी थी और अब आपको शायद ताज्ज्जुब हो पर वे जया भादुरी जी के साथ साथ उस कपूर परिवार की शादी के जलसे मेँ घूम रहीँ थीँ !
उसके बाद मैँने रेखा जी को नीतू और ऋषि कपूर की शादी के समय बडी तन्मयता से, नीतू के साथ साथ लग्न -मँडप मेँ भी ध्यान से सारी विवाह की विधि को सम्पन्न होते देखा था ! लोगोँ की ,भीड के बीच नीतू जिन्होँने उपवास भी किया था शायद, वे कुछ पल के लिये बेहोश हो गई थी तब भी रेखा जी उसके साथ सहारा देतीँ साथ खडीँ थीँ --

सुना है कि रेखा जी का ह्र्दय बहोत विशाल है और लाख मना करने पर भी, वे नीतू जैसी खास सहेली को कई सारे तोहफे देतीँ थीँ !

उसके बाद, रेखा जी के जीवन मेँ तब्दीलीयाँ आईँ -- गोसिप न करते हुए, इतना ही कहुँगी कि, जो भी उनके अनिभव रहे रेखा जी ने हमेशा एक गरिमापूर्ण चुप्पी साधे रखी है ! हाँ अक्सर, फिल्मफेर अवार्ड शो मेँ उन्हेँ स्टेज पर बुलाया जाता है तब रेखा जी उम्र के इस पडाव मेँ भी , अपने से आधी ऊम्र की नई नई सिने तारिकाओँ की भीड के बीच भी सबसे सुँदर, सबसे हसीँ नज़र आतीँ हैँ -- जब वे "गुलज़ार साहब" का कोई शेर दोहरातीँ हैँ तब सच्चे दिल से बोली हुई उनकी बात दर्शकोँ के दिल को भी छू जाती है ! उनकी आँखोँ मेँ आँसू मानोँ ठहरे हुए रहतेँ हैँ पर हँसतीँ हैँ तब खुल के हँसतीँ हैँ और उन्हेँ "सुँदर" पुकारने पर शर्मा भी जातीँ दीखलाई देतीँ हैँ !

दूर से यह सब देखकर, मेरे दिल से तो इस मँजी हुई अदाकारा के लिये, दुआ ही निकलती है --

ईश्वर रेखा जी को खुशहाल रखेँ ! ये मेरी कामना है

...ऐसा क्यूँ होता है कि, हम किसी भी इन्सान की कद्र या प्रशँसा उनके चले जाने के बाद ही किया करते हैँ ?? क्या, हम, उदारता से किसी अच्छे इन्सान की अच्छाइयोँ के बारे मेँ कहने से, लिखने से, या तारीफ करने से कतराते हैँ ?

ऐसा क्योँ करते हैँ हम लोग ? बुराई ,ईर्ष्या, जलन, कटुता, वैर, झगडा करने मेँ हम अक्सर आगे क्योँ रहते हैँ ?
...........ये इन्सान की सोच का हिस्स्सा भले हो, क्या, कोई तारीफ के २ शब्द लिख देने से, हमारी धन दौलत या सम्पत्ति कम हो जायेगी ? "शब्दे किम्` दरिद्रता ?"

आज कुछ ऐसे ही विचार आये और लिख दिये .........

अब सुन रही हूँ," वो क्या जगे है दोस्तोँ, वो कौन सा दयार है ..."


Wednesday, June 6, 2007

३ गीत जिन्हेँ आप ने शायद सुना हो या ना सुना हो ...




(1)
श्री लँका के लोक गीत का आधार लेकर सलिल दा ने इस बँगाली गीत की सँरचना की थी ~ "सात भाई चँपा जागो रे जागो रे" -
स्वर है कोकीला सुश्री लता मँगेशकर जी का ~
" Lata Mangeshkar "
The combination of Salil Chowdhury and Lata Mangeshkar changed the course of modern Bengali song for ever. The song 'na jeo na' became one of the most important and most beautiful Bengali songs in history. Bengalees were thrilled to get Lata singing Bengali songs with practically flawless accent. She became one of them and the wonderful songs Salil composed for Lata during the next three decades still remain possibly the most melodic and lyrical Bengali modern songs.
LM1
Jaa re ja re ude jare paakhi
1959
MA5
LM2
Naa jeo na
1959
PR3
-LM3
O baansi haay
1960
PR5
LM4
Ogo aar kichu to naai
1960
MA3
LM5
Saat bhaai champa jagorey(based on a SriLankan folk song)
1961
MB2
SB1
~इस गीत को सुनकर मन मेँ एक छवि खडी हो जाती है , साँथाली युवती, महुआ के पेड के नीचे मानोँ थिरक रही हो अपनी ही मस्ती मेँ दुनिया से बेखबर ...
(2)
और यह गीत है जिसे श्री कनु घोष जी ने स्वरबध्ध किया ओर
राग: हँसकिँकिणी मेँ खूबसुरती से गाया है
लता जी ने ...
साल १९५७ फिल्म: नया ज़माना
(3)
और ये गीत की बँदिश दी के.महावीर जी ने जिनके पिताजी महावीर प्रसाद कथक जी स्वामी हरि वललभ जी से जुडे हुए थे स्वामी जी के नामसे जलँधर मेँ सँगीत सम्मेलन होते आये हैँ गीत के बोल हैँ
"साँझ भयी घर आजा रे पिया "
It is a Private song composed by K. Mahavir and Written by Abhilash in 1973.






Sunday, June 3, 2007

मेजबाँ बनते बील गेट्स्` आपके गरेबाँ तक . " Surface ".

श्रीमान` बील गेट्स` के घर का अतिथि सत्कार का कमरा

http://specials.rediff.com/money/2007/jun/02sld5.htm
अतिथि आप और कोफी की या चाय की मेज़ आपका कम्प्युटर !

अजी उतना ही क्यूँ ? ये आपके मनोरँजन की विविधता लिये आपके दोस्तोँ , पत्नी , प्रेयसी या मित्रोँ के सँग लगातार कई घँटे तक आपको मनोरँजन, ज्ञान, खोज, खेलकूद, इत्यादी कई तरीकोँ से बहलाये रखने मेँ समर्थ "माइक्रोसोफ्ट कँपनी " की नई इजाद है
--तो, मिलिये," सरफेस से "....
अभी तो इसकी कीमत तकरीबन $५,००० से $ १०,००० /- तक रखी गई है जो आम आदमी की पहुँच से परे है -
बडी होटलेँ जैसे कि, "हाराज़ ऐन्टरटेनमेन्ट इन्क." ( जो लास -वेगस शहर मेँ भी बडे पैमाने पर यात्रीयोँ की सुविधा का प्रबँध करती है
-और ' स्टारवुड होटल एन्ड रीज़ोर्ट वर्ल्डवाइड इन्क" जैसी प्रख्यात और समृध्ध होटल चेन आपको
"सरफेस " से मुलाकात करवाने की पहल मेँ हैँ --

मनोरँजन, आपकी मनचाही खरीदारी और जीवन से जुडकर, जल्द ही श्रीमान्` बील गेट्स का यह नया उपहार / आविष्कार " सरफेस" आप के लिये, "मेजबाँ बनता हुआ...सीधा आपके गिरेबाँ तक कब्ज़ा जम्मा लेगा ..! " :-)
और कुछ माह के बाद, आम जनता भी इसे खरीदने की ललक मेँ भागेगी, सबसे समीप के, बेस्ट बाय " या मोल की दुकानोँ पर !

Saturday, June 2, 2007

ईश्वर सत्य है ! आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन पर ...



ईश्वर सत्य है !
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www.srijangatha.com से
१७९० मेँ प्रथम काला सागर पार कर के मद्रास के एक अनाम व्यक्ति , मेसेच्य्सेट्स के सेलम की गलियोँ मेँ पहली बार पहुँचे थे - १८२० से १८९८ तक ५२३ और लोग आ पाये. १९१३ तक ७००० और आये. १९७१ मेँ, कोन्ग्रेस ने इस पर रोक लगा दी. १९४३ मेँ जब चीन के अप्रवासीयोँ पर से रोक उठाई गई तब प्रेसीडेन्ट रुज़वेल्ट के बाद आये ट्रूमेन के शासन काल मेँ ३ जुलाई १९४६ मेँ " एशियन अमेरीकन सिटीज़नशीप एक्ट " पारित किया था. "हिन्दी असोशीयेन ओफ पसेफिक कोस्ट " ने १ नवम्बर १९१३ मेँ "गदर" पत्रिका मेँ घोषणा की ," हम आज विदेशी भूमि पर अपनी भाषा मेँ ब्रिटीश सरकार के विरुध्ध युध्ध की घोषणा करते हैँ " --- इससे सँबध्ध लाला हरदयाल, दलित श्रमिक मँगूराम और १७ वर्षीय इँजीनीयर करतार सिँह सरापा जैसे हिम्म्ती कार्यकर्ता थे --
१६ नवम्बर १९१५ के अपयशी दिवस , १९ वर्षीय सरापा को भारत मेँ, फाँसी पर चढाया गया था. शहीद भगत सिँह ने सरापा को अपना गुरु माना था. सरापा का अँतिम गीत था," यही पाओगे, मशहर मेँ जबाँ मेरी बयाँ मेरा,मैँ बँदा हिन्दीवालोँ का हूँ खून हिन्दी, जात हिन्दी,यही मज़हब, यही फिरका,यही है, खानदाँ मेरा !मैँ इस उजडे हुए भारत के खँडहर का ही ज़र्रा हूँ यही बस पता मेरा, यही बस नामोनिशाँ मेरा !"ना जाने सरापा की अस्थियाँ गँगा मेँ मिलीँ या नहीँ ?? :-((
पर, हिन्दी भाषा भारती , तो ,सँस्कृत की ज्येष्ठ पुत्री है !
ऐसा सँत विनोबा भावे जी का कहना है और आज यह हिन्दी की भागीरथी विश्व के हर भूखँड मेँ बहती है जहाँ कहीँ एक भारतीय बसता है ...मेरी कविता मेँ मैँने कहा है,
" हम भारतीय जन मन मेँ कहीँ गँगा छिपी हुई है "
" गँगा आये कहाँ से रे गँगा जाये कहाँ रे,
लहराये पानी मेँ जैसे धूप ~ छाँव रे "
सौम्य स्वर लहरी हेमँत दा की सुनतीँ हूँ तब हिन्दी भाषा का मनोमुग्धकारी विन्यास मन को ठीठका कर , स्तँभित कर देता है ..
आज हिन्दी भाषा से मेरे सँबँध की ओर एक विहँगम द्र्ष्टिपात करते हुए स्मृति मेँ एक शब्द बार बार आ रहा है
-- "नमकीन " !
मेरे पूज्य पापाजी हम चारोँ भाई बहनोँ के साथ हमेशा हिन्दी मेँ ही बतचीत किया करते थे. इस प्रकार हिन्दी मेरे शैशव से मिली, विरासत है. हाँ अम्मा गुजराती भाषा का ही उपयोग किया करतीँ थीँ चूँकि वे गुजरात से थीँ. इस तरह गँगा जमनी भाषा का प्रभाव मुझ पर बना रहा है जो आज तक कायम है. तो हाँ ,जैसे मैँ आपसे कह रही थी ना कि, "नमकीन " शब्द आज क्यूँ याद आ रहा है ? तो कारण था, कि पापा बँबई से देहली जा रहे थे और हर बच्चे से वे पूछ रहे थे कि,
"बताओ तुम्हारे लिय देहली से क्या लाऊँ ? "
मुझे पापा जी के जाने का बहुत दुख था परँतु आँसुओँ के बीच अचानक बोली," मेरे लिये "नमकीन " लाना पापा ! "
पापा जी प्रसन्न हो गये ये सुनकर और मुस्कुराते हुए अम्मा से कहा," सुन रही हो, लावण्या को नमकीन चाहिये !" ~`
खैर ! जब वे लौटे तब बडे चाव से उन्होँने एक दालमोँठ का पेकेट मेरी तरफ , बढाते हुए कहा ,"ये लो तुम्हारा नमकीन !" और मैँ फूट फूट कर रोने लगी !
अम्मा , पापाजी दोनोँ घबडा गये कि ऐसा क्यूँ हुआ? ये लडकी रोने क्यूँ लगी ? अम्मा ने गोद मेँ भरकर जब प्यार से सहलाते हुए पूछा कि "रो क्योँ रही है हम्म लावण्या ?
यही तो माँगा था न तुमने - "नमकीन " ?
तो रोते हुए मैँने कहा " ये नमकीन नहीँ है ! "
तब अम्म समझ गईँ कि, मुझे भारी भरकम, या नये नये हिन्दी या अन्य भाषाओँ के शब्द , सुनते ही याद हो जाते थे और उनका प्रयोग मैँ अक्सर मेरी हर बातचीत मेँ डाल दिया करती थी. आज भी जिसका नतीजा ये निकला था कि बिना समझे हुए कि "नमकीन " किसे कहते हैँ,
मैँने उस की फरमाइश कर दी थी ! :-)
केलेन्डर के पन्ने सरसर्राते हुए, सालोँ की समँदर सी फैली धारा को पार करते आज २००७ मई माह के समापन पर रुकी है ~~
और जून माह के बाद जुलाई मेँ, अँतराष्ट्रीय हिन्दी दिवस सम्मेलन न्यु -योर्क शहर मेँ सम्पन्न होने जा रहा है.
य़े हिन्दी का " परदेस " की भूमि पर हो रहा "महायज्ञ "ही तो है. पिछले कई इसी तरह के सम्मेलनोँ मेँ हिन्दी की महान कवियत्री आदरणीया श्री महादेवी वर्मा जी ने भी समापन भाषण दिया था. भाषा - भारती "हिन्दी" को युनाइटेड नेशन्स मेँ स्थान मिले ये कई सारे भारतीय मूल के भारतीयोँ की एक महती इच्छा है. ये स्वप्न सत्य हो ये आशा आज बलवती हुई जा रही है. इस दिशा मेँ बहुयामी प्रयास यथासँभव जारी हैँ.देखते हैँ कि न्यु -योर्क शहर मेँ स्थित ये अन्तर्राष्ट्रीय सँस्था U.N.O. = ( यु.एन्.ओ. ) कितनी शीघ्रता बरतता है "हिन्दी" को स्वीकार करने मेँ ! न्यु योर्क शहर का इलाका जो मुख्य है उसे "मेनहेट्टन " कहा जाता है -- देखिये ये लिन्क
-- http://en.wikipedia.org/wiki/Manhattan
इस का बृहद प्रदेश " न्यु -योर्क " कहा जाता है --
या उसका चहेता नाम है, 'बीग ऐपल" या फिर "गोथम सीटी '--
http://en.wikipedia.org/wiki/New_york_city --

भौगोलिक स्तर पर ये पाँच खँडो मेँ बँटा हुआ है - उन्हेँ "बरोज़" कह्ते हैँ .जिनके नाम हैँ -
ब्रोन्क्स, ब्रूकलीन,मनहट्टन, क्वीन्स और स्टेटन आइलेन्ड.
इसे डच मूल के लोगोँ ने १६२५ मेँ बसाया था और ३२२ क्षेत्रफल या ८३० किलोमीटर मेँ फैला यह विश्व का बृहदतम शहरी इलाका है जिसकी आबादी १८.८ कोटि जन से अधिक है. यहाँ विश्व के हर प्रदेश के लोग आपको दीख जायेँगे.ऐसे महानगर मेँ भारतीय दूतावास के सौजन्य से व भारतीय विध्या भवन के सँयोजन से जिसके कर्णधार श्रध्धेय डो.जयरामन जी हैँ , हिन्दी का समान होने जा रहा है.इस सम्मेलन मेँ कई सारे लोग कमिटी मेँ काम कर रहे हैँ - - स्वेच्छासे कार्य भार उठाये अपने रोजमर्रा के बहुयामी, व्यस्त जीवन से समय प्रदान करते हुए सहर्षसारी गतिविधियोँ मेँ हिस्सा ले रहे हैँ.
जाहिर है कि जो सारे हिन्दीवाले न्यु योर्क शहर के आस पास रहते हैँ वे श्रमदान देने मेँ सक्षम हैँ
मेरी तरह हज़ारोँ मील दूरी के शहर मेँ रहनेवाले हिन्दी प्रेमीयोँ को इस समय बेसब्री से इँतज़ार करना ही नसीब है कि कब हम इस भव्य कार्यक्रम मेँ शामिल होँगे !
उत्साह इस बात का भी है और एक तरह की उत्कँठा भी है कि, " क्या होगा वहाँ पर?"
आयोजन की सफलता पर सँदेह नही है. परँतु ये भी शँका है, कि इस सम्मेलन के बाद क्या हिन्दी को सम्मानित दर्जा , अँतराष्ट्रीय स्तर पर मिल सकेगा ?? कि सिर्फ बुध्धीजीवी वर्ग की चेतना से जुडी हिन्दी भाषा भी सीमित दायरोँ मेँ बध्ध होकर रह जायेगी?
हिन्दी के उत्थान मेँ कार्यरत अनेक हिन्दी प्रेमीयोँ से वहाँ मुलाकात होगी ये तथ्य उत्साह दे रहा है.
"अभिव्यक्ति " व अनुभूति " की सँपादीका मेरी सखा कवियत्री श्रीमती पूर्णिमा बर्मन जी सुना है शारजाह ( यु.ए.ई.) से पधार रहीँ हैँ.
जिनसे मेरी मुलाकात "काव्यालय" जाल घर के सौजन्य से करीब १९९३ के करीब हुई - जब मैँने उनके दोहे वहाँ पढे और "ई- मेल" से सम्पर्क किया था. काव्यालय = वाणी मुरारका जी ने स्थापित किया है. जिसे वे कलकत्ता से प्रेषित करतीँ हैँ और कई सारी हिन्दी काव्य रचनाओँ का सँग्रह काव्यालय पर है.
उन्होँने प्रोध्योगिकी व विश्वजाल मेँ हिन्दी के बढते कदम की नीँव रखते हुए, अथक परिश्रम किया है.वे खुद भी अच्छी कविताएँ लिखतीँ हैँ और अपने वेब -मगेज़ीन मेँ निश्पक्षता से कई हिन्दी लिखनेवालोँ को स्थान देतीँ आयीँ हैँ और हिन्दी के लिये गहरी सँवेदना रखतीँ हैँ.ख्यातनामा हास्य रस के सम्राट श्रीमान अशोक चक्रधर जी का आगमन भी सँभाव्य है ! अनुमान है कि, वे कवि सम्मेलन मेँ हमेशा की तरह छा जायेँगे और एक बार फिर, अपना लोहा मनवाते हुए सुननेवालोँ को हँसाते हुए लोट पोट करेँगे. उनकी हास्य कविता मे समाज की विषम परिस्थितीयोँ को परखने की तीव्र द्र्ष्टि है जो हल्के से बात कह जाती है और बाद मेँ श्रोतागण देर तक सोचते रह जाते हैँ !" सृजनगाथा " के भीष्मपितामह श्रीमान जयप्रकाश मानस जी के आगमन से हिन्दी के कार्य को बल मिलेगा. उनकी पैनी निगाह से विश्वजाल की कोई भी प्रगति, दीशा या आविष्कार अछूता नहीँ ! वे बहुआयामी पत्रिका के सफल सँपादक ही नही है, अपितु बडे धैर्यसे छत्तीसगढ जैसे भारत के एक ग्रामीण व शहरी अँचलोँ की दोहरी सँस्कृति को समेटे, अपने निबँधो मेँ सँयत भाषा प्रयोग करते हुए , कम शब्दोँ मेँ बहुत कुछ कह जाते हैँ . हिन्दी के इस महायज्ञ मेँ इन सारे महानुभावोँ की " आहुति" , " यज्ञ ज्वाला " को परिमार्जित करते हुए यशस्वी बनायेगी ये मेरा विश्वास है.यहाँ अमरीका मेँ बसे हुए , श्री अनूप भार्गव जी, डो. अँजना सँधीर जी ,रससिध्ध कवि श्रीमान राकेश जी खँडेलवाल , कनाडा से कवियत्री श्रीमती मानोशी चटर्जी,श्री समीर लाल जी इत्यादी कई सारे लोगोँ के आने की सँभावना है. भारत सरकार के बाहरी गतिविधियोँ के मँत्री मँडल ने ( External Affairs Ministry ) यह आँठवा -८वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन , १३, १४ और १५ जुलाई के दिनोँ मेँ न्यु योर्क मेँ आयोजित करना तय किया तब स्थल का चुनाव हुआ " फेशन इन्स्टीट्य्ट ओफ टेक्नोलोज़ी " ( जो कि २७ वीँ गली ७ वेँ एवेन्यु पर स्थित है ), वहाँ सम्पन्न होना निस्चित्त किया गया है. उत्तर अमेरीका के प्रमुख सँघ जैसे कि, " अँतराष्ट्रीय हिन्दी समिती" "विश्व हिन्दी न्यास " - "विश्व हिन्दी समिती " इत्यादी को भारतीय विध्या भवन के अँतर्गत, इस कार्यक्रम को सफल बनाने की जिम्मेदारी सौँपी गयी है.
हर हिन्दी भाषा के चाहनेवालोँ की दुआएँ, प्रार्थनाएँ सँलग्न हैँ कि आगे भी हिन्दी का मार्ग प्रशस्त होता रहे.सँभावनाएँ कई हैँ !!
मार्ग, आगे, अनदेखा, अन्चिन्हा है !!
परँतु निस्वार्थ परिश्रम व हिन्दी प्रेम के सम्बल से लिपटा हुआ है. अगर हिन्दी भाषा जीवित रहेगी, फूलेगी - फलेगी तभी तो हमारी भारतीय सँस्कृति, हमारा वाङमय, हमारी धरोहर भी सुरक्षित रह पायेगी !जीवन यापन की आपाधपी मेँ, भारतमाता के बालक, दुनिया के सात सँमँदर पार कर के , विभिन्न प्रेदेशोँ मेँ जा बसे हैँ !
अपने त्योहारोँ को मनाते समय, वे भारत भूमि से सीधा सँबँध स्थापित कर लेते हैँ.
गहरे महासागर के जल के ठीक बीचोँबीच एक शाँत, द्वीप की तरह जहाँ भारतीय अस्मिता का "माटी का नन्हा दीप" अखँड ज्योति का प्रकाश फैलाता , अकँपित जलता है --
जिसकी ज्योति, मानस की ज्योति है. हमारे पुरखोँ के पुण्यकी आस्था है !
परमात्मा श्री कृष्ण से यही माँगती हूँ कि इस " दिये " का तेल कभी भी न घटे !
२००७ से इस का प्रकाश और भी प्रखर होकर विश्व की पीडित, दमित , थकी हुई प्रजा को भौगोलिक परिस्थितीयोँ से परे ले जाकर, आत्म विश्लेक्षण का अवसर दे .चिर शाँति का पाठ दोहराया जाये जिस से "विश्व - शाँति " का बीज , पल्लवित हो कर, भारत के बरगद की तरह हर प्राणी को छाँव देने की क्षमता, चिर स्थायी करे !
अस्तु .........आइये,
हम और आप, हर तरह की पूर्व ग्रँथि को खोलकर एक जुट होकर, यथासँभव योगदान करेँ ताकि हिन्दी भाषा की गरिमा फिर एक बार, भारतेन्दु हरिस्चन्द्र जी के शब्दोँ को चरितार्थ करे.
" निज भाषा उन्नति ही उन्नति का मूल है "
आओ, प्रण करेँ हिन्दी सेवा का, हिन्दी प्रेम का !
" जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरीयसी".
...........सत्यमेव जयते !

Wednesday, May 30, 2007

जब काली रात बहुत गहराती है,...... याद तुम्हारी आती है !




जब काली रात बहुत गहराती है, तब सच कहूँ, याद तुम्हारी आती है !

जब काले मेघोँ के ताँडव से,सृष्टि डर डर जाती है,

तब नन्हीँ बूँदोँ मेँ, सारे,अँतर की प्यास छलकाती है.

जब थक कर, विहँगोँ की टोली, साँध्य गगन मे खो जाती है,

तब नीड मेँ दुबके पँछी -सी, याद, मुझे अक्स्रर अकुलाती है!

जब भीनी रजनीगँधा की लता, खुदब~ खुद बिछ जाती है,

तब रात भर, माटी के दामन से, मिलकर, याद, मुझे तडपाती है !

जब हौलेसे सागर पर , माँझी की कश्ती गाती है,

तब पतवार के सँग कोई, याद दिल चीर जाती है!
जब पर्बत के मँदिर पर,घँटियाँ नाद गुँजातीँ हैँ

तब मनके दर्पण पर पावन माँ की छवि दीख जाती है!
जब कोहरे से लदी घाटीयाँ,कुछ पल ओझल हो जातीँ हैं

तब तुम्हेँ खोजते मेरे नयनोँ के किरन पाखी मेँ समातीँ हैं

वह याद रहा,यह याद रहा, कुछ भी तो ना भूला मन!

मेघ मल्हार गाते झरनोँ से जीत गया बैरी सावन!

हर याद सँजोँ कर रख लीँ हैँ मन मेँ,

याद रह गईँ, दूर चला मन! ये कैसा प्यारा बँधन!
--- लावण्या