Monday, May 21, 2012

ब्लोगिंग / कुछ हिंदी महिला ब्लॉगर्स Q. & A.

ॐ

    विकास ज़ुत्शी भारतीय जन संचार संस्थान -- 9871485270

2010/3/14 Vikas Zutshi <vikaszutshisn@rediffmail.com>
see the attachment
one more thing,

क्या आप अपने विदेश में रहने के अनुभव को ब्लॉगिंग के साथ जो़ड़ सकती हैं ?
और ये सभी सवाल मेरे एक assingment का हिस्सा है । जो मैंने चुना था ।विषय है हिंदीं ब्लॉगिंग और महिलाएँ ।
(as iam doing post graduation in hindi journalism.)

भाई श्री विकास ज़ुत्शी जी ने प्रश्न पूछे थे उनके उत्तर व संदर्भ :
विकास जी , नमस्ते
मेरे विदेश में रहने के कारण ही मेरा, ( एक तरीके से देखा जाए तो ) " हिन्दी - ब्लोगिंग " की ओर रुझान हुआ भारत से दूर रहते हुए भी, न सिर्फ भारत से ब्लोगींग करनेवाले व्यक्तियों के अनुभव, उनके परिवेश व जिस शहर, कसबे या ग्राम में वे आबाद हैं वहां की सच्ची और खरी बातें जान पाने का ब्लॉग -- एकदम बढ़िया विकल्प है ... बनिस्बत , समाचार पत्र व मीडीया के ! ये सत्य मैं जान पायी हूँ और ऐसा मेरा निष्कर्ष एक लम्बे अनुभव के बाद हुआ है उसीने मुझे प्रेरित किया - के मैं भी ब्लॉग लेखन करूं हिन्दी ब्लॉग जगत से जुड़ने का विचार, वहीं से आया .. हिन्दी से जुड़े रहना भी इसी का अंश है . अपने लोगों से जुड़े रहना, अपनी मूल प्रकृति के समीप रहना ये ब्लॉग दुनिया से जुड़ कर ही संभव हो पाया है.
मेरी अपनी बात कहूं तो, मैंने , मुम्बई जैसे महानगर में जन्म लिया और वहीं पर मेरे जीवन का एक दीर्घ कालखंड बिता है . भारत के ग्राम्य जीवन की एक छवि मन में बसी हुई है पर ग्राम्य जीवन को, न ही करीब से कभी देखने का अवसर ही आया और नाही कोइ ग्राम्य जीवन से जुडा अनुभव ही हुआ ! हिन्दी ब्लोगर्स , जो कई सारे भारत के विभिन्न ग्राम प्रांत के बारे में लिखते हैं वो मुझे , मानो , मेरे सामने , एक नयी खिड़की खोलते से नज़र आते हैं ! जब् भी मैं, दक्षिण भारत के प्राचीन और भव्य मंदिरों के बारे में पढ़ती हूँ , ( जिन्हें न जाने कब देखूंगी ) तब, मन में एक उल्लास उभरता है और असीम प्रसन्नता होती है उनके बारे में यात्रा विवरण पढ़कर परदेस में बैठे हुए मैं तीर्थ यात्रा कर लेती हूँ मुझे ऐसा महसूस होता है ! दूसरी ओर , छतीसगढ़ के कई गाँवों में आदीवासी जन के कष्टों के बारे में पढ़कर बहोत दुःख होता है और सोचती हूँ, सरकार या समाज कोइ , मदद क्यूं नहीं करता ? ऐसा क्यूं है ? :-( कुछ संस्थाएं हैं पर बदलाव यों नहीं दीखलाई देते ? क्या कारण है जो पिछड़े और दुर्बल तबक्के में पिस रहे लोगों को आज भी इतने कष्ट हैं ? और ये दुखद और कठोर सत्य से ब्लॉग के जरिए ही साक्षात्कार हुआ है . ब्लॉग व्यक्ति की अपनी आवाज़ है , देशकाल से परे , किसी भी दबाव के बिना , हर ब्लोगर, अपने दिल की हर बात, दुनिया के कोने कोने तक पहुंचा सकता है - व्यक्ति स्वातंत्र्य का यह एक उत्तम साधन है - ऐसे ही , कारणों से ब्लॉग की विस्तृत होती दुनिया से मुझे , लगाव हुआ और अपनी बात कहने का, दूसरों की प्रतिक्रया जानने का अवसर भी इसी से मिला - अब आपके प्रश्नों के उत्तर दे रही हूँ !
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
Q. ब्लॉग बनाने का विचार क्यों और कैसे आया ? और अबतक के अपने अनुभव पर क्या कहेंगी ?
A. ' एक दिन , गुगल की ब्लॉग सेवा के बारे में पढ़ते हुए, सारे निर्देश , पढ़ कर ब्लॉग बनाते हुए, मैंने अपना प्रथम ब्लॉग " अंतर्मन " बना लिया था - उसे , अंग्रेज़ी में लिखना आरम्भ किया - उन शुरुआती दिनों में , मैं, ब्लॉग - लेखन कला , सीख ही रही थी देखिये -- ये थी मेरी प्रथम प्रविष्टी ---

TUESDAY, SEPTEMBER 19, 2006

antarman .......from : लावण्या

My Photo
LAVANYA SHAH

In the Infinite space & Time...I'm but a petal of a flower, a drop in the Ocean. SONGS are those ANGEL's sound that Unite US with the Divine.

कई चित्र मूलतः मेरे नहीं है, मुझे इस के मूल चित्रकार के बारे में ज्ञात नहीं है, यदि आप इसके मूल चित्रकार हैं तो अपने बारे में बताएं, मैं स्त्रोत के रुप में आपका उल्लेख कर दूँगी यदि आपको इस लेख के प्रकाशन पर आपत्ति है तो कृपया प्रमाण सहित बताइए मैं इस को हटा दूँगी

(Rest of my Text + all material is copy righted under USA laws )

VIEW MY COMPLETE PROFILE


Hello World,
Feels good to be somewhere in between the world of dreams and reality which is the Cyber space !
Democracy, individualism , a passion for achievements of the finest that is within us is self evident within the diapheonous spheres of existance here like a surrelists dream . The WWW is alive with billion human thoughts and mine is a petal of a flower , a drop within the infinite Ocean of TIME ! So, here I'm , leaving my foot print on the sands of time........for all Eternity !

POSTED BY लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` AT 8:52 PM

फिर, ये पता लगा के इसी नाम का और कोइ ब्लॉग है ! तब मैंने " लावण्यम ~ अंतर्मन " के संशोधित नाम से अपना दूसरा , नया ब्लॉग आरम्भ किया और वहां पर , हिन्दी में लिखना जारी रखा - " लावण्यम्` ~अन्तर्मन्`" मेरी, आपकी, अन्य की बात और जी हां , ब्लॉग सम्बंधित - मेरे सारे अनुभव बढ़िया रहे हैं -- http://www.lavanyashah.com/
Q. बात अगर हिंदी महिला ब्लॉगिंग की करें तो ये देखा जाता है कि अधिकतर महिलाएँ सिर्फ़ साहित्य लेखन को ही अपना विषय चुनती हैं (कविताएँ आदि) , वहाँ वेराइटी की कमी देखी जाती है, ऐसा क्यों?
A. आशा है आप आपके संशोधन विषय को लेकर, मेरे दोनों ब्लोग्स , पढने का कष्ट उठायेंगें :)
तब आप की ये शिकायत कमसकम , मेरे बारे में तो नहीं रहेगी . ये विश्वास है . मैं, कई विषयों पर लिखती रही हूँ -- उदाहरणार्थ : - यात्रा, समाज, धर्म, मॉडर्न कहानी, ज़िँदगी ख्वाब है ...!!
चेप्टर ~ १ से लेकर ...ज़िँदगी ख्वाब है..चेप्टर -- - १० -- कथा का - अँत..



( जिसमे परदेस में बसे भारतीय की छवि है ) अनुभव हैं
कई मुद्दों पर मैंने , यहां उत्तर अमरीका को करीब से देखने के बाद , जितना मैं समझी हूँ , उस के आधार पर लिखा है -- जैसे ये प्रविष्टियाँ देखिएगा . यहां सिर्फ ३ उदाहरण के तौर पर दे रही हूँ . ( समय मिले तब दूसरी कई सारी प्रविष्टी भी अवश्य जांचियेगा ) और भी कई महिलाएं , कई विविध विषयों पे लिखतीं हैं ....
उनपर भी रीसर्च हो ! ...
ये देखिये विवेक जी,
१ )
५* तापमान कैसा होगा ? देखना चाहेंगें ?

२ ) बफेलो ट्रेस :

३ )
पेरेडोक्स (paradox) है अमरीका..

Q. क्या ब्लॉग सामाजिक चेतना, जागरुकता फैलाने में सहायक हो पा रहा है ?
A. हां . लोग दूर देस में रहने वाले दूर बसनेवाले लोगों के दुःख दर्द, उनके सपने, उनकी आशाएं , निराशाएं
उनकी सच्चाई और जीवन के यथार्थ से परिचित होकर ये समझ पाते हैं के वहां भी लोगों को कई सारी विषमताओं से संघर्ष करना पड़ रहा है . इस तरह एक अपनापन , ब्लॉग से उपज रहा है - ब्लोगर्स, आपस में मिलते भी हैं और कई नये दोस्त भी बने हैं . ये सारा एक सफलता का द्रश्य ही तो है ! चेतना तो फ़ैली है ..जब् चेतना रूपांतरित होकर ठोस कर्म बनेगी तब , सामाजिक सफलताएं भी सामने आ पाएंगीं . भला बुरा , हर समाज में और हर व्यक्ति के अन्दर विद्यमान है आप कौन स मार्ग चुन कर आगे बढ़ते हैं वह सर्वथा , आप पे निर्भर है .
Q. इंटरनेट पर आज फ़ेसबुक,ट्विटर और अब बज़ के आने से ब्लॉग अपनी उपयोगिता कब तक बनाए रख पाएगा ?
A. सभी कम्युनीकेशन के विभिन्न औजार हैं .
इन सभी की उपयोगिता , व्यक्ति की मौलिक , पसंद से निर्धारित होगी . रेडियो, टीवी, सिनेमा, फ़ेसबुक,ट्विट, बज़ सभी जारी रहेंगें और लोगों को जोड़ने का काम करेंगें आगे भी और नयी खोज होंगीं . नये तरीके ईजाद होंगें .
Q. अबतक के महिला ब्लॉगर्स के सफ़र को देखकर क्या कहेंगी ?
A. बढ़िया !! शानदार !!
Q. अन्य स्थानों की तरह यहाँ भी ( हिंदी ब्लॉग पर) पुरुषों की संख्या, महिलाओं से काफ़ी अधिक है . जबकी अंग्रेज़ी ब्लॉग इससे बेहतर तस्वीर पेश करता है ,इसके पीछे क्या कारण मानती हैं ?
A. अजी , महिलाओं को घर, परिवार, चूल्हा , चौका , बच्चों की परवरिश , नौकरी , सामाजिक पर्व , उत्सव , अनुष्ठान जैसे अनगिनत कार्य करने होते हैं . हिन्दी ब्लोगिंग इस मायने में समाज का दर्पण है . अंग्रेजींदा महिला ब्लोगर्स अगर ज्यादा हैं ये भी खुशी की बात है . आशा करती हूँ के हिन्दी महिला ब्लोगर्स भी अपनी उपस्थिति, भविष्य में, ज्यादह संख्या में दर्ज करवायेंगी .
Q. ऐसे कुछ हिंदी महिला ब्लॉगर्स के नाम बता सकती हैं ,जो साहित्य लेखन से इतर भी लिखतीं हों ?
:) लगता है आपका रीसर्च पेपर, मैं ही तैयार कर रही हूँ विकास जी :-)
तब क्या मुझे भी १०० / १०० अंक मिलेंगें ?
संगीता पुरी जी गत्यात्मक ज्योतिष पर लिखतीं हैं . ममता जी , यात्रा विवरण बढ़िया लिखतीं हैं !! वे पहले गोवा रहतीं थीं , अब अरुणाचल से लिख रहीं हैं.

mamta


अदा जी बहुत बढ़िया गायिका हैं

अदा'

About में : http://www.shails.com/manjusha/index.htm

रश्मि रविजा


अल्पना वर्मा

रंजना सिंह


डॉ.राधिका उमडे़कर बुधकर

  • Location: India
  • ब्लोग्स : संगीत सम्बंधित ब्लोग्स :


    वीणापाणी
    http://aarohijivantarang.blogspot.com/

    और भी कई महिला ब्लोगर्स हैं जो विविध विषयों पे लिख रहीं हैं --

    Q. ब्लॉगिंग को आने वाले समय में किस रुप में देखती हैं ?

















    A. आगे भी लोग अपने मन की बातें शेर करते रहेंगें और व्यति स्वातंत्र्य और अपने अनुभव को अभिव्यक्ति करने से जुड़े रहेंगें येही अनुमान है

    Q. विदेशों में महिलाऔं और उनसे संबंधित मुद्दों को मुख्यधारा के मीडिया ने जब शामिल करना लगभग बंद कर दिया तो महिला ब्लॉगर्स ने मुखर होकर ब्लॉग का जमकर इस्तेमाल किया । क्या हमारे यहाँ ऐसा संभव ?
A. हां ...नेपोलियन ने कहा था न , " कोइ बात असंभव नहीं अगर कोइ ठान ले तो "
Q . ब्लॉग पर देखा जाता है कि ज़्यादातर टिप्पणियाँ जानने वालों की ही होती हैं, कहीं न कहीं ये ब्लॉग की कम लोकप्रियता, पहुँच में कमी को नहीं दर्शाता है ?
A. कई पढ़ते तो अवश्य हैं किन्तु , टिप्पणी करने से कतराते हैं , किसी को आप फ़ोर्स तो नहीं न कर सकते जिसकी जैसी इच्छा ! अगर ब्लोगिंग करनी है तब , आप प्रामाणिकता से लिखिए.महज टिप्पणी का होना या न होना, आपकी प्रतिभा अभिव्यक्ति या आपके मन की बात उजागर करने का इनाम न मान लें . हां , सकारात्मक सोच रखें और अच्छी बातें लिखें , जो कहीं न कहीं , किसी दिशा को आलोकित अवश्य करेंगीं ..
" अपना जितना काम, आप ही जो कोइ कर लेगा,
पाकर उतनी मुक्ति आप वह औरों को भी देगा ...
एक दीप सौ दीप जलाए मिट जाए अंधियारा "
( ये पंक्तिया परम आदरणीय , राष्ट्रकवि दददा मैथिली शरण गुप्त जी ने लिखीं थीं एक हस्ताक्षर देते समय, जो मेरी बड़ी बहन स्वर्गीय वासवी मोदी की एक पुस्तक में हैं . परंतु, .कहीं छपी नहीं हैं )
Q. ब्लॉग पर किसी तरह के watchdog होने पर क्या कहेंगी ?
A. अगर किसी को ये काम पसंद है तब वह, यही करे. जैसे हर समाज में खुफिया विभाग भी होता ही है क्या पाया , क्या खोया ये आनेवाला " समय " ही तय करेगा . मैं स्वयं, व्यक्ति स्वातंत्र की हिमायती हूँ और साथ साथ, व्यक्ति की शालीनता और गरिमा भी कायम रहे आपके लेखन से किसी के मन को चोट न पहुंचे इस बात का ध्यान रखा जाए आप दूसरों से वही व्यवहार कीजिये जैसा आप खुद के साथ बर्ताव होना पसंद करते हैं . " Do unto others that YOU want , others to do to you " ( as the Bible says )
Q. अगर और कोई जानकारी देना चाहें, जो इन सवालों में रह गई हों तो अच्छा लगेगा
A. मैंने अपना प्रयास किया है आप के मन में कोइ प्रश्न बाकी हों तब फिर पूछ लीजिएगा . अभी इतना ही अब आज्ञा लेती हूँ -- मेरी बात सुनने का शुक्रिया !

स स्नेह,
- लावण्या




Tuesday, April 24, 2012

एरीजोना प्रांत, फीनीक्स शहर , मेरी यात्रा का प्रथम पडाव

ॐ 
बहुत दिनों बाद आज पुन: ब्लॉग लिख रही हूँ ..
आज , साल २०१२ , अप्रैल की २४ तारीख है और अक्षय तृतीया का पवित्र दिवस है 
 मेरी पिछले माह की यात्राओं के बारे में आपको अवगत करवाते हुए कुछ नई जानकारियाँ बतलाना चाहती   हूँ . 
मेरी यात्रा का प्रथम पडाव था फीनीक्स शहर जो ,  अमरीका के दक्षिण - पश्चिम भूभाग में , एरीजोना प्रांत में ,
 ' सोनोरन ' नामक मरुभूमि में  आबाद है .  

Flag ऑफ़ अरिजोना -- > 
Flag of Arizona.svg

 मुख्यत: कृषि प्रधान समाज और संस्कृति का प्राचीन नाम जो इस भूभाग पर आबाद था वह ' होहोकम ' कहलाता था . आज  होहोकम संस्कृति के वंशज ' पीमा ' ; कहलाते हैं 
जो प्राचीन काल में , सोबाएपुरी समाज कहलाता था .
 होहोकम जाति अगावे नामक कैक्टस , कपास , तमाकू , मक्का , बीन्ज़, व कद्दू इत्यादी उगाते थे - 
फीनीक्स भारतीय गरुड पक्षी की तरह पौराणिक कथाओं में विश्व के हर देश की कथाओं से जुडा हुआ दिव्य प्राणी है 
कहते हैं कि , ५०० वर्ष पूर्ण होने पर सुगन्धित द्रव्यों की अग्नि सुलगाकर फीनीक्स पक्षी अग्नि प्रवेश करता है और उसी अग्नि में स्वर्णिम अंड - कोष से एक नया फीनीक्स पक्षी प्रकट हो जाता है और प्राचीन लुप्त हो जाता है ..
चीन, जापान, कोरिया , पर्शिया , रशिया , ग्रीस , यूरोपीय राज्यों में इस चमत्कारी फीनीक्स पक्षी का उल्लेख है 
The Fenghuang (Chinese Phoenix) at the Summer Palace, Beijing, China
 China, the phoenix is called thebusiniao (不死鳥; literally "immortal bird"). -- ---------------------------------------------------------------------------------------> 
फीनीक्स शहर तथा एरीजोना प्रांत की जानकारी के लिए देखे 
१ ) सीटी ऑफ़ फीनीक्स - पहाड़ियों से घिरा हुआ है जिसे ' वेली ऑफ़ सन ' भी कहते हैं और तापमान सालभर  उष्ण रहता  है 
Midtown Phoenix skyline, looking north up Central Avenue
http://en.wikipedia.org/wiki/Phoenix,_Arizona
 २ ) http://az.gov/
- लावण्या 

Citrus Trees of Arizona

Tuesday, December 13, 2011

क्रिसमस की अग्रिम शुभकामनाएँ

क्रिसमस की अग्रिम शुभकामनाएँ – लावण्या शाह

अमरीकी जीवन शैली की ये एक ख़ास बात है यहाँ हर तरह के बदलाव के साथ, जन जीवन यूँ ही, अबाध गति से, व्यस्तता से, जारी रहता है। काम चलता ही रहता है। विषम या अनुकूल, जैसी भी परिस्थितियाँ हों, उनसे जूझने के उपाय फ़ौरन लागू किए जाते हैं और जन – जीवन को सामान्य बनाने के उपाय, शीघ्र लागू करना हरेक प्रांत की नगर निगम सेवा का जिम्मा है। यातायात हर हालत में, जारी रहता है क्यूंकि, सभी को काम पे जो जाना होता है ! जहाँ बिल भरने हों वहां विपरीत परिस्थिति हो, फ़िर रोना कैसा ? रुकना कैसा ? सरकार द्वारा , जनता से लिया गया ” कर ” माने ” टैक्स” , जनता की सुविधा के लिए इस्तेमाल होता हुआ, आप अमरीका में हर जगह पर देख सकते हैं और यही बात शीत ऋतु में भी दिख पडती है । जब बर्फ गिरती है तब लोग अपने घरों के बाहर एकत्रित हुई स्नो को स्नो शवल से दूर करते हैं । ‘ बर्फ हटाना ‘ यह काम बहुत कड़े परिश्रम से ही संभव हो पाता है । चूंकि बर्फ का वजन अधिक होता है और जिन्हें कमजोर दिल की आरोग्य की समस्या हो उनके लिए ये काम खतरनाक भी साबित होता है । इस बात की सूचना टेलीविजन द्वारा प्रसारित की जाती है।
अमेरीकी नगर निगम, ट्रैक्टर नुमा मशीन का इस्तेमाल करती है जो रास्तों पर से स्नो को हटाती हैं और रास्तों पर नमक भी छिड़का जाता है जिससे बर्फ शीघ्र पिघल जाती है। रास्ते साफ़ किए जाते हैं और हवाई जहाजों को भी स्नो रहित किया जाता है। मशीन से केमिकल स्प्रे किया जाता है जिससे बर्फ पिघल जाती है और इस प्रक्रिया को, ” di -icing ” कहते हैं। जब कंट्रोल रूम से,पायलट को उड़ान भरने की स्वीकृति मिल जाती है उसके बाद ही उड़ान के लिए यात्री विमान में सवारी के लिए आमंत्रित किए जाते हैं अन्यथा यात्रीगण प्रतीक्षा कक्ष में इंतज़ार करते हैं।
अमेरीका में आर्थिक मंदी के रहते हुए भी क्रिसमस के सबसे बड़े त्यौहार के आने से असंख्य नागरिक एक हिस्से से दुसरे तक यात्रा करेंगे और अपने-अपने परिवार के लोगों के साथ मिलकर छुट्टी बिताना पसंद करेंगे। स्नो गिरे या बरखा,गरमी हो या लू चले, काम काज चलता ही रहता है ना ! शायद यही आज के अत्यन्त व्यस्त जीवन शैली की देन है समाज को।
अब क्या भारत या क्या विदेश? सभी व्यस्त हैं! अपने अपने कार्यों में! दिसम्बर माह सन २०११ का आख़िरी महीना आने के साथ काल की तुलना नदी और समुद्र से समुद्र बाहरी काल, नदी भीतरी काल नदी हमारे भीतर है समुद्र हमारे चारों ओर रहस्यवादी अनुभूति जिस लोक को छूती है उसमें काल नहीं है वह कालातीत है इलियट ने कहा था, ” काल से ही काल पर विजय होती है ” और बाबा श्री तुलसीदास का दोहा, कहता है,
” पल निमेष परमानु जुग बरस कलप सर चँड,
भजसि न मन तेहि राम कहं काल जासु कोदँड।
दिसम्बर के मध्य में आते ही क्रिसमस से जुडी शख्शियत ‘‘संता क्लोज़’’ का भी इंतज़ार हर बच्चे को रहता है ।
ये हमारे ‘‘सान्ता क्लोज़’’ हैं। संता केवल एक धर्म विशेष के नहीं बल्कि पूरी मानवता के जीवन्त प्रतीक हैं। संता की सफ़ेद बर्फ के बीच में सफ़ेद दाढी की शोभा ही अलग है। आप उन्हें किसी भी नाम से पुकार लीजिये ‘‘संत निकोलस’’, क्रिस क्रींगल, क्रिसमस पिता ऐसे कई नाम से ये पहचाने जाते हैं और दुनिया भर के बच्चे इनका बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। बच्चों को बड़ी उम्म्मीदें लगीं होतीं हैं सान्ता क्लोज़ जी से। चूंकि, वे तोहफे लेकर आते हैं। सान्ता की मदद करने के लिए एक पूरी टीम एल्फ की भी तैयार रहती है। मिसिज क्लोज़ बच्चों को देने के लिए कुकी, केक, पाई, बिस्कुट, केंडी भी तैयार करतीं हैं। साल भर सान्ता क्लोज़ और मिसिज क्लोज़ बच्चों के लिए, खिलौने तैयार करवाते हैं और जादूई थैले में उन सारे गिफ्ट को भर कर ‘‘नॉर्थ पोल’’की बर्फ से घिरी गलियों से सान्ता क्लोज़ आवाज़ लगाते हैं अपने प्यारे और वफादार ‘स्ले’ खींचनेवाले पालतू रेंडीयरों को जिन के नाम हैं, ‘‘रुडोल्फ़, डेशर, डांसर, प्रेन्सर, विक्सन, डेंडर, ब्लिटज़न, क्युपिड और कोमेट’’। सान्ता क्लोज़ ख़ास तौर से क्रिसमस के त्यौहार में बच्चों को खिलौने और तोहफे बांटने ही तो उत्तरी ध्रुव पर आते हैं बाकि का समय वे लेप लैन्ड, फीनलैन्ड में रहते हैं। बहुत बरसों पहले की बात है जब साँता क्लोज और उनके साथी और मददगार एल्फों की टोली ने जादू की झिलमिलाती धूल, रेंडीयरों पर डाली थी उसी के कारण रेंडीयरों को उडना आ गया !! सिर्फ क्रिसमस की रात के लिये ही इस मैजिक डस्ट का उपयोग होता है और सान्ता क्लोज़ अपना सफर शुरू करे उसके बस कुछ लम्होँ पहले मैजिक डस्ट छिड़क कर, शाम को यात्रा का आरम्भ किया जाता है। और बस फुर्र से रेंडीयरों को उडना आ जाता है और वे क्रिसमस लाईट की स्पीड से उड़ते हैं। बहुत तेज।
संत निक के बच्चे उनका इन्तजार जो कर रहे होते हैं। हर बच्चा, दूध का गिलास और ३-४ बिस्कुट सान्ता के लिए घर के एक कमरे में रख देता है । जब बच्चे गहरी नींद में सो जाते हैं और परियां उन्हें परियों के देश में ले चलती हैं, उसी समय सान्ता जी की रेंडीयर से उडनेवाली स्ले हर बच्चे के घर पहुँच कर तोहफा रख फिर अगले बच्चे के घर निकल लेती है । आप सान्ता का सफर यहाँ देख सकते हैं ताकि आपके घर पर वे कब तक पधारेंगें उसका सही सही अंदाज़ , आप लगा सकें।
क्लिक करें – http://www.noradsanta.org/en/home.html
- क्रेब एप्पल के पेड़ पर , ” फिंच ” नामक पक्षी -
- लावण्या दीपक शाह
[ देखें ' प्रवासी दुनिया ' पे भी ]
http://www.pravasiduniya.com/christmas-ki-advance-best-wishes-lavanya-shah

Friday, December 2, 2011

टैगोर की 150 वीं जयंती : गीतांजली के अमर गायक को स्नेहपूर्ण स्मरणांजलि

टैगोर की १५o  वीं जयंती : गीतांजली के अमर गायक को स्नेहपूर्ण स्मरणांजलि



‘एकला चलो रे … तोमार हाक सुने कोयी ना आबे तो तुमी एकला चालो रे – ‘ एकाकी स्वर की करुण पुकार और दृढ निश्चय भरा यह दिव्य स्वर कविवर रविन्द्र नाथ टैगौर की काव्य रचना की इस पंक्ति से उभरा और दिग्दिगंत तक व्याप्त हो गया और कविवर की कीर्ति पताका उनके जन्म स्थान बंगाल तक सीमित न रहकर, विश्व के कोने कोने तक फ़ैल गयी । बंगाल की शस्य श्यामला भूमि पर साहित्य के लिए आगे चलकर सन १९१३ में नोबल पुरस्कार विजेता होने का गौरव प्राप्त करनेवाले भारतीय साहित्यकार, उच्च कोटि के कवि, दार्शनिक, रंगमंच के लिए संगीतबद्ध नाटिकाएं, नृत्य कथाएँ रचनेवाले विलक्षण प्रतिभा के धनी रवीन्द्रनाथ टैगौर के लेखन से उभरे २ गीत , २ देशों के राष्ट्र गान बन कर देश प्रेम की उद्दात भावना उभारते जन मन में अतीव लोकप्रियता प्राप्त करने में सफल हुए हैं । आज हम ऐसे अलौकिक रचनाकार को विनम्र , स्नेहपूर्ण स्मरणांजलि दे रहे हैं और उनके विलक्षण प्रतिभावान जीवन का विहंगावलोकन करते श्रद्धा सुमन निछावर करते हैं।

रवि बाबू का श्वेत श्याम छाया चित्र - यहां वे अपनी डेस्क पर लिखते हुए दिखायी दे रहे हैं
भारतीय राष्ट्र गान, ” जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता ‘ और बांग्ला देश का राष्ट्र गान ” आमार सोनार बांग्ला देश ” रवीन्द्रनाथ की देन है । गांधीजी के लिए ‘ महात्मा ‘ का विशेषण भी गुरुदेव ने ही सबसे पहले उपयोग में लिया था जो आगे चलकर गांधी बापू का पर्याय बना ।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म देवेन्द्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के सन्तान के रूप में ७ मई, १८६१ को कोलकाता के जोरासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। वे ब्राह्मो समाज के अग्रणी परिवार में पल कर बड़े हुए । छोटी उम्र में उन्होंने ‘ अभिलाषा ‘ नामक काव्य लिखा । १३ वर्ष की उम्र होते उनकी माता जी चल बसीं और बड़े भाई ज्योतिन्द्र्नाथ व भाभी कादम्बरी का साथ और प्रोत्साहन मिलता रहा और ‘ कबी कहनी ‘ १८७८ तक छप गयी ।
उनकी स्कूल की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने बैरिस्टर बनने की चाहत में १८७८ में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन १८८० में बिना डिग्री हासिल किए ही स्वदेश वापस आ गए। सन् १८८३ में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ। वाल्मीकि प्रतिभा और काल मृगया , सांध्य संगीत ,निर्झ्रेर स्वप्नभंगे, कोरी ओ कमाल , राजा ओ रानी , मायार खेला, विसर्जन , चित्रांगदा , सोनार तरी , इत्यादी उसी काल की कृतियाँ हैं ।

रवि बाबू का हस्ताक्षर
कविवर की पुत्रियाँ माधुरी लता, रेणुका व मीरा के जन्म के संग संग पारिवारिक जीवन भी गतिशील था और उनकी अनेक साहित्यिक रचनाएं भी उभरतीं रहीं । पुत्र समीन्द्र का जन्म सन १८९४ में हुआ । सन १९०१ में ‘ बंग दर्शन ‘ पत्रिका का कार्य आरम्भ किया और शांति निकेतन में बोलपुर ब्रह्मचर्याश्रम की स्थापना की । सन १९०२ में पत्नी मृणालिनी का देहांत हो गया और ‘ स्मरण ‘ नामक कृति रविन्द्रनाथ जी ने पत्नी मृणालिनी की स्मृति में लिखी और आगे के वर्षों में , पुत्री रेणुका का और १९०५ तक पिता देबेन्द्रनाथ टैगौर का भी निधन हो गया । कोमल कवि ह्रदय पर आघात लगे और गहराए जब पुत्र समीन्द्र के अचानक निधन ने कवि के कोमल ह्रदय को विक्षप्त कर दिया ।
सन १९०९ से अमर काव्य कृति ‘ गीतांजली ‘ की रचना आरम्भ हो गयी थी जिसे उनके यूरोपीयन मित्र विलियम रोथेन्स्ताईन ने रविन्द्रनाथ टैगौर द्वारा अनुदित रचनाएं , ब्रिटेन के कवि येअट्स को सुनवाईं और येअट्स ने टैगौर की अंग्रेज़ी अनुवादित कवितायेँ एजरा पौंड , मय सिंक्लैर , एर्नेस्त रहय को पढ़ सुनाईं तब तक टैगौर अमरीका यात्रा करते हुए आ पहुंचे थे । १०३ कविताओं का संग्रह ‘ गीतांजली ‘ इंडिया सोसायटी ऑफ़ लंदन ने छापीं और यूरोप में इन कविताओं ने धूम मचा दी ! सन १९१३ की १३ नवम्बर को भारत में समाचार बिजली की तरह फ़ैल गये कि रवीन्द्रनाथ टैगौर को साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ है । तब कोलकता विद्यालय ने डी. लिट. की उपाधि से उन्हें नवाजा और ब्रिटिश राज्य सता ने नाईटहूड प्रदान किया जिसे सन १९२० में जलियांवाला हत्याकांड से दुखी होकर कविवर ने लौटा दिया ।
अमरीका के असंख्य शहरों में जैसे सान फ्रांसिस्को, शिकागो, आईयोवा , बोस्टन , फीलाडेल्फीया इत्यादी तथा दक्षिण भारत के शहर जैसे कोईम्ब्तूर, तान्जोर, मद्रास, त्रिची , पालघाट, मैसूर इत्यादी तथा पंजाब , गुजरात में , गांधी जी के आश्रम साबरमती , अहमदाबाद , सुरत पूर्व एशिया के देशों में जैसे रंगून, सिंगापुर , होन्ग कोंग,में टैगौर को लोग सुनने के लिए भारी संख्याओं में उमड़ कर आये और उनके सुलझे और उदात विचारों को सुनकर धन्य हुए । सन १९२० में दुबारा यूरोप के अलग देशों में जैसे ब्रसेल्स , इंग्लैंड , पेरिस , जीनीवा , झुरीख , कोपंन हेगन, वियेना, बर्लिन , स्टोक होम, प्राग इत्यादी में साहित्यिक गतिविधियों में व्यस्त रहे ।

चित्र : फूलों भरी बगिया में कविवर रवीन्द्र नाथ टैगौर
कविवर ने भारत लौट कर विश्व भारती की स्थापना की और चीन के आमन्त्रण पर पेकिंग गये और आगे सूदूर जापान भी पहुंचे । तद्पश्चात वे दक्षिण अमरीका की यात्रा पे निकले जहां आर्जेन्टीना में उनकी मुलाक़ात , कवियत्री विक्टोरिया ओकाम्पो से, ब्युनोईस एरीस शहर में हुई उन्होंने ‘ विजया के नवीन नामकरण से कवियत्री को पुकारा और ‘ पुरबी ‘ रचना लिखी ।
तद्पश्चात , इटली पहुंचकर , मिलान, वेनिस , फ्लोरेंस शहरों की यात्राएं कीं और यूरोप की अगली यात्रा के दौरान ग्रीस, इजिप्त, रोमानिया , हंगरी , बल्गेरिया, चेकोस्वालोवाकिया, नोर्वे, स्वीडन, डेनमार्क भी गये । मलेशिया, जावा, थाई लैंड, केनेडा, रशिया , ईरान, ईराक, श्री लंका की यात्राएं भी संपन्न कीं । उनकी वर्षगाँठ पर गांधी जी शान्तिनिकेतन पधारे और सन १९४० में विश्व प्रिसिध्ध ऑक्स्फ़र्ड विद्यालय ने उन्हें साहित्य विशारद से विभूषित किया । सन १९४१ की ७ अगस्त के दिन भारत के विश्व प्रसिद्ध साहित्य मनीषी ने नेत्र मूँद लिए परंतु उनकी रचनाएं आज भी जन मन के मानस में अपना अक्षुण स्थान बनाकर , उतनी ही प्रसिद्ध हैं जितनी पिछली शताब्दी में थीं । प्रस्तुत है कविवर रविन्द्रनाथ टैगौर की एक कविता ” जन्म कथा ” का हिन्दी अनुवाद :
मेरा मानना है कि ये कविता , मूल बाँग्ला में शायद इतनी मधुर व सारगर्भित होगी कि इसे हिन्दी अनुवाद में ढालना एक प्रकार की धृष्टता ही कहलायेगी । पर, वही काम आज मैंने किया है ! इस कविता को कई बार पढा है और हमेशा भारतीय मनोविज्ञान तथा दर्शन का पुट लिये, एक अलौकिक दिव्यता लिए , इस कविता की शुचिता तथा माँ के शिशु के प्रति अगाढ ममत्त्व के दर्शन से हमें जोड़ने की क्षमता रखती ये कविता मुझे अभिभूत करती रही है।
जन्मकथा :
” बच्चे ने पूछा माँ से , मैं कहाँ से आया माँ ? “
माँ ने कहा, ” तुम मेरे जीवन के हर पल के संगी साथी हो !”
जब मैं स्वयं शिशु थी, खेलती थी गुडिया के संग , तब भी,
और जब शिवजी की पूजा किया करती थी तब भी,
आंसू और मुस्कान के बीच बालक को ,
कसकर, छाती से लिपटाए हुए , माँ ने कहा ,
” जब मैंने देवता पूजे, उस वेदिका पर तुम्ही आसीन थे ,
मेरे प्रेम , इच्छा और आशाओं में भी तुम्ही तो थे !
और नानी माँ और अम्मा की भावनाओं में भी, तुम्ही थे !
ना जाने कितने समय से तुम छिपे रहे !
हमारी कुलदेवी की पवित्र मूर्ति में ,
हमारे पुरखो की पुरानी हवेली मेँ तुम छिपे रहे !
जब मेरा यौवन पूर्ण पुष्प सा खिल उठा था,
तुम उसकी मदहोश करनेवाली मधु गँध थे !
मेरे हर अंग प्रत्यंग में तुम बसे हुए थे
तुम्ही में हरेक देवता बिराजे हुए थे
तुम, सर्वथा नवीन व प्राचीन हो !
उगते रवि की उम्र है तुम्हारी भी,
आनंद के महासिंधु की लहर पे सवार,
ब्रह्माण्ड के चिरंतन स्वप्न से ,
तुम अवतरित होकर आए थे।
अनिमेष द्रष्टि से देखकर भी
एक अद्भुत रहस्य रहे तुम !
जो मेरे होकर भी समस्त के हो,
एक आलिंगन में बध्ध , सम्बन्ध ,
मेरे अपने शिशु , आए इस जग में,
इसी कारण मैं , व्यग्र हो, रो पड़ती हूँ,
जब, तुम मुझ से, दूर हो जाते हो…
कि कहीँ, जो समष्टि का है
उसे खो ना दूँ कहीँ !
कैसे सहेज बाँध रखूँ उसे ?
किस तिलिस्मी धागे से ?
हिन्दी अनुवाद : – लावण्या दीपक शाह