Thursday, July 19, 2007

समन्वय सेतु " डॉ. पी. जयरमन जी व श्रीमती तुलसी जयरमन जी से परिचय - ( निर्देशक, भारतीय विद्या भवन, न्यूयॉर्क )

http://www.srijangatha.com/2007-08/july07/usakidharti%20se-lshah.htm
आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन से संबंधित स्थायी समिति मेँ अनेक नाम ऐसे हैँ जो पहले से ही जग विख्यात हैँ -- जैसे,

1) विदेश सचिव 1) डॉ. कर्ण सिंह 2 )सचिव, (राजभाषा विभाग) 2) डॉ. एल.एम. सिंघवी और कई ऐसे नाम भी हैँ जो लेखन जगत से हैँ -
जैसे 12) संयुक्त सचिव (संस्कृति विभाग), पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय 12 )श्री बालकवि बैरागी, मध्यप्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री, पूर्व संसद सदस्य और प्रसिद्ध लेखक 14) श्रीमती मृणाल पांडेय, मुख्य संपादक, हिंदुस्तान 15) श्रीमती चित्रा मुद्गल, साहित्यकार 16) डॉ. इंदिरा गोस्वामी, प्रसिद्ध असमी साहित्यकार 23) डॉ. अशोक चक्रधर, प्रसिद्ध कवि और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय दिल्ली के सेवानिवृत्त प्राध्यापक

19) डॉ. जे वीरा राघवन, निदेशक, भारतीय विद्या भवन, दिल्ली 20) डॉ. पी. जयरमन, निदेशक, भारतीय विद्या भवन, न्यूयॉर्क 21) डॉ. बालशौरि रेड्डी, पूर्व संपादक, चंदामामा और प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार 26) श्री सैय्यद रहमतुल्ला साहेब, हिंदी विभागाध्यक्ष, मद्रास विश्वविद्यालय, चेन्नै 27) डा. राम संजीवैया, महासचिव, मैसूर हिंदी प्रचार समिति, मैसूर

अब क्रम १९ से २७ तक के नामोँ पर जरा दुबारा द्रष्टि डालेँ -
- तो आपको ज्ञात हो जायेगा कि ये सारे नाम हमारे दक्षिण भारत से सामने -आये -- महानुभाव हैँ !
यह कुछ ऐसे नाम हैँ , कुछ ऐसे महत्वपूर्ण समन्वयकारी हिन्दी प्रेमीयोँ के जिनके प्रयास से ,उतर दक्षिण के बीच निकटता आयी है
जिन्होने न सिर्फ अपने सर्जनात्मक जीवन से , भारतीय अस्मिता और सँस्कृति को निखारा है और इतना ही नहीँ बल्कि हिन्दी के प्रति वे सजग व समर्पित रहे.
उनके प्रयास इस बात से और भी सराहनीय हो जाते हैँ कि हिन्दी के प्रचलन के खिलाफ कभी कभार दक्षिण भारत से विरोध के स्वर भी सुनाई दिये हैँ. भारत की भाषा भारती " हिन्दी " -- " जनवाणी है " !
इस मेँ दो मत नहीँ ! -


परँतु दक्षिण का अपना साहित्य है और अति समृध्ध भाषाएँ भी हैँ ...जैसे, तमिळ, कन्नड, मलयालम और तेलेगु , जिन्हेँ हम कभी अनदेखा न करेँ तो ही अच्छा है .आलव्वार साहित्य की कृति " शिलपाधीकारम्`" जग प्रसिध्ध है
आलवार साहित्य की मूल चेतना के आधारभूत साहित्य, वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत , विष्णुपुराण रहे हैँ ये उक्ति सुनिये, " भक्ति द्रविड उपजी, लाये रामानन्द" " आण्डाल्` रचित कृष्ण भक्ति की वैतरणी है - "तिरुपावै " ,
तिरिकुल्लर`, मणिमेखले,पुरुनानुर,अहनानुर्`,परिपाडल, पुरुप्पोरुल्`,
वेणवा मालै ( जो आठवीँ शती मे रचित तमिळ काव्यशास्त्र है )
सँगम साहित्य महाकवि सुब्रह्मण्यम् भारती का दीर्घ व यशस्वी साहित्य
पुरुनानूर ,..महर्षि अगत्स्य के शिष्य तोल्` कप्पियार जो तमिळ व्याकरण : " तोल्` कप्पियाम" के सर्जक हैँ
ये सभी , भारतीय सँस्कृति के स्तँभ हैँ -
द्रविड सँस्कृति और आर्य सँस्कृति के खेमोँ मेँ इन्हेँ विभाजित करना इन विद्वानोने नहीँ अपनाया बल्कि अपने साहित्य सृजन व साहित्य सेवा से भारत की दक्षिण व उतर के जनपदोँ की भाषा के बीच साँस्कृतिक एकता का सूत्रपात किया गया जो आज, २१ वीँ शताब्दि के आरँभ मेँ, भारतीय अस्मिता की रक्षा व सँबल मेँ, निताँत महत्वपूर्ण भूमिका बनकर नवीन सँरचना मेँ अपना अपना योगदान दे रहा है -
- तमिल भाषा अति प्राचीन है और सँस्कृत के शब्दोँ को ध्वनि रुप मेँ ग्रहण कर आत्मसात किये हुए है -
उदाहरण हैँ ये शब्द : भोगम्`, निधि, नगर, मँगल, नील वितान इत्यादी -- " उदारचरितानाँ तु वसुधैव कुटुबकम्`" के सार्वभौम तत्व की गँभीरता को तमिळ कवि की निम्न पँक्ति मेँ पाकर भारतीय मनीषा की एकात्म चेतना को ह्रदयँगम किया जा सकता है
" यादुम्` उउरे वावरुम्` केलिर्` " अर्थात्` "सारा विश्व मेरा आवास है और जड चेतन, सभी मेरे बँधु बाँधव हैँ " ये सारी माहिती आप को बतला दूँ मैँने .."भक्ति के आयाम " शोध -ग्रँथ "मेँ पढीँ --
जिसे डा. जयरामन जी ने मुझे उपहार स्वरुप भेजी है
यह उनका शोध ग्रँथ है - एक अमूल्य बृहत्` पुस्तिका है --
प्राचीन तमिळ समाज की एक देवी का नाम " कोट्रवै" है जो अम्बिका भवानी के साद्रश्य हैँ -- ये भी उल्लेख किया गया है -
- तो आइये, डा. जयरामन जी से परिचित होँ लेँ :
~ सँस्कृत, हिन्दी, एवँ तमिल साहित्य के विद्वान, भारतीय सँस्कृति तथा साहित्य की एकात्मता के प्रति समर्पित , १८ वर्ष तक अध्ययन कार्य मे रत जन सामान्य के हित के लिये, भारतीय रीज़र्व बेन्क के प्रबँध तँत्र मेँ १६ वर्ष तक कार्यरत , १९८० मेँ न्यू योर्क मेँ भारतीय भवन की स्थापना कर, विगत २२ वर्षोँ से अमेरिका मेँ भारतीय सँस्कृति , परम्परा, दर्शन, भाषा , साहित्य व कलाओँ के प्रचार = प्रसार मेँ वे सँलग्न रहे हैँ -- शैक्षणिक योग्यता " एम्.ए. ( सँस्कृत तथा हिन्दी )पीएचडी.डी.लिट्`प्रमुख प्रकाशन :

१) कवि सुब्रह्मण्यम्` भारती तथा सूर्यकाँत त्रिपाठी निराला के काव्य का तुल्नात्मक अध्ययन ( पीएचडी.का शोध प्रबँध )
२) कवि श्री भारती --

कवि सुब्रह्मण्यम्` भारती की चुनी हुई कविताओँ का हिन्दी रुपान्तर
३) पुरुनानूरु ( प्राचीन तमिल काव्य ) की कथायेँ
४) स्वर्गीय अखिलन के तमिल उपन्यास " चित्त्रुप्पावै" का हिन्दी रुपान्तर ' चित्रित प्रतिमा " के नाम से ( नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित )
५) तमिल - हिन्दी सवयम्` शिक्षक ( के. हि. निर्देशाला का प्रकाशन)
६)चिन्मय - काव्य

( योगी श्री चिन्मय की चुनी हुई अँग्रेजी कविताओँ का हिन्दी पध्य रुपान्तर )
७) जैन धर्म स्वामी विवेकानन्द तथा आधुनिक भारत के निर्माताओ पर अँग्रेजी मेँ सँपादित ग्रँथ
८) शिलम्बु ( तमिळ नाटक - प्राचीन तमिल काव्य "शिल्पाधीकारम्`'पर आधारित )
सम्मान : साहित्य वाचस्पति ( हिन्दी साहित्य सम्मेला -प्रयाग ) साहित्य भूषण ( उत्तर प्रदेश हिन्दी सँस्थान)
अन्य सेवायेँ : आकाशवाणी मद्रास व बँबई से वार्ताकार तथा दूरदर्शन बँबई मेँ " सँचयिता " के नाम से पाक्षिक पत्रिका - कार्यक्रमोँ के प्रस्तोता
[बँबई मेँ डा. जयरमन जी व उनकी धर्मपत्नी श्रीमती तुलसी जी मेरे पापा स्वर्गीय पँडित नरेन्द्र शर्मा व मेरी अम्मा श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा मे घर पर अतिथि बनकर पधारे थे
और वहीँ मैँ, उन दोनोँ से , कन्या- अवस्था मेँ मिली थी] -


श्रीमती तुलसी जयरमन जी :
( जन्म: २१ जनवरी १९३४, मद्रास, भारत)
सन्` १९८० मेँ अमेरीका आगमन. न्यूयोर्क मेँ रहीँ जहाँ १८ अगस्त १९८९ को उनका देहाँत हो गया
लेखन वप्रकाशन : सँस्कृत, हिन्दी, तमिल एवँ अँग्रेजी भाषा व साहित्य की श्रेष्ठ विदुषी थीँ२२ वर्ष तक आकाशवाणी मद्रास तथा बम्बई स्टेशनोँ नेँ कार्यक्रम अधिकारी के रुप मेँ कार्यरत रहीँ." गाँधी अँजलि" और " अपना देश अपना सँगीत " उनकी लोक सँगीत के क्षेत्र की साँस्कृतिक व कलात्मक प्रस्तुति , अत्यँत सराही गई -- सँगीत से सभर उनकी गीत रचना व गायन श्रोता समुदाय को भाव विभोर कर देने मेँ सक्षम रहे -- 'प्रेयर्स अण्टु किम्` " भक्तिपरक श्लोकोँ की पाली कृति थी जिसे स्वामी श्री चिन्मयानन्द जी के साथ मिलकर तैयार किया था तुलसी जी ने -- नेशनल बुक ट्रस्ट के लिये ८ सर्वोत्तम उपन्यासोँ का हिन्दी से तमिल मेँ अनुवाद किया. तमिल के सँत अरुणगिरिनाथर के तमिल काव्य " कन्दरनुभूति" को उन्होँने हिन्दी काव्य रुप मेँ " स्कन्दानुभूति " के नाम से प्रस्तुत किया. अँग्रेजी साहित्य : रामायण और नो गाँधी इन वन हँड्रेड वेज़ - बहुत लोकप्रिय रहीँ हैँ"मेरी चिँतन की धारा " उनके लेखोँ का सँग्रह है -स्व. श्रीमती तुलसी जयरमन जी तमिल और हिन्दी के बीच एक मजबूत सेतु रुप थीँ - अनेक विश्व हिन्दी सम्मेलन व विश्व रामायण सम्मेलन जैसे अँतराष्ट्रीय अधिवेशनोँमेँ भाग लेतीँ रहीँ ~~हैद्राबाग आकाशवाणी स्टेशन से त्यागपत्र देकर अपने पति डा. जयरमन जी के साथ अमेरीका आ गईँ जहाँ डा. साहब ने भारतीय विध्या भवन की शाखा को न्यू योर्क मेँ स्थापित कर भारतीय साँस्कृतिक गतिविधियोँ की नीँव डाली जो अमेरीका के विभिन्न शहेरोँ मेँ भारतीय सँस्कृति, दर्शन, धर्म, सँगीत आदि का प्रचार व प्रसार करने मेँ मुख्य भूमिका अदा करने मेँ रत है और तुलसी जी का इन सारी गतिविधियोँ मेँ अनन्य हिस्सा रहा है.वे एक कुशल अध्यापिका व श्रेष्ठ वक्ता भी रहीँ . सँगीत व कविता उनके दो सशक्त पक्ष थे. कुँवर चँद्र प्रकाश सिँह के शब्दोँ मेँ " वे आलवारोँ और कम्बन के तामिलनाडु की अँतरात्मा थीँ और दक्षिण भारत के हिन्दी काव्य की "कोकिला" थीँ "
मरणोपराँत : "हिन्दी का चँदन " कविता सँग्रह प्रकाशित हुआ है. प्रस्तुत है इस सँग्रह की प्रथम कविता :

"हिन्दी का चँदन "
मैँने हिन्दी का चँदन धरा है भाल पर

दूर से देखो मुझेभाल पर दमकते इस तिलक मेँ शोला भरा है !

साहस मत करो ,पास आने का !
उसकी गरिमा को तोलने का-हाँ, यह चँदन नहीँ है शीतल
प्रखर फासफरस -सा है विस्फोताकौर अति उज्ज्वलछूओगे ,
तो जल जाओगेइसे मिटाने का दँभ मत करोयः
ऐसे भाल पर शोभित चन्दन है

जिसकी आभा मेँ कन्याकुमारी की कमनीयता का,यौवन है, तप पावन है

अटल द्राविड की " भिन्नी " पर अँकित बिन्दी है यह
द्राविड का सुहाग अचल है इसका मत उपहास करो

इसमें सौरभ का मार्दव नही है हुँकार भरकर दहाडता शार्दूल है

येमैँने हिन्दी के मुक्तामल से,निज उस को सजाया है, सँवरा है
पानी कितना है इसमेँ,यह परखनेवाले, तुम नहीँ हो !

मोल मुक्ता का वह क्या जानेजो गोताखोर नही है ?ठहरो! सुनो, मेरी बात

-मैँने लिया है इस मुक्ता को,उस आत्मा की धडकन के सँग ही

,जहाँ मेरी तमिळ जननी अँत: सलिला है, कलकण्ठी है

इस मुक्ता को तोलने का मत करो अभियान

यह चढती नहीँ नही तराजू पर इसे उसी कण्ठ पर पाओगेजिसमेँ भारत माँ की विजय के गान को,प्रतिपल मुखरित पाओगे

-वह मेरी तूलिका हिन्दी की है जिसे चलाता तमिल का चेतन कर है

इसे छीनने का मत करो अभियान प्राणोँ की शक्ति समग्र सहेज कर मैँने इसे अपनाया है इसमेँ घुल गया है, मेरा आत्म सम्मान

यह तुम्हारी तलवार की वार से, गिरेगी कहाँ ?

चढकर सूली के मँच पर भी,
अरुनामय ह्रदय मेरा -अँकित करेगा हिन्दी के अक्षर

हाँ - अ -क्षर हिन्दी के अक्षर

हिन्दी को मैँने अपनी रग रग मेँ पाया है

-जरा रहो सावधान !

हिन्दी के ही सँग मेरे उगय -अस्त की,

तटिनी बहती है - अम्लान !
हिंदी मेरी जाह्नवी धारा है -ऋतँभरा है !


श्री तुलसी जी की पुण्य -स्मृति मेँ - साभार कविता सँग्रह " प्रवासिनी के बोल " अमेरीका की हिन्दी कवियत्रियोँ की सँचित कवितावली से साभार --

लेखिका : लावण्या
[ मेरा एक कोना - एक भारत, अमेरीका के मध्य मेँ ]

9 comments:

अनुनाद सिंह said...

आपके लेख से बहुत सारी जानकारियाँ मिलीं।
साधुवाद!

सच ही आपने इनको 'समन्वय सेतु' से विभूषित किया है।

yunus said...

लावण्‍या जी मैंने विविध भारती पर डॉ पी जयरमन की कई वार्ताएं सुनी हैं । उन्‍हें बताईयेगा कि आपकी आवाज़ आज भी विविध भारती में सुरक्षित है । विविध भारती के पुराने लोग उन्‍हें आज भी याद करते हैं ।

अनूप भार्गव said...

लावण्या जी:
इस अमूल्य जानकारी के लिये धन्यवाद । डा. जयरमन जैसे लोग बिरले ही मिलते हैं आजकल । उन जैसे इन्सान बनानें का सांचा भगवान कम ही प्रयोग करते हैं ।

Divine India said...

मैंम,
बहुत अच्छी जानकारी दी कम-से-कम इन महान विभूतियों को यहाँ प्रस्तुत कर कितना बड़ा काम किया है यह व्यक्त नहीं किया जा सकता और आप तो हमेशा से ही यह कार्य बखूबी निभा रही हैं।

Lavanyam -Antarman said...

अनुनाद भाई,
नमस्कार !
जिन महारथी , विद्वानोँ ने अपने जीवन भर ऐसे योगदान किये होँ उन्हेँ हम अनदेखा कैसे करेँ ?
समन्वय की इस समय बहोत जरुरत भी है --
टिप्पणी के लिये धन्यवाद -- यूँ ही स्नेह रखेँ -
स -स्नेह,
--लावण्या

Lavanyam -Antarman said...

युनूस भाई,
डा. जयरमन जी से अवश्य कहुँगी -- आपने जो बतलाया है वो -
पर, एक शिकायत है आपसे -- आपने पहले भी कहा था कि मेरे पापा जी की कयी रीकोर्डीँग्ज़ आकाशवाणी मेँ हैँ - डा.जयरमन जी की भी हैँ -
अगर मैँ उन्हेँ प्राप्त करना चाहूँ तो क्या वे मिल सकेँगी ? उन्हेँ पाने के लिये, क्या औपचारिक्तायेँ करना जरुरी होगा? बतलाइयेगा
स -स्नेह,
--लावण्या

Lavanyam -Antarman said...

अनूप भाई,
डा.जयरमन जी व सौ. तुलसी जी जैसे लोग हमेँ प्रेरणा देते हैँ और हमारा नेक काम करने मेँ उत्साह बढाते हैँ
ईश्वर अपने साँचे से अन्य ऐसी विभूतियाँ निर्मित करेँ यही मेरी आशा है
टिप्पणी के लिये धन्यवाद -- यूँ ही स्नेह रखेँ -
स -स्नेह,
--लावण्या

Lavanyam -Antarman said...

दीव्याभ,
क्रियात्मक्ता एक ज्वार है - जिस ओर धारा बह निकले, वही सही
टिप्पणी के लिये धन्यवाद -- यूँ ही स्नेह रखेँ -
स -स्नेह,
--लावण्या

Farid Khan said...

लावण्या जी.... ।


मैं आजकल अरुणगिरिनाथर के जीवन पर एक स्क्रिप्ट लिख रहा हूँ ।


क्या मुझे अरुणगिरिनाथर की कविताओं का हिन्दी अनुवाद मिल पायेगा ?

मेरा ईमेल - kfaridbaba@gmail.com